सूरह 46

अल्-अह्क़ाफ़्

मक्की · 35 आयतें · 19 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

حمٓ ﴿1﴾ تَنزِيلُ ٱلْكِتَـٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَكِيمِ ﴿2﴾

यह सूरह 'हा-मीम' है। इस ग्रंथ का उतरना परमेश्वर की ओर से है जो प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।

مَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَأَجَلٍ مُّسَمًّى ۚ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَمَّآ أُنذِرُوا۟ مُعْرِضُونَ ﴿3﴾

धरती और समस्त आकाशों को और जो उनके बीच हैं, हमने सोद्देश्य और एक निर्धारित अवधि ही के लिए पैदा किया है और ये नकारने वाले उस वास्तविकता को अनदेखा किए हुए हैं, जिससे इन्हें सचेत किया गया है।

قُلْ أَرَءَيْتُم مَّا تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَرُونِى مَاذَا خَلَقُوا۟ مِنَ ٱلْأَرْضِ أَمْ لَهُمْ شِرْكٌ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ ۖ ٱئْتُونِى بِكِتَـٰبٍ مِّن قَبْلِ هَـٰذَآ أَوْ أَثَـٰرَةٍ مِّنْ عِلْمٍ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿4﴾ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّن يَدْعُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَن لَّا يَسْتَجِيبُ لَهُۥٓ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَهُمْ عَن دُعَآئِهِمْ غَـٰفِلُونَ ﴿5﴾ وَإِذَا حُشِرَ ٱلنَّاسُ كَانُوا۟ لَهُمْ أَعْدَآءً وَكَانُوا۟ بِعِبَادَتِهِمْ كَـٰفِرِينَ ﴿6﴾

(ये किस भरोसे पर अनदेखा कर रहे हैं)? इनसे कहो, कभी तुमने विचार भी किया है कि परमेश्वर को छोड़ जिनको तुम पुकारते हो, ज़रा मुझे दिखाओ तो सही कि उन्होंने धरती में क्या बनाया है या उनका समस्त आकाशों में कुछ हिस्सा है (कि उन्हें उपास्य बना लिया जाए)? इससे पूर्व का कोई धर्मग्रंथ मेरे सामने प्रस्तुत करो या कोई परंपरा जिसका आधार ज्ञान पर हो, यदि तुम सच्चे हो। उनसे बढ़कर कौन भटका हुआ हो सकता है जो परमेश्वर को छोड़ उनको पुकारते हैं जो उन्हें क़यामत के दिन तक उत्तर देने वाले नहीं हैं? उनको तो इन लोगों की प्रार्थनाओं की सूचना भी नहीं है और उस दिन जब लोग इकट्ठे किए जाएँगे तो वे अपने पुकारने वालों के शत्रु होंगे और उनकी पूजा को नकारने वाले हो जाएँगे।

وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُنَا بَيِّنَـٰتٍ قَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُمْ هَـٰذَا سِحْرٌ مُّبِينٌ ﴿7﴾ أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ إِنِ ٱفْتَرَيْتُهُۥ فَلَا تَمْلِكُونَ لِى مِنَ ٱللَّهِ شَيْـًٔا ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَا تُفِيضُونَ فِيهِ ۖ كَفَىٰ بِهِۦ شَهِيدًۢا بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۖ وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ﴿8﴾

इन्हें जब हमारी स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं तो ये नकारने वाले सत्य के बारे में, जबकि वह इनके पास आ गया है, कहते हैं कि यह तो स्पष्ट जादू है। क्या ये कहते हैं कि इस व्यक्ति ने इसे स्वयं गढ़ लिया है? इनसे कहो कि यदि मैंने इसको स्वयं गढ़ा है तो तुम परमेश्वर की पकड़ से मेरी कुछ भी रक्षा न कर सकोगे। तुम जिन बातों में लगे हो, वह उन से भलीभांति परिचित है। वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाही के लिए पर्याप्त है और (यह ढील जो तुमको मिली हुई है तो केवल इसलिए कि) वह अत्यंत क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

قُلْ مَا كُنتُ بِدْعًا مِّنَ ٱلرُّسُلِ وَمَآ أَدْرِى مَا يُفْعَلُ بِى وَلَا بِكُمْ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ وَمَآ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴿9﴾

इनसे कहो, मैं कोई नया रसूल तो नहीं हूं, (इससे पहले भी मनुष्य ही रसूल बनाकर भेजे गए हैं)। और मैं नहीं जानता कि मेरे साथ क्या होना है और तुम्हारे साथ क्या, मैं तो केवल उस बात का पालन करता हूं जो मेरी ओर वह्य की जाती है और मैं तो केवल एक स्पष्ट सचेत करने वाला हूं।

قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ وَكَفَرْتُم بِهِۦ وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِّنۢ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ عَلَىٰ مِثْلِهِۦ فَـَٔامَنَ وَٱسْتَكْبَرْتُمْ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿10﴾

इनसे पूछो, कभी सोचा भी है कि उस समय क्या होगा, यदि यह क़ुरआन परमेश्वर की ओर से हुआ और तुम इसको नकार बैठे और इस्राईलियों में से एक साक्षी इसी प्रकार के एक ग्रंथ के उतरने की गवाही भी दे चुका है? तो उसने तो मान लिया और तुम अपने घमंड में पड़े रहे। निस्संदेह परमेश्वर ऐसे दुष्ट लोगों का मार्गदर्शन नहीं करता।1

टिप्पणियाँ 1
  1. पैग़ंबर ईसा मसीह (अ.स.) की ओर संकेत है जिनको चुनने और यहूदियों की ओर भेजना का उद्देश्य ही यह था कि यहूदियों तक सत्य को निर्णायक और स्पष्ट रूप से पहुंचा दें और आने वाले पैग़ंबर की शुभ सूचना दें। ↩
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَوْ كَانَ خَيْرًا مَّا سَبَقُونَآ إِلَيْهِ ۚ وَإِذْ لَمْ يَهْتَدُوا۟ بِهِۦ فَسَيَقُولُونَ هَـٰذَآ إِفْكٌ قَدِيمٌ ﴿11﴾

ये नकारने वाले मानने वालों के बारे में कहते हैं कि यदि यह क़ुरआन कोई अच्छी चीज़ होता तो (निचले वर्ग के) ये लोग हम से पहले इसकी ओर नहीं दौड़ते। और यह भी कि जब इस क़ुरआन से इन्होंने मार्गदर्शन नहीं पाया तो अब कहेंगे कि यह तो पुराना झूठ है।

وَمِن قَبْلِهِۦ كِتَـٰبُ مُوسَىٰٓ إِمَامًا وَرَحْمَةً ۚ وَهَـٰذَا كِتَـٰبٌ مُّصَدِّقٌ لِّسَانًا عَرَبِيًّا لِّيُنذِرَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ وَبُشْرَىٰ لِلْمُحْسِنِينَ ﴿12﴾

इससे पहले मूसा का धर्मग्रंथ उपलब्ध है, मार्गदर्शक और साक्षात कृपा। और यह ग्रंथ उसकी भविष्यवाणियों को पूरा करने वाला है, अरबी भाषा में, इसलिए कि जिन्होंने अपने प्राणों पर अत्याचार किया है, उन्हें सचेत करे और उनके लिए शुभ समाचार हो जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं।

إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسْتَقَـٰمُوا۟ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿13﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ خَـٰلِدِينَ فِيهَا جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿14﴾

निस्संदेह जिन लोगों ने कह दिया कि हमारा प्रभु परमेश्वर है, फिर (सारे विरोधों के होते हुए) उस पर जमे रहे तो उनके लिए न कोई भय होगा और न वे कभी दुखी होंगे। यही स्वर्ग के लोग हैं, उसमें सदा रहेंगे, अपने कर्मों के फलस्वरूप जो वे करते रहे।

وَوَصَّيْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ بِوَٰلِدَيْهِ إِحْسَـٰنًا ۖ حَمَلَتْهُ أُمُّهُۥ كُرْهًا وَوَضَعَتْهُ كُرْهًا ۖ وَحَمْلُهُۥ وَفِصَـٰلُهُۥ ثَلَـٰثُونَ شَهْرًا ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغَ أَشُدَّهُۥ وَبَلَغَ أَرْبَعِينَ سَنَةً قَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِىٓ أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ وَعَلَىٰ وَٰلِدَىَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَـٰلِحًا تَرْضَىٰهُ وَأَصْلِحْ لِى فِى ذُرِّيَّتِىٓ ۖ إِنِّى تُبْتُ إِلَيْكَ وَإِنِّى مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ ﴿15﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ نَتَقَبَّلُ عَنْهُمْ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا۟ وَنَتَجَاوَزُ عَن سَيِّـَٔاتِهِمْ فِىٓ أَصْحَـٰبِ ٱلْجَنَّةِ ۖ وَعْدَ ٱلصِّدْقِ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يُوعَدُونَ ﴿16﴾

(तुम समझना चाहते हो कि लोग किस प्रकार अच्छे ढंग से कर्म करने वाले और किस प्रकार अपने प्राण पर अत्याचार करने वाले बनते हैं तो सुनो)। हमने मनुष्य को अपने माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का निर्देश दे रखा है। उसकी मां ने बड़ी कठिनाई से उसको अपने पेट में रखा और बड़ी कठिनाई से उस को जन्म दिया और उसका पेट में रखना और उसका दूध छुड़ाना (लगभग) तीस महीनों में हुआ। यहाँ तक कि (इन सब चरणों से होकर) जब मनुष्य अपने प्रौढ़त्व को पहुंचता है और चालीस बरस का हो जाता है तो प्रार्थना करता है कि मेरे प्रभु, मुझे सौभाग्य दे कि मैं तेरे उपकार का आभार व्यक्त करूं जो तूने मुझपर और मेरे माता-पिता पर किया और भले कर्म करूं जो तुझे प्रिय हैं। और तू मेरी संतान में भी मेरे लिए शालीनता पैदा कर दे। मैं तेरी ओर पलट आया और निस्संदेह, मैं आज्ञाकारियों में से हूं। यही लोग हैं कि जिनके अच्छे कर्म हम उनसे स्वीकार करेंगे और जिन के पापकर्मों को क्षमा करेंगे कि स्वर्ग वालों में होंगे। यह सच्चा वचन है जो इनसे किया जाता रहा है।

وَٱلَّذِى قَالَ لِوَٰلِدَيْهِ أُفٍّ لَّكُمَآ أَتَعِدَانِنِىٓ أَنْ أُخْرَجَ وَقَدْ خَلَتِ ٱلْقُرُونُ مِن قَبْلِى وَهُمَا يَسْتَغِيثَانِ ٱللَّهَ وَيْلَكَ ءَامِنْ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّ فَيَقُولُ مَا هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿17﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلْقَوْلُ فِىٓ أُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِم مِّنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ خَـٰسِرِينَ ﴿18﴾

इसके विपरीत जिसने अपने माता-पिता से कहा कि तुम पर धिक्कार है, क्या तुम मुझे इससे डराते हो कि मैं (पुनः जीवित करके) क़ब्र से निकाला जाऊंगा, जबकि मुझसे पहले कितनी ही क़ौमें बीत चुकी हैं और उनमें से कोई भी निकल कर नहीं आया? माता पिता परमेश्वर की दुहाई देते हैं कि तेरा नाश हो, मान जा, निस्संदेह परमेश्वर का वचन सत्य है। परंतु वह कहता है कि कुछ नहीं, ये तो पहले के लोगों की कहानियाँ हैं। यही लोग हैं जिन पर परमेश्वर की बात पूरी हो गई कि उन्हीं समूहों में मिले हैं जो इनसे पहले जिन्नों और मनुष्यों में से हो चुके हैं। निस्संदेह, ये असफल होने वाले ही थे।

وَلِكُلٍّ دَرَجَـٰتٌ مِّمَّا عَمِلُوا۟ ۖ وَلِيُوَفِّيَهُمْ أَعْمَـٰلَهُمْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿19﴾ وَيَوْمَ يُعْرَضُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ أَذْهَبْتُمْ طَيِّبَـٰتِكُمْ فِى حَيَاتِكُمُ ٱلدُّنْيَا وَٱسْتَمْتَعْتُم بِهَا فَٱلْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ ٱلْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَبِمَا كُنتُمْ تَفْسُقُونَ ﴿20﴾

इन दोनों समूहों में से हर एक के लिए (क़यामत में) उनके कर्मों के अनुसार (अच्छे या बुरे) स्थान होंगे, ताकि परमेश्वर का वचन पूरा हो और ताकि इनके कर्म वह इनको पूरे कर दे। (वह यही करेगा) और इन पर कोई अत्याचार नहीं होगा। (लोगो), उस दिन को याद रखो, जब ये नकारने वाले अग्नि के सामने ला खड़े किए जाएँगे और इनसे कहा जाएगा कि तुम अपने हिस्से की उत्तम चीज़ें अपने दुनिया के जीवन में ले चुके और तुमने वहां उनसे लाभ उठा लिया तो आज तुम अपमान का दण्ड बदले में पाओगे, इस कारण कि बिना किसी अधिकार के तुम धरती में घमंड करते रहे और इस कारण कि तुम (परमेश्वर की) अवज्ञा करते रहे।

وَٱذْكُرْ أَخَا عَادٍ إِذْ أَنذَرَ قَوْمَهُۥ بِٱلْأَحْقَافِ وَقَدْ خَلَتِ ٱلنُّذُرُ مِنۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِۦٓ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴿21﴾ قَالُوٓا۟ أَجِئْتَنَا لِتَأْفِكَنَا عَنْ ءَالِهَتِنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿22﴾ قَالَ إِنَّمَا ٱلْعِلْمُ عِندَ ٱللَّهِ وَأُبَلِّغُكُم مَّآ أُرْسِلْتُ بِهِۦ وَلَـٰكِنِّىٓ أَرَىٰكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ ﴿23﴾

इन्हें आद का भाई (हूद) याद दिलाओ, (हे पैग़ंबर) जब उसने अह्क़ाफ़ में अपनी क़ौम को सचेत किया और उसके आगे और पीछे (के क्षेत्रों में) सचेत करने वाले बीत चुके थे। उसने सचेत किया कि परमेश्वर के अतिरिक्त किसी की भक्ति न करो, मैं तुम्हारे लिए एक भयंकर दिन के दण्ड से डरता हूं। उन्होंने उत्तर दिया: क्या हमारे पास इसलिए आए हो कि झूठ बोलकर हमारे पूज्य-देवताओं से हमें विमुख कर दो? तो यदि तुम सच्चे हो तो हम पर ले आओ वह दण्ड जिसकी तुम हमें धमकी सुना रहे हो। उसने कहा: (वह कब आएगा)? इसका ज्ञान तो परमेश्वर ही के पास है। मुझे तो जो संदेश देकर भेजा गया है, मैं वही तुम्हें पहुंचा रहा हूं। परंतु मैं देख रहा हूं कि तुम लोग पूर्णतः अज्ञानता में पड़े हो।

فَلَمَّا رَأَوْهُ عَارِضًا مُّسْتَقْبِلَ أَوْدِيَتِهِمْ قَالُوا۟ هَـٰذَا عَارِضٌ مُّمْطِرُنَا ۚ بَلْ هُوَ مَا ٱسْتَعْجَلْتُم بِهِۦ ۖ رِيحٌ فِيهَا عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿24﴾ تُدَمِّرُ كُلَّ شَىْءٍۭ بِأَمْرِ رَبِّهَا فَأَصْبَحُوا۟ لَا يُرَىٰٓ إِلَّا مَسَـٰكِنُهُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْقَوْمَ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿25﴾

फिर जब उन्होंने उस दण्ड को, (जिस की धमकी उन्हें दी गई थी), देखा कि एक बादल है जो उनकी घाटियों की ओर उमड़ा चला आ रहा है तो कहने लगे कि यह तो बादल है जो हमारी सिंचाई करने वाला है। नहीं, अपितु यह वही चीज़ है जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे। तीव्र वायु जिसमें कष्टदायक दण्ड है। यह अपने प्रभु के आदेश से हर चीज़ को विध्वस्त कर देगी। फिर वे ऐसे हो गए कि उनके घरों के अतिरिक्त वहां कोई चीज़ नज़र नहीं आती थी। हम अपराधी लोगों को इसी प्रकार दण्ड देते हैं।

وَلَقَدْ مَكَّنَّـٰهُمْ فِيمَآ إِن مَّكَّنَّـٰكُمْ فِيهِ وَجَعَلْنَا لَهُمْ سَمْعًا وَأَبْصَـٰرًا وَأَفْـِٔدَةً فَمَآ أَغْنَىٰ عَنْهُمْ سَمْعُهُمْ وَلَآ أَبْصَـٰرُهُمْ وَلَآ أَفْـِٔدَتُهُم مِّن شَىْءٍ إِذْ كَانُوا۟ يَجْحَدُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿26﴾ وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا مَا حَوْلَكُم مِّنَ ٱلْقُرَىٰ وَصَرَّفْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ﴿27﴾ فَلَوْلَا نَصَرَهُمُ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ قُرْبَانًا ءَالِهَةًۢ ۖ بَلْ ضَلُّوا۟ عَنْهُمْ ۚ وَذَٰلِكَ إِفْكُهُمْ وَمَا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ ﴿28﴾

हमने उन्हें उन चीज़ों में सामर्थ्य दिया था, जिनमें, (हे मक्का के क़ुरैश), तुम्हें सामर्थ्य नहीं दिया है और हमने उनको कान और आँखें और दिल प्रदान किए, परंतु क्योंकि वे परमेश्वर की आयतों को नकारते थे, न उनके ये कान उनके कुछ काम आए, न उनकी आँखें और न उनके दिल और उनको उसी चीज़ ने घेर लिया जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे थे। (फिर यही नहीं), तुम्हारे आस पास की बस्तियों को भी हमने इसी प्रकार नष्ट कर दिया था और (इससे पहले) अपनी आयतें उनके लिए अनेक प्रकार से प्रस्तुत की थीं, (जिस प्रकार तुम्हारे लिए प्रस्तुत कर रहे हैं) ताकि वे पलट जाएँ। फिर (सोचो कि) उन हस्तियों ने क्यों न उनकी सहायता की जिनको उन्होंने परमेश्वर को छोड़ उसके समीप होने के लिए उपास्य बना रखा था? अपितु वे तो उनसे खोए गए। यह सब उनका झूठ और उनकी मनगढ़ंत बात थी जो वे करते रहे।

وَإِذْ صَرَفْنَآ إِلَيْكَ نَفَرًا مِّنَ ٱلْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ ٱلْقُرْءَانَ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُوٓا۟ أَنصِتُوا۟ ۖ فَلَمَّا قُضِىَ وَلَّوْا۟ إِلَىٰ قَوْمِهِم مُّنذِرِينَ ﴿29﴾ قَالُوا۟ يَـٰقَوْمَنَآ إِنَّا سَمِعْنَا كِتَـٰبًا أُنزِلَ مِنۢ بَعْدِ مُوسَىٰ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ يَهْدِىٓ إِلَى ٱلْحَقِّ وَإِلَىٰ طَرِيقٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿30﴾ يَـٰقَوْمَنَآ أَجِيبُوا۟ دَاعِىَ ٱللَّهِ وَءَامِنُوا۟ بِهِۦ يَغْفِرْ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُجِرْكُم مِّنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ ﴿31﴾

और इन्हें वह घटना भी सुनाओ, जब हमने जिन्नों के एक समूह का ध्यान तुम्हारी ओर कर दिया कि वे क़ुरआन सुनें। तो जब वे उस स्थान पर पहुंच गए, (जहां तुम क़ुरआन पढ़ रहे थे) तो उन्होंने आपस में कहा: चुप रहो (और सुनो)। फिर जब उसका पढ़ना पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर लौटे कि उनको सचेत करें। उन्होंने कहा: हमारी क़ौम के लोगो, हमने एक ग्रंथ सुना है जो मूसा के बाद उतरा है, उन भविष्यवाणियों की पुष्टि में जो (उसके बारे में) उससे पहले रही हैं। यह सत्य की शिक्षा देता और एक सीधे मार्ग की ओर अगुवाई करता है। हमारी क़ौम के लोगो, परमेश्वर की ओर बुलाने वाले का निमंत्रण स्वीकार करो और उसे मान जाओ, वह तुम्हारे पापकर्मों में से क्षमा करेगा (जो उसके नियम अनुसार क्षमा किए जा सकते हैं) और तुमको कष्टदायक दण्ड से शरण देगा।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहाँ से आगे परमेश्वर की ओर से परिशिष्ट है, जिन्नों की बात, हमारे विचार में इस वाक्य पर समाप्त हो गई है। ↩
وَمَن لَّا يُجِبْ دَاعِىَ ٱللَّهِ فَلَيْسَ بِمُعْجِزٍ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَيْسَ لَهُۥ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءُ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿32﴾ أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَلَمْ يَعْىَ بِخَلْقِهِنَّ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يُحْـِۧىَ ٱلْمَوْتَىٰ ۚ بَلَىٰٓ إِنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿33﴾

और जो परमेश्वर की ओर बुलाने वाले का निमंत्रण स्वीकार नहीं करेगा, उसे याद रखना चाहिए कि वह धरती में (कहीं भाग कर) परमेश्वर के नियंत्रण से बाहर नहीं निकल सकता और न (क़यामत के दिन) परमेश्वर को छोड़ उसके कोई समर्थक हो सकते हैं। इसी प्रकार के लोग हैं जो स्पष्ट पथभ्रष्टता में हैं। क्या इन्होंने विचार नहीं किया कि परमेश्वर, जिसने धरती और समस्त आकाशों की रचना की और उनकी रचना करने में उसको कुछ भी थकान नहीं हुई, वह इसका सामर्थ्य भी रखता है कि मृतकों को जी उठाए? क्यों नहीं, निस्संदेह वह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।

وَيَوْمَ يُعْرَضُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ أَلَيْسَ هَـٰذَا بِٱلْحَقِّ ۖ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَرَبِّنَا ۚ قَالَ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ ﴿34﴾

(लोगो), उस दिन को याद रखो, जब ये नकारने वाले नरक के सामने लाए जाएँगे। इनसे पूछा जाएगा: क्या यह सत्य नहीं है? ये कहेंगे: हाँ क्यों नहीं, हमारे प्रभु की सौगंध, (अवश्य सत्य है)। कहा जाएगा: तो चखो अपने नकारने के परिणामस्वरुप दण्ड का स्वाद जो तुम करते रहे थे।

فَٱصْبِرْ كَمَا صَبَرَ أُو۟لُوا۟ ٱلْعَزْمِ مِنَ ٱلرُّسُلِ وَلَا تَسْتَعْجِل لَّهُمْ ۚ كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَ مَا يُوعَدُونَ لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا سَاعَةً مِّن نَّهَارٍۭ ۚ بَلَـٰغٌ ۚ فَهَلْ يُهْلَكُ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ ﴿35﴾

अतः, (हे पैग़ंबर), कृतसंकल्प रहो, जिस प्रकार साहसी पैग़ंबर कृतसंकल्प रहे और इनके लिए (दंड की) जल्दी न करो। जिस दिन ये लोग उस चीज़ को देखेंगे जिसकी चेतावनी इन्हें सुनाई जा रही है तो इन्हें ऐसा लगेगा कि जैसे दिन की एक घड़ी से अधिक (दुनिया में) नहीं रहे। तुम्हारा कार्य पहुंचा देना है। अब बर्बाद तो वही लोग होंगे जो अवज्ञाकारी हैं।