सूरह 21

अल्-अंबिया

मक्की · 112 आयतें · 39 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

ٱقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِى غَفْلَةٍ مُّعْرِضُونَ ﴿1﴾ مَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّن رَّبِّهِم مُّحْدَثٍ إِلَّا ٱسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ ﴿2﴾ لَاهِيَةً قُلُوبُهُمْ ۗ وَأَسَرُّوا۟ ٱلنَّجْوَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ هَلْ هَـٰذَآ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ ۖ أَفَتَأْتُونَ ٱلسِّحْرَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ ﴿3﴾

लोगों के लिए उनके हिसाब का समय पास आ लगा है और वे लापरवाही में पड़े हुए अनदेखा किए जा रहे हैं। उनके प्रभु की ओर से जो नवीन उपदेश भी उनके पास आता है, वे उसको सुनते हैं तो खेल में लगे होते हैं। उनके दिल बेपरवाह हैं और वे दुष्ट चुपके-चुपके (आपस में) कानाफूसियां करते हैं कि यह व्यक्ति है ही क्या, यह तो तुम्हारे ही जैसा मनुष्य है, फिर क्या आंखों देखते इसके जादू में पड़ते हो?

قَالَ رَبِّى يَعْلَمُ ٱلْقَوْلَ فِى ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿4﴾

(इस पर) रसूल ने कहा: (ये क्या कानाफूसियां करते हैं)? मेरा प्रभु हर उस बात को जानता है जो धरती और आकाश में की जाए और वह सुनने वाला और जानने वाला है।

بَلْ قَالُوٓا۟ أَضْغَـٰثُ أَحْلَـٰمٍۭ بَلِ ٱفْتَرَىٰهُ بَلْ هُوَ شَاعِرٌ فَلْيَأْتِنَا بِـَٔايَةٍ كَمَآ أُرْسِلَ ٱلْأَوَّلُونَ ﴿5﴾

यही नहीं कि केवल जादू कहते हैं, अपितु उन्होंने यह भी कहा है कि यह परेशान सपने हैं, अपितु यह भी कि इसने अपनी ओर से इस क़ुरआन की रचना की है, अपितु यह भी कि यह केवल एक कवि है। अतः (यदि यह वास्तव में पैग़ंबर है तो) हमारे पास उसी प्रकार कोई निशानी लाए, जिस प्रकार पूर्वकालीन पैग़ंबर निशानियों के साथ भेजे गए थे।

مَآ ءَامَنَتْ قَبْلَهُم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَـٰهَآ ۖ أَفَهُمْ يُؤْمِنُونَ ﴿6﴾ وَمَآ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِىٓ إِلَيْهِمْ ۖ فَسْـَٔلُوٓا۟ أَهْلَ ٱلذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿7﴾ وَمَا جَعَلْنَـٰهُمْ جَسَدًا لَّا يَأْكُلُونَ ٱلطَّعَامَ وَمَا كَانُوا۟ خَـٰلِدِينَ ﴿8﴾ ثُمَّ صَدَقْنَـٰهُمُ ٱلْوَعْدَ فَأَنجَيْنَـٰهُمْ وَمَن نَّشَآءُ وَأَهْلَكْنَا ٱلْمُسْرِفِينَ ﴿9﴾

हमने जिन बस्तियों को नष्ट किया है, उनमें से किसी ने भी इनसे पहले (इस प्रकार की निशानी देखकर) नहीं माना तो क्या ये मान जाएँगे? (कहते हैं कि हमारे जैसा मनुष्य है)। तुमसे पहले भी हमने जिसको रसूल बना कर भेजा, मनुष्यों ही में से भेजा है जिनकी ओर हम वह्य करते थे। अतः स्मृति वालों से पूछ लो, यदि तुम लोग नहीं जानते हो। हमने उन रसूलों के ऐसे शरीर नहीं बनाए थे कि वे भोजन न खाते हों और वे (दुनिया में) सदा रहने वाले भी नहीं थे। फिर देख लो कि उनसे अपना वचन हमने पूरा कर दिया और उनको और (उनके साथ) जिनको हम चाहते थे, बचा लिया और हद से आगे बढ़ने वालों को हमने नष्ट कर के छोड़ा।1

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  1. अर्थात अहल-ए-किताब (Jews and Christians) से, जिनके पास इससे पहले इसी प्रकार स्मरण कराने वाली [वाणी] भेजी गई। ↩
لَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكُمْ كِتَـٰبًا فِيهِ ذِكْرُكُمْ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿10﴾ وَكَمْ قَصَمْنَا مِن قَرْيَةٍ كَانَتْ ظَالِمَةً وَأَنشَأْنَا بَعْدَهَا قَوْمًا ءَاخَرِينَ ﴿11﴾ فَلَمَّآ أَحَسُّوا۟ بَأْسَنَآ إِذَا هُم مِّنْهَا يَرْكُضُونَ ﴿12﴾ لَا تَرْكُضُوا۟ وَٱرْجِعُوٓا۟ إِلَىٰ مَآ أُتْرِفْتُمْ فِيهِ وَمَسَـٰكِنِكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْـَٔلُونَ ﴿13﴾ قَالُوا۟ يَـٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ ﴿14﴾ فَمَا زَالَت تِّلْكَ دَعْوَىٰهُمْ حَتَّىٰ جَعَلْنَـٰهُمْ حَصِيدًا خَـٰمِدِينَ ﴿15﴾

(लोगो), हमने तुम्हारी ओर भी एक ग्रंथ उतार दिया है, जिसमें तुम्हारे हिस्से का उपदेश है। फिर क्या समझते नहीं हो? कितनी ही बस्तियाँ हमने तोड़-फोड़ कर समतल कर दीं जो अपने प्राणों पर अत्याचार ढा रही थीं और उनके बाद अन्य लोग उठा खड़े किए। फिर जब उन्होंने हमारे दण्ड की आहट पाई तो उसी समय वहां से भागने लगे। (हमने कहा): अब भागो नहीं, अपने उन्हीं साधनों की ओर जिनमें तुम मौज कर रहे थे और अपने उन्हीं घरों की ओर लौट जाओ जो तुम्हारे विलास स्थान थे ताकि तुमसे पूछा जाए। उन्होंने बड़ा विलाप किया कि हाय हमारा दुर्भाग्य, निस्संदेह, हम ही अत्याचारी थे। अतः यही विलाप करते रहे, यहाँ तक कि हमने उनको काटकर ढेर कर दिया, मानो जैसे बुझे हुए पड़े हैं।

وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَآءَ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَـٰعِبِينَ ﴿16﴾ لَوْ أَرَدْنَآ أَن نَّتَّخِذَ لَهْوًا لَّٱتَّخَذْنَـٰهُ مِن لَّدُنَّآ إِن كُنَّا فَـٰعِلِينَ ﴿17﴾ بَلْ نَقْذِفُ بِٱلْحَقِّ عَلَى ٱلْبَـٰطِلِ فَيَدْمَغُهُۥ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٌ ۚ وَلَكُمُ ٱلْوَيْلُ مِمَّا تَصِفُونَ ﴿18﴾

हमने धरती और आकाश को और उसको जो उनके बीच है, किसी लीला के रूप में नहीं बनाया है। यदि हम कोई लीला रचना चाहते तो उसका प्रबंध अपने पास ही से कर लेते, यदि हमको यही करना होता। कदापि नहीं, अपितु (एक दिन आने वाला है कि) हम सत्य को असत्य पर मारेंगे और वह उसका सर तोड़ देगा। फिर उसी समय देखोगे कि वह मिट गया है। सत्य यह है कि तुम्हारे लिए बड़ी बर्बादी है उन बातों के कारण जो तुम कहते हो।

وَلَهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَمَنْ عِندَهُۥ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِۦ وَلَا يَسْتَحْسِرُونَ ﴿19﴾ يُسَبِّحُونَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ لَا يَفْتُرُونَ ﴿20﴾

उसी के हैं जो धरती और समस्त आकाशों में हैं और जो उसकी सभा में हैं, (जिन्हें उसकी संतान बना कर पूजते हो), वे उसकी भक्ति से हटते नहीं और न थकते हैं। रात दिन उसकी पवित्रता का जाप करते रहते हैं, कभी विश्राम नहीं करते।

أَمِ ٱتَّخَذُوٓا۟ ءَالِهَةً مِّنَ ٱلْأَرْضِ هُمْ يُنشِرُونَ ﴿21﴾ لَوْ كَانَ فِيهِمَآ ءَالِهَةٌ إِلَّا ٱللَّهُ لَفَسَدَتَا ۚ فَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ رَبِّ ٱلْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ ﴿22﴾ لَا يُسْـَٔلُ عَمَّا يَفْعَلُ وَهُمْ يُسْـَٔلُونَ ﴿23﴾ أَمِ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةً ۖ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ ۖ هَـٰذَا ذِكْرُ مَن مَّعِىَ وَذِكْرُ مَن قَبْلِى ۗ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ٱلْحَقَّ ۖ فَهُم مُّعْرِضُونَ ﴿24﴾ وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِىٓ إِلَيْهِ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعْبُدُونِ ﴿25﴾

क्या इन्होंने धरती के अलग पूज्य-देवता बना लिए हैं जो उसको जीवन प्रदान करते हैं? यदि धरती और आकाश में परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य उपास्य भी होते तो दोनों अस्त-व्यस्त हो जाते। अतः परमेश्वर, सिंघासन का स्वामी उन सब बातों से मुक्त है जो ये कहते हैं। वह जो कुछ करता है, उसके लिए (किसी के आगे) उत्तरदायी नहीं है और ये सब उत्तरदायी हैं। क्या इन्होंने परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य उपास्य बना लिए हैं? इनसे कहो कि अपना प्रमाण पेश करो। यह उनकी स्मरण-वाणी है जो मेरे साथ हैं और उनकी भी जो मुझसे पूर्व हुए हैं। नहीं, किसी के पास कोई प्रमाण नहीं है, अपितु इनमें से अधिकांश सत्य को नहीं जानते, इसलिए मुँह मोड़े हुए हैं। तुमसे पूर्व जो रसूल भी हमने भेजे हैं, उनकी ओर हम यही वह्य करते रहे हैं कि मेरे अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है, तो मेरी ही भक्ति करो।1

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  1. अर्थात क़ुरआन भी उपलब्ध है जो मेरे माननेवालों के लिए स्मरण बनकर अवतरित हुआ है, और तौरात, ज़बूर, इंजील और नबियों के दूसरे ग्रंथ भी। ↩
وَقَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَلَدًا ۗ سُبْحَـٰنَهُۥ ۚ بَلْ عِبَادٌ مُّكْرَمُونَ ﴿26﴾ لَا يَسْبِقُونَهُۥ بِٱلْقَوْلِ وَهُم بِأَمْرِهِۦ يَعْمَلُونَ ﴿27﴾ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ٱرْتَضَىٰ وَهُم مِّنْ خَشْيَتِهِۦ مُشْفِقُونَ ﴿28﴾ وَمَن يَقُلْ مِنْهُمْ إِنِّىٓ إِلَـٰهٌ مِّن دُونِهِۦ فَذَٰلِكَ نَجْزِيهِ جَهَنَّمَ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿29﴾

ये कहते हैं कि परम दयालु परमेश्वर की संतान है। वह (इस दोष से) मुक्त है। फ़रिश्ते, जिनको ये परमेश्वर की बेटियां समझते हैं, वे उसकी संतान नहीं, अपितु सम्मानित भक्त हैं। वे उसके सामने कभी बढ़कर नहीं बोलते और उसके आदेश का पालन करते हैं। उनके आगे और पीछे जो कुछ है, वह सब जानता है। वे किसी की सिफ़ारिश नहीं करते, उसके अतिरिक्त जिसके लिए परमेश्वर चाहे और उसके भय से कांपते रहते हैं। उनमें से जो यह कहने का दुस्साहस करे कि परमेश्वर के अतिरिक्त मैं उपास्य हूं तो उसको हम नरक का दण्ड देंगे। हम अत्याचारियों को इसी प्रकार दण्ड देते हैं।

أَوَلَمْ يَرَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ كَانَتَا رَتْقًا فَفَتَقْنَـٰهُمَا ۖ وَجَعَلْنَا مِنَ ٱلْمَآءِ كُلَّ شَىْءٍ حَىٍّ ۖ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ ﴿30﴾ وَجَعَلْنَا فِى ٱلْأَرْضِ رَوَٰسِىَ أَن تَمِيدَ بِهِمْ وَجَعَلْنَا فِيهَا فِجَاجًا سُبُلًا لَّعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ ﴿31﴾ وَجَعَلْنَا ٱلسَّمَآءَ سَقْفًا مَّحْفُوظًا ۖ وَهُمْ عَنْ ءَايَـٰتِهَا مُعْرِضُونَ ﴿32﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ ۖ كُلٌّ فِى فَلَكٍ يَسْبَحُونَ ﴿33﴾

(ये निशानियाँ मांगते हैं)। क्या इन नकारने वालों ने बार-बार देखा नहीं कि आकाश और धरती, दोनों बंद हैं, फिर हमने उनको खोल दिया और हमने प्रत्येक जीवित चीज़ को आकाश के पानी ही से पैदा किया है? क्या वे फिर भी नहीं मानेंगे? और हमने धरती में पर्वत जमा दिए कि वह उनको लेकर झुक न पड़े और उन पर्वतों के अंदर मार्ग के लिए दर्रे बनाए ताकि लोग (अपने लिए) मार्ग पा लें। और आकाश को हमने एक सुरक्षित छत बना दिया और ये लोग हैं कि उसकी निशानियों से मुँह फेरे हुए हैं। सत्य यह है कि वही है जिसने रात और दिन बनाए और सूरज और चाँद की रचना की है। इनमें से प्रत्येक (अपने) एक पथ में गमन कर रहा है।1

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  1. अर्थात आकाश से वर्षा नहीं हुई और धरती से हरियाली नहीं उगी। इसी को इस आयत में बंद होने के शब्दों में व्यक्त किया गया है। ↩
وَمَا جَعَلْنَا لِبَشَرٍ مِّن قَبْلِكَ ٱلْخُلْدَ ۖ أَفَإِي۟ن مِّتَّ فَهُمُ ٱلْخَـٰلِدُونَ ﴿34﴾ كُلُّ نَفْسٍ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۗ وَنَبْلُوكُم بِٱلشَّرِّ وَٱلْخَيْرِ فِتْنَةً ۖ وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ ﴿35﴾

(ये तुम को नहीं मानते, इसलिए कि तुम्हें भी एक दिन मर जाना है)। तुमसे पहले भी, (हे पैग़ंबर), हमने किसी मनुष्य को अनंत जीवन नहीं दिया, तो क्या यदि तुम मर गए तो ये सदा रहने वाले हैं? सत्य यह है कि प्रत्येक जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है। और (ये अपनी हैसियत पर अभिमान न करें), हम अच्छी और बुरी परिस्थितियों से तुम लोगों की परीक्षा कर रहे हैं, परखने के लिए और (एक दिन) तुम सब हमारी ही ओर लौटाए जाओगे।

وَإِذَا رَءَاكَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَـٰذَا ٱلَّذِى يَذْكُرُ ءَالِهَتَكُمْ وَهُم بِذِكْرِ ٱلرَّحْمَـٰنِ هُمْ كَـٰفِرُونَ ﴿36﴾

ये नकारने वाले जब तुमको देखते हैं तो इसके अतिरिक्त कुछ नहीं करते कि तुम्हें मज़ाक बना लेते हैं। (कहते हैं): अच्छा यही है जो तुम्हारे पूज्य-देवताओं का अपमान करता है और इनकी अपनी दशा यह है कि ये स्वयं परम दयालु परमेश्वर के स्मरण ही के नकारने वाले हैं।

خُلِقَ ٱلْإِنسَـٰنُ مِنْ عَجَلٍ ۚ سَأُو۟رِيكُمْ ءَايَـٰتِى فَلَا تَسْتَعْجِلُونِ ﴿37﴾ وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿38﴾ لَوْ يَعْلَمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ حِينَ لَا يَكُفُّونَ عَن وُجُوهِهِمُ ٱلنَّارَ وَلَا عَن ظُهُورِهِمْ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿39﴾ بَلْ تَأْتِيهِم بَغْتَةً فَتَبْهَتُهُمْ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ رَدَّهَا وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ﴿40﴾

(ये दण्ड के लिए जल्दी मचाए हुए हैं। सत्य यह है कि) मनुष्य उतावलेपन के तत्व से पैदा हुआ है। मैं शीघ्र ही अपनी निशानियाँ तुम्हें दिखाऊंगा, इसलिए मुझसे जल्दी न मचाओ। और कहते हैं कि यह वचन कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो? काश, इन नकारने वालों को उस समय की सूचना होती, जब ये नरक की आग को अपने चेहरों से हटा सकेंगे, न अपनी पीठों से और न इनको कहीं से सहायता पहुंचेगी। यह संकट बताकर नहीं आएगा, अपितु इन पर अचानक आ जाएगा और इन्हें भौंचक्का कर देगा। फिर न उसको हटा सकेंगे और न इन्हें समय में ढील ही दी जाएगी ।

وَلَقَدِ ٱسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَحَاقَ بِٱلَّذِينَ سَخِرُوا۟ مِنْهُم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿41﴾ قُلْ مَن يَكْلَؤُكُم بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ مِنَ ٱلرَّحْمَـٰنِ ۗ بَلْ هُمْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِم مُّعْرِضُونَ ﴿42﴾ أَمْ لَهُمْ ءَالِهَةٌ تَمْنَعُهُم مِّن دُونِنَا ۚ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنفُسِهِمْ وَلَا هُم مِّنَّا يُصْحَبُونَ ﴿43﴾

तुमसे पहले भी, (हे पैग़ंबर), रसूलों का मज़ाक़ उड़ाया जा चुका है। फिर जिन्होंने उनका मज़ाक़ उड़ाया था, उनको उसी चीज़ ने घेर लिया, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे थे। इनसे पूछो, (यदि वही चीज़ तुम्हें आ घेरे तो) रात और दिन में कौन परम दयालु परमेश्वर से तुम्हारी रक्षा कर सकता है? कोई नहीं, अपितु ये लोग अपने प्रभु के उपदेश से मुँह मोड़े हुए हैं। क्या इनके लिए हमारे अतिरिक्त कुछ अन्य पूज्य-देवता हैं जो इनको बचा लेंगे? (कदापि नहीं), वे न स्वयं अपनी सहायता कर सकेंगे और न हमारे विरुद्ध कोई उनका साथ दे सकता है।

بَلْ مَتَّعْنَا هَـٰٓؤُلَآءِ وَءَابَآءَهُمْ حَتَّىٰ طَالَ عَلَيْهِمُ ٱلْعُمُرُ ۗ أَفَلَا يَرَوْنَ أَنَّا نَأْتِى ٱلْأَرْضَ نَنقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَآ ۚ أَفَهُمُ ٱلْغَـٰلِبُونَ ﴿44﴾

अपितु सच्ची बात यह है कि हमने इनको और इनके पुरखों को दुनिया के संसाधन दिए, यहाँ तक कि इन पर एक लंबा समय इसी दशा में बीत गया। फिर भी, क्या ये देख नहीं रहे हैं कि इस भूभाग को हम इसकी सभी सीमाओं से कम करते हुए इसकी ओर बढ़ रहे हैं? फिर क्या यही विजयी रहने वाले हैं?1

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  1. अर्थात मक्का के हरम (Sanctuary) की भूमि को कम करते हुए। यह युद्ध में उन सफलताओं की ओर संकेत है जो इस्लाम के संदेश को मक्का के आसपास प्राप्त हो रही थीं। ↩
قُلْ إِنَّمَآ أُنذِرُكُم بِٱلْوَحْىِ ۚ وَلَا يَسْمَعُ ٱلصُّمُّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا مَا يُنذَرُونَ ﴿45﴾ وَلَئِن مَّسَّتْهُمْ نَفْحَةٌ مِّنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَـٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ ﴿46﴾

इनसे कहो, मैं केवल वह्य के माध्यम से तुमको सचेत कर रहा हूं — परंतु (ये बहरे हैं और) बहरे पुकार को नहीं सुना करते, (हे पैग़ंबर), जब उन्हें सचेत किया जाए। (इस समय तो ये मांगें कर रहे हैं और उधर) बात यह है कि तुम्हारे प्रभु के दण्ड का कोई झोंका भी इन्हें छू जाए तो पुकार उठेंगे कि हाय हमारा दुर्भाग्य! निस्संदेह, हम ही अत्याचारी थे।

وَنَضَعُ ٱلْمَوَٰزِينَ ٱلْقِسْطَ لِيَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْـًٔا ۖ وَإِن كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِّنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا ۗ وَكَفَىٰ بِنَا حَـٰسِبِينَ ﴿47﴾

(इन्हें बताओ कि) क़यामत के दिन के लिए हम न्याय का तुला रख देंगे। फिर किसी जीव पर थोड़ा सा भी अत्याचार नहीं होगा और यदि राई के दाने के बराबर भी किसी का कर्म होगा तो हम उसको ला कर उपस्थित करेंगे। और हम (लोगों का) हिसाब लेने के लिए पर्याप्त हैं।

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ ٱلْفُرْقَانَ وَضِيَآءً وَذِكْرًا لِّلْمُتَّقِينَ ﴿48﴾ ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِٱلْغَيْبِ وَهُم مِّنَ ٱلسَّاعَةِ مُشْفِقُونَ ﴿49﴾

हमने मूसा और हारून को फ़ुर्क़ान और पुण्यशील व्यक्तियों के लिए एक प्रकाश और उपदेश प्रदान किया था।ۣ जो बिन देखे अपने प्रभु से डरते हैं और क़यामत का भय रखने वाले हैं।1

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  1. अर्थात तौरात (Torah)। ↩
وَهَـٰذَا ذِكْرٌ مُّبَارَكٌ أَنزَلْنَـٰهُ ۚ أَفَأَنتُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ ﴿50﴾

उसी प्रकार यह क़ुरआन भी एक आशीषमय उपदेश है जो हमने उतारा है, फिर क्या तुम लोग इसके नकारने वाले ही बने रहोगे?

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَآ إِبْرَٰهِيمَ رُشْدَهُۥ مِن قَبْلُ وَكُنَّا بِهِۦ عَـٰلِمِينَ ﴿51﴾ إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَا هَـٰذِهِ ٱلتَّمَاثِيلُ ٱلَّتِىٓ أَنتُمْ لَهَا عَـٰكِفُونَ ﴿52﴾ قَالُوا۟ وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا لَهَا عَـٰبِدِينَ ﴿53﴾ قَالَ لَقَدْ كُنتُمْ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُمْ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿54﴾ قَالُوٓا۟ أَجِئْتَنَا بِٱلْحَقِّ أَمْ أَنتَ مِنَ ٱللَّـٰعِبِينَ ﴿55﴾ قَالَ بَل رَّبُّكُمْ رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ٱلَّذِى فَطَرَهُنَّ وَأَنَا۠ عَلَىٰ ذَٰلِكُم مِّنَ ٱلشَّـٰهِدِينَ ﴿56﴾ وَتَٱللَّهِ لَأَكِيدَنَّ أَصْنَـٰمَكُم بَعْدَ أَن تُوَلُّوا۟ مُدْبِرِينَ ﴿57﴾ فَجَعَلَهُمْ جُذَٰذًا إِلَّا كَبِيرًا لَّهُمْ لَعَلَّهُمْ إِلَيْهِ يَرْجِعُونَ ﴿58﴾

इससे पहले इब्राहीम को भी हमने (उसके यथोचित) उसके हिस्से का मार्गदर्शन प्रदान किया था और हम उस को भलीभांति जानते थे। जब उसने अपने पिता से और अपनी क़ौम के लोगों से कहा: यह क्या मूर्तियां हैं जिनसे तुम लगे बैठे हो? उन्होंने उत्तर दिया: हमने अपने पूर्वजों को इन्हीं की पूजा करते हुए पाया है। उसने कहा: सत्य यह है कि तुम भी और तुम्हारे पूर्वज भी एक स्पष्ट पथभ्रष्टता में पड़े रहे हो। उन्होंने पूछा: क्या हमारे पास कोई सुविचारित बात लेकर आए हो या मसखरापन कर रहे हो? उसने कहा: नहीं, अपितु तुम्हारा प्रभु वही है जो धरती और समस्त आकाशों का प्रभु है, जिसने उनकी रचना की है और मैं (तुम्हारे सामने) उस पर साक्षी हूं —, (फिर अपने दिल में कहा): परमेश्वर की सौगंध, जब तुम पीठ दिखा कर जा चुकेगे तो मैं तुम्हारी मूर्तियों के साथ अवश्य एक चाल करूंगा। अतः (वे चले गए तो) इब्राहीम ने उन सबको टुकड़े-टुकड़े कर डाला, उनके एक बड़े को छोड़ ताकि वे उसी की ओर वापस जाएँ।

قَالُوا۟ مَن فَعَلَ هَـٰذَا بِـَٔالِهَتِنَآ إِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿59﴾ قَالُوا۟ سَمِعْنَا فَتًى يَذْكُرُهُمْ يُقَالُ لَهُۥٓ إِبْرَٰهِيمُ ﴿60﴾ قَالُوا۟ فَأْتُوا۟ بِهِۦ عَلَىٰٓ أَعْيُنِ ٱلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَشْهَدُونَ ﴿61﴾ قَالُوٓا۟ ءَأَنتَ فَعَلْتَ هَـٰذَا بِـَٔالِهَتِنَا يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ ﴿62﴾ قَالَ بَلْ فَعَلَهُۥ كَبِيرُهُمْ هَـٰذَا فَسْـَٔلُوهُمْ إِن كَانُوا۟ يَنطِقُونَ ﴿63﴾ فَرَجَعُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ فَقَالُوٓا۟ إِنَّكُمْ أَنتُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿64﴾ ثُمَّ نُكِسُوا۟ عَلَىٰ رُءُوسِهِمْ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا هَـٰٓؤُلَآءِ يَنطِقُونَ ﴿65﴾ قَالَ أَفَتَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكُمْ شَيْـًٔا وَلَا يَضُرُّكُمْ ﴿66﴾ أُفٍّ لَّكُمْ وَلِمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿67﴾

(उन्होंने आ कर मूर्तियों की यह दशा देखी तो) कहने लगे: हमारे पूज्य-देवताओं के साथ यह चेष्टा किसने की है? निस्संदेह वह बड़ा ही अत्याचारी है। लोगों ने बताया कि हमने एक नवयुवक को इन्हें कुछ बुरा कहते हुए सुना था, जिसको इब्राहीम कह कर पुकारते हैं। उन्होंने कहा: तो उसको सब लोगों के सामने प्रस्तुत करो ताकि वे भी देख लें। (अतः इब्राहीम लाए गए तो) उन्होंने पूछा: इब्राहीम, हमारे पूज्य-देवताओं के साथ यह चेष्टा तुम्हीं ने की है? इब्राहीम ने उत्तर दिया: अपितु इनके इस बड़े ने की होगी। तो इन्हीं से पूछ लो, यदि ये बोलते हों। इस बात पर उन्हें अपने अंतर्मन की ओर कुछ ध्यान हुआ और उन्होंने एक-दूसरे से कहा: सत्य में तुम ही अत्याचारी हो। परंतु फिर सर झुकाया और बोले: तुम जानते ही हो कि ये बोलते नहीं हैं। इब्राहीम ने कहा: फिर क्या परमेश्वर को छोड़ उन चीज़ों की पूजा-उपासना करते हो जो तुम्हें न कोई लाभ पहुंचा सकें न हानी? धिक्कार है तुम पर और उनपर भी जिन्हें तुम परमेश्वर को छोड़ पूजते हो। फिर क्या समझते नहीं हो?

قَالُوا۟ حَرِّقُوهُ وَٱنصُرُوٓا۟ ءَالِهَتَكُمْ إِن كُنتُمْ فَـٰعِلِينَ ﴿68﴾ قُلْنَا يَـٰنَارُ كُونِى بَرْدًا وَسَلَـٰمًا عَلَىٰٓ إِبْرَٰهِيمَ ﴿69﴾ وَأَرَادُوا۟ بِهِۦ كَيْدًا فَجَعَلْنَـٰهُمُ ٱلْأَخْسَرِينَ ﴿70﴾

(इस पर) वे बोले कि यदि कुछ करना चाहते हो तो इसको आग में जला दो और अपने पूज्य-देवताओं की सहायता करो। (अतः इब्राहीम को आग में झोंक दिया गया, तब) हमने आदेश दिया कि हे अग्नि, तू इब्राहीम के लिए ठंडी हो जा और शांति बन जा। उन्होंने चाहा था कि (इब्राहीम से मुक्ति के लिए) उसके साथ एक चाल चलें, परंतु हमने उनको बुरी तरह असफल बना दिया।

وَنَجَّيْنَـٰهُ وَلُوطًا إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِى بَـٰرَكْنَا فِيهَا لِلْعَـٰلَمِينَ ﴿71﴾ وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةً ۖ وَكُلًّا جَعَلْنَا صَـٰلِحِينَ ﴿72﴾ وَجَعَلْنَـٰهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا وَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِمْ فِعْلَ ٱلْخَيْرَٰتِ وَإِقَامَ ٱلصَّلَوٰةِ وَإِيتَآءَ ٱلزَّكَوٰةِ ۖ وَكَانُوا۟ لَنَا عَـٰبِدِينَ ﴿73﴾

और उसको और (उसके भतीजे) लूत को बचाकर हम उस भूमि की ओर निकाल ले गए, जिसमें हमने दुनिया वालों के लिए आशीष रखे थे। और (उसके बलिदानों के फलस्वरूप) हमने उसको इस्हाक़ प्रदान किया और उसके साथ याक़ूब भी, और हमने हर एक को सदाचारी बनाया। और हमने उनको नेतृत्व प्रदान किया कि हमारे मार्गदर्शन के अनुसार (दुनिया वालों की) अगुआई करते थे और उनको भले कार्य करने और नमाज़ का प्रबंध रखने और ज़कात का भुगतान करने का आदेश भेजा और वे हमारी भक्ति करने वाले थे।1

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  1. यह कन्आन की भूमि (अर्ज़-ए-कन्आन/Land of Canaan) की ओर संकेत है जिसे परमेश्वर ने लगभग दो हज़ार साल तक अपनी धर्म के प्रचार के लिए विशेष रखा। ↩
وَلُوطًا ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًا وَعِلْمًا وَنَجَّيْنَـٰهُ مِنَ ٱلْقَرْيَةِ ٱلَّتِى كَانَت تَّعْمَلُ ٱلْخَبَـٰٓئِثَ ۗ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمَ سَوْءٍ فَـٰسِقِينَ ﴿74﴾ وَأَدْخَلْنَـٰهُ فِى رَحْمَتِنَآ ۖ إِنَّهُۥ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿75﴾

हमने लूत को भी सत्ता और ज्ञान प्रदान किया था और इसी प्रकार उसको भी उस बस्ती से मुक्ति दी थी जहाँ के लोग कुकर्म करते थे। सत्य यह है कि वे बड़े ही बुरे, दुष्कर्मी लोग थे। और (इस लोक और परलोक, दोनों में) उसको हमने विशेष अपनी कृपा में प्रवेश किया। इसमें संदेह नहीं कि वह सदाचारी लोगों में से था।

وَنُوحًا إِذْ نَادَىٰ مِن قَبْلُ فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ فَنَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥ مِنَ ٱلْكَرْبِ ٱلْعَظِيمِ ﴿76﴾ وَنَصَرْنَـٰهُ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَآ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمَ سَوْءٍ فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ أَجْمَعِينَ ﴿77﴾

यही मामला हमने नूह के साथ किया था। याद करो, इन सब लोगों से पहले जब उसने पुकारा तो हमने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसे और उसके लोगों को बड़ी आपदा से मुक्ति प्रदान की। और उसकी सहायता में उन लोगों से बदला लिया जिन्होंने हमारी आयतों को झूठा कह दिया था। निस्संदेह वे बड़े ही बुरे लोग थे, तो हमने उन सबको डुबो दिया।

وَدَاوُۥدَ وَسُلَيْمَـٰنَ إِذْ يَحْكُمَانِ فِى ٱلْحَرْثِ إِذْ نَفَشَتْ فِيهِ غَنَمُ ٱلْقَوْمِ وَكُنَّا لِحُكْمِهِمْ شَـٰهِدِينَ ﴿78﴾ فَفَهَّمْنَـٰهَا سُلَيْمَـٰنَ ۚ وَكُلًّا ءَاتَيْنَا حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَسَخَّرْنَا مَعَ دَاوُۥدَ ٱلْجِبَالَ يُسَبِّحْنَ وَٱلطَّيْرَ ۚ وَكُنَّا فَـٰعِلِينَ ﴿79﴾ وَعَلَّمْنَـٰهُ صَنْعَةَ لَبُوسٍ لَّكُمْ لِتُحْصِنَكُم مِّنۢ بَأْسِكُمْ ۖ فَهَلْ أَنتُمْ شَـٰكِرُونَ ﴿80﴾

और दाऊद और सुलैमान को भी हमने अपने वरदान से आभूषित किया। याद करो, जब वे खेती के मुकदमे का निर्णय कर रहे थे, जब उसमें रात के समय कुछ लोगों की बकरियां जा पड़ी थीं और उनका यह निर्णय हम स्वयं देख रहे थे। अतः हमने सुलैमान को वह मामला समझा दिया और हमने दोनों को सत्ता और ज्ञान प्रदान किया था। और पर्वतों और पक्षियों को हमने दाऊद का साथी गायक बना दिया था, वे (उसके साथ) परमेश्वर की पवित्रता का जाप करते थे, और (उनके लिए यह) हम ही करने वाले थे। और हमने उसको तुम्हारे लिए एक युद्ध कवच की कला सिखाई थी ताकि वह तुम्हारे युद्धों में तुम्हें बचाए रखे। (वह इन सब वरदानों को पाकर अपने प्रभु का आभार व्यक्त करता था)। फिर क्या तुम भी (इस प्रकार) आभारी बनते हो?

وَلِسُلَيْمَـٰنَ ٱلرِّيحَ عَاصِفَةً تَجْرِى بِأَمْرِهِۦٓ إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِى بَـٰرَكْنَا فِيهَا ۚ وَكُنَّا بِكُلِّ شَىْءٍ عَـٰلِمِينَ ﴿81﴾ وَمِنَ ٱلشَّيَـٰطِينِ مَن يَغُوصُونَ لَهُۥ وَيَعْمَلُونَ عَمَلًا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ وَكُنَّا لَهُمْ حَـٰفِظِينَ ﴿82﴾

और सुलैमान के लिए हमने तेज़ हवाओं को वशीभूत कर दिया जो उसके आदेश से उस भूभाग की ओर चलती थीं, जिसमें हमने आशीष रखे थे और हम प्रत्येक चीज़ के जानने वाले थे। और शैतानों में से भी हमने उसके अधीन किए थे जो उसके लिए (समुद्रों में) डुबकी लगाते थे और उसके अतिरिक्त अन्य कार्य भी करते थे, और हम ही उनको थामे हुए थे।

وَأَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُۥٓ أَنِّى مَسَّنِىَ ٱلضُّرُّ وَأَنتَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ ﴿83﴾ فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ فَكَشَفْنَا مَا بِهِۦ مِن ضُرٍّ ۖ وَءَاتَيْنَـٰهُ أَهْلَهُۥ وَمِثْلَهُم مَّعَهُمْ رَحْمَةً مِّنْ عِندِنَا وَذِكْرَىٰ لِلْعَـٰبِدِينَ ﴿84﴾

और हमने अय्यूब पर भी कृपा की थी, जब उसने अपने प्रभु को पुकारा कि मैं पीड़ा में हूं और तू सब दया करने वालों से बढ़कर दया करने वाला है। (उसने पुकारा) तो हमने उसकी प्रार्थना सुन ली और जिस पीड़ा में वह था, उसको दूर कर दिया और उसके परिवार वाले भी उसको दिए, यहाँ तक कि उनके साथ इतने ही और भी, अपनी विशेष कृपा से और इसलिए कि यह एक स्मरण हो परमेश्वर की भक्ति करने वालों के लिए।

وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِدْرِيسَ وَذَا ٱلْكِفْلِ ۖ كُلٌّ مِّنَ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿85﴾ وَأَدْخَلْنَـٰهُمْ فِى رَحْمَتِنَآ ۖ إِنَّهُم مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿86﴾

और यही कृपा इस्माईल और इद्रीस और ज़ुल्-किफ़्ल पर भी हुई। ये सब धैर्य रखने वालों में से थे। इनको हमने अपनी दया में प्रवेश कर लिया । इसमें संदेह नहीं कि ये (हमारे) सदाचारी भक्तों में से थे।

وَذَا ٱلنُّونِ إِذ ذَّهَبَ مُغَـٰضِبًا فَظَنَّ أَن لَّن نَّقْدِرَ عَلَيْهِ فَنَادَىٰ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ أَن لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنتَ سُبْحَـٰنَكَ إِنِّى كُنتُ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿87﴾ فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ وَنَجَّيْنَـٰهُ مِنَ ٱلْغَمِّ ۚ وَكَذَٰلِكَ نُـۨجِى ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿88﴾

और मछली वाले (यूनुस) पर भी, जब वह (अपनी क़ौम से) क्रुद्ध हो कर चला गया और उसने सोचा कि हम उस पर कोई पकड़ नहीं करेंगे। परंतु फिर अंधेरों में पुकार उठा कि (प्रभु), तेरे अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, तू दोषरहित है, निस्संदेह मैं ही दोषी हूं। तब उसकी प्रार्थना हमने स्वीकार कर ली और उसको दुख से मुक्ति दी। मानने वालों को हम इसी प्रकार मुक्ति देते हैं।

وَزَكَرِيَّآ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُۥ رَبِّ لَا تَذَرْنِى فَرْدًا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْوَٰرِثِينَ ﴿89﴾ فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ وَوَهَبْنَا لَهُۥ يَحْيَىٰ وَأَصْلَحْنَا لَهُۥ زَوْجَهُۥٓ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ يُسَـٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا وَرَهَبًا ۖ وَكَانُوا۟ لَنَا خَـٰشِعِينَ ﴿90﴾

और ज़करिय्या पर भी, जब उसने अपने प्रभु को पुकारा कि मेरे प्रभु, मुझे अकेला न छोड़ और तू सब उत्तराधिकारियों से अच्छा उत्तराधिकारी है। फिर उसकी यह प्रार्थना हमने स्वीकार की और उसे यह्या प्रदान किया और उसकी पत्नी को उसके लिए भला चंगा कर दिया। इसमें संदेह नहीं कि ये लोग भले कार्यों में आगे रहते थे और आशा और भय की हर परिस्थिति में हमको पुकारते और हमारे आगे सर झुकाए हुए रहने वाले थे।

وَٱلَّتِىٓ أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِن رُّوحِنَا وَجَعَلْنَـٰهَا وَٱبْنَهَآ ءَايَةً لِّلْعَـٰلَمِينَ ﴿91﴾

और उस स्त्री पर भी जिसने अपने आप को पवित्र रखा तो हमने उसके अंदर अपनी रूह फूंक दी और उसको और उसके पुत्र (ईसा) को दुनिया वालों के लिए एक निशानी बना दिया।

إِنَّ هَـٰذِهِۦٓ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَٰحِدَةً وَأَنَا۠ رَبُّكُمْ فَٱعْبُدُونِ ﴿92﴾ وَتَقَطَّعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ ۖ كُلٌّ إِلَيْنَا رَٰجِعُونَ ﴿93﴾ فَمَن يَعْمَلْ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا كُفْرَانَ لِسَعْيِهِۦ وَإِنَّا لَهُۥ كَـٰتِبُونَ ﴿94﴾

(अतः) यह सत्य है कि यह तुम्हारा संघ है, एक ही संघ और मैं ही तुम्हारा प्रभु हूं, इसलिए मेरी ही भक्ति करो। परंतु (ये लोग हैं कि) इन्होंने अपने धर्म को आपस में टुकड़े-टुकड़े कर डाला है। (तुम इनकी परवाह न करो), ये सब हमारी ही ओर लौटने वाले हैं। फिर जो भले कर्म करेगा और ईमान पर भी होगा तो उसके परिश्रम की उपेक्षा नहीं होगी। हम उसके लिए उसे लिख रहे हैं।

وَحَرَٰمٌ عَلَىٰ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَـٰهَآ أَنَّهُمْ لَا يَرْجِعُونَ ﴿95﴾ حَتَّىٰٓ إِذَا فُتِحَتْ يَأْجُوجُ وَمَأْجُوجُ وَهُم مِّن كُلِّ حَدَبٍ يَنسِلُونَ ﴿96﴾ وَٱقْتَرَبَ ٱلْوَعْدُ ٱلْحَقُّ فَإِذَا هِىَ شَـٰخِصَةٌ أَبْصَـٰرُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يَـٰوَيْلَنَا قَدْ كُنَّا فِى غَفْلَةٍ مِّنْ هَـٰذَا بَلْ كُنَّا ظَـٰلِمِينَ ﴿97﴾

(अब इन नकारने वालों के अधिक पीछे लगने की आवश्यकता नहीं है, हे पैग़ंबर। इसलिए कि) हमने जिस बस्ती वालों के लिए (अपने नियम अनुसार) विनाश निश्चित कर रखा है, उनके लिए वर्जित है कि वे सत्य की ओर आएँ, इसलिए कि वे कभी वापस नहीं आएंगे। यहाँ तक कि वह घड़ी आ जाए, जब याजूज व माजूज खोल दिए जाएं और वे हर ऊँचाई से पिल पड़ें। और (क़यामत का) सच्चा वादा पास आ जाए तो अचानक इन नकारने वालों की आँखें खुली की खुली रह जाएं और बोल उठें कि हाय हमारा दुर्भाग्य! हम इससे बेपरवाही में पड़े रहे, अपितु हम अत्याचारी थे।1

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  1. यहाँ से आगे सूरह के समापन की आयतें हैं। इनमें 'औद् अलल्-बदअ' (عود علی البدء) की शैली पर उसी विषय को नए सिरे से लिया गया है जिससे सूरह शुरू हुई थी। ↩
إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنتُمْ لَهَا وَٰرِدُونَ ﴿98﴾ لَوْ كَانَ هَـٰٓؤُلَآءِ ءَالِهَةً مَّا وَرَدُوهَا ۖ وَكُلٌّ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿99﴾ لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَهُمْ فِيهَا لَا يَسْمَعُونَ ﴿100﴾

तुम और तुम्हारे पूज्य-देवता जिनको परमेश्वर को छोड़ पूजते रहे हो, अब नरक का ईंधन हैं। तुम (रोओ या विनती करो), उसमें प्रविष्ट होकर रहोगे। यदि ये वास्तव में पूजा योग्य होते तो उसमें न जाते — (ये पूजने वाले और जिनको पूजा गया), सब सदा उसी में रहेंगे। अब पूजने वालों को उसमें चिल्लाना है और जिनकी पूजा करते रहे हो, उनकी दशा यह होगी कि उसमें कुछ नहीं सुनेंगे।

إِنَّ ٱلَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُم مِّنَّا ٱلْحُسْنَىٰٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَنْهَا مُبْعَدُونَ ﴿101﴾ لَا يَسْمَعُونَ حَسِيسَهَا ۖ وَهُمْ فِى مَا ٱشْتَهَتْ أَنفُسُهُمْ خَـٰلِدُونَ ﴿102﴾ لَا يَحْزُنُهُمُ ٱلْفَزَعُ ٱلْأَكْبَرُ وَتَتَلَقَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ هَـٰذَا يَوْمُكُمُ ٱلَّذِى كُنتُمْ تُوعَدُونَ ﴿103﴾

अपितु, जिनके लिए हमारी ओर से अच्छे अंत का वादा हो चुका है, वे उससे दूर रखे जाएँगे। वे उसकी आहट भी नहीं सुनेंगे और सदा अपने मन-भाते आनंद में रहेंगे। वह बड़ी घबराहट उनको थोड़ा सा भी दुख में नहीं डालेगी और परमेश्वर के फ़रिश्ते उनको हाथों-हाथ लेंगे। और कहेंगे: यह तुम्हारा वही दिन है, जिसका तुमसे वादा किया जाता था।

يَوْمَ نَطْوِى ٱلسَّمَآءَ كَطَىِّ ٱلسِّجِلِّ لِلْكُتُبِ ۚ كَمَا بَدَأْنَآ أَوَّلَ خَلْقٍ نُّعِيدُهُۥ ۚ وَعْدًا عَلَيْنَآ ۚ إِنَّا كُنَّا فَـٰعِلِينَ ﴿104﴾

उस दिन, जबकि हम आकाश को लपेट देंगे, जिस प्रकार गोल पंजी में पन्ने लपेट दिए जाते हैं। हमने जिस प्रकार प्रथम उत्पत्ति का प्रारम्भ किया था, उसी प्रकार हम उसकी पुनरावृत्ति कर देंगे। यह हमारे ज़िम्मे एक निश्चित वचन है, हम इसको अवश्य करके रहेंगे।

وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِى ٱلزَّبُورِ مِنۢ بَعْدِ ٱلذِّكْرِ أَنَّ ٱلْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِىَ ٱلصَّـٰلِحُونَ ﴿105﴾ إِنَّ فِى هَـٰذَا لَبَلَـٰغًا لِّقَوْمٍ عَـٰبِدِينَ ﴿106﴾ وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَـٰلَمِينَ ﴿107﴾ قُلْ إِنَّمَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ أَنَّمَآ إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌ وَٰحِدٌ ۖ فَهَلْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ ﴿108﴾ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقُلْ ءَاذَنتُكُمْ عَلَىٰ سَوَآءٍ ۖ وَإِنْ أَدْرِىٓ أَقَرِيبٌ أَم بَعِيدٌ مَّا تُوعَدُونَ ﴿109﴾ إِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلْجَهْرَ مِنَ ٱلْقَوْلِ وَيَعْلَمُ مَا تَكْتُمُونَ ﴿110﴾ وَإِنْ أَدْرِى لَعَلَّهُۥ فِتْنَةٌ لَّكُمْ وَمَتَـٰعٌ إِلَىٰ حِينٍ ﴿111﴾

हमने उपदेश व स्मृति के बाद ज़बूर में लिख दिया था कि (उस दिन जो) धरती (अस्तित्व में आएगी, उस) के उत्तराधिकारी मेरे सदाचारी भक्त होंगे। इसमें उन लोगों के लिए बड़ी जानकारी है जो (हमारी) भक्ति करने वाले हैं। (ये तुम से दण्ड की मांग करते हैं) और हमने (हे पैग़ंबर), तुमको जो भेजा है तो दुनिया वालों के लिए साक्षात दया बना कर भेजा है। इनसे कह दो कि मेरी ओर तो केवल यह वह्य की जाती है कि तुम्हारा उपास्य एक ही उपास्य है तो क्या तुम अपने आपको उसे सौंप देते हो? फिर यदि वे मुँह फेरें तो कह दो कि मैंने तुम सबको समान रूप से सचेत कर दिया है। मैं नहीं जानता कि वह घड़ी पास है या दूर जिसका तुम्हें वचन दिया जा रहा है। (अब मामला परमेश्वर के पास है)। निस्संदेह, वही जानता है उसको भी जो सामने कह रहे हो और उसको भी जिसे तुम छिपाते हो। और मैं नहीं जानता, हो सकता है कि यह अवकाश तुम्हारे लिए एक परीक्षा और एक विशेष घड़ी तक लाभ उठा लेने का मौक़ा हो।

قَـٰلَ رَبِّ ٱحْكُم بِٱلْحَقِّ ۗ وَرَبُّنَا ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلْمُسْتَعَانُ عَلَىٰ مَا تَصِفُونَ ﴿112﴾

पैग़ंबर ने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, सत्य के साथ निर्णय कर दे, और कहा: हमारा प्रभु परम दयालु ही है, जिससे हम उन बातों के विरुद्ध सहायता मांगते हैं जो तुम करते हो।