सूरह 23

अल्-मोमीनून

मक्की · 118 आयतें · 26 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

قَدْ أَفْلَحَ ٱلْمُؤْمِنُونَ ﴿1﴾ ٱلَّذِينَ هُمْ فِى صَلَاتِهِمْ خَـٰشِعُونَ ﴿2﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ عَنِ ٱللَّغْوِ مُعْرِضُونَ ﴿3﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ لِلزَّكَوٰةِ فَـٰعِلُونَ ﴿4﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَـٰفِظُونَ ﴿5﴾ إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ ﴿6﴾ فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ ﴿7﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ ﴿8﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَوَٰتِهِمْ يُحَافِظُونَ ﴿9﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْوَٰرِثُونَ ﴿10﴾ ٱلَّذِينَ يَرِثُونَ ٱلْفِرْدَوْسَ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿11﴾

अपने मनोरथ को पा गए मानने वाले। जो अपनी नमाज़ में विनम्रता दिखाने वाले हैं, जो अनर्गल बातों से दूर रहने वाले हैं और जो ज़कात देने वाले और अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैं। अपनी पत्नियों और दासियों के सिवा कि उनके बारे में उनपर कोई दोष नहीं है। हाँ, जो इसके अतिरिक्त चाहें तो वही हैं जो मर्यादा से आगे बढ़ने वाले हैं — और जो अपनी अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखने वाले हैं और जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं। वही अधिकारी होने वाले हैं, जो फ़िरदौस के अधिकारी होंगे। वे उसमें सदा रहेंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात पत्नियों और दासियों के अतिरिक्त किसी अन्य की कामना करें। ↩
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِن سُلَـٰلَةٍ مِّن طِينٍ ﴿12﴾ ثُمَّ جَعَلْنَـٰهُ نُطْفَةً فِى قَرَارٍ مَّكِينٍ ﴿13﴾ ثُمَّ خَلَقْنَا ٱلنُّطْفَةَ عَلَقَةً فَخَلَقْنَا ٱلْعَلَقَةَ مُضْغَةً فَخَلَقْنَا ٱلْمُضْغَةَ عِظَـٰمًا فَكَسَوْنَا ٱلْعِظَـٰمَ لَحْمًا ثُمَّ أَنشَأْنَـٰهُ خَلْقًا ءَاخَرَ ۚ فَتَبَارَكَ ٱللَّهُ أَحْسَنُ ٱلْخَـٰلِقِينَ ﴿14﴾ ثُمَّ إِنَّكُم بَعْدَ ذَٰلِكَ لَمَيِّتُونَ ﴿15﴾ ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ تُبْعَثُونَ ﴿16﴾

(तुम्हारे नकारने वाले इसको नहीं मानते तो देखें कि) हमने मनुष्य को मिट्टी के तत्व से पैदा किया था। फिर उसको (आगे के लिए) हमने पानी की एक (टपकी हुई) बूंद बनाकर एक सुरक्षित ठिकाने में रख दिया। फिर पानी की उस बूंद को हमने एक जमे हुए खून का रूप दिया और जमे हुए खून को मांस की एक बंधी हुई बोटी बनाया और उस बोटी की हड्डियों की रचना की और हड्डियों पर मांस चढ़ा दिया। फिर हमने उसको एक और ही रचना बना कर खड़ा किया। तो बड़ा ही धन्य है परमेश्वर, सबसे अच्छा पैदा करने वाला। फिर यह भी सत्य है कि इसके बाद तुम को अवश्य मरना है। फिर यह कि क़यामत के दिन तुम अवश्य उठाए भी जाओगे।

وَلَقَدْ خَلَقْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعَ طَرَآئِقَ وَمَا كُنَّا عَنِ ٱلْخَلْقِ غَـٰفِلِينَ ﴿17﴾ وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۢ بِقَدَرٍ فَأَسْكَنَّـٰهُ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَإِنَّا عَلَىٰ ذَهَابٍۭ بِهِۦ لَقَـٰدِرُونَ ﴿18﴾ فَأَنشَأْنَا لَكُم بِهِۦ جَنَّـٰتٍ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَـٰبٍ لَّكُمْ فِيهَا فَوَٰكِهُ كَثِيرَةٌ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ ﴿19﴾ وَشَجَرَةً تَخْرُجُ مِن طُورِ سَيْنَآءَ تَنۢبُتُ بِٱلدُّهْنِ وَصِبْغٍ لِّلْـَٔاكِلِينَ ﴿20﴾ وَإِنَّ لَكُمْ فِى ٱلْأَنْعَـٰمِ لَعِبْرَةً ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِى بُطُونِهَا وَلَكُمْ فِيهَا مَنَـٰفِعُ كَثِيرَةٌ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ ﴿21﴾ وَعَلَيْهَا وَعَلَى ٱلْفُلْكِ تُحْمَلُونَ ﴿22﴾

और (यही नहीं), हमने तुम्हारे ऊपर अनेक परतों में सात आकाश बनाए हैं और हम अपनी रचनाओं से बेपरवाह नहीं हुए। और हमने आकाश से एक माप के साथ पानी बरसाया, फिर उसको धरती में ठहरा दिया और हम (यदि चाहते तो) उसको वापस भी ले जा सकते थे। फिर इसी से हमने तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ उगाए हैं। इनमें तुम्हारे लिए बहुत से फल हैं जिनसे तुम स्वाद लेते हो और इन्हीं से अपने भोजन का प्रबंध भी करते हो। इसी प्रकार वह वृक्ष भी उगाया है जो सीना के तूर पर्वत से निकलता है। वह तेल लिए हुए उगता है और (तेल के रूप में खाने) वालों के लिए एक अच्छा सालन भी। और तुम्हारे लिए चौपायों में भी अवश्य बड़ी सीख है। हम उन चीज़ों के अंदर से जो उनके पेट में हैं, तुम्हें (स्वादिष्ट दूध) पिलाते हैं और तुम्हारे लिए इनमें बहुत से अनेक लाभ भी हैं और तुम इन्हीं से अपना भोजन प्राप्त करते हो। और इन पर और नौकाओं पर (जो समुद्र में चलती हैं), सवार भी किए जाते हो।

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦ فَقَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴿23﴾ فَقَالَ ٱلْمَلَؤُا۟ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ مَا هَـٰذَآ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُرِيدُ أَن يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَنزَلَ مَلَـٰٓئِكَةً مَّا سَمِعْنَا بِهَـٰذَا فِىٓ ءَابَآئِنَا ٱلْأَوَّلِينَ ﴿24﴾ إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌۢ بِهِۦ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا۟ بِهِۦ حَتَّىٰ حِينٍ ﴿25﴾

(और वह नाव भी याद है जिसमें जलप्रलय से निकले थे?) हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा था तो उसने आह्वान किया कि मेरी क़ौम के लोगो, परमेश्वर की भक्ति करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं है। फिर क्या (उसके सहभागी बनाकर तुम उसके प्रकोप से) डरते नहीं हो? उसने यह आह्वान किया तो उसकी क़ौम के सरदारों ने, जो नकारने वाले थे, कहा कि यह तो केवल तुम्हारे जैसा एक व्यक्ति है। यह तुम पर बड़ाई प्राप्त करना चाहता है। परमेश्वर को यदि भेजना होता तो फ़रिश्ते उतारता। हमने इस प्रकार की बात अपने पूर्वजों से तो कभी सुनी नहीं। कुछ नहीं, यह एक व्यक्ति है कि जिसे पागलपन लग गया है है। तो कुछ दिन इसकी प्रतीक्षा करो, (इसके ये भ्रम समाप्त हो जाएँगे)।

قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى بِمَا كَذَّبُونِ ﴿26﴾ فَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِ أَنِ ٱصْنَعِ ٱلْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَآءَ أَمْرُنَا وَفَارَ ٱلتَّنُّورُ ۙ فَٱسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّ زَوْجَيْنِ ٱثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ ٱلْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا تُخَـٰطِبْنِى فِى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ ﴿27﴾

नूह ने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, अब तू उसी चीज़ से मेरी सहायता कर जिसमें उन्होंने मुझे झूठा कह दिया है। तो हमने उसकी ओर वह्य की कि हमारी देख-रेख में और हमारी शिक्षा के अनुसार नौका बनाओ। फिर जब हमारा आदेश आ जाए और तूफ़ान उबल पड़े तो उसमें हर प्रकार के (जानवरों के) जोड़े रख लो, (नर व मादा) दो-दो और (उनके साथ) अपने लोगों को भी सवार करा लो, उनमें से सिवाए उनके जिनके बारे में पहले निर्णय हो चुका है और मुझसे उन लोगों के बारे में कुछ न कहना जिन्होंने अपने प्राणों पर अत्याचार किया है, वे अवश्य डूब के रहेंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यह मन में विद्यमान विशेषण (मअहूद ज़हनी) की दृष्टि से है, अर्थात उन जानवरों के जोड़े जिनकी जलप्रलय के पश्चात् आवश्यकता हो सकती है। ↩
فَإِذَا ٱسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى ٱلْفُلْكِ فَقُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى نَجَّىٰنَا مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿28﴾ وَقُل رَّبِّ أَنزِلْنِى مُنزَلًا مُّبَارَكًا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْمُنزِلِينَ ﴿29﴾ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ وَإِن كُنَّا لَمُبْتَلِينَ ﴿30﴾

फिर जब तुम और तुम्हारे साथी नौका में सवार हो लें तो कहो कि आभार है उस परमेश्वर का जिसने इन अत्याचारी लोगों से हमें मुक्ति प्रदान की है। और प्रार्थना करो कि मेरे प्रभु, तू मुझे आशीष के साथ उतार और तू सबसे अच्छा उतारने वाला है। सत्य यह है कि इस वृत्तांत में बड़ी निशानियाँ हैं और परीक्षा तो हम करते ही हैं।

ثُمَّ أَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قَرْنًا ءَاخَرِينَ ﴿31﴾ فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴿32﴾ وَقَالَ ٱلْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَتْرَفْنَـٰهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا مَا هَـٰذَآ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ ﴿33﴾ وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَـٰسِرُونَ ﴿34﴾ أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًا وَعِظَـٰمًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ ﴿35﴾ هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ ﴿36﴾ إِنْ هِىَ إِلَّا حَيَاتُنَا ٱلدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ ﴿37﴾ إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا وَمَا نَحْنُ لَهُۥ بِمُؤْمِنِينَ ﴿38﴾

फिर इनके बाद हमने एक दूसरी क़ौम उठाई। और उनमें भी एक रसूल उन्हीं में से इस आह्वान के साथ भेजा कि परमेश्वर की भक्ति करो। उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं है। फिर क्या (उसके सहभागी बनाकर तुम उसके प्रकोप से) डरते नहीं हो? उसकी क़ौम के सरदारों ने, जो नकारने वाले थे, जिन्होंने परलोक के मिलने को झूठा कह दिया था और दुनिया के जीवन में जिनको हमने समृद्ध कर रखा था, कहा कि यह तो केवल तुम्हारे जैसा एक मानव है। वही खाता है जो तुम खाते हो और वही पीता है जो तुम पीते हो। अब यदि तुमने अपने ही जैसे एक मानव की बात मान ली तो उस समय अवश्य घाटे में रहोगे। क्या यह तुम्हें डराता है कि जब तुम मर जाओगे और मिट्टी और अस्थियां बन जाओगे तो अपनी क़ब्रों से अवश्य निकाले जाओगे? असंभव, पूर्णतः असंभव है यह डरावा जो तुम्हें सुनाया जा रहा है। जीवन तो यही हमारी दुनिया का जीवन है। हम (यहीं) मरते और जीते हैं और हमको कदापि उठना नहीं है। कुछ नहीं, यह एक व्यक्ति है जिसने परमेश्वर पर एक झूठ गढ़ा है और हम इसको कदापि मानने वाले नहीं हैं।

قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى بِمَا كَذَّبُونِ ﴿39﴾ قَالَ عَمَّا قَلِيلٍ لَّيُصْبِحُنَّ نَـٰدِمِينَ ﴿40﴾ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ بِٱلْحَقِّ فَجَعَلْنَـٰهُمْ غُثَآءً ۚ فَبُعْدًا لِّلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿41﴾

(इस पर) रसूल ने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, अब तू उसी चीज़ से मेरी सहायता कर जिसमें उन्होंने मुझे झूठा कह दिया है। परमेश्वर ने कहा: अब अधिक देर नहीं होगी कि ये पछताते रह जाएँगे। फिर उनको हमारे सत्य वचन के अनुसार एक कठोर डांट ने पकड़ा और हमने उनको कूड़ा कर्कट बना दिया। अतः ऐसे अत्याचारी लोगों पर परमेश्वर का अभिशाप!

ثُمَّ أَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قُرُونًا ءَاخَرِينَ ﴿42﴾ مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَـْٔخِرُونَ ﴿43﴾ ثُمَّ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَا ۖ كُلَّ مَا جَآءَ أُمَّةً رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُ ۚ فَأَتْبَعْنَا بَعْضَهُم بَعْضًا وَجَعَلْنَـٰهُمْ أَحَادِيثَ ۚ فَبُعْدًا لِّقَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ ﴿44﴾

फिर इनके बाद हमने दूसरी क़ौमें उठाईं। (उन्होंने भी अपने रसूलों के साथ यही मामला किया, अतः) कोई क़ौम न अपने लिए निर्धारित समय से आगे जाती थी, न पीछे रहती थी। फिर हमने एक के बाद एक अपने रसूल भेजे। (परंतु हुआ यही कि) जब भी किसी क़ौम के पास उसका रसूल आया, उन्होंने उसको झूठा कह दिया तो हमने भी उन क़ौमों में से एक के पीछे एक को लगाया और उनको कहानियां बना दिया। अतः उन लोगों पर अभिशाप जो (रसूलों की ओर से इत्माम-ए-हुज्जत पर भी) नहीं मानते!

ثُمَّ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ وَأَخَاهُ هَـٰرُونَ بِـَٔايَـٰتِنَا وَسُلْطَـٰنٍ مُّبِينٍ ﴿45﴾ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ وَكَانُوا۟ قَوْمًا عَالِينَ ﴿46﴾ فَقَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَـٰبِدُونَ ﴿47﴾ فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا۟ مِنَ ٱلْمُهْلَكِينَ ﴿48﴾ وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ ﴿49﴾

फिर मूसा और उसके भाई हारून को हमने अपनी निशानियों और स्पष्ट निर्णायक प्रमाण के साथ फ़िरऔन और उसके दरबारियों की ओर रसूल बनाकर भेजा तो उन्होंने भी अहंकार किया और वे बड़े उद्दंड लोग थे। अतः उन्होंने कहा कि क्या हम अपने ही जैसे दो मनुष्यों की बात मान लें, यद्यपि उनकी क़ौम हमारी ग़ुलामी कर रही है? तो उन्होंने दोनों को झूठा कह दिया और अंततः नष्ट होकर रहे। और हमने मूसा को (यह उपहार दिया कि उसको) धर्मग्रंथ प्रदान कर दिया ताकि उसकी क़ौम के लोग (उससे) मार्गदर्शन प्राप्त करें।

وَجَعَلْنَا ٱبْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُۥٓ ءَايَةً وَءَاوَيْنَـٰهُمَآ إِلَىٰ رَبْوَةٍ ذَاتِ قَرَارٍ وَمَعِينٍ ﴿50﴾

और मर्यम के पुत्र और उसकी मां को भी हमने इसी प्रकार एक महान निशानी बनाया और (एक बड़े संकट के समय) दोनों को एक टीले पर शरण दी जो शांति का स्थान था और वहां उनके लिए एक झरना बह रहा था।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلرُّسُلُ كُلُوا۟ مِنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ وَٱعْمَلُوا۟ صَـٰلِحًا ۖ إِنِّى بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ ﴿51﴾ وَإِنَّ هَـٰذِهِۦٓ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَٰحِدَةً وَأَنَا۠ رَبُّكُمْ فَٱتَّقُونِ ﴿52﴾

(इन पैग़ंबरों से हमने यही कहा कि) हे पैग़ंबरो, (तुम इन लोगों के अंधविश्वासों की परवाह न करो और) शुद्ध व निर्मल चीज़ें (बिना किसी संकोच के) खाओ और अच्छा कर्म करो। मैं जानता हूं जो कुछ तुम करते हो। यह तुम्हारा संघ है, एक ही संघ और मैं तुम्हारा प्रभु हूँ, तो मुझसे डरते रहो।

فَتَقَطَّعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ زُبُرًا ۖ كُلُّ حِزْبٍۭ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ ﴿53﴾ فَذَرْهُمْ فِى غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ ﴿54﴾ أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِۦ مِن مَّالٍ وَبَنِينَ ﴿55﴾ نُسَارِعُ لَهُمْ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ ﴿56﴾

फिर लोगों ने (उनके बाद) अपने धर्म को आपस में टुकड़े-टुकड़े कर लिया। अब प्रत्येक संप्रदाय के पास जो कुछ है, वह उसी में मगन है। तो इन्हें कुछ दिन इनकी इसी मस्ती में रहने दो। क्या ये समझते हैं कि हम जो धन और पुत्र इनको दिए जा रहे हैं तो मानो इनको भलाइयाँ पहुंचाने में लगे हैं? नहीं, अपितु इनको सत्य की समझ नहीं है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ ﴿57﴾ وَٱلَّذِينَ هُم بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ ﴿58﴾ وَٱلَّذِينَ هُم بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَ ﴿59﴾ وَٱلَّذِينَ يُؤْتُونَ مَآ ءَاتَوا۟ وَّقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَىٰ رَبِّهِمْ رَٰجِعُونَ ﴿60﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُسَـٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَهُمْ لَهَا سَـٰبِقُونَ ﴿61﴾ وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَـٰبٌ يَنطِقُ بِٱلْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿62﴾

अपितु, जो अपने प्रभु की धाक से डरे रहते हैं। और जो अपने प्रभु की आयतों पर विश्वास रखते हैं। और जो किसी को अपने प्रभु का सहभागी नहीं बनाते। और जो उसके मार्ग में देते हैं तो जो कुछ देते हैं, इस प्रकार देते हैं कि उनके दिल (इस विचार से) कांपते हैं कि उन्हें अपने प्रभु की ओर पलटना है। वही हैं जो भलाइयों के मार्ग में आगे निकल रहे हैं और वे उनको पाकर रहेंगे। सत्य यह है कि हम किसी पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालते और हमारे पास एक किताब है जो पूर्णतः ठीक-ठीक बता देगी (कि वे दुनिया में क्या कर्म करते रहे) और उनका थोड़ा सा भी अधिकार हनन न होगा।

بَلْ قُلُوبُهُمْ فِى غَمْرَةٍ مِّنْ هَـٰذَا وَلَهُمْ أَعْمَـٰلٌ مِّن دُونِ ذَٰلِكَ هُمْ لَهَا عَـٰمِلُونَ ﴿63﴾ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِٱلْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْـَٔرُونَ ﴿64﴾ لَا تَجْـَٔرُوا۟ ٱلْيَوْمَ ۖ إِنَّكُم مِّنَّا لَا تُنصَرُونَ ﴿65﴾ قَدْ كَانَتْ ءَايَـٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَـٰبِكُمْ تَنكِصُونَ ﴿66﴾ مُسْتَكْبِرِينَ بِهِۦ سَـٰمِرًا تَهْجُرُونَ ﴿67﴾

नहीं, (ये नकारने वाले इसको नहीं समझते), अपितु इनके दिल इससे बेपरवाही में पड़े हुए हैं और (यही नहीं), इनके कार्य इसके अतिरिक्त हैं, ये उन्हीं में पड़े रहेंगे। यहाँ तक कि जब इनके समृद्ध लोगों को हम दण्ड में पकड़ लेंगे तो ये गुहार करने लगेंगे। अब हाय-पुकार न करो, हमारी ओर से अब तुम्हारी कोई सहायता नहीं होगी। मेरी आयतें तुम्हें सुनाई जाती थीं तो तुम पैग़ंबर का मज़ाक़ उड़ाते हुए अहंकार में उल्टे पाँव भागते थे, मानो किसी कथाकार को छोड़ रहे हो।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात उन कार्यों से भिन्न हैं जिनका उल्लेख ऊपर मानने वालों (मोमिनों) की [विशेषता के रूप में] हुआ है। ↩
أَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا۟ ٱلْقَوْلَ أَمْ جَآءَهُم مَّا لَمْ يَأْتِ ءَابَآءَهُمُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿68﴾ أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا۟ رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ ﴿69﴾ أَمْ يَقُولُونَ بِهِۦ جِنَّةٌۢ ۚ بَلْ جَآءَهُم بِٱلْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَـٰرِهُونَ ﴿70﴾ وَلَوِ ٱتَّبَعَ ٱلْحَقُّ أَهْوَآءَهُمْ لَفَسَدَتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَـٰهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ ﴿71﴾

फिर क्या इन लोगों ने इस वाणी पर विचार नहीं किया या इनके पास कोई ऐसी चीज़ आ गई है जो इनके पूर्वजों के पास नहीं आई थी? या इन्होंने अपने रसूल को पहचाना नहीं, इस कारण उसके नकारने वाले हो रहे हैं? या कहते हैं कि उस पर कुछ पागलपन का प्रभाव है? कदापि नहीं, अपितु वह इनके पास सत्य लेकर आया है, परंतु इनमें से अधिकांश सत्य से विमुख हैं, (इसलिए कि वह इनकी इच्छाओं के विरुद्ध है)। और बात यह है कि यदि सत्य कहीं इनकी इच्छाओं के (अनुकूल होकर इनके) पीछे चलता तो धरती और समस्त आकाशों और जो उनके बीच हैं, सब नष्ट हो जाते। नहीं, (यह किसी कथाकार की कथा नहीं है), अपितु हम तो इनके पास इन्हीं के हिस्से का स्मरण लाए हैं, परंतु ये हैं कि अपने ही स्मरण से मुँह मोड़ रहे हैं।

أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ خَرْجًا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلرَّٰزِقِينَ ﴿72﴾ وَإِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿73﴾ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ عَنِ ٱلصِّرَٰطِ لَنَـٰكِبُونَ ﴿74﴾ وَلَوْ رَحِمْنَـٰهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِم مِّن ضُرٍّ لَّلَجُّوا۟ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ ﴿75﴾ وَلَقَدْ أَخَذْنَـٰهُم بِٱلْعَذَابِ فَمَا ٱسْتَكَانُوا۟ لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ ﴿76﴾ حَتَّىٰٓ إِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِم بَابًا ذَا عَذَابٍ شَدِيدٍ إِذَا هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ ﴿77﴾

क्या तुम इनसे बदले में कोई धन मांग रहे हो (कि जिसके बोझ तले ये दबे जा रहे हैं)? अतः (इन्हें बता दो कि) तुम्हारे प्रभु का फल (तुम्हारे लिए) अच्छा है और वह सबसे अच्छी जीविका देने वाला है। इसमें संदेह नहीं कि तुम तो इन्हें एक सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हो। परंतु जो परलोक पर विश्वास नहीं रखते, वे सीधे मार्ग से हटकर चलना चाहते हैं। (ये किसी प्रकार मानने वाले नहीं हैं। अतः यह सत्य है कि) यदि (हम इनको किसी परीक्षा में डालते, फिर) हम इन पर दया करते और इनकी कठिनाई दूर कर देते तो अपनी उद्दंडता में लगे हुए ये इसी प्रकार भटकते रहते। हमने उनको दण्ड में पकड़ लिया था (जो पिछले लोगों में इन्हीं जैसे थे), परंतु न उनके दिल उनके प्रभु के आगे झुके और न वे कभी विनती करते थे। यहाँ तक कि जब इस प्रकार के लोगों पर हम कठोर दण्ड का द्वार खोल देते हैं तो देखते हो कि उसमें पूर्णतः हताश होकर रह गए हैं।

وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ ﴿78﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى ذَرَأَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴿79﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ وَلَهُ ٱخْتِلَـٰفُ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿80﴾

(लोगो, परमेश्वर की बात सुनो कि) वही है जिसने तुम्हारे लिए कान और आँखें और दिल बनाए, (परंतु तुम पर अफ़सोस), तुम कम ही आभारी होते हो। और वही है जिसने तुम्हें धरती में फैला रखा है और (एक दिन आएगा कि) उसी की ओर समेटे जाओगे। और वही है जो जीवित करता और मारता है और रात और दिन का चक्कर, सब उसी के नियंत्रण में है। फिर क्या समझते नहीं हो?

بَلْ قَالُوا۟ مِثْلَ مَا قَالَ ٱلْأَوَّلُونَ ﴿81﴾ قَالُوٓا۟ أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ ﴿82﴾ لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَءَابَآؤُنَا هَـٰذَا مِن قَبْلُ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿83﴾

ये नहीं समझते, अपितु इन्होंने भी वही बात कही है जो इनसे पहले के लोगों ने कही थी। उन्होंने कह दिया कि क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और अस्थियाँ हो जाएँगे तो क्या पुनः उठाए जाएँगे? इसका वादा हमसे और इससे पहले हमारे बड़ों से भी होता चला आया है। कुछ नहीं, ये केवल पहले लोगों की कहानियाँ हैं।

قُل لِّمَنِ ٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهَآ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿84﴾ سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴿85﴾ قُلْ مَن رَّبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ ٱلسَّبْعِ وَرَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ ﴿86﴾ سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ ﴿87﴾ قُلْ مَنۢ بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿88﴾ سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ فَأَنَّىٰ تُسْحَرُونَ ﴿89﴾

इनसे कहो, यदि तुम जानते हो तो बताओ कि यह धरती और जो इसमें बसे हैं, ये किसके हैं? ये अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर के हैं। कहो, तो क्या तुम (इससे) स्मरण प्राप्त नहीं करते? इनसे पूछो, सात आकाशों और महान सिंहासन का स्वामी कौन है? ये अवश्य कहेंगे कि ये भी परमेश्वर के हैं। कहो, तो (परमेश्वर के सहभागी बनाकर तुम उस) से डरते नहीं हो? इनसे पूछो, यदि तुम जानते हो तो बताओ कि कौन है जिसके हाथ में हर चीज़ का नियंत्रण है और वह शरण देता है, परंतु उसके विरुद्ध कोई शरण नहीं दे सकता? ये अवश्य कहेंगे कि यह सब परमेश्वर ही का अधिकार है। कहो कि फिर तुम्हारी मत कहां मारी जाती है?

بَلْ أَتَيْنَـٰهُم بِٱلْحَقِّ وَإِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ ﴿90﴾ مَا ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ مِن وَلَدٍ وَمَا كَانَ مَعَهُۥ مِنْ إِلَـٰهٍ ۚ إِذًا لَّذَهَبَ كُلُّ إِلَـٰهٍۭ بِمَا خَلَقَ وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ ﴿91﴾ عَـٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ فَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿92﴾

नहीं, कुछ नहीं, अपितु हम इनके पास सत्य लेकर आए हैं और सच यह है कि ये पूरे झूठे हैं। परमेश्वर ने किसी को अपनी संतान नहीं बनाया है और न उसके साथ कोई अन्य उपास्य है। यदि ऐसा होता तो हर उपास्य अपनी रचना को लेकर अलग हो जाता और फिर वे एक दूसरे पर चढ़ दौड़ते। परमेश्वर ऐसी बातों से मुक्त है जो ये कहते हैं, प्रत्यक्ष और परोक्ष का जानने वाला। अतः उन सब चीज़ों से ऊपर है जिन्हें ये उसका सहभागी बनाते हैं।

قُل رَّبِّ إِمَّا تُرِيَنِّى مَا يُوعَدُونَ ﴿93﴾ رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِى فِى ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿94﴾ وَإِنَّا عَلَىٰٓ أَن نُّرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَـٰدِرُونَ ﴿95﴾

तुम प्रार्थना करो, (हे पैग़ंबर) कि मेरे प्रभु, यदि तू मुझे वह दण्ड दिखाए जिससे इन्हें डराया जा रहा है तो प्रभु, मुझे इन दुष्ट लोगों में नहीं मिलाना। और सत्य यह है कि हम पूरा सामर्थ्य रखते हैं कि जिस दण्ड से हम इनको डरा रहे हैं, वह (तुम्हारी आंखों के सामने ले आएं और) तुम्हें दिखा दें।

ٱدْفَعْ بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ٱلسَّيِّئَةَ ۚ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ ﴿96﴾ وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَٰتِ ٱلشَّيَـٰطِينِ ﴿97﴾ وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ ﴿98﴾

तुम इनकी बुराई के बदले में अच्छाई की बात करो। ये जो कुछ अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं, हम उससे भलीभांति परिचित हैं। और प्रार्थना करते रहो कि प्रभु, मैं शैतानों की दुष्ट प्रेरणाओं से तेरी शरण मांगता हूं और मेरे प्रभु, इस बात से भी तेरी शरण मांगता हूं कि वे मेरे पास आएं।

حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَحَدَهُمُ ٱلْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ٱرْجِعُونِ ﴿99﴾ لَعَلِّىٓ أَعْمَلُ صَـٰلِحًا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّآ ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَآئِلُهَا ۖ وَمِن وَرَآئِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ ﴿100﴾ فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَلَآ أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَآءَلُونَ ﴿101﴾ فَمَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ ﴿102﴾ وَمَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فِى جَهَنَّمَ خَـٰلِدُونَ ﴿103﴾ تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَـٰلِحُونَ ﴿104﴾ أَلَمْ تَكُنْ ءَايَـٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ ﴿105﴾ قَالُوا۟ رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًا ضَآلِّينَ ﴿106﴾ رَبَّنَآ أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَـٰلِمُونَ ﴿107﴾ قَالَ ٱخْسَـُٔوا۟ فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ ﴿108﴾ إِنَّهُۥ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْ عِبَادِى يَقُولُونَ رَبَّنَآ ءَامَنَّا فَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ ﴿109﴾ فَٱتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰٓ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِى وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ ﴿110﴾ إِنِّى جَزَيْتُهُمُ ٱلْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ ﴿111﴾

(ये अपनी छेड़-छाड़ से नहीं रुकेंगे), यहाँ तक कि जब इनमें से किसी की मृत्यु सर पर आ खड़ी होगी तो कहेगा कि प्रभु, आप लोग मुझे वापस भेज दें कि जो कुछ छोड़ आया हूं, उसमें कुछ पुण्य कमा लूं। कदापि नहीं, यह केवल एक बात है जो यह कह रहा है। इनके आगे अब उस दिन तक एक आड़ होगी, जब ये उठाए जाएँगे। फिर जब नरसिंघा फूंका जाएगा तो उस दिन इनके बीच न कोई संबंध रहेगा और न ये एक दूसरे से सहायता मांग सकेंगे। उस समय जिनके पलड़े भारी होंगे, वही हैं जो सफलता पाएंगे और जिनके पलड़े हल्के होंगे, तो वही हैं जिन्होंने अपने आप को घाटे में डाल लिया। वे सदा नरक में रहेंगे। उनके चेहरों को आग झुलसा देगी और उनके मुँह उसमें बिगड़े हुए होंगे — क्या मेरी आयतें तुम को पढ़कर नहीं सुनाई जाती थीं, फिर तुम उन्हें झूठा कह देते थे? कहेंगे कि हे हमारे प्रभु, हमारा दुर्भाग्य हम पर छा गया था और हम वास्तव में भटकने वाले लोग थे। हे हमारे प्रभु, हमें यहाँ से (एक बार) निकाल दे, इसके बाद यदि हम फिर से ऐसा करेंगे तो अवश्य हम ही दुष्ट होंगे। आदेश होगा: दूर हो, इसी में पड़े रहो और मुझसे बात न करो। मेरे भक्तों में कुछ ऐसे लोग भी थे जो प्रार्थना करते थे कि हे हमारे प्रभु, हम मान गए हैं, अतः तू हमको क्षमा कर दे और हम पर दया कर और तू सबसे अच्छा दया करने वाला है तो तुमने उनका मज़ाक़ बनाया, यहाँ तक कि उन्होंने (मानो) हमारी याद भी तुम्हें भुला दी और तुम उन की हंसी उड़ाते रहे। आज उनके धैर्य का मैंने उनको अच्छा फल दिया है कि वही सफल हैं।

قَـٰلَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِى ٱلْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ ﴿112﴾ قَالُوا۟ لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَسْـَٔلِ ٱلْعَآدِّينَ ﴿113﴾ قَـٰلَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ لَّوْ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿114﴾

(उस समय) एक कहने वाला कहेगा: वर्षों की गणना से तुम कितना समय धरती में रहे होगे? वे उत्तर देंगे: एक दिन या दिन का कुछ हिस्सा, परंतु यह बात तुम उनसे पूछो जो गणना करने वाले हों। कहने वाला कहेगा: तुम तो कुछ ही समय रहे। काश, तुम जानते होते।

أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَـٰكُمْ عَبَثًا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ ﴿115﴾ فَتَعَـٰلَى ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْكَرِيمِ ﴿116﴾ وَمَن يَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ لَا بُرْهَـٰنَ لَهُۥ بِهِۦ فَإِنَّمَا حِسَابُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَـٰفِرُونَ ﴿117﴾ وَقُل رَّبِّ ٱغْفِرْ وَٱرْحَمْ وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ ﴿118﴾

(लोगो, तुम इस दिन से बेपरवाह बैठे हो) तो क्या तुमने समझ लिया है कि हमने तुम्हें निरर्थक पैदा किया है और तुम हमारी ओर लौटाए नहीं जाओगे? अतः बहुत ऊँचा है परमेश्वर, वास्तविक सम्राट। उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है, प्रतिष्ठित सिंहासन का स्वामी। और जो परमेश्वर के साथ किसी अन्य उपास्य को पुकारें जिसके लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं है तो उनका हिसाब उनके प्रभु के यहाँ होगा। (वे नकारने वाले हैं और) इसमें संदेह नहीं कि नकारने वाले कदापि सफलता नहीं पाएंगे। (तुम इनको अब इनके हाल पर छोड़ो, हे पैग़ंबर), और प्रार्थना करो कि मेरे प्रभु मुझे क्षमा कर दे और मुझपर दया कर, तू सबसे अच्छा दया करने वाला है।