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सूरह 34–49

पाँचवाँ अध्याय

विषय

परमेश्वर के एक, अद्वितीय और साझेदार रहित होने (तौहीद) को प्रमाणित करना,

उसके माध्यम से क़ुरैश क़बीले को सचेत करना (इंज़ार),

पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके अनुयायियों को सत्य के विजयी होने की भविष्यवाणी और उनका शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर)

परिचय

यह पवित्र क़ुरआन का पाँचवाँ अध्याय है। इसमें 'सबा' (34) से 'अल्-हुजरात' (49) तक सोलह सूरतें हैं। इन सूरतों की विषय-वस्तु से यह मालूम होता है कि इनमें से पहली तेरह सूरतें मक्का में और अंतिम तीन मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद मदीना में अवतरित (नाज़िल) हुई हैं।

क़ुरआन के अन्य सभी अध्यायों की तरह, इस अध्याय में भी यह बात ध्यान में रखी गई है कि यह हिज्रत से पहले अवतरित (मक्की) सूरतों से शुरू होता और हिज्रत के बाद अवतरित (मदनी) सूरतों पर समाप्त होता है।

इसमें मूख्य रूप से संबोधन मक्का के क़ुरैश क़बीले से है, परंतु अंतिम सूरतों में जब शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) का विषय शुरू हुआ है, तो संबोधन मुसलमानों से हो गया है।

इसका विषय परमेश्वर के एक, अद्वितीय और साझेदार रहित होने (तौहीद) को प्रमाणित करना, इसके संदर्भ से क़ुरैश को सचेत करना (इंज़ार), पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके मानने वालों के लिए सत्य की विजय (ग़लबा-ए-हक़) की भविष्यवाणी, और उनका शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) है।

क़ुरआन के अंतिम अध्याय की तरह, इस अध्याय की सूरतों को भी इस प्रकार क्रमबद्ध किया गया है कि परमेश्वर के रसूल (स.) के धर्मप्रचार के विभिन्न चरण इस क्रम से पूरी तरह स्पष्ट रूप से सामने आ जाते हैं। अतः सूरह 'फ़ातिर' (35) तक इंज़ार-ए-आम का चरण है, सूरह 'यासीन' (36) बिना जोड़े के एक अलग सूरह है, जिससे इत्माम-ए-हुज्जत का चरण शुरू होता है। इसका समापन सूरह 'साद' (38) पर होता है। इसके बाद सूरह 'अल्-अहक़ाफ़' (46) तक हिज्रत व बराअत का चरण है और अंत में, कार्यवाही की तैयारी, सत्य की विजय और परमेश्वर की सहायता की शुभ सूचना, और तज़्कियह व तत्हीर के चरण की सूरतें हैं। ये सूरह 'मुहम्मद' (47) से शुरू होती हैं और सूरह 'अल्-हुजरात' (49) पर समाप्त होती हैं, जो अध्याय के अंत में बिना जोड़े के एक अलग सूरह है।1234

टिप्पणियाँ 4
  1. इंज़ार-ए-आम: पैग़ंबर के द्वारा सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत करना ↩
  2. इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩
  3. हिज्रत: पैग़ंबर और उनके साथियों का मक्का से मदीना प्रवास। ↩
  4. बराअत्: पैग़ंबर और उनके साथियों का इत्माम-ए-हुज्जत के बाद इस्लाम के नकारने वालों से संबंध तोड़ना या उनसे विरक्ति प्रकट करना। ↩

इस अध्याय की सूरतें