सूरह 27

अन्-नम्ल्

मक्की · 93 आयतें · 38 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके साथियों को तसल्ली और शुभ सूचना देना (बशारत) और उनके नकारने वालों को चेतावनी देना है कि वे परलोक (आख़िरत) से बेखौफ़ और दुनिया के ऐश-ओ-आराम में मगन हो कर जिस उद्दंडता पर उतर आए हैं, उसे छोड़ दें, अपने ऊपर परमेश्वर के वरदानों और कृपाओं का आभार व्यक्त करें और अपने पैग़ंबर को पहचानें।

दोनों सूरतों में तर्क का मूल आधार पैग़ंबर मूसा (अ) का वृत्तांत है। इसके अलावा जो घटनाएं सुनाई गई हैं, वे इसके अंतर्गत इसी के कुछ पहलुओं की और अधिक व्याख्या करती हैं।

इनमें संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से भी हुआ है और मक्का के क़ुरैश क़बीले से भी, परंतु संबोधन की दिशा अधिकतर क़ुरैश की ओर है।

दोनों सूरतों की विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में परमेश्वर के रसूल (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जब वे सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत (इंज़ार-ए-आम) कर रहे थे और जब मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) और इस्लाम के नकारने वालों से संबंध तोड़ने (बराअत) का समय निकट आ चुका है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

طسٓ ۚ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْقُرْءَانِ وَكِتَابٍ مُّبِينٍ ﴿1﴾ هُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ ﴿2﴾ ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ ﴿3﴾

यह सूरह 'ता-सीन' है। ये क़ुरआन और एक स्पष्ट ग्रंथ की आयतें हैं, मानने वालों के लिए मार्गदर्शन और सुसमाचार जो नमाज़ का प्रबंध करते हैं, ज़कात देते हैं और वही परलोक पर वास्तव मैं विश्वास रखते हैं।

إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ زَيَّنَّا لَهُمْ أَعْمَـٰلَهُمْ فَهُمْ يَعْمَهُونَ ﴿4﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَهُمْ سُوٓءُ ٱلْعَذَابِ وَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمُ ٱلْأَخْسَرُونَ ﴿5﴾ وَإِنَّكَ لَتُلَقَّى ٱلْقُرْءَانَ مِن لَّدُنْ حَكِيمٍ عَلِيمٍ ﴿6﴾

इसके विपरीत जो लोग परलोक को नहीं मानते, उनके कर्म हमने उनके लिए अच्छे दिखने वाले बना दिए हैं, अतः भटकते फिर रहे हैं। ये लोग हैं कि इनके लिये दुनिया में भी दण्ड है और परलोक मैं भी, यही भीषण घाटे में होंगे। (इनकी चिंता न करो, हे पैग़ंबर), इसमें कोई संदेह ही नहीं कि यह क़ुरआन तुम्हें एक प्रज्ञावान और ज्ञानी की ओर से दिया जा रहा है।

إِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِأَهْلِهِۦٓ إِنِّىٓ ءَانَسْتُ نَارًا سَـَٔاتِيكُم مِّنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ ءَاتِيكُم بِشِهَابٍ قَبَسٍ لَّعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ ﴿7﴾ فَلَمَّا جَآءَهَا نُودِىَ أَنۢ بُورِكَ مَن فِى ٱلنَّارِ وَمَنْ حَوْلَهَا وَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿8﴾

(और अपने ऊपर परमेश्वर के इस उपकार को समझने के लिए) वह घटना याद करो, जब मूसा ने अपने घरवालों से कहा कि मैंने एक आग सी देखी है। (तुम लोग ज़रा ठहरो), मैं वहाँ से अभी तुम्हारे पास कोई सूचना लाता हूं या आग का कोई अंगारा ले कर आता हूं ताकि तुम उसे ताप सको। तो जब वह उसके पास पहुंचा तो आवाज़ आई कि धन्य है वह जो इस अग्नि में प्रकाशित है और वे भी जो इसके आसपास हैं। और दोषरहित है परमेश्वर, समस्त लोकों का प्रभु।

يَـٰمُوسَىٰٓ إِنَّهُۥٓ أَنَا ٱللَّهُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿9﴾ وَأَلْقِ عَصَاكَ ۚ فَلَمَّا رَءَاهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَآنٌّ وَلَّىٰ مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَـٰمُوسَىٰ لَا تَخَفْ إِنِّى لَا يَخَافُ لَدَىَّ ٱلْمُرْسَلُونَ ﴿10﴾ إِلَّا مَن ظَلَمَ ثُمَّ بَدَّلَ حُسْنًۢا بَعْدَ سُوٓءٍ فَإِنِّى غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿11﴾

हे मूसा, यह मैं हूँ परमेश्वर, अत्यंत प्रबल और प्रज्ञावान। (तुम संतुष्ट हो जाओ) और अपनी लाठी (धरती पर) डाल दो। फिर जब मूसा ने उसको देखा कि वह इस प्रकार बल खा रही है, मानो वह सांप है तो पीठ फेरकर भागा और पलटकर देखा भी नहीं। परमेश्वर ने कहा: हे मूसा, डरो नहीं, मेरे सामने पैग़ंबर डरा नहीं करते। हाँ जो बुराई के दोषी हों, फिर बुराई के बाद वे उसे भलाई से बदल दें तो (उनके लिए) मैं बड़ा क्षमा करने वाला और बड़ा दयालु हूं।

وَأَدْخِلْ يَدَكَ فِى جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَآءَ مِنْ غَيْرِ سُوٓءٍ ۖ فِى تِسْعِ ءَايَـٰتٍ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَقَوْمِهِۦٓ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًا فَـٰسِقِينَ ﴿12﴾ فَلَمَّا جَآءَتْهُمْ ءَايَـٰتُنَا مُبْصِرَةً قَالُوا۟ هَـٰذَا سِحْرٌ مُّبِينٌ ﴿13﴾ وَجَحَدُوا۟ بِهَا وَٱسْتَيْقَنَتْهَآ أَنفُسُهُمْ ظُلْمًا وَعُلُوًّا ۚ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُفْسِدِينَ ﴿14﴾

और अपना हाथ ज़रा अपने गिरेबान में डालो, वह बिना किसी रोग के सफेद होकर निकलेगा। (ये दोनों मिल कर नौ निशानियाँ हैं जो हम तुम्हें दे रहे हैं। इन) नौ निशानियों के संग तुम फ़िरऔन और उसकी क़ौम के पास जाओ, वे बड़े ही अवज्ञाकारी लोग हैं। फिर जब हमारी ये आँखें खोल देने वाली निशानियाँ उनके सामने आईं तो उन्होंने कह दिया कि यह तो स्पष्ट जादू है। उन्होंने अन्याय और घमंड के कारण इनको नकार दिया, यद्यपि उनके दिल इन निशानियों को मान चुके थे। तो देखो, इन उपद्रवियों का अंत क्या हुआ!

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا دَاوُۥدَ وَسُلَيْمَـٰنَ عِلْمًا ۖ وَقَالَا ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى فَضَّلَنَا عَلَىٰ كَثِيرٍ مِّنْ عِبَادِهِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿15﴾

इसके विपरीत हमने दाऊद और सुलैमान को असाधारण ज्ञान दिया था, (किंतु वे हमारे सामने झुकते ही चले गए) और उन्होंने कहा: आभार परमेश्वर के लिए है जिसने हमें अपने बहुत से मोमिन भक्तों पर श्रेष्ठता प्रदान की है।

وَوَرِثَ سُلَيْمَـٰنُ دَاوُۥدَ ۖ وَقَالَ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ عُلِّمْنَا مَنطِقَ ٱلطَّيْرِ وَأُوتِينَا مِن كُلِّ شَىْءٍ ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْفَضْلُ ٱلْمُبِينُ ﴿16﴾

और दाऊद का उत्तराधिकारी सुलैमान हुआ और उसने भी कहा: लोगो, हमें पक्षियों की बोली सिखाई गई है और अन्य सब प्रकार की चीज़ें भी दी गई हैं। निस्संदेह, यह परमेश्वर का स्पष्ट अनुग्रह है।

وَحُشِرَ لِسُلَيْمَـٰنَ جُنُودُهُۥ مِنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ وَٱلطَّيْرِ فَهُمْ يُوزَعُونَ ﴿17﴾ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَتَوْا۟ عَلَىٰ وَادِ ٱلنَّمْلِ قَالَتْ نَمْلَةٌ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّمْلُ ٱدْخُلُوا۟ مَسَـٰكِنَكُمْ لَا يَحْطِمَنَّكُمْ سُلَيْمَـٰنُ وَجُنُودُهُۥ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿18﴾ فَتَبَسَّمَ ضَاحِكًا مِّن قَوْلِهَا وَقَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِىٓ أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ وَعَلَىٰ وَٰلِدَىَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَـٰلِحًا تَرْضَىٰهُ وَأَدْخِلْنِى بِرَحْمَتِكَ فِى عِبَادِكَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿19﴾

(अतः एक दिन ऐसा हुआ कि) जिन्नों और मनुष्यों और पक्षियों में से सुलैमान की सभी सेनाएँ उसके निरीक्षण के लिए इकट्ठा किए गए, इसलिए कि उनका वर्गीकरण किया जा रहा था। यहाँ तक कि (मार्च करते हुए) जब वे चींटियों की घाटी में पहुंचे तो एक चींटी ने कहा: हे चींटियो, अपने बिलों में घुस जाओ, कहीं सुलैमान और उसकी सेनाएँ तुम्हें कुचल न डालें और उन्हें इसका एहसास भी न हो। (सुलैमान ने यह सुना) तो उसकी बात से प्रसन्न हो कर मुस्कुराया और बोला: हे मेरे प्रभु, मुझे प्रेरणा दे कि मैं तेरे उपकार का आभारी रहूँ जो तू ने मुझपर और मेरे माता पिता पर किया है और ऐसे अच्छे काम करूँ जो तुझे प्रिय हों और अपनी दया से, (हे प्रभु), तू मुझे अपने सदाचारी भक्तों में मिला ले।

وَتَفَقَّدَ ٱلطَّيْرَ فَقَالَ مَا لِىَ لَآ أَرَى ٱلْهُدْهُدَ أَمْ كَانَ مِنَ ٱلْغَآئِبِينَ ﴿20﴾ لَأُعَذِّبَنَّهُۥ عَذَابًا شَدِيدًا أَوْ لَأَا۟ذْبَحَنَّهُۥٓ أَوْ لَيَأْتِيَنِّى بِسُلْطَـٰنٍ مُّبِينٍ ﴿21﴾ فَمَكَثَ غَيْرَ بَعِيدٍ فَقَالَ أَحَطتُ بِمَا لَمْ تُحِطْ بِهِۦ وَجِئْتُكَ مِن سَبَإٍۭ بِنَبَإٍ يَقِينٍ ﴿22﴾ إِنِّى وَجَدتُّ ٱمْرَأَةً تَمْلِكُهُمْ وَأُوتِيَتْ مِن كُلِّ شَىْءٍ وَلَهَا عَرْشٌ عَظِيمٌ ﴿23﴾ وَجَدتُّهَا وَقَوْمَهَا يَسْجُدُونَ لِلشَّمْسِ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ ٱلسَّبِيلِ فَهُمْ لَا يَهْتَدُونَ ﴿24﴾

(इसी अवसर पर) सुलैमान ने अपनी सेना के पक्षियों का निरीक्षण किया तो कहा: क्या बात है, मैं हुदहुद को नहीं देख रहा हूँ। वह उपस्थित है या कहीं गायब हो गया है? मैं उसको कठोर दण्ड दूंगा या उसकी हत्या ही कर डालूंगा या (अपनी इस अनुपस्थिति के लिए) वह मेरे सामने कोई स्पष्ट बहाना पेश करेगा। फिर अधिक समय नहीं बीता कि हुदहुद आ गया और उसने निवेदन किया: मुझे उस बात का ज्ञान हुआ है जो आपकी जानकारी में नहीं है। मैं सबा (के देश) से एक विश्वसनीय सूचना आपके पास लाया हूँ। मैंने देखा कि एक महिला उनपर शासन कर रही है, उसे सभी प्रकार के संसाधन उपलब्ध हैं और उसका बहुत बड़ा सिंहासन भी है। मैंने उसको और उसके लोगों को देखा कि वे परमेश्वर को छोड़ सूरज के सामने नतमस्तक होते हैं। शैतान ने उनके कर्मों को उनके लिए आकर्षक बना दिया है और उन्हें उचित मार्ग से रोक दिया है, तो मार्ग नहीं पा रहे हैं।

أَلَّا يَسْجُدُوا۟ لِلَّهِ ٱلَّذِى يُخْرِجُ ٱلْخَبْءَ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَيَعْلَمُ مَا تُخْفُونَ وَمَا تُعْلِنُونَ ﴿25﴾ ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ ۩ ﴿26﴾

(निस्संदेह शैतान ही ने रोक दिया है) कि वे परमेश्वर के सामने नतमस्तक न हों जो धरती और समस्त आकाशों की छिपी हुई चीज़ों को निकालता है और जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ व्यक्त करते हो। परमेश्वर कि उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, वह महान सिंहासन का स्वामी है।

قَالَ سَنَنظُرُ أَصَدَقْتَ أَمْ كُنتَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ ﴿27﴾ ٱذْهَب بِّكِتَـٰبِى هَـٰذَا فَأَلْقِهْ إِلَيْهِمْ ثُمَّ تَوَلَّ عَنْهُمْ فَٱنظُرْ مَاذَا يَرْجِعُونَ ﴿28﴾

सुलैमान ने कहा: हम अभी देख लेते हैं कि तुम सच्चे हो या झूठ बोल रहे हो। मेरा यह पत्र ले कर जाओ और इसे उनकी ओर डाल दो, फिर उनसे अलग हट जाना, फिर देखना कि वे क्या प्रतिक्रिया देते हैं?

قَالَتْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَؤُا۟ إِنِّىٓ أُلْقِىَ إِلَىَّ كِتَـٰبٌ كَرِيمٌ ﴿29﴾ إِنَّهُۥ مِن سُلَيْمَـٰنَ وَإِنَّهُۥ بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ﴿30﴾ أَلَّا تَعْلُوا۟ عَلَىَّ وَأْتُونِى مُسْلِمِينَ ﴿31﴾ قَالَتْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَؤُا۟ أَفْتُونِى فِىٓ أَمْرِى مَا كُنتُ قَاطِعَةً أَمْرًا حَتَّىٰ تَشْهَدُونِ ﴿32﴾

(रानी को पत्र मिला तो) उसने दरबारियों से कहा: हे सभा के सदस्यगण, एक पत्र मेरे पास डाला गया है। यह सुलैमान की ओर से है और यह दयालु और कृपालु परमेश्वर के नाम से है। इसमें लिखा है कि तुम मेरे विरुद्ध विद्रोह न करो और आज्ञाकारी हो कर मेरे पास उपस्थित हो जाओ। रानी ने कहा: हे सभा के सदस्यगण, मेरे इस विषय में मुझे परामर्श दो। (तुम जानते हो कि) मैं किसी विषय का निर्णय नहीं करती, जब तक तुम लोग मेरी सभा में उपस्थित न हो।

قَالُوا۟ نَحْنُ أُو۟لُوا۟ قُوَّةٍ وَأُو۟لُوا۟ بَأْسٍ شَدِيدٍ وَٱلْأَمْرُ إِلَيْكِ فَٱنظُرِى مَاذَا تَأْمُرِينَ ﴿33﴾

उन्होंने उत्तर दिया: हम शक्तिशाली भी हैं और युद्ध का अच्छा सामर्थ्य रखने वाले भी हैं। आगे निर्णय आपके हाथ में है। तो देख लीजिए की आप क्या आदेश देती हैं।

قَالَتْ إِنَّ ٱلْمُلُوكَ إِذَا دَخَلُوا۟ قَرْيَةً أَفْسَدُوهَا وَجَعَلُوٓا۟ أَعِزَّةَ أَهْلِهَآ أَذِلَّةً ۖ وَكَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ ﴿34﴾ وَإِنِّى مُرْسِلَةٌ إِلَيْهِم بِهَدِيَّةٍ فَنَاظِرَةٌۢ بِمَ يَرْجِعُ ٱلْمُرْسَلُونَ ﴿35﴾

रानी ने कहा: सम्राट लोग जब किसी बस्ती (को पराजित करके उस) में घुस जाते हैं तो उसको उजाड़ देते और उसके सम्मानित व्यक्तियों को अपमानित कर देते हैं ओर ये लोग भी यही करेंगे। (मेरा विचार है कि) मैं अपना प्रतिनिधि मण्डल उनकी ओर उपहार के साथ भेजती हूँ, फिर देखती हूँ कि मेरे राजदूत क्या उत्तर लाते हैं।

فَلَمَّا جَآءَ سُلَيْمَـٰنَ قَالَ أَتُمِدُّونَنِ بِمَالٍ فَمَآ ءَاتَىٰنِۦَ ٱللَّهُ خَيْرٌ مِّمَّآ ءَاتَىٰكُم بَلْ أَنتُم بِهَدِيَّتِكُمْ تَفْرَحُونَ ﴿36﴾ ٱرْجِعْ إِلَيْهِمْ فَلَنَأْتِيَنَّهُم بِجُنُودٍ لَّا قِبَلَ لَهُم بِهَا وَلَنُخْرِجَنَّهُم مِّنْهَآ أَذِلَّةً وَهُمْ صَـٰغِرُونَ ﴿37﴾

फिर जब रानी का प्रतिनिधि मण्डल सुलैमान के पास पहुंचा तो (उनके उपहार देख कर) सुलैमान ने कहा: क्या तुम लोग मुझे यह धन प्रस्तुत करना चाहते हो! तो जो कुछ परमेश्वर ने मुझे दे रखा है, वह उससे कहीं अच्छा है जो उसने तुम्हें दिया है। नहीं, अपितु यह तुम ही लोग हो कि अपने उपहारों से प्रसन्न होते हो। तुम अपने भेजने वालों के पास वापस जाओ, अब हम उनपर अवश्य ऐसी सेनाएं लेकर आएंगे कि वे उनका सामना नहीं कर सकेंगे और हम उन्हें वहाँ से ऐसे अपमानित करके निकाल देंगे कि वे आवारा हो कर रह जाएँगे।

قَالَ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَؤُا۟ أَيُّكُمْ يَأْتِينِى بِعَرْشِهَا قَبْلَ أَن يَأْتُونِى مُسْلِمِينَ ﴿38﴾ قَالَ عِفْرِيتٌ مِّنَ ٱلْجِنِّ أَنَا۠ ءَاتِيكَ بِهِۦ قَبْلَ أَن تَقُومَ مِن مَّقَامِكَ ۖ وَإِنِّى عَلَيْهِ لَقَوِىٌّ أَمِينٌ ﴿39﴾ قَالَ ٱلَّذِى عِندَهُۥ عِلْمٌ مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ أَنَا۠ ءَاتِيكَ بِهِۦ قَبْلَ أَن يَرْتَدَّ إِلَيْكَ طَرْفُكَ ۚ فَلَمَّا رَءَاهُ مُسْتَقِرًّا عِندَهُۥ قَالَ هَـٰذَا مِن فَضْلِ رَبِّى لِيَبْلُوَنِىٓ ءَأَشْكُرُ أَمْ أَكْفُرُ ۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبِّى غَنِىٌّ كَرِيمٌ ﴿40﴾

(सुलैमान का अनुमान था कि अब वे आ ही जाएँगे। अतः) उसने कहा: हे सभा के सदस्यगण, तुम में से कौन उसका सिंहासन मेरे पास लाएगा, इससे पहले की वे लोग आज्ञाकारी होकर मेरे पास उपस्थित हो जाएं? जिन्नों में से एक महाकाय व्यक्ति ने निवेदन किया: मैं उसको आपके पास आपकी इस सभा से आपके उठने से पहले ला दूंगा। मैं इसका सामर्थ्य रखता हूँ और ईमानदार भी हूँ। एक व्यक्ति जिसके पास परमेश्वर के नियम का ज्ञान था, (इस पर जोश में आ गया और) उसने कहा: मैं आपकी पलक झपकने से पहले उसको आपके पास लाए देता हूँ। फिर जब सुलैमान ने उसको अपने सामने रखा हुआ देखा तो पुकार उठा यह मेरे प्रभु का उपकार है ताकि वह मुझे परखें कि मैं आभार व्यक्त करता हूँ या अकृतज्ञ बनता हूँ। सत्य यह है कि जो आभार व्यक्त करता है तो अपने ही लाभ के लिए आभार व्यक्त करता है और जो अकृतज्ञता दिखाता है तो यह भी उसी का घाटा है, इसलिए कि मेरा प्रभु निस्पृह है और वह अनुग्रह करने वाला भी है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात् सृष्टि में कार्यरत परमेश्वर के नियम या सिद्धांत का ज्ञान। ↩
قَالَ نَكِّرُوا۟ لَهَا عَرْشَهَا نَنظُرْ أَتَهْتَدِىٓ أَمْ تَكُونُ مِنَ ٱلَّذِينَ لَا يَهْتَدُونَ ﴿41﴾ فَلَمَّا جَآءَتْ قِيلَ أَهَـٰكَذَا عَرْشُكِ ۖ قَالَتْ كَأَنَّهُۥ هُوَ ۚ وَأُوتِينَا ٱلْعِلْمَ مِن قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِمِينَ ﴿42﴾ وَصَدَّهَا مَا كَانَت تَّعْبُدُ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۖ إِنَّهَا كَانَتْ مِن قَوْمٍ كَـٰفِرِينَ ﴿43﴾

सुलैमान ने आदेश दिया की उसको जांचने के लिए उसके सिंहासन का रूप बदल दो, देखें वह पहचानती है या उन्हीं लोगों में से होकर रह जाती है जो (इस परिवर्तन के बाद उसे) पहचान न पाएं। तो जब वह आ गई तो पूछा गया: क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है? उसने कहा: जैसे कि वही है। आपके ये चमत्कार हम इससे पहले ही जान गए थे और हम आज्ञाकारी हो गए थे। सत्य यह है कि (वह मान चुकी होती, किंतु) उसे उन चीज़ों ने रोक रखा था जिन्हें वह परमेश्वर को छोड़ पूजती थी। इसलिए कि वह एक नकारने वाली क़ौम से थी।

قِيلَ لَهَا ٱدْخُلِى ٱلصَّرْحَ ۖ فَلَمَّا رَأَتْهُ حَسِبَتْهُ لُجَّةً وَكَشَفَتْ عَن سَاقَيْهَا ۚ قَالَ إِنَّهُۥ صَرْحٌ مُّمَرَّدٌ مِّن قَوَارِيرَ ۗ قَالَتْ رَبِّ إِنِّى ظَلَمْتُ نَفْسِى وَأَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمَـٰنَ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿44﴾

कहा गया कि अब महल में प्रवेश कीजिए। फिर जब उसने महल (के फर्श) को देखा तो समझी कि गहरा पानी है और अपनी पिंडलियों से कपड़े उठा लिए। सुलैमान ने कहा: यह तो शीशों से बना हुआ महल है। (इस पर) वह पुकार उठी: मेरे प्रभु, मैं अपने आप पर अत्याचार करती रही हूँ। (तो लौटती हूँ) और सुलैमान के साथ होकर अब मैंने अपने आप को जगत प्रभु परमेश्वर को सौंप दिया है।

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَـٰلِحًا أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ فَإِذَا هُمْ فَرِيقَانِ يَخْتَصِمُونَ ﴿45﴾ قَالَ يَـٰقَوْمِ لِمَ تَسْتَعْجِلُونَ بِٱلسَّيِّئَةِ قَبْلَ ٱلْحَسَنَةِ ۖ لَوْلَا تَسْتَغْفِرُونَ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ﴿46﴾

(परंतु यह प्रेरणा प्रत्येक व्यक्ति को नहीं मिलती)। हमने समूद की ओर उनके भाई सालेह को भी इसी आह्वान के साथ भेजा था कि परमेश्वर की भक्ति करो तो हुआ यह कि वह दो पक्षधर बनकर आपस में झगड़ने लगे। सालेह ने कहा: मैरी क़ौम के लोगो, तुम भलाई से पहले बुराई के लिए क्यों जल्दी मचाते हो? तुम परमेश्वर से क्षमा क्यों नहीं मांगते कि तुम पर दया की जाए?

قَالُوا۟ ٱطَّيَّرْنَا بِكَ وَبِمَن مَّعَكَ ۚ قَالَ طَـٰٓئِرُكُمْ عِندَ ٱللَّهِ ۖ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تُفْتَنُونَ ﴿47﴾

उन्होंने उत्तर दिया कि हमने तो तुमसे और तुम्हारे साथियों से अभागापन ही पाया है। सालेह ने कहा: (इससे हमारा क्या संबंध)? तुम्हारा अभागापन सब परमेश्वर के पास है। अपितु सत्य यह है कि तुम लोग परखे जा रहे हो।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात् जिसे तुम अपशकुन समझ रहे हो, वह सब परमेश्वर की युक्ति और नियति, तथा उसकी प्रज्ञा और इच्छा की करनी है; उसका हमसे कोई संबंध नहीं है। ↩
وَكَانَ فِى ٱلْمَدِينَةِ تِسْعَةُ رَهْطٍ يُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ ﴿48﴾ قَالُوا۟ تَقَاسَمُوا۟ بِٱللَّهِ لَنُبَيِّتَنَّهُۥ وَأَهْلَهُۥ ثُمَّ لَنَقُولَنَّ لِوَلِيِّهِۦ مَا شَهِدْنَا مَهْلِكَ أَهْلِهِۦ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ ﴿49﴾ وَمَكَرُوا۟ مَكْرًا وَمَكَرْنَا مَكْرًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿50﴾ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ مَكْرِهِمْ أَنَّا دَمَّرْنَـٰهُمْ وَقَوْمَهُمْ أَجْمَعِينَ ﴿51﴾ فَتِلْكَ بُيُوتُهُمْ خَاوِيَةًۢ بِمَا ظَلَمُوٓا۟ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴿52﴾ وَأَنجَيْنَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ يَتَّقُونَ ﴿53﴾

उसके नगर में नौ परिवार थे जो देश में बिगाड़ फैलाते और किसी सुधार के लिए तैयार नहीं होते थे। उन्होंने आपस में परमेश्वर की सौगंध खाकर प्रतिज्ञा की कि हम सालेह और उसके लोगों को रात के समय जाकर मारेंगे, फिर उसके उत्तराधिकारी से कहेंगे कि उसके आदमी की हत्या के समय हम उपस्थित नहीं थे और हम पूरे सच्चे है। उन्होंने भी योजना की ओर हमने भी एक योजना की और उनको भनक भी नहीं लगी। फिर देखो कि उनकी योजना का अंत क्या हुआ कि हमने उनको और उनकी पूरी क़ौम को नष्ट कर दिया। तो ये हैं उनके घर, वीरान पड़े हुए, इसलिए कि उन्होंने अपने आप पर अत्याचार किया था। इसमें उन लोगों के लिए निस्संदेह एक सीख है जो जानना चाहें। और उन सब लोगों को हमने बचा लिया जो (उनमें से) मान गए थे और परमेश्वर से डरते थे।

وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ أَتَأْتُونَ ٱلْفَـٰحِشَةَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ ﴿54﴾ أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلرِّجَالَ شَهْوَةً مِّن دُونِ ٱلنِّسَآءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ ﴿55﴾ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوٓا۟ أَخْرِجُوٓا۟ ءَالَ لُوطٍ مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ ﴿56﴾ فَأَنجَيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ قَدَّرْنَـٰهَا مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ ﴿57﴾ وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَسَآءَ مَطَرُ ٱلْمُنذَرِينَ ﴿58﴾

और लूत को भी इसी आह्वान के साथ भेजा था, जब उसने अपनी क़ौम से कहा। क्या तुम खुली आँखों के साथ यह दुष्कर्म करते हो? (तुम पर अफसोस), क्या तुम स्त्रियों को छोड़कर पुरुषों से अपनी काम वासना पूरी करते हो? (सत्य यह है कि तुम पूरे औंधे), अपितु तुम बड़े ही मूर्ख लोग हो। परंतु उसकी क़ौम ने उत्तर दिया तो यह दिया कि लूत के लोगों को अपनी बस्ती से निकाल दो, ये लोग बड़े शुद्ध चरित्र वाले बनते हैं। तो हमने उसे और उसके घरवालों को बचा लिया, उसकी पत्नी को छोड़, उसे हमने पीछे रह जाने वालों में गिन रखा था। और उसकी क़ौम पर (पत्थरों की) एक भीषण बारिश बरसा दी। फिर कैसी बुरी थी वह बारिश उन लोगों के लिए जिन्हें सचेत कर दिया गया था।

قُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ وَسَلَـٰمٌ عَلَىٰ عِبَادِهِ ٱلَّذِينَ ٱصْطَفَىٰٓ ۗ ءَآللَّهُ خَيْرٌ أَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿59﴾

इनसे कहो, (हे पैग़ंबर) कि आभार परमेश्वर ही के लिए है (जिसने अपनी ये महिमाएँ दिखाई हैं) और उसके उन भक्तों पर शांति जिनको उसने (अपना निर्णय दिखाने के लिए) चुन लिया। क्या वह परमेश्वर अच्छा है या इनके पूज्य-देवता जिन्हें ये उसके सहभागी बनाते हैं?

أَمَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَنۢبَتْنَا بِهِۦ حَدَآئِقَ ذَاتَ بَهْجَةٍ مَّا كَانَ لَكُمْ أَن تُنۢبِتُوا۟ شَجَرَهَآ ۗ أَءِلَـٰهٌ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ يَعْدِلُونَ ﴿60﴾

क्या ये अच्छे हैं या वह (प्रभु) जिसने धरती और समस्त आकाशों की रचना की और आकाश से तुम्हारे लिए पानी उतारा, फिर उससे हमने सुंदर बाग़ उगाए, तुम्हारे लिए संभव नहीं था कि तुम उनके पेड़ों को उगा सकते? क्या परमेश्वर के साथ कोई अन्य पूज्य-देवता भी (इन सब कार्यों में भागीदार) है? कदापि नहीं, अपितु यही लोग हैं कि सन्मार्ग से हटे हुए हैं।

أَمَّن جَعَلَ ٱلْأَرْضَ قَرَارًا وَجَعَلَ خِلَـٰلَهَآ أَنْهَـٰرًا وَجَعَلَ لَهَا رَوَٰسِىَ وَجَعَلَ بَيْنَ ٱلْبَحْرَيْنِ حَاجِزًا ۗ أَءِلَـٰهٌ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿61﴾

क्या ये अच्छे हैं या वह (प्रभु) जिसने धरती को ठिकाना बनाया और उसके बीच नदियां बहा दीं और उस (को अपने स्थान पर बनाए रखने) के लिए पर्वत बनाए और दो समुद्रों के बीच आड़ डाल दी? क्या परमेश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य उपास्य भी (इन सब कार्यों में भागीदार) है? कदापि नहीं, अपितु इनके अधिकांश लोग जानते नहीं हैं।

أَمَّن يُجِيبُ ٱلْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ وَيَكْشِفُ ٱلسُّوٓءَ وَيَجْعَلُكُمْ خُلَفَآءَ ٱلْأَرْضِ ۗ أَءِلَـٰهٌ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ ﴿62﴾

क्या ये अच्छे हैं या वह (प्रभु) जो व्याकुल व्यक्ति का उपाय करता है, जब वह उसे पुकारता है और उसके दुख को दूर कर देता है और (तुमसे पहले लोगों को हटाता और) तुमको धरती का उत्तराधिकारी बना देता है? क्या परमेश्वर के साथ कोई अन्य पूज्य देवता भी (इन सब कार्यों में भागीदार) है? तुम लोग कम ही स्मरण प्राप्त करते हो।

أَمَّن يَهْدِيكُمْ فِى ظُلُمَـٰتِ ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ وَمَن يُرْسِلُ ٱلرِّيَـٰحَ بُشْرًۢا بَيْنَ يَدَىْ رَحْمَتِهِۦٓ ۗ أَءِلَـٰهٌ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ تَعَـٰلَى ٱللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿63﴾

क्या ये अच्छे हैं या वह (प्रभु) जो थल और जल के अँधेरों में तुम्हारा मार्गदर्शन करता है और जो अपनी बारिश से आगे हवाओं को शुभ समाचार बनाकर भेजता है? क्या परमेश्वर के साथ कोई अन्य पूज्य देवता भी (इन सब कार्यों में भागीदार) है? सत्य यह है कि परमेश्वर बहुत ही विशुद्ध है उन चीज़ों से जिन्हें ये उसका सहभागी बनाते हैं?

أَمَّن يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ وَمَن يَرْزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ ۗ أَءِلَـٰهٌ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿64﴾

क्या ये अच्छे हैं या वह (प्रभु) जो सृष्टि की उत्पत्ति करता है, फिर उसका पुनर्निर्माण करेगा और जो धरती तथा आकाश में तुम्हें जीविका देता है? क्या परमेश्वर के साथ कोई अन्य पूज्य देवता भी (इन सब कार्यों में भागीदार) हैं? इनसे कहो कि अपना प्रमाण लाओ, यदि तुम सच्चे हो।

قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ٱلْغَيْبَ إِلَّا ٱللَّهُ ۚ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ ﴿65﴾

(ये दण्ड के लिए जल्दी मचाते हैं)। इनसे कहो, (ये परोक्ष की बातें हैं और) परमेश्वर को छोड़ धरती और समस्त आकाशों में जो भी हैं, इस परोक्ष को नहीं जानते और न ये जानते हैं कि (मृत्यु के बाद) कब उठाए जाएँगे।

بَلِ ٱدَّٰرَكَ عِلْمُهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ بَلْ هُمْ فِى شَكٍّ مِّنْهَا ۖ بَلْ هُم مِّنْهَا عَمُونَ ﴿66﴾ وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَءِذَا كُنَّا تُرَٰبًا وَءَابَآؤُنَآ أَئِنَّا لَمُخْرَجُونَ ﴿67﴾ لَقَدْ وُعِدْنَا هَـٰذَا نَحْنُ وَءَابَآؤُنَا مِن قَبْلُ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿68﴾

(तुम्हारा विचार है कि ये इस बात को समझते नहीं हैं)? कदापि नहीं, अपितु परलोक के बारे में इनका ज्ञान उलझ गया है, अपितु ये उसके बारे में संदेह में हैं, अपितु ये उससे अंधे बने हुए हैं। ये नकारने वाले कहते हैं कि क्या जब हम मिट्टी हो जाएँगे और हमारे पूर्वज भी तो क्या हम क़ब्रों से निकाले जाएँगे? ये धमकी हमें भी दी गई है और इससे पहले हमारे पूर्वजों को भी दी गई थी। कुछ नहीं, यह केवल बीते लोगों की कथाएँ हैं।

قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿69﴾

इनसे कहो, (नहीं मानते तो) कुछ अपनी इस धरती में ही चलो फिरो, फिर देख लो कि (उन) अपराधियों का अंत क्या हुआ (जो तुम से पहले इसी प्रकार की बातें करते थे)।

وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُن فِى ضَيْقٍ مِّمَّا يَمْكُرُونَ ﴿70﴾ وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿71﴾ قُلْ عَسَىٰٓ أَن يَكُونَ رَدِفَ لَكُم بَعْضُ ٱلَّذِى تَسْتَعْجِلُونَ ﴿72﴾ وَإِنَّ رَبَّكَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ ﴿73﴾ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ ﴿74﴾ وَمَا مِنْ غَآئِبَةٍ فِى ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍ مُّبِينٍ ﴿75﴾

इन पर अफसोस न करो, (हे पैग़ंबर), और जो षड्यंत्र ये रच रहे हैं, तुम उनपर दिल छोटा न करो। ये पूछते हैं कि यदि तुम लोग सच्चे हो तो ये वचन कब पूरा होगा? इनसे कहो कि जिस (क़यामत) के लिए जल्दी मचाये हुए हो, अति संभव है कि उसमें से कुछ तुम्हारे पीछे ही लगा हुआ हो। (इस समय जो ढील तुम्हें मिली हुई है, वह तुम्हारे ही लाभ के लिए है)। सत्य यह है कि तेरा प्रभु लोगों पर बड़ा अनुग्रह करने वाला है, परंतु उनमें से अधिकांश कृतज्ञ नहीं होते। इनके सीने जो कुछ अपने अंदर छिपाए हुए हैं और जो कुछ ये व्यक्त करते हैं, तेरा प्रभु अवश्य उसे जानता है। धरती और आकाश में कोई ऐसी छिपी हुई चीज़ नहीं है जो एक स्पष्ट पुस्तक में लिखी न हो।

إِنَّ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ يَقُصُّ عَلَىٰ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ أَكْثَرَ ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ﴿76﴾ وَإِنَّهُۥ لَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ ﴿77﴾ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِى بَيْنَهُم بِحُكْمِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْعَلِيمُ ﴿78﴾ فَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۖ إِنَّكَ عَلَى ٱلْحَقِّ ٱلْمُبِينِ ﴿79﴾

(ये उनकी बातों से न भटकें, इसलिए कि) यह क़ुरआन इस्राईलियों पर भी वह बहुत सी चीज़ें स्पष्ट कर रहा है जिनमें वे मतभेद कर रहे हैं और इसमें संदेह नहीं कि मानने वालों के लिए तो यह सर्वथा मार्गदर्शन ओर दया है। निस्संदेह तेरा प्रभु (क़यामत के दिन) अपने अंतिम निर्णय के माध्यम से उनके बीच निर्णय करेगा। वह प्रबल है, बड़ा ज्ञानी है। तो तुम परमेश्वर पर भरोसा रखो, निस्संदेह तुम ही स्पष्ट सत्य पर हो।

إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ ٱلْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا وَلَّوْا۟ مُدْبِرِينَ ﴿80﴾ وَمَآ أَنتَ بِهَـٰدِى ٱلْعُمْىِ عَن ضَلَـٰلَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِـَٔايَـٰتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ ﴿81﴾

सत्य यह है कि तुम मुर्दों को नहीं सुना सकते और न बहरों तक अपनी पुकार पहुंचा सकते हो, जबकि वे पीठ फेरकर भागे जा रहे हों और न अंधों को उनकी पथभ्रष्टता से हटा कर उनका मार्गदर्शन कर सकते हो। तुम केवल उन्हीं को सुना सकते हो जो हमारी आयतों को मानना चाहें। फिर वही आज्ञाकारी भी होंगे।

وَإِذَا وَقَعَ ٱلْقَوْلُ عَلَيْهِمْ أَخْرَجْنَا لَهُمْ دَآبَّةً مِّنَ ٱلْأَرْضِ تُكَلِّمُهُمْ أَنَّ ٱلنَّاسَ كَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا لَا يُوقِنُونَ ﴿82﴾ وَيَوْمَ نَحْشُرُ مِن كُلِّ أُمَّةٍ فَوْجًا مِّمَّن يُكَذِّبُ بِـَٔايَـٰتِنَا فَهُمْ يُوزَعُونَ ﴿83﴾ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُو قَالَ أَكَذَّبْتُم بِـَٔايَـٰتِى وَلَمْ تُحِيطُوا۟ بِهَا عِلْمًا أَمَّاذَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿84﴾ وَوَقَعَ ٱلْقَوْلُ عَلَيْهِم بِمَا ظَلَمُوا۟ فَهُمْ لَا يَنطِقُونَ ﴿85﴾

(इस समय तो, हे पैग़ंबर, तुम इन्हें समझा रहे हो, परंतु) जब हमारी बात इन पर पूरी हो जाएगी तो हम इनके लिए धरती से कोई जानवर निकाल खड़ा करेंगे जो इन्हें बताएगा कि लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं रखते थे, (तो अब वे ईश्वरीय प्रकोप बनकर सामने आ गई हैं)। ये उस दिन का विचार करें जिस दिन हम प्रत्येक जन-समूह में से एक पूरी सेना उन लोगों की इकट्ठा करेंगे जो हमारी आयतों को झूठा बताते थे, फिर उनका वर्गीकरण किया जाएगा। यहाँ तक कि जब वे इकट्ठे होकर आ जाएँगे तो परमेश्वर पूछेगा कि क्या तुमने मेरी आयतों को झूठा कह दिया, यद्यपि तुम्हारा ज्ञान उनको घेर नहीं सका था या बताओ कि तुम क्या करते रहे थे? तो उनपर बात पूरी हो जाएगी, इसलिए कि उन्होंने अपने प्राण पर अत्याचार किया, फिर वे कुछ बोल नहीं सकेंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात् अपने अस्तित्व से यह बात स्पष्ट कर देगा। लेकिन इसकी बारी नहीं आई, इसलिए कि क़ुरैश कबीले के अधिकांश लोगों ने पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को सच्चा पैग़ंबर मान लिया। ↩
أَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا جَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِيَسْكُنُوا۟ فِيهِ وَٱلنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿86﴾

(ये निशानियाँ मांगते हैं)? क्या इन्होंने देखा नहीं कि हमने रात को अंधेरा बनाया कि उसमें आराम करें और दिन को प्रकाशित कर दिया कि उसमें काम करें? सत्य ये है कि इसमें उन लोगों के लिए बहुत निशानियाँ हैं जो मानना चाहें।

وَيَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَفَزِعَ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا مَن شَآءَ ٱللَّهُ ۚ وَكُلٌّ أَتَوْهُ دَٰخِرِينَ ﴿87﴾ وَتَرَى ٱلْجِبَالَ تَحْسَبُهَا جَامِدَةً وَهِىَ تَمُرُّ مَرَّ ٱلسَّحَابِ ۚ صُنْعَ ٱللَّهِ ٱلَّذِىٓ أَتْقَنَ كُلَّ شَىْءٍ ۚ إِنَّهُۥ خَبِيرٌۢ بِمَا تَفْعَلُونَ ﴿88﴾ مَن جَآءَ بِٱلْحَسَنَةِ فَلَهُۥ خَيْرٌ مِّنْهَا وَهُم مِّن فَزَعٍ يَوْمَئِذٍ ءَامِنُونَ ﴿89﴾ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَكُبَّتْ وُجُوهُهُمْ فِى ٱلنَّارِ هَلْ تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿90﴾

(लोगो), उस दिन का विचार करो, जिस दिन नरसिंघा फूंका जाएगा तो जो समस्त आकाशों में है और जो धरती में है, सब घबरा उठेंगे, सिवाय उनके जिन्हें परमेश्वर चाहे, और उसके आगे सर झुकाए हुए सब उपस्थित हो जाएँगे। तुम पर्वतों को समझोगे कि जमे हुए हैं, यद्यपि वे बादलों के समान उड़ रहे होंगे। यह परमेश्वर की कारीगरी का चमत्कार होगा जिसने हर चीज़ को अधीन किया है। निस्संदेह, वह जानता है जो तुम करते हो। उस दिन जो भलाई लेकर आएंगे, उनके लिए फल है और वे उस दिन हर घबराहट से सुरक्षित रहेंगे। और जो बुराई लेकर आएंगे, वे औंधे मुँह नरक में झोंक दिए जाएँगे --- तुम वही प्रतिफल पा रहे हो जो तुम करते रहे हो।

إِنَّمَآ أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ رَبَّ هَـٰذِهِ ٱلْبَلْدَةِ ٱلَّذِى حَرَّمَهَا وَلَهُۥ كُلُّ شَىْءٍ ۖ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ ﴿91﴾ وَأَنْ أَتْلُوَا۟ ٱلْقُرْءَانَ ۖ فَمَنِ ٱهْتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهْتَدِى لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن ضَلَّ فَقُلْ إِنَّمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُنذِرِينَ ﴿92﴾ وَقُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ سَيُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ فَتَعْرِفُونَهَا ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿93﴾

(इनसे कहो, हे पैग़ंबर कि) मुझे तो यही आदेश मिला है कि मैं इस नगर के प्रभु की भक्ति करूँ जिसने इसे पवित्रता दी है और जिसके अधिकार ही में सब कुछ है। और मुझे आदेश मिला है कि उसके आज्ञाकारियों में रहूँ और आदेश मिला है कि तुम्हें यह क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ। फिर जो उचित मार्ग पर आए तो वह अपने लिए ही उचित मार्ग पर आएगा और जो पथभ्रष्टता अपनाए, वह भी अपने लिए अपनाएगा। तो कह दो कि मैं तो केवल सचेत करने वाला हूँ। और कह दो कि आभार परमेश्वर ही के लिए है। वह शीघ्र ही अपनी निशानियाँ तुम्हें दिखाएगा और तुम उन्हें पहचान लोगे और जो कुछ तुम कर रहे हो, तुम्हारा प्रभु उससे अपरिचित नहीं है।