सूरह 37

अस्-साफ़्फ़ात्

मक्की · 182 आयतें · 24 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय परमेश्वर के एक, अद्वितीय और साझेदार रहित होने (तौहीद) को नकारने वालों को डराना और दंड की चेतावनी देना है। अपितु, पहली सूरह में इनकार और दूसरी में अहंकार पर सचेत किया गया है, जो उन लोगों के नकारने का मूल कारण है जिन्हें संबोधित किया गया है। इसके साथ, नबी (स.) और उनके साथियों को इन अहंकारी लोगों के विरुद्ध धैर्य और स्थिरता के उपदेश का विषय भी दूसरी सूरह में स्पष्ट है। इसलिए, परमेश्वर के पैग़ंबरों की जो कथाएँ इस सूरह में सुनाई गई हैं, उनमें ये दोनों बातें ध्यान में रखी गई हैं। इन सूरतों में संबोधन मूलतः क़ुरैश क़बीले से है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट है कि मक्का में ये नबी (स.) के धर्मप्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में अवतरित हुई हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلصَّـٰٓفَّـٰتِ صَفًّا ﴿1﴾ فَٱلزَّٰجِرَٰتِ زَجْرًا ﴿2﴾ فَٱلتَّـٰلِيَـٰتِ ذِكْرًا ﴿3﴾ إِنَّ إِلَـٰهَكُمْ لَوَٰحِدٌ ﴿4﴾ رَّبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَرَبُّ ٱلْمَشَـٰرِقِ ﴿5﴾

कतार बांधे उपस्थित रहने वाले फ़रिश्ते गवाही देते हैं, फिर शैतानों को झिड़क कर डांटने वाले, फिर परमेश्वर को याद करने वाले कि तुम्हारा उपास्य एक ही है। वही जो धरती और समस्त आकाशों और उनके बीच की सब चीज़ों का प्रभु है और पूरब और पश्चिम की सभी दिशाओं का प्रभु।

إِنَّا زَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنْيَا بِزِينَةٍ ٱلْكَوَاكِبِ ﴿6﴾ وَحِفْظًا مِّن كُلِّ شَيْطَـٰنٍ مَّارِدٍ ﴿7﴾ لَّا يَسَّمَّعُونَ إِلَى ٱلْمَلَإِ ٱلْأَعْلَىٰ وَيُقْذَفُونَ مِن كُلِّ جَانِبٍ ﴿8﴾ دُحُورًا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ وَاصِبٌ ﴿9﴾ إِلَّا مَنْ خَطِفَ ٱلْخَطْفَةَ فَأَتْبَعَهُۥ شِهَابٌ ثَاقِبٌ ﴿10﴾

इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे निकटतम आकाश को हमने तारों की शोभा से सजाया है और प्रत्येक विद्रोही शैतान की घुसपैठ से उसे पूरी तरह सुरक्षित कर दिया है। वे ऊपर के लोक की ओर कान नहीं लगा सकते और लगाएं तो भगाने के लिए सब ओर से दुतकारे जाते हैं और यह उनके लिए निरंतर दण्ड है। फिर भी कोई शैतान यदि कुछ ले उड़े तो आग की एक दहकती लपट उसका पीछा करती है।

فَٱسْتَفْتِهِمْ أَهُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَم مَّنْ خَلَقْنَآ ۚ إِنَّا خَلَقْنَـٰهُم مِّن طِينٍ لَّازِبٍۭ ﴿11﴾ بَلْ عَجِبْتَ وَيَسْخَرُونَ ﴿12﴾ وَإِذَا ذُكِّرُوا۟ لَا يَذْكُرُونَ ﴿13﴾ وَإِذَا رَأَوْا۟ ءَايَةً يَسْتَسْخِرُونَ ﴿14﴾ وَقَالُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ ﴿15﴾ أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ ﴿16﴾ أَوَءَابَآؤُنَا ٱلْأَوَّلُونَ ﴿17﴾

अब इनसे पूछो कि इन्हें बनाना अधिक कठिन है या उनको जिन्हें हम (इनसे पहले) बना चुके हैं? सत्य यह है कि इन्हें तो हमने चिपकती मिट्टी से पैदा कर दिया था। नहीं, यह कुछ भी कठिन नहीं है, अपितु तुम्हें आश्चर्य है (कि ऐसे स्पष्ट तथ्य को ये मानते क्यों नहीं) और ये मज़ाक़ उड़ा रहे हैं (कि तुम यह कैसी बातें मानते हो)? और जब इन्हें स्मरण कराया जाता है तो स्मरण प्राप्त नहीं करते और जब कोई निशानी देखते हैं तो उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं और कहते हैं कि कुछ नहीं, यह तो खुला हुआ जादू है। क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियां बन जाएँगे तो क्या पुनः उठाए जाएँगे? और क्या हमारे पिछले पूर्वज भी?

قُلْ نَعَمْ وَأَنتُمْ دَٰخِرُونَ ﴿18﴾ فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌ وَٰحِدَةٌ فَإِذَا هُمْ يَنظُرُونَ ﴿19﴾ وَقَالُوا۟ يَـٰوَيْلَنَا هَـٰذَا يَوْمُ ٱلدِّينِ ﴿20﴾ هَـٰذَا يَوْمُ ٱلْفَصْلِ ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ ﴿21﴾

कहो कि हाँ और तुम अपमानित भी होगे। अतः वह एक डांट ही होगी, फिर उसी समय (उठ कर) देखने लगेंगे और कहेंगे कि हाय हमारा दुर्भाग्य, यह तो प्रतिफल का दिन है — जी हाँ, यह वही निर्णय का दिन है जिसको तुम लोग झूठा कहते रहे थे।

ٱحْشُرُوا۟ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ وَأَزْوَٰجَهُمْ وَمَا كَانُوا۟ يَعْبُدُونَ ﴿22﴾ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَٱهْدُوهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطِ ٱلْجَحِيمِ ﴿23﴾ وَقِفُوهُمْ ۖ إِنَّهُم مَّسْـُٔولُونَ ﴿24﴾ مَا لَكُمْ لَا تَنَاصَرُونَ ﴿25﴾ بَلْ هُمُ ٱلْيَوْمَ مُسْتَسْلِمُونَ ﴿26﴾

आदेश होगा: इन दुष्टों को इकट्ठा करो और इनके साथियों को और उनको भी जिन्हें ये परमेश्वर के अतिरिक्त पूजते रहे हैं, फिर इन सबको नरक का मार्ग दिखा दो। और हाँ, इन्हें ज़रा ठहराओ तो, इनसे कुछ पूछना भी है। क्या बात है, इस समय तुम एक दूसरे की सहायता नहीं कर रहे हो? कुछ नहीं बोलते, अपितु ये तो आज बड़े आज्ञाकारी बने हुए हैं!

وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَسَآءَلُونَ ﴿27﴾ قَالُوٓا۟ إِنَّكُمْ كُنتُمْ تَأْتُونَنَا عَنِ ٱلْيَمِينِ ﴿28﴾ قَالُوا۟ بَل لَّمْ تَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ ﴿29﴾ وَمَا كَانَ لَنَا عَلَيْكُم مِّن سُلْطَـٰنٍۭ ۖ بَلْ كُنتُمْ قَوْمًا طَـٰغِينَ ﴿30﴾ فَحَقَّ عَلَيْنَا قَوْلُ رَبِّنَآ ۖ إِنَّا لَذَآئِقُونَ ﴿31﴾ فَأَغْوَيْنَـٰكُمْ إِنَّا كُنَّا غَـٰوِينَ ﴿32﴾ فَإِنَّهُمْ يَوْمَئِذٍ فِى ٱلْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ ﴿33﴾

उस समय एक दूसरे की ओर ध्यान देने वाले होंगे कि आपस में प्रश्नोत्तर करें। (अतः अपने नेताओं से) कहेंगे: यह तुम ही हमारे पास आते थे दाएँ से ... वे (बात काट कर) उत्तर देंगे: नहीं, अपितु तुम स्वयं ही मानने वाले नहीं थे और तुम्हारे ऊपर हमारा कोई ज़ोर नहीं था, अपितु तुम स्वयं ही अवज्ञाकारी लोग थे। तो हमारे प्रभु की बात हम पर पूरी हो गई है। कोई संदेह नहीं कि उसका स्वाद अब हमको चखना ही है। सत्य यह है कि हम बहके हुए थे, अतः हमने तुम्हें भी बहका दिया। इस प्रकार ये सब उस दिन दण्ड में भागीदार होंगे।

إِنَّا كَذَٰلِكَ نَفْعَلُ بِٱلْمُجْرِمِينَ ﴿34﴾ إِنَّهُمْ كَانُوٓا۟ إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ ﴿35﴾ وَيَقُولُونَ أَئِنَّا لَتَارِكُوٓا۟ ءَالِهَتِنَا لِشَاعِرٍ مَّجْنُونٍۭ ﴿36﴾ بَلْ جَآءَ بِٱلْحَقِّ وَصَدَّقَ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿37﴾

हम अपराधियों के साथ यही करेंगे। उनकी स्थिति यह थी कि जब उनसे कहा जाता था कि परमेश्वर के सिवा कोई उपास्य नहीं है तो अकड़ बैठते और, (क़ुरैश के लोगो, तुम्हारे जैसे वे भी) कहते थे कि क्या हम एक सनकी कवि के कहने से अपने देवताओं को छोड़ देंगे? कदापि नहीं, अपितु वह सत्य लेकर आया है और वह रसूलों की भविष्यवाणियों को पूरा करने वाला है।

إِنَّكُمْ لَذَآئِقُوا۟ ٱلْعَذَابِ ٱلْأَلِيمِ ﴿38﴾ وَمَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿39﴾ إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ ﴿40﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ رِزْقٌ مَّعْلُومٌ ﴿41﴾ فَوَٰكِهُ ۖ وَهُم مُّكْرَمُونَ ﴿42﴾ فِى جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ ﴿43﴾ عَلَىٰ سُرُرٍ مُّتَقَـٰبِلِينَ ﴿44﴾ يُطَافُ عَلَيْهِم بِكَأْسٍ مِّن مَّعِينٍۭ ﴿45﴾ بَيْضَآءَ لَذَّةٍ لِّلشَّـٰرِبِينَ ﴿46﴾ لَا فِيهَا غَوْلٌ وَلَا هُمْ عَنْهَا يُنزَفُونَ ﴿47﴾ وَعِندَهُمْ قَـٰصِرَٰتُ ٱلطَّرْفِ عِينٌ ﴿48﴾ كَأَنَّهُنَّ بَيْضٌ مَّكْنُونٌ ﴿49﴾

(उसे नहीं मानोगे तो) तुमको अवश्य कष्टदायक दण्ड चखना होगा और (यह कोई अन्याय नहीं होगा), तुम उसी का बदला पाओगे जो करते रहे हो। परंतु, परमेश्वर के चुने हुए भक्त इससे सुरक्षित होंगे। ये लोग हैं कि जिनके लिए जानी हुई जीविका होगी, सब प्रकार के फल। और राहत के बाग़ों में वे बड़े सम्मान से होंगे, गद्दियों पर आमने सामने बैठे होंगे, उन के लिए विशुद्ध सुरा के जाम भ्रमण में होंगे, पूर्णतः निर्मल और स्वच्छ, पीने वालों के लिए आनंद ही आनंद! न उसमें नशा होगा और न उससे उनकी बुद्धि भ्रष्ट होगी। उनके पास झुकी हुई नज़रों वाली मृगनयनी स्त्रियाँ होंगी, मानो कि (शुतुरमुर्ग के) छिपे हुए अंडे हैं।

فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَسَآءَلُونَ ﴿50﴾ قَالَ قَآئِلٌ مِّنْهُمْ إِنِّى كَانَ لِى قَرِينٌ ﴿51﴾ يَقُولُ أَءِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُصَدِّقِينَ ﴿52﴾ أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَدِينُونَ ﴿53﴾ قَالَ هَلْ أَنتُم مُّطَّلِعُونَ ﴿54﴾ فَٱطَّلَعَ فَرَءَاهُ فِى سَوَآءِ ٱلْجَحِيمِ ﴿55﴾ قَالَ تَٱللَّهِ إِن كِدتَّ لَتُرْدِينِ ﴿56﴾ وَلَوْلَا نِعْمَةُ رَبِّى لَكُنتُ مِنَ ٱلْمُحْضَرِينَ ﴿57﴾ أَفَمَا نَحْنُ بِمَيِّتِينَ ﴿58﴾ إِلَّا مَوْتَتَنَا ٱلْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ ﴿59﴾ إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ ﴿60﴾ لِمِثْلِ هَـٰذَا فَلْيَعْمَلِ ٱلْعَـٰمِلُونَ ﴿61﴾

फिर वे एक दूसरे की ओर ध्यान देंगे कि आपस में बातचीत करें। उनमें से एक कहने वाला कहेगा कि मेरा एक साथी था जो (बड़े आश्चर्य के साथ) मुझसे पूछा करता था कि क्या तुम भी क़यामत की पुष्टि करने वालों में से हो? क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियां बन जाएँगे तो क्या हम बदला पाएंगे? वह कहेगा: थोड़ा झांक कर देखोगे (कि वह कहां और किस स्थिति में है)? यह कहकर वह झाँकेगा तो उसको नरक के बीच में देख लेगा। (फिर अनायास) बोल उठेगा: परमेश्वर की सौगंध, तुम तो मुझे बर्बाद कर देने वाले थे! यदि मेरे प्रभु की कृपा न होती तो मैं भी उन्हीं में होता जो पकड़े हुए आए हैं। फिर क्या वही नहीं हुआ कि पहली मृत्यु जो हमको आनी थी, आ चुकी, अब हमें मरना नहीं है और न हमें कोई दण्ड दिया जाएगा? निस्संदेह, यही बड़ी सफलता है। अतः कर्म करने वालों को ऐसी ही सफलता के लिए कर्म करना चाहिए।

أَذَٰلِكَ خَيْرٌ نُّزُلًا أَمْ شَجَرَةُ ٱلزَّقُّومِ ﴿62﴾ إِنَّا جَعَلْنَـٰهَا فِتْنَةً لِّلظَّـٰلِمِينَ ﴿63﴾ إِنَّهَا شَجَرَةٌ تَخْرُجُ فِىٓ أَصْلِ ٱلْجَحِيمِ ﴿64﴾ طَلْعُهَا كَأَنَّهُۥ رُءُوسُ ٱلشَّيَـٰطِينِ ﴿65﴾ فَإِنَّهُمْ لَـَٔاكِلُونَ مِنْهَا فَمَالِـُٔونَ مِنْهَا ٱلْبُطُونَ ﴿66﴾ ثُمَّ إِنَّ لَهُمْ عَلَيْهَا لَشَوْبًا مِّنْ حَمِيمٍ ﴿67﴾ ثُمَّ إِنَّ مَرْجِعَهُمْ لَإِلَى ٱلْجَحِيمِ ﴿68﴾ إِنَّهُمْ أَلْفَوْا۟ ءَابَآءَهُمْ ضَآلِّينَ ﴿69﴾ فَهُمْ عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِمْ يُهْرَعُونَ ﴿70﴾ وَلَقَدْ ضَلَّ قَبْلَهُمْ أَكْثَرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿71﴾ وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا فِيهِم مُّنذِرِينَ ﴿72﴾ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُنذَرِينَ ﴿73﴾ إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ ﴿74﴾

(इनसे पूछो), यह आतिथ्य अच्छा है या जक़्क़ूम का पेड़? हमने उसको इन अत्याचारियों के लिए परीक्षा बना दिया है। वह ऐसा पेड़ है जो नरक के निचले भाग में उगता है। उसकी कलियाँ मानो शैतानों के सर हैं। अतः ये दुष्ट उसी से खाएंगे और उसी से पेट भरेंगे। फिर उसके ऊपर उनको खौलता हुआ पानी मिला कर दिया जाएगा। फिर उनको जैसे-तैसे नरक ही की ओर लौटना होगा। (ये वे लोग हैं कि) इन्होंने अपने पुरखों को पथभ्रष्टता में पाया। फिर ये उन्हीं के पदचिन्हों पर दौड़ते रहे। इनसे पहले बीते हुए लोगों में भी अधिकांश इसी प्रकार भटक गए थे। हमने उन्हें भी सचेत करने वाले भेजे थे। फिर देख लो कि जिन्हें सचेत किया गया, उनका अंत कैसा हुआ! परमेश्वर के चुने हुए भक्त ही उससे सुरक्षित रहे।

وَلَقَدْ نَادَىٰنَا نُوحٌ فَلَنِعْمَ ٱلْمُجِيبُونَ ﴿75﴾ وَنَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥ مِنَ ٱلْكَرْبِ ٱلْعَظِيمِ ﴿76﴾ وَجَعَلْنَا ذُرِّيَّتَهُۥ هُمُ ٱلْبَاقِينَ ﴿77﴾ وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿78﴾ سَلَـٰمٌ عَلَىٰ نُوحٍ فِى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿79﴾ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿80﴾ إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿81﴾ ثُمَّ أَغْرَقْنَا ٱلْـَٔاخَرِينَ ﴿82﴾

(इसके लिए सबसे पहले) नूह ने हमसे प्रार्थना की थी। फिर देखो कि हम कितने अच्छे प्रार्थना सुनने वाले हैं! हमने उसको और उसके लोगों को बहुत बड़े संकट से बचा लिया। और (बाद के युगों में) उसी के वंश को बाक़ी रखा। और पिछले लोगों में एक समूह को हमने उसके मार्ग पर छोड़ा। नूह पर शांति है सभी दुनिया वालों में। हम अच्छे ढंग से कर्म करने वालों को ऐसा ही फल देते हैं। कोई संदेह नहीं कि वह हमारे मोमिन भक्तों में से था। फिर (उसको और उसके मानने वालों को अलग करके) हमने अन्य लोगों को डुबो दिया।

وَإِنَّ مِن شِيعَتِهِۦ لَإِبْرَٰهِيمَ ﴿83﴾ إِذْ جَآءَ رَبَّهُۥ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ ﴿84﴾ إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَاذَا تَعْبُدُونَ ﴿85﴾ أَئِفْكًا ءَالِهَةً دُونَ ٱللَّهِ تُرِيدُونَ ﴿86﴾ فَمَا ظَنُّكُم بِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿87﴾ فَنَظَرَ نَظْرَةً فِى ٱلنُّجُومِ ﴿88﴾ فَقَالَ إِنِّى سَقِيمٌ ﴿89﴾ فَتَوَلَّوْا۟ عَنْهُ مُدْبِرِينَ ﴿90﴾ فَرَاغَ إِلَىٰٓ ءَالِهَتِهِمْ فَقَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ ﴿91﴾ مَا لَكُمْ لَا تَنطِقُونَ ﴿92﴾ فَرَاغَ عَلَيْهِمْ ضَرْبًۢا بِٱلْيَمِينِ ﴿93﴾ فَأَقْبَلُوٓا۟ إِلَيْهِ يَزِفُّونَ ﴿94﴾ قَالَ أَتَعْبُدُونَ مَا تَنْحِتُونَ ﴿95﴾ وَٱللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُونَ ﴿96﴾ قَالُوا۟ ٱبْنُوا۟ لَهُۥ بُنْيَـٰنًا فَأَلْقُوهُ فِى ٱلْجَحِيمِ ﴿97﴾ فَأَرَادُوا۟ بِهِۦ كَيْدًا فَجَعَلْنَـٰهُمُ ٱلْأَسْفَلِينَ ﴿98﴾ وَقَالَ إِنِّى ذَاهِبٌ إِلَىٰ رَبِّى سَيَهْدِينِ ﴿99﴾ رَبِّ هَبْ لِى مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿100﴾ فَبَشَّرْنَـٰهُ بِغُلَـٰمٍ حَلِيمٍ ﴿101﴾

निस्संदेह उसी के समूह में से इब्राहीम भी था। याद करो, जब वह पूरे मन के साथ अपने प्रभु के समक्ष आया। जब उसने अपने पिता से और अपनी क़ौम के लोगों से कहा: यह तुम किस चीज़ की पूजा करते हो? क्या परमेश्वर के अतिरिक्त मिथ्या बनावटी देवताओं को चाहते हो? फिर संपूर्ण जगत के परमेश्वर के बारे में तुम्हारा क्या विचार है? (लोग जब पूजा स्थल से जाने लगे, जहाँ इब्राहीम ने यह बातें की थी) तो उसने (समय का अनुमान करने के लिए) एक दृष्टि तारों पर डाली, फिर कहा: मैं तो थका-मांदा हो रहा हूँ। इसलिए वे उसको छोड़कर पलटे और चले गए। तो इब्राहीम गुप्त रूप से उनके पूज्य-देवताओं की ओर गया और कहा: आप लोग खाते क्यों नहीं? क्या बात है, आप लोग बोलते भी नहीं। इसके बाद वह मौक़ा मिलते ही उनपर झपट पड़ा और भरपूर हाथ मारा। (लोगों को सूचना हुई) तो वे भागे हुए उसकी ओर आए। इब्राहीम ने कहा: क्या तुम लोग अपनी बनाई हुई चीज़ों को पूजते हो? सत्य यह है कि परमेश्वर ही ने तुम्हारी भी रचना की है और उन चीज़ों की भी जिन्हें तुम बनाते हो। उन्होंने कहा: (इसका यही आचरण है तो) इसके लिए एक ढांचा खड़ा करो, फिर इसको भड़कती आग में फेंक दो। तो उन्होंने उसके साथ चाल करनी चाही तो हमने उनको ही नीचा दिखा दिया। इब्राहीम ने कहा: (तुम लोगों को छोड़कर अब) मैं अपने प्रभु की ओर जाता हूं, वह अवश्य मेरा मार्गदर्शन करेगा। प्रभु, तू मुझे सदाचारी संतान प्रदान कर। (इब्राहीम ने यह प्रार्थना की) (तो इसके उत्तर में) हमने उसको एक सहनशील लड़के का शुभ समाचार दिया।

فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ ٱلسَّعْىَ قَالَ يَـٰبُنَىَّ إِنِّىٓ أَرَىٰ فِى ٱلْمَنَامِ أَنِّىٓ أَذْبَحُكَ فَٱنظُرْ مَاذَا تَرَىٰ ۚ قَالَ يَـٰٓأَبَتِ ٱفْعَلْ مَا تُؤْمَرُ ۖ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿102﴾ فَلَمَّآ أَسْلَمَا وَتَلَّهُۥ لِلْجَبِينِ ﴿103﴾ وَنَـٰدَيْنَـٰهُ أَن يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ ﴿104﴾ قَدْ صَدَّقْتَ ٱلرُّءْيَآ ۚ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿105﴾ إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْبَلَـٰٓؤُا۟ ٱلْمُبِينُ ﴿106﴾ وَفَدَيْنَـٰهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ ﴿107﴾ وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿108﴾ سَلَـٰمٌ عَلَىٰٓ إِبْرَٰهِيمَ ﴿109﴾ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿110﴾ إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿111﴾ وَبَشَّرْنَـٰهُ بِإِسْحَـٰقَ نَبِيًّا مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿112﴾ وَبَـٰرَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَىٰٓ إِسْحَـٰقَ ۚ وَمِن ذُرِّيَّتِهِمَا مُحْسِنٌ وَظَالِمٌ لِّنَفْسِهِۦ مُبِينٌ ﴿113﴾

(वह लड़का जवान हुआ), फिर जब वह उसके साथ दौड़-धूप करने की आयु को पहुंचा तो इब्राहीम ने (एक दिन) उससे कहा: मेरे बेटे, मैं (कुछ दिनों से) सपने में देखता हूं कि मैं तुमको ज़िबह कर रहा हूं। तो थोड़ा सोचो, तुम्हारा क्या विचार है? उसने कहा: पिता श्री, आपको जो आदेश दिया जा रहा है, उसका पालन कीजिए। परमेश्वर ने चाहा तो आप मुझे दृढ़ संकल्प वाले व्यक्तियों में पाएंगे। फिर जब दोनों ने आत्मसमर्पण कर दिया और पिता ने पुत्र को माथे के बल लिटा दिया और हमने उससे पुकार कर कहा कि इब्राहीम, तुमने सपने को सच्चा कर दिखाया तो थोड़ा सोचो कि दया का सागर कैसा उमड़ा होगा। सत्य यह है कि अच्छे ढंग से कर्म करने वालों को हम ऐसा ही फल देते हैं। निस्संदेह यह स्पष्ट परीक्षा थी। (इब्राहीम इस में सफल हो गया तो) हमने एक महान क़ुर्बानी के बदले इस्माईल को छुड़ा लिया और (इब्राहीम को ऐसी लोकप्रियता प्रदान की कि) पिछले लोगों में एक समूह को हमने उसके मार्ग पर छोड़ा। शांति हो इब्राहीम पर। हम अच्छे ढंग से कर्म करने वालों को इसी प्रकार फल देते हैं। कोई संदेह नहीं कि वह हमारे मोमिन भक्तों में से था। (यही अवसर था कि) हमने उसको इस्हाक़ का शुभ समाचार दिया, सदाचारियों की श्रेणी में से एक नबी। और हमने इस्माईल और इस्हाक़, दोनों पर अपने आशीष उतारे। अब दोनों की संतान में उत्तम रूप से कर्म करने वाले भी हैं और अपने प्राणों पर स्पष्ट अत्याचार करने वाले भी।

وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَىٰ مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ ﴿114﴾ وَنَجَّيْنَـٰهُمَا وَقَوْمَهُمَا مِنَ ٱلْكَرْبِ ٱلْعَظِيمِ ﴿115﴾ وَنَصَرْنَـٰهُمْ فَكَانُوا۟ هُمُ ٱلْغَـٰلِبِينَ ﴿116﴾ وَءَاتَيْنَـٰهُمَا ٱلْكِتَـٰبَ ٱلْمُسْتَبِينَ ﴿117﴾ وَهَدَيْنَـٰهُمَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ ﴿118﴾ وَتَرَكْنَا عَلَيْهِمَا فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿119﴾ سَلَـٰمٌ عَلَىٰ مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ ﴿120﴾ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿121﴾ إِنَّهُمَا مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿122﴾

हमने मूसा और हारून पर भी इसी प्रकार उपकार किया था और उनको और उनकी क़ौम को बड़े संकट से मुक्ति दी थी और उनकी सहायता की थी तो अंततः वही विजयी रहे थे और हमने उन दोनों को प्रकाशमान ग्रंथ प्रदान किया था और उनको सीधे मार्ग पर रखा था और (नूह और इब्राहीम की तरह) हमने पिछले लोगों में एक समूह को उनके मार्ग पर छोड़ा था। शांति हो मूसा और हारून पर। हम अच्छे ढंग से कर्म करने वालों को इसी प्रकार फल देते हैं। कोई संदेह नहीं कि वे दोनों भी हमारे मोमिन भक्तों में से थे।

وَإِنَّ إِلْيَاسَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿123﴾ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ أَلَا تَتَّقُونَ ﴿124﴾ أَتَدْعُونَ بَعْلًا وَتَذَرُونَ أَحْسَنَ ٱلْخَـٰلِقِينَ ﴿125﴾ ٱللَّهَ رَبَّكُمْ وَرَبَّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿126﴾ فَكَذَّبُوهُ فَإِنَّهُمْ لَمُحْضَرُونَ ﴿127﴾ إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ ﴿128﴾ وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿129﴾ سَلَـٰمٌ عَلَىٰٓ إِلْ يَاسِينَ ﴿130﴾ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿131﴾ إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿132﴾

इसी प्रकार इल्यास भी निस्संदेह हमारे पैग़ंबरों में से था। याद करो, जब उसने अपनी क़ौम से कहा: तुम लोग डरते नहीं हो? क्या तुम बअल देवता को पुकारते हो और उसे छोड़ देते हो जो सबसे अच्छा रचयिता है? परमेश्वर को, जो तुम्हारा भी प्रभु है और तुम्हारे पूर्वजों का भी? अंत में उन्होंने उसे झूठा कह दिया तो अब वे भी अवश्य पकड़े हुए आएंगे। अपितु, परमेश्वर के चुने हुए भक्त सुरक्षित रहेंगे। हमने (इल्यास पर भी अनुग्रह किया और) पिछले लोगों में एक समूह को उसके मार्ग पर छोड़ा। शांति हो महान इल्यास पर। हम अच्छे ढंग से कर्म करने वालों को इसी प्रकार फल देते हैं। निस्संदेह वह हमारे मोमिन भक्तों में से था।

وَإِنَّ لُوطًا لَّمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿133﴾ إِذْ نَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ أَجْمَعِينَ ﴿134﴾ إِلَّا عَجُوزًا فِى ٱلْغَـٰبِرِينَ ﴿135﴾ ثُمَّ دَمَّرْنَا ٱلْـَٔاخَرِينَ ﴿136﴾ وَإِنَّكُمْ لَتَمُرُّونَ عَلَيْهِم مُّصْبِحِينَ ﴿137﴾ وَبِٱلَّيْلِ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿138﴾

और कोई संदेह नहीं कि लूत भी हमारे पैग़ंबरों में से था। याद करो, जब उसको और उसके सभी घर वालों को हमने मुक्ति दी, एक बुढ़िया को छोड़ कि वह पीछे रह जाने वालों में रह गई। इसके बाद हमने अन्य लोगों को नष्ट कर के मारा। (क़ुरैश के लोगो), तुम सुबह को भी उनकी बस्तियों पर से निकलते हो और रात में भी। फिर क्या बुद्धि से काम नहीं लेते हो?

وَإِنَّ يُونُسَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿139﴾ إِذْ أَبَقَ إِلَى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ ﴿140﴾ فَسَاهَمَ فَكَانَ مِنَ ٱلْمُدْحَضِينَ ﴿141﴾ فَٱلْتَقَمَهُ ٱلْحُوتُ وَهُوَ مُلِيمٌ ﴿142﴾ فَلَوْلَآ أَنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلْمُسَبِّحِينَ ﴿143﴾ لَلَبِثَ فِى بَطْنِهِۦٓ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ ﴿144﴾ فَنَبَذْنَـٰهُ بِٱلْعَرَآءِ وَهُوَ سَقِيمٌ ﴿145﴾ وَأَنۢبَتْنَا عَلَيْهِ شَجَرَةً مِّن يَقْطِينٍ ﴿146﴾ وَأَرْسَلْنَـٰهُ إِلَىٰ مِا۟ئَةِ أَلْفٍ أَوْ يَزِيدُونَ ﴿147﴾ فَـَٔامَنُوا۟ فَمَتَّعْنَـٰهُمْ إِلَىٰ حِينٍ ﴿148﴾

इसी प्रकार यूनुस भी निस्संदेह पैग़ंबरों में से था। याद करो, जब वह (अपनी क़ौम को छोड़ कर) नौका की ओर भाग निकला जो यात्रियों से भर चुकी थी। फिर (नौका तूफ़ान में घिर गई और उनके कहने पर) उसने पासा डाला तो (उसी के नाम पर निकला और) वह समुद्र में फेंक दिया गया। फिर उसको मछली ने निगल लिया और वह निंदा के योग्य हो चुका था। तो यदि वह परमेश्वर की स्तुति करने वालों में से न होता तो उस दिन तक मछली के पेट ही में पड़ा रहता, जब लोग उठाए जाएँगे। (परंतु उसने परमेश्वर की स्तुति की) तो हमने उसको खुले मैदान में डाल दिया और उस समय वह निढाल हो रहा था। हमने (कुछ और भी अनुग्रह किया) और उस पर एक बेल वाला वृक्ष उगा दिया और (जिनकी ओर नियुक्त कर के भेजा गया था) उसे (फिर से उन्हीं) एक लाख, बल्कि उससे भी अधिक लोगों की ओर भेज दिया। फिर वे मान गए तो हमने उनको एक अवधि तक रहने बसने की ढील दे दी।

فَٱسْتَفْتِهِمْ أَلِرَبِّكَ ٱلْبَنَاتُ وَلَهُمُ ٱلْبَنُونَ ﴿149﴾ أَمْ خَلَقْنَا ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ إِنَـٰثًا وَهُمْ شَـٰهِدُونَ ﴿150﴾ أَلَآ إِنَّهُم مِّنْ إِفْكِهِمْ لَيَقُولُونَ ﴿151﴾ وَلَدَ ٱللَّهُ وَإِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ ﴿152﴾ أَصْطَفَى ٱلْبَنَاتِ عَلَى ٱلْبَنِينَ ﴿153﴾ مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ ﴿154﴾ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴿155﴾ أَمْ لَكُمْ سُلْطَـٰنٌ مُّبِينٌ ﴿156﴾ فَأْتُوا۟ بِكِتَـٰبِكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿157﴾

(ये अब भी नहीं मानते) तो इनसे पूछो, क्या तुम्हारे प्रभु के लिए बेटियां हैं और इनके लिए बेटे? या हमने फ़रिश्तों को स्त्रियाँ बनाया और ये उस समय देख रहे थे? सुन लो, सत्य यह है कि ये केवल अपनी मनगढ़ंत से कह रहे हैं कि परमेश्वर की संतान हुई है और ये पूर्णतः झूठे हैं। क्या परमेश्वर ने बेटों की तुलना में बेटियां पसंद कर लीं? तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसा निर्णय करते हो? फिर क्या तुम होश से काम नहीं लेते? या तुम्हारे पास (ईश्वरीय ग्रंथ का) कोई स्पष्ट प्रमाण है? तो लाओ अपना ग्रंथ, यदि तुम सच्चे हो।

وَجَعَلُوا۟ بَيْنَهُۥ وَبَيْنَ ٱلْجِنَّةِ نَسَبًا ۚ وَلَقَدْ عَلِمَتِ ٱلْجِنَّةُ إِنَّهُمْ لَمُحْضَرُونَ ﴿158﴾ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ ﴿159﴾ إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ ﴿160﴾ فَإِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ ﴿161﴾ مَآ أَنتُمْ عَلَيْهِ بِفَـٰتِنِينَ ﴿162﴾ إِلَّا مَنْ هُوَ صَالِ ٱلْجَحِيمِ ﴿163﴾

इन्होंने परमेश्वर के और जिन्नों के बीच भी संबंध बना रखा है, और जिन्न भलीभांति जानते हैं कि अवज्ञा करेंगे तो वे भी अवश्य पकड़े हुए आएंगे — परमेश्वर विमुक्त है उन बातों से जो ये व्यक्त करते हैं — परमेश्वर के चुने हुए भक्त ही (उसकी पकड़ से) सुरक्षित रहेंगे। तो तुम और तुम्हारे उपास्य, तुम इनपर केवल उन्हीं को मोहित कर सकते हो जो (अपने दुष्कर्मों के आधार पर) नरक में पड़ने वाले हैं।

وَمَا مِنَّآ إِلَّا لَهُۥ مَقَامٌ مَّعْلُومٌ ﴿164﴾ وَإِنَّا لَنَحْنُ ٱلصَّآفُّونَ ﴿165﴾ وَإِنَّا لَنَحْنُ ٱلْمُسَبِّحُونَ ﴿166﴾

(ये हमें परमेश्वर की बेटियां बनाते हैं? कदापि नहीं), हमारा हाल तो यह है कि हम में से हर एक का एक निर्धारित स्थान है और हम जो हैं, हम तो परमेश्वर के समक्ष कतार बांधे हुए रहने वाले हैं और हम तो (हर समय) उसके गुणगान में लगे रहते हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इस वार्तालाप के अंतर्गत जिब्रील-ए-अमीन ने उन सभी मूर्खताओं का खंडन (तरदीद) कर दिया है, जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है। ↩
وَإِن كَانُوا۟ لَيَقُولُونَ ﴿167﴾ لَوْ أَنَّ عِندَنَا ذِكْرًا مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿168﴾ لَكُنَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ ﴿169﴾ فَكَفَرُوا۟ بِهِۦ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ﴿170﴾

ये लोग कहा करते थे कि यदि पिछले लोगों का उपदेश हमारे पास होता तो हम परमेश्वर के ख़ास भक्त होते। परंतु (वह इनके पास आ गया तो) इन्होंने उसको नकार दिया। तो शीघ्र ही जान लेंगे कि अब इसका परिणाम क्या होता है।

وَلَقَدْ سَبَقَتْ كَلِمَتُنَا لِعِبَادِنَا ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿171﴾ إِنَّهُمْ لَهُمُ ٱلْمَنصُورُونَ ﴿172﴾ وَإِنَّ جُندَنَا لَهُمُ ٱلْغَـٰلِبُونَ ﴿173﴾ فَتَوَلَّ عَنْهُمْ حَتَّىٰ حِينٍ ﴿174﴾ وَأَبْصِرْهُمْ فَسَوْفَ يُبْصِرُونَ ﴿175﴾

(तुम परमेश्वर के रसूल हो और) रसूल की हैसियत से अपने भेजे हुए भक्तों के बारे में हमारा यह निर्णय पहले ही जारी हो चुका है कि सहायता के अधिकारी वही होंगे। और निस्संदेह हमारी सेना ही विजयी रहने वाली है। तो कुछ दिनों के लिए इन्हें छोड़ दो और इन्हें देखते रहो कि शीघ्र ही ये भी देख लेंगे।

أَفَبِعَذَابِنَا يَسْتَعْجِلُونَ ﴿176﴾ فَإِذَا نَزَلَ بِسَاحَتِهِمْ فَسَآءَ صَبَاحُ ٱلْمُنذَرِينَ ﴿177﴾ وَتَوَلَّ عَنْهُمْ حَتَّىٰ حِينٍ ﴿178﴾ وَأَبْصِرْ فَسَوْفَ يُبْصِرُونَ ﴿179﴾

फिर क्या ये हमारे दण्ड के लिए जल्दी मचा रहे हैं? तो जब वह इनके आंगन में उतरेगा तो बड़ी ही बुरी होगी उन लोगों का सवेरा जिन्हें उससे सचेत कर दिया गया था। (इसलिए छोड़ दो) और कुछ दिनों के लिए इनकी ओर ध्यान न दो और देखते रहो कि शीघ्र ही ये भी देख लेंगे।

سُبْحَـٰنَ رَبِّكَ رَبِّ ٱلْعِزَّةِ عَمَّا يَصِفُونَ ﴿180﴾ وَسَلَـٰمٌ عَلَى ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿181﴾ وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿182﴾

तेरा प्रभु, सम्मान का स्वामी, उन सब बातों से विमुक्त है जो ये कहते हैं और उसके पैग़ंबरों पर शांति है और आभार परमेश्वर ही के लिए है, समस्त लोकों का प्रभु।