सूरह 22
अल्-हज्ज
मक्की · 78 आयतें · 31 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का मूलभाव सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है, जो पिछली सूरतों से चला आ रहा है। पहली सूरह में मक्का के क़ुरैश क़बीले को, विशेष रूप से पवित्र घर (हरम) की देखरेख के संबंध में अंतिम चेतावनी दी गई है, और दूसरी सूरह में उनके लिए उसी चेतावनी के परिणामों की व्याख्या है, जिसमें मानने वालों की सफलता का विषय बहुत प्रमुख हो गया है।
दोनों सूरतों में संबोधन मूल रूप से क़ुरैश क़बीले से है और इनकी विषय-वस्तु स्पष्ट है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के ‘हिज्रत व बराअत’ के चरण में अवतरित हुई हैं।
अपितु, सूरह हज्ज की कुछ आयतें मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद मदीना में अवतरित हुई हैं, जो उस कार्यवाही की व्याख्या के लिए इस सूरह का हिस्सा बना दी गई हैं, जिसके द्वारा नबी (स.) की हिज्रत के बाद मक्का के क़ुरैश क़बीले के लिए परमेश्वर का निर्णय प्रकट हो जाएगा।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
लोगो, अपने प्रभु से डरो। सत्य यह है कि क़यामत का भूकंप बड़ी ही भयानक चीज़ है। तुम जिस दिन उसको देखोगे, हर दूध पिलाने वाली अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी और हर गर्भवती अपना गर्भ गिरा देगी, और तुम लोगों को बेसुध देखोगे, यद्यपि वे बेसुध नहीं होंगे, अपितु परमेश्वर का दण्ड ही कुछ ऐसा कठोर होगा।
इधर लोगों की दशा यह है कि उनमें ऐसे (मूर्ख) भी हैं जो बिना किसी ज्ञान के परमेश्वर के बारे में झगड़ते और प्रत्येक उद्दंड शैतान का अनुसरण करने लगते हैं। जिसके बारे में लिख दिया गया है कि जो उसको मित्र बनाएगा तो यूं है कि उसको वह पथभ्रष्ट कर देगा और उसको नरक की यातना में पहुंचाएगा।
लोगो, यदि पुनः जी उठने के बारे में तुम्हें कोई संदेह है तो विचार करो कि हमने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया है, फिर वीर्य से, फिर रक्त के थक्के से, फिर मांस की बोटी से, जो पूरी भी होती है और अधूरी भी। इसलिए कि तुम्हारे लिए कुछ तथ्य स्पष्ट करें (जो तुमको समझने चाहिए)। हम जो चाहते हैं, एक निर्धारित अवधि तक गर्भों में ठहराए रखते हैं। फिर एक बच्चे के रूप में तुम्हें निकाल लाते हैं। फिर एक समय देते हैं कि तुम अपनी युवा अवस्था को पहुँचो। और तुम में से कोई पहले ही बुला लिया जाता है और कोई (बुढ़ापे की) निकम्मी आयु को पहुंचा दिया जाता है कि वह बहुत कुछ जानने के बाद फिर कुछ भी नहीं जानता। इसी प्रकार धरती को देखते हो कि सूखी पड़ी है। फिर जब हम उस पर पानी बरसा देते हैं तो वह लहलहाने लगती है और उभरती है और सब प्रकार की सुंदर चीज़ें उगाती है। यह सब इसलिए कि परमेश्वर ही सच्चा प्रभु है और इसलिए कि वही मुर्दों को जीवित करता है और इसलिए कि वह हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। और इसलिए कि क़यामत आ कर रहेगी, उसके आने में कोई संदेह नहीं है, और इसलिए कि परमेश्वर उन सब को अवश्य उठाएगा जो क़ब्रों में पड़े हैं।
ऐसा होते हुए भी लोगों की दशा यह है कि उनमें से ऐसे भी हैं जो बिना किसी ज्ञान, बिना किसी मार्गदर्शन और बिना किसी प्रकाशमान ग्रंथ के (अहंकार से) कंधे हिलाते हुए परमेश्वर के बारे में वाद-विवाद करते हैं कि लोगों को परमेश्वर के मार्ग से भटका दें। उनके लिए दुनिया में अपमान है और क़यामत के दिन हम उनको ज्वलंत अग्नि की यातना चखाएंगे — यह है तुम्हारे कर्मों का फल जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजे थे और (तुम्हारे लिए परमेश्वर का न्याय भी), इसलिए कि परमेश्वर अपने बंदों के साथ थोड़ा सा भी अन्याय करने वाला नहीं है।
और लोगों में ऐसे भी हैं जो परमेश्वर की भक्ति किनारे पर खड़े हुए करते हैं। फिर यदि उनको कोई लाभ पहुंचा तो परमेश्वर पर संतुष्ट हो गए और यदि उनको किसी परीक्षा का सामना हुआ तो औंधे हो जाते हैं। उन्होंने दुनिया को भी खो दिया और परलोक को भी। यही स्पष्ट घाटा है। ये परमेश्वर को छोड़ उन चीज़ों को पुकारते हैं जो न इन का बुरा कर सकती हैं, न इनका भला। यही दूरवर्ती पथभ्रष्टता है। ये उनको पुकारते हैं, वही जिनका घाटा उनके फायदे से निकटतम है। कैसे बुरे हैं ये स्वामी और कैसे बुरे हैं उनके ये साथी (जो उन्हें स्वामी बनाए हुए हैं)! (इसके विपरीत) जो पूरी निष्ठा के साथ मान गए और जिन्होंने भले कर्म किए, परमेश्वर उनको अवश्य ऐसे बाग़ों में प्रवेश देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। निस्संदेह, परमेश्वर करता है जो चाहता है।
(इन्हें बताओ कि) जो यह धारणा रखता हो कि परमेश्वर इस लोक और परलोक में कदापि उसकी सहायता नहीं करेगा, उसको चाहिए कि (अपनी कल्पना में थोड़ा) एक रस्सी (ऊपर चढ़ने के लिए) आकाश की ओर ताने, फिर (जब लक्ष्य को बहुत दूर देख कर दुखी हो तो) उसको काट दे और देखे कि क्या उसका यह उपाय उसके दुख को दूर करने वाला बनता है? हमने इस क़ुरआन को इसी प्रकार स्पष्ट प्रमाणों के रूप में उतारा है, परंतु जो परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित हैं, वे मार्गदर्शन कहाँ पाएंगे कि परमेश्वर ही जिसका चाहता है, (अपने नियम अनुसार) मार्गदर्शन करता है।1
टिप्पणियाँ 1
- यह उन्हीं लोगों के आचरण की अत्यंत मार्मिक उपमा है जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है — कि वे परमेश्वर की भक्ति किनारे पर खड़े होकर करते हैं, और यदि कोई कठिन परिस्थिति या परीक्षा आ जाए तो उससे आशाएँ तोड़कर दूसरों की चौखट पर आ गिरते हैं। ↩
(ये परमेश्वर के बारे में वाद-विवाद करते हैं। इन्हें बताओ कि) जो लोग मान गए हैं और जिन्होंने यहूदी मत अपना रखा है और साबअई और ईसाई और पारसी और जो शिर्क अपनाए हुए हैं, परमेश्वर क़यामत के दिन इन सबके बीच (इनके मतभेदों का) निपटारा कर देगा। सत्य यह है कि परमेश्वर प्रत्येक बात से अवगत है।
क्या देखते नहीं हो कि जो समस्त आकाशों में हैं और जो धरती में हैं, सब परमेश्वर ही के आगे सजदे में गिरे हैं, और सूरज और चाँद और तारे और पर्वत और पेड़ और पशु और बहुत से लोग भी? और बहुत से वे भी हैं कि जिन पर परमेश्वर का दण्ड अनिवार्य हो चुका है, (इसलिए कि उन्होंने यह अपमान स्वीकार कर लिया कि दूसरों के आगे सर झुका दिया)। सत्य यह है कि जिसको परमेश्वर अपमानित कर दे, उसे फिर कोई सम्मान देने वाला नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर (अपने नियम अनुसार) जो चाहे, करता है।
यह सब दो पक्ष हैं जिन्होंने अपने प्रभु के बारे में मतभेद किया है। तो जिन्होंने (उसके अद्वितीय होने को) अस्वीकार कर दिया है, उनके लिए अग्नि के कपड़े तराशे जाएँगे, उनके सरों के ऊपर से खोलता हुआ पानी उंडेला जाएगा। उनके पेट के अंदर जो कुछ है, सब उससे पिघल जाएगा और (ऊपर से) उनकी खालें भी। उनको कुचलने के लिए लोहे के हथौड़े होंगे। वे उससे, उसकी किसी यातना से भी जब-जब निकलना चाहेंगे, फिर से उसी में धकेल दिए जाएँगे कि अब इसी में रहो और चखो जलने के दण्ड का स्वाद।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात जिनका उल्लेख बीच में हुआ है। ↩
अपितु उन लोगों को, जो मान गए और जिन्होंने भले कर्म किए, परमेश्वर ऐसे बाग़ों में प्रवेश देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनको वहां सोने के कंगन और मोतियों के हार पहनाए जाएँगे। उनके वस्त्र वहां रेशम के होंगे। और इस पर यह कि उन्हें वहां निर्मल बात की शिक्षा दी गई और उन्हें प्रशंसित परमेश्वर (के स्वर्ग) का मार्ग दिखा दिया गया।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात उन्हें स्तुति और कृतज्ञता के उन शब्दों की प्रेरणा दी जाएगी जो स्वर्ग के निवासियों की जिह्वा पर उसकी अनुकम्पाओं को देखकर अनायास प्रवाहित हो जाएंगे। ↩
यह सत्य है कि जिन लोगों ने (परमेश्वर के पैग़ंबर को) मानने को नकार दिया और अब वे परमेश्वर के मार्ग से रोक रहे हैं और मस्जिद-ए-हराम से भी जिसे हमने लोगों के लिए समान बनाया है, चाहे वहां के रहने वाले हों या बाहर के, उन्होंने बड़ा अन्याय किया है। (इसलिए कि इस मस्जिद का मामला तो यह है कि) जो इसमें किसी अवज्ञा, किसी अत्याचार को घटित करने का संकल्प करेगा, उसको हम कष्टदायक यातना का स्वाद चखाएंगे।
इन्हें याद दिलाओ, जब हमने इब्राहीम के लिए इस घर के स्थान को ठिकाना बनाया था, इस शिक्षा के साथ कि किसी चीज़ को मेरा सहभागी न बनाना और मेरे घर को परिक्रमा करने वालों और क़ियाम करने वालों और झुकने तथा नतमस्तक होने वालों के लिए पवित्र रखना। और आदेश दिया था कि लोगों में हज्ज की घोषणा करो, वे तुम्हारे पास पैदल भी आएंगे और सब प्रकार की ऊंटनियों पर सवार होकर भी कि (यात्रा के कारण) दुबली हो गई होंगी। वे (क़ाफ़िलों के आने जाने से) गहरे हो चुके प्रत्येक दूरवर्ती पर्वतीय मार्ग से आएंगे। इस लिए आएंगे कि अपनी भलाई के स्थानों पर उपस्थित हों और कुछ निश्चित दिनों में उन मवेशी पशुओं पर परमेश्वर का नाम लें जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान किए हैं। (तुम उनको ज़िबह करो) तो उनसे स्वयं भी खाओ और बुरे हाल निर्धनों को भी खिलाओ। फिर चाहिए कि लोग अपना मैल कुचैल दूर करें, अपनी मन्नतें पूरी करें और इस प्राचीन घर की परिक्रमा करें।
(ये बातें हैं जो इब्राहीम को बताई गई थीं। इनको अच्छे से समझ लो) और (याद रखो कि) जो परमेश्वर की स्थापित की हुई मर्यादाओं का सम्मान करेगा तो उसके प्रभु के पास यह उस के पक्ष में अच्छा है। और (यह भी कि जानवरों के बारे में इन मुश्रिकों की भ्रांतियाँ पूर्णतः निराधार हैं)। सत्य यह है कि तुम्हारे लिए चौपाये वैध बनाए गए हैं, उनको छोड़ जो तुम्हें (क़ुरआन में) बताए जा रहे हैं। तो मूर्तियों के मैल से बचो और झूठी बात से भी (जो इनके बारे में किसी चीज़ को वैध और किसी को अवैध बनाकर परमेश्वर पर बांधते हो) और उसके प्रतीकों का सम्मान करो, परमेश्वर की ओर एकाग्र होकर, किसी को उसका सहभागी करके नहीं। और (याद रखो कि) जो परमेश्वर के सहभागी बनाता है तो मानो वह आकाश से गिर पड़ा है। अब पक्षी उसको उचक ले जाएँगे या हवा उसको किसी दूर के स्थान पर ले जाकर फेंक देगी। यह बातें हैं, (इन्हें अच्छे से समझ लो) और (याद रखो कि) जो परमेश्वर के निर्धारित किए हुए प्रतीकों का सम्मान करेगा तो यह दिलों की पुण्यशीलता में आता है। (ये हदी के पशु भी परमेश्वर के प्रतीकों में से हैं, परंतु परमेश्वर का आदेश है कि) इनमें तुम्हारे लिए एक निर्धारित समय तक अनेक प्रकार के हित हैं, फिर इनको (क़ुर्बानी के लिए) परमेश्वर के उसी प्राचीन घर की ओर ले जाना है।
हमने प्रत्येक समुदाय के लिए बलि-संस्कार नियत किया है ताकि परमेश्वर ने जो मवेशी पशु उनको प्रदान किए हैं, उनपर वे परमेश्वर का नाम लें, (किसी और का नहीं)। सो तुम्हारा उपास्य एक ही उपास्य है तो अपने आप को उसी को सौंप दो (और उसी के आगे झुके रहो), और उन्हें शुभ सूचना दो, (हे पैग़ंबर), जिनके दिल उसके आगे झुके हुए हैं। जिनकी दशा यह है कि जब उनके सामने परमेश्वर का वर्णन होता है तो उनके दिल काँप उठते हैं। उनपर जो संकट आता है, उस पर धैर्य रखने वाले और नमाज़ का प्रबंध रखने वाले हैं और जो कुछ हमने उनको दिया है, उसमें से वे (हमारे मार्ग में) दान करते हैं।
(ऊंट की क़ुर्बानी में भी तुम में से किसी को दुविधा नहीं होनी चाहिए, इसलिए कि) क़ुर्बानी के ऊँटों को हमने तुम्हारे लिए परमेश्वर के प्रतीकों में रख लिया है। उनमें तुम्हारे लिए कई लाभ और उपकार हैं। तो उनकी कतार बना के उनपर भी परमेश्वर का नाम लो। फिर जब (क़ुर्बानी के बाद) वह अपने पक्षों पर गिर पड़ें तो उनमें से स्वयं भी खाओ और उनको भी खिलाओ जो (दरिद्र हैं, परंतु) जो मिल जाए उसी में संतुष्ट बैठे हैं और उनको भी जो व्याकुल होकर मांगने के लिए आ जाएं। इन पशुओं को हमने इसी प्रकार तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया है ताकि तुम आभार व्यक्त करो। परमेश्वर को न इनका मांस पहुंचता है न इनका ख़ून, अपितु उसको केवल तुम्हारी पुण्यशीलता पहुंचती है। इसी प्रकार परमेश्वर ने उनको तुम्हारे लिए वशीभूत कर दिया है ताकि परमेश्वर ने तुम्हारा जो मार्गदर्शन किया है, उस पर तुम परमेश्वर की महिमा का वर्णन करो। (यही मार्ग है उनका जो उत्तम आचरण अपनाएं) और (हे पैग़ंबर), उन लोगों को शुभ शूचना दो जो उत्तम आचरण अपनाने वाले हैं।
(इसके विपरीत जो लोग परमेश्वर के मार्ग से रोक रहे हैं, उनके बारे में) परमेश्वर का निर्णय है कि वे (उनके विरुद्ध अब) उन लोगों का बचाव करेगा जो मान गए हैं। सत्य यह है कि परमेश्वर किसी धोखेबाज़ अकृतज्ञ से प्रेम नहीं करता। (अतः) जिन से युद्ध किया जाए, उन्हें युद्ध की अनुमति दे दी गई है, इसलिए कि उनपर अत्याचार हुआ है और परमेश्वर निस्संदेह उनकी सहायता का सामर्थ्य रखता है । वे जो अकारण अपने घरों से निकाल दिए गए, केवल इसलिए कि वे कहते हैं कि हमारा प्रभु परमेश्वर है। (यह अनुमति इसलिए दी गई कि) यदि परमेश्वर लोगों को एक दूसरे के माध्यम से पीछे धकेलता न रहता तो मठ और गिरजे और यहूदी प्रार्थना भवन और मस्जिदें जिन में अत्यधिक परमेश्वर का नाम लिया जाता है, सब गिराए जा चुके होते। परमेश्वर अवश्य उन लोगों की सहायता करेगा जो उसकी सहायता के लिए उठेंगे। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर प्रबल है, वह सब पर भारी है। वही कि जिनको यदि हम इस धरती में सत्ता प्रदान करेंगे तो नमाज़ का प्रबंध करेंगे और ज़कात का भुगतान करेंगे और भलाई का उपदेश करेंगे और बुराई से रोकेंगे। (परमेश्वर अवश्य उनकी सहायता करेगा) और सब कार्यों का अंत तो परमेश्वर ही के नियंत्रण में है।
(हे पैग़ंबर), यदि ये तुम्हें झूठा बताते हैं तो इस पर आश्चर्य क्यों? इनसे पहले नूह की क़ौम, आद और समूद भी झूठे बताए जा चुके हैं। इब्राहीम की क़ौम, लूत की क़ौम भी। और मद्यन के लोग भी, और मूसा को भी इसी प्रकार झूठा बताया गया था। फिर उनके नकारने वालों को मैंने कुछ ढील दी, फिर उनको धर लिया तो देखो कि कैसा हुआ मेरा दंड! तो कितनी ही बस्तियां हैं जिनको हमने नष्ट किया है और वे अत्याचारी थीं। अब वे अपनी छतों पर उल्टी पड़ी हैं। और कितने कुएं बेकार और कितने पक्के महल हैं जो वीरान पड़े हैं। फिर क्या ये लोग धरती में चले फिरे नहीं हैं कि (सीख के इन स्थलों को देख कर) इनके दिल ऐसे हो जाते कि उनसे समझते और कान ऐसे हो जाते कि उनसे सुनते? तो बात यह है कि सरों की आँखें अंधी नहीं होतीं, अपितु वे दिल अंधे हो जाते हैं जो सीनों में हैं।
ये तुमसे दण्ड के लिए जल्दी मचाए हुए हैं, यद्यपि (परमेश्वर ने दण्ड की चेतावनी सुनाई है तो) परमेश्वर कदापि अपने वचन का उल्लंघन नहीं करेगा। (इन्हें जानना चाहिए कि) तेरे प्रभु के यहाँ का एक दिन तुम्हारी गणना के अनुसार एक हज़ार वर्ष के बराबर होता है। (तो ये भी निडर न हों)। कितनी ही बस्तियां हैं जिनको मैंने उनके अत्याचार के होते हुए भी इस प्रकार ढील दी, फिर उनको पकड़ लिया और सब को वापस तो मेरे पास ही आना है।
इनसे कह दो कि लोगो, मैं तुम्हारे लिए केवल एक स्पष्ट सचेत करने वाला हूं। फिर जो मान गए और उन्होंने भले कर्म किए, उनके लिए क्षमा भी है और सम्मान की जीविका भी। और जिन का प्रयास हमारी आयतों को नीचा दिखाने के लिए है, वही नरक वासी हैं।
हमने (हे पैग़ंबर), तुमसे पहले जो रसूल और जो नबी भी भेजा है, उसके साथ यही मामला हुआ कि उसने जब भी कोई इच्छा की, शैतान उसकी इच्छा में बाधा डालने वाला हो गया है। फिर शैतान की इस बाधा को परमेश्वर मिटा देता है, फिर परमेश्वर अपनी आयतों को स्थिरता प्रदान करता है और परमेश्वर जानने वाला और सूक्ष्मदर्शी है। यह इसलिए होता है कि परमेश्वर शैतान की इस बाधा डालने को उन लोगों के लिए परीक्षा बना दे जिनके दिलों में (कपट का) रोग है और जिनके दिल कठोर हो चुके हैं। सत्य यह है कि ये अत्याचारी (अपने) विरोध में बहुत दूर निकल गए हैं। और इसलिए भी होता है कि जिन को परमेश्वर के ग्रंथ का ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे अच्छे से जान लें कि यह तेरे प्रभु की ओर से सत्य आया है। तो उनकी आस्थाएँ उनपर पक्की हों और उनके दिल उसके आगे झुक जाएं। और परमेश्वर का निर्णय है कि वह उन लोगों को जो मान गए हैं, अवश्य सीधा मार्ग दिखाएगा।
इसके विपरीत जिन लोगों ने नकारने का निर्णय कर लिया है, वे इस ज्ञान की ओर से संदेह में रहेंगे, यहाँ तक कि उनके सर पर क़यामत अचानक आ खड़ी हो या एक अशुभ दिन का दण्ड उनपर उतर जाए। (वे इस बात को याद रखें कि) उस दिन सम्पूर्ण अधिकार परमेश्वर ही का होगा। वह उनके बीच निर्णय कर देगा। फिर जो मान गए होंगे और उन्होंने भले कर्म भी किए होंगे, वह सुखमय बाग़ों में होंगे। और जिन्होंने नकारा और हमारी आयतों को झूठा बताया है वही हैं कि जिनके लिए अपमानजनक दण्ड है।
(इनके अत्याचार से विवश होकर) जिन लोगों ने परमेश्वर के मार्ग में प्रवास किया, फिर मारे गए या अपनी मृत्यु से मर गए, परमेश्वर उनको अवश्य अच्छी जीविका प्रदान करेगा। निस्संदेह, परमेश्वर ही है जो उत्तम जीविका प्रदान करने वाला है। वह उनको अवश्य ऐसी जगह पहुंचाएगा जिस से वे प्रसन्न होंगे। निस्संदेह, परमेश्वर सब की स्थिति से परिचित है, वह बड़ा ही सहनशील है।
यह इसी प्रकार होगा और (यह भी कि) जो (किसी अन्याय का) वैसा ही बदला ले, जैसा उसके साथ किया गया, फिर उस पर अत्याचार किया जाए तो परमेश्वर उसकी सहायता अवश्य करेगा। (परंतु थोड़ी सी क्षमा करे तो अच्छा है), इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर क्षमा करने वाला, अनदेखा करने वाला है।
(परमेश्वर अवश्य उसकी सहायता करेगा)। यह इसलिए कि परमेश्वर ही है जो रात को दिन में प्रवेश करता है और दिन को रात में प्रवेश करता है, और इसलिए कि परमेश्वर सुनने वाला और देखने वाला है। यह इसलिए कि परमेश्वर ही सत्य है और जिन को ये परमेश्वर को छोड़ पुकारते हैं, वे सब असत्य हैं और इसलिए कि परमेश्वर ही सर्वोच्च है, वह सबसे बड़ा है।
(वह अवश्य सहायता करेगा, यद्यपि परिस्थितियां कितनी ही प्रतिकूल हों)। क्या देखते नहीं हो कि परमेश्वर ने आकाश से पानी बरसाया तो उससे धरती हरी भरी हो जाती है? सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ा ही प्रज्ञावान है, (हर चीज़ की) जानकारी रखने वाला है। उसी का है जो कुछ समस्त आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। सत्य यह है कि परमेश्वर ही है जो निःस्पृह है और वही अच्छे गुणों वाला भी है।
क्या देखते नहीं हो कि परमेश्वर ने धरती की सब चीज़ों को तुम्हारे काम में लगा रखा है और नौका को भी? वह उसके आदेश से समुद्र में चलती है। और वह आकाश को थामे हुए है कि कहीं ऐसा न हो कि धरती पर गिर पड़े, सिवाए इस के कि वही इसकी अनुमति दे। निस्संदेह परमेश्वर लोगों पर बड़ा ही दयालु है, उसकी कृपा शाश्वत है। वही है जिसने तुम्हें जीवन दिया, फिर मारता है, फिर तुम्हें जीवित करेगा। सत्य यह है कि मनुष्य बड़ा ही अकृतज्ञ है।
(इन्हें आपत्ति है कि यह नई शरीअत अलग क्यों है? इन्हें बताओ कि) हमने प्रत्येक जनसमूह के लिए एक विधि निर्धारित की है कि वे उसी पर चलेंगे। (हमने इस समय भी यही किया है)। तो इस विषय में वह तुम्हारे साथ कदापि कोई झगड़ा न करने पाएँ। इसलिए अनदेखा करो और अपने प्रभु की ओर बुलाते रहो। निस्संदेह तुम सीधे मार्ग पर हो। इसके बाद भी यदि वे तुमसे झगड़ने के लिए पीछे पड़े हों तो इनसे कह दो कि परमेश्वर भलीभांति जानता है जो कुछ तुम कर रहे हो। परमेश्वर क़यामत के दिन तुम्हारे बीच उस चीज़ का निपटारा कर देगा जिसमें तुम मतभेद करते रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि आकाश और धरती की सभी वस्तुएँ परमेश्वर के ज्ञान में हैं? यह सब एक खाते में सुरक्षित है। सत्य यह है कि परमेश्वर के लिए यह अत्यंत सरल है।
परमेश्वर को छोड़ ये उनकी पूजा करते हैं जिन के पक्ष में परमेश्वर ने कोई प्रमाण नहीं उतारा है और जिनके बारे में इनको कोई ज्ञान भी नहीं है। (ये मूर्ख समझते हैं परलोक में वे इनके सहायक होंगे)। सत्य यह है कि इन अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं होगा। इन्हें जब हमारी स्पष्ट आयतें सुनाई जाती हैं तो इन नकारने वालों के चेहरों पर तुम अप्रसन्नता देखते हो। मानो यह उन लोगों पर हमला कर देंगे जो इनको हमारी आयतें पढ़कर सुना रहे हैं। इनसे कहो, तो क्या मैं इस से बढ़कर तुम्हें एक अप्रिय चीज़ बताऊं? नरक की आग, परमेश्वर ने नकारने वालों के पक्ष में उसका वादा कर रखा है और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है।
लोगो, (तुम अपने पूज्य-देवताओं की वास्तविकता समझना चाहते हो तो) एक उदाहरण दिया जाता है, तो उसको ध्यान से सुनो। सत्य यह है कि परमेश्वर को छोड़ जिनको तुम पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते, यद्यपि वे इसके लिए सब मिलकर प्रयास करें। और यदि वह मक्खी उनसे कुछ छीन ले तो उससे वे उसको छुड़ा भी नहीं सकते। चाहने वाले भी शक्तिहीन और जिनको चाहते हैं, वह भी पूर्णतः शक्तिहीन। इन्होंने परमेश्वर का महत्व नहीं जाना, जैसा कि उसे जानना चाहिए। निस्संदेह, परमेश्वर शक्तिशाली है, वह सब पर भारी है।
(यह इसी अनादर का परिणाम है कि फ़रिश्तों को उपास्य बनाए बैठे हैं)। परमेश्वर फ़रिश्तों में से भी (अपने) संदेशवाहक चुनता है और मनुष्यों में से भी। (इससे वे ईश्वरत्व में सहभागी क्यों हो जाएँगे)? सत्य यह है कि परमेश्वर (स्वयं) सुनने वाला और देखने वाला है। इन (फ़रिश्तों) के आगे और पीछे जो कुछ है, वह उससे परिचित है और सभी मामले परमेश्वर ही की ओर लौटते हैं।
हे मानने वालो, (इनका युग समाप्त हुआ, अब तुम्हारा युग प्रारम्भ हो रहा है तो) रुकू और सुजूद करो और अपने प्रभु की भक्ति करो और भलाई के काम करो ताकि तुम सफलता पाओ। और (यह भी कि अपने पद के कर्तव्यों को पूरा करने के लिए) परमेश्वर के मार्ग में संघर्ष करो, यथायोग्य संघर्ष। उसने तुम्हें चुन लिया है और (जो) शरीअत (तुम्हें प्रदान की है, उस) में तुम्हारे लिए कोई कठिनाई नहीं रखी है। तुम्हारे पिता — इब्राहीम — का संघ तुम्हारे लिए चुन लिया है। उसी ने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था, इससे पूर्व और इस क़ुरआन में भी (तुम्हारा नाम मुस्लिम है)। इसलिए चुन लिया है कि रसूल तुम पर (इस धर्म की) गवाही दे और दुनिया के सभी लोगों पर तुम (इसकी) गवाही देने वाले बनो। तो नमाज़ का प्रबंध रखो और ज़कात का भुगतान करते रहो और परमेश्वर को दृढ़तापूर्वक पकड़ो। वही तुम्हारा संरक्षक है। तो कैसा अच्छा संरक्षक है और कैसा अच्छा सहायक!