सूरह 24

अन्-नूर्

मदनी · 64 आयतें · 31 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

यह बिना किसी जोड़े के एक अलग सूरह है, जिस पर क़ुरआन के इस तीसरे अध्याय का समापन हो रहा है। पीछे संकेत थे कि इस समय जो सत्य और असत्य के बीच संघर्ष चल रहा है, उसका अंत पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके साथियों की विजय और क़ुरैश क़बीले की पराजय पर होने वाला है। इस सूरह में स्पष्ट घोषणा कर दी गई है कि मानने वालों [अर्थात मुसलमानों] से परमेश्वर का वादा है कि अब अरब देश की सत्ता उन्हें सौंप दी जाएगी। इसी संबंध में इस सूरह का विषय उनका शुद्धिकरण (तज़्कियह) भी है, जिसके लिए आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, और उनका परिष्करण (तत्हीर) भी, जिसके लिए मुनाफ़िक़ों को चेतावनी दी गई है। इस दृष्टिकोण से यह सूरह इस अध्याय की पिछली सभी सूरतों का पूरक और समापन है।

इसके संबोधित इस्लाम के मानने वाले [अर्थात मुसलमान] हैं और इसकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद यह मदीना में उस समय अवतरित हुई है, जब मुसलमानों का एक व्यवस्थित शासन तंत्र वहां स्थापित हो चुका था और इस्लाम को नकारने वालों के विरुद्ध अंतिम कार्यवाही से पहले पैग़ंबर मुहम्मद (स.) अपने मानने वालों का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) कर रहे थे।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

سُورَةٌ أَنزَلْنَـٰهَا وَفَرَضْنَـٰهَا وَأَنزَلْنَا فِيهَآ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍ لَّعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿1﴾

यह एक महान सूरह है जिसको हमने उतारा है और इसके निर्देश (तुम्हारे लिए) अनिवार्य बनाए हैं और इसमें अत्यंत स्पष्ट चेतावनियाँ भी उतारी हैं ताकि तुम याद रखो।

ٱلزَّانِيَةُ وَٱلزَّانِى فَٱجْلِدُوا۟ كُلَّ وَٰحِدٍ مِّنْهُمَا مِا۟ئَةَ جَلْدَةٍ ۖ وَلَا تَأْخُذْكُم بِهِمَا رَأْفَةٌ فِى دِينِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَآئِفَةٌ مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿2﴾

ज़ानी स्त्री हो या ज़ानी पुरुष, अतः (इनका अपराध साबित हो जाए तो) दोनों में से हर एक को सौ कोड़े मारो और परमेश्वर के इस नियम (को लागू करने) में उनके साथ किसी नरमी की भावना तुम्हें रोक न पाए, यदि तुम परमेश्वर को और क़यामत के दिन को वस्तुतः मानते हो। और उनको दण्ड देते समय मुसलमानों का एक समूह भी वहां उपस्थित होना चाहिए।

ٱلزَّانِى لَا يَنكِحُ إِلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةً وَٱلزَّانِيَةُ لَا يَنكِحُهَآ إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ ۚ وَحُرِّمَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿3﴾

(इस दण्ड के बाद) यह ज़ानी किसी ज़ानी स्त्री या किसी मुश्रिक स्त्री ही के साथ विवाह करेगा और इस ज़ानी स्त्री को भी कोई ज़ानी या मुश्रिक ही अपने विवाह में लाएगा। मानने वालों के लिए इसे अवैध कर दिया गया है।

وَٱلَّذِينَ يَرْمُونَ ٱلْمُحْصَنَـٰتِ ثُمَّ لَمْ يَأْتُوا۟ بِأَرْبَعَةِ شُهَدَآءَ فَٱجْلِدُوهُمْ ثَمَـٰنِينَ جَلْدَةً وَلَا تَقْبَلُوا۟ لَهُمْ شَهَـٰدَةً أَبَدًا ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ ﴿4﴾ إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿5﴾ وَٱلَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَٰجَهُمْ وَلَمْ يَكُن لَّهُمْ شُهَدَآءُ إِلَّآ أَنفُسُهُمْ فَشَهَـٰدَةُ أَحَدِهِمْ أَرْبَعُ شَهَـٰدَٰتٍۭ بِٱللَّهِ ۙ إِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿6﴾ وَٱلْخَـٰمِسَةُ أَنَّ لَعْنَتَ ٱللَّهِ عَلَيْهِ إِن كَانَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ ﴿7﴾ وَيَدْرَؤُا۟ عَنْهَا ٱلْعَذَابَ أَن تَشْهَدَ أَرْبَعَ شَهَـٰدَٰتٍۭ بِٱللَّهِ ۙ إِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ ﴿8﴾ وَٱلْخَـٰمِسَةَ أَنَّ غَضَبَ ٱللَّهِ عَلَيْهَآ إِن كَانَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿9﴾ وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ وَأَنَّ ٱللَّهَ تَوَّابٌ حَكِيمٌ ﴿10﴾

और जो लोग निष्कलंक व चरित्रवती स्त्रियों पर (ज़िना का) झूठा आरोप लगाएं, (फिर उसके सबूत में) चार गवाह न ला सकें, उनको अस्सी कोड़े मारो और उनकी गवाही फिर कभी स्वीकार न करो, और यही लोग दुराचारी हैं। हाँ जो इसके बाद तौबा और सुधार कर लें, वे परमेश्वर के निकट दुराचारी नहीं रहेंगे, इसलिए कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। परंतु जो अपनी पत्नियों पर झूठा आरोप लगाएं और अपने अतिरिक्त उनके पास कोई गवाह न हों तो उनमें से हर एक की गवाही यह है कि चार बार परमेश्वर की शपथ खाकर कहे कि वह सच्चा है। और पांचवी बार यह कहे कि उस पर परमेश्वर का अभिशाप हो, यदि वह झूठा हो। (इसके बाद) स्त्री पर से दण्ड उसी स्थिति में टल सकता है कि (इसके उत्तर में) वह भी चार बार परमेश्वर की शपथ खाकर कहे कि यह व्यक्ति झूठा है। और पांचवी बार यह कहे कि इस दासी पर परमेश्वर का प्रकोप हो, यदि यह (अपने आरोप में) सच्चा हो। (हे मानने वालो), यदि तुम पर परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी दया न होती और यह बात न होती कि परमेश्वर बड़ा तौबा स्वीकार करने वाला और प्रज्ञावान है तो जो आचरण तुमने अपनाया था, इन निर्देशों के स्थान पर उस पर परमेश्वर का दण्ड उतर जाता।

إِنَّ ٱلَّذِينَ جَآءُو بِٱلْإِفْكِ عُصْبَةٌ مِّنكُمْ ۚ لَا تَحْسَبُوهُ شَرًّا لَّكُم ۖ بَلْ هُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ لِكُلِّ ٱمْرِئٍ مِّنْهُم مَّا ٱكْتَسَبَ مِنَ ٱلْإِثْمِ ۚ وَٱلَّذِى تَوَلَّىٰ كِبْرَهُۥ مِنْهُمْ لَهُۥ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿11﴾

यह सच है कि जो लोग यह लांछन गढ़ लाए हैं, वे तुम्हारे ही अंदर का एक गुट है। तुम इसको अपने पक्ष में बुरा न समझो, अपितु यह तुम्हारे लिए अच्छा है। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति ने जो पाप कमाया है, वह उसके खाते में पड़ेगा और (इस दुष्टता का जनक), जिसने उनमें से इसका सबसे बड़ा हिस्सा लिया है, उसके लिए तो बहुत बड़ा दण्ड है।

لَّوْلَآ إِذْ سَمِعْتُمُوهُ ظَنَّ ٱلْمُؤْمِنُونَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتُ بِأَنفُسِهِمْ خَيْرًا وَقَالُوا۟ هَـٰذَآ إِفْكٌ مُّبِينٌ ﴿12﴾

तुम लोगों ने जब यह बात सुनी तो मुसलमान पुरुषों और मुसलमान महिलाओं ने अपने लोगों के पक्ष में अच्छा क्यों न सोचा आर क्यों न कह दिया कि यह एक स्पष्ट लांछन है?

لَّوْلَا جَآءُو عَلَيْهِ بِأَرْبَعَةِ شُهَدَآءَ ۚ فَإِذْ لَمْ يَأْتُوا۟ بِٱلشُّهَدَآءِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ عِندَ ٱللَّهِ هُمُ ٱلْكَـٰذِبُونَ ﴿13﴾

यह (आरोप लगाने वाले) अपने आरोप के प्रमाण में चार गवाह क्यों नहीं लाए? फिर जब गवाह नहीं लाए तो परमेश्वर के निकट यही झूठे हैं?

وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ لَمَسَّكُمْ فِى مَآ أَفَضْتُمْ فِيهِ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿14﴾ إِذْ تَلَقَّوْنَهُۥ بِأَلْسِنَتِكُمْ وَتَقُولُونَ بِأَفْوَاهِكُم مَّا لَيْسَ لَكُم بِهِۦ عِلْمٌ وَتَحْسَبُونَهُۥ هَيِّنًا وَهُوَ عِندَ ٱللَّهِ عَظِيمٌ ﴿15﴾ وَلَوْلَآ إِذْ سَمِعْتُمُوهُ قُلْتُم مَّا يَكُونُ لَنَآ أَن نَّتَكَلَّمَ بِهَـٰذَا سُبْحَـٰنَكَ هَـٰذَا بُهْتَـٰنٌ عَظِيمٌ ﴿16﴾

तुम (मुसलमानों) पर इस लोक और परलोक में परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी दया न होती तो जिस मार्ग पर तुम चल निकले थे, उसमें तुम पर कोई बड़ी आपदा आ जाती। भला विचार करो, जब तुम अपनी ज़बानों से इसको फैला रहे थे और अपने मुँहों से वह बात कह रहे थे जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं था। तुम उसको साधारण बात समझ रहे थे, यद्यपि परमेश्वर के निकट वह बहुत बड़ी बात थी। तुमने उसको सुनते ही क्यों न कह दिया कि हमें शोभा नहीं देता कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएं? परमेश्वर बचाए, यह तो बहुत बड़ा लांछन है।

يَعِظُكُمُ ٱللَّهُ أَن تَعُودُوا۟ لِمِثْلِهِۦٓ أَبَدًا إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿17﴾ وَيُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿18﴾

परमेश्वर तुम्हें उपदेश करता है कि यदि तुम मानने वाले हो तो फिर कभी ऐसा न करना। परमेश्वर तुम्हारे लिए अपनी आयतों का वर्णन अत्यंत स्पष्टता के साथ करता है और परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحِبُّونَ أَن تَشِيعَ ٱلْفَـٰحِشَةُ فِى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿19﴾ وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ وَأَنَّ ٱللَّهَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ ﴿20﴾

इसमें संदेह नहीं कि जो लोग यह चाहते हैं कि मुसलमानों में अश्लीलता का प्रसारण हो, उनके लिए दुनिया में भी कष्टदायक यातना है और परलोक में भी। इन सब लोगों को परमेश्वर जानता है, परंतु तुम नहीं जानते हो। सच यह है कि यदि परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी दया तुम पर न होती और यह बात न होती कि परमेश्वर दयालु और कृपालु है तो इस पाप के परिणामस्वरुप तुम लोगों पर बड़ी आपदा आ जाती।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ وَمَن يَتَّبِعْ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ فَإِنَّهُۥ يَأْمُرُ بِٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ ۚ وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ مَا زَكَىٰ مِنكُم مِّنْ أَحَدٍ أَبَدًا وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يُزَكِّى مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿21﴾

हे मानने वालो, शैतान के पदचिन्ह पर न चलो और (याद रखो कि) जो शैतान के पदचिन्ह पर चलेगा, वह अपने ही को बर्बाद करेगा, इसलिए कि वह तो निर्लज्जता और बुराई के मार्ग ही का सुझाव देता है। (तुम दूसरों पर आरोप लगाते और अपने आप को बहुत पवित्र समझते हो)? सत्य यह है कि यदि परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी कृपा तुम पर न होती तो तुम में से कोई कभी पवित्र नहीं हो सकता। परंतु परमेश्वर ही जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार) पवित्र कर देता है और परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।

وَلَا يَأْتَلِ أُو۟لُوا۟ ٱلْفَضْلِ مِنكُمْ وَٱلسَّعَةِ أَن يُؤْتُوٓا۟ أُو۟لِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينَ وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ وَلْيَعْفُوا۟ وَلْيَصْفَحُوٓا۟ ۗ أَلَا تُحِبُّونَ أَن يَغْفِرَ ٱللَّهُ لَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿22﴾

तुम में से जो लोग समृद्ध हैं और जिनको व्यापक धन प्रदान हुआ है, वे (इस मामले में किसी को शामिल देख कर) इस बात की शपथ न खा बैठें कि अब वे सगे-संबंधियों और निर्धन व्यक्तियों और परमेश्वर के मार्ग में प्रवास करने वालों पर ख़र्च न करेंगे। (नहीं, अपितु) उनको चाहिए कि क्षमा कर दें और अनदेखा करें। क्या तुम नहीं चाहते कि परमेश्वर तुमको क्षमा कर दे? सच यह है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَرْمُونَ ٱلْمُحْصَنَـٰتِ ٱلْغَـٰفِلَـٰتِ ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ لُعِنُوا۟ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿23﴾ يَوْمَ تَشْهَدُ عَلَيْهِمْ أَلْسِنَتُهُمْ وَأَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿24﴾ يَوْمَئِذٍ يُوَفِّيهِمُ ٱللَّهُ دِينَهُمُ ٱلْحَقَّ وَيَعْلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْحَقُّ ٱلْمُبِينُ ﴿25﴾

जो लोग अच्छे चरित्रवाली, भोली भाली, मोमिन स्त्रियों पर झूठे लांछन लगाते हैं, उनपर इस लोक और परलोक, दोनों में अभिशाप किया गया और उनके लिए बड़ा दण्ड है। उस दिन, जब उनकी ज़बानें और उनके हाथ-पांव उनके विरुद्ध उनके कर्मों की गवाही देंगे। वे जिस बदले के योग्य हैं, उस दिन परमेश्वर उन्हें पूरा दे देगा और वे जान लेंगे कि परमेश्वर ही सत्य है, वह सभी तथ्य खोल देने वाला है।

ٱلْخَبِيثَـٰتُ لِلْخَبِيثِينَ وَٱلْخَبِيثُونَ لِلْخَبِيثَـٰتِ ۖ وَٱلطَّيِّبَـٰتُ لِلطَّيِّبِينَ وَٱلطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَـٰتِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ مُبَرَّءُونَ مِمَّا يَقُولُونَ ۖ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ ﴿26﴾

उस दिन दुष्ट स्त्रियाँ दुष्ट पुरुषों के लिए होंगी और दुष्ट पुरुष दुष्ट स्त्रियों के लिए। इसी प्रकार पवित्र स्त्रियाँ पवित्र पुरुषों के लिए होंगी और पवित्र पुरुष पवित्र स्त्रियों के लिए। वे उन बातों से मुक्त होंगे जो ये लोग (उनके बारे में) कहते हैं। उनके लिए वहां क्षमा है और सम्मान की जीविका है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَدْخُلُوا۟ بُيُوتًا غَيْرَ بُيُوتِكُمْ حَتَّىٰ تَسْتَأْنِسُوا۟ وَتُسَلِّمُوا۟ عَلَىٰٓ أَهْلِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿27﴾ فَإِن لَّمْ تَجِدُوا۟ فِيهَآ أَحَدًا فَلَا تَدْخُلُوهَا حَتَّىٰ يُؤْذَنَ لَكُمْ ۖ وَإِن قِيلَ لَكُمُ ٱرْجِعُوا۟ فَٱرْجِعُوا۟ ۖ هُوَ أَزْكَىٰ لَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ ﴿28﴾ لَّيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَدْخُلُوا۟ بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍ فِيهَا مَتَـٰعٌ لَّكُمْ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ ﴿29﴾

हे मानने वालो, (इसी पवित्रता के लिए आवश्यक है कि) तुम अपने घरों के सिवा दूसरों के घरों में प्रवेश न किया करो, जब तक कि परिचय न हो जाए और घर वालों को सलाम न कर लो। यही मार्ग तुम्हारे लिए अच्छा है ताकि तुम्हें स्मरण प्राप्त रहे। फिर यदि वहां किसी को न पाओ तो उनमें प्रवेश न करो, जब तक कि तुम्हें अनुमति न दे दी जाए। और यदि तुमसे कहा जाए कि लौट जाओ तो लौट जाओ। यही मार्ग तुम्हारे लिए पवित्र है और (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे भलीभांति जानता है। अपितु, इसमें तुम पर कोई पाप नहीं कि ऐसे घरों में प्रवेश करो जिनमें तुम्हारे लिए कोई लाभ है और वे रहने के घर नहीं हैं। परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम व्यक्त करते हो और जो कुछ छिपाते हो।

قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا۟ مِنْ أَبْصَـٰرِهِمْ وَيَحْفَظُوا۟ فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرٌۢ بِمَا يَصْنَعُونَ ﴿30﴾ وَقُل لِّلْمُؤْمِنَـٰتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَـٰرِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا ۖ وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ ۖ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ ءَابَآئِهِنَّ أَوْ ءَابَآءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَآئِهِنَّ أَوْ أَبْنَآءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَٰنِهِنَّ أَوْ بَنِىٓ إِخْوَٰنِهِنَّ أَوْ بَنِىٓ أَخَوَٰتِهِنَّ أَوْ نِسَآئِهِنَّ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُنَّ أَوِ ٱلتَّـٰبِعِينَ غَيْرِ أُو۟لِى ٱلْإِرْبَةِ مِنَ ٱلرِّجَالِ أَوِ ٱلطِّفْلِ ٱلَّذِينَ لَمْ يَظْهَرُوا۟ عَلَىٰ عَوْرَٰتِ ٱلنِّسَآءِ ۖ وَلَا يَضْرِبْنَ بِأَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِينَ مِن زِينَتِهِنَّ ۚ وَتُوبُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ ٱلْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ ﴿31﴾

(हे पैग़ंबर), अपने मानने वालों को उपदेश करो कि (इन घरों में स्त्रियाँ हों तो) अपनी नज़रें बचा कर रखें और अपने गुप्त अंगो की रक्षा करें। यह उनके लिए अधिक पवित्र मार्ग है। इसमें संदेह नहीं कि जो कुछ वे करते हैं, परमेश्वर उससे भलीभांति परिचित है। और मानने वाली स्त्रियों को उपदेश करो कि वे भी अपनी नज़रें बचा कर रखें और अपने गुप्त अंगों की सुरक्षा करें और अपने शृंगार की चीज़ें न खोलें, सिवाए उनके जो उनमें से खुली होती हैं और इसके लिए अपनी ओढ़नियों के आँचल अपनी छातियों पर डाले रहें। और अपने शृंगार की चीज़ें न खोलें, किंतु अपने पतियों के सामने या अपने पिता, अपने पतियों के पिता, अपने बेटों, अपने पतियों के बेटों, अपने भाइयों, अपने भाइयों के बेटों, अपनी बहनों के बेटों, अपने मेल जोल की स्त्रियों और अपने ग़ुलामों के सामने या उन सेवक पुरुषों के सामने जो स्त्रियों की इच्छा नहीं रखते या उन बच्चों के सामने जो स्त्रियों की गुप्त बातों से अभी परिचित नहीं हुए। और अपने पाँव धरती पर मारती हुई न चलें कि उनके छिपे हुए आभूषण का पता चले। हे मानने वालो, (अब तक की भूलों पर) सब मिल कर परमेश्वर की ओर पलटो ताकि तुम सफलता पाओ।

وَأَنكِحُوا۟ ٱلْأَيَـٰمَىٰ مِنكُمْ وَٱلصَّـٰلِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَآئِكُمْ ۚ إِن يَكُونُوا۟ فُقَرَآءَ يُغْنِهِمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ ﴿32﴾ وَلْيَسْتَعْفِفِ ٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ نِكَاحًا حَتَّىٰ يُغْنِيَهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ ۗ وَٱلَّذِينَ يَبْتَغُونَ ٱلْكِتَـٰبَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًا ۖ وَءَاتُوهُم مِّن مَّالِ ٱللَّهِ ٱلَّذِىٓ ءَاتَىٰكُمْ ۚ وَلَا تُكْرِهُوا۟ فَتَيَـٰتِكُمْ عَلَى ٱلْبِغَآءِ إِنْ أَرَدْنَ تَحَصُّنًا لِّتَبْتَغُوا۟ عَرَضَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَمَن يُكْرِههُّنَّ فَإِنَّ ٱللَّهَ مِنۢ بَعْدِ إِكْرَٰهِهِنَّ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿33﴾ وَلَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكُمْ ءَايَـٰتٍ مُّبَيِّنَـٰتٍ وَمَثَلًا مِّنَ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِكُمْ وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ ﴿34﴾

(इसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि) तुम में से जो लोग अविवाहित हों, उनके विवाह कर दो और अपने उन ग़ुलामों और दासियों के भी जो इसकी क्षमता रखते हों। यदि वे ग़रीब होंगे तो परमेश्वर उन को अपने अनुग्रह से समृद्ध कर देगा। परमेश्वर बड़ा व्यापक है, वह हर चीज़ का ज्ञान रखता है। और जो विवाह का अवसर न पाएं, उन्हें चाहिए कि अपने आप को वश में रखें, यहाँ तक कि परमेश्वर उन्हें अपने अनुग्रह से समृद्ध कर दे। और तुम्हारे स्वामित्व में जो मुकातबत चाहें, उनसे मुकातबत कर लो, यदि तुम उनमें अच्छाई पाओ (ताकि वे भी पवित्रता में आगे बढ़ें)। और (इसके लिए यदि आवश्यक हो तो मुसलमानो), उन्हें उस धन में से दो जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। और केवल इसलिए कि दुनिया के जीवन का कुछ लाभ तुम्हें प्राप्त हो जाए, अपनी दासियों को वेश्यावृत्ति पर विवश न करो, जबकि वे निष्कलंक व पवित्र रहना चाहती हों। और जो उन्हें मजबूर करेगा तो इसका पाप उसी पर है, इसलिए कि उनपर इस ज़बरदस्ती के बाद परमेश्वर (उनके लिए) क्षमा करने वाला और कृपा करने वाला है। हमने तुम्हारी ओर, (हे पैग़ंबर, यह) खोल कर बताने वाली आयतें उतार दी हैं और उन लोगों का उदाहरण भी जो तुमसे पूर्व चल बसे हैं और परमेश्वर से डरने वालों के लिए अच्छा उपदेश भी।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात यह क्षमता देखो कि वह भलाई और नेकी के साथ अपने पाँव पर खड़ा हो सकता है। ↩
ٱللَّهُ نُورُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ مَثَلُ نُورِهِۦ كَمِشْكَوٰةٍ فِيهَا مِصْبَاحٌ ۖ ٱلْمِصْبَاحُ فِى زُجَاجَةٍ ۖ ٱلزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوْكَبٌ دُرِّىٌّ يُوقَدُ مِن شَجَرَةٍ مُّبَـٰرَكَةٍ زَيْتُونَةٍ لَّا شَرْقِيَّةٍ وَلَا غَرْبِيَّةٍ يَكَادُ زَيْتُهَا يُضِىٓءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌ ۚ نُّورٌ عَلَىٰ نُورٍ ۗ يَهْدِى ٱللَّهُ لِنُورِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ وَيَضْرِبُ ٱللَّهُ ٱلْأَمْثَـٰلَ لِلنَّاسِ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿35﴾ فِى بُيُوتٍ أَذِنَ ٱللَّهُ أَن تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيهَا ٱسْمُهُۥ يُسَبِّحُ لَهُۥ فِيهَا بِٱلْغُدُوِّ وَٱلْـَٔاصَالِ ﴿36﴾ رِجَالٌ لَّا تُلْهِيهِمْ تِجَـٰرَةٌ وَلَا بَيْعٌ عَن ذِكْرِ ٱللَّهِ وَإِقَامِ ٱلصَّلَوٰةِ وَإِيتَآءِ ٱلزَّكَوٰةِ ۙ يَخَافُونَ يَوْمًا تَتَقَلَّبُ فِيهِ ٱلْقُلُوبُ وَٱلْأَبْصَـٰرُ ﴿37﴾ لِيَجْزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا۟ وَيَزِيدَهُم مِّن فَضْلِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ ﴿38﴾

(उदाहरण यह है कि) परमेश्वर धरती और समस्त आकाशों का प्रकाश है। (मनुष्य के दिल में) उसके इस प्रकाश का उदाहरण ऐसा है, जैसे एक ताक़ जिसमें एक दिया है। दीया शीशे के अंदर है। शीशा ऐसा है, जैसे एक चमकता हुआ तारा। वह ज़ैतून के ऐसे हरे-भरे वृक्ष के तेल से प्रकाशित किया जाता है जो न पूरब का है न पश्चिम का। उसका तेल (ऐसा पारदर्शी है कि) मानो आग के छुए बिना ही भड़क उठेगा। प्रकाश के ऊपर प्रकाश! परमेश्वर जिसको चाहता है, अपने इस प्रकाश का मार्ग दिखाता है। परमेश्वर इन उदाहरणों का वर्णन लोगों के मार्गदर्शन के लिए करता है और परमेश्वर हर चीज़ से परिचित है। (ये ताक़) उन घरों में हैं जिनके बारे में परमेश्वर ने आदेश दिया कि निर्माण किए जाएं और उनमें उसके नाम का स्मरण किया जाए। उनमें वे सत्यवादी सुबह-शाम उसकी स्तुति करते हैं जिन्हें व्यापार और लेन-देन परमेश्वर की याद और नमाज़ के प्रबंध और ज़कात के भुगतान से बेपरवाह नहीं करता। वह उस दिन से डरते रहते हैं जिसमें दिल उलट पलट होंगे और आँखें फिरी की फिरी रह जाएंगी कि परमेश्वर उनके कर्मों का सबसे उत्तम फल उन्हें दे और उनको अपनी कृपा से और भी दे। परमेश्वर जिसको चाहेगा, असंख्य मात्रा में देगा।

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَعْمَـٰلُهُمْ كَسَرَابٍۭ بِقِيعَةٍ يَحْسَبُهُ ٱلظَّمْـَٔانُ مَآءً حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَهُۥ لَمْ يَجِدْهُ شَيْـًٔا وَوَجَدَ ٱللَّهَ عِندَهُۥ فَوَفَّىٰهُ حِسَابَهُۥ ۗ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ ﴿39﴾ أَوْ كَظُلُمَـٰتٍ فِى بَحْرٍ لُّجِّىٍّ يَغْشَىٰهُ مَوْجٌ مِّن فَوْقِهِۦ مَوْجٌ مِّن فَوْقِهِۦ سَحَابٌ ۚ ظُلُمَـٰتٌۢ بَعْضُهَا فَوْقَ بَعْضٍ إِذَآ أَخْرَجَ يَدَهُۥ لَمْ يَكَدْ يَرَىٰهَا ۗ وَمَن لَّمْ يَجْعَلِ ٱللَّهُ لَهُۥ نُورًا فَمَا لَهُۥ مِن نُّورٍ ﴿40﴾

इसके विपरीत जो लोग इस प्रकाश के नकारने वाले हैं, उनके कर्मों का उदाहरण यह है कि जैसे उजाड़ रेगिस्तान में मृगजल जिसको प्यासा पानी समझे, यहाँ तक कि जब उसके पास आए तो उसे कुछ न पाए। अपितु वहां परमेश्वर को पाए, फिर वह उसका हिसाब पूरा-पूरा चुका दे और परमेश्वर को हिसाब चुकाते कभी देर नहीं लगती। या जैसे एक गहरे समुद्र में अंधेरे कि जिसको मौज के ऊपर मौज ढाँक रही हो, ऊपर से बादल छाए हुए हों। (मतलब यह कि) ऊपर तले अंधेरे ही अंधेरे हों। जब कोई अपना हाथ निकाले तो उसको भी न देख पाए। सत्य यह है कि जिसे परमेश्वर प्रकाश न दे, उसके लिए फिर कोई प्रकाश नहीं है।

أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُسَبِّحُ لَهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱلطَّيْرُ صَـٰٓفَّـٰتٍ ۖ كُلٌّ قَدْ عَلِمَ صَلَاتَهُۥ وَتَسْبِيحَهُۥ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِمَا يَفْعَلُونَ ﴿41﴾ وَلِلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلْمَصِيرُ ﴿42﴾

तुमने देखा नहीं कि जो धरती और समस्त आकाशों में हैं, सब परमेश्वर ही का गुणगान करते हैं और पक्षी भी, परों को फैलाए हुए? हर एक ने अपनी नमाज़ और अपना गुणगान भलीभांति जान रखा है। (तुम नहीं जानते तो क्या हुआ, परंतु) परमेश्वर जानता है जो कुछ वे करते हैं। धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य परमेश्वर ही के लिए है और परमेश्वर ही की ओर (सबको) पलटना है।

أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُزْجِى سَحَابًا ثُمَّ يُؤَلِّفُ بَيْنَهُۥ ثُمَّ يَجْعَلُهُۥ رُكَامًا فَتَرَى ٱلْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَـٰلِهِۦ وَيُنَزِّلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن جِبَالٍ فِيهَا مِنۢ بَرَدٍ فَيُصِيبُ بِهِۦ مَن يَشَآءُ وَيَصْرِفُهُۥ عَن مَّن يَشَآءُ ۖ يَكَادُ سَنَا بَرْقِهِۦ يَذْهَبُ بِٱلْأَبْصَـٰرِ ﴿43﴾ يُقَلِّبُ ٱللَّهُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةً لِّأُو۟لِى ٱلْأَبْصَـٰرِ ﴿44﴾

तुमने देखा नहीं कि परमेश्वर बादलों को हांक लाता है, फिर उन (के अलग-अलग टुकड़ों) को आपस में मिलाता है, फिर उनको उनकी परतें बना देता है? फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से (तुम्हारे लिए कृपा की) वर्षा निकलती है और (इसी प्रकार जब वह चेतावनी की इच्छा करता है तो) आकाश से — उसके अंदर (ओलों) के पर्वतों से — ओले बरसाता है। फिर जिस पर चाहता है, उन्हें गिराता है और जिससे चाहता है, उन्हें हटा देता है। उसकी बिजली की चमक है कि मानो आंखों को उचक ले चली जाती है। रात और दिन का उलटफेर भी परमेश्वर ही कर रहा है। सत्य यह है कि आंख वालों के लिए इसमें सीखने की बड़ी सामग्री है।

وَٱللَّهُ خَلَقَ كُلَّ دَآبَّةٍ مِّن مَّآءٍ ۖ فَمِنْهُم مَّن يَمْشِى عَلَىٰ بَطْنِهِۦ وَمِنْهُم مَّن يَمْشِى عَلَىٰ رِجْلَيْنِ وَمِنْهُم مَّن يَمْشِى عَلَىٰٓ أَرْبَعٍ ۚ يَخْلُقُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿45﴾

प्रत्येक प्राणी को परमेश्वर ही ने पानी से पैदा किया है। फिर (तुम देखते हो कि) इनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है तो इनमें से कोई दो पाँव पर चलता है और इनमें से कोई चार पाँव पर। परमेश्वर जो चाहे, पैदा कर देता है। निस्संदेह, परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।

لَّقَدْ أَنزَلْنَآ ءَايَـٰتٍ مُّبَيِّنَـٰتٍ ۚ وَٱللَّهُ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿46﴾

हमने यह अति-स्पष्ट आयतें उतार दी हैं। (इसलिए कि लोग समझें। आगे) परमेश्वर ही जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार) सीधा मार्ग दिखा देता है।

وَيَقُولُونَ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلرَّسُولِ وَأَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿47﴾ وَإِذَا دُعُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم مُّعْرِضُونَ ﴿48﴾ وَإِن يَكُن لَّهُمُ ٱلْحَقُّ يَأْتُوٓا۟ إِلَيْهِ مُذْعِنِينَ ﴿49﴾ أَفِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ٱرْتَابُوٓا۟ أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُۥ ۚ بَلْ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿50﴾ إِنَّمَا كَانَ قَوْلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ إِذَا دُعُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ أَن يَقُولُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ ﴿51﴾ وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَيَخْشَ ٱللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ ﴿52﴾

(ये नहीं समझते), ये कहते हैं कि हमने परमेश्वर और उसके रसूल को माना है और हमने आज्ञाकारी होना स्वीकार कर लिया है। फिर इनमें से एक समूह इसके बाद पलट जाता है। सत्य यह है कि ये मानने वाले नहीं हैं। इन्हें जब परमेश्वर और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है कि रसूल इनके बीच (इनके आपसी झगड़ों का) निपटारा कर दे तो इनमें से एक समूह उसी समय टालमटोल कर जाता है। अपितु यदि हक़ इनको मिलने वाला हो तो रसूल के पास बड़े आज्ञाकारी बन कर आ जाते हैं। क्या इनके दिलों में (कपट का) रोग है या अभी संदेह में पड़े हुए हैं या इन्हें आशंका है कि परमेश्वर और उसका रसूल इनके साथ अन्याय करेंगे? कदापि नहीं, अपितु ये स्वयं ही अन्याय करने वाले हैं। मानने वालों की बात तो यह होती है कि जब वे परमेश्वर और उसके रसूल की ओर बुलाए जाते हैं कि रसूल उनके बीच निर्णय करे तो कहते हैं कि हमने सुना और माना। सत्य यह है कि यही लोग सफलता पाने वाले हैं। (याद रखो), जो परमेश्वर और उसके रसूल के आज्ञाकारी होंगे और परमेश्वर से डरेंगे और उसकी मर्यादा का पालन करेंगे तो वही हैं जो सफल होंगे।

وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ ۖ قُل لَّا تُقْسِمُوا۟ ۖ طَاعَةٌ مَّعْرُوفَةٌ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ ﴿53﴾ قُلْ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُم مَّا حُمِّلْتُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا۟ ۚ وَمَا عَلَى ٱلرَّسُولِ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ ﴿54﴾

(ये मुनाफ़िक़ीन वे लोग हैं कि) इन्होंने परमेश्वर की कड़ी-कड़ी क़समें खाईं कि यदि तुम इन्हें (जिहाद का) आदेश दोगे तो ये अवश्य निकलेंगे। कह दो कि क़समें न खाओ। तुमसे नियम अनुसार आज्ञापालन चाहिए। निस्संदेह परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम कर रहे हो। इनसे कह दो कि परमेश्वर की आज्ञा का पालन करो और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। परंतु यदि विरोध करोगे तो (याद रखो कि) रसूल पर वही दायित्व है जो उस पर डाला गया है और तुम पर वही जो तुम पर डाला गया है। तुम उसकी आज्ञा का पालन करोगे तो सन्मार्ग पाओगे और रसूल पर तो केवल स्पष्ट रूप से बात पहुंचा देने का दायित्व है।

وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنكُمْ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ كَمَا ٱسْتَخْلَفَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ ٱلَّذِى ٱرْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّنۢ بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِى لَا يُشْرِكُونَ بِى شَيْـًٔا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ ﴿55﴾

तुम में से जो लोग मान चुके और उन्होंने भले कर्म किए हैं, उनसे परमेश्वर का वादा है कि उनको वह इस भूभाग में अवश्य उसी प्रकार सत्ता प्रदान करेगा, जिस प्रकार उनसे पहले के लोगों को उसने प्रदान की थी और उनके लिए उनके धर्म को पूर्णतः स्थापित कर देगा जिसे उसने उनके लिए चुन लिया है और उनकी इस भय की स्थिति के बाद इसे अवश्य शांति से बदल देगा। वे मेरी उपासना करेंगे, किसी को मेरा सहभागी नहीं बनाएँगे। और जो इसके बाद भी नकारने वाले हों तो वही अवज्ञाकारी हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात अरब की भूमि में — आगे इसका विस्तार है। इतिहास साक्षी है कि परमेश्वर का यह वादा अपनी पूरी शान के साथ पूरा हुआ, यहाँ तक कि अब संसार में कोई भी व्यक्ति इसे नकारने का साहस नहीं कर सकता। ↩
وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ﴿56﴾ لَا تَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ ﴿57﴾

(तुम अपनी शंकाओं से मुक्ति चाहते हो तो) नमाज़ का प्रबंध रखो और ज़कात का भुगतान करो और रसूल के आज्ञाकारी बन कर रहो ताकि तुम पर दया की जाए। इन नकारने वालों के बारे में कभी यह विचार न करो कि इस भूभाग में ये परमेश्वर को परास्त कर देंगे। (कदापि नहीं, ये स्वयं परास्त होंगे) और इनका ठिकाना (आगे भी) नरक है और वह अत्यंत बुरा ठिकाना है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لِيَسْتَـْٔذِنكُمُ ٱلَّذِينَ مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ وَٱلَّذِينَ لَمْ يَبْلُغُوا۟ ٱلْحُلُمَ مِنكُمْ ثَلَـٰثَ مَرَّٰتٍ ۚ مِّن قَبْلِ صَلَوٰةِ ٱلْفَجْرِ وَحِينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُم مِّنَ ٱلظَّهِيرَةِ وَمِنۢ بَعْدِ صَلَوٰةِ ٱلْعِشَآءِ ۚ ثَلَـٰثُ عَوْرَٰتٍ لَّكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌۢ بَعْدَهُنَّ ۚ طَوَّٰفُونَ عَلَيْكُم بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿58﴾ وَإِذَا بَلَغَ ٱلْأَطْفَـٰلُ مِنكُمُ ٱلْحُلُمَ فَلْيَسْتَـْٔذِنُوا۟ كَمَا ٱسْتَـْٔذَنَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿59﴾ وَٱلْقَوَٰعِدُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ ٱلَّـٰتِى لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ مُتَبَرِّجَـٰتٍۭ بِزِينَةٍ ۖ وَأَن يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌ لَّهُنَّ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿60﴾

हे मानने वालो, (तुम्हारे मन और दृष्टि की शुद्धि के लिए जो निर्देश हमने दिए हैं, तुम उनकी और अधिक व्याख्या चाहते हो तो सुनो), तुम्हारे दास और दासियाँ और तुम में जो युवा अवस्था को नहीं पहुंचे, तीन घड़ियों में तुमसे अनुमति लेकर तुम्हारे पास आया करें: फ़ज्र की नमाज़ से पहले; जब दोपहर को तुम वस्त्र उतारते हो और इशा की नमाज़ के बाद। ये तीन घड़ियाँ तुम्हारे लिए निजी घड़ियां हैं। इनके अतिरिक्त (वे अनुमति के बिना आजाएँ तो) न तुम पर कोई पाप है न उन पर, इसलिए कि तुम एक दूसरे के पास आने जाने वाले ही हो। परमेश्वर तुम्हारे लिए इसी प्रकार अपनी आयतों की व्याख्या करता है और परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है। तुम में से जो बच्चे हैं, जब वे वयस्क हो जाएँ तो उसी प्रकार अनुमति ले कर आएँ, जिस प्रकार उन के अगले अनुमति लेते रहे हैं। परमेश्वर इसी प्रकार अपनी आयतों की व्याख्या करता है और परमेश्वर ज्ञानी और प्रज्ञावान है। और बड़ी बूढ़ी महिलाएं जो अब विवाह की आशा नहीं रखतीं, वे यदि अपने दुपट्टे गरेबानों से उतार दें तो उनपर कोई दोष नहीं, इस शर्त के साथ कि सौन्दर्य की नुमाइश करने वाली नह हों। परंतु वे भी सावधानी बरतें तो उनके लिए अच्छा है और परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।12

टिप्पणियाँ 2
  1. अर्थात उनके बड़े [वयस्क]। ↩
  2. पहले यह निर्देश दिया जा चुका है कि यदि स्त्रियाँ श्रृंगार की हुई हों तो जिनके साथ विवाह वैध है (अर्थात गैर-महरम), उनके सामने वे अपना गिरेबान और अपनी छाती ओढ़नियों के आँचल से ढककर रखें। यह उसी को स्पष्ट करने के लिए कहा गया है। ↩
لَّيْسَ عَلَى ٱلْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى ٱلْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى ٱلْمَرِيضِ حَرَجٌ وَلَا عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمْ أَن تَأْكُلُوا۟ مِنۢ بُيُوتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ ءَابَآئِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أُمَّهَـٰتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ إِخْوَٰنِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخَوَٰتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَعْمَـٰمِكُمْ أَوْ بُيُوتِ عَمَّـٰتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخْوَٰلِكُمْ أَوْ بُيُوتِ خَـٰلَـٰتِكُمْ أَوْ مَا مَلَكْتُم مَّفَاتِحَهُۥٓ أَوْ صَدِيقِكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَأْكُلُوا۟ جَمِيعًا أَوْ أَشْتَاتًا ۚ فَإِذَا دَخَلْتُم بُيُوتًا فَسَلِّمُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمْ تَحِيَّةً مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُبَـٰرَكَةً طَيِّبَةً ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿61﴾

(परमेश्वर इन निर्देशों से तुम्हारे लिए कोई तंगी पैदा नहीं करना चाहता, इसलिए) न अंधे के लिए कोई संकोच है, न लंगड़े के लिए और न रोगी के लिए और न स्वयं तुम्हारे लिए कि तुम अपने घरों से या अपने बाप दादा के घरों से या अपनी माताओं के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चाचाओं के घरों से या अपनी बुआओं के घरों से या अपने मामाओं के घरों से या अपनी मौसियों के घरों से या अपनी निगरानी में रहने वालों के घरों से या अपने मित्रों के घरों से खाओ पियो। तुम पर कोई दोष नहीं, चाहे (स्त्री और पुरुष) एक साथ बैठ कर खाओ या अलग अलग। अपितु, जब घरों में प्रवेश करो तो अपने लोगों को सलाम करो, परमेश्वर की ओर से निर्धारित की हुई एक शुभ और पावन प्रार्थना। परमेश्वर तुम्हारे लिए इसी प्रकार अपनी आयतों की व्याख्या करता है ताकि तुम बुद्धि से काम लो।

إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَإِذَا كَانُوا۟ مَعَهُۥ عَلَىٰٓ أَمْرٍ جَامِعٍ لَّمْ يَذْهَبُوا۟ حَتَّىٰ يَسْتَـْٔذِنُوهُ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَسْتَـْٔذِنُونَكَ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۚ فَإِذَا ٱسْتَـْٔذَنُوكَ لِبَعْضِ شَأْنِهِمْ فَأْذَن لِّمَن شِئْتَ مِنْهُمْ وَٱسْتَغْفِرْ لَهُمُ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿62﴾

(यही शुद्धता तुम्हारे आचरण में भी चाहिए। इसलिए कि) मोमिन तो वास्तव में वही हैं जो परमेश्वर और उसके रसूल पर सच्चा विश्वास रखते हैं और जब किसी सामूहिक कार्य के लिए रसूल के साथ होते हैं तो जब तक उससे अनुमति न ले लें, वहां से नहीं जाते। जो लोग तुम से अनुमति लेकर जाते हैं, वही, (हे पैग़ंबर), परमेश्वर और उसके रसूल के मानने वाले हैं। अतः जब वे अपने किसी कार्य के लिए तुम से अनुमति मांगें तो उनमें से जिसको चाहो, अनुमति दे दिया करो और उनके लिए परमेश्वर से क्षमा की प्रार्थना करते रहो। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

لَّا تَجْعَلُوا۟ دُعَآءَ ٱلرَّسُولِ بَيْنَكُمْ كَدُعَآءِ بَعْضِكُم بَعْضًا ۚ قَدْ يَعْلَمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ يَتَسَلَّلُونَ مِنكُمْ لِوَاذًا ۚ فَلْيَحْذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يُصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿63﴾ أَلَآ إِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ قَدْ يَعْلَمُ مَآ أَنتُمْ عَلَيْهِ وَيَوْمَ يُرْجَعُونَ إِلَيْهِ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۢ ﴿64﴾

तुम लोग अपने बीच रसूल के बुलाने को उस प्रकार का बुलाना न समझो, जिस प्रकार तुम आपस में एक दूसरे को बुलाते हो। परमेश्वर उन लोगों को भलीभांति जानता है जो तुम में से एक दूसरे की आड़ लेते हुए चुपके से चले जाते रहे हैं। अतः उन लोगों को डरना चाहिए जो रसूल के आदेश को टालकर उसका विरोध करते रहे हैं कि उनपर कोई परीक्षा आ जाए या उनको कष्टदायक यातना आ पकड़े। सुनो, धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर ही का है। तुम जिस हाल पर हो, परमेश्वर उसको जान चुका है। जिस दिन ये उसकी ओर लौटाए जाएँगे तो वह इन्हें बता देगा जो कुछ ये कर के आए हैं। और (याद रखो कि) परमेश्वर हर चीज़ से परिचित है।