सूरह 49

अल्-हुजुरात्

मदनी · 18 आयतें · 11 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

यह बिना जोड़े के एक अलग सूरह है जिस पर पवित्र क़ुरआन का यह पाँचवाँ अध्याय समाप्त हो जाता है। अपने विषय के अनुसार, यह पिछली सूरह—अल्-फ़त्ह—का अनुपूरक है। सूरह फ़त्ह की अंतिम आयत में पैग़ंबर मुहम्मद के साथियों के विषय में तौरात (Torah) की उप्मा के माध्यम से जो कहा गया था, यह पूरी सूरह उसी की व्याख्या है। इसलिए, इसका विषय वही तज़्कियह और तत्हीर है, जो पिछली दोनों सूरतों से चला आ रहा है। इसके अंतर्गत इस सूरह में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और मुसलमानों के आपस के अधिकारों से संबंधित आवश्यक निर्देश दिए गए हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. तज़्कियह और तत्हीर के शब्द ग़ामिदी साहब द्वारा समान अर्थों में ज्ञान और कर्म से संबन्धित चीज़ों के शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त किए गए हैं; तत्हीर शब्द का एक अतिरिक्त अर्थ होता है वर्गीकरण या मानने वालों को नकारने वालों और ढोंगियों से अलग करना। जहां भी यह अतिरिक्त अर्थ अभिप्राय होता है, वहां ग़ामिदी साहब ने इसे सूरह की व्याख्या में स्पष्ट किया है। [अनुवादक] ↩

इसमें संबोधन मानने वालों [अर्थात मुसलमानों] से है और इसकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि यह मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के तज़्कियह व तत्हीर के चरण में उस समय अवतरित हुई है, जब उनके दुनिया से विदा हो जाने का समय निकट आ गया था और इस बात की आशंका थी कि नैतिक प्रशिक्षण की कमी, आपसी मनमुटाव, और क़बाइली अस्मिता के झगड़े उनकी सामूहिक एकता को खंडित कर सकते हैं।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُقَدِّمُوا۟ بَيْنَ يَدَىِ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿1﴾

हे मानने वालो, परमेश्वर और उसके रसूल के आगे अपने विचार को प्राथमिकता न दो और परमेश्वर से डरते रहो। निस्संदेह, परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَرْفَعُوٓا۟ أَصْوَٰتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ ٱلنَّبِىِّ وَلَا تَجْهَرُوا۟ لَهُۥ بِٱلْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَـٰلُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ ﴿2﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَٰتَهُمْ عِندَ رَسُولِ ٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱمْتَحَنَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ ﴿3﴾

हे मानने वालो, अपनी आवाज़ों को पैग़ंबर की आवाज़ से ऊँचा न होने दो और न उसको ऐसे आवाज़ देकर पुकारो, जैसे आपस में एक दूसरे को पुकारते हो। ऐसा न हो कि तुम्हारा किया कराया सब बेकार चला जाए और तुम्हें आभास भी न हो। (याद रखो), जो परमेश्वर के रसूल के आगे अपनी आवाज़ें नीची रखते हैं, वही हैं जिनके दिलों को परमेश्वर ने पुण्यशीलता के विकास के लिए जांच कर चुन लिया है। उनके लिए क्षमा भी है और महान प्रतिफल भी।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَآءِ ٱلْحُجُرَٰتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ﴿4﴾ وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا۟ حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿5﴾

इसमें कोई संदेह नहीं, (हे पैग़ंबर) कि जो लोग तुमको कमरों के बाहर से पुकारते हैं, उनमें से अधिकांश समझ बूझ नहीं रखते। यदि ये लोग धीरज के साथ प्रतीक्षा कर लेते कि तुम स्वयं इनके पास निकल के आ जाते तो यह इनके पक्ष में बहुत अच्छा होता। फिर भी (क्षमा करो), परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِن جَآءَكُمْ فَاسِقٌۢ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوٓا۟ أَن تُصِيبُوا۟ قَوْمًۢا بِجَهَـٰلَةٍ فَتُصْبِحُوا۟ عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَـٰدِمِينَ ﴿6﴾ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ فِيكُمْ رَسُولَ ٱللَّهِ ۚ لَوْ يُطِيعُكُمْ فِى كَثِيرٍ مِّنَ ٱلْأَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ حَبَّبَ إِلَيْكُمُ ٱلْإِيمَـٰنَ وَزَيَّنَهُۥ فِى قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ ٱلْكُفْرَ وَٱلْفُسُوقَ وَٱلْعِصْيَانَ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلرَّٰشِدُونَ ﴿7﴾ فَضْلًا مِّنَ ٱللَّهِ وَنِعْمَةً ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿8﴾

हे मानने वालो, यदि (इन पुकारने वालों में से) कोई दुराचारी तुम्हारे पास कोई महत्वपूर्ण सूचना लाए तो उसकी अच्छे से जांच कर लिया करो। ऐसा न हो कि तुम भावनाओं में आकर किसी जनसमूह पर आक्रमण करो, फिर तुमको अपने किए पर पछताना पड़े। और तुम यह बात भी अच्छे से जान लो कि तुम्हारे बीच परमेश्वर का रसूल उपस्थित है, (इसलिए किसी प्रकार उचित नहीं है कि अपने विचारों पर अड़े रहो)। यदि वह बहुत से मामलों में तुम्हारी बात मान लिया करे तो तुम बड़े संकट में पड़ जाओगे, (जिस प्रकार इससे पहले पड़े रहते थे), परंतु परमेश्वर ने तुम्हारे आगे आस्था को प्रिय बनाया और उसको तुम्हारे दिलों में अच्छा कर दिखाया है और कुफ़्र और दुराचार और पैग़ंबर की अवज्ञा को तुम्हारी दृष्टि में अत्यंत अप्रिय बनाया है। परमेश्वर की कृपा और उपकार से यही लोग उचित मार्ग पर हैं (कि इस वरदान के पाने वाले हैं) और परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।

وَإِن طَآئِفَتَانِ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ٱقْتَتَلُوا۟ فَأَصْلِحُوا۟ بَيْنَهُمَا ۖ فَإِنۢ بَغَتْ إِحْدَىٰهُمَا عَلَى ٱلْأُخْرَىٰ فَقَـٰتِلُوا۟ ٱلَّتِى تَبْغِى حَتَّىٰ تَفِىٓءَ إِلَىٰٓ أَمْرِ ٱللَّهِ ۚ فَإِن فَآءَتْ فَأَصْلِحُوا۟ بَيْنَهُمَا بِٱلْعَدْلِ وَأَقْسِطُوٓا۟ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ ﴿9﴾ إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا۟ بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ﴿10﴾

(तुम्हारी एकता इसी से स्थापित है, इसलिए) यदि मुसलमानों के दो गुट आपस में लड़ पड़ें तो उनके बीच संधि कराओ। फिर यदि उनमें से एक गुट दूसरे के साथ अन्याय करे तो जो अन्याय करे, उससे युद्ध करो, यहाँ तक कि वह परमेश्वर के निर्णय की ओर आ जाए। फिर यदि आ जाए तो दोनों के बीच न्याय के साथ समझौता कराओ और परमेश्वर से डरते रहो ताकि तुम पर दया की जाए।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُونُوا۟ خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَآءٌ مِّن نِّسَآءٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا۟ بِٱلْأَلْقَـٰبِ ۖ بِئْسَ ٱلِٱسْمُ ٱلْفُسُوقُ بَعْدَ ٱلْإِيمَـٰنِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿11﴾

हे मानने वालो, (इसी भाई चारे की मांग है कि) न (तुम्हारे) पुरुष अन्य पुरुषों का मज़ाक़ उड़ाएँ, हो सकता है कि वे उनसे अच्छे हों, और न महिलाएं दूसरी महिलाओं का मज़ाक़ उड़ाएँ, हो सकता है कि वे उनसे अच्छी हों। और न अपनों पर दोष लगाओ और आपस में एक दूसरे को बुरी उपाधियां दो। (ये सब दुराचार की बातें हैं, और) ईमान के बाद दुराचार का नाम भी बहुत बुरा है। और जो (इस चेतावनी के बाद भी) तौबा न करें तो वही अपने प्राणों पर अत्याचार करने वाले हैं।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱجْتَنِبُوا۟ كَثِيرًا مِّنَ ٱلظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ ٱلظَّنِّ إِثْمٌ ۖ وَلَا تَجَسَّسُوا۟ وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ تَوَّابٌ رَّحِيمٌ ﴿12﴾

हे मानने वालो, बहुत सी अटकलों से बचो, इसलिए कि कई अटकलें स्पष्ट पाप होती हैं। और (दूसरों की) जासूसी में न लगो और न तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे बुराई करे। क्या तुम में से कोई ऐसा है जो अपने मरे हुए भाई का मांस खाने को अच्छा समझेगा? इसके प्रति तो सहिष्णुता नहीं दिखाते, (फिर पीठ पीछे बुराई करने के प्रति सहिष्णुता क्यों दिखाते हो)! तुम परमेश्वर से डरो। निस्संदेह, परमेश्वर बड़ा ही तौबा स्वीकार करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَـٰكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَـٰكُمْ شُعُوبًا وَقَبَآئِلَ لِتَعَارَفُوٓا۟ ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ ٱللَّهِ أَتْقَىٰكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ ﴿13﴾

लोगो, (एक दूसरे को भाई नहीं समझोगे तो इन्हीं बुराइयों में पड़े रहोगे, इसलिए अच्छे से समझ लो कि) हमने तुमको एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया है और तुमको अनेक घरानों और कुलों में विभाजित कर दिया है ताकि एक दूसरे को (अलग-अलग) पहचानो। सत्य यह है कि परमेश्वर के सामने तुम में सबसे अधिक सम्मान वाला वह है जो तुम में सबसे अधिक पुण्यशील है। (वह क़यामत में इसी आधार पर निर्णय करेगा)। निस्संदेह, परमेश्वर ज्ञानी और अवगत है।

قَالَتِ ٱلْأَعْرَابُ ءَامَنَّا ۖ قُل لَّمْ تُؤْمِنُوا۟ وَلَـٰكِن قُولُوٓا۟ أَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ ٱلْإِيمَـٰنُ فِى قُلُوبِكُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ لَا يَلِتْكُم مِّنْ أَعْمَـٰلِكُمْ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿14﴾ إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلصَّـٰدِقُونَ ﴿15﴾

(तुमको कमरों के बाहर से पुकारने वाले) ये बद्दु अरब (बड़ा उपकार जताकर) कहते हैं कि हमने मान लिया है। इन्हें बताओ कि तुम माने नहीं हो। हाँ, यह कहो कि हमने अधीनता स्वीकार कर ली है। ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों के अंदर प्रवेश तक नहीं हुआ है। यदि तुम परमेश्वर और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करोगे तो परमेश्वर तुम्हारे कर्मों में कोई कमी नहीं करेगा। (तो अपना सुधार कर लो)। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। (याद रखो), मोमिन तो वास्तव में वही हैं जिन्होंने परमेश्वर और उसके रसूल को मान लिया, फिर संदेह में नहीं पड़े और अपने धन और अपने प्राण से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद किया। यही सच्चे लोग हैं।

قُلْ أَتُعَلِّمُونَ ٱللَّهَ بِدِينِكُمْ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿16﴾

इनसे कहो, क्या तुम परमेश्वर को अपने धर्म से अवगत कर रहे हो? यद्यपि जो कुछ धरती में है और जो कुछ समस्त आकाशों में है, परमेश्वर उसे जानता है और परमेश्वर हर चीज़ से परिचित है।

يَمُنُّونَ عَلَيْكَ أَنْ أَسْلَمُوا۟ ۖ قُل لَّا تَمُنُّوا۟ عَلَىَّ إِسْلَـٰمَكُم ۖ بَلِ ٱللَّهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ أَنْ هَدَىٰكُمْ لِلْإِيمَـٰنِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿17﴾ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ غَيْبَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ ﴿18﴾

ये तुम पर उपकार जताते हैं कि इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया। कह दो कि अपने इस्लाम का उपकार मुझपर न रखो, अपितु परमेश्वर का तुम पर उपकार है कि उसने तुमको ईमान का सौभाग्य प्रदान किया, यदि तुम (अपने इस दावे में) सच्चे हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि धरती और समस्त आकाशों की सभी छिपी हुई बातें परमेश्वर की जानकारी में हैं और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देख रहा है।