सूरह 41
हा-मीम् अस्-सज्दह्
मक्की · 54 आयतें · 27 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय परमेश्वर के एक, अद्वितीय और साझेदार रहित होने (तौहीद) को प्रमाणित करना और इसके संदर्भ से क़ुरैश को सचेत करना (इंज़ार) और शुभ समाचार देना (बशारत) है। पहली हालांकि, पहली सूरह में चेतावनी का पहलू और दूसरी में समझाने और शिक्षा देने का पहलू प्रमुख है। दोनों में संबोधन मक्का के क़ुरैश क़बीले से है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के हिज्रत व बराअत के चरण में अवतरित हुई हैं।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
यह सूरह 'हा-मीम' है। यह रहमान और रहीम परमेश्वर की उतारी हुई वाणी है। यह ऐसा ग्रंथ है जिसकी आयतों की स्पष्ट व्याख्या की गई है। अरबी क़ुरआन के रूप में, उन लोगों के लिए जो जानना चाहें। शुभ समाचार देने वाला और सचेत करने वाला। (इन पर अफसोस), इनके अधिकांश लोगों ने फिर भी इससे मुँह मोड़ लिया है, इसलिए सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। और (बड़ी अकड़ के साथ) कहते हैं कि जिस चीज़ की ओर तुम हमें बुला रहे हो, हमारे दिल उससे ढके हुए हैं और जो कुछ हमें सुना रहे हो, हमारे कान उससे बहरे हैं और हमारे और तुम्हारे बीच एक पर्दा पड़ा है। तो जो कुछ तुम्हें करना है, कर डालो, हम भी, जो कुछ करना है, करके रहेंगे।
इनसे कह दो, (मुझे क्या करना है, मैं परमेश्वर नहीं हूं कि तुम पर दण्ड उतार दूं)। मैं भी उसी प्रकार एक मनुष्य ही हूं, जैसे तुम हो। मुझे वह्य के माध्यम से बताया जाता है कि तुम्हारा उपास्य एक ही उपास्य है। तो अपनी दिशा सीधे उसी की ओर किए रहो और उससे क्षमा चाहो। और (सुन लो कि) इन मुश्रिकों के लिए बर्बादी है। जो ज़कात (के रूप में लोगों का जो अधिकार इन पर लागू होता है, उसे) नहीं देते और यही परलोक के नकारने वाले हैं। अपितु, (इनमें से) जिन्होंने मान लिया है और उन्होंने भले कर्म किए हैं, उनके लिए, निस्संदेह ऐसा प्रतिफल है जो कभी समाप्त होने वाला नहीं है।
इनसे पूछो, क्या तुम उस परम सत्ता को नकार रहे हो जिसने दो दिनों में धरती बनाई, और उसके सहभागी बनाते हो? यह है समस्त लोकों का प्रभु। और उसने धरती के अंदर उसके ऊपर से पर्वत गाड़ दिए और उसमें अनेक आशीष रख दिए और सभी अभावग्रस्त प्राणियों के लिए समान, उसके आहार उसमें डाल दिए। यह सब मिलाकर चार दिनों में। फिर उसने आकाश की ओर ध्यान किया जो (धरती के साथ ही अस्तित्व में आ चुका था और) उस समय धुएँ के रूप में था। तो उसको और धरती को आदेश दिया कि पालन करो, स्वेच्छापूर्वक या अनिच्छापूर्वक। दोनों ने कहा: हम स्वेच्छापूर्वक उपस्थित हैं। फिर दो दिनों में उनके सप्त-आकाश होने का निर्णय किया और हर आकाश में उसका नियम प्रेरित कर दिया और तुम्हारे इस निकटतम आकाश को हमने दीपों से शोभा दी और उसे अत्यंत सुरक्षित बना दिया। यह परम शक्तिशाली और परम ज्ञानी परमेश्वर का आयोजन है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात आकाश यद्यपि अस्तित्व में आ चुके थे, परंतु अभी अपूर्ण थे, इसलिए उनको भी अंतिम रूप देकर संपूर्ण सृष्टि को पूर्णता की अवस्था तक पहुँचा दिया गया। ↩
अब भी यदि मुँह मोड़ते हैं तो कह दो कि जैसी बिजली आद व समूद पर गिरी थी, मैं तुमको उसी प्रकार की बिजली की कड़क से डराता हूं। जब उनके आगे और पीछे से उनके रसूल उनके पास आए कि उन्हें हर प्रकार से समझा दें कि परमेश्वर को छोड़ किसी और की भक्ति न करो। उन्होंने उत्तर दिया कि यदि हमारा प्रभु चाहता कि किसी को रसूल बनाकर भेजे तो फ़रिश्ते उतारता, इसलिए हम तो उस संदेश को नकारने वाले हैं जिसके साथ तुम भेजे गए हो।
तो आद का मामला तो यह था कि वह बिना किसी अधिकार के धरती में बड़े बन बैठे और कहने लगे कि हमसे बढ़कर शक्ति में कौन है! क्या उन्होंने सोचा नहीं कि जिस परमेश्वर ने उनको पैदा किया है, वह उनसे शक्ति में कहीं बढ़-चढ़कर है? (इस प्रकार बड़े बन बैठे) और हमारी आयतों को नकारते रहे। तो हमने कुछ मनहूस दिनों में उनपर जाड़े की तीव्र हवा भेज दी ताकि उनको इसी दुनिया के जीवन में अपमान का दण्ड चखाएँ और परलोक का दण्ड तो इससे कहीं बढ़कर अपमानित कर देने वाला होगा और वहां उनको कोई सहायता भी नहीं पहुंचेगी।
रहे समूद तो हमने उनको भी उचित मार्ग दिखाया, परंतु उन्होंने सन्मार्ग पर अंधा बनकर रहने को चुना। तो उनके कर्मों के परिणामस्वरूप उनको अपमानजनक दण्ड की कडक ने आ दबोचा। और हमने उनको बचा लिया जो मान गए और हमसे डरने वाले थे।
उस दिन को याद करो, जब परमेश्वर के ये शत्रु नरक की ओर हांक कर इकट्ठे किए जाएँगे। फिर (इनके कर्मों के अनुसार) इनका वर्गीकरण किया जाएगा। यहाँ तक कि जब वह घड़ी आ जाएगा कि नरक तक आ पहुंचेंगे तो जो कुछ ये करते रहे, इनके कान और इनकी आँखें और उनके शरीर के रोंगटे इन पर उसकी गवाही देंगे। ये अपने शरीरों से पूछेंगे: तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी? वे उत्तर देंगे: हमको उसी परमेश्वर ने बोलने वाला कर दिया जिसने हर चीज़ को बोलने वाला किया है। (इस प्रकार गवाही देंगे और लोगो, यह बात भी याद रखो कि) उसी ने तुम्हारी पहली बार रचना की थी और अब उसी की ओर लौटाए जा रहे हो।
तुम यह ड़र नहीं रखते थे कि तुम्हारे कान और तुम्हारी आँखें और तुम्हारे शरीरों के रोंगटे तुम्हारे विरुद्ध गवाही देंगे, अपितु तुमने तो कल्पना कर रखी थी कि परमेश्वर भी उन बहुत सी चीज़ों से अवगत नहीं है जो तुम करते हो। तुम्हारी यही कल्पना है जो तुमने अपने प्रभु के बारे में की थी, जिसने तुमको बर्बाद किया और तुम घाटे में पड़ गए।
तो यदि ये धैर्य रखें, तब भी नरक ही इनका ठिकाना है और यदि न रखें, तब भी। और यदि ये क्षमा चाहेंगे तो इन्हें क्षमा भी नहीं किया जाएगा।
(ये इस अंत को इसलिए पहुंचे कि इनके पापकर्मों के परिणामस्वरूप) हमने इन पर बुरे साथी थोप दिए तो इनके आगे और पीछे की हर चीज़ उन्होंने इनको लुभावनी बनाकर दिखाई और अंततः वही बात इन पर भी पूरी हो कर रही जो इनसे पहले बीते हुए जिन्नों और मनुष्यों के समूहों पर पूरी हुई। निस्संदेह ये घाटे में रहने वाले थे।
ये नकारने वाले कहते हैं कि इस क़ुरआन को न सुनो और इसके बीच में शोर मचा दिया करो ताकि तुम प्रभावी रहो। तो हम इन नकारने वालों को अवश्य कठोर दण्ड चखाएंगे और जो कुछ ये करते रहे, अवश्य उसका इनको सबसे बुरा प्रतिफल देंगे। यह परमेश्वर के शत्रुओं का बदला है। (जानते हो क्या है)? यह आग है। इनके लिए इनके इस अपराध के दण्ड में कि ये हमारी आयतों को नकारते रहे थे, इसी में हमेशा का ठिकाना होगा।
वहां ये नकारने वाले कहेंगे कि हे हमारे प्रभु, हमें वे जिन्न और मनुष्य दिखा दे जिन्होंने हमें भटकाया था कि हम उनको अपने पाँव तले रौंदें ताकि वे अपमानित हों।
इसके विपरीत जिन लोगों ने स्वीकार किया कि हमारा प्रभु परमेश्वर है, फिर (सभी विरोधों से बेपरवाह होकर) उस पर जमे रहे, (उनकी संतुष्टि के लिए क़यामत के दिन, इससे पहले कि निर्णय हो), उनपर अवश्य फ़रिश्ते उतरेंगे और कहेंगे कि अब न कोई भय रखो, न दुख और उस स्वर्ग का शुभ समाचार स्वीकार करो, जिसका वचन तुम्हें दिया जाता है। हम दुनिया के जीवन में भी तुम्हारे साथी रहे और परलोक के जीवन में भी तुम्हारे साथी हैं। (हम जिस स्वर्ग की शुभ सूचना तुम्हें दे रहे हैं), उसमें तुम्हारे लिए हर वह चीज़ है जिसे तुम्हारा दिल चाहेगा और उसमें हर वह चीज़ प्रस्तुत है जो तुम मांगोगे — उसकी ओर से आतिथ्य के रूप में, जो बड़ा ही क्षमा करने वाला है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
(तुम इनको परमेश्वर की ओर बुला रहे हो, हे पैग़ंबर) और उससे अच्छी बात किस की हो सकती है जो परमेश्वर की ओर बुलाए और भले कर्म करे और कहे कि मैं आज्ञाकारियों में हूँ! सत्य यह है कि भलाई और बुराई, दोनों समान नहीं हैं। (इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे ये नकारने वाले अब बुराई के पीछे हैं, परंतु) तुम बुराई के बदले वह करो जो उससे अच्छा है तो देखोगे कि वही जिसके और तुम्हारे बीच द्वेष है, वह जैसे एक अंतरंग मित्र बन गया है। और (याद रखो कि) यह समझ उनही को मिलती है जो अपने संकल्प में अटल रहने वाले हों और यह प्रज्ञता उन्हीं को दी जाती है जिनके बड़े भाग्य हैं। और यदि शैतान की ओर से (किसी समय) तुम्हारे दिल में कोई उकसाहट पैदा हो जाए तो परमेश्वर की शरण ढूंढो। निस्संदेह, वही सुनने वाला, जानने वाला है।
(लोगो, जो धरती और आकाश का रचयिता है), यह रात और दिन और सूरज और चाँद भी उसी की निशानियों में से हैं। तुम न सूरज को सज्दा करो और न चाँद को, अपितु उस परमेश्वर को सज्दा करो जिसने इन्हें बनाया है, यदि तुम उस की भक्ति करने वाले हो।
फिर यदि ये अहंकार करें तो चिंता नहीं, जो फ़रिश्ते तेरे प्रभु की सभा में हैं, वे रात दिन उसी का गुणगान कर रहे हैं और (उनका उत्साह ऐसा है कि) कभी थकते नहीं हैं।
और उसी की निशानियों में से है कि तुम धरती को देखते हो कि पूरी तरह मृत पड़ी है। फिर जब हम (अपनी कृपा से) उस पर पानी बरसा देते हैं तो वह (जीवित होकर) हरी भरी होती और उभरती है। जिसने उसको जीवित किया, निस्संदेह वही मुर्दों को भी जीवन देने वाला है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।
हमारी इन निशानियों के बारे में जो लोग टेढ़ापन अपनाते हैं, वे हमसे छिपे हुए नहीं हैं। अतः (निर्णय कर लें कि) क्या वह व्यक्ति अच्छा है जो आग में झोंका जाएगा या वह जो क़यामत के दिन आएगा और उसे किसी बात का खटका नहीं होगा। (लोगो), तुम जो चाहो, सो करो। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो तुम कर रहे हो, परमेश्वर उसे देख रहा है।
जिन लोगों ने परमेश्वर के इस उपदेश को नकार दिया है, जबकि वह उनके पास आ गया है, उन्होंने अपनी बरबादी बुला ली है। सत्य यह है कि यह एक बड़ा प्रतिष्ठित ग्रंथ है। इसमें न असत्य इसके आगे से प्रवेश कर सकता है और न इसके पीछे से। यह अत्यंत प्रबंध के साथ उस परम सत्ता की ओर से उतारा गया है जो सर्वथा प्रज्ञा है, उत्तम गुणों वाला है।
(तुम संतुष्ट रहो, हे पैग़ंबर), तुम्हें (इन लोगों की ओर से) वही बातें कही जा रही हैं जो तुमसे पहले रसूलों को कही जा चुकी हैं। इस समय इन्हें ढील दी गई है, परंतु ये निर्भय न हों)। वास्तव में तेरा प्रभु क्षमा करने वाला और इसके साथ बड़ा कष्टदायक दण्ड देने वाला भी है।
(कहते हैं कि यह उपदेश पहले ग्रंथों की भाषा में क्यों नहीं उतारा गया)? हम यदि इस क़ुरआन को ग़ैर-अरबी क़ुरआन बनाकर उतारते तो उस समय ये आपत्ति उठाते कि इसकी आयतें (स्वयं हमारी भाषा में) खोलकर क्यों नहीं कही गईं? क्या आश्चर्य की बात है कि वाणी ग़ैर-अरबी और संबोध्य अरबवासी! इनसे कहो, मानने वालों के लिए तो यह मार्गदर्शन है और (दिल के रोगों का) उपचार है। रहे वे लोग जो मान नहीं रहे तो उनके कानों में, अपितु यह भारीपन है और उनके ऊपर यह एक पर्दा बन गया है। यही हैं (जो क़यामत के दिन) अब किसी दूर के स्थान से पुकारे जाएँगे।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात इस प्रकार नहीं, जिस प्रकार परमेश्वर का पैग़ंबर इस समय इनके बीच खड़े होकर इनको बहुत पास से पुकार रहा है और ये सुन नहीं रहे हैं। ↩
और (कहते हैं कि मूसा के ग्रंथ के बाद इस नए ग्रंथ की आवश्यकता क्यों हुई)? निस्संदेह हमने मूसा को भी धर्मग्रंथ प्रदान किया था, परंतु उसमें मतभेद पैदा कर दिया गया और तेरे प्रभु की ओर से यदि एक बात पहले तय न हो चुकी होती तो (परमेश्वर के ग्रंथ के साथ इस अन्याय के परिणामस्वरुप) धर्मग्रंथ के इन उत्तराधिकारियों के बीच निपटारा कर दिया जाता। सत्य यह है कि ये तो अब उसकी ओर से ऐसे संदेह में पड़े हुए हैं जो उलझन में डाल देने वाला है। (इससे मुक्ति के लिए ये परमेश्वर के इस उपदेश से लाभ उठाएं तो इन्हीं का भला है, इसलिए याद रखें कि) जो भले कर्म करेगा तो अपने ही लिए करेगा और जो बुराई करेगा तो उसका भार उसी पर होगा और तेरा प्रभु अपने भक्तों के साथ कुछ भी अन्याय करने वाला नहीं है।
और (कहते हैं कि यह जिस क़यामत से डरा रहे हो, यह कब प्रकट होगी? इनसे कहो), क़यामत का ज्ञान तो परमेश्वर ही के पास है। और (केवल क़यामत ही नहीं), यह उसी का ज्ञान है कि जिसके बिना न फल अपने छिलके से बाहर निकलते हैं और न कोई स्त्री गर्भवती होती है और न जन्म देती है। (ये अपने देवी-देवताओं के बल पर परमेश्वर से बेपरवाह हो रहे हैं तो) याद रखें, जिस दिन वह उनको पुकारेगा कि मेरे वह सहभागी कहाँ हैं, (उन्हें बुलाओ कि तुम्हें छुड़ा लें) तो कहेंगे कि हमने तुझसे निवेदन किया कि आज हम में से कोई भी उनकी गवाही देने वाला नहीं है। उस समय वे सब इनसे ओझल हो जाएँगे जिन्हें ये इससे पहले पुकारते रहे और ये समझ लेंगे कि अब इनके लिए कोई भागने की जगह नहीं है।
मनुष्य (का मामला भी अद्भुत है, वह संकटों को आते देख कर) भलाई की प्रार्थना से नहीं थकता, परंतु यदि उस पर संकट आ जाए (और वह देखे कि प्रार्थनाओं का कोई परिणाम नहीं हो रहा है) तो निराश हो जाता है। और यदि उस संकट के बाद जो उसको पहुंचा था, हम उसको अपनी दया का स्वाद चखाते हैं तो कहता है कि यह तो मेरा अधिकार ही है और मैं नहीं समझता कि क़यामत घटित होगी, किंतु (यदि हुई और) मैं अपने प्रभु की ओर लौटा दिया गया तो कोई संदेह नहीं कि मेरे लिए उसके यहाँ भी अच्छा ही है। (ये इनके सपने हैं जिनके बल पर ये पैग़ंबर का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं)। तो इन नकारने वालों को हम अवश्य इनके कर्मों से अवगत करेंगे और इनको अवश्य एक कठोर दण्ड का स्वाद चखाएंगे।
मनुष्य (का मामला यही है कि उस) पर जब हम कृपा करते हैं तो वह (अहंकार से) मुँह मोड़ता और पक्ष बदल लेता है और जब उसको कष्ट पहुंचता है तो लंबी-लंबी प्रार्थनाएं करने वाला बन जाता है।
इनसे कहो, थोड़ा ध्यान तो दो कि यदि सच में यह क़ुरआन परमेश्वर की ओर से हुआ और इस पर भी तुम इसको नकारते रहे तो इससे अधिक पथभ्रष्ट कौन होगा जो बहुत दूर के विरोध में जा पड़ा?
(तुम संतुष्ट रहो, हे पैग़ंबर और ये भी सचेत हो जाएं), इन्हें हम शीघ्र ही अपनी निशानियाँ बाहर की दुनिया में भी दिखाएंगे और स्वयं इनके अंदर भी, यहाँ तक कि इनपर स्पष्ट हो जाएगा कि यह क़ुरआन पूर्णतः सत्य है। और (तुम्हारी तसल्ली के लिए) क्या यह बात पर्याप्त नहीं है कि तुम्हारा प्रभु हर चीज़ का साक्षी है? सुनो, ये लोग अपने प्रभु के समक्ष प्रस्तुत होने के बारे ही में संदेह में हैं। सुनो, वह हर चीज़ को घेरे हुए है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात मक्का के आस-पास भी और स्वयं मक्का में क़ुरैश के अंदर भी। ↩