सूरह 29

अल्-अन्कबूत्

मक्की · 69 आयतें · 32 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय रसालत को नकारने वालों को सचेत और भयभीत करना, उनकी शंकाओं का खंडन और मानने वालों के लिए, यदि वे दृढ़ता के साथ ईमान पर जमे रहें तो अच्छे अंत की शुभ सूचना देना (बशारत) है। पहली सूरह—अल्-अन्कबूत —में इसी के अनुसार उन्हें कष्टों और कठिनाइयों की भरमार में दृढ़ता और धैर्य का उपदेश किया गया है। इसके लिए पहली सूरह में तर्क का आधार अधिकतर ऐतिहासिक तथ्य और दूसरी में मानव अस्तित्व और प्रकृति तथा ब्रह्माण्ड की निशानियाँ हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. रिसालत: अर्थात पैग़ंबरी या रसूलत्व (Prophethood) ↩

इन सूरतों में यद्यपि कुछ स्थानों पर पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके अनुयायियों को भी संबोधित किया गया है, परंतु संबोधन की दिशा हर जगह मक्का के क़ुरैश ही की ओर है।

दोनों सूरतों की विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में परमेश्वर के रसूल (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जब वे सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत (इंज़ार-ए-आम) कर रहे थे और जब मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) और इस्लाम के नकारने वालों से संबंध तोड़ने (बराअत) का समय निकट आ चुका है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

الٓمٓ ﴿1﴾ أَحَسِبَ ٱلنَّاسُ أَن يُتْرَكُوٓا۟ أَن يَقُولُوٓا۟ ءَامَنَّا وَهُمْ لَا يُفْتَنُونَ ﴿2﴾ وَلَقَدْ فَتَنَّا ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۖ فَلَيَعْلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ وَلَيَعْلَمَنَّ ٱلْكَـٰذِبِينَ ﴿3﴾

यह सूरह 'अलिफ़ लाम मीम' है। क्या लोगों ने समझ रखा है कि केवल यह कहने पर छोड़ दिए जाएँगे कि हम मान चुके और उन्हें परखा न जाएगा? सत्य यह है कि हमने उन सब लोगों को परखा है, जो इनसे पहले हुए हैं। तो परमेश्वर उन लोगों को अवश्य जानेगा जो सच्चे हैं और झूठे लोगों को भी जान कर रहेगा।

أَمْ حَسِبَ ٱلَّذِينَ يَعْمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ أَن يَسْبِقُونَا ۚ سَآءَ مَا يَحْكُمُونَ ﴿4﴾ مَن كَانَ يَرْجُوا۟ لِقَآءَ ٱللَّهِ فَإِنَّ أَجَلَ ٱللَّهِ لَـَٔاتٍ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿5﴾ وَمَن جَـٰهَدَ فَإِنَّمَا يُجَـٰهِدُ لِنَفْسِهِۦٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِىٌّ عَنِ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿6﴾ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَنُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَحْسَنَ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿7﴾

और क्या जो (उनके साथ) बुराइयाँ कर रहे हैं, उन्होंने समझ लिया है कि हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाएँगे? (उन पर अफ़सोस), बहुत ही बुरा निर्णय है जो वे कर रहे हैं! (इसमें संदेह नहीं कि इस समय कठिनाइयों की भरमार है, परंतु) जो परमेश्वर से मिलने की आशा रखता हो, उसे संतुष्ट रहना चाहिए, इसलिए कि (प्रतिफल के लिए) परमेश्वर का निर्धारित समय अवश्य आने वाला है और परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। (उसे जानना चाहिए कि) जो हमारे लिए संघर्ष करते हैं तो वे अपने ही भले के लिए संघर्ष करते हैं, इसलिए कि परमेश्वर तो दुनिया वालों से निस्पृह है। और जो लोग ईमान पर जमे रहे और उन्होंने भले कर्म किए हैं, (वे विश्वास रखें कि) उनकी बुराइयाँ हम अवश्य उनसे दूर करेंगे और उनके कर्म का उन्हें सबसे उत्तम फल प्रदान करेंगे।

وَوَصَّيْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ بِوَٰلِدَيْهِ حُسْنًا ۖ وَإِن جَـٰهَدَاكَ لِتُشْرِكَ بِى مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَآ ۚ إِلَىَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿8﴾ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَنُدْخِلَنَّهُمْ فِى ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿9﴾

(परमेश्वर से बढ़कर किसी का अधिकार नहीं है)। हमने मनुष्य को उसके माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का उपदेश किया है, परंतु (साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि) यदि वे तुम्हारे पीछे पड़ जाएँ कि तुम किसी को मेरा सहभागी बनाओ जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है तो उनकी बात न मानना। तुम सबको मेरी ही ओर लौट कर आना है, फिर मैं तुम्हें बताऊंगा जो कुछ तुम करते रहे हो। और जो मान चुके और उन्होंने भले कर्म किए, उन्हें हम (उस दिन) अवश्य सदाचारियों में स्थान देंगे।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ فَإِذَآ أُوذِىَ فِى ٱللَّهِ جَعَلَ فِتْنَةَ ٱلنَّاسِ كَعَذَابِ ٱللَّهِ وَلَئِن جَآءَ نَصْرٌ مِّن رَّبِّكَ لَيَقُولُنَّ إِنَّا كُنَّا مَعَكُمْ ۚ أَوَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَعْلَمَ بِمَا فِى صُدُورِ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿10﴾ وَلَيَعْلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَلَيَعْلَمَنَّ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ ﴿11﴾

(यह परमेश्वर को मानने के लिए अनिवार्य है) और इधर लोगों की दशा यह है कि उनमें ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हमने परमेश्वर को माना है, परंतु जब उसी परमेश्वर के मार्ग में सताए जाते हैं तो लोगों के सताने को वे परमेश्वर के दण्ड के समान समझ लेते (और पीछे हट जाते) हैं। (यही लोग हैं कि) यदि तेरे प्रभु की ओर से कोई सहायता प्रकट होगी तो अवश्य कहेंगे कि हम तो आप लोगों के साथ थे। क्या लोगों के दिलों में जो कुछ है, उससे परमेश्वर भलीभांति परिचित नहीं है? (ये मानने का दावा कर रहे हैं तो अच्छे से समझ लें कि) परमेश्वर उन्हें अवश्य जानेगा जो वास्तव में मोमिन हैं और कपटी लोगों को भी जान कर रहेगा।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّبِعُوا۟ سَبِيلَنَا وَلْنَحْمِلْ خَطَـٰيَـٰكُمْ وَمَا هُم بِحَـٰمِلِينَ مِنْ خَطَـٰيَـٰهُم مِّن شَىْءٍ ۖ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ ﴿12﴾ وَلَيَحْمِلُنَّ أَثْقَالَهُمْ وَأَثْقَالًا مَّعَ أَثْقَالِهِمْ ۖ وَلَيُسْـَٔلُنَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ عَمَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ ﴿13﴾

और नकारने वाले (जो इनको पीड़ा दे रहे हैं), मानने वालों से कहते हैं कि तुम हमारे मार्ग पर चलते रहो और तुम्हारे पाप हम उठा लें, यद्यपि उनके पापकर्मों में से वे कुछ भी उठाने वाले नहीं हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे झूठे हैं। हाँ, अपने (पापकर्मों के) बोझ वे अवश्य उठाएंगे और अपने बोझों के साथ कुछ अन्य बोझ भी और जो मनगढ़ंत बातें वे कर रहे हैं, क़यामत के दिन उसके बारे में अवश्य उनसे पूछा जाएगा।

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦ فَلَبِثَ فِيهِمْ أَلْفَ سَنَةٍ إِلَّا خَمْسِينَ عَامًا فَأَخَذَهُمُ ٱلطُّوفَانُ وَهُمْ ظَـٰلِمُونَ ﴿14﴾ فَأَنجَيْنَـٰهُ وَأَصْحَـٰبَ ٱلسَّفِينَةِ وَجَعَلْنَـٰهَآ ءَايَةً لِّلْعَـٰلَمِينَ ﴿15﴾

(यही कुछ पहले के लोगों ने भी किया है)। हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा था तो वह पचास कम एक हज़ार वर्ष उन लोगों में रहा, (परंतु तब भी वे लोग नहीं माने तो) अंततः उन्हें तूफ़ान ने आ कर घेरा और वे अपने प्राणों पर अत्याचार कर रहे थे। फिर नूह को और नौका वालों को हमने बचा लिया और इस घटना को हमने दुनिया वालों के लिए एक महान निशानी बना दिया।

وَإِبْرَٰهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱتَّقُوهُ ۖ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿16﴾ إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوْثَـٰنًا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًا فَٱبْتَغُوا۟ عِندَ ٱللَّهِ ٱلرِّزْقَ وَٱعْبُدُوهُ وَٱشْكُرُوا۟ لَهُۥٓ ۖ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿17﴾

इसी प्रकार इब्राहीम को उसकी क़ौम की ओर भेजा, जब उसने अपनी क़ौम से कहा कि परमेश्वर की भक्ति करो और उससे डरो। यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम जानो। तुम परमेश्वर को छोड़कर केवल मूर्तियों को पूज रहे हो और इसके लिए झूठ गढ़ते हो। सत्य यह है कि जिन्हें तुम परमेश्वर को छोड़कर पूज रहे हो, वे तुम्हारी जीविका पर कोई नियंत्रण नहीं रखते। अतः परमेश्वर ही के यहाँ जीविका की खोज करो और उसी की भक्ति करो और उसी के आभारी रहो, तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे।

وَإِن تُكَذِّبُوا۟ فَقَدْ كَذَّبَ أُمَمٌ مِّن قَبْلِكُمْ ۖ وَمَا عَلَى ٱلرَّسُولِ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ ﴿18﴾

और यदि नकारोगे तो यह कोई नई बात नहीं है, इसलिए कि तुम से पहले बहुत सी क़ौमें नकार चुकी हैं और परमेश्वर के रसूल पर तो केवल अति स्पष्ट रूप से बात पहुंचा देने ही का दायित्व है।

أَوَلَمْ يَرَوْا۟ كَيْفَ يُبْدِئُ ٱللَّهُ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥٓ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٌ ﴿19﴾ قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ بَدَأَ ٱلْخَلْقَ ۚ ثُمَّ ٱللَّهُ يُنشِئُ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْـَٔاخِرَةَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿20﴾ يُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ وَيَرْحَمُ مَن يَشَآءُ ۖ وَإِلَيْهِ تُقْلَبُونَ ﴿21﴾ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ ﴿22﴾ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَلِقَآئِهِۦٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَئِسُوا۟ مِن رَّحْمَتِى وَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿23﴾

क्या इन्होंने देखा नहीं कि परमेश्वर किस प्रकार उत्पत्ति करता है, फिर उसको दोहरा देता है? सत्य यह है कि परमेश्वर के लिए यह अत्यंत सरल है। इनसे कहो कि धरती में चलो फिरो और देखो कि परमेश्वर ने किस प्रकार उत्पत्ति की, फिर वही परमेश्वर उसे पुनः उठा खड़ा करेगा। सत्य यह है कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। (फिर किसी के अधिकार में नहीं होगा कि उसके किसी निर्णय में हस्तक्षेप करे)। वह जिसको चाहेगा, (अपने नियम अनुसार) दण्ड देगा और जिस पर चाहेगा, दया करेगा और तुम उसी की ओर पलटाए जाओगे। (लोगो), न तुम पृथ्वी में परमेश्वर के नियंत्रण से बाहर निकल सकते हो, न आकाश में, और परमेश्वर के अतिरिक्त न तुम्हारी कोई बिगड़ी बनाने वाला है, न सहायता करने वाला। और जिन्होंने परमेश्वर की आयतों और उससे भेंट को नकार दिया है, वही हैं कि मेरी दया से वंचित होकर निराश हो चुके और वही हैं कि जिनके लिए कष्टदायक यातना है।1

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  1. यहाँ से आगे आयत 23 तक परमेश्वर की ओर से एक अंतर्वेशन (insertion/तज़्मीन) है। ↩
فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ ٱقْتُلُوهُ أَوْ حَرِّقُوهُ فَأَنجَىٰهُ ٱللَّهُ مِنَ ٱلنَّارِ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿24﴾

तो (इब्राहीम ने अपना संदेश पेश किया तो) उसकी क़ौम का उत्तर इसके अतिरिक्त कुछ नहीं था कि आपस में कहने लगे: इसकी हत्या कर दो या जला दो। फिर परमेश्वर ने उसको आग से बचा लिया। इसमें उन लोगों के लिए अवश्य बहुत सी निशानियाँ हैं जो मान चुके हैं।

وَقَالَ إِنَّمَا ٱتَّخَذْتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ أَوْثَـٰنًا مَّوَدَّةَ بَيْنِكُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ ثُمَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يَكْفُرُ بَعْضُكُم بِبَعْضٍ وَيَلْعَنُ بَعْضُكُم بَعْضًا وَمَأْوَىٰكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن نَّـٰصِرِينَ ﴿25﴾

उसने कहा: तुमने परमेश्वर को छोड़ जो मूर्तियाँ बनाई हैं तो दुनिया के जीवन तक केवल आपस की मित्रता में बना लिए हैं। फिर क़यामत आएगी तो उस दिन तुम में से हर एक दूसरे को नकारेगा और एक दूसरे को अभिशप्त करेगा और तुम्हारा ठिकाना आग होगा और (इनमें से) कोई वहाँ तुम्हारा सहायक नहीं बनेगा।

فَـَٔامَنَ لَهُۥ لُوطٌ ۘ وَقَالَ إِنِّى مُهَاجِرٌ إِلَىٰ رَبِّىٓ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿26﴾

उस समय लूत ने उसकी पुष्टि की और इब्राहीम ने (जब यह देखा कि उसके अतिरिक्त कोई व्यक्ति भी मानने के लिए तैयार नहीं है तो) कहा: मैं अपने प्रभु की ओर प्रवास करता हूँ। निस्संदेह, वही प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।

وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَجَعَلْنَا فِى ذُرِّيَّتِهِ ٱلنُّبُوَّةَ وَٱلْكِتَـٰبَ وَءَاتَيْنَـٰهُ أَجْرَهُۥ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿27﴾

(इसी दृढ़ता के फलस्वरूप) इब्राहीम को हमने इस्हाक़ और याकूब प्रदान किए और उसके वंश में नुबुव्वत जारी की और उन्हें ईश्वरीय ग्रंथ का धारण करने वाला बनाया और उसका फल उसे इस लोक में दिया और परलोक में भी वह अवश्य हमारे सदाचारी भक्तों में से होगा।

وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلْفَـٰحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿28﴾ أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلرِّجَالَ وَتَقْطَعُونَ ٱلسَّبِيلَ وَتَأْتُونَ فِى نَادِيكُمُ ٱلْمُنكَرَ ۖ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ ٱئْتِنَا بِعَذَابِ ٱللَّهِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿29﴾

इसी प्रकार लूत को रसूल बनाकर भेजा, जब उसने अपनी क़ौम से कहा कि तुम लोग स्पष्ट कुकर्म के दोषी होते हो। तुमसे पहले दुनिया की किसी क़ौम ने (इस ढिठाई के साथ और इस प्रकार क़ौमी स्तर पर) इसको नहीं किया। क्या तुम पुरुषों के पास जाते हो और प्रकृति का मार्ग काटते हो और अपनी सभाओं में (सार्वजनिक रूप से) इस बुराई को करते हो? इस पर उसकी क़ौम का उत्तर इसके अतिरिक्त कुछ नहीं था कि उन्होंने कहा: यदि तुम सच्चे हो तो हम पर परमेश्वर का दण्ड ले आओ।

قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْمُفْسِدِينَ ﴿30﴾ وَلَمَّا جَآءَتْ رُسُلُنَآ إِبْرَٰهِيمَ بِٱلْبُشْرَىٰ قَالُوٓا۟ إِنَّا مُهْلِكُوٓا۟ أَهْلِ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةِ ۖ إِنَّ أَهْلَهَا كَانُوا۟ ظَـٰلِمِينَ ﴿31﴾ قَالَ إِنَّ فِيهَا لُوطًا ۚ قَالُوا۟ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَن فِيهَا ۖ لَنُنَجِّيَنَّهُۥ وَأَهْلَهُۥٓ إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ كَانَتْ مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ ﴿32﴾

लूत ने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, इन दुष्ट लोगों के विरुद्ध मेरी सहायता कर। (और उसकी यह प्रार्थना इस प्रकार स्वीकार हुई कि) हमारे दूत जब इब्राहीम के पास शुभ सूचना लेकर आए तो उन्होंने उसे बताया कि हम इस बस्ती के लोगों का सर्वनाश करने वाले हैं, इसलिए कि इसके लोग अत्याचारी हो चुके हैं। इब्राहीम ने कहा: उसमें तो लूत भी है। उन्होंने उत्तर दिया कि उसमें जो लोग भी हैं, उन्हें हम भलीभांति जानते हैं। (आप संतुष्ट रहिए), हम लूत और उसके सब घर वालों को अवश्य बचा लेंगे, उसकी बीवी के सिवा। वह अपितु, पीछे रह जाने वालों में से होगी।

وَلَمَّآ أَن جَآءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا سِىٓءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالُوا۟ لَا تَخَفْ وَلَا تَحْزَنْ ۖ إِنَّا مُنَجُّوكَ وَأَهْلَكَ إِلَّا ٱمْرَأَتَكَ كَانَتْ مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ ﴿33﴾ إِنَّا مُنزِلُونَ عَلَىٰٓ أَهْلِ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةِ رِجْزًا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ ﴿34﴾ وَلَقَد تَّرَكْنَا مِنْهَآ ءَايَةًۢ بَيِّنَةً لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ ﴿35﴾

और जब यह हुआ कि हमारे दूत लूत के पास पहुंचे तो उनके आने से वह बहुत चिंतित और दुखी हुआ। (उसकी चिंता देख कर) उन्होंने आश्वासन दिया कि न घबराओ, न दुखी हो। तुम्हारी बीवी के सिवा, हम तुम्हें और तुम्हारे सब घर वालों को बचा लेंगे। वह पीछे रह जाने वालों में से है। इस बस्ती के लोगों पर हम उनके अवज्ञाकारियों के परिणामस्वरूप आकाश से दण्ड उतारने वाले हैं। (क़ुरैश के लोगो), इसकी एक स्पष्ट निशानी हमने उन लोगों के लिए बाक़ी रखी है जो बुद्धि से काम लें।

وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا فَقَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱرْجُوا۟ ٱلْيَوْمَ ٱلْـَٔاخِرَ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ﴿36﴾ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دَارِهِمْ جَـٰثِمِينَ ﴿37﴾

और मद्यन वालों की ओर हमने उनके भाई शुऐब को भेजा, फिर उसने आह्वान किया कि मेरी क़ौम के लोगो, परमेश्वर की भक्ति करो और अंतिम दिन की प्रतीक्षा में रहो और धरती में बिगाड़ फैलाते न फिरो। फिर उन्होंने उसे झूठा कह दिया तो अंत में एक भूकंप ने उन्हें पकड़ लिया। फिर वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए।

وَعَادًا وَثَمُودَا۟ وَقَد تَّبَيَّنَ لَكُم مِّن مَّسَـٰكِنِهِمْ ۖ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَكَانُوا۟ مُسْتَبْصِرِينَ ﴿38﴾

आद और समूद को भी हमने इसी प्रकार नष्ट कर दिया। उनकी बस्तियों के अवशेष भी तुम्हारे लिए खुले हुए हैं। उनके कर्म शैतान ने उनके लिए सुंदर बना दिए और उन्हें सन्मार्ग से रोक दिया, यद्यपि वे बड़े ही बुद्धिमान लोग थे।

وَقَـٰرُونَ وَفِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ ۖ وَلَقَدْ جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كَانُوا۟ سَـٰبِقِينَ ﴿39﴾

और क़ारून और फ़िरऔन और हामान का भी नाश कर दिया। मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ ले कर आ गया था। फिर भी उन्होंने धरती में घमंड किया और वे भी हमसे कहीं भाग कर नहीं जा सके।

فَكُلًّا أَخَذْنَا بِذَنۢبِهِۦ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِ حَاصِبًا وَمِنْهُم مَّنْ أَخَذَتْهُ ٱلصَّيْحَةُ وَمِنْهُم مَّنْ خَسَفْنَا بِهِ ٱلْأَرْضَ وَمِنْهُم مَّنْ أَغْرَقْنَا ۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ﴿40﴾

अतः इनमें से हर एक को हमने उसके पापकर्म के फलस्वरूप पकड़ा, फिर उनमें से कोई था कि उस पर हमने पथराव करने वाली हवा भेज दी और कोई था कि उसको कड़क ने पकड़ लिया और उनमें से कोई था कि उसे हमने भूमि में धंसा दिया और कोई था कि उसको हमने डुबो दिया। सत्य यह है कि परमेश्वर उनपर अत्याचार करने वाला नहीं था, अपितु वे स्वयं ही अपने प्राणों पर अत्याचार करने वाले थे।

مَثَلُ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوْلِيَآءَ كَمَثَلِ ٱلْعَنكَبُوتِ ٱتَّخَذَتْ بَيْتًا ۖ وَإِنَّ أَوْهَنَ ٱلْبُيُوتِ لَبَيْتُ ٱلْعَنكَبُوتِ ۖ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿41﴾ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِۦ مِن شَىْءٍ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿42﴾ وَتِلْكَ ٱلْأَمْثَـٰلُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ ۖ وَمَا يَعْقِلُهَآ إِلَّا ٱلْعَـٰلِمُونَ ﴿43﴾

जिन लोगों ने परमेश्वर के सिवा दूसरे बिगड़ी बनाने वाले बना लिए हैं, उनका उदाहरण मकड़ी जैसा है कि उसने एक घर बनाया और कोई संदेह नहीं कि सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का घर ही होता है। काश, ये लोग जानते! परमेश्वर के अतिरिक्त जिन चीज़ों को भी ये पुकारते हैं, सत्य यह है कि परमेश्वर उन्हें अच्छे से जानता है और वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है। ये उदाहरण हम लोगों की समझ के लिए देते हैं, परंतु इनको वही समझते हैं जो ज्ञानी हैं।

خَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ ﴿44﴾ ٱتْلُ مَآ أُوحِىَ إِلَيْكَ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ ۖ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ تَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ ۗ وَلَذِكْرُ ٱللَّهِ أَكْبَرُ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تَصْنَعُونَ ﴿45﴾

धरती और समस्त आकाशों की उत्पत्ति परमेश्वर ने सत्य के साथ की है। इसमें अवश्य बहुत बड़ी निशानी है, उनके लिए जो मानने वाले हों। (ये ध्यान नहीं दे रहे तो इनकी परवाह न करो, हे पैग़ंबर, और) उस ग्रंथ को पढ़ते रहो जो तुम्हारी ओर वह्य की गई है और नमाज़ का प्रबंध रखो। निस्संदेह नमाज़ निर्लज्जता और बुराई से रोकती है। (यह परमेश्वर की याद है) और सत्य यह है कि परमेश्वर की याद बड़ी चीज़ है। (तुम उस पर भरोसा रखो, इसलिए कि) परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम लोग करते हो।

وَلَا تُجَـٰدِلُوٓا۟ أَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ إِلَّا بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْهُمْ ۖ وَقُولُوٓا۟ ءَامَنَّا بِٱلَّذِىٓ أُنزِلَ إِلَيْنَا وَأُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَإِلَـٰهُنَا وَإِلَـٰهُكُمْ وَٰحِدٌ وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ ﴿46﴾

और अहल-ए-किताब (इस आह्वान की ओर ध्यान दें तो उन) के साथ उसी प्रकार बहस करो जो अच्छा है, सिवाय उनके जो उनमें से अत्याचारी हैं। (उनके साथ किसी बहस की आवश्यकता नहीं है)। तुम उन्हें बताओ कि हम उसे भी मानते हैं जो हमारी ओर उतारा गया और उसे भी जो तुम्हारी ओर उतारा गया था। हमारा उपास्य और तुम्हारा उपास्य एक ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं।

وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ ۚ فَٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۖ وَمِنْ هَـٰٓؤُلَآءِ مَن يُؤْمِنُ بِهِۦ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَّا ٱلْكَـٰفِرُونَ ﴿47﴾ وَمَا كُنتَ تَتْلُوا۟ مِن قَبْلِهِۦ مِن كِتَـٰبٍ وَلَا تَخُطُّهُۥ بِيَمِينِكَ ۖ إِذًا لَّٱرْتَابَ ٱلْمُبْطِلُونَ ﴿48﴾ بَلْ هُوَ ءَايَـٰتٌۢ بَيِّنَـٰتٌ فِى صُدُورِ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَّا ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿49﴾

हमने, (हे पैग़ंबर), इसी प्रकार यह ग्रंथ तुम्हारी ओर उतारा है। तो जिन को हमने (इससे पूर्व) धर्मग्रंथ दिया है, वे इसे मान लेंगे और उनमें से कुछ इसे मान भी रहे हैं, और हमारी आयतों को तो वही नकारते हैं जो नकारने का निर्णय किए बैठे हैं। तुम इससे पूर्व न कोई पुस्तक पढ़ते थे, न उसको अपने हाथ से लिखते थे। यदि ऐसा होता तो ये नकारने वाले अपितु, संदेह में पड़ सकते थे। नहीं, (इसमें किसी संदेह की संभावना नहीं है) अपितु यह क़ुरआन तो खुली हुई आयतें है उन लोगों के सीने में जिन्हें ज्ञान मिला है। और हमारी आयतों को नकारते तो वही हैं जो अपने प्राणों पर अत्याचार करने वाले हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात् इसे उसी सिद्धांत के अनुसार उतारा है जो ऊपर बताया जा चुका है — कि परमेश्वर का धर्म सदा से एक ही रहा है। ↩
وَقَالُوا۟ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ ءَايَـٰتٌ مِّن رَّبِّهِۦ ۖ قُلْ إِنَّمَا ٱلْـَٔايَـٰتُ عِندَ ٱللَّهِ وَإِنَّمَآ أَنَا۠ نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴿50﴾ أَوَلَمْ يَكْفِهِمْ أَنَّآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَرَحْمَةً وَذِكْرَىٰ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿51﴾ قُلْ كَفَىٰ بِٱللَّهِ بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ شَهِيدًا ۖ يَعْلَمُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱلْبَـٰطِلِ وَكَفَرُوا۟ بِٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿52﴾

ये (दुष्ट) कहते हैं कि इसके प्रभु की ओर से इस पर निशानियाँ क्यों नहीं उतारी गईं? इनसे कहो, निशानियाँ तो परमेश्वर ही के पास हैं, मैं तो केवल एक स्पष्ट सचेत करने वाला हूं। क्या इनके लिए पर्याप्त नहीं है कि हमने तुम पर यह ग्रंथ उतारा है कि इन्हें पढ़कर सुनाया जा रहा है? इसमें अवश्य उन लोगों के लिए दया है और स्मरण भी जो मान लें। (ये नकारने का निर्णय किए बैठे हैं या इनके लिए वास्तव में सत्य स्पष्ट नहीं हुआ)? कह दो कि (इस पर) मेरे और तुम्हारे बीच परमेश्वर गवाही के लिए पर्याप्त है। वह जानता है जो कुछ धरती और समस्त आकाशों में है। (अपितु, याद रखो कि) जिन्होंने असत्य को माना और जिन्होंने परमेश्वर को नकार दिया है, वही असफल होने वाले हैं।

وَيَسْتَعْجِلُونَكَ بِٱلْعَذَابِ ۚ وَلَوْلَآ أَجَلٌ مُّسَمًّى لَّجَآءَهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَيَأْتِيَنَّهُم بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿53﴾ يَسْتَعْجِلُونَكَ بِٱلْعَذَابِ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿54﴾ يَوْمَ يَغْشَىٰهُمُ ٱلْعَذَابُ مِن فَوْقِهِمْ وَمِن تَحْتِ أَرْجُلِهِمْ وَيَقُولُ ذُوقُوا۟ مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿55﴾

ये तुमसे दण्ड के लिए जल्दी मचाए हुए हैं। इन पर दण्ड आ जाता, यदि उसके लिए एक समय निर्धारित न होता। (इनका आचरण यही रहा तो) निस्संदेह (एक दिन) वह अचानक इन पर आ जाएगा और इन्हें सूचना भी नहीं होगी। (इन पर अफ़सोस), ये तुमसे दण्ड के लिए जल्दी मचाए हुए हैं, यद्यपि नरक इन नकारने वालों को घेरे में ले चुका है। ये उस दिन का विचार करें, जिस दिन दण्ड इनके ऊपर से और इनके पाँव के नीचे से इन्हें ढक लेगा और कहा जाएगा कि अब चखो उसका स्वाद जो करते रहे हो।

يَـٰعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّ أَرْضِى وَٰسِعَةٌ فَإِيَّـٰىَ فَٱعْبُدُونِ ﴿56﴾ كُلُّ نَفْسٍ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۖ ثُمَّ إِلَيْنَا تُرْجَعُونَ ﴿57﴾ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَنُبَوِّئَنَّهُم مِّنَ ٱلْجَنَّةِ غُرَفًا تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ نِعْمَ أَجْرُ ٱلْعَـٰمِلِينَ ﴿58﴾ ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ ﴿59﴾ وَكَأَيِّن مِّن دَآبَّةٍ لَّا تَحْمِلُ رِزْقَهَا ٱللَّهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿60﴾

मेरे बंदो जो मान चुके हो, (ये तुम पर अत्याचार करने से नहीं रुकते तो प्रवास करके यहाँ से निकल जाओ)। मेरी धरती, निस्संदेह फैली हुई है, तो (जहां रहकर बन पड़े) तुम मेरी ही भक्ति करो। (यह दुनिया सदा के लिए नहीं है, यहाँ) प्रत्येक प्राणी को मृत्यु का स्वाद चखना है, फिर तुम हमारी ही ओर लौटाए जाओगे। और जो मान चुके और उन्होंने भले कर्म किए हैं, उन्हें हम अवश्य स्वर्ग की उच्च कोठियों में स्थान देंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वे उनमें सदा रहेंगे। कैसा अच्छा फल है कर्म करने वालों के लिए। जिन्होंने धैर्य रखा और हर परिस्थिति में अपने प्रभु ही पर भरोसा करते रहे। (यह न समझो कि यहाँ से निकले तो खाओगे कहां से)। कितने पशु हैं जो अपनी जीविका उठाए नहीं फिरते। परमेश्वर ही उनको जीविका देता है और तुम्हें भी और वह सुनने वाला और जानने वाला है।

وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَسَخَّرَ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ ﴿61﴾ ٱللَّهُ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ وَيَقْدِرُ لَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿62﴾ وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّن نَّزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ مِنۢ بَعْدِ مَوْتِهَا لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۚ قُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ﴿63﴾

(सत्य यह है कि इनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है)। यदि तुम इनसे पूछो कि धरती और समस्त आकाशों की रचना किसने की है और सूरज और चाँद को किसने नियंत्रित कर रखा है तो अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर ने। फिर कहां से टेढ़े हो जाते हैं! (क्या इनके देवता इन्हें खिलाते हैं? कदापि नहीं), परमेश्वर ही अपने भक्तों में से जिस की जीविका चाहता है, बढ़ाता है और जिसकी चाहता है, कम कर देता है। निस्संदेह, परमेश्वर हर चीज़ का जानने वाला है। और यदि तुम इनसे पूछो कि आकाश से किसने पानी बरसाया, फिर उससे धरती को उसके मुर्दा हो जाने के बाद जीवित कर दिया तो अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर ने। कहो, आभार का पात्र भी परमेश्वर है, परंतु इनमें से अधिकांश समझते नहीं हैं।

وَمَا هَـٰذِهِ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌ ۚ وَإِنَّ ٱلدَّارَ ٱلْـَٔاخِرَةَ لَهِىَ ٱلْحَيَوَانُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿64﴾

(इसका कारण यह है कि दुनिया पर मुग्ध हुए हैं और) सत्य यह है कि यह दुनिया का जीवन खेल तमाशे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। असली जीवन का घर तो परलोक का घर है, यदि ये जानते!

فَإِذَا رَكِبُوا۟ فِى ٱلْفُلْكِ دَعَوُا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمْ إِلَى ٱلْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ ﴿65﴾ لِيَكْفُرُوا۟ بِمَآ ءَاتَيْنَـٰهُمْ وَلِيَتَمَتَّعُوا۟ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ﴿66﴾

(फिर यही लोग हैं कि मानो ऐसे यात्री हैं कि) जब नौका में सवार होते हैं (और वह तूफ़ान में घिर जाती है) तो अपनी आज्ञाकारिता को परमेश्वर के लिए विशुद्ध करके उसको पुकारते हैं। फिर जब परमेश्वर मुक्ति देकर उन्हें भूमि की ओर ले जाता है तो मुक्ति पाते ही परमेश्वर के सहभागी बनाने लगते हैं कि हमने जो वरदान उनको दिया है, उसकी अकृतज्ञता करें और (दुनिया के इस जीवन से) कुछ दिन और लाभ उठाने वाले हो लें। (इसका परिणाम क्या है?) अब आगे जान लेंगे।

أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا ءَامِنًا وَيُتَخَطَّفُ ٱلنَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْ ۚ أَفَبِٱلْبَـٰطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ ٱللَّهِ يَكْفُرُونَ ﴿67﴾ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِٱلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُۥٓ ۚ أَلَيْسَ فِى جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَـٰفِرِينَ ﴿68﴾

क्या इन्होंने देखा नहीं कि हमने एक सुरक्षित घर बनाया (जिसमें ये सुखदायक जीवन बिता रहे हैं), यद्यपि इनके आसपास लोग उचक लिए जाते हैं? क्या फिर भी असत्य ही को मानते हैं और परमेश्वर के इस वरदान की अकृतज्ञता करते हैं? उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो परमेश्वर पर झूठ मढ़ दे या सत्य को झूठा कह दे, जबकि वह उसके पास आ चुका है? क्या ऐसे नकारने वालों का ठिकाना नरक में नहीं है!

وَٱلَّذِينَ جَـٰهَدُوا۟ فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَمَعَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿69﴾

(तुम मेरे भक्तों को शुभ सूचना दो, हे पैग़ंबर कि) जो लोग हमारे मार्ग में कठिनाइयां झेल रहे हैं, उनपर हम अपने मार्ग अवश्य खोलेंगे और निस्संदेह परमेश्वर उनके साथ है जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं।