सूरह 28
अल्-क़सस्
मक्की · 88 आयतें · 43 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
यह सूरह 'ता-सीन-मीम' है। यह अत्यंत स्पष्ट ग्रंथ की आयतें हैं। हम उन लोगों के मार्गदर्शन के लिए जो मानना चाहें, मूसा और फ़िरऔन की कथा का कुछ भाग ठीक-ठीक तुम्हें सुनाते हैं।
घटना यह है कि मिस्र की धरती में फ़िरऔन ने सर उठा लिया था। उसके वासियों को उसने अनेक समुदायों में विभाजित कर दिया था। उनमें से एक समुदाय को उसने कठोरता से दबा रखा था, उनके बेटों का वह ढूंढ-ढूंढ कर नरसंहार करता था और उनकी स्त्रियों को जीवित रखता था। वास्तव में वह फ़साद करने वालों में से था। और इधर हमने संकल्प कर लिया था कि उन लोगों पर कृपा करे जो उस देश में दबा कर रखे गए थे और उनको नेतृत्व प्रदान करें और उन्हें देश का उत्तराधिकारी बनाएं और उन्हें उस देश में सत्ता प्रदान करें और फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को उनसे वही कुछ दिखा दें जिससे वे डरते थे।
(अतः मूसा का जन्म हुआ तो बच्चों की हत्या की जा रही थी)। हमने मूसा की माता को (इसी आधार पर) प्रेरणा की कि अभी इसे दूध पिलाओ, फिर जब इसके बारे में तुम्हें (जान का) जोखिम हो तो इसे नदी में डाल देना और भयभीत और दुखी न होना, हमने निर्णय कर लिया है कि इसको हम वापस तुम्हारे पास पहुंचा देंगे और इसे पैग़ंबरों में से (एक पैग़ंबर) बनाएंगे।
(उसने अंततः यही किया), फिर फ़िरऔन के घरवालों ने (नदी में बहते देख कर) उसको उठा लिया कि (परमेश्वर की बात पूरी हो और) इसके बदले में वह उनका शत्रु और उनके लिए दुख का कारण बने। सत्य यह है कि फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाएं बड़ी पापी थीं (कि अपने आप को सभी अधिकारों और सत्ता का स्वामी समझते रहे)। फ़िरऔन की पत्नी ने (बच्चे को देखा तो फ़िरऔन से) कहा: यह तो मेरी और तुम्हारी आँखों की ठंडक है, तुम लोग इसकी हत्या न करो। हो सकता है कि यह हमें लाभ पहुँचाए या हम इसे बेटा ही बना लें। (वे ये बातें कर रहे थे) और उन्हें कोई ख़बर न थी कि उनके साथ क्या होने वाला है।
उधर मूसा की माता का दिल पूरा व्याकुल हो गया। यदि हम उसके दिल को न सँभालते कि उसको हमारे वचन पर विश्वास रहे तो वह उसका भेद खोल कर रहती। और (इसी व्याकुलता में) उसने बच्चे की बहन से कहा कि उसके पीछे-पीछे जा। अतः वह (अजनबी बन कर) उसको दूर से देखती रही और फ़िरऔन के लोगों को इसकी कोई जानकारी नहीं हुई।
और इधर दूध पिलाने वाली दाइयों से हमने मूसा को पहले ही रोक रखा था। अतः (मूसा की बहन वहाँ पहुंची और यह देखा तो) उसने उनसे कहा: तुम लोग कहो तो मैं तुम्हें एक परिवार का पता बताऊँ जो तुम लोगों के लिए इसे पालेंगे और बड़ी शुभ चिंता से इसकी देखभाल करेंगे। इस प्रकार मूसा को हमने उसकी माता की ओर लौटा दिया कि उसकी आँखें ठंडी हों और वह दुखी न हो और इसलिए कि वह अच्छे से जान ले कि परमेश्वर का वचन पूरा होकर रहता है, परंतु अधिकांश लोग नहीं जानते।
(फ़िरऔन की छत्रछाया में पल कर यही) मूसा जब अपनी जवानी को पहुंचा और सब प्रकार से परिपक्व हो गया तो हमने उसे ज्ञान तथा विद्या से आभूषित किया। अच्छे लोगों को हम इसी प्रकार प्रतिफल देते हैं।
(फिर एक दिन संयोग से) उसने ऐसे समय नगर में प्रवेश किया, जब कि नगर के लोग बेखबर होते थे तो उसने देखा कि दो व्यक्ति वहाँ लड़ रहे हैं। एक उसकी अपनी क़ौम से था और दूसरा उसके शत्रुओं की क़ौम में से। फिर उसकी क़ौम के आदमी ने उस व्यक्ति के विरुद्ध उसकी सहायता चाही जो उसके शत्रुओं में से था। इस पर मूसा ने उसको घूसा मारा और उसकी हत्या कर दी। (यह कांड होते ही) मूसा ने कहा: यह तो मुझसे शैतानी काम हो गया है। इसमें संदेह नहीं कि शैतान एक स्पष्ट भटकाने वाला शत्रु है। उसने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, मैंने अपने आप पर अत्याचार किया है, तो मुझे क्षमा कर दे तो उसके प्रभु ने उसे क्षमा कर दिया। सत्य यह है कि वही क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। मूसा ने कहा: मेरे प्रभु, यह कृपा जो तुम ने मुझपर की है, बस इसके बाद तो अब मैं इस प्रकार के अपराधियों का कभी सहायक नहीं बनूँगा।
(रात ठीक से बीत गई) तो अगले दिन मूसा ने सुबह को डरते-डरते, कुछ जिज्ञासापूर्वक नगर में प्रवेश किया। फिर क्या देखता है कि वही जिसने कल उसे सहायता के लिए पुकारा था, आज भी उसे पुकार रहा है मूसा ने उससे कहा: अब कोई संदेह नहीं रहा कि तुम स्वयं एक स्पष्ट शरारती व्यक्ति हो। फिर (दोनों को समझाते समझाते) जब बात यहाँ तक पहुँच गई कि मूसा ने चाहा की अब अपने और उसके शत्रु को पकड़े (कि वह भी झगड़ना बंद करे) तो (उसे संदेह हुआ कि यह मुझे पकड़ना चाहते हैं, इसलिए) वह बोल उठा कि मूसा, जिस प्रकार कल एक व्यक्ति की तुमने हत्या कर दी थी, क्या आज उसी प्रकार मेरी हत्या करना चाहते हो? तुम यही चाहते हो कि इस देश में तानाशाह बन कर रहो, तुम यहाँ सुधारक बन कर नहीं रहना चाहते।
(यह बात राजसभा में पहुंची तो) नगर के दूरवर्ती किनारे से, (जहां राजमहल थे), एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया। उसने बताया कि मूसा, राजसभा के बड़े तुम्हारी हत्या पर विमर्श कर रहे हैं, इसलिए यहाँ से निकल जाओ। विश्वास रखो, मैं तुम्हारे शुभचिंतकों में से हूँ। अतः मूसा वहाँ से डरता हुआ और सतर्कतापूर्वक निकल गया। (उस समय) उसने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, मुझे इन अत्याचारी लोगों से मुक्ति प्रदान कर दे।
(मिस्र से निकल कर) जब मूसा (अंत में) मद्यन की ओर चला तो (अपने दिल में) कहा: आशा है कि मेरा प्रभु मुझे सीधा मार्ग दिखाएगा। (अतः चलते-चलते) जब वह मद्यन के कुएं पर पहुंचा तो उसने देखा कि वहाँ लोगों की एक भीड़ लगी है और वे अपने पशुओं को पानी पिला रहे हैं और यह भी देखा कि उनसे अलग दो महिलाएं हैं जो अपने पशु समूह को रोके खड़ी हैं। उसने पूछा: तुम्हारा क्या मामला है? उन्होंने कहा: हम अपने पशुओं को पानी नहीं पिला सकतीं, जब तक ये चरवाहे अपने पशु न हटा लें। और (इस काम के लिए हमें ही आना पड़ता है, इसलिए कि) हमारे पिता बहुत बूढ़े हैंं। यह सुनकर मूसा ने उन दोनों के लिए उनके पशुओं को पानी पिला दिया। फिर हटकर छाँव की ओर आया और प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, इस समय जो भलाई भी तू मेरे लिए उतार दे, मैं उसका अभिलाषी हूँ।
फिर (कुछ अधिक समय नहीं बीत गया कि) उनमें से एक शरमाती हुई उसके पास चलकर आई और कहने लगी: मेरे पिता आपको बुला रहे हैं ताकि हमारे लिए आपने जो पानी पिलाया है, उसका प्रतिफल आपको दें। (मूसा चल पड़ा), फिर जब उसके पिता के पास पहुंचा और अपनी सारी कथा उसे सुनाई तो उसने तसल्ली दी कि अब डरो नहीं, तुम अत्याचारी लोगों से बच निकले हो।
उन महिलाओं में से एक ने (यह सब देखा तो एक अवसर पर अपने पिता से) कहा: पिताजी, इसे नौकरी पर रख लीजिए, इसलिए कि सबसे अच्छा आदमी जिससे आप नौकरी पर रखें, वही हो सकता है जो बलवान और विश्वसनीय हो।
उसके पिता ने मूसा से कहा: मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दो बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ कर दूँ, इस शर्त के साथ कि तुम आठ साल मेरे यहाँ काम करो। फिर यदि दस साल ही पूरे कर दो तो यह तुम्हारी इच्छा है। मैं तुम पर कोई बोझ नहीं डालना चाहता। परमेश्वर ने चाहा तो आगे तुम मुझे एक भला व्यक्ति पाओगे। मूसा ने कहा: (ठीक है), यह बात मेरे और आपके बीच तय हो गई। मैं इन दोनों में से जो कार्यकाल भी पूरा कर दूँ, उसके बाद मुझपर कोई दबाव नहीं है और जो समझौता हम कर रहे हैं, उस पर परमेश्वर साक्षी है।
फिर जब मूसा ने कार्यकाल पूरा कर दिया और अपने परिवार को लेकर (वहाँ से) चल पड़ा तो तूर पर्वत की ओर से उसे एक आग सी दिखाई दी। उसने अपने घरवालों से कहा: मुझे आग दिखाई दी है, तुम लोग थोड़ा ठहरो कि वहाँ से मैं तुम्हारे पास (रास्ते की) कोई सूचना या आग का कोई अंगारा ही ले आऊँ ताकि (इस सर्दी में) तुम उसे ताप सको।
फिर जब मूसा वहाँ पहुंचा तो ऐमन घाटी के किनारे से, उस पावन क्षेत्र में, उसको पेड़ से आवाज़ आई कि हे मूसा, मैं हूँ परमेश्वर, समस्त लोकों का प्रभु और यह भी कि अपनी लाठी (धरती पर) डाल दो। फिर जब मूसा ने देखा कि लाठी बल खा रही है, जैसे कि सांप है तो पीठ फेरकर भागा और उसने मुड़कर भी नहीं देखा। परमेश्वर ने कहा: मूसा, आगे आओ और डरो नहीं, तुम पूर्णतः सुरक्षित हो। अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो, वह बिना किसी रोग के श्वेत (चमकता हुआ) निकलेगा और इसके लिए अपना बाज़ू अपनी ओर खींच लो, जिस प्रकार भय से खींचते हैं। तो तेरे प्रभु की ओर से फ़िरऔन और उसके दरबारियों के पास जाने के लिए ये दो निशानियाँ हैं। सत्य यह है कि वे बड़े अवज्ञाकारी लोग हैं।1
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- अर्थात् पावन वादी (घाटी) के छोर से जो ‘तूर’ के पावन क्षेत्र में स्थित था। ↩
मूसा ने निवेदन किया कि मेरे प्रभु, मैं तो उनके एक आदमी की हत्या कर चुका हूँ, इसलिए डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे। और मेरा भाई, हारून, उसकी वाणी मुझसे अधिक सुंदर और स्पष्ट है, तो उसको मेरा सहायक बनाकर मेरे साथ भेजिए कि वह मेरा समर्थन करे, मुझे डर है कि वे मुझे झूठा बता देंगे। परमेश्वर ने कहा: हम तुम्हारे भाई को तुम्हारे लिए सहायक बनाएंगे और तुम दोनों को ऐसी धाक प्रदान करेंगे कि वे तुम तक पहुँच नहीं सकेंगे। हमारी निशानियों के साथ जाओ, तुम दोनों और जो तुम्हारा अनुसरण करेंगे, वही विजयी रहेंगे।
फिर जब मूसा हमारी स्पष्ट निशानियों के साथ उनके पास आया तो उन्होंने कह दिया कि यह तो केवल गढ़ा हुआ जादू है और ऐसी बात हमने अपने पूर्वजों में तो कभी सुनी ही नहीं।
मूसा ने उत्तर दिया: मेरा प्रभु भलीभांति जानता है उसको भी जो उसकी ओर से मार्गदर्शन लेकर आया है और उसको भी जिसके लिए आने वाले घर का अच्छा प्रतिफल है। (उसके नकारने वाले अपने प्राणों पर अत्याचार करने वाले हैं और) सत्य यह है कि इस प्रकार के अधर्मी कभी सफलता नहीं पाएंगे।
फ़िरऔन ने कहा: सभा के लोगो, मैं तो अपने अतिरिक्त तुम्हारे लिए किसी अन्य पूज्य देवता से परिचित नहीं हूँ। अच्छा तो हे हामान, तुम मेरे लिए मिट्टी की ईंटों की भट्टी लगाओ और एक ऊँचा महल मेरे लिए बनवाओ ताकि मूसा के ईश्वर को मैं (आकाश में) झांक कर देखूँ, और मैं तो इसे एक झूठा व्यक्ति समझता हूँ।
फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने धरती में अकारण घमंड किया और सोचा कि वे हमारी ओर नहीं लौटाए जाएँगे। अंततः उसे और उसकी सेनाओं को हमने पकड़ा, फिर उन्हें समुद्र में फेंक दिया तो देख लो कि इन अधर्मियों का अंत कैसा हुआ। हमने उन्हें (ढील दी और) ऐसे नेता बना दिया कि नरक की ओर बुलाते रहे। क़यामत के दिन अब उनकी कोई सहायता नहीं होगी। हमने इस दुनिया में उनके पीछे अभिशाप लगा दिया है और क़यामत के दिन वही कलंकित होने वालों में होंगे।
पिछले बहुत से जन समूहों को नष्ट कर देने के बाद हमने मूसा को ग्रंथ दिया था, लोगों के लिए देखने का साधन और मार्गदर्शन तथा दया बनाकर ताकि वे स्मरण प्राप्त करें।
हमने जब मूसा को अपने इस निर्णय से अवगत किया, (हे पैग़ंबर), तो न तुम तूर पर्वत के पश्चिमी भाग पर उपस्थित थे ओर न इस घटना को देखने वालों में से थे। परंतु हमने बहुत सी पुश्तें उठाईं, फिर उनपर एक लम्बा समय बीत गया (और वे हमारे उपदेश को भुला बैठे तो परमेश्वर की कृपा से अब तुम ही याद दिला रहे हो)। तुम मद्यन वालों के बीच भी उपस्थित नहीं थे, उनको हमारी आयतें सुनाते हुए, परंतु हम निर्णय कर चुके थे कि तुम्हें रसूल बनाएँ। (तो उनकी घटनाएं भी सुना रहे हो)। और तुम तूर के आँचल में भी उपस्थित नहीं थे, जब हमने मूसा को पुकारा था, परंतु अपने प्रभु की दया से तुम उससे भी अवगत किए गए, इसलिए कि उन लोगों को सचेत करो जिनके पास तुमसे पूर्व कोई सचेत करने वाला नहीं आया ताकि वे स्मरण प्राप्त करें।
हम तुम्हें न भेजते, यदि यह बात न होती कि जो कुछ इन्होंने आगे भेजा है, उसके कारण कोई संकट इन पर आए तो ये कहने लगें कि हमारे प्रभु, तूने हमारी ओर कोई दूत क्यों नहीं भेजा कि हम तेरी आयतों का अनुसरण करते और मानने वालों में से होते? फिर जब हमारी ओर से सत्य इनके पास आ गया तो इन्होंने कह दिया कि जो कुछ मूसा को मिला था, वही इस पैग़ंबर को क्यों नहीं दिया गया? इससे पहले क्या ये उसको नकार नहीं चुके जो मूसा को दिया गया था? इन्होंने कहा कि (तौरात और क़ुरआन), दोनों जादू हैं, एक दूसरे के अनुकूल, और कहा कि हम इनमें से किसी को भी नहीं मानते।
इनसे कहो, फिर परमेश्वर के यहाँ से कोई और ग्रंथ ले आओ जो इन दोनों से अधिक मार्गदर्शन करने वाला हो, मैं उसका अनुसरण कर लूँगा, यदि तुम सच्चे हो। अब यदि वे तुम्हारी यह बात स्वीकार नहीं करें तो जान लो कि वे केवल अपनी इच्छाओं के अनुयायी हैं। और उन से बढ़कर कौन भटका हुआ होगा जो परमेश्वर की ओर से किसी मार्गदर्शन के बिना अपनी इच्छाओं के अनुयायी बने हुए हैं। इस प्रकार के अधर्मी लोगों का परमेश्वर कभी मार्गदर्शन नहीं करेगा।
हमने अपनी बात इन लोगों के लिए बराबर जारी रखी है, ताकि ये स्मरण प्राप्त करें। (फिर यह भी सत्य है कि) जिनको हमने इनसे पहले ग्रंथ दिया था, वे इस क़ुरआन को मानते हैं और जब यह उन्हें सुनाया जाता है तो कहते हैं कि हम इसको मान गए है। इसमें संदेह नहीं कि यह हमारे प्रभु की ओर से सत्य आया है। सत्य यह है कि हम तो इसके उतरने से पहले ही इसको माने हुए थे। यही लोग हैं कि इनके दृढ़ संकल्प के बदले में इन्हें इनका दुगुना प्रतिफल दिया जाएगा। ये बुराई को भलाई से दूर करते हैं और हमने जो जीविका इन्हें दे रखी है, उसमें से दान करते हैं और जब अशिष्ट बात सुनते हैं तो उससे मुँह मोड़ लेते हैं और ऐसे लोगों को कह देते हैं कि हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म, हम अज्ञानियों से उलझना नहीं चाहते।
(ये फिर भी नहीं मानेंगे, इसलिए अधिक चिंतित न हो, हे पैग़ंबर)। तुम जिनका चाहो, मार्गदर्शन नहीं कर सकते, अपितु परमेश्वर ही जिसे चाहता है, (अपने नियम अनुसार) मार्गदर्शन करता है और वही भलीभांति जानता उनको जो मार्गदर्शन पाने वाले हैं।
ये (दुष्ट) कहते हैं कि हम यदि तुम्हारे साथ हो कर इस मार्गदर्शन के अनुयायी बन जाएँ तो हम अपने इस देश से उचक लिए जाएँगे। (इससे पहले) क्या हमने इनको इस शांति वाले पवित्र घर में स्थिरता प्रदान नहीं की जिसकी ओर हर चीज़ की पैदावार विशेष हमारी कृपा से खिंची चली आ रही हैं? परंतु इनमें से अधिकांश इस बात को नहीं जानते।
(क़ुरैश के लोगो), कितनी बस्तियां हमने नष्ट कर छोड़ी हैं जो अपनी आर्थिक स्थिति पर अकृतज्ञता दिखा कर इतरा गई थीं। तो ये उन्हीं की बस्तियां है जिनमें उनके बाद कोई कम ही बसा है और उनके उत्तराधिकारी फिर हम ही हुए हैं। सत्य यह है कि तेरा प्रभु इन बस्तियों को नष्ट करने वाला नहीं था, जब तक इनके केंद्र में किसी रसूल को न भेज ले जो हमारी आयतें इन्हें पढ़कर सुना दे। इसके साथ यह भी सत्य है कि हम बस्तियों को उसी समय नष्ट करते हैं, जब उनके लोग अपने ऊपर अत्याचार करने वाले बन जाते हैं।
तुम्हें जो चीज़ भी दी गई है, वह दुनिया के जीवन की सामग्री और उसका श्रृंगार ही है और जो कुछ परमेश्वर के पास है, वह इस से अच्छा भी है और स्थायी भी। फिर क्या समझते नहीं हो? भला वह व्यक्ति कि जिसको हमने अच्छा वचन दिया है और वह उसे अवश्य पा कर रहेगा, उस व्यक्ति के बराबर हो जाएगा जिसे हमने दुनिया के जीवन की सामग्री दी है, फिर क़यामत के दिन वह पकड़ कर बुलाया जाने वाला है?
ये उस दिन का ध्यान करें, जब परमेश्वर इन्हें पुकारेगा, फिर पूछेगा कि मेरे वह सहभागी कहाँ जिनका तुम दावा करते थे? (उनके बड़े) जिन पर बात पूरी हो चुकी होगी, (इस डर से कि सारी जवाबदेही कहीं उनपर न डाल दिया जाए), तुरंत बोल उठेंगे कि हमारे प्रभु, ये लोग जिन्हें हमने बहकाया, इन्हें हमने उसी प्रकार बहकाया है, जिस प्रकार हम स्वयं बहके थे। तेरी उपस्थिति में हम इनसे विमुक्त होते हैं। ये हम को नहीं पूजते थे।
(उस समय) कहा जाएगा: अच्छा, अब अपने सहभागियों को बुलाओ। तो (घबराकर) उन्हें बुलाएंगे, परंतु वे इन्हें उत्तर नहीं देंगे और ये अपना दण्ड देख लेंगे। काश, ये उचित मार्ग अपनाने वाले होते!
और उस दिन का ध्यान करें, जब परमेश्वर इन्हें पुकारेगा, फिर पूछेगा कि तुमने रसूलों को क्या उत्तर दिया था? तो उस दिन ये भौचक्के रह जाएँगे, फिर आपस में भी कुछ नहीं पूछ सकेंगे। हाँ, जिसने प्रायश्चित किया ओर मान गया और भले कर्म किए, उसे आशा रखनी चाहिए कि उस दिन वह सफलता पाने वालों में से होगा।
तेरा प्रभु जो कुछ चाहता है, पैदा करता है और जिसे चाहता है, चुन लेता है। इसमें उनका कोई अधिकार नहीं है। (तो) परमेश्वर दोष रहित और विशुद्ध है उससे जो ये भागीदार बनाते हैं। तेरा प्रभु जानता है जो कुछ ये अपने सीनों में छिपाए हुए हैं और जो कुछ ये व्यक्त करते हैं। (फिर वह किसी को अपना सहभागी क्यों बनाएगा)? वही परमेश्वर है, उसको छोड़ कोई उपास्य नहीं है। इस लोक और परलोक में वही आभार के योग्य है। उसी के अधिकार में निर्णय है और तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे।1
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- यह संकेत विशेष रूप से उन फ़रिश्तों की ओर है, जिनकी मूर्तियों की पूजा अरब के मुश्रिक (polytheists) करते थे। ↩
इनसे कहो कि बताओ, यदि परमेश्वर के दिन तक तुम पर सदा के लिए रात्रि फैला दे तो परमेश्वर के अतिरिक्त कौन पूज्य देवता है जो तुम्हें प्रकाश ला कर दे? फिर क्या सुनते नहीं हो? कहो कि बताओ, यदि परमेश्वर क़यामत के दिन तक तुम पर सदा के लिए दिन ही किए रहे तो परमेश्वर के अतिरिक्त कौन पूज्य देवता है जो तुम्हें रात्रि ला कर देगा जिसमें तुम चैन पाते हो? फिर क्या देखते नहीं हो? यह उसी की दया है कि उसने तुम्हारे लिए रात और दिन बनाए, ताकि रात में चैन प्राप्त करो और इसलिए कि दिन में अपने प्रभु के उपकार की खोज करो, और इसलिए कि तुम उसके आभारी रहो।
ये उस दिन का ध्यान करें, जब परमेश्वर इन्हें पुकारेगा, फिर पूछेगा कि मेरे वे सहभागी कहाँ हैं जिनका तुम दावा करते थे? और प्रत्येक समुदाय में हम एक गवाह निकाल कर लाएंगे, फिर लोगों से कहेंगे कि अपना प्रमाण लाओ। तब उनपर स्पष्ट हो जाएगा कि सत्य परमेश्वर की ओर से है और जो कुछ झूठ वे बांधते रहे थे, वे सब उनसे खो जाएँगे।
(ये अपने साधनों पर न इतराएँ। इन्हें बताओ कि) क़ारून मूसा की क़ौम में से ही था, फिर उसने उनके विरुद्ध सर उठा लिया। हमने उसको इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी चाबियां कई बलवान पुरुषों का जत्था भी कठिनाई से उठाता था। जब उसकी क़ौम के लोगों ने उसे उपदेश किया कि इतराओ मत, इसलिए कि परमेश्वर इतराने वालों को प्रिय नहीं रखता और जो कुछ परमेश्वर ने तुम्हें दे रखा है, उसमें परलोक के घर के चाहने वाले बनो और इस दुनिया से अपना हिस्सा वहाँ ले जाना न भूलो और जिस प्रकार परमेश्वर ने तुम पर उपकार किया है, उसी प्रकार तुम भी दूसरों पर उपकार करो और धरती में बिगाड़ चाहने वाले न बनो, इसलिए कि परमेश्वर बिगाड़ पैदा करने वालों को प्रिय नहीं रखता।
उसने उत्तर दिया: ये सब तो मुझे मेरे व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर मिला है — क्या वह नहीं जानता था कि परमेश्वर उससे पहले कितनी ही क़ौमों को नष्ट कर चुका है जो शक्ति और सामर्थ्य में उन से बढ़कर और संख्या में उससे कहीं अधिक थीं। इस प्रकार के अपराधियों से तो उनके पापकर्मों के बारे में पूछा भी नहीं जाता।
तो (एक दिन) वह अपनी ठाट-बाट के साथ अपनी क़ौम के लोगों के सामने निकला तो दुनिया के जीवन के चाहने वाले (उसे देख कर) कहने लगे कि जो कुछ क़ारून को मिला है, काश हमें भी मिला होता! इसमें संदेह नहीं कि वह बड़ा सौभाग्यशाली है। और जिनको ज्ञान की पूंजी प्रदान हुई थी, वे बोल उठे कि कमबख़्तो, जो मान जाएं और अच्छे कर्म करें, उनके लिए परमेश्वर का प्रतिफल इससे कहीं अच्छा है — (यही वह प्रज्ञा है जिसकी कामना हर व्यक्ति को करनी चाहिए) और यह उन्हीं को मिलती है जो धैर्य रखने वाले हों।
फिर हुआ यह कि हमने क़ारून और उसके घर को धरती में धंसा दिया तो न कोई जत्था उसके लिए उठा कि परमेश्वर के विरुद्ध उसकी सहायता करता और न वह स्वयं अपने आप को बचा सका। अब वही जो कल उसके स्थान पर होने की कामना कर रहे थे, पुकार उठे: अरे, यह तो वही बात हो गई (जो हमें बताई जा रही थी) कि परमेश्वर ही अपने भक्तों में से जिसके लिए चाहता है, जीविका को बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है, घटा देता है। यदि परमेश्वर ने हम पर कृपा न की होती तो हमें भी इसी प्रकार धंसा देता। ओहो, यह तो वही बात हो गई कि नकारने वाले सफलता नहीं पाएंगे।
यह परलोक का घर (जिसका वर्णन हुआ), इसे हम उन्हीं के लिये खास रखेंगे जो न धरती में अपनी बड़ाई चाहते हैं, न बिगाड़ के चाहने वाले हैं। (वही परमेश्वर से डरने वाले हैं), और अंतिम सफलता तो परमेश्वर से डरने वालों ही के लिए है। (उस दिन) जो भलाई लेकर आएगा, उसके लिए उससे अच्छी भलाई है और जो बुराई लेकर आएगा तो जिन्होंने बुराइयां की हैं, उनको वही बदले में मिलेगा जो वे (दुनिया में) करते रहे।
(इसलिए) विश्वास रखो, (हे पैग़ंबर कि) जिसने तुम पर ये क़ुरआन की ज़िम्मेदारी डाली है, वह तुम्हें अच्छे अंत तक पहुंचा के रहेगा। (अब) इनसे कह दो कि मेरा प्रभु भलीभांति जानता है उसको भी जो परमेश्वर का मार्गदर्शन लेकर आया है और उसको भी जो स्पष्ट पथभ्रष्टता में पड़ा हुआ है।
तुम इसके अभिलाषी नहीं थे कि तुम्हारी ओर यह ग्रंथ उतारा जाए। यह तो केवल तुम्हारे प्रभु का अनुग्रह हुआ (कि उसने तुम्हें इस दायित्व के लिए चुन लिया है)। इसलिए (यथार्थ रूप से सुनाओ और) कदापि इन नकारने वालों के सहायक न बनो। और ऐसा कभी न हो कि ये परमेश्वर की आयतों से, जबकि वह तुम्हारी ओर अवतरित हो चुकी हैं, तुम्हें रोक दें। तुम अपने प्रभु की ओर बुलाते रहो और कदापि मुश्रिकों में न मिल जाओ और न परमेश्वर के साथ किसी अन्य पूज्य-देवता को पुकारो। उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है। उसकी सत्ता को छोड़ हर चीज़ नश्वर है। निर्णय उसी के अधिकार में है और तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे।