सूरह 43

अज़्-ज़ुख्रुफ़्

मक्की · 89 आयतें · 25 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय परमेश्वर के एक, अद्वितीय और साझेदार रहित होने (तौहीद) को नकारने वालों को सचेत करना (इंज़ार) है। हालांकि, पहली सूरह में तौहीद को प्रमाणित करने और परमेश्वर के सहभागी बनाने (शिर्क) के खंडन का पहलू अधिक प्रमुख है और दूसरी में इंज़ार का जिसमें उन लोगों के लिए कड़ी डांट और इस डांट के प्रमाणों और संकेतों की व्याख्या है जो तौहीद के इस संदेश को पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की मनगढ़ंत बात बता रहे थे और इस प्रकार क़ुरआन के बारे में यह कह रहे थे कि यह क़ुरआन इन्ही का बनाया हुआ है जिसे परमेश्वर का ग्रंथ कहकर पेश किया जा रहा है। क़ुरआन की महानता व महिमा और उसके अवतरण (नुज़ूल) की सटीक व्यवस्था का उल्लेख इसी संदर्भ से किया गया है। दोनों सूरतों को एक ही आयत से शुरू कर के क़ुरआन ने इनके इस आपसी संबंध की ओर स्वयं संकेत कर दिया है।

इन सूरतों में संबोधन मक्का के क़ुरैश क़बीले से है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के हिज्रत व बराअत के चरण में अवतरित हुई हैं।12

टिप्पणियाँ 2
  1. हिज्रत: पैग़ंबर और उनके साथियों का मक्का से मदीना प्रवास। ↩
  2. बराअत्: पैग़ंबर और उनके साथियों का इत्माम-ए-हुज्जत के बाद इस्लाम के नकारने वालों से संबंध तोड़ना या उनसे विरक्ति प्रकट करना। ↩

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

حمٓ ﴿1﴾ وَٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ ﴿2﴾ إِنَّا جَعَلْنَـٰهُ قُرْءَٰنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿3﴾ وَإِنَّهُۥ فِىٓ أُمِّ ٱلْكِتَـٰبِ لَدَيْنَا لَعَلِىٌّ حَكِيمٌ ﴿4﴾

यह सूरह 'हा-मीम' है। यह स्पष्ट ग्रंथ (आप ही अपनी) गवाही है। हमने इसको अरबी क़ुरआन बना कर उतारा है, ताकि तुम समझो। और निस्संदेह, यह मूल ग्रंथ में हमारे पास है, अत्यंत ऊँचा और प्रज्ञता से भरा हुआ।

أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ ٱلذِّكْرَ صَفْحًا أَن كُنتُمْ قَوْمًا مُّسْرِفِينَ ﴿5﴾ وَكَمْ أَرْسَلْنَا مِن نَّبِىٍّ فِى ٱلْأَوَّلِينَ ﴿6﴾ وَمَا يَأْتِيهِم مِّن نَّبِىٍّ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿7﴾ فَأَهْلَكْنَآ أَشَدَّ مِنْهُم بَطْشًا وَمَضَىٰ مَثَلُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿8﴾

फिर क्या तुम्हें स्मरण दिलाने को हम केवल इसलिए अनदेखा कर लें कि तुम हद से बढ़ जाने वाले लोग हो? (कदापि नहीं, हम अपना निर्णायक प्रमाण पूरा करेंगे)। हमने पहले लोगों में भी कितने ही नबी रसूल बनाकर भेजे। इसके बावजूद जो नबी भी उनके पास आता, वे उसका मज़ाक़ ही उड़ाते थे। फिर हमने उनको, जो तुम्हारे इन नकारने वालों से कहीं बढ़कर शक्तिशाली थे, नष्ट कर डाला और बीते लोगों के उदाहरण बीत चुके हैं।

وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ ٱلْعَزِيزُ ٱلْعَلِيمُ ﴿9﴾

और यदि तुम इनसे पूछो कि धरती और समस्त आकाशों को किसने पैदा किया है तो अवश्य ही उत्तर देंगे कि इनको शक्तिशाली और ज्ञानी परमेश्वर ने पैदा किया है।

ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ مَهْدًا وَجَعَلَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴿10﴾ وَٱلَّذِى نَزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۢ بِقَدَرٍ فَأَنشَرْنَا بِهِۦ بَلْدَةً مَّيْتًا ۚ كَذَٰلِكَ تُخْرَجُونَ ﴿11﴾ وَٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَزْوَٰجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلْفُلْكِ وَٱلْأَنْعَـٰمِ مَا تَرْكَبُونَ ﴿12﴾ لِتَسْتَوُۥا۟ عَلَىٰ ظُهُورِهِۦ ثُمَّ تَذْكُرُوا۟ نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا ٱسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا۟ سُبْحَـٰنَ ٱلَّذِى سَخَّرَ لَنَا هَـٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُۥ مُقْرِنِينَ ﴿13﴾ وَإِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ ﴿14﴾

(वही) जिसने धरती को तुम्हारे लिए पालना बनाया और उसमें तुम्हारे लिए मार्ग निकाले ताकि तुम मार्ग पाओ। और जिसने आकाश से एक मात्रा में पानी बरसाया, फिर उसके माध्यम से हमने मुर्दा बस्ती को नवीन जीवन प्रदान किया। इसी प्रकार तुम भी (एक दिन) क़बरों से निकाले जाओगे। और जिसने यह सब अनेक प्रकार की वस्तुएं पैदा की हैं और तुम्हारे लिए नौकाएँ और चौपाये बनाए हैं जिन पर तुम सवार होते हो कि इनकी पीठ पर संतुष्टि से बैठो, जब इन पर संतुष्टि से बैठ जाओ तो अपने प्रभु के अनुग्रह को याद करो और कहो के दोषरहित है वह परम सत्ता जिसने इनको हमारी सेवा में लगा दिया। हम ऐसे नहीं थे कि इनको अपने वश में कर लेते। निस्संदेह हम अपने प्रभु ही की ओर लौटने वाले हैं।

وَجَعَلُوا۟ لَهُۥ مِنْ عِبَادِهِۦ جُزْءًا ۚ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَكَفُورٌ مُّبِينٌ ﴿15﴾ أَمِ ٱتَّخَذَ مِمَّا يَخْلُقُ بَنَاتٍ وَأَصْفَىٰكُم بِٱلْبَنِينَ ﴿16﴾ وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحْمَـٰنِ مَثَلًا ظَلَّ وَجْهُهُۥ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظِيمٌ ﴿17﴾ أَوَمَن يُنَشَّؤُا۟ فِى ٱلْحِلْيَةِ وَهُوَ فِى ٱلْخِصَامِ غَيْرُ مُبِينٍ ﴿18﴾

(यह सब जानते और मानते हुए भी) इन्होंने परमेश्वर के सेवकों में से कुछ को उसका अंग बना डाला है। सत्य यह है कि मनुष्य स्पष्ट रूप से अकृतज्ञ है। क्या अपनी रचनाओं में से उसने अपने लिए बेटियां चुनी हैं और तुमको बेटे देकर आभूषित किया है? और इनकी अपनी दशा यह है कि जब इनमें से किसी को उस बात की शुभ सूचना दी जाती है, जिसका दोष परम दयालु परमेश्वर को देता है तो उसका चेहरा धुंधला पड़ जाता है और वह घुटा-घुटा रहने लगता है और (सोचता है कि) क्या वह पैदा हुई है जो गहनों में पलती और झगड़ों के अवसरों पर मानो गूंगी होती है।

وَجَعَلُوا۟ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ ٱلَّذِينَ هُمْ عِبَـٰدُ ٱلرَّحْمَـٰنِ إِنَـٰثًا ۚ أَشَهِدُوا۟ خَلْقَهُمْ ۚ سَتُكْتَبُ شَهَـٰدَتُهُمْ وَيُسْـَٔلُونَ ﴿19﴾

(इन पर अफ़ोस), इन्होंने फ़रिश्तों को, जो परम दयालु परमेश्वर के सेवक हैं, बेटियां बना दिया! क्या ये उनकी रचना के समय उपस्थित थे? इनकी यह गवाही अब लिख ली जाएगी और इन्हें इसकी जवाबदेही करनी होगी।

وَقَالُوا۟ لَوْ شَآءَ ٱلرَّحْمَـٰنُ مَا عَبَدْنَـٰهُم ۗ مَّا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ ﴿20﴾ أَمْ ءَاتَيْنَـٰهُمْ كِتَـٰبًا مِّن قَبْلِهِۦ فَهُم بِهِۦ مُسْتَمْسِكُونَ ﴿21﴾ بَلْ قَالُوٓا۟ إِنَّا وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِم مُّهْتَدُونَ ﴿22﴾ وَكَذَٰلِكَ مَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِى قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَآ إِنَّا وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِم مُّقْتَدُونَ ﴿23﴾ قَـٰلَ أَوَلَوْ جِئْتُكُم بِأَهْدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمْ عَلَيْهِ ءَابَآءَكُمْ ۖ قَالُوٓا۟ إِنَّا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ ﴿24﴾ فَٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ ﴿25﴾

कहते हैं कि यदि परम दयालु परमेश्वर चाहता तो हम इनकी पूजा नहीं करते। इनको तो इस मामले का कोई ज्ञान नहीं है, ये केवल तीर तुक्के लड़ाते हैं। क्या हमने इससे पहले कोई ग्रंथ इन्हें दिया था कि (अपनी इस मूर्खता के लिए) यह उसका प्रमाण पकड़े हुए हैं? कदापि नहीं, अपितु ये तो कहते हैं कि हमने अपने बाप-दादा को एक श्रेष्ठ मार्ग पर पाया है और हम उन्हीं के साथ-साथ उचित मार्ग पर चल रहे हैं। इसी प्रकार, (हे पैग़ंबर), हमने तुमसे पहले जिस बस्ती में भी कोई सचेत करने वाला भेजा है, उसके खाते पीते लोगों ने यही कहा कि हमने अपने पूर्वजों को एक श्रेष्ठ मार्ग पर पाया है और हम उन्हीं के पदचिह्नों पर चलते रहेंगे। उनके सचेत करने वाले ने कहा: क्या फिर भी कि यदि मैं उससे कहीं सीधे मार्ग की शिक्षा तुम्हारे पास ले आया हूं, जिस पर तुमने अपने पूर्वजों को पाया है? उन्होंने उत्तर दिया: तुम लोग जो कुछ भी दे कर भेजे गए हो, हम उसको मानने वाले नहीं हैं। अतः (नौबत यहाँ तक पहुंच गई तो) हमने उनसे (उनके इस विद्रोह का) बदला लिया। फिर देख लो कि [सत्य को] नकारने वालों का अंत कैसा हुआ।

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦٓ إِنَّنِى بَرَآءٌ مِّمَّا تَعْبُدُونَ ﴿26﴾ إِلَّا ٱلَّذِى فَطَرَنِى فَإِنَّهُۥ سَيَهْدِينِ ﴿27﴾ وَجَعَلَهَا كَلِمَةًۢ بَاقِيَةً فِى عَقِبِهِۦ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ﴿28﴾

ये (पूर्वजों की बात करते हैं तो) याद करें जब (इनके पुरखे) इब्राहीम ने अपने पिता से और अपनी क़ौम के लोगों से कहा था कि जिन्हें तुम पूजते हो, मैं उनसे पूरी तरह बरी हूं। मैं केवल उसी को पूजता हूं जिसने मुझे पैदा किया है। तो कोई संदेह नहीं कि (तुमसे संबंध तोड़ने के बाद) अब वही मेरा मार्गदर्शन करेगा। इब्राहीम ने यह बात एक परंपरा की हैसियत से अपने बाद वालों में छोड़ी ताकि वे इसकी ओर पलटें।

بَلْ مَتَّعْتُ هَـٰٓؤُلَآءِ وَءَابَآءَهُمْ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ ﴿29﴾ وَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ قَالُوا۟ هَـٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِۦ كَـٰفِرُونَ ﴿30﴾

नहीं, (ये इससे अपरिचित नहीं थे), अपितु हुआ यह कि मैंने इनको और इनके पूर्वजों को दुनिया से तृप्त किया, (फिर लंबा समय बीत गया और इनके दिल कठोर हो गए), यहाँ तक कि इनके पास सत्य आया और एक पैग़ंबर भी जो धर्म से संबंधित हर चीज़ को स्पष्ट कर देने वाला है। यह सत्य जब इनके पास आया तो इन्होंने कह दिया कि यह तो जादू है और हम इसको कदापि मानने वाले नहीं हैं।

وَقَالُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ ٱلْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ ﴿31﴾ أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَـٰتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ ﴿32﴾

कहते हैं कि यह क़ुरआन (मक्का और ताइफ), दोनों नगरों के किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं उतारा गया? क्या तेरे प्रभु की दया यही बांटते हैं? दुनिया के जीवन में इनकी आजीविका की सामग्री तो इनके बीच हमने बाँट दी है और इस प्रकार बाँट दी है की एक के स्तर दूसरे से ऊँचे रखे हैं ताकि ये एक दूसरे से काम ले सकें और तेरे प्रभु की दया उससे अच्छी है जो ये एकत्रित कर रहे हैं।

وَلَوْلَآ أَن يَكُونَ ٱلنَّاسُ أُمَّةً وَٰحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِٱلرَّحْمَـٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ ﴿33﴾ وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَٰبًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِـُٔونَ ﴿34﴾ وَزُخْرُفًا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَٱلْـَٔاخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ ﴿35﴾

(ये इस पर इतराएँ नहीं)। यदि यह आशंका न होती कि सब लोग एक ही पंथ के हो जाएँगे (और कोई ईमान पर नहीं रहेगा) तो जो लोग परम दयालु परमेश्वर के नकारने वाले हो रहे हैं, उनके घरों की छतें हम चांदी की कर देते और सीढ़ियां भी जिन पर वे चढ़ते और उनके घरों के द्वार और उनके आसन जिन पर वे तकिए लगा कर बैठते, अपितु (चांदी ही नहीं), सोने के भी। सत्य यह है कि यह सब चीज़ें तो केवल दुनिया के जीवन की सामग्री हैं और परलोक, (हे पैग़ंबर), तेरे प्रभु के यहाँ केवल उनके लिए है जो परमेश्वर से डरने वाले हैं।

وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ ٱلرَّحْمَـٰنِ نُقَيِّضْ لَهُۥ شَيْطَـٰنًا فَهُوَ لَهُۥ قَرِينٌ ﴿36﴾ وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ ﴿37﴾ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَنَا قَالَ يَـٰلَيْتَ بَيْنِى وَبَيْنَكَ بُعْدَ ٱلْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ ٱلْقَرِينُ ﴿38﴾ وَلَن يَنفَعَكُمُ ٱلْيَوْمَ إِذ ظَّلَمْتُمْ أَنَّكُمْ فِى ٱلْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ ﴿39﴾

(इन पर अफ़सोस, ये परम दयालु से विरक्त हैं) और जो परम दयालु की याद से मुँह मोड़ ले, उस पर हम एक शैतान थोप देते हैं, फिर वह उसका साथी बन जाता है। इसमें संदेह नहीं कि ऐसे लोगों को ये शैतान परमेश्वर के मार्ग से रोकते हैं और वे अपनी जगह यह समझ रहे होते हैं कि वे ठीक जा रहे हैं। यहाँ तक कि इस प्रकार का हर व्यक्ति जब हमारे पास आएगा तो अपने शैतान से कहेगा कि काश, मेरे और तुम्हारे बीच पूरब और पश्चिम के दोनों छोरों की दूरी होती! तो कैसा बुरा साथी होगा! कहा जाएगा: (लोगो), जब तुमने (दुनिया में) अपने आप पर अत्याचार ढाए हैं तो आज यह बात तुम्हारे लिए कुछ भी लाभदायक नहीं है कि अब तुम लोग दण्ड में एक दूसरे के भागीदार हो।

أَفَأَنتَ تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ أَوْ تَهْدِى ٱلْعُمْىَ وَمَن كَانَ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿40﴾ فَإِمَّا نَذْهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنْهُم مُّنتَقِمُونَ ﴿41﴾ أَوْ نُرِيَنَّكَ ٱلَّذِى وَعَدْنَـٰهُمْ فَإِنَّا عَلَيْهِم مُّقْتَدِرُونَ ﴿42﴾ فَٱسْتَمْسِكْ بِٱلَّذِىٓ أُوحِىَ إِلَيْكَ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿43﴾ وَإِنَّهُۥ لَذِكْرٌ لَّكَ وَلِقَوْمِكَ ۖ وَسَوْفَ تُسْـَٔلُونَ ﴿44﴾ وَسْـَٔلْ مَنْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رُّسُلِنَآ أَجَعَلْنَا مِن دُونِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ءَالِهَةً يُعْبَدُونَ ﴿45﴾

(ये अंधे और बहरे हो चुके हैं, हे पैग़ंबर)। फिर क्या तुम बहरों को सुनाओगे या अंधों को मार्ग दिखाओगे और उनको जो स्पष्ट पथभ्रष्टता में पड़े हैं? अब यदि हम तुम्हें उठा भी लें तो ये छूट नहीं जाएँगे, इसलिए कि हमने निर्णय कर रखा है कि हम इनसे अवश्य बदला लेंगे, या जिस दण्ड का वचन हमने इन्हें दिया है, वह (तुम्हारे इस दुनिया में होते हुए) तुम को ला दिखाएं तो इसमें भी कुछ कठिनाई नहीं, इसलिए कि हम इन पर पूरा सामर्थ्य रखते हैं। तो (इन्हें छोड़ो और) उस ग्रंथ को दृढ़तापूर्वक थामे रखो जो तुम्हारी ओर वह्य किया गया है। निस्संदेह तुम एक सीधे मार्ग पर हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह तुम्हारे और तुम्हारी क़ौम के लिए एक स्मरण है और आगे तुम सबको इसकी जवाबदेही करनी है। तुमसे पहले हमने अपने जो रसूल भी भेजे हैं, उनसे पूछकर देखो, क्या हमने परम दयालु परमेश्वर को छोड़ अन्य उपास्य भी बनाए हैं कि उनकी पूजा की जाए?

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَقَالَ إِنِّى رَسُولُ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿46﴾ فَلَمَّا جَآءَهُم بِـَٔايَـٰتِنَآ إِذَا هُم مِّنْهَا يَضْحَكُونَ ﴿47﴾ وَمَا نُرِيهِم مِّنْ ءَايَةٍ إِلَّا هِىَ أَكْبَرُ مِنْ أُخْتِهَا ۖ وَأَخَذْنَـٰهُم بِٱلْعَذَابِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ﴿48﴾

हमने मूसा को भी इसी प्रकार अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके अधिकारियों की ओर भेजा था तो उसने उन्हें आह्वान किया कि मैं समस्त लोकों के प्रभु का रसूल है। फिर जब वह हमारी निशानियों के साथ उनके पास आया तो वे उनकी हंसी उड़ाने लगे। और हम एक पर एक जो निशानी भी उन्हें दिखाते थे, वह दूसरी से बढ़कर ही होती थी और हमने उनको दण्ड में भी पकड़ा, ताकि वे पलटें।

وَقَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَ ٱلسَّاحِرُ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ إِنَّنَا لَمُهْتَدُونَ ﴿49﴾ فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ ٱلْعَذَابَ إِذَا هُمْ يَنكُثُونَ ﴿50﴾

प्रत्येक दण्ड के अवसर पर वे कहते थे कि हे मायावी, अपने प्रभु से उस वचन के आधार पर जो उसने तुमसे कर रखा है, हमारे लिए प्रार्थना करो। अब हम अवश्य मार्ग पर आ जाएँगे। फिर जब वह दण्ड हम उनसे टाल देते तो उसी समय वे वचन तोड़ देते थे।

وَنَادَىٰ فِرْعَوْنُ فِى قَوْمِهِۦ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَلَيْسَ لِى مُلْكُ مِصْرَ وَهَـٰذِهِ ٱلْأَنْهَـٰرُ تَجْرِى مِن تَحْتِىٓ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ ﴿51﴾ أَمْ أَنَا۠ خَيْرٌ مِّنْ هَـٰذَا ٱلَّذِى هُوَ مَهِينٌ وَلَا يَكَادُ يُبِينُ ﴿52﴾ فَلَوْلَآ أُلْقِىَ عَلَيْهِ أَسْوِرَةٌ مِّن ذَهَبٍ أَوْ جَآءَ مَعَهُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ مُقْتَرِنِينَ ﴿53﴾ فَٱسْتَخَفَّ قَوْمَهُۥ فَأَطَاعُوهُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًا فَـٰسِقِينَ ﴿54﴾ فَلَمَّآ ءَاسَفُونَا ٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ أَجْمَعِينَ ﴿55﴾ فَجَعَلْنَـٰهُمْ سَلَفًا وَمَثَلًا لِّلْـَٔاخِرِينَ ﴿56﴾

(इससे जब लोगों में बेचैनी पैदा होने लगी तो) फ़िरऔन ने अपनी क़ौम में घोषणा कराई, उसने कहा: मेरी क़ौम के लोगो, क्या मिस्र का साम्राज्य मेरा नहीं है? और ये नहरें भी कि मेरे नीचे बह रही हैं? फिर क्या तुम देखते नहीं हो? यह अच्छा है या मैं इस व्यक्ति से अच्छा हूं जो एक बेकार व्यक्ति है और अपनी बात भी स्पष्ट कह नहीं सकता। (यदि यह पैग़ंबर है) तो ऐसा क्यों नहीं हुआ कि इसके लिए ऊपर से सोने के कंगन उतरे होते या इसके साथ पंक्तियाँ बनाए हुए फ़रिश्ते आते? तो उसने अपनी क़ौम को मूर्ख बनाया और वे उसके कहे में आ गए। निस्संदेह, वे अवज्ञाकारी लोग थे। अतः (अपनी अवज्ञा से) जब उन्होंने हमें क्रोधित कर दिया तो हमने उनसे प्रतिशोध लिया और उन सबको डुबो दिया और उनको अतीत की एक कथा और बाद वालों के लिए एक उदाहरण बना दिया।

وَلَمَّا ضُرِبَ ٱبْنُ مَرْيَمَ مَثَلًا إِذَا قَوْمُكَ مِنْهُ يَصِدُّونَ ﴿57﴾ وَقَالُوٓا۟ ءَأَـٰلِهَتُنَا خَيْرٌ أَمْ هُوَ ۚ مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلًۢا ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ ﴿58﴾ إِنْ هُوَ إِلَّا عَبْدٌ أَنْعَمْنَا عَلَيْهِ وَجَعَلْنَـٰهُ مَثَلًا لِّبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ﴿59﴾ وَلَوْ نَشَآءُ لَجَعَلْنَا مِنكُم مَّلَـٰٓئِكَةً فِى ٱلْأَرْضِ يَخْلُفُونَ ﴿60﴾

और जब (इन्हीं तथ्यों के स्मरण के लिए) मर्यम पुत्र का उदाहरण दिया जाता है तो तुम्हारी क़ौम के लोग उस पर चिल्लाने लगते हैं और कहते हैं कि (उसके अनुयायी भी तो उसे अपना उपास्य समझते हैं, फिर) हमारे उपास्य अच्छे हैं या वह? वे तुम्हारे सामने यह बात केवल उल्टे सीधे वाद-विवाद के लिए उठाते हैं, वास्तव में ये हैं ही झगड़ालू लोग। वह एक व्यक्ति ही था जिस पर हमने अपनी कृपा की और इसराईलियों के लिए उसको (अपनी शक्ति का) एक उदाहरण बनाया और (तुम क्या जानो कि हमारी शक्ति कैसी असीम है)? यदि हम चाहते तो तुम्हारे अंदर से फ़रिश्ते पैदा कर देते जो धरती में तुम्हारे स्थान पर आ जाते।

وَإِنَّهُۥ لَعِلْمٌ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمْتَرُنَّ بِهَا وَٱتَّبِعُونِ ۚ هَـٰذَا صِرَٰطٌ مُّسْتَقِيمٌ ﴿61﴾ وَلَا يَصُدَّنَّكُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ ۖ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴿62﴾

(इनसे कहो, हे पैग़ंबर कि) निस्संदेह वह क़यामत का एक बड़ा प्रमाण है तो उसके घटित होने में संदेह न करो और मेरा अनुसरण करो। यही सीधा मार्ग है और शैतान तुमको (इस मार्ग से) रोकने न पाए। सत्य यह है कि वह तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात ईसा मसीह (अ.स.) जिनका बिना पिता के जन्म, जिनके अद्भुत चमत्कार और जिनके माध्यम से यहूदियों के लिए क़यामत के दिन तक ईश्वरीय दण्ड का प्रकटन वास्तव में क़यामत का एक बड़ा प्रमाण है। ↩
وَلَمَّا جَآءَ عِيسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ قَالَ قَدْ جِئْتُكُم بِٱلْحِكْمَةِ وَلِأُبَيِّنَ لَكُم بَعْضَ ٱلَّذِى تَخْتَلِفُونَ فِيهِ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ ﴿63﴾ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ رَبِّى وَرَبُّكُمْ فَٱعْبُدُوهُ ۚ هَـٰذَا صِرَٰطٌ مُّسْتَقِيمٌ ﴿64﴾ فَٱخْتَلَفَ ٱلْأَحْزَابُ مِنۢ بَيْنِهِمْ ۖ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْ عَذَابِ يَوْمٍ أَلِيمٍ ﴿65﴾

और (याद रखो कि) जब ईसा स्पष्ट निशानियों के साथ आया था तो उसने यह आह्वान किया था कि (लोगो), मैं तुम्हारे पास प्रज्ञान लेकर आया हूं, इसलिए तुमको धर्म की वास्तविकता समझा दूं और इसलिए कि मैं तुम पर कुछ उन बातों की वास्तविकता स्पष्ट कर दूं जिनमें तुम मतभेद कर रहे हो। तो परमेश्वर से डरो और मेरी बात मानो। इसमें कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर ही मेरा प्रभु है और वही तुम्हारा भी प्रभु है तो उसी की भक्ति करो। यही सीधा मार्ग है। पर (इतने स्पष्ट उपदेश के बाद भी) उसके अनुयायियों के अंदर से अनेक समूहों ने संप्रदाय पैदा कर लिए। अतः बर्बादी है उनके लिए एक कष्टदायक दिन के दण्ड की जिन्होंने (परमेश्वर के सहभागी बनाकर) अपनी जान पर अत्याचार किया है।

هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأْتِيَهُم بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿66﴾ ٱلْأَخِلَّآءُ يَوْمَئِذٍۭ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا ٱلْمُتَّقِينَ ﴿67﴾

(इन्हें अब इनकी दशा में छोड़ो, हे पैग़ंबर)। ये तो क़यामत ही की प्रतीक्षा में हैं कि अचानक इन पर आ जाए और इनको सूचना भी न हो। (इन्हें बताओ कि अपने सहभागियों के भरोसे पर न रहें), उस दिन परमेश्वर से डरने वालों के अतिरिक्त सभी मित्र एक दूसरे के शत्रु बन जाएँगे।

يَـٰعِبَادِ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمُ ٱلْيَوْمَ وَلَآ أَنتُمْ تَحْزَنُونَ ﴿68﴾ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَكَانُوا۟ مُسْلِمِينَ ﴿69﴾ ٱدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ أَنتُمْ وَأَزْوَٰجُكُمْ تُحْبَرُونَ ﴿70﴾ يُطَافُ عَلَيْهِم بِصِحَافٍ مِّن ذَهَبٍ وَأَكْوَابٍ ۖ وَفِيهَا مَا تَشْتَهِيهِ ٱلْأَنفُسُ وَتَلَذُّ ٱلْأَعْيُنُ ۖ وَأَنتُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿71﴾ وَتِلْكَ ٱلْجَنَّةُ ٱلَّتِىٓ أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿72﴾ لَكُمْ فِيهَا فَـٰكِهَةٌ كَثِيرَةٌ مِّنْهَا تَأْكُلُونَ ﴿73﴾

मेरे भक्तो, आज न तुम्हें कोई आशंका है और न तुम असंतुष्ट होगे — ये जिन्होंने हमारी आयतों को मान लिया और आज्ञाकारी रहे। तुम और तुम्हारे साथी, सभी स्वर्ग में प्रवेश हो जाओ, तुम्हें प्रमुदित कर दिया जाएगा। उनके आगे सोने की थालें और सोने के प्याले घूम रहे होंगे और उसमें वे सब चीज़ें होंगी जो दिल को भाती और आंखों को आनंद देने वाली होंगी और (उनको शुभ सूचना सुनाई जाएगी कि) तुम इसमें सदा रहोगे। यह वह स्वर्ग है जिसके तुम अपने कर्मों के बदले में उत्तराधिकारी बनाए गए हो। और तुम्हारे लिए उसमें अत्यधिक फल होंगे जिनमें से तुम खाओगे।

إِنَّ ٱلْمُجْرِمِينَ فِى عَذَابِ جَهَنَّمَ خَـٰلِدُونَ ﴿74﴾ لَا يُفَتَّرُ عَنْهُمْ وَهُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ ﴿75﴾ وَمَا ظَلَمْنَـٰهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿76﴾ وَنَادَوْا۟ يَـٰمَـٰلِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَ ۖ قَالَ إِنَّكُم مَّـٰكِثُونَ ﴿77﴾

अपितु, ये अपराधी सदा नरक की यातना में रहेंगे। वह इनसे हल्की नहीं की जाएगी और ये उस में निराश पड़े रहेंगे। इन पर हमने अत्याचार नहीं किया, अपितु ये स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार करते रहे। और ये (नरक के दारोगा को) पुकारेंगे कि हे मालिक! कोई ऐसा उपाय हो कि तेरा प्रभु हमारा काम ही तमाम करदे। वह उत्तर देगा कि (कदापि नहीं), अब तुम को इसी स्थिति में रहना है।

لَقَدْ جِئْنَـٰكُم بِٱلْحَقِّ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَكُمْ لِلْحَقِّ كَـٰرِهُونَ ﴿78﴾ أَمْ أَبْرَمُوٓا۟ أَمْرًا فَإِنَّا مُبْرِمُونَ ﴿79﴾ أَمْ يَحْسَبُونَ أَنَّا لَا نَسْمَعُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَىٰهُم ۚ بَلَىٰ وَرُسُلُنَا لَدَيْهِمْ يَكْتُبُونَ ﴿80﴾

(क़ुरैश के लोगो), हम तुम्हारे पास सत्य लेकर आए हैं, परंतु तुम में अधिकांश का हाल यह है कि सत्य से विमुख हैं। क्या इन्होंने कोई बात ठान ली है तो निस्संदेह हम भी ठान लेंगे। क्या ये समझते हैं कि (पैग़ंबर के विरुद्ध) हम इनके भेदों और इनकी कानाफूसियों को सुन नहीं रहे हैं? क्यों नहीं, और हमारे दूत इनके पास लिख भी रहे हैं।

قُلْ إِن كَانَ لِلرَّحْمَـٰنِ وَلَدٌ فَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلْعَـٰبِدِينَ ﴿81﴾ سُبْحَـٰنَ رَبِّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ رَبِّ ٱلْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ ﴿82﴾ فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا۟ وَيَلْعَبُوا۟ حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ ﴿83﴾

इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर) कि यदि परम-दयालु परमेश्वर की कोई संतान हो तो सबसे पहला उसकी पूजा करने वाला मैं हूंगा। धरती और समस्त आकाशों का प्रभु, भव्य सिंहासन का स्वामी उन सब बातों से विमुक्त है जो ये करते हैं। तो इनको छोड़ो, ये बेकार की बातें और मसख़रापन कर लें, यहाँ तक कि अपने उस दिन का सामना कर लें जिसकी इन्हें चेतावनी सुनाई जा रही है।

وَهُوَ ٱلَّذِى فِى ٱلسَّمَآءِ إِلَـٰهٌ وَفِى ٱلْأَرْضِ إِلَـٰهٌ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْعَلِيمُ ﴿84﴾ وَتَبَارَكَ ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَعِندَهُۥ عِلْمُ ٱلسَّاعَةِ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿85﴾ وَلَا يَمْلِكُ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ ٱلشَّفَـٰعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِٱلْحَقِّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿86﴾ وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ ﴿87﴾ وَقِيلِهِۦ يَـٰرَبِّ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ قَوْمٌ لَّا يُؤْمِنُونَ ﴿88﴾ فَٱصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَـٰمٌ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ﴿89﴾

वही अकेला आकाश में भी उपास्य है और वही धरती में भी उपास्य है और वही प्रज्ञावान और ज्ञानी है। बड़ी धन्य है वह परम सत्ता जिसके नियंत्रण में धरती और समस्त आकाशों और उनके बीच हर चीज़ का साम्राज्य है। उसी के पास क़यामत का ज्ञान है और उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे। उसके अतिरिक्त ये जिन्हें पुकारते हैं, वे अनुशंसा का कोई अधिकार नहीं रखते। हाँ, जो सत्य की गवाही देंगे और वे उसको जानते भी होंगे — यदि तुम इनसे पूछो कि इन्हें किसने पैदा किया है तो अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर ने। फिर कहां भटक जाते हैं? और वे अपनी इस बात से गवाही देंगे कि हे प्रभु, ये लोग हैं कि मानने वाले न हुए। अतः इनको अनदेखा करो और कह दो कि मेरा सलाम है। फिर ये शीघ्र ही जान लेंगे।