सूरह 47
मुहम्मद्
मदनी · 38 आयतें · 14 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के परिणामस्वरूप उन्हें मानने वालों के ज्ञान (इल्म) और कर्मों (अमल) का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और उनके संगठन का परिष्करण (तत्हीर) है। इसके साथ, उन्हें परलोक (आख़िरत) में स्वर्ग (जन्नत) और दुनिया में विजय एवं परमेश्वर की सहायता (फ़त्ह व नुस्रत) की शुभ सूचना भी बहुत स्पष्ट शब्दों में दी गई है। इसका आवश्यक परिणाम यह है कि पैग़ंबर को नकारने वालों और झूठा कहने वालों को हार का सामना करना पड़ेगा और उनके लिए नरक (जहन्नम) की चेतावनी है।1
टिप्पणियाँ 1
- तज़्कियह और तत्हीर के शब्द ग़ामिदी साहब द्वारा समान अर्थों में ज्ञान और कर्म से संबन्धित चीज़ों के शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त किए गए हैं; तत्हीर शब्द का एक अतिरिक्त अर्थ होता है वर्गीकरण या मानने वालों को नकारने वालों और ढोंगियों से अलग करना। जहां भी यह अतिरिक्त अर्थ अभिप्राय होता है, वहां ग़ामिदी साहब ने इसे सूरह की व्याख्या में स्पष्ट किया है। [अनुवादक] ↩
इन सूरतों में संबोधन मुख्य रूप से मानने वालों [अर्थात मुसलमानों] से है, और इनकी विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि यह मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के तज़्कियह और तत्हीर के चरण में उस समय अवतरित हुई हैं, जब सत्य को नकारने वालों के विरुद्ध निर्णायक कार्यवाही में अधिक समय नहीं बचा था।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
जिन लोगों ने इनकार किया और परमेश्वर के मार्ग से रोका, उनके कर्म परमेश्वर ने निष्फल कर दिए हैं। और जो मान गए और उन्होंने भले कर्म किए और उस चीज़ को मान लिया जो मुहम्मद पर उतारी गई है — और उनके प्रभु की ओर से वही सत्य है — उनके पापकर्म परमेश्वर ने उनसे दूर कर दिए और उनकी दशा ठीक कर दी है। यह इसलिए कि नकारने वालों ने असत्य का अनुसरण किया और मानने वालों ने उस सत्य का अनुसरण किया है जो उनके प्रभु की ओर से आया है। इस प्रकार परमेश्वर उनके उदाहरणों का वर्णन लोगों के लिए करता है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात दृष्टांत के रूप में ऐसे तथ्य समझता है जो शीघ्र ही सामने आ जाएँगे। ↩
अतः, (हे मानने वालो), जब इन नकारने वालों से तुम्हारे टकराव का अवसर आए तो बिना संकोच के गर्दनें मारनी हैं, यहाँ तक कि इनको अच्छे से कुचल दो, तब बंदी बनाकर मज़बूत बांधो। फिर जब बांध लो तो उसके बाद उपकार कर के छोड़ देना है या बंधक धन लेकर। (इनके साथ तुम्हारा यही व्यवहार रहना चाहिए), यहाँ तक की युद्ध अपने शस्त्र डाल दे। यह कार्य है जो तुम्हारे करने का है। यदि परमेश्वर चाहता तो इनसे स्वयं ही बदला ले लेता, परंतु उसने तुमको आदेश दिया, इसलिए कि तुम में से एक को दूसरे से जाँचे। और (संतुष्ट रहो, इसके परिणामस्वरुप) जिन लोगों की परमेश्वर के मार्ग में हत्या हुई, उनके कर्म परमेश्वर कभी व्यर्थ नहीं जाने देगा। (अतः) शीघ्र ही वह उनको (उनके लक्ष्य का) मार्ग दिखाएगा, उनकी दशा ठीक करेगा और उनको स्वर्ग में प्रवेश कर देगा। उसकी पहचान उसने उन्हें करा दी है।1
टिप्पणियाँ 1
- क़ुरआन का यही आदेश है, जिस ने बंधियों को ग़ुलाम बनाने की रीति का हमेशा की लिए अंत कर दिया और इस प्रकार ग़ुलामी की जड़ काट दी। ↩
हे मानने वालो, यदि तुम परमेश्वर की सहायता करोगे तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और (इन शत्रुओं के विरुद्ध) तुम्हारे पाँव जमा देगा। रहे वे जिन्होंने नकारने का निर्णय कर लिया है तो उनके लिए बर्बादी है और उनके कर्म परमेश्वर ने निष्फल कर दिए हैं। यह इसलिए कि उन्होंने उस चीज़ को बुरा जाना जो परमेश्वर ने उतारी है तो परमेश्वर ने उनके अच्छे कर्म भी निष्फल कर दिए।
फिर क्या ये लोग देश में चले फिर नहीं कि (कभी आंख उठा कर) देखते कि उन लोगों का अंत क्या हुआ जो इनसे पहले चल बसे हैं? परमेश्वर ने उनको उनकी सभी वस्तुओं के साथ नष्ट कर दिया। इन नकारने वालों के सामने अब इसी के उदाहरण आने हैं। यह इसलिए कि परमेश्वर मानने वालों का समर्थक तथा सहायक है और इन नकारने वालों का समर्थक तथा सहायक कोई नहीं।
निस्संदेह परमेश्वर उनको, जो मान गए और उन्होंने भले कर्म किए, ऐसे बाग़ों में प्रवेश देगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी और जिन्होंने नकार दिया है, (उनकी समृद्धि पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए), वे उसी प्रकार लाभ उठाने वाले हो रहे और खा पी रहे हैं, जिस प्रकार चौपाये खाते हैं और उनका ठिकाना अंततः नरक है।
(ये किस बलबूते पर अकड़ रहे हैं, हे पैग़ंबर)। कितनी ही बस्तियां हैं जो शक्ति में तुम्हारी उस बस्ती से कहीं बढ़कर थीं, जिसने तुम्हें निकाला है। उनको हमने नष्ट कर दिया तो कोई भी उनकी सहायता करने वाला नहीं था।
(आगे क़यामत में भी यही होगा। यदि नहीं मानते तो इनसे पूछो), फिर क्या जो अपने प्रभु की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हैं और भले कर्म भी करते हैं, वे उन लोगों के जैसे हो जाएँगे, जिनके पास कोई प्रमाण नहीं और जिनके बुरे काम उनके लिए आकर्षक बना दिए गए हैं और वे अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हैं? (कदापि नहीं), वह स्वर्ग जिसका वचन परमेश्वर से डरने वालों को दिया गया है, उसका उदाहरण यह है कि उसमें पानी की नहरें हैं जिसमें कोई मिलावट नहीं होगी और दूध की नहरें हैं जिसके स्वाद में कुछ भी परिवर्तन नहीं आया होगा और शराब की नहरें हैं जो पीने वालों के लिए सर्वथा आनंदमय होगी और मधु की नहरें हैं जो पूर्णतः स्वच्छ होगा और उनके लिए उसमें सब प्रकार के फल हैं और उनके प्रभु की ओर से क्षमा भी। क्या वे जिनके लिए यह वरदान है, उन लोगों के जैसे होंगे जो सदा नरक में रहने वाले हैं, जिन्हें उसमें खौलता हुआ पानी पिलाया जाएगा तो उनकी आंतों को वह टुकड़े-टुकड़े करके रख देगा?
और उनमें, (जो परमेश्वर के उतारे हुए इस ग्रंथ को पसंद नहीं करते), कुछ ऐसे भी हैं जो तुम्हारी ओर कान लगाते हैं, (परंतु सुनते समझते कुछ नहीं)। यहाँ तक कि जब तुम्हारे पास से बाहर निकलते हैं तो ज्ञानियों से पूछते हैं की अभी इन्होंने क्या कहा था? यही लोग हैं जिनके दिलों पर परमेश्वर ने मुहर कर दी है, इसलिए कि ये अपनी इच्छाओं के अनुयायी बने रहे हैं। इसके विपरीत जिन्होंने सन्मार्ग अपनाया है, उनका मार्गदर्शन (इस क़ुरआन से) परमेश्वर ने और बढ़ा दिया और उनके हिस्से की पुण्यशीलता उन्हें प्रदान कर दी है।
(इनकी समझ में तुम्हारी बात नहीं आ रही) तो अब यह इसी की प्रतीक्षा में हैं कि क़यामत इन पर अचानक आ जाए। अतः याद रखें कि उसके लक्षण प्रकट हो चुके हैं। फिर जब वह इनपर आ ही जाएगी तो इनके लिए इनके समझने का अवसर कहां होगा! तो, (हे पैग़ंबर), अपितु तुम जान रखो कि परमेश्वर को छोड़ कोई उपास्य नहीं है, और (निर्णय की घड़ी पास आ गई है तो) अपनी और (अपने साथी) मुसलमान पुरुषों और मुसलमान महिलाओं की ग़लतियों की क्षमा मांगते रहो। परमेश्वर तुम्हारे आने जाने के स्थानों और तुम्हारे ठिकानों को जानता है।
ये जो ऊपर-ऊपर से मान गए हैं, कहते थे कि युद्ध के बारे में कोई सूरह क्यों नहीं उतारी जाती? फिर जब एक स्पष्ट सूरह उतार दी गई और उसमें युद्ध का वर्णन भी हुआ तो जिनके दिलों में रोग है, तुम उनको देखते हो कि वे तुम्हारी ओर इस प्रकार देख रहे हैं, जिस प्रकार कोई ऐसा व्यक्ति देखता है जिस पर मृत्यु की बेहोशी छाई हो। तो इनकी दशा पर अफसोस! इनके लिए उचित आचरण था कि आदेश मानना है और भली बात कहनी है। फिर जब मामले का निर्णायक निपटारा हो जाए तो उस समय यदि ये परमेश्वर से सच्चे साबित होते तो इनके लिए बहुत अच्छा होता। तो, (मानने का दावा करने वालो), यदि तुम उल्टे मुँह फिर गए तो तुमसे इसके अतिरिक्त क्या आशा है कि तुम धरती में बिगाड़ पैदा करो और कोख के संबंधों को तोड़ो! यही लोग हैं जिन पर परमेश्वर ने अभिशाप किया, फिर इनके कानों को बहरा और इनकी आंखों को अंधा कर दिया। तो क्या ये क़ुरआन पर चिंतन नहीं करते या दिलों पर उनके ताले चढ़े हुए हैं? सत्य यह है कि जो लोग अपने उल्टे पाँव फिर गए, इसके बाद कि सन्मार्ग उनके लिए स्पष्ट हो गया था, उन्हें शैतान ने धोखा दिया और उनको परमेश्वर ने भी ढील दे दी। यह इस कारण से हुआ कि इन्होंने उन लोगों से कहा जिन्होंने परमेश्वर की उतारी हुई चीज़ को बुरा जाना कि कुछ मामलों में हम तुम्हारी ही मानेंगे। परमेश्वर इनकी गोपनीयता को भलीभांति जानता है। (इनका यही आचरण है) तो उस समय क्या होगा, जब फ़रिश्ते इनके चेहरों और इनकी पीठों पर मारते हुए इनके प्राण ग्रहण करेंगे? यह इस कारण से कि उन्होंने उस चीज़ का अनुसरण किया जो परमेश्वर को क्रोधित करने वाली थी और उसकी प्रसन्नता की कामना नहीं की तो परमेश्वर ने इनके (देखने में) अच्छे कर्म भी निष्फल कर दिए।
क्या ये लोग, जिनके दिलों में रोग है, इस विचार में हैं कि इनके द्वेष को परमेश्वर कभी सामने नहीं लाएगा? यदि हम चाहते तो, (हे पैग़ंबर), इनको इस प्रकार तुम्हें दिखा देते कि तुम इनके लक्षणों से इन्हें पहचान लेते और इनके बोलचाल की दुविधा से तो इन्हें तुम (इस समय भी) अवश्य पहचान लोगे। (मानने का दावा करने वालो, तुम किस को धोखा दे रहे हो)? परमेश्वर तुम्हारे कर्मों को जानता है।
हम अवश्य तुम्हारी परीक्षा करेंगे, यहाँ तक कि तुम में जो योद्धा और कृतसंकल्प हैं, उनको हम अलग जान लेंगे और तुम्हारी परिस्थितियों को जांच लें। (तुम किन के पीछे लग कर अपने आप को बर्बाद कर रहे हो? याद रखो), जिन लोगों ने नकार दिया है और परमेश्वर के मार्ग से (लोगों को) रोका है और उचित मार्ग के उनपर स्पष्ट हो जाने के बाद रसूल का विरोध किया है, वे परमेश्वर को कदापि कोई क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे, अपितु वह उन्हीं के कर्म निष्फल कर देगा।
हे मानने वालो, (हर चीज़ से बेपरवाह होकर) परमेश्वर के आदेश पर चलो और रसूल के आदेश पर चलो और (परमेश्वर और रसूल से विश्वासघात करके) अपने कर्मों को बर्बाद न करो। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन लोगों ने नकार दिया और परमेश्वर के मार्ग से रोका, फिर इसी नकारने की हालत में मर गए, परमेश्वर उनको कदापि क्षमा नहीं करेगा। तो तुम दुर्बल न पड़ो और (यह जो दण्ड की लपेट में है, इनको अब) समझौते का निमंत्रण न दो और (जान लो कि) तुम ही विजयी रहोगे। परमेश्वर तुम्हारे साथ है और तुम्हारे कर्मों के विषय में वह कदापि तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं करेगा।
यह दुनिया का जीवन तो एक खेल तमाशा है। यदि तुम ईमान रखोगे और संयम अपनाओगे तो परमेश्वर तुम्हारा अच्छा फल तुम्हें देगा और तुमसे तुम्हारी संपत्ति समेट कर नहीं मांगेगा, और यदि वह इसको तुमसे मांग ले और सब कुछ समेटकर मांग ले तो (स्पष्ट है कि) तुम कंजूसी करोगे (और स्पष्ट नकार दोगे) और इससे वह तुम्हारे (दिलों में छिपे हुए) विद्वेष को प्रकट कर देगा। सुनो, तुम वह लोग हो कि तुमको (तुम्हारे धन का कुछ भाग) परमेश्वर के मार्ग में दान करने का निमंत्रण दिया जाता है तो तुम में से ऐसे भी हैं जो (उसमें भी) कंजूसी करते हैं। (याद रखो), जो कंजूसी करता है तो वास्तव में अपने ही साथ कंजूसी करता है। परमेश्वर (हर चीज़ से) निस्पृह है और तुम उस पर निर्भर हो। (तुम परमेश्वर की अवज्ञा करना चाहते हो तो जाओ, करो)। यदि तुम अवज्ञा करोगे तो परमेश्वर तुम्हारे स्थान पर दूसरे लोगों को ले आएगा, फिर वे तुम्हारे जैसे नहीं होंगे।