सूरह 42

अश्-शूरा

मक्की · 53 आयतें · 26 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

حمٓ ﴿1﴾ عٓسٓقٓ ﴿2﴾ كَذَٰلِكَ يُوحِىٓ إِلَيْكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكَ ٱللَّهُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿3﴾ لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ ﴿4﴾ تَكَادُ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ يَتَفَطَّرْنَ مِن فَوْقِهِنَّ ۚ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَيَسْتَغْفِرُونَ لِمَن فِى ٱلْأَرْضِ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ﴿5﴾ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ ٱللَّهُ حَفِيظٌ عَلَيْهِمْ وَمَآ أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ ﴿6﴾

यह सूरह 'हा-मीम ऐन-सीन-क़ाफ़' है। प्रभावशाली और प्रज्ञावान परमेश्वर इसी प्रकार तुम्हारी ओर वह्य करता है और जो तुमसे पहले बीतें हैं, उनकी ओर भी इसी प्रकार वह्य करता रहा है, (इन्हीं अर्थों के साथ और इसी प्रकार)। समस्त आकाशों में जो कुछ है और जो कुछ धरती में है, उसी का है और वह ऊँचा और महान है। क़रीब है कि आकाश (उसके भय के मारे) अपने ऊपर से फट पड़ें और फ़रिश्ते, वे तो अपने प्रभु (के भय के कारण उस) की प्रशंसा के साथ उसका गुणगान और धरती वालों के लिए क्षमा की प्रार्थनाएं करते रहते हैं। सुनो, सत्य यह है कि परमेश्वर ही क्षमा करने वाला और दया करने वाला है। इसपर भी जिन लोगों ने उसको छोड़ अन्य संरक्षक बना रखे हैं, परमेश्वर उनपर निरीक्षक है और, (हे पैग़ंबर), तुम उनके लिए उत्तरदाई नहीं बनाए गए हो।

وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ قُرْءَانًا عَرَبِيًّا لِّتُنذِرَ أُمَّ ٱلْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا وَتُنذِرَ يَوْمَ ٱلْجَمْعِ لَا رَيْبَ فِيهِ ۚ فَرِيقٌ فِى ٱلْجَنَّةِ وَفَرِيقٌ فِى ٱلسَّعِيرِ ﴿7﴾

इसी प्रकार, (जैसे कि वर्णन हुआ) हमने एक अरबी क़ुरआन तुम्हारी ओर वह्य किया है ताकि तुम मक्का वालों को और उसके आस-पास रहने वालों को सचेत कर दो, विशेषतः उस दिन से सचेत कर दो जो सब लोगों के इकट्ठा होने का दिन है, जिसके आने में कोई संदेह नहीं है। उस दिन एक समूह स्वर्ग में होगा और एक समूह नरक में।

وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَهُمْ أُمَّةً وَٰحِدَةً وَلَـٰكِن يُدْخِلُ مَن يَشَآءُ فِى رَحْمَتِهِۦ ۚ وَٱلظَّـٰلِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ ﴿8﴾ أَمِ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ ۖ فَٱللَّهُ هُوَ ٱلْوَلِىُّ وَهُوَ يُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿9﴾ وَمَا ٱخْتَلَفْتُمْ فِيهِ مِن شَىْءٍ فَحُكْمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبِّى عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ ﴿10﴾

(इससे अधिक तुम्हारा कोई दायित्व नहीं है)। यदि परमेश्वर चाहता तो इन सबको एक ही समुदाय बना देता, परंतु (उसने लोगों को स्वेच्छा तथा चुनाव की स्वतंत्रता दी, इसलिए अब) वह जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार) अपनी दया में ले आता है और रहे वे लोग जो अपने प्राणों पर अत्याचार करने वाले हैं तो उनका न कोई संरक्षक होगा और न सहायक। क्या इन लोगों ने परमेश्वर को छोड़ अन्य संरक्षक बना रखे हैं? तो याद रखें कि परमेश्वर ही संरक्षक है, वही मुर्दों को जीवित करेगा और (यह उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं), वह हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। तुम जिन चीज़ों में भी कोई मतभेद रखते हो, (चाहे वह परमेश्वर के अद्वितीय होने की धारणा है या परलोक की धारणा), उसका निर्णय परमेश्वर ही के ऊपर है। वही परमेश्वर मेरा प्रभु है, उसी पर मैंने भरोसा किया है और उसी की ओर मैं पलटता हूं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहाँ से, पैग़ंबर मुहम्मद (स.) वक्ता हो गए हैं। मानो ऊपर जो कहा था कि तुम्हारा दायित्व केवल धर्मप्रचार है, इसके बाद लोगों का मामला परमेश्वर के ऊपर है, तो उन्होंने उसका पालन कर दिया। ↩
فَاطِرُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًا وَمِنَ ٱلْأَنْعَـٰمِ أَزْوَٰجًا ۖ يَذْرَؤُكُمْ فِيهِ ۚ لَيْسَ كَمِثْلِهِۦ شَىْءٌ ۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْبَصِيرُ ﴿11﴾ لَهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿12﴾

वही धरती और समस्त आकाशों का रचयिता है। उसी ने तुम्हारी प्रजाति से तुम्हारे लिए जोड़े बनाए और चौपायों की प्रजाति से भी जोड़े बनाए। वह इस खेत में तुम्हारा बीज बोता है। उसके समान कोई चीज़ नहीं है और वही सुनने वाला और देखने वाला है। धरती और समस्त आकाशों की चाबियां उसी के पास हैं। वह जिसकी जीविका चाहता है, बढ़ाता है और जिसकी चाहता है, घटा देता है। निस्संदेह, वह हर चीज़ से अवगत है।

شَرَعَ لَكُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِۦ نُوحًا وَٱلَّذِىٓ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِۦٓ إِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰٓ ۖ أَنْ أَقِيمُوا۟ ٱلدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا۟ فِيهِ ۚ كَبُرَ عَلَى ٱلْمُشْرِكِينَ مَا تَدْعُوهُمْ إِلَيْهِ ۚ ٱللَّهُ يَجْتَبِىٓ إِلَيْهِ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِىٓ إِلَيْهِ مَن يُنِيبُ ﴿13﴾

उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया है जिसकी शिक्षा उसने नूह को की और जिसकी वह्य, (हे पैग़ंबर), हमने तुम्हारी ओर की है और जिसका आदेश हमने इब्राहीम और मूसा और ईसा को दिया कि (अपने जीवन में) इस धर्म को स्थापित रखो और इसमें फूट पैदा न करो। तुम जिस चीज़ की ओर इन मुश्रिकों को बुला रहे हो (कि ये परमेश्वर को एक मानें), वह इनको अत्यंत अप्रिय लग रही है। परमेश्वर जिसको चाहता है, अपनी ओर आने के लिए चुन लेता है, परंतु अपनी ओर आने का मार्ग वह उन्हीं को दिखाता है जो उसकी ओर ध्यान करते हैं।

وَمَا تَفَرَّقُوٓا۟ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلْعِلْمُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى لَّقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُورِثُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ مِنۢ بَعْدِهِمْ لَفِى شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ ﴿14﴾

(और ये जो इन पैग़ंबरों के मानने वाले हैं), ये उचित ज्ञान अपने पास आ चुकने के बाद केवल आपस के द्वेष तथा दुराग्रह के कारण विभाजित हो गए हैं। और तुम्हारे प्रभु की ओर से यदि एक निर्धारित अवधि तक ढील की बात पहले से निश्चित न हो चुकी होती तो इनके बीच उसी समय निपटारा कर दिया जाता। (फिर यही नहीं), इनके बाद जो (परमेश्वर की ओर से) उसके ग्रंथ के उत्तराधिकारी बनाए गए, वे उस ग्रंथ की ओर से ऐसे संदेह में पड़े हुए हैं जो बहुत उलझन में डाल देने वाला है।

فَلِذَٰلِكَ فَٱدْعُ ۖ وَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَ ۖ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَآءَهُمْ ۖ وَقُلْ ءَامَنتُ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِن كِتَـٰبٍ ۖ وَأُمِرْتُ لِأَعْدِلَ بَيْنَكُمُ ۖ ٱللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ ۖ لَنَآ أَعْمَـٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَـٰلُكُمْ ۖ لَا حُجَّةَ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ ۖ ٱللَّهُ يَجْمَعُ بَيْنَنَا ۖ وَإِلَيْهِ ٱلْمَصِيرُ ﴿15﴾

अतः, (हे पैग़ंबर), तुम उसी धर्म की ओर बुलाओ (जो सब पैग़ंबरों का धर्म है) और जिस प्रकार तुम को आदेश दिया गया है, उसपर दृढ़तापूर्वक जमे रहो और इनकी इच्छाओं का अनुसरण न करो और घोषणा कर दो कि परमेश्वर ने जो ग्रंथ भी उतारा है, मैं उसको मानता हूं और मुझे आदेश मिला है कि मैं (सत्य-असत्य के विषय में) तुम्हारे बीच न्यायपूर्वक निर्णय कर दूँ। (याद रखो), परमेश्वर ही हमारा प्रभु है और तुम्हारा भी। (तुम नहीं मानते तो) हमारे कर्म हमारे लिए हैं और तुम्हारे कर्म तुम्हारे लिए। हमारे और तुम्हारे बीच किसी और बहस की आवश्यकता नहीं रही। परमेश्वर (क़यामत के दिन) हम सबको इकट्ठा करेगा और उसी की ओर सबको जाना है।

وَٱلَّذِينَ يُحَآجُّونَ فِى ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا ٱسْتُجِيبَ لَهُۥ حُجَّتُهُمْ دَاحِضَةٌ عِندَ رَبِّهِمْ وَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ ﴿16﴾

जो लोग परमेश्वर के बारे में वाद-विवाद कर रहे हैं (कि उसके भागीदार सिद्ध करें), इसके बाद कि (उनकी ओर से) उसको माना जा चुका है, उनका कुतर्क उनके प्रभु के आगे पूरी तरह परास्त होने वाला है और उनपर प्रकोप और उनके लिए कठोर दण्ड है।

ٱللَّهُ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ وَٱلْمِيزَانَ ۗ وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ قَرِيبٌ ﴿17﴾ يَسْتَعْجِلُ بِهَا ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِهَا ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مُشْفِقُونَ مِنْهَا وَيَعْلَمُونَ أَنَّهَا ٱلْحَقُّ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱلَّذِينَ يُمَارُونَ فِى ٱلسَّاعَةِ لَفِى ضَلَـٰلٍۭ بَعِيدٍ ﴿18﴾

परमेश्वर ही है जिसने अपना यह ग्रंथ निर्णायक बात के साथ उतारा है और (इस प्रकार सत्य-असत्य को अलग-अलग करने के लिए) अपनी तुला उतार दी है। (इन्हें सौभाग्य हो तो इससे लाभ उठा लें, अन्यथा) तुमको क्या पता कि शायद क़यामत पास ही आ लगी हो! उसके लिए वही जल्दी मचा रहे हैं जो उसको नहीं मानते। मानने वाले तो उससे डरते हैं और जानते हैं कि वह अवश्य वास्तविक है। सुनो, जो लोग क़यामत (जैसी वास्तविकता) के बारे में झगड़ रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं कि वे बहुत दूर की पथभ्रष्टता में पड़े हैं।

ٱللَّهُ لَطِيفٌۢ بِعِبَادِهِۦ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ ۖ وَهُوَ ٱلْقَوِىُّ ٱلْعَزِيزُ ﴿19﴾ مَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ ٱلْـَٔاخِرَةِ نَزِدْ لَهُۥ فِى حَرْثِهِۦ ۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ ٱلدُّنْيَا نُؤْتِهِۦ مِنْهَا وَمَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ ﴿20﴾

(इनको यह ढील इसलिए मिल रही है कि) परमेश्वर अपने भक्तों पर बड़ा दयालु है। (उनकी अवज्ञा के बावजूद), वह जिसको चाहता है, जीविका प्रदान करता है और (ये इस ढील से निडर न हों, इसलिए कि) वह बड़ा शक्तिशाली है, बड़ा प्रबल है। (लोगो, हमारा नियम यह है कि) जो परलोक की खेती चाहता है, हम उसकी खेती में उसके लिए आशीष प्रदान करते हैं और दुनिया में भी उसका हिस्सा उसे देते हैं और जो दुनिया की खेती चाहता है, उसको हम उसमें से (जितना चाहते हैं), दे देते हैं, परंतु (इसके बाद फिर) परलोक में उसका कोई हिस्सा नहीं है।

أَمْ لَهُمْ شُرَكَـٰٓؤُا۟ شَرَعُوا۟ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمْ يَأْذَنۢ بِهِ ٱللَّهُ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةُ ٱلْفَصْلِ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۗ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿21﴾ تَرَى ٱلظَّـٰلِمِينَ مُشْفِقِينَ مِمَّا كَسَبُوا۟ وَهُوَ وَاقِعٌۢ بِهِمْ ۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فِى رَوْضَاتِ ٱلْجَنَّاتِ ۖ لَهُم مَّا يَشَآءُونَ عِندَ رَبِّهِمْ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَضْلُ ٱلْكَبِيرُ ﴿22﴾ ذَٰلِكَ ٱلَّذِى يُبَشِّرُ ٱللَّهُ عِبَادَهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۗ قُل لَّآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا ٱلْمَوَدَّةَ فِى ٱلْقُرْبَىٰ ۗ وَمَن يَقْتَرِفْ حَسَنَةً نَّزِدْ لَهُۥ فِيهَا حُسْنًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ شَكُورٌ ﴿23﴾

(परमेश्वर का धर्म तो वही है जो उसने अपने पैग़ंबरों के माध्यम से दिया है, फिर) क्या इन लोगों ने परमेश्वर के कुछ ऐसे सहभागी बना रखे हैं जिन्होंने इनके लिए वह धर्म बनाया है जिसकी अनुमति परमेश्वर ने नहीं दी है? (यह ऐसा दुस्साहस है कि) यदि निर्णय की बात निश्चित न कर दी गई होती तो इनके बीच इसी समय निपटारा कर दिया जाता। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो इस प्रकार के दुष्ट हैं, उनके लिए एक कष्टदायक दण्ड है। तुम इन दुष्टों को (उस दिन) देखोगे कि अपनी कमाई के बुरे परिणाम से डर रहे होंगे और वह उनपर पड़ के रहेगा। इसके विपरीत जो लोग मान गए और उन्होंने भले कर्म किए होंगे, वे स्वर्ग के बगीचों में होंगे। उनके लिए, जो कुछ चाहेंगे, उनके प्रभु के पास उपलब्ध होगा। बड़ा अनुग्रह वास्तव में यही है। यह वह चीज़ है जिसकी शुभ सूचना परमेश्वर अपने उन भक्तों को दे रहा है जो मान गए और उन्होंने भले कर्म किए। इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर) कि मैं इस पर तुमसे कोई बदला नहीं मांग रहा, मैं तो केवल रिश्तेदारी का प्रेम है, जिसका कर्तव्य पूरा कर रहा हूं। और कह दो कि जो व्यक्ति कोई पुण्य करेगा तो हम उस पुण्य में उसके लिए भलाई को बढ़ा देंगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर बड़ा ही क्षमा करने वाला है, बड़ा सराहने वाला है।

أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا ۖ فَإِن يَشَإِ ٱللَّهُ يَخْتِمْ عَلَىٰ قَلْبِكَ ۗ وَيَمْحُ ٱللَّهُ ٱلْبَـٰطِلَ وَيُحِقُّ ٱلْحَقَّ بِكَلِمَـٰتِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ﴿24﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى يَقْبَلُ ٱلتَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِۦ وَيَعْفُوا۟ عَنِ ٱلسَّيِّـَٔاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ ﴿25﴾

क्या ये कहते हैं कि इसने परमेश्वर पर झूठ मढ़ दिया है? (कदापि नहीं, यह सर्वथा हमारी कृपा है)। अतः यदि परमेश्वर चाहे तो तुम्हारे दिल पर मुहर लगा दे (और चाहे तो अपनी यह कृपा जारी रखे), जबकि परमेश्वर तो अपनी इन बातों के द्वारा असत्य को मिटा रहा और सत्य को सिद्ध कर रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर दिलों के भेद तक जानता है। (यह उसकी ओर बढ़ें कि) वही तो है जो अपने भक्तों का प्रायश्चित स्वीकार करता और उनकी बुराइयों को क्षमा करता है और जानता है जो कुछ तुम करते हो।

وَيَسْتَجِيبُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضْلِهِۦ ۚ وَٱلْكَـٰفِرُونَ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ ﴿26﴾

मानने वाले और भले कर्म करने वाले तो (उसके आह्वान को) स्वीकार करते हैं और (इसके बदले में) वह उनपर अपनी अधिक कृपा करेगा। रहे ये नकारने वाले तो इनके लिए कठोर दण्ड है।

وَلَوْ بَسَطَ ٱللَّهُ ٱلرِّزْقَ لِعِبَادِهِۦ لَبَغَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَـٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٍ مَّا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرٌۢ بَصِيرٌ ﴿27﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى يُنَزِّلُ ٱلْغَيْثَ مِنۢ بَعْدِ مَا قَنَطُوا۟ وَيَنشُرُ رَحْمَتَهُۥ ۚ وَهُوَ ٱلْوَلِىُّ ٱلْحَمِيدُ ﴿28﴾

(परमेश्वर ने जो कुछ इन्हें दिया है, वही इनके लिए परीक्षा बन गया है)। यदि परमेश्वर अपने भक्तों के लिए जीविका को पूर्णतः खोल देता तो वे धरती में ऊधम मचा देते। परंतु वह एक गणना के साथ जो चाहता है, उनके लिए उतारता है, इसलिए कि वह अपने भक्तों से परिचित है, वह उनकी परिस्थिति का निरीक्षक है। अपितु वही है जो उनके निराश हो जाने के बाद बारिश बरसाता है और अपनी दया को (सब ओर) फैला देता है और वही (सबकी) बिगड़ी बनाने वाला और उत्तम गुणों वाला है।

وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦ خَلْقُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَآبَّةٍ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَآءُ قَدِيرٌ ﴿29﴾

(ये उसकी चेतावनी को मज़ाक़ न समझें)। धरती और समस्त आकाशों की रचना उसी की निशानियों में से है और ये प्राणी भी जो उसने इन दोनों के अंदर फैला रखे हैं और वह इन्हें इकट्ठा कर लेने का भी पूरा सामर्थ्य रखता है, जब वह इन्हें इकट्ठा करना चाहेगा।

وَمَآ أَصَـٰبَكُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُوا۟ عَن كَثِيرٍ ﴿30﴾ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ ﴿31﴾

(लोगो, जब परमेश्वर से विद्रोह कर देते हो तो दुनिया में भी) जो संकट तुमको पहुंचता है, तुम्हारे बुरे कर्मों ही के परिणामस्वरूप पहुंचता है और तुम्हारी बहुत सी बुराइयों को वह अनदेखा भी करता है। (यह इसलिए कि तुम इससे स्मरण प्राप्त करो), अन्यथा तुम पृथ्वी पर कहीं उसके वश से बाहर नहीं निकल सकते हो और परमेश्वर के विरुद्ध न तुम्हारा कोई संरक्षक होता है, न सहायक।

وَمِنْ ءَايَـٰتِهِ ٱلْجَوَارِ فِى ٱلْبَحْرِ كَٱلْأَعْلَـٰمِ ﴿32﴾ إِن يَشَأْ يُسْكِنِ ٱلرِّيحَ فَيَظْلَلْنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهْرِهِۦٓ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ ﴿33﴾ أَوْ يُوبِقْهُنَّ بِمَا كَسَبُوا۟ وَيَعْفُ عَن كَثِيرٍ ﴿34﴾ وَيَعْلَمَ ٱلَّذِينَ يُجَـٰدِلُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ ﴿35﴾

और समुद्र में चलने वाले पर्वतों के समान (ऊंचे) जहाज भी उसी की निशानियाँ में से हैं। यदि वह चाहे तो हवा को रोक दे, फिर वे समुद्र के ऊपर ही ठहरे रह जाएं — इसमें, निस्संदेह हर उस व्यक्ति के लिए निशानियाँ हैं जो धैर्य रखने वाला, आभार व्यक्त करने वाला हो — या उनके कर्मों के परिणामस्वरूप उनके जहाज़ों को नष्ट कर दे और बहुतों को अनदेखा करे। इसलिए नष्ट कर दे कि उनसे प्रतिशोध ले और इसलिए कि जो लोग हमारी आयतों में कुतर्क कर रहे हैं, वे जान लें कि उनके लिए कोई भागने का स्थान नहीं है।

فَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَىْءٍ فَمَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ ﴿36﴾

अतः जो कुछ तुम्हें मिला है, (लोगो), वह इस दुनिया के जीवन की बहुत थोड़ी सामग्री है और जो कुछ परमेश्वर के पास है, वह कहीं अच्छा और स्थायी है, उनके लिए जो मान गए और अपने प्रभु पर भरोसा रखते हैं।

وَٱلَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَـٰٓئِرَ ٱلْإِثْمِ وَٱلْفَوَٰحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُوا۟ هُمْ يَغْفِرُونَ ﴿37﴾ وَٱلَّذِينَ ٱسْتَجَابُوا۟ لِرَبِّهِمْ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ ﴿38﴾

और वे कि जो बड़े पापकर्मों और स्पष्ट निर्लज्ज कार्यों से बचते हैं और जब कभी क्रोध आ जाए तो ऐसे लोग हैं कि अनदेखा कर जाते हैं। और वे कि जिन्होंने अपने प्रभु के आह्वान को माना है और नमाज़ का प्रबंध रखा है और उनकी व्यवस्था उनके आपसी परामर्श पर आधारित है और हमने जो जीविका उन्हें प्रदान की है, उसमें से (हमारे मार्ग में) ख़र्च करते हैं।

وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَابَهُمُ ٱلْبَغْىُ هُمْ يَنتَصِرُونَ ﴿39﴾ وَجَزَٰٓؤُا۟ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُۥ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿40﴾ وَلَمَنِ ٱنتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مَا عَلَيْهِم مِّن سَبِيلٍ ﴿41﴾ إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَظْلِمُونَ ٱلنَّاسَ وَيَبْغُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿42﴾

और वे कि जो बदला उस समय लेते हैं, जब उनपर अत्याचार किया जाए। इसलिए कि बुराई का बदला वैसी ही बुराई है। फिर जिसने क्षमा किया और मामले का सुधार कर लिया तो उसका अच्छा फल परमेश्वर के ऊपर है। निस्संदेह, परमेश्वर अत्याचारियों को प्रिय नहीं रखता। और हाँ, जिनपर अत्याचार हुआ और उसके बाद उन्होंने बदला लिया तो यही हैं जिनपर कोई दोष नहीं है। दोष तो उन्हीं पर है जो लोगों पर अत्याचार करते और धरती में बिना किसी अधिकार के विद्रोह करते हैं। यही लोग हैं जिनके लिए कष्टदायक दण्ड है।

وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنْ عَزْمِ ٱلْأُمُورِ ﴿43﴾

अपितु जो धैर्य रखें और क्षमा कर दें तो निस्संदेह, यही काम हैं जिन पर बल दिया गया है।

وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن وَلِىٍّ مِّنۢ بَعْدِهِۦ ۗ وَتَرَى ٱلظَّـٰلِمِينَ لَمَّا رَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلَىٰ مَرَدٍّ مِّن سَبِيلٍ ﴿44﴾ وَتَرَىٰهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَـٰشِعِينَ مِنَ ٱلذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِىٍّ ۗ وَقَالَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّ ٱلْخَـٰسِرِينَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ فِى عَذَابٍ مُّقِيمٍ ﴿45﴾ وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَآءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن سَبِيلٍ ﴿46﴾

(ये दुष्ट तो अब पथभ्रष्टता में पड़ चुके, हे पैग़ंबर), और जिन्हें परमेश्वर (अपने नियम अनुसार) पथभ्रष्टता में डाल दे तो उसके बाद फिर उनकी बिगड़ी बनाने वाला कोई नहीं हो सकता। तुम इन दुष्टों को देखोगे कि जब दण्ड भोगेंगे तो (तड़प से) कहेंगे कि क्या (दुनिया में) वापस जाने का भी कोई मार्ग है? और तुम इनको देखोगे कि इस प्रकार नरक के सामने लाए जाएँगे कि अपमान से झुके हुए, कनखियों से देखते होंगे। उस समय मानने वाले कहेंगे कि वास्तव में घाटे वाले तो वे हैं जिन्होंने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया। सुनो, ये दुष्ट अवश्य एक स्थायी दण्ड में पड़ेंगे और वहां इनके कोई संरक्षक नहीं होंगे जो परमेश्वर के विरुद्ध इनकी सहायता कर सकें। सत्य यह है कि जिसको परमेश्वर भटका दे तो फिर उसके लिए (मुक्ति का) कोई मार्ग नहीं है।

ٱسْتَجِيبُوا۟ لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍ ﴿47﴾

(लोगो, अब भी समय है), तुम अपने प्रभु के आह्वान को मानो, इससे पहले कि परमेश्वर की ओर से एक ऐसा दिन आ जाए जो टलने वाला नहीं है। उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण होगी और न तुम किसी चीज़ का खंडन कर सकोगे।

فَإِنْ أَعْرَضُوا۟ فَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ إِنْ عَلَيْكَ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ۗ وَإِنَّآ إِذَآ أَذَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌۢ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَإِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ كَفُورٌ ﴿48﴾

इस पर भी यदि मुँह फेरें तो हमने, (हे पैग़ंबर), तुमको इन पर कोई दरोगा नियुक्त नहीं किया है। तुम्हारे ऊपर केवल पहुंचा देने का दायित्व है। मनुष्य का हाल तो यही है कि उसको जब हम अपनी किसी कृपा से आभूषित करते हैं तो उस पर इतराने लगता है और यदि लोगों के कर्मों के परिणामस्वरूप उनपर कोई संकट आ जाए जो उन्होंने आगे भेजे हैं तो उस समय मनुष्य बड़ा ही अकृतज्ञ बन जाता है।

لِّلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَآءُ إِنَـٰثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَآءُ ٱلذُّكُورَ ﴿49﴾ أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَإِنَـٰثًا ۖ وَيَجْعَلُ مَن يَشَآءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌ قَدِيرٌ ﴿50﴾

(ये जो चाहें, कहें, सत्य यही है कि) धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य परमेश्वर ही का है। वह जो चाहता है, पैदा करता है। जिनको चाहता है, बेटियां देता है और जिनको चाहता है, बेटे देता है। या उनको बेटे और बेटियां मिलाकर देता है और जिनको चाहता है, बिना संतान के रखता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह सब कुछ जानता है, हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।

وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَآئِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِىَ بِإِذْنِهِۦ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ عَلِىٌّ حَكِيمٌ ﴿51﴾ وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ رُوحًا مِّنْ أَمْرِنَا ۚ مَا كُنتَ تَدْرِى مَا ٱلْكِتَـٰبُ وَلَا ٱلْإِيمَـٰنُ وَلَـٰكِن جَعَلْنَـٰهُ نُورًا نَّهْدِى بِهِۦ مَن نَّشَآءُ مِنْ عِبَادِنَا ۚ وَإِنَّكَ لَتَهْدِىٓ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿52﴾ صِرَٰطِ ٱللَّهِ ٱلَّذِى لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ أَلَآ إِلَى ٱللَّهِ تَصِيرُ ٱلْأُمُورُ ﴿53﴾

(इनकी ज़िद है कि परमेश्वर इनके साथ प्रत्यक्ष रूप से बात क्यों नहीं करता? इनसे कहो), किसी मनुष्य का यह स्तर नहीं है कि परमेश्वर उससे आमने सामने बात करे, सिवाय इसके कि वह वह्य के माध्यम से हो या पर्दे के पीछे से या फिर कोई फ़रिश्ता भेजे कि वह उसकी अनुमति से और जो वह चाहे, वह्य कर दे। निस्संदेह वह बड़ी प्रतिष्ठा वाला है, बड़ा प्रज्ञावान है। हमने तुम्हारी ओर भी, (हे पैग़ंबर), इसी प्रकार अपने आदेश की रूह वह्य की है। तुम नहीं जानते थे कि शरीअत क्या है और न यह कि ईमान किसको कहते हैं, परंतु हमने उसको प्रकाश बना दिया जिससे हम अपने भक्तों में से जिसका चाहते हैं, मार्गदर्शन करते हैं। निस्संदेह (इसी रूह का अनुग्रह है कि) तुम एक सीधे मार्ग की ओर अगुवाई कर रहे हो। उस परमेश्वर के मार्ग की ओर कि धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, उसी का है। सुनो, सभी मामले परमेश्वर ही की ओर लौटने वाले हैं।