सूरह 34
सबा
मक्की · 54 आयतें · 27 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों में सचेत करने (इंज़ार) और शुभ सूचना देने (बशारत) के साथ-साथ परमेश्वर की कृतज्ञता का आह्वान किया गया है और उसके एक, अद्वितीय और साझेदार रहित होने (तौहीद) को प्रमाणित किया गया है। इसलिए, दोनों का विषय एक ही है। अपितु, पहली सूरह में ऐतिहासिक तर्क प्रमुख है जबकि दूसरी में फ़रिश्तों [देवताओं] के पूज्य तथा उपास्य होने के खंडन का पहलू अधिक स्पष्ट है। इन दोनों सूरतों को 'अल्हम्दु लिल्लाहि' के वाक्य से शुरू करके इनके इस संबंध की ओर क़ुरआन ने स्वयं संकेत कर दिया है।1
टिप्पणियाँ 1
- हिन्दी अनुवादक ↩
दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश से है और इनकी विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जब वे सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत (इंज़ार-ए-आम) कर रहे थे।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
आभार के योग्य वही परमेश्वर है कि जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है, सब उसी का है। और परलोक में भी उसी की प्रशंसा होगी और वही प्रज्ञावान और जागरूक है। जो कुछ धरती में प्रवेश करता है और जो कुछ उससे निकलता है और जो कुछ आकाश से उतरता और जो कुछ उसमें चढ़ता है, वह उसको जानता है और वही क्षमा करने वाला और दया करने वाला है।
(तुम्हारे) नकारने वाले कहते हैं कि क़यामत हम पर नहीं आ रही। कह दो, क्यों नहीं, मेरे उस प्रभु की सौगंध जो परोक्ष की हर बात का जानने वाला है, वह तुम पर अवश्य आएगी। उससे तिनके के बराबर कोई चीज़ न आकाशों में छिपी हुई है, न धरती में, न तिनके से छोटी न बड़ी, अपितु एक स्पष्ट खाते में लिख दी गई है। ताकि वह उन लोगों को अच्छा फल दे जो मान चुके और उन्होंने अच्छे कर्म किए हैं। वही हैं जिनके लिए क्षमा और सम्मानजनक जीविका है। और जो हमारी आयतों को नीचा दिखाने में सक्रिय हैं, वही हैं जिनके लिए अत्यंत कष्टदायक दण्ड है।
इसके विपरीत जिनको ज्ञान दिया गया है, वे समझते हैं कि जो तुम्हारे प्रभु के पास से तुम्हारी ओर उतारा गया है, वही सत्य है और वह परम शक्तिशाली और अति प्रशंसनीय परमेश्वर का मार्ग दिखाता है।
अपितु, उसके नकारने वाले (तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाते और) कहते हैं कि (लोगो), क्या हम तुम्हें एक ऐसा व्यक्ति बताएं जो तुम्हें सूचना देता है कि जब तुम पूरी तरह कण-कण हो जाओगे तो पुनः पैदा किए जाओगे? यह परमेश्वर पर झूठ लगा कर लाया है या इसको किसी प्रकार का पागलपन है? कदापि नहीं, अपितु जो लोग परलोक पर विश्वास नहीं रखते वही प्रकोप में और दूर की पथभ्रष्टता में पड़े हैं।
तो क्या इन्होंने अपने आगे और पीछे जो आकाश और धरती हैं, उनकी ओर नहीं देखा? यदि हम चाहें तो इनको इसी धरती में धंसा दें या इन पर आकाश के टुकड़े गिरा दें। सत्य यह है कि हर उस व्यक्ति के लिए इसमें बहुत बड़ी निशानी है जो ध्यान देने वाला हो।
(परमेश्वर के भक्तो, यही निशानियाँ उन कथाओं में भी हैं जो हम तुम्हें सुना रहे हैं)। हमने दाऊद को अपनी ओर से विशेष उपकार प्रदान किया था। हमने आदेश दिया था कि पर्वतो, तुम भी उसके साथ एक स्वर हो जाओ और यही आदेश हमने पक्षियों को भी दिया था। हमने लोहे को उसके लिए कोमल कर दिया था। कि पूरे और फैले हुए ढीले-ढीले रक्षा कवच बनाओ और उनकी बनावट में भी पूर्ण अनुपात का ध्यान रखो और तुम सब अच्छा कर्म करो। इसमें संदेह नहीं कि जो कुछ तुम करते हो, उसे मैं देख रहा हूँ।
इसी प्रकार सुलैमान के लिए हमने वायु को सेवा में कर दिया। (उसकी नौकाओं को लेकर) वायु का जाना भी महीने भर का होता था और आना भी महीने भर का होता था। और हमने उसके लिए तांबे की सरिता बहा दी और ऐसे जिन्न भी उसकी सेवा में कर दिए थे जो उसके प्रभु की आज्ञा से उसके आगे काम करते थे और कह दिया था कि उनमें से जो हमारी आज्ञा को नहीं मानेगा, उसे हम आग के दण्ड का स्वाद चखाएंगे। वे उसके लिए जो वह चाहता था, बनाते थे: मेहराबें, मूर्तियाँ, बड़े बड़े जलाशय जैसे पात्र और पर्वत जैसे चूल्हों पर जमी हुई हांडियाँ — दाऊद के घर वालो, (अपने प्रभु का) आभार व्यक्त करते रहो। सत्य यह है कि मेरे भक्तों में कम ही आभारी होते हैं।
(यही जिन्न हैं जिन्हें तुम परोक्ष के जानकार समझकर परमेश्वर के सहभागी बनाते हो। ये सुलैमान की सेवा करते रहे)। फिर जब हमने उस पर मृत्यु का निर्णय लागू किया तो उनको धरती के कीड़े ही ने उसकी मृत्यु की जानकारी दी जो उसकी लाठी को खा रहा था। अतः सुलैमान जब गिर पड़ा, तब जिन्नों की वास्तविकता स्वयं उनपर स्पष्ट हो गई कि यदि वे परोक्ष के जानने वाले होते तो इस अपमानजनक दण्ड में न पड़े रहते।
(क़ुरैश के लोगो, सबा ने भी वही किया था जो तुम कर रहे हो, यद्यपि) सबा के लोगों के लिए उनके निवास-स्थान ही में बहुत बड़ी निशानी थी। दाएँ बाएं, बाग़ों की दो शृंखलाएँ। (इन सब की दशा कह रही थी कि) अपने प्रभु की दी हुई जीविका खाओ और उसके आभारी रहो। उर्वर और हरी-भरी धरती और क्षमा करने वाला प्रभु। फिर भी उन्होंने विद्रोह किया तो अंततः हमने उनपर बांध की बाढ़ भेज दी और उनके बाग़ों को उनके लिए दो ऐसे बाग़ों में बदल दिया जिनमें फीके फल और झाऊ के वृक्ष और बेरी की कुछ थोड़ी सी झाड़ियां थीं। यह हमने उनकी अकृतज्ञता का बदला उन्हें दिया और ऐसा बदला हम अकृतज्ञ लोगों ही को दिया करते हैं।
हमने उनके और उन बस्तियों के बीच, जहाँ हमने शुभ आशीष रखे थे, ऐसी बस्तियां बसाई जो सामने रास्ते पर थीं और उनके अंदर (उनके लिए) यात्रा के पड़ाव निर्धारित कर दिए कि उनमें दिन रात निर्भय यात्रा करो। परंतु उन्होंने (जो आचरण अपनाया तो जैसे अपनी दशा से) कह दिया कि प्रभु, हमारे पड़ावों को दूर-दूर कर दे। और इस प्रकार अपने प्राणों पर अत्याचार किया तो हमने अंततः उन्हें कथा मात्र बना दिया और उनको पूरा छिन्न-भिन्न कर डाला। निस्संदेह इसमें हर उस व्यक्ति के लिए निशानियाँ हैं जो धैर्य रखने वाला और कृतज्ञ हो।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात् इस सैर करने के स्थान को उजाड़ जगह में बदल दे। ↩
इसमें क्या संदेह है कि उनपर इबलीस ने अपना विचार सच्च कर दिखाया। तो वे उसी के रास्ते पर चले, मानने वालों के एक छोटे से दल के सिवा। सत्य यह है कि इबलीस का उनपर कोई प्रभाव नहीं था। हमने यह ढ़ील उसको दी तो केवल इसलिए कि हम उन लोगों को जो परलोक पर विश्वास रखते हैं, उन लोगों से अलग जान लें जो उसकी ओर से संदेह में पड़े हुए हैं। और तेरा प्रभु, (हे पैग़ंबर), हर चीज़ पर निरीक्षक है।
इनसे कहो कि ज़रा बुलाओ उन्हें जिनको तुमने परमेश्वर को छोड़ उपास्य समझ रखा है। वे न समस्त आकाशों में तिनके के बराबर अधिकार रखते हैं न धरती में, और न इन दोनों के बनाने में उनका कोई हिस्सा है और न (इस जगत की व्यवस्था चलाने के लिए) उनमें से कोई परमेश्वर का सहायक है। उसके समक्ष कोई अनुशंसा काम नहीं आती, सिवाय इसके कि वह स्वयं किसी के लिए उसकी अनुमति दे। यहाँ तक कि क़यामत के दिन जब उनके दिलों से घबराहट दूर होगी तो तुम्हारे यही पूज्य-देवता एक दूसरे से पूछेंगे कि तुम्हारे प्रभु ने क्या आदेश दिया? वे उत्तर देंगे कि सत्य कहा गया और वह सर्वोच्च है, बड़ी प्रतिष्ठा वाला है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात् फ़रिश्तों को, जिन्हें तुम परमेश्वर की लाड़ली बेटियाँ समझ कर इनकी उपासना करते थे। ↩
इनसे पूछो, तुम्हें धरती और समस्त आकाशों से कौन जीविका पहुंचाता है? कहो, परमेश्वर। अब हम में और तुम में कोई एक सन्मार्ग पर है या स्पष्ट पथभ्रष्टता में, (इसका निर्णय परमेश्वर ही के हवाले है)। इनसे कहो, न हमारे किसी अपराध की तुमसे कोई पूछताछ होनी है और न जो कुछ तुम कर रहे हो, उसके बारे में हमसे पूछा जाएगा? कहो, हमारा प्रभु हम सबको (एक दिन) अपने निर्णय के लिए इकट्ठा करेगा, फिर हमारे बीच ठीक न्यायपूर्वक निर्णय कर देगा। वही बहुत बड़ा निर्णय करने वाला और हर चीज़ की जानकारी रखने वाला है।
इनसे कहो, ज़रा मुझे दिखाओ तो सही जिन्हें तुमने साझी बनाकर परमेश्वर से मिला रखा है। कदापि नहीं, अपितु वही परमेश्वर प्रबल और प्रज्ञावान है।
(ये नहीं सुनते तो हम दूसरों को सबोधित कर लेंगे)। हमने, (हे पैग़ंबर), तुमको जो भेजा है तो मानव-मात्र के लिए शुभ समाचार देने वाला और सचेत करने वाला बना कर भेजा है, परंतु (लोगों पर अफ़सोस है कि) अधिकांश लोग जानते नहीं हैं। कहते हैं कि यदि तुम लोग सच्चे हो तो दण्ड का यह वादा कब पूरा होगा (जिसकी धमकी सुना रहे हो)? इन्हें बता दो कि तुम्हारे लिए एक ऐसे दिन की समय सीमा निश्चित है जिससे न एक घड़ी पीछे हटोगे, न आगे बढ़ोगे।
ये नकारने वाले कहते हैं कि हम इस क़ुरआन को कभी नहीं मानेंगे और न उसको जिसकी यह आगे सूचना दे रहा है। और यदि तुम देखते, जब ये दुष्ट अपने प्रभु के सामने खड़े होंगे, इस प्रकार कि इनमें से एक दूसरे पर बात डाल रहा होगा, फिर तुम देखते कि ये किस अंत को पहुंचे हैं। जो लोग दबा कर रखे गए थे, उस समय वे अपने अहंकारियों से कहेंगे कि यदि तुम लोग न होते तो (पैग़ंबर के आने के बाद सत्य इस प्रकार स्पष्ट हो गया था कि) हम मान गए होते। इसके उत्तर में अहंकारी उन्हें जो दबा कर रखे गए, कहेंगे: क्या हमने तुम्हें मार्गदर्शन स्वीकार करने से रोका था, इसके बाद कि वह तुम्हारे पास आ गया था? कदापि नहीं, अपितु तुम स्वयं ही अपराधी हो। दबे हुए लोग अहंकारी लोगों को उत्तर देंगे: अपितु तुम्हारी दिन रात के षड्यंत्र थे जो यहाँ तक ले आए हैं, जबकि तुम हमें समझाते थे कि हम परमेश्वर से कुफ़्र करें और उसके सहभागी बनाएं। (फिर) जब दण्ड को अपनी आंखों से देख लेंगे तो दिलों में पछताएंगे। (परंतु उस समय पछताने से क्या लाभ)! हम इन नकारने वालों के गलों में पट्टे डाल देंगे। ये वही बदला पाएंगे जो करते रहे थे।
(यह कोई नई बात नहीं है, हे पैग़ंबर), हमने जिस बस्ती में भी कोई सचेत करने वाला भेजा है, उसके समृद्ध लोगों ने यही कहा कि तुम्हें जो दे कर भेजा गया है, हम उसको नहीं मानेंगे। और कहा कि हम धन और संतान में तुमसे बढ़कर हैं और हम पर कोई दण्ड भी आने वाला नहीं है। इनसे कहो, सत्य यह है कि मेरा प्रभु ही जिसके लिए चाहता है, जीविका बढ़ाता है और जिसके लिए चाहता है, घटा देता है, परंतु अधिकांश लोग जानते नहीं हैं। (परमेश्वर के भक्तो), तुम्हारी धन संपत्ति और तुम्हारी संतान वह चीज़ नहीं है जो तुमको हमारा क़रीबी बना दे। अपितु जो मान गए और उन्होंने भले कर्म किए, वही हैं कि जिनके लिए उनके कर्मों का कई गुना अच्छा फल है और वे उच्च भवनों में शांति से बैठे होंगे।
और जो नीचा दिखाने के लिए हमारी आयतों को झूठा कहने में सक्रिय हैं, वे पकड़े हुए दण्ड में ड़ाले जाएँगे।
कह दो, मेरा प्रभु ही है जो अपने भक्तों में से जिसके लिए चाहता है, जीविका बढ़ाता है और जिसके लिए चाहता है, घटा देता है। उसके मार्ग में जो चीज़ भी तुम ख़र्च करोगे, वह उसका बदला देगा और वह सबसे अच्छी जीविका देने वाला है।
उस दिन को याद रखो, जिस दिन वह सबको इकट्ठा करेगा, फिर फ़रिश्तों से पूछेगा, क्या ये लोग तुम्हारी ही पूजा करते रहे हैं? वे उत्तर देंगे कि तू दोषरहित है। इनके विरुद्ध तू ही हमारा सहायक है। वास्तव में यह हमारी नहीं, अपितु जिन्नों की पूजा करते थे। इनमें से अधिकांश उन्हीं पर विश्वास किए हुए थे।
तो (तुमने देख लिया कि) आज तुम में से कोई न एक दूसरे को लाभ पहुंचा सकता है, न हानि। हम इन दुष्टों से कहेंगे कि अब उस आग के दण्ड का स्वाद चखो जिसको झूठा कहते रहे हो।
(इन पर अफ़सोस), इन्हें जब हमारी स्पष्ट आयतें सुनाई जाती हैं तो कहते हैं कि यह तो केवल एक व्यक्ति है जो चाहता है कि तुमको उन चीज़ों से रोक दे जिन्हें तुम्हारे पूर्वज पूजते आए हैं। और कहते हैं कि यह क़ुरआन केवल एक झूठ है गढ़ा हुआ। (कदापि नहीं, यह परम सत्य है) और इन नकारने वालों ने इस सत्य के बारे में, जब वह इनके पास आ गया तो कहा कि यह तो स्पष्ट जादू है। हमने इनको ग्रंथ नहीं दिए थे जिन्हें ये पढ़ते हों, (जिस प्रकार इस्राईलियों को दिए) और न तुम से पूर्व इनकी ओर कोई सचेत करने वाला भेजा था। (इन पर अफ़सोस, इस पर भी ये अनादर कर रहे हैं)!
इनसे पहले के लोगों ने भी इसी प्रकार नका दिया था और ये तो उसके दसवें भाग को भी नहीं पहुंचे जो हमने उनको दिया था। परंतु जब उन्होंने मेरे रसूलों को झूठा कह दिया तो देख लो कि कैसा था मेरा अभिशाप!
इनसे कहो, मैं तुम्हें एक बात का उपदेश करता हूं। यह कि परमेश्वर के लिए, तुम दो-दो, एक-एक करके उठो, फिर विचार करो। सत्य यह है कि तुम्हारे साथी को कोई पागलपन नहीं है। वह तो एक कठोर दण्ड से पहले तुम्हें सचेत करने वाला है। इनसे कहो, मैंने तुमसे कोई फल मांगा है तो वह तुम्हारे ही लिए मांगा है। मेरा फल तो परमेश्वर के ज़िम्मे है और वह हर चीज़ पर साक्षी है।
इनसे कह दो, मेरा प्रभु सत्य को अवश्य असत्य पर मारेगा। वह सब भेदों का जानने वाला है। कह दो कि सत्य आ गया और असत्य मिट गया, और (उसे मिटना ही था), सच्चाई यह है कि असत्य न उत्पत्ति करता है, न पुनरावृत्ति।
कह दो कि यदि मैं पथभ्रष्टता पर हूं तो मेरी पथभ्रष्टता का बुरा परिणाम मुझी पर है और यदि मैं सन्मार्ग पर हूं तो यह उस वह्य की कृपा है जो मेरा प्रभु मेरी ओर भेज रहा है। (मुझे अब जो कुछ कहना है, उसी से कहूंगा)। इसमें संदेह नहीं कि वह सुनने वाला भी है और पास भी है।
यदि तुम देख पाते (तो इनकी विवशता देखते, हे पैग़ंबर), जब यह घबराए हुए फिरेंगे, फिर कहीं भाग न सकेंगे, अपितु पास ही से पकड़ लिए जाएँगे। उस समय बोल उठेंगे कि हम उसको मान गए हैं जिसे मानने को हमसे कहा गया था। पर इतनी दूर से अब वह ईमान कहां इनके हाथ आएगा! इससे पहले ये उसको नकार चुके और दूर ही से अटकल के तीर-तुक्के चलाते रहे। इनके और इनकी इच्छाओं के बीच दीवार आड़े आ जाएगी, जैसा इससे पहले इनही जैसे लोगों के साथ किया गया। इसलिए कि वे भी इसी प्रकार उलझा देने वाले संदेह में पड़े रहे थे।