सूरह 33
अल्-अहज़ाब्
मदनी · 73 आयतें · 32 अनुच्छेद
परिचय
यह बिना किसी जोड़े के एक अलग सूरह है, जिस पर क़ुरआन के इस चौथे अध्याय का समापन हो रहा है। हमने पहले बताया है कि इस अध्याय का विषय रसालत की धारणा को प्रमाणित करना और इसके संदर्भ से क़ुरैश क़बीले को सचेत करना (इंज़ार) और शुभ समाचार देना (बशारत) है। अतः इस पहलू को ध्यान में रखते हुए यह सूरह पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के अधिकारों व कर्तव्यों को स्पष्ट करती है और उनके तथा उनकी पतिव्रता पत्नियों (अज़्वाज-ए-मुतह्हरात) के बारे में जो आचरण उस समय के कपटाचारी (मुनाफ़िक़) पुरुषों और स्त्रियों ने अपनाए रखा था, उसपर उन्हें कड़ी चेतावनी देती है। साथ ही, यह मुसलमानों को निर्देश देती है कि वे इनके विरुद्ध अपने प्रभु पर ही भरोसा रखें। यदि उसकी सहायता उनके साथ रही तो ये कपटी उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे, जैसा कि अह्ज़ाब के युद्ध (ग़ज़वा-ए-अहज़ाब) के अवसर पर हुआ । परमेश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा और आधिपत्य के साथ आज्ञापालन की जो महान अमानत सौंप रखी है, उस अमानत से पैदा होने वाले कर्तव्यों का स्मरण भी इसी संदर्भ से कराया गया है। इस दृष्टि से, यह सूरह ठीक उसी प्रकार इस अध्याय की सभी सूरतों का पूरक और समापन है, जिस प्रकार सूरह नूर पिछले अध्याय का पूरक और समापन है।1
टिप्पणियाँ 1
- रिसालत: अर्थात पैग़ंबरी या रसूलत्व (Prophethood) ↩
इसमें संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से भी है और उनके अनुयायियों से भी, और इसकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद यह मदीना में उस समय अवतरित हुई है, जब मुसलमानों का एक संगठित शासन तंत्र वहां स्थापित हो चुका था और इस्लाम के नकारने वालों के विरुद्ध अंतिम कार्यवाही से पहले परमेश्वर के रसूल (स.) अपने अनुयायियों का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) कर रहे थे।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
हे नबी, परमेश्वर से डरो और इन नकारने वालों और ढोंगियों की बातों पर कान न धरो। इसमें कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर ज्ञानी और प्रज्ञावान है। तुम उस चीज़ का अनुसरण करो जो तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम पर वह्य की जा रही है। सत्य यह है कि परमेश्वर उन सब चीज़ों से परिचित हैं जो तुम लोग करते हो। और परमेश्वर पर भरोसा रखो और भरोसे के लिए परमेश्वर पर्याप्त है।
परमेश्वर ने किसी व्यक्ति के सीने में दो दिल नहीं रखे हैं (कि एक ही पल में वह दो परस्पर विरोधी बातों को मानता रहे)। अतः उसने न तुम्हारी उन पत्नियों को जिनसे तुम ज़िहार कर बैठते हो, तुम्हारी मताएँ बनाया है और न तुम्हारे मुँह बोले बेटों को तुम्हारा बेटा बना दिया है। ये सब तुम्हारे अपने मुँह की बातें हैं, परंतु परमेश्वर सत्य कहता है और वही सीधा मार्ग दिखाता है। तुम मुँह बोले बेटों को उनके पिताओं के संबंध से पुकारो। यही परमेश्वर की दृष्टि में अधिक न्यायसंगत है। फिर यदि उनके पिताओं का तुमको पता न हो तो वे तुम्हारे धार्मिक भाई और तुम्हारे साथी हैं। तुमसे जो भूल इस विषय में हुई है, उसके लिए तो तुम पर कोई पकड़ नहीं, परंतु तुम्हारे दिलों ने जिस बात का संकल्प कर लिया, उस पर अवश्य पकड़ है। और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
(इसी सिद्धांत के अनुसार), नबी का अधिकार तो उसके मानने वालों पर स्वयं उनसे भी ऊपर है और उसकी पत्नियां उनकी माताएं हैं, परंतु सगे-संबंधी परमेश्वर के विधान में दूसरे सभी मोमिनों और प्रवास करने वालों की तुलना में एक दूसरे के ज़्यादा अधिकारी हैं, सिवाय इसके कि अपने संबंधियों के साथ तुम कोई अच्छा व्यवहार करना चाहो। यह इसी ग्रंथ में लिखा हुआ है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात् वह सिद्धांत जो ऊपर बताया गया है — कि किसी व्यक्ति के सीने में दो दिल नहीं रखे गए हैं। ↩
(तुम इसका अनुसरण करो, हे पैग़ंबर), और याद रखो, जब हमने सब नबियों से उनका वचन लिया और तुमसे भी और नूह और इब्राहीम और मूसा और मर्यम पुत्र ईसा से भी, और हमने उनसे अत्यंत पक्का वचन लिया (कि हमारा संदेश यथार्थ रूप से पहुंचा दो) ताकि परमेश्वर सदाचारियों से उनके सदाचार के बारे में पूछे और नकारने वालों और ढोंगियों से उनके नकारने और कपट के बारे में, और नकारने वालों के लिए तो उसने कष्टदायक दण्ड तैयार कर रखा है।
हे मानने वालो, (तुम इनकी चिंता न करो, तुम्हारे लिए परमेश्वर पर्याप्त है, और) अपने ऊपर परमेश्वर के अनुग्रह को याद रखो, जब तुम पर एक के बाद एक सेनाएं चढ़ आईं तो हमने उनपर एक तीव्र आँधी भेज दी और ऐसी सेनाएँ जिनको तुमने नहीं देखा और (विश्वास रखो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसको लगातार देखने वाला है। याद करो, जब वे तुम्हारे ऊपर की दिशा से भी और तुम्हारे नीचे की दिशा से भी तुम पर चढ़ आए थे, जब (डर के मारे) आँखें बहक गई थीं और कलेजे मुँह को आ गए थे और परमेश्वर के बारे में तुम लोग अनेक प्रकार की कल्पनाएं करने लगे थे। उस समय मानने वाले परीक्षा में डाले गए और बुरी तरह हिला दिए गए।
और जब ढोंगी लोग कहते थे और वे भी जिनके दिलों में रोग है कि परमेश्वर और उसके रसूल ने जो वादे हमसे किए थे, वे पूरा धोखा ही थे। और जब उनमें से एक दल ने कहा कि यस्रिब वालो, तुम्हारे लिए अब ठहरने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए लौट जाओ। और उनमें से एक दल नबी से अनुमति मांग रहा था। वह कहता था कि हमारे घर संकट में हैं, यद्यपि वे संकट में नहीं थे। वे केवल भागना चाहते थे। उनके घरों के चारों ओर से यदि उनपर आक्रमण हो जाता, फिर उन्हें फ़ित्ने का निमंत्रण दिया जाता तो वे उसमें जा पड़ते और इसमें बहुत थोड़ा विलंब करते। इससे पहले उन्होंने परमेश्वर से प्रतिज्ञा की थी कि वे पीठ नहीं दिखाएंगे और परमेश्वर से की हुई प्रतिज्ञा की पूछताछ तो (एक दिन) होनी है। उनसे कहो, यदि तुम मृत्यु या हत्या से भागोगे तो यह भागना तुम्हारे कुछ भी काम न आएगा और यदि बच भी गए तो थोड़े दिनों ही के लिए कुछ लाभ उठा लोगे। उनसे पूछो, कौन है जो तुम्हें परमेश्वर से बचा सकेगा, यदि वह तुम्हें कोई क्षति पहुंचाना चाहे या उसकी दया को रोक सकेगा, यदि वह तुम पर दया करना चाहे? सत्य यह है कि परमेश्वर के विरुद्ध वे अपने लिए कोई समर्थक और सहायक नहीं पाएंगे।
परमेश्वर तुम में से उन लोगों को भलीभांति जानता है जो (उसके मार्ग में) इस युद्ध से दूसरों को रोकते और अपने भाइयों से कहते रहे हैं कि हमारे पास आ जाओ और तुमसे बचते हुए वे स्वयं भी लड़ाई में कम ही भाग लेते रहे हैं। अतः जब संकट की घड़ी आ जाती है तो तुम उनको देखते हो कि तुम्हारी ओर देख रहे हैं, इस प्रकार कि उनकी आँखें घूम रही हैं, जैसे किसी पर मौत की बेहोशी छाई हो। फिर जब संकट चला जाता है तो धन की लालच में वे तुम पर तेज़ ज़बानों से चढ़-चढ़ कर बोलते हैं। ये लोग ईमान नहीं लाए तो परमेश्वर ने इनके कर्म निष्फल कर दिए और यह परमेश्वर के लिए अत्यंत सरल है। ये समझ रहे हैं कि शत्रु की सेनाएँ अभी गई नहीं हैं और यदि ये सेनाएँ फिर आ जाएँ तो इनकी कामना होगी कि बद्दुओं के साथ कहीं देहात में हों और वहीं से तुम्हारे समाचार पूछते रहें। (यही अच्छा है, इसलिए कि) यदि ये तुम्हारे बीच होते भी तो लड़ाई में कम ही भाग लेते।
(लोगो), परमेश्वर के रसूल में तुम्हारे लिए (उस समय स्थिरता और दृढ़ता का) एक सबसे अच्छा आदर्श था, उनके लिए जो परमेश्वर से मिलने और अंतिम दिन की आशा रखते हैं और परमेश्वर को बहुत अधिक याद करते हैं। और सच्चे मानने वालों (की दशा उस समय यह थी कि उन्हों) ने जब सेनाओं को देखा तो पुकार उठे कि यह तो वही चीज़ है जिसका परमेश्वर और उसके रसोल ने हमसे वादा किया था और परमेश्वर और उसके रसूल की बात पूनतः सत्य थी। और (उनके अंदर कोई दुर्बलता पैदा करने के बजाए) इस चीज़ ने उनके विश्वास व आज्ञापालन ही को और बढ़ा दिया।
मानने वालों में वे सच्चे शूरवीर भी हैं कि उन्होंने परमेश्वर से जिस चीज़ का वादा किया था, उसे पूरा कर दिखाया है। फिर उनमें से कोई अपना कर्तव्य पूरा कर चुका और कोई प्रतीक्षा में है। उन्होंने इसमें थोड़ा सा भी परिवर्तन नहीं किया है। (यह परीक्षा इसी लिए रची गई थी) ताकि परमेश्वर सच्चों को उनकी सच्चाई का फल दे और ढोंगियों को, यदि चाहे तो दण्ड दे और चाहे तो उनपर उपकार करे और उनकी तौबा स्वीकार कर ले, (यदि वे तौबा करें)। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
(तुमने देखा नहीं कि) परमेश्वर ने नकारने वालों को उसी प्रकार अपना क्रोध दिलों में लिए हुए पूरी तरह असफल फेर दिया और मुसलमानों की ओर से परमेश्वर ही लड़ने के लिए पर्याप्त हो गया। परमेश्वर बड़ा शक्तिशाली है, बड़ा प्रबल है। और अहल-ए-किताब में से जिन्होंने उनकी सहायता की थी, परमेश्वर उन्हें भी उनके गढ़ों से उतार लाया और उन के दिलों में उसने आतंक डाल दिया, उनके एक दल की तुम हत्या कर रहे थे और एक दल को बंदी बना रहे थे। और उनकी भूमि और उनके घरों और उनकी धन-संपत्ति का तुम्हें उत्तराधिकारी बना दिया और एक ऐसी भूमि का भी जिसको तुम्हारे चरणों ने छुआ भी नहीं है। सत्य यह है कि परमेश्वर हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।
(इस ओर से निराश होकर अब ये ढोंगी तुम्हारे घरों में झगड़े उठाना चाहते हैं, इसलिए), हे पैग़ंबर, अपनी पत्नियों से कह दो कि यदि तुम दुनिया का जीवन और उसकी ठाटबाट चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें दे दिला कर अच्छे ढंग से विदा कर दूँ। और यदि तुम परमेश्वर और उसके रसूल और परलोक के घर को चाहती हो तो इन सब चीज़ों से निस्पृह होकर उसी के लिए सक्रिय रहो, इसलिए कि परमेश्वर ने तुम में से अच्छे ढंग से सहयोग करने वालियों के लिए महान प्रतिफल तैयार कर रखा है।
नबी की पत्नियो, तुम में से जो किसी स्पष्ट निर्लज्जता की दोषी होगी, उसके लिए दुगना दण्ड है और यह परमेश्वर के लिए सरल सी बात है। और तुम में से जो परमेश्वर और उसके रसूल की आज्ञाकारी बनी रहेंगी और भले कर्म करेंगी, उन्हें हम उनका दुगना फल प्रदान करेंगे और उनके लिए हमने सम्मानपूर्वक जीविका तैयार कर रखी है।
नबी की पत्नियो, तुम साधारण महिलाओं के समान नहीं हो। यदि तुम परमेश्वर से डरो तो (इन लोगों के साथ) धीमे स्वर में बात न करो कि जिसके दिल में रोग है, वह किसी झूठी चाहत में न पड़ जाए और औपचारिक ढंग से बात करो।
तुम अपने घरों में टिककर रहो और पहली जाहिलिय्यत के जैसी सज धज न दिखाती फिरो। और नमाज़ का प्रबंध रखो और ज़कात देती रहो और परमेश्वर और उसके रसूल की आज्ञापालन पर जमी रहो। परमेश्वर तो यही चाहता है, इस घर की पत्नियो कि तुमसे (वह) गंदगी दूर करे (जो ये ढोंगी तुम पर थोपना चाहते हैं) और तुम्हें पूर्ण रूप से पवित्र कर दे। और तुम्हारे घरों में परमेश्वर की आयतों और उसकी हिकमत की जो शिक्षा दी जाती है, उसका प्रचार करो। निस्संदेह, परमेश्वर बड़ा ही प्रज्ञावान और ख़बर रखने वाला है।1
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- ये समस्त निर्देश विशेष रूप से उस पद और उसके दायित्वों की दृष्टि से दिए गए हैं, जो पद पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की पत्नियों (उम्महातुल-मोमिनीन) को पैग़ंबर (स.) के साथ उनके संबंध के आधार पर प्राप्त था। इनका आम महिलाओं से कोई संबंध नहीं है। ↩
(फिर भी उसका सारा उपकार और दया केवल इसी घर के साथ सीमित नहीं है)। सत्य यह है कि जो पुरुष और जो स्त्रियाँ मुसलमान हैं, मानने वाले हैं, भक्ति करने वाले हैं, सच्चे हैं, धैर्य रखने वाले हैं, परमेश्वर के आगे झुक कर रहने वाले हैं, दान करने वाले हैं, उपवास रखने वाले हैं, अपनी गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैं और परमेश्वर को बहुत अधिक याद करने वाले हैं, परमेश्वर ने उनके लिए भी क्षमा और महान प्रतिफल तैयार कर रखा है।
(ये ढोंगी अब परमेश्वर और उसके रसूल के निर्णयों को भी कटाक्षों का निशाना बना रहे हैं। इन्हें जानना चाहिए कि) किसी मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्री के लिए गुंजाइश नहीं है कि जब परमेश्वर और उसका रसूल किसी विषय का निर्णय कर दें तो उनके लिए अपने उस विषय में कोई अधिकार बाक़ी रह जाए। और (जानना चाहिए कि) जो परमेश्वर और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा तो वह स्पष्ट पथभ्रष्टता में पड़ चुका।
(इन्होंने यह दुष्टता उस समय की) जब तुम उस व्यक्ति से बार-बार कह रहे थे जिस पर परमेश्वर ने उपकार किया और तुमने भी उपकार किया कि अपनी पत्नी को अपने पास रोके रखो और परमेश्वर से डरो, और तुम अपने मन में वह बात छिपाए हुए थे जिसको परमेश्वर व्यक्त करने वाला था। और तुम लोगों से डर रहे थे, यद्यपि परमेश्वर ज़्यादा अधिकारी है कि तुम उससे डरो। फिर जब ज़ैद ने अपना संबंध पत्नी से तोड़ दिया तो हमने उसका विवाह तुमसे किया ताकि मुसलमानों पर उनके मुँह बोले बेटों की पत्नियों के विषय में कोई समस्या न रहे, जब वे अपना संबंध उनसे तोड़ दें। और परमेश्वर का आदेश तो हो कर ही रहना था।1
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- अर्थात् यह बात कि यदि तलाक़ दे दी गई तो सय्यिदह ज़ैनब (अ) का दिल रखने के लिए, फिर स्वयं पैग़ंबर (स.) ही को उनसे विवाह करना होगा, और यह एक बहुत बड़े धर्मसंकट (फ़ित्ने) और दुष्प्रचार का कारण बन जाएगी। ↩
नबी के लिए जो बात परमेश्वर ने निश्चित कर दी हो, उसमें उस पर कोई कठिनाई नहीं है। (उसके पैग़ंबर) जो पहले चल बसे हैं, उनके विषय में भी परमेश्वर की यही कार्यप्रणाली रही है और परमेश्वर का आदेश एक पक्का निर्णय होता है। वे जो परमेश्वर का संदेश पहुंचाते थे और उसी से डरते थे और उसके अतिरिक्त किसी से नहीं डरते थे। (इसलिए तुम भी उसी से डरो, हे पैग़ंबर, और संतुष्ट रहो कि) हिसाब के लिए परमेश्वर पर्याप्त है।
(सत्य यह है कि) मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं, अपितु परमेश्वर के रसूल और नबियों की मुहर हैं। (इसलिए यह दायित्व उन्हीं को पूरा करना था), और परमेश्वर हर चीज़ से अवगत है।1
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- अतः ज़ैद के पिता क्यों होने लगे, कि उनकी तलाक़शुदा (पत्नी) से उनके विवाह पर यह दुष्प्रचार किया जाए? ↩
हे मानने वालो, (इनके शोर मचाने से निश्चिंत हो जाओ और), परमेश्वर को बहुत अधिक याद करो। और सुबह व शाम उसका गुणगान करते रहो। वही है जो तुम पर अपनी दया भेजता है और उसके फ़रिश्ते भी तुम्हारे लिए इसकी प्रार्थनाएं करते हैं ताकि तुमको अंधकारों से निकाल कर प्रकाश में ले आए और वह मानने वालों पर अत्यंत दया करने वाला है। जिस दिन वह उससे मिलेंगे, उनका अभिवादन (उसकी ओर से) सलाम होगा और उनके लिए उसने बड़े सम्मान का फल तैयार कर रखा है।
हे नबी, (तुम भी निश्चिंत हो जाओ), हमने तुम्हें गवाही देने वाला और शुभ समाचार सुनाने वाला और सचेत करने वाला और परमेश्वर की अनुमति से उसकी ओर बुलाने वाला और (लोगों को अंधकारों से निकालने के लिए) एक उज्ज्वल दीप बनाकर भेजा है। (तुम अपने इन कर्तव्यों का निर्वाह करो) और अपने मानने वालों को शुभ समाचार दो कि परमेश्वर की ओर से उनके लिए बहुत बड़ा अनुग्रह है। तुम इन नकारने वालों और ढोंगियों की बात का ध्यान न करो और इनके सब कष्टों को अनदेखा कर दो और परमेश्वर पर भरोसा रखो और भरोसे के लिए परमेश्वर पर्याप्त है।
(इस विवाह के लिए किसी इद्दत की आवश्यकता नहीं है, जिसका आदेश हमने पैग़ंबर को दिया है)। हे मानने वालो, (इसलिए कि) जब तुम मुसलमान स्त्रियों से विवाह करते हो, फिर उन्हें छूने से पहले उनको तलाक़ दे देते हो तो उनपर तुम्हारे लिए कोई इद्दत आवश्यक नहीं है जिसकी तुम गणना करोगे। परंतु (इस स्थिति में भी आवश्यक है कि) उन्हें कुछ जीवन सामग्री दो और उनको भले तरीक़े से विदा करो।
(और इसके लिए किसी पत्नी को तलाक़ देने की आवश्यकता भी नहीं है, इसलिए कि इस विवाह के होते हुए भी) हमने तुम्हारी सब पत्नियों को, जिनके महर तुम दे चुके हो, तुम्हारे लिए वैध बना दिया है, हे नबी। और (केवल उन्हीं को नहीं, उनके साथ) उन (पारिवारिक स्त्रियों) को भी वैध बना दिया है जो परमेश्वर ने तुम्हें युद्ध में जीती वस्तुओं में से दीं और उनमें से तुम्हारे स्वामित्व में आ गई हों और तुम्हारे चाचा की बेटियाँ और बुआओं की बेटियाँ और मामाओं की बेटियाँ और तुम्हारी मौसियों की बेटियाँ जिन्होंने तुम्हारे साथ प्रवास किया है और कोई मुसलमान स्त्री, यदि वे अपने आप को नबी के लिए भेंट कर दे, यदि नबी उसको विवाह में लेना चाहे। यह निर्देश अन्य मुसलमानों से अलग विशेष रूप से तुम्हारे लिए है। हम जानते हैं जो कुछ हमने उनकी पत्नियों और उनकी दासियों के विषय में उनपर अनिवार्य किया है। इसलिए केवल तुम्हारे लिए है कि (अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में) तुम पर कोई कठिनाई न रहे, और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। (और पत्नियों के वैवाहिक जीवन के अधिकारों में बराबरी भी अब तुम्हारे लिए आवश्यक नहीं है)। तुम उनमें जिसे चाहो अलग रखो और जिसे चाहो अपने पास रखो और जिनको (किसी समय) अलग रखा था, उनमें से फिर किसी को बुलवा लो तो इसमें भी तुम पर कोई दोष नहीं है। (हमने यह स्पष्टीकरण इसलिए दिया है कि इसके बाद) इसकी अधिक संभावना है कि उनकी आँखें ठंडी रहेंगी और वे दुखी नहीं होंगी और जो कुछ तुम उनको दोगे, सब उसपर संतुष्ट रहेंगी। परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम लोगों के दिलों में है और परमेश्वर ज्ञानी और सहनशील है। इनके बाद अब अन्य स्त्रियाँ तुम्हारे लिए वैध नहीं हैं और न यह वैध है की इनके स्थान पर और पत्नियां ले आओ, यद्यपि उनका सौंदर्य तुम्हें कितना ही प्रिय हो। अपितु, तुम्हारी दासियाँ इस नियम के अंतर्गत नहीं हैं। और परमेश्वर हर चीज़ पर निरीक्षक है।
(ये ढोंगी अपनी नीच हरकतों से नहीं रुक रहे, इसलिए) हे मानने वालो, तुम अब नबी के घरों में न जाया करो, सिवाय इसके कि जब तुमको किसी खाने पर आने की अनुमति दी जाए, तब भी इस प्रकार कि उसकी तैयारी की प्रतीक्षा में न रहो। हाँ जब तुमको बुलाया जाए तो (उसी समय) प्रवेश करो, फिर जब खाना खा लो तो उठकर चले जाओ और बातों में लगे हुए बैठे न रहो। इससे पैग़ंबर को पीड़ा होती है, परंतु वे तुमसे संकोच करते हैं और परमेश्वर सत्य वचन कहने में किसी की चिंता नहीं करता। और तुम्हें जब नबी की पत्नियों से कोई चीज़ मांगनी हो तो पर्दे के पीछे से मांगो। यह तुम्हारे दिलों के लिए भी अधिक पवित्र उपाय है और उनके दिलों के लिए भी। तुम्हारे लिए वैध नहीं कि तुम परमेश्वर के रसूल को कष्ट पहुंचाओ और न यह वैध है कि उसके बाद तुम उसकी पत्नियों से कभी विवाह करो। परमेश्वर के निकट यह बड़ी गंभीर बात है। तुम किसी चीज़ को व्यक्त करो या उसको छिपाओ, परमेश्वर के लिए समान है, इसलिए कि परमेश्वर हर चीज़ से अवगत है।
नबी की पत्नियों पर अपने पिताओं के सामने होने में, अपितु कोई पाप नहीं है और न अपने पुत्रों के, न अपने भाइयों के, न अपने भतीजों के, न अपने भांजों के, अपने मेल जोल की स्त्रियों के और न अपनी दासियों के सामने होने में कोई पाप है। (नबी के घर की स्त्रियो) तुम परमेश्वर से डरती रहो। निस्संदेह, परमेश्वर हर चीज़ पर दृष्टि रखने वाला है।
(ये ढोंगी नहीं जानते)। सत्य यह है कि परमेश्वर और उसके फ़रिश्ते नबी पर आशीर्वाद भेज रहे हैं। हे मानने वालो, (तुम्हारे लिए भी उचित आचरण यह है कि) तुम भी उस पर दुरूद और सलाम भेजो। परमेश्वर और उसके रसूल को जो लोग पीड़ा पहुंचा रहे हैं, उनपर परमेश्वर ने इस लोक और परलोक, दोनों में अभिशाप कर दिया है और उनके लिए उसने अपमानजनक दण्ड तैयार कर रखा है। और जो मुसलमान पुरुषों और मुसलमान स्त्रियों को (इसी प्रकार उनपर झूठे आरोप लगाकर), बिना इसके कि उन्होंने कुछ किया हो, पीड़ा दे रहे हैं, उन्हें भी जानना चाहिए कि उन्होंने बड़े लांछन और स्पष्ट पाप का भार अपने सर ले लिया है।
(इनकी शरारतों से अपनी सुरक्षा के लिए), हे नबी, तुम अपनी पत्नियों और अपनी बेटियों और सब मुसलमानों की पत्नियों को निर्देश दो कि (जोखिम के स्थानों पर जाएँ तो) अपनी चादरों में से कोई बड़ी चादर अपने ऊपर डाल लिया करें। इससे संभव है कि अलग पहचानी जाएंगी तो सताई न जाएंगी। इसके होते हुए भी (कोई ग़लती हुई तो) परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।1
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- इन शब्दों से भी यह बात स्पष्ट है, और आदेश का प्रसंग (सियाक़-व-सबाक़) भी यही बता रहा है, कि यह आदेश महिलाओं के लिए पर्दे/हिजाब का कोई विधान नहीं था, जैसा कि सामान्यतः लोगों ने समझ लिया है, बल्कि यह मुसलमान स्त्रियों के लिए उनकी अलग पहचान क़ायम कर देने की एक अस्थायी (वक़्ती) उपाय था, जो आवारा और लांछन लगाने वाले लोगों के दुष्प्रचार से उन्हें सुरक्षित रखने के लिए अपनाया गया था। ↩
ये ढोंगी यदि (इसके बाद भी) अपनी हरकतों से पीछे न हटे और वह भी जिनके दिलों में रोग है और जो मदीना में लोगों को भड़काने के लिए झूठ उड़ाने वाले हैं तो हम उनपर तुम्हें उकसा देंगे, फिर वे तुम्हारे साथ इस शहर में बहुत कम रह पाएंगे। उनपर अभिशाप होगा, जहाँ मिलेंगे, पकड़े जाएँगे और बिना संकोच के मार दिए जाएँगे। यही उन लोगों के बारे में परमेश्वर की अटल कार्यप्रणाली है जो पहले चल बसे हैं और परमेश्वर की इस कार्यप्रणाली में तुम कदापि कोई परिवर्तन नहीं पाओगे।
(तुम इस अंत से सचेत करते हो तो) लोग तुमसे क़यामत के बारे में पूछते हैं (कि जिस से डरा रहे हो, वह कहां रह गई)? इनसे कहो कि उसका ज्ञान तो केवल परमेश्वर के पास है और तुम्हें क्या पता, हो सकता है क़यामत पास ही आ चुकी हो।
सत्य यह है कि इस प्रकार के नकारने वालों पर परमेश्वर ने अभिशाप कर छोड़ा है और उनके लिए दहकती हुई आग तैयार कर रखी है। वे उस में सदा-सदा रहेंगे। वहां न अपने लिए कोई समर्थक पाएंगे, न सहायक। जिस दिन उनके चेहरे आग में उलट पलट किए जाएँगे, वे कहेंगे: काश, हमने परमेश्वर का आज्ञापालन किया होता और हमने उसके रसूल का आज्ञापालन किया होता! और कहेंगे कि हे हमारे प्रभु, हमने अपने सरदारों और अपने बड़ों की बात मानी तो उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया। हे हमारे प्रभु, उनको दुगना दण्ड दे और उनपर भारी अभिशाप कर।
हे मानने वालो, (इससे सीख प्राप्त करो और अपने पैग़ंबर के विषय में) उन लोगों के जैसे न हो जाओ जिन्होंने मूसा को पीड़ा पहुंचाई तो परमेश्वर ने उनके झूठे आरोपों से उसे बरी साबित किया और वह परमेश्वर के पास बड़ा सम्मानित था। हे मानने वालो, परमेश्वर से डरो और सीधी बात कहो। परमेश्वर इसके फलस्वरूप तुम्हारे कर्म तुम्हारे लिए सुधारेगा और तुम्हारे पापकर्मों को क्षमा कर देगा। सत्य यह है कि जिसने परमेश्वर और उसके रसूल का आज्ञापालन किया, उसने बड़ी सफलता प्राप्त कर ली है।
(आज्ञापालन की यह मांग उस इच्छाशक्ति के आधार पर की जाती है जो हमने मनुष्य को प्रदान की है)। हमने यह दायित्व धरती और समस्त आकाशों और पर्वतों के सामने प्रस्तुत किया था तो उन्होंने उसको उठाने से मना कर दिया था और उससे डर गए थे, परंतु मनुष्य ने उसको उठा लिया। सत्य यह है कि वह बड़ा ही अत्याचारी और भावनाओं के अधीन हो जाने वाला है। यह इसलिए प्रस्तुत किया गया था कि परमेश्वर (इसके आवश्यक परिणाम के रूप में) ढोंगी पुरुषों और ढोंगी स्त्रियों और मुश्रिक पुरुषों और मुश्रिक स्त्रियों को दण्ड दे, और मुसलमान पुरुषों और मुसलमान स्त्रियों को परमेश्वर अपनी कृपाओं से आभूषित करे। परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।