अपने विषय की दृष्टि से क़ुरआन एक रसूल के इंज़ार की कथा है। पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के बारे में यह बात मालूम है कि वे नुबूव्वत (prophethood) के साथ-साथ रिसालत (messengerhood) के पद पर भी नियुक्त थे। परमेश्वर जिन व्यक्तियों को लोगों के मार्गदर्शन के लिए नियुक्त करते हैं और अपनी ओर से वह्य व इल्हाम के द्वारा जिनका मार्गदर्शन करते हैं, उन्हें नबी कहा जाता है, लेकिन हर नबी के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह रसूल भी हो। रिसालत (रसूलत्व) एक विशेष पद है जो नबियों में से कुछ ही को प्राप्त हुआ है। क़ुरआन में दिए गए विवरण के अनुसार रसूल अपने संबोधित लोगों के लिए परमेश्वर की अदालत (judgement) बनकर आता है और उनका फ़ैसला करके इस दुनिया से विदा हो जाता है। क़ुरआन बताता है कि रसूलों के धर्मप्रचार में यह फ़ैसला इंज़ार, इंज़ार-ए-आम, इत्माम-ए-हुज्जत और हिज्रत-ओ-बराअत के चरणों से होकर जारी होता है, और इस तरह जारी होता है कि ईश्वरीय अदालत धरती पर स्थापित हो जाती है, परमेश्वर की दैनूनत प्रकट होती है, और रसूल के संबोधित लोगों के लिए एक छोटी क़यामत (लघु प्रलय) घटित हो जाती है।12345
इस धर्मप्रचार का जो इतिहास क़ुरआन में बता गया है, उससे मालूम होता है कि इस अवसर पर सामान्यतः दो ही परिस्थितियां सामने आती हैं: एक यह कि पैगंबर के साथी अनुयायी भी संख्या में कम होते हैं और उसे हिजरत की कोई जगह (प्रवास स्थान) भी उपलब्ध नहीं होती। दूसरी यह कि वह पर्याप्त संख्या में अपने साथियों को लेकर निकलता है, और उसके निकलने से पहले ही परमेश्वर किसी भूभाग में उसके लिए स्वतंत्रता राजनीतिक अधिकार के साथ रहने-बसने का प्रबंध कर देते हैं। इन दोनों ही परिस्थितियों में रसूलों से विषय में परमेश्वर की वह अटल रीत (सुन्नत) अनिवार्य रूप से कार्यान्वित हो जाती है जिसका वर्णन क़ुरआन में इस प्रकार हुआ है:
وَلِکُلِّ اُمَّۃٍ رَّسُوْلٌ، فَاِذَا جَآءَ رَسُوْلُہُمْ قُضِیَ بَیْْنَہُمْ بِالْقِسْطِ وَہُمْ لاَ یُظْلَمُوْنَ.
"(उसका नियम यही है कि) प्रत्येक क़ौम के लिए एक रसूल है। फिर जब उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक निर्णय कर दिया जाता है और उनके साथ कोई अन्याय नहीं किया जाता।" (सूरह यूनुस 10, आयत 47)
पहली परिस्थिति में रसूल के अपनी क़ौम को छोड़ देने के बाद — चाहे यह उसकी मृत्यु के रूप में हो या हिज्रत के रूप में — यह निर्णय इस तरह जारी होता है कि आकाश की फ़ौजें उतरती हैं, प्रचंड आँधी और पथराव करने वाली हवा का तूफ़ान उठता है, और बादल व वायु की सेनाएँ क़ौम पर इस तरह आक्रमण करती हैं कि रसूल के विरोधियों में से कोई भी धरती पर बाक़ी नहीं रहता। तथापि यह मामला केवल उन्हीं लोगों के साथ होता है जिनके लिए क़ुरआन अपनी परिभाषा में 'मुश्रिकीन' शब्द का प्रयोग करता है। रहे वे लोग जो मूल रूप से तौहीद ही से जुड़े होते हैं, उनके साथ यह मामला नहीं होता। उनके बारे में नियम यह है कि उनके सर्वनाश के बजाय उन पर अपमान और पराधीनता का दंड थोप दिया जाता है। अतः यह मालूम है कि इस्राईलियों (Israelites) के साथ यही मामला हुआ, जबकि नूह (Noah), हूद (Hud), सालेह (Salih), लूत (Lot), शुऐब (Shuayb) जैसे रसूलों की क़ौमों और इस तरह की कुछ अन्य क़ौमों को इसके विपरीत धरती से मिटा दिया गया।678
दूसरी परिस्थिति के लिए भी यही नियम है, परंतु इसमें दंड का यह निर्णय रसूल और उसके साथियों के शास्त्रों के द्वारा लागू किया जाता है। इस परिस्थिति में क़ौम को कुछ और ढील मिल जाती है। रसूल इस अवधि में हिज्रत की जगह (प्रवास स्थान) के लोगों पर इत्माम-ए-हुज्जत भी करता है, अपने अनुयायियों के प्रशिक्षण और तज़्कियह-व-तत्हीर के बाद उन्हें इस सत्य-असत्य के संघर्ष के लिए संगठित भी करता है, और प्रवास स्थान में अपनी सत्ता भी इतनी मज़बूत कर लेता है कि उसकी मदद से वह सत्य को नकारने वालों के सर्वनाश और सत्यवादियों की प्रतिष्ठा का यह संघर्ष पूरा कर सके।9
पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के मामले में यही दूसरी परिस्थिति पैदा हुई। अतः उनकी ओर से इंज़ार, इंज़ार-ए-आम, इत्माम-ए-हुज्जत, हिज्रत-ओ-बराअत और अपने संबोधित लोगों के लिए प्रतिफल की यह कथा ही क़ुरआन का विषय है। इसकी हर सूरह इसी पृष्ठभूमि में उतरी है, और इसके सारे भाग इसी दृष्टि से व्यवस्थित किए गए हैं।
इस क्रम की बनावट संक्षेप में यह है कि क़ुरआन की सारी सूरतें आपस में जोड़ा बनाकर सात भागों के रूप में संगृहीत की गई हैं, अर्थात हर सूरह विषय की दृष्टि से अपना एक जोड़ा और मस्ना रखती है, और दोनों के बीच वैसा की रिश्ता होता है जैसा रिश्ता पति-पत्नी में होता है। कुछ सूरतें इसका अपवाद हैं, जिनमें से सूरह फ़ातिहा पूरे क़ुरआन के लिए प्रस्तावना के समान है, जबकि बाक़ी सूरतें किसी भाग की पूरक, पूर्णता या समापन के रूप में आई हैं। फिर सात समूहों के रूप में, जिन्हें हमने 'भाग' कहा है, यह सूरतें क़ुरआन में व्यवस्थित कर दी गई हैं। क़ुरआन से संबंधित इस वास्तविकता का वर्णन सूरह हिज्र में इस तरह हुआ है:
وَلَقَدْ اٰتَیْنٰکَ سَبْعًا مِّنَ الْمَثَانِیْ وَالْقُرْاٰنَ الْعَظِیْمَ.
"हमने, (हे पैग़ंबर) तुमको सात ‘मसानी’, अर्थात महान क़ुरआन प्रदान किया है।" (सूरह हिज्र 15, आयत 87)10
क़ुरआन के इन सातों हिस्सों में से हर हिस्सा एक या एक से अधिक मक्की सूरतों से शुरू होता है और एक या एक से अधिक मदनी सूरतों पर समाप्त हो जाता है।1112
पहला भाग फ़ातिहा से शुरू होता और माइदह पर समाप्त होता है। इसमें फ़ातिहा मक्की है और बाक़ी चार मदनी हैं।
दूसरा भाग अन्आम् और अअराफ़ — दो मक्की सूरतों — से शुरू होता है और दो मदनी सूरतों, अन्फ़ाल और तौबा, पर समाप्त होता है।
तीसरे भाग में यूनुस से मोमिनून तक पहली चौदह सूरतें मक्की हैं और अंत में एक सूरह नूर है जो मदनी है।
चौथा भाग फ़ुर्क़ान से शुरू होता है, अह्ज़ाब पर समाप्त होता है। इसमें पहली आठ सूरतें मक्की और अंत में एक, यानी अह्ज़ाब, मदनी है।
पाँचवाँ भाग सबा से शुरू होता है, हुजुरात पर समाप्त होता है। इसमें तेरह सूरतें मक्की हैं और अंत में तीन मदनी हैं।
छठा भाग क़ाफ़ से शुरू होकर तह्रीम पर समाप्त होता है। इसमें सात मक्की हैं और इनके बाद दस मदनी हैं।
सातवाँ भाग मुल्क से शुरू होकर नास पर समाप्त होता है। इसमें अंतिम दो, यानी मुअव्वज़तैन, मदनी हैं और बाक़ी सब मक्की हैं।
इनमें से हर भाग का एक विषय है।
पहले भाग का विषय यहूदियों और ईसाइयों पर इत्माम-ए-हुज्जत, उनके स्थान पर एक नवीन संघ (उम्मत) की स्थापना, उसका तज़्कियह-व-तत्हीर, और उसके साथ परमेश्वर का अंतिम वचन (final covenant) है।
दूसरे भाग में अरब के मुश्रिकीन पर इत्माम-ए-हुज्जत, मुसलमानों के तज़्कियह-व-तत्हीर, और परमेश्वर की अंतिम दैनूनत का वर्णन है।
तीसरे, चौथे, पाँचवें और छठे भाग का विषय एक ही है, और वह है इंज़ार-व-बशारत (सचेत करना और शुभ सूचना देना) तथा तज़्कियह-व-तत्हीर।
सातवें और अंतिम भाग का विषय क़ुरैश क़बीले के सरदारों को क़यामत के बारे में सचेत करना, उन पर इत्माम-ए-हुज्जत, इसके परिणामस्वरूप उन्हें दंड की धमकी, और पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के लिए अरब की धरती में सत्य की विजय की शुभ सूचना है। हम इसे संक्षेप में केवल इंज़ार-व-बशारत भी कह सकते हैं।
इनमें से पहले भाग को अलग कर लीजिए तो क़ुरआन में इनका क्रम समापन से प्रारंभ (सातवें भाग से दूसरे भाग) की ओर है। अतः सातवाँ भाग इंज़ार-व-बशारत ही पर समाप्त हो जाता है। इसके बाद छठे, पाँचवें, चौथे और तीसरे भाग में इंज़ार-व-बशारत के साथ तज़्कियह-व-तत्हीर का विषय भी शामिल हो गया है। फिर दूसरा भाग इस श्रृंखला का अंतिम भाग है, जिसमें पैगंबर का इंज़ार अपनी पूर्णता को पहुँचता है। इसलिए इत्माम-ए-हुज्जत और तज़्कियह-व-तत्हीर के साथ उसमें संबोधित किए गए लोगों के लिए इसी दुनिया में ईश्वरीय अदालत का वह निर्णय भी सामने आ जाता है, जिसे हम बड़ी क़यामत से पहले परमेश्वर का अंतिम प्रतिफल कहते हैं।
पहला भाग इस दृष्टि से बिल्कुल अलग है कि अरब के मुश्रिकों के बजाय वह यहूदियों और ईसाइयों के लिए विशेष है, लेकिन क़ुरआन के आरंभ से देखें तो यह भी इत्माम-ए-हुज्जत और तज़्कियह-व-तत्हीर के बाद सूरह तौबा में दैनूनत के विषय से ठीक उसी तरह जुड़ता है, जिस तरह ऊपर के भाग — यदि समापन से प्रारंभ की ओर आएँ तो — क्रमिक रूप से जुड़े हैं। इसलिए दूसरा भाग जैसे एक शिखर-बिंदु (peak) है, जहाँ दोनों ओर से एक ही विषय, केवल इस अंतर के साथ कि संबोधित लोग बदल गए हैं, अपने चरम को पहुँचता और समाप्त हो जाता है।
इससे स्पष्ट है कि दूसरे भाग से आगे नुज़ूली क्रम (अवतरण-क्रम, chronological order) की पद्धति, पहले भाग के लिए संबंध की इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अपनाई गई है।
पहला भाग इस क्रम में पहले इसलिए आया है कि क़ुरआन को ग्रहण करने वाले अब सबसे पहले इसी के संबोधित हैं। इंज़ार-व-बशारत और इत्माम-ए-हुज्जत का विषय, पहले भाग को छोड़कर, सामान्यतः मक्की सूरतों में और तज़्कियह-व-तत्हीर का विषय मदनी सूरतों में बयान होता है, लेकिन ये दोनों भी हर भाग में इस तरह सम-रंग और सामंजस्यपूर्ण हैं जैसे जड़ से तना और तने से शाखाएँ निकल रही हों।
पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की नियुक्ति के परिणामस्वरूप परमेश्वर की जो अदालत अरब की धरती में स्थापित हुई, उसका वृत्तांत इस सुंदर क्रम के साथ इस ग्रंथ में सदा के लिए सुरक्षित कर दिया गया है। इस दृष्टि से देखें तो क़ुरआन धर्म के इस मूल आह्वान को बिल्कुल अंतिम स्तर पर सिद्ध कर देता है कि परमेश्वर की अदालत पूरी मानवता के लिए भी एक दिन इसी तरह स्थापित होकर रहेगी।
टिप्पणियाँ
- 1इंज़ार: लोगों को मृत्यु के बाद के परलोकीय जीवन (क़यामत) के बारे में सचेत करना। ↩
- 2इंज़ार-ए-आम: सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत करना, (public preaching)। ↩
- 3इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩
- 4हिज्रत: एक जगह से दूसरी जगह जा बसना या प्रवास करना, (migration)। बराअत: इस्लाम या सत्या के नकारने वालों से संबंध तोड़ना, (disavowal)। ↩
- 5दैनूनत: अर्थात (ईश्वरीय) निर्णय और प्रतिफल। ↩
- 6मुश्रिकीन: मुश्रिक का बहुवचन, अर्थात शिर्क करने वाले। परमेश्वर के साझीदार या सहभागी (partners) बनाने वाला, या परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य चीज़ों की उपासना करने वाला, (polytheist)। ↩
- 7तौहीद: परमेश्वर को एक और अद्वितीय मानने की धारणा, (monotheism)। ↩
- 8यह वही नियम है जो क़यामत के दिन भी लागू होगा। अतः सूरह निसा (4) की आयत 48 में परमेश्वर कहते हैं कि वहाँ वे भी शिर्क (polytheism) को क्षमा नहीं करेंगे। हाँ, इसके अतिरिक्त, जिसके लिए जो पाप चाहेंगे, क्षमा कर देंगे। ↩
- 9तज़्कियह: शुद्धीकरण (purification), तत्हीर: परिष्करण, वर्गिकरण (segregation)। तज़्कियह और तत्हीर के शब्द ग़ामिदी साहब द्वारा समान अर्थों में ज्ञान और क्रिया से संबन्धित चीज़ों के शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त किए गए हैं; तत्हीर शब्द का एक अतिरिक्त अर्थ होता है वर्गीकरण या मानने वालों को नकारने वालों और ढोंगियों से अलग करना। जहां भी यह अतिरिक्त अर्थ अभिप्राय होता है, वहां ग़ामिदी साहब ने इसे सूरह की व्याख्या में स्पष्ट किया है। [सुल्तान] ↩
- 10मसानी (مثانی) मस्ना (مثنیٰ) का बहुवचन है, और इसका अर्थ है वह चीज़ जो दो-दो करके हो। ↩
- 11मक्की सूरह: मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) से पहले अवतरित हुई सूरह। ↩
- 12मदनी सूरह: मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद अवतरित हुई सूरह। ↩