प्रस्तुत ग्रंथ में जावेद अहमद ग़ामिदी द्वारा किए क़ुरआन के उर्दू अनुवाद का हिंदी रूपांतरण है। इसके साथ ग़ामिदी साहब के अपने प्राक्कथन, भूमिका और समाप्ति भी सम्मिलित हैं जो इस अनुवाद की पद्धति, विद्वत्-परंपरा और मूल प्रयोजन का पूर्ण और प्रामाणिक परिचय देती हैं। पाठकों से निवेदन है कि उन्हें अवश्य पढ़ें। यह संक्षिप्त निवेदन केवल उन बिंदुओं के लिए है जो इस हिंदी संस्करण के लिए विशिष्ट हैं।
ग़ामिदी साहब के अनुवाद की एक विशिष्ट पहचान यह है कि वह कोष्ठक में रखे गए वाक्यांशों के माध्यम से क़ुरआन की आंतरिक संगति को सामने लाने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य पाठकों को क़ुरआन की भाषा-शैली के क़रीब लाना और उन्हें उसकी उन सूक्ष्मताओं से अवगत कराना है जो उस शास्त्रीय अरबी की विशिष्ट संरचना और शैली के कारण — जिसमें क़ुरआन रचा गया है — अन्यथा उनकी दृष्टि से छूट सकती थीं।
क़ुरआन का किसी नई भाषा में अनुवाद करना एक दुष्कर कार्य है। इसका कारण है क़ुरआनी अरबी की वह संक्षिप्त शैली जो उसे अपनी विशिष्ट संक्षिप्तता प्रदान करती है। इस शैली पर टिप्पणी करते हुए, और यह बताते हुए कि इसी ने उन्हें इस अनुवाद की ओर किस प्रकार प्रेरित किया, ग़ामिदी साहब लिखते हैं:
“क़ुरआन की शैली यह है कि वह किसी बात का कारण तो बताता है, लेकिन उसके कारण होने का संकेत देने के लिए प्रायः कोई स्पष्ट शब्द प्रयुक्त नहीं करता; वह दृष्टांत प्रस्तुत करता है, किंतु समानांतर विन्यास (parallelism) के आधार पर उसके कुछ अंशों को हटा देता है और उन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं करता; एक दिव्य वक्ता की भाँति कभी एक समूह को और कभी दूसरे समूह को संबोधित करता है, किंतु अनेक बार प्रसंग और कथन-स्वरूप के अतिरिक्त किसी अन्य संकेत से इस परिवर्तन की सूचना नहीं देता; वह एक क्रम से एक के बाद एक उत्तर देता चला जाता है, किंतु जिन प्रश्नों, आपत्तियों और संदेहों का उत्तर देता है, उन्हें उद्धृत नहीं करता, या यदि करता भी है तो अत्यंत संक्षेप में — इतना कि वे केवल उत्तर से ही समझे जा सकते हैं। वह मूल कथनों, उपवाक्यों, आपत्तियों, परिपूरक कथनों, तुलना, साम्य, संशोधन (इस्तिद्राक) और पुनरावर्तन (औद् अ’ला अल्-बअद्) की पद्धति पर एक के बाद दूसरी बात कहता चला जाता है, किंतु आगे-पीछे के इन संबंधों को शब्दों में स्पष्ट नहीं करता। यही उस साहित्यिक शैली की पराकाष्ठा है जिसे प्राचीन काल के वक्ता अपनाते थे। अरब के लोग इस शैली के रसज्ञ थे और भलीभाँति जानते थे कि इससे वाणी की प्रभावशीलता और वाक्पटुता किस उत्कर्ष तक पहुँच जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप के महान विद्वान और शोधकर्ता इमाम हमीदुद्दीन फ़राही (1863–1930) ने क़ुरआन के भीतर के जिस क्रम व समन्वय (नज़्म) से दुनिए को परिचित कराया, वह इसी शैली को समझने का परिणाम है। मेरे आदरणीय गुरु इमाम अमीन अहसन इस्लाही (1904–1997) ने क़ुरआन पर अपने भाष्य “तदब्बुर-ए-क़ुरआन” में इन बारीकियों को पूर्ण स्पष्टता के साथ समझाया है, किंतु क़ुरआन का अनुवाद उसी पद्धति से किया है जिस प्रकार सामान्यतः क़ुरआन के अनुवादक करते आए हैं। छात्र-जीवन से ही मेरा यह अनुभव रहा है कि शब्दों का सौंदर्य, वाक्यों की लय और गहनता, तथा रचना-विन्यास की शोभा और पूर्णता को हम किसी भी कृति के अनुवाद में पूर्णतः स्थानांतरित नहीं कर सकते। किंतु जब क़ुरआन का अनुवाद करते समय इन आंतरिक संबंधों को भी छोड़ दिया जाता है, तो उसके पाठक को उसके आशय के एक बड़े भाग से, बल्कि कभी-कभी उसके वास्तविक आशय से ही वंचित कर दिया जाता है।
मैंने यह अनुवाद इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया है और इन संबंधों को अनुवाद के भीतर ही इस प्रकार स्पष्ट कर दिया है कि शब्दों और वाक्यों के आवश्यक संबंधों पर कोष्ठक (parentheses) तक नहीं लगाए गए, क्योंकि वे वास्तव में उन्हीं के निहितार्थ और अर्थ-संकेत हैं, जिन्हें अरबी की शैली में शब्दों में व्यक्त नहीं किया गया। आशा है कि पाठक क़ुरआन के आशय, उसके विन्यास और उसकी शैली के सौंदर्य के वे पहलू इस अनुवाद में किसी हद तक देख सकेंगे जो सामान्यतः दृष्टि से ओझल रह जाते हैं। वे देखेंगे कि इन संबंधों के उद्घाटन से प्रत्येक सूरह अपने विषय की दृष्टि से किस प्रकार एक सुंदर इकाई में ढल गई है; व्याख्यात्मक मतभेदों की संभावना किस प्रकार लगभग समाप्त हो गई है; क़ुरआन kए भीतर के क्रम का सौंदर्य किस प्रकार उभरकर सामने आया है; आयतों का आशय किस स्पष्टता, निर्धारण और निश्चयात्मकता के साथ प्रकट हुआ है; और उनकी वाक्पटुता किस शान के साथ प्रकट हुई है।”
ग़ामिदी साहब के उर्दू अनुवाद का यह हिन्दी रूपान्तरण मुख्य रूप से उन हिंदी-भाषी पाठकों के लिए है जिनके लिए फ़ार्सिबहुल उर्दू परिचित भाषा नहीं है — मुसलमान और ग़ैर-मुसलमान, दोनों। भाषा का स्तर आज की मानक हिंदी का है, वही जो समाचारपत्रों, रेडियो और दूरदर्शन में प्रयुक्त होती है और जिस पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है। ऐसे पाठकों के लिए हिंदी में क़ुरआन की उपलब्धता की यह कामना कोई नयी बात नहीं है।
जब शाह अब्दुल क़ादिर (मृत्यु 1813 ई.) ने सन् 1790 में क़ुरआन का पहला भावानुवाद पूर्ण किया — जो ‘मुज़ेह-उल-क़ुरआन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ — तो उन्होंने अपनी अनुवाद-भाषा को स्वयं ‘हिन्दी-ए-मुतअर्रफ़’, अर्थात् ‘जन-प्रचलित हिंदी’ कहा। उनका उद्देश्य स्पष्ट था: क़ुरआन को फ़ारसीबहुल रेख़्ता के बजाय सामान्य भाषा में सुलभ कराना। उस समय हिंदी और उर्दू के बीच वह साम्प्रदायिक सीमा-रेखा नहीं खिंची थी जिसने आगे चलकर एक भाषा को मुसलमानों की और दूसरी को हिंदुओं की पहचान दे दी। वह विभाजन उन्नीसवीं सदी की राजनीतिक प्रक्रियाओं की देन है, न कि इस्लामी परंपरा की। प्रस्तुत अनुवाद उसी मूल भावना का अनुसरण करता है।
इस हिन्दी अनुवाद में ‘अल्लाह’ के लिए ‘परमेश्वर’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका आधार क़ुरआन में परमेश्वर की यह वाणी है:
وَمَا أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ
“(हमारी अटल रीति यही है कि) हमने जो रसूल भी भेजा है, उसकी क़ौम की भाषा में भेजा है, इसलिए कि वे उन्हें अच्छे से स्पष्टता के साथ समझा दे।” (सूरह इब्राहीम 14, आयत 4)
क़ुरआन ने ‘अल्लाह’ शब्द अपनाया था क्योंकि अरब में ‘परम सत्ता’ के लिए यही नाम प्रचलित था। उसी सिद्धांत के अनुसार हिंदी में ‘परमेश्वर’ का शब्द ‘परम सत्ता’ का सर्वाधिक सटीक और अर्थपूर्ण अभिव्यंजन है।
यह प्रयोग भी कोई नया नहीं है। मुस्लिम इतिहास के एक महान विद्वान अबू रैहान अल्-बीरूनी (मृत्यु 1048 ई.) के द्वारा किया गया कलमा-ए-तैय्यिबह का संस्कृत अनुवाद, ग़ज़नवी सुल्तान महमूद ने अपने काल में सरकारी सिक्कों पर इस प्रकार उत्कीर्ण करवाया था:
अव्यक्तमेकम् मुहम्मदः अवतारः
“अव्यक्त एक है; मुहम्मद अवतार हैं।”
इस्लामी और संस्कृत धर्मशास्त्रीय शब्दावली के बीच यह सेतु हज़ार वर्ष पहले ही बन चुका था। इसके पीछे एक गहरा धर्मशास्त्रीय आधार भी है। क़ुरआन का स्पष्ट ऐलान है:
وَإِن مِّن أُمَّةٍ إِلَّا خَلَا فِيهَا نَذِيرٌ
“कोई क़ौम ऐसी नहीं जिसमें कोई सचेत करने वाला न आया हो।” (सूरह फ़ातिर 35, आयत 24)
इस आधार पर संस्कृत-हिंदी शब्दावली — परमेश्वर, जगत प्रभु, परलोक, स्वर्ग, नर्क आदि — उस सभ्यता की देन है जिसे, मेरे अध्ययय के अनुसार, अवश्य परमेश्वर का मार्गदर्शन मिला था। यह शब्दावली क़ुरआन के संदेश के लिए अजनबी नहीं है।
अन्य शब्द-चयन
अरबी ‘मोमिन’ के लिए ‘मानने वाला’ और ‘काफ़िर’ के लिए ‘नकारने वाला’ का प्रयोग ग़ामिदी साहब की उस व्याख्या के अनुसार है जिसमें ‘कुफ़्र’ को — ठोस प्रमाण के उपस्थित हो जाने के बाद — जानबूझकर सत्य का इनकार माना गया है। जिन शब्दों का इस्लामी उपासना और ज्ञान-परंपरा से विशेष रूप से संबंध हैं — जैसे नमाज़, ज़कात, हज्ज, जिहाद, रसूल, नबी, पैग़ंबर, शरीअत, वह्य — वे अपने मूल रूप में रखे गए हैं, क्योंकि इन्हें हिंदी में अनूदित करने से इस्लामी ज्ञान-परंपरा में इन्हें प्राप्त विशिष्ट अर्थ-छाया खो जाती है।
परमेश्वर से प्रार्थना है कि यह अनुवाद उन सभी के लिए लाभकारी हो जो परमेश्वर के इस अंतिम धर्मग्रंथ के संदेश को दिल से समझना चाहते हैं।
मुश्फ़िक़ सुल्तान
श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर, भारत
29 जून, 2026