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सूरह 25–33

चौथा अध्याय

विषय

रिसालत को प्रमाणित करना1

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  1. रिसालत: अर्थात पैग़ंबरी या रसूलत्व (Prophethood) ↩

उसके माध्यम से क़ुरैश क़बीले को सचेत करना (इंज़ार) और शुभ सूचना देना (बशारत)

और मुसलमानों का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर)

परिचय

यह पवित्र क़ुरआन का चौथा अध्याय है। इसमें 'अल्-फ़ुर्क़ान' (25) से 'अल्-अहज़ाब' (33) तक नौ सूरतें हैं। इन सूरतों की विषय-वस्तु से यह मालूम होता है कि इनमें से पहली आठ सूरतें मक्का में और अंतिम सूरह 'अल्-अहज़ाब' मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद मदीना में अवतरित हुई है।

क़ुरआन के अन्य अध्यायों की तरह, इस अध्याय में भी यह बात ध्यान में रखी गई है कि यह मक्का में अवतरित (मक्की) सूरतों से शुरू होता है और एक मदीना-काल में अवतरित (मदनी) सूरह पर समाप्त होता है।

मुख्य रूप से इसमें संबोधन मक्का के क़ुरैश क़बीले से हैं। पिछले अध्याय की तरह, इन सूरतों में भी कुछ मौकों पर अहल-ए-किताब को क़ुरैश के संदर्भ में चेतावनी दी गई है, क्योंकि इन सूरतों के उतारने के समय वे भी क़ुरैश का समर्थन और पैग़ंबर मुहम्मद (स.) का विरोध करने के लिए मैदान में आ गए थे। शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) के विषयों में, हालांकि, नबी (स.) और उनके मानने वाले संबोधित हैं। इसलिए, अध्याय का समापन उन्हीं के साथ संबोधन पर हुआ है।1

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  1. अहल-ए-किताब: यहूदी व ईसाई ↩

इसका विषय रसालत को प्रमाणित करना, इसके माध्यम में क़ुरैश को सचेत करना (इंज़ार) और शुभ समाचार देना (बशारत), और मुसलमानों का तज़्कियह और तत्हीर है। नबी (स.) और क़ुरआन का महत्व और स्तर इसी संदर्भ में उनके मानने वालों पर स्पष्ट किया गया है।

इस अध्याय की सूरतें