सूरह 25

अल्-फ़ुर्क़ान्

मक्की · 77 आयतें · 25 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय रसालत को प्रमाणित करना और इसके संदर्भ से सचेत करना (इंज़ार) और शुभ सूचना देना (बशारत) है। अपितु, दूसरी सूरह में उन घटनाओं का विस्तार से वर्णन कर दिया गया है जिनकी ओर पहली सूरह में संक्षेप में इशारा किया गया है। इसके अलावा, मक्का के क़ुरैश पैग़ंबर मुहम्मद (स.) पर ज्योतिषी (का‍हिन) और कवि होने का जो आरोप लगाते थे, इस सूरह में विशेष रूप से उसका खंडन किया गया है। दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश क़बीले से है, जो उस समय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के सच्चा नबी होने के प्रमाण के लिए उनसे बार-बार दंड (अज़ाब) की किसी निशानी की मांग कर रहे थे। दूसरी सूरह में बार-बार मिलने वाली एक आयत भी इसी संदर्भ में आई है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. रिसालत: अर्थात पैग़ंबरी या रसूलत्व (Prophethood) ↩

दोनों सूरतों की विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि मक्का में परमेश्वर के रसूल (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जब वे सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत (इंज़ार-ए-आम) कर रहे थे।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

تَبَارَكَ ٱلَّذِى نَزَّلَ ٱلْفُرْقَانَ عَلَىٰ عَبْدِهِۦ لِيَكُونَ لِلْعَـٰلَمِينَ نَذِيرًا ﴿1﴾ ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًا وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ شَرِيكٌ فِى ٱلْمُلْكِ وَخَلَقَ كُلَّ شَىْءٍ فَقَدَّرَهُۥ تَقْدِيرًا ﴿2﴾ وَٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةً لَّا يَخْلُقُونَ شَيْـًٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَ وَلَا يَمْلِكُونَ لِأَنفُسِهِمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا وَلَا يَمْلِكُونَ مَوْتًا وَلَا حَيَوٰةً وَلَا نُشُورًا ﴿3﴾

अत्यंत श्रेष्ठ, अत्यंत कृपा करने वाली है वह सत्ता जिसने अपने दास पर यह फ़ुर्क़ान उतारा है, ताकि वह दुनिया वालों के लिए सचेत करने वाला हो। वही जिसके लिए धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य है, उसने अपनी कोई संतान नहीं बनाई है, उसके साम्राज्य में कोई उसका सहभागी नहीं है, उसने प्रत्येक पदार्थ की रचना की और उसका एक विशेष अनुमान निर्धारित किया है। परंतु लोगों की दशा यह है कि उन्होंने उसको छोड़ अन्य उपास्य बना लिए हैं जो किसी चीज़ को पैदा नहीं करते, वह स्वयं पैदा किए हुए हैं और अपने लिए भी किसी लाभ और हानि की शक्ति नहीं रखते। वे न मृत्यु पर कोई नियंत्रण रखते हैं न जीवन पर और न मरे हुए मृतकों को उठाना उनके बस में है।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ إِفْكٌ ٱفْتَرَىٰهُ وَأَعَانَهُۥ عَلَيْهِ قَوْمٌ ءَاخَرُونَ ۖ فَقَدْ جَآءُو ظُلْمًا وَزُورًا ﴿4﴾ وَقَالُوٓا۟ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ٱكْتَتَبَهَا فَهِىَ تُمْلَىٰ عَلَيْهِ بُكْرَةً وَأَصِيلًا ﴿5﴾ قُلْ أَنزَلَهُ ٱلَّذِى يَعْلَمُ ٱلسِّرَّ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا ﴿6﴾

(इसके) नकारने वाले कहते हैं कि यह क़ुरआन केवल झूठ है जिसको इस व्यक्ति ने गढ़ लिया है और कुछ अन्य लोगों ने इस कार्य में इसकी सहायता की है। यह कह कर वे बड़े अन्याय और झूठ के दोषी हुए हैं। कहते हैं कि यह बीते हुए लोगों की कहानियाँ हैं जो इसने (किसी से) लिखवा लिए हैं। तो वही अब सुबह शाम इस ग्रंथ में लिखने के लिए इसको सुनाए जाते हैं। उनसे कहो कि (यह ग्रंथ तो अपने प्रत्येक शब्द से गवाही दे रहा है कि) इसे उस (प्रभु) ने उतारा है जो धरती और समस्त आकाशों के भेद जानता है। (तुम जैसे अवज्ञाकारियों के लिए वह इसके स्थान पर दण्ड भी उतार सकता था, परंतु) सत्य यह है कि वह बड़ा ही क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

وَقَالُوا۟ مَالِ هَـٰذَا ٱلرَّسُولِ يَأْكُلُ ٱلطَّعَامَ وَيَمْشِى فِى ٱلْأَسْوَاقِ ۙ لَوْلَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مَلَكٌ فَيَكُونَ مَعَهُۥ نَذِيرًا ﴿7﴾ أَوْ يُلْقَىٰٓ إِلَيْهِ كَنزٌ أَوْ تَكُونُ لَهُۥ جَنَّةٌ يَأْكُلُ مِنْهَا ۚ وَقَالَ ٱلظَّـٰلِمُونَ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلًا مَّسْحُورًا ﴿8﴾ ٱنظُرْ كَيْفَ ضَرَبُوا۟ لَكَ ٱلْأَمْثَـٰلَ فَضَلُّوا۟ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ سَبِيلًا ﴿9﴾

कहते हैं कि यह कैसा रसूल है? यह तो (हमारे जैसे) खाना खाता है और (अपनी आवश्यकताओं के लिए) बाज़ारों में फिरता है! इसके पास कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं भेजा गया कि इसके साथ हो कर वह (न मानने वालों को) सचेत करता? या इस पर कोई भंडार उतारा जाता या (कुछ अधिक नहीं तो) इसके लिए कोई बाग़ ही होता जिससे यह खाता पीता — ये अत्याचारी कहते हैं कि तुम लोग तो एक जादू से प्रभावित व्यक्ति के पीछे लग गए हो। देखो, (हे पैग़ंबर), ये तुम से संबन्धित कैसी-कैसी बातें बना रहे हैं। तो पूर्ण रूप से भटक गए हैं, अब कोई मार्ग नहीं पा रहे हैं।

تَبَارَكَ ٱلَّذِىٓ إِن شَآءَ جَعَلَ لَكَ خَيْرًا مِّن ذَٰلِكَ جَنَّـٰتٍ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ وَيَجْعَل لَّكَ قُصُورًۢا ﴿10﴾ بَلْ كَذَّبُوا۟ بِٱلسَّاعَةِ ۖ وَأَعْتَدْنَا لِمَن كَذَّبَ بِٱلسَّاعَةِ سَعِيرًا ﴿11﴾ إِذَا رَأَتْهُم مِّن مَّكَانٍۭ بَعِيدٍ سَمِعُوا۟ لَهَا تَغَيُّظًا وَزَفِيرًا ﴿12﴾ وَإِذَآ أُلْقُوا۟ مِنْهَا مَكَانًا ضَيِّقًا مُّقَرَّنِينَ دَعَوْا۟ هُنَالِكَ ثُبُورًا ﴿13﴾ لَّا تَدْعُوا۟ ٱلْيَوْمَ ثُبُورًا وَٰحِدًا وَٱدْعُوا۟ ثُبُورًا كَثِيرًا ﴿14﴾ قُلْ أَذَٰلِكَ خَيْرٌ أَمْ جَنَّةُ ٱلْخُلْدِ ٱلَّتِى وُعِدَ ٱلْمُتَّقُونَ ۚ كَانَتْ لَهُمْ جَزَآءً وَمَصِيرًا ﴿15﴾ لَّهُمْ فِيهَا مَا يَشَآءُونَ خَـٰلِدِينَ ۚ كَانَ عَلَىٰ رَبِّكَ وَعْدًا مَّسْـُٔولًا ﴿16﴾

अत्यंत श्रेष्ठ, अत्यंत कृपा करने वाली है वह सत्ता जो यदि चाहे तो तुम्हें इससे कहीं अच्छी चीज़ें दे दे — (एक नहीं), अनेक बाग़ जिनके नीचे नहरें बह रही हों और उनमें तुम्हारे लिए महल बनवा दे। नहीं, यह बात नहीं है, अपितु इन्होंने क़यामत को झूठा कह दिया है और जो क़यामत को झूठा बता दें, उनके लिए हमने नरक तैयार कर रखा है। वह जब इनको को दूर ही से देखेगा तो (देखते ही क्रोधित हो जाएगा और) यह उसका क्रोधित होना और दहाड़ना सुनेंगे। और जब उसके किसी सिकुड़े स्थान में बांध कर डाल दिए जाएँगे तो उस समय मृत्यु को पुकारेंगे। आज एक ही मृत्यु को नहीं, अनेक मृत्युओं को पुकारो। इनसे पूछो, क्या यह अच्छा है या सदा का स्वर्ग जिसका वचन परमेश्वर से डरने वाले लोगों को दिया गया है? वह उनका कर्म फल और उनका ठिकाना होगा। उसमें जो चीज़ भी चाहेंगे, उनके लिए उपस्थित होगी। वे उस में सदा रहेंगे। यह तेरे प्रभु के ऊपर एक वचन है जिसको उसे हर परिस्थिति में पूरा करना है।

وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَقُولُ ءَأَنتُمْ أَضْلَلْتُمْ عِبَادِى هَـٰٓؤُلَآءِ أَمْ هُمْ ضَلُّوا۟ ٱلسَّبِيلَ ﴿17﴾ قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَكَ مَا كَانَ يَنۢبَغِى لَنَآ أَن نَّتَّخِذَ مِن دُونِكَ مِنْ أَوْلِيَآءَ وَلَـٰكِن مَّتَّعْتَهُمْ وَءَابَآءَهُمْ حَتَّىٰ نَسُوا۟ ٱلذِّكْرَ وَكَانُوا۟ قَوْمًۢا بُورًا ﴿18﴾ فَقَدْ كَذَّبُوكُم بِمَا تَقُولُونَ فَمَا تَسْتَطِيعُونَ صَرْفًا وَلَا نَصْرًا ۚ وَمَن يَظْلِم مِّنكُمْ نُذِقْهُ عَذَابًا كَبِيرًا ﴿19﴾

ये उस दिन का ध्यान करें, जिस दिन वह इन्हें इकट्ठा करेगा और उनको भी जिन्हें यह परमेश्वर के अतिरिक्त पूजते हैं, फिर उनसे पूछेगा: क्या तुमने मेरे मेरे इन भक्तों को भटकाया था या ये स्वयं ही सन्मार्ग से भटक गए थे? वे उत्तर देंगे की दोष रहित है तू, हमें यह अधिकार भी कहाँ था कि हम तुझे छोड़ दूसरों को बिगड़ी बनाने वाला बनाएं! परंतु हुआ यह कि तूने इनको और इनके पूर्वजों को अत्याधिक जीवन सामग्री दी, यहाँ तक कि वे तेरे स्मरण को भुला बैठे और ऐसे लोग बन गए जो बर्बाद हो कर रहे। यह लो, इन्होंने तो जो तुम कहते थे, उसमें तुम्हें झूठा कह दिया। तो अब न अपनी दुर्दशा को टाल सकोगे न अपनी कोई सहायता कर सकोगे और तुम में से जो भी अत्याचार के दोषी होंगे, उन्हें हम एक बड़ा दण्ड चखाएंगे।

وَمَآ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ إِلَّآ إِنَّهُمْ لَيَأْكُلُونَ ٱلطَّعَامَ وَيَمْشُونَ فِى ٱلْأَسْوَاقِ ۗ وَجَعَلْنَا بَعْضَكُمْ لِبَعْضٍ فِتْنَةً أَتَصْبِرُونَ ۗ وَكَانَ رَبُّكَ بَصِيرًا ﴿20﴾

तुमसे पहले भी जितने रसूल हमने भेजे हैं, वे सब खाना खाते और बाजारों में चलते फिरते थे। (हे मानने वालो), हमने तुम लोगों को एक दूसरे के लिए परीक्षा बना दिया है तो बोलो, इन सब बातों पर धैर्य रखते हो? (तुम संतुष्ट रहो, हे पैग़ंबर, यह जो कुछ कर रहे हैं), तेरा प्रभु सब देख रहा है।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ نَرَىٰ رَبَّنَا ۗ لَقَدِ ٱسْتَكْبَرُوا۟ فِىٓ أَنفُسِهِمْ وَعَتَوْ عُتُوًّا كَبِيرًا ﴿21﴾ يَوْمَ يَرَوْنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ لَا بُشْرَىٰ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُجْرِمِينَ وَيَقُولُونَ حِجْرًا مَّحْجُورًا ﴿22﴾ وَقَدِمْنَآ إِلَىٰ مَا عَمِلُوا۟ مِنْ عَمَلٍ فَجَعَلْنَـٰهُ هَبَآءً مَّنثُورًا ﴿23﴾ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ يَوْمَئِذٍ خَيْرٌ مُّسْتَقَرًّا وَأَحْسَنُ مَقِيلًا ﴿24﴾

और इनमें जो हमारे सामने प्रस्तुत होने की आशंका नहीं रखते, वे कहते हैं कि तुम्हारी जगह हम पर फ़रिश्ते क्यों नहीं उतारे गए? या ऐसा क्यों नहीं हुआ कि हम सीधा अपने प्रभु ही को देखते? ये अपने जी में बड़ा घमंड ले बैठे हैं और अपनी अवज्ञा में बहुत बढ़ गए हैं। जिस दिन यह फ़रिश्तों को देखेंगे, उस दिन इन अपराधियों के लिए कोई शुभ समाचार नहीं होगा। यह उनको देखकर चिल्ला उठेंगे कि शरण, शरण। और इन्होंने जो कर्म भी किए होंगे, हम उनकी ओर बढ़ेंगे और उन्हें लेकर उड़ती हुई मिट्टी बना देंगे। उस दिन स्वर्ग के लोग सबसे अच्छे ठिकाने और अत्यंत अच्छे विश्राम कक्ष में होंगे।

وَيَوْمَ تَشَقَّقُ ٱلسَّمَآءُ بِٱلْغَمَـٰمِ وَنُزِّلَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ تَنزِيلًا ﴿25﴾ ٱلْمُلْكُ يَوْمَئِذٍ ٱلْحَقُّ لِلرَّحْمَـٰنِ ۚ وَكَانَ يَوْمًا عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ عَسِيرًا ﴿26﴾ وَيَوْمَ يَعَضُّ ٱلظَّالِمُ عَلَىٰ يَدَيْهِ يَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى ٱتَّخَذْتُ مَعَ ٱلرَّسُولِ سَبِيلًا ﴿27﴾ يَـٰوَيْلَتَىٰ لَيْتَنِى لَمْ أَتَّخِذْ فُلَانًا خَلِيلًا ﴿28﴾ لَّقَدْ أَضَلَّنِى عَنِ ٱلذِّكْرِ بَعْدَ إِذْ جَآءَنِى ۗ وَكَانَ ٱلشَّيْطَـٰنُ لِلْإِنسَـٰنِ خَذُولًا ﴿29﴾ وَقَالَ ٱلرَّسُولُ يَـٰرَبِّ إِنَّ قَوْمِى ٱتَّخَذُوا۟ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ مَهْجُورًا ﴿30﴾ وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِىٍّ عَدُوًّا مِّنَ ٱلْمُجْرِمِينَ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيًا وَنَصِيرًا ﴿31﴾

जिस दिन आकाश एक बदली के ऊपर से फट जाएगा। वह प्रकट होगी और फ़रिश्तों के दलों के दल उसके अंदर से उतार दिए जाएँगे। उस दिन असली साम्राज्य केवल परम दयालु परमेश्वर का होगा। वह दिन नकारने वालों के लिए बड़ा कठिन दिन होगा। जिस दिन अत्याचारी अपने हाथ निराशा से काटेगा और कहेगा कि काश, मैंने रसूल के साथ सत्य मार्ग अपनाया होता! हाय मेरा दुर्भाग्य, काश मैंने अमुक व्यक्ति को अपना मित्र न बनाया होता! उसी ने भटका कर के मुझे परमेश्वर के स्मरण से बहका दिया था, इसके बाद कि वह मेरे पास आ चुका था। कहा जाएगा: शैतान मनुष्य के साथ बड़ा ही विश्वासघात करने वाला है! और रसूल कहेगा कि प्रभु, मेरी क़ौम के लोगों ने इस कुरआन को पूरी तरह अनदेखा कर दिया था — ये जिस प्रकार तुम्हारे शत्रु बनकर उठ खड़े हुए हैं, हे पैग़ंबर, हमने इसी प्रकार अपराधियों में से प्रत्येक नबी के शत्रु बनाए हैं। तुम संतुष्ट रहो, तुम्हारा प्रभु मार्गदर्शन और सहायता करने के लिए पर्याप्त है।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ ٱلْقُرْءَانُ جُمْلَةً وَٰحِدَةً ۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِۦ فُؤَادَكَ ۖ وَرَتَّلْنَـٰهُ تَرْتِيلًا ﴿32﴾ وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا ﴿33﴾ ٱلَّذِينَ يُحْشَرُونَ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ إِلَىٰ جَهَنَّمَ أُو۟لَـٰٓئِكَ شَرٌّ مَّكَانًا وَأَضَلُّ سَبِيلًا ﴿34﴾

यह नकारने वाले कहते हैं कि क़ुरआन सारे का सारा इसके ऊपर एक ही समय में क्यों नहीं उतार दिया गया? हमने ऐसा ही किया है, इसलिए कि इसके माध्यम से हम तुम्हारे दिल को दृढ़ करें और यही कारण है कि हमने इसको ठहर ठहर कर उतारा है। ये लोग जो आपत्ति भी तुम्हारे पास लेकर आएंगे, उसका ठीक उत्तर और उसकी सबसे अच्छी व्याख्या हम तुम्हें बता देंगे। इनके लिए अब नरक ही है और जो लोग अपने मुखों के बल नरक की ओर घसीटे जाएँगे, उन्हीं का ठिकाना बहुत बुरा है और वही सबसे बढ़कर भटके हुए हैं।

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَجَعَلْنَا مَعَهُۥٓ أَخَاهُ هَـٰرُونَ وَزِيرًا ﴿35﴾ فَقُلْنَا ٱذْهَبَآ إِلَى ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا فَدَمَّرْنَـٰهُمْ تَدْمِيرًا ﴿36﴾ وَقَوْمَ نُوحٍ لَّمَّا كَذَّبُوا۟ ٱلرُّسُلَ أَغْرَقْنَـٰهُمْ وَجَعَلْنَـٰهُمْ لِلنَّاسِ ءَايَةً ۖ وَأَعْتَدْنَا لِلظَّـٰلِمِينَ عَذَابًا أَلِيمًا ﴿37﴾ وَعَادًا وَثَمُودَا۟ وَأَصْحَـٰبَ ٱلرَّسِّ وَقُرُونًۢا بَيْنَ ذَٰلِكَ كَثِيرًا ﴿38﴾ وَكُلًّا ضَرَبْنَا لَهُ ٱلْأَمْثَـٰلَ ۖ وَكُلًّا تَبَّرْنَا تَتْبِيرًا ﴿39﴾ وَلَقَدْ أَتَوْا۟ عَلَى ٱلْقَرْيَةِ ٱلَّتِىٓ أُمْطِرَتْ مَطَرَ ٱلسَّوْءِ ۚ أَفَلَمْ يَكُونُوا۟ يَرَوْنَهَا ۚ بَلْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ نُشُورًا ﴿40﴾

हमने मूसा को भी इसी प्रकार ग्रंथ प्रदान किया था और उसके साथ उसके भाई हारून को उसका सहायक बना दिया था। फिर दोनों को आदेश दिया था कि उन लोगों के पास जाओ जिन्होंने (उन दोनों की ओर से इत्माम-ए-हुज्जत के बाद भी अंततः) हमारी आयतों को झूठा कह दिया, फिर हमने भी उन्हें कुचल कर रख दिया। इसी प्रकार जब नूह की क़ौम ने रसूलों को झूठा बताया तो उनको भी हमने डुबो दिया और लोगों के लिए उन्हें सीख की एक निशानी बना दिया। इस प्रकार के अत्याचारियों के लिए (आगे भी) हमने एक कष्टदायक यातना तैयार कर रखी है। आद, समूद, अस्हाबुर्-रस् और उनके बीच अनेक क़ौमों को भी हमने इसी प्रकार नष्ट किया। इनमें से हर एक को हमने (पिछली क़ौमों के) उदाहरण दे कर समझाया, और नहीं समझे तो अंततः हर एक का हमने सर्वनाश कर दिया। यह क़ुरैश के लोग तो उस बस्ती के पास से निकले भी हैं जिस पर बुरी तरह पत्थर बरसाए गए थे। फिर क्या उसको देखते नहीं रहे? नहीं, यह बात नहीं, अपितु यह पुनः उठाए जाने की उम्मीद नहीं रखते हैं।

وَإِذَا رَأَوْكَ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَـٰذَا ٱلَّذِى بَعَثَ ٱللَّهُ رَسُولًا ﴿41﴾ إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ ءَالِهَتِنَا لَوْلَآ أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ ٱلْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا ﴿42﴾ أَرَءَيْتَ مَنِ ٱتَّخَذَ إِلَـٰهَهُۥ هَوَىٰهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَكِيلًا ﴿43﴾ أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ ۚ إِنْ هُمْ إِلَّا كَٱلْأَنْعَـٰمِ ۖ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلًا ﴿44﴾

(अतः इसी का परिणाम है कि) ये जब भी तुम्हें देखते हैं, तुम्हारा मज़ाक़ ही बनाते हैं कि अच्छा, यही है जिसको परमेश्वर ने (अपना) रसूल बनाकर भेजा है! इसने तो हमारे पूज्य-देवताओं से हमें विमुख ही कर दिया था, यदि हम (उनकी पूजा) पर जमे न रहते। (इन्हें इस बात की ज़िद है, यद्यपि) वह समय अब अधिक दूर नहीं, जब ये दण्ड देखेंगे तो स्वयं जान लेंगे कि कौन बहुत अधिक मार्ग से भटका हुआ है। तुमने उस व्यक्ति को देखा है, (हे पैग़ंबर), जिसने अपनी इच्छा को अपना उपास्य बना रखा है? फिर क्या तुम उसका दायित्व ले सकते हो? क्या तुम समझते हो कि इनमें से अधिकांश सुनते या समझते हैं? ये तो केवल जानवरों के समान हैं, अपितु उनसे भी अधिक मार्गहीन हैं।

أَلَمْ تَرَ إِلَىٰ رَبِّكَ كَيْفَ مَدَّ ٱلظِّلَّ وَلَوْ شَآءَ لَجَعَلَهُۥ سَاكِنًا ثُمَّ جَعَلْنَا ٱلشَّمْسَ عَلَيْهِ دَلِيلًا ﴿45﴾ ثُمَّ قَبَضْنَـٰهُ إِلَيْنَا قَبْضًا يَسِيرًا ﴿46﴾

(लोगो, किस परम सत्ता को छोड़कर इन मूर्तियों की पूजा पर जमे हुए हो)? तुमने देखा नहीं अपने प्रभु को कि किस प्रकार रात का साया फैला देता है? यदि वह चाहता तो उसको (इसी प्रकार) बना देता। फिर देखते नहीं हो कि) हमने सूरज को उस पर एक मार्गदर्शक बनाया है। फिर (इसी से) धीरे-धीरे हम उसको अपनी ओर समेट लेते हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इसलिए कि वही रात के व्यापक अंधकार से दुनिया को निकालने का कारण बनता है, उसी तरह जैसे कोई मार्गदर्शक बनकर रास्ते के सभी पड़ावों को स्पष्ट कर दे। ↩
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ لِبَاسًا وَٱلنَّوْمَ سُبَاتًا وَجَعَلَ ٱلنَّهَارَ نُشُورًا ﴿47﴾

वही है जिसने रात को तुम्हारे लिए आवरण और उसमें नींद को विश्राम का साधन बनाया और दिन को जी उठने का समय बना दिया।

وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ ٱلرِّيَـٰحَ بُشْرًۢا بَيْنَ يَدَىْ رَحْمَتِهِۦ ۚ وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً طَهُورًا ﴿48﴾ لِّنُحْـِۧىَ بِهِۦ بَلْدَةً مَّيْتًا وَنُسْقِيَهُۥ مِمَّا خَلَقْنَآ أَنْعَـٰمًا وَأَنَاسِىَّ كَثِيرًا ﴿49﴾

और वही है जो अपनी दया (की बारिश) से पहले हवाओं को सुसमाचार बनाकर भेजता है। (लोगो, देखते नहीं हो कि) हम आकाश से स्वच्छ पानी उतरते हैं कि उस नगर की मुर्दा धरती में जान डाल दें और अपनी रचनाओं में बहुत से पशुओं और मनुष्यों को उससे तृप्त कर दें।

وَلَقَدْ صَرَّفْنَـٰهُ بَيْنَهُمْ لِيَذَّكَّرُوا۟ فَأَبَىٰٓ أَكْثَرُ ٱلنَّاسِ إِلَّا كُفُورًا ﴿50﴾ وَلَوْ شِئْنَا لَبَعَثْنَا فِى كُلِّ قَرْيَةٍ نَّذِيرًا ﴿51﴾ فَلَا تُطِعِ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَجَـٰهِدْهُم بِهِۦ جِهَادًا كَبِيرًا ﴿52﴾

हमने इस क़ुरआन को उनके बीच अनेक प्रकार से सुनाया है, (हे पैग़ंबर), ताकि ये स्मरण प्राप्त करें, परंतु अधिकांश लोग अकृतज्ञता किए बिना नहीं रहते। यदि हम चाहते तो (इनकी) हर बस्ती में एक सचेत करने वाला भेज देते, (परंतु हम जानते हैं कि ये फिर भी नहीं मानते), इसलिए तुम इन नकारने वालों की बात पर ध्यान न दो और इसी क़ुरआन के माध्यम से इनके साथ महान जिहाद करते रहो।

وَهُوَ ٱلَّذِى مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ هَـٰذَا عَذْبٌ فُرَاتٌ وَهَـٰذَا مِلْحٌ أُجَاجٌ وَجَعَلَ بَيْنَهُمَا بَرْزَخًا وَحِجْرًا مَّحْجُورًا ﴿53﴾

और (इन्हें बताओ कि) वही है जिसने दो समुद्रों को मिलाकर छोड़ दिया। एक का पानी मीठा है, प्यास बुझाने वाला और दूसरे का खारा है, अत्यंत कड़वा। और दोनों के बीच उसने एक आड़ डाल दी और एक अटल अड़चन खड़ी कर दी है।

وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ مِنَ ٱلْمَآءِ بَشَرًا فَجَعَلَهُۥ نَسَبًا وَصِهْرًا ۗ وَكَانَ رَبُّكَ قَدِيرًا ﴿54﴾

और वही है जिसने पानी से मनुष्य की रचना की, फिर उसके वंश और ससुराल तय किए। सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु बड़ा सामर्थ्य वाला है।

وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُهُمْ وَلَا يَضُرُّهُمْ ۗ وَكَانَ ٱلْكَافِرُ عَلَىٰ رَبِّهِۦ ظَهِيرًا ﴿55﴾ وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ إِلَّا مُبَشِّرًا وَنَذِيرًا ﴿56﴾ قُلْ مَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ إِلَّا مَن شَآءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلًا ﴿57﴾ وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱلْحَىِّ ٱلَّذِى لَا يَمُوتُ وَسَبِّحْ بِحَمْدِهِۦ ۚ وَكَفَىٰ بِهِۦ بِذُنُوبِ عِبَادِهِۦ خَبِيرًا ﴿58﴾ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۚ ٱلرَّحْمَـٰنُ فَسْـَٔلْ بِهِۦ خَبِيرًا ﴿59﴾ وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱسْجُدُوا۟ لِلرَّحْمَـٰنِ قَالُوا۟ وَمَا ٱلرَّحْمَـٰنُ أَنَسْجُدُ لِمَا تَأْمُرُنَا وَزَادَهُمْ نُفُورًا ۩ ﴿60﴾

परंतु इनकी दशा यह है कि परमेश्वर को छोड़कर ये उन चीज़ों की भक्ति कर रहे हैं जो इनको न लाभ पहुंचा सकती हैं, न हानि और (यही नहीं), ये नकारने वाले (तो अब इससे आगे) अपने प्रभु के विरोधी बने हुए हैं। हमने, (हे पैग़ंबर), तुमको केवल एक शुभ समाचार देने वाला और सचेत करने वाला बनाकर भेजा है। इनसे कह दो कि मैं इस पर तुमसे कोई इनाम नहीं मांग रहा हूँ, किंतु यही कि जो चाहे, वह अपने प्रभु तक पहुंचने का मार्ग अपना ले। तुम उस जीवंत सत्ता पर विश्वास रखो जो मरने वाला नहीं है और उसकी प्रशंसा के साथ उसकी स्तुति करते रहो। (वह इनसे स्वयं समझ लेगा), अपने भक्तों के पापकर्मों से परिचित रहने के लिए वह पर्याप्त है। (वही) जिसने धरती और समस्त आकाशों और उनके बीच की चीज़ों को छः दिन में पैदा किया, फिर अपने सिंहासन पर विराजमान हुआ। वह रहमान है, तो तुम (उसकी महिमा) उसी से पूछो जो उसको जानने वाला है। जब इनसे कहा जाता है कि रहमान के आगे सजदे में गिर जाओ तो कहते हैं कि रहमान क्या है? क्या हम उसको सज्दा करें जिससे तुम सज्दा करने के लिए हमें कह दो? और इनके द्वेश को यह चीज़ और बढ़ा देती है।1

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  1. अर्थात् यह बात स्वयं परमेश्वर से पूछो, इसलिए कि अपने स्वरूप और अपने गुणों को वास्तव में वही जानता है। ↩
تَبَارَكَ ٱلَّذِى جَعَلَ فِى ٱلسَّمَآءِ بُرُوجًا وَجَعَلَ فِيهَا سِرَٰجًا وَقَمَرًا مُّنِيرًا ﴿61﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ خِلْفَةً لِّمَنْ أَرَادَ أَن يَذَّكَّرَ أَوْ أَرَادَ شُكُورًا ﴿62﴾

(लोगो, किस से मुँह फेर रहे हो? सत्य यह है कि) अत्यंत श्रेष्ठ, अत्यंत कृपा करने वाली है वह सत्ता जिसने आकाश में तगड़े क़िले बनाए और उसमें एक जलता दीपक और एक चमकदार चाँद बनाया और वही है जिसने रात और दिन को एक दूसरे के बाद आने वाला बनाया, उनके लिए जो स्मरण प्राप्त करना चाहें या आभारी बनना चाहेंं।

وَعِبَادُ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى ٱلْأَرْضِ هَوْنًا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ ٱلْجَـٰهِلُونَ قَالُوا۟ سَلَـٰمًا ﴿63﴾ وَٱلَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَـٰمًا ﴿64﴾ وَٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا ٱصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا ﴿65﴾ إِنَّهَا سَآءَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا ﴿66﴾

(वही रहमान है) और रहमान के भक्त वे हैं जो धरती पर विनम्रता से चलते हैं और अज्ञानी व उग्र लोग उनसे उलझने का प्रयास करें तो उनको सलाम करके अलग हो जाते हैं। जो रातें अपने प्रभु के आगे सजदे और क़ियाम में बिताते हैं। जो प्रार्थनाएँ करते हैं कि हे हमारे प्रभु, हमसे नरक का दण्ड हटा ले। सत्य यह है कि उसका दण्ड तो प्राण से चिमटने वाला है। सत्य यह है कि वह बसने और ठहरने का बहुत ही बुरा स्थान है।

وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَنفَقُوا۟ لَمْ يُسْرِفُوا۟ وَلَمْ يَقْتُرُوا۟ وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًا ﴿67﴾

और (वे हैं) जो ख़र्च करते हैं तो न उड़ाते हैं, न कंजूसी करते हैं, उनका ख़र्च इसके बीच संतुलित होता है।

وَٱلَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ يَلْقَ أَثَامًا ﴿68﴾ يُضَـٰعَفْ لَهُ ٱلْعَذَابُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَيَخْلُدْ فِيهِۦ مُهَانًا ﴿69﴾ إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ عَمَلًا صَـٰلِحًا فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يُبَدِّلُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِهِمْ حَسَنَـٰتٍ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا ﴿70﴾ وَمَن تَابَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًا فَإِنَّهُۥ يَتُوبُ إِلَى ٱللَّهِ مَتَابًا ﴿71﴾

और (वे हैं) जो परमेश्वर के साथ किसी दूसरे उपास्य को नहीं पुकारते, परमेश्वर के द्वारा किसी अलंघनीय जान की अनुचित हत्या नहीं करते और न व्यभिचार के दोषी होते हैं — ये पापकर्म जो व्यक्ति भी करेगा, इनका परिणाम भुगतेगा। क़यामत के दिन उसका दण्ड बढ़ता ही जाएगा और वह सदा उसमें अपमानित होकर रहेगा। परंतु यह कि जिसने तौबा कर ली और मान लिया और भले कर्म किए तो इसी प्रकार के लोग हैं जिनकी बुराइयों को परमेश्वर भलाइयों से बदल देगा। सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है और जो तौबा करे और भले कर्म करे, उसको संतुष्ट होना चाहिए, इसलिए कि वह पूरी सफलता के साथ परमेश्वर ही की ओर लौटता है।

وَٱلَّذِينَ لَا يَشْهَدُونَ ٱلزُّورَ وَإِذَا مَرُّوا۟ بِٱللَّغْوِ مَرُّوا۟ كِرَامًا ﴿72﴾ وَٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ لَمْ يَخِرُّوا۟ عَلَيْهَا صُمًّا وَعُمْيَانًا ﴿73﴾ وَٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَٰجِنَا وَذُرِّيَّـٰتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ وَٱجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا ﴿74﴾

और रहमान के भक्त वे हैं जो किसी बुराई में भागीदार नहीं होते और जब किसी बेहूदा चीज़ के पास से उन्हें निकलना होता है तो गरिमा के साथ निकल जाते हैं। और ऐसे हैं कि उन्हें जब उनके प्रभु की आयतों के माध्यम से याद दिलाया जाता है तो उनपर अंधे और बहरे हो कर नहीं गिरते। ओर जो कहते हैं कि हे हमारे प्रभु, हमें हमारी पत्नियों और हमारी संतानों की ओर से आंखों की ठंडक प्रदान कर और (हमारे इन परिवार के सदस्यों में) हमको पुण्यशील व्यक्तियों का नेता बना।1

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  1. बल्कि उन पर विचार करते हैं और उनसे लाभ उठाते हैं। ↩
أُو۟لَـٰٓئِكَ يُجْزَوْنَ ٱلْغُرْفَةَ بِمَا صَبَرُوا۟ وَيُلَقَّوْنَ فِيهَا تَحِيَّةً وَسَلَـٰمًا ﴿75﴾ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ حَسُنَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا ﴿76﴾

यही है जिनको उनके दृढ़संकल्प के बदले में स्वर्ग के उच्च भवन मिलेंगे और वहाँ अभिवादन तथा सलाम के साथ उनका स्वागत किया जाएगा। वे उनमें सदा रहेंगे बसने और ठहरने का कैसा अच्छा स्थान है!

قُلْ مَا يَعْبَؤُا۟ بِكُمْ رَبِّى لَوْلَا دُعَآؤُكُمْ ۖ فَقَدْ كَذَّبْتُمْ فَسَوْفَ يَكُونُ لِزَامًۢا ﴿77﴾

इन से कह दो, (हे पैग़ंबर) कि यदि यह उद्देश्य न होता कि तुम्हें (इस स्थान का) निमंत्रण दिया जाए तो मेरे प्रभु को तुम्हारी क्या चिंता है! तो तुमने नकार दिया है तो (जिसकी धमकी तुम्हें सुनाई गई है), वह अब शीघ्र हो के रहेगी कि जान छुड़ानी कठिन हो जाएगी।