सूरह 21
अल्-अंबिया
मक्की · 112 आयतें · 39 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
लोगों के लिए उनके हिसाब का समय पास आ लगा है और वे लापरवाही में पड़े हुए अनदेखा किए जा रहे हैं। उनके प्रभु की ओर से जो नवीन उपदेश भी उनके पास आता है, वे उसको सुनते हैं तो खेल में लगे होते हैं। उनके दिल बेपरवाह हैं और वे दुष्ट चुपके-चुपके (आपस में) कानाफूसियां करते हैं कि यह व्यक्ति है ही क्या, यह तो तुम्हारे ही जैसा मनुष्य है, फिर क्या आंखों देखते इसके जादू में पड़ते हो?
(इस पर) रसूल ने कहा: (ये क्या कानाफूसियां करते हैं)? मेरा प्रभु हर उस बात को जानता है जो धरती और आकाश में की जाए और वह सुनने वाला और जानने वाला है।
यही नहीं कि केवल जादू कहते हैं, अपितु उन्होंने यह भी कहा है कि यह परेशान सपने हैं, अपितु यह भी कि इसने अपनी ओर से इस क़ुरआन की रचना की है, अपितु यह भी कि यह केवल एक कवि है। अतः (यदि यह वास्तव में पैग़ंबर है तो) हमारे पास उसी प्रकार कोई निशानी लाए, जिस प्रकार पूर्वकालीन पैग़ंबर निशानियों के साथ भेजे गए थे।
हमने जिन बस्तियों को नष्ट किया है, उनमें से किसी ने भी इनसे पहले (इस प्रकार की निशानी देखकर) नहीं माना तो क्या ये मान जाएँगे? (कहते हैं कि हमारे जैसा मनुष्य है)। तुमसे पहले भी हमने जिसको रसूल बना कर भेजा, मनुष्यों ही में से भेजा है जिनकी ओर हम वह्य करते थे। अतः स्मृति वालों से पूछ लो, यदि तुम लोग नहीं जानते हो। हमने उन रसूलों के ऐसे शरीर नहीं बनाए थे कि वे भोजन न खाते हों और वे (दुनिया में) सदा रहने वाले भी नहीं थे। फिर देख लो कि उनसे अपना वचन हमने पूरा कर दिया और उनको और (उनके साथ) जिनको हम चाहते थे, बचा लिया और हद से आगे बढ़ने वालों को हमने नष्ट कर के छोड़ा।1
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- अर्थात अहल-ए-किताब (Jews and Christians) से, जिनके पास इससे पहले इसी प्रकार स्मरण कराने वाली [वाणी] भेजी गई। ↩
(लोगो), हमने तुम्हारी ओर भी एक ग्रंथ उतार दिया है, जिसमें तुम्हारे हिस्से का उपदेश है। फिर क्या समझते नहीं हो? कितनी ही बस्तियाँ हमने तोड़-फोड़ कर समतल कर दीं जो अपने प्राणों पर अत्याचार ढा रही थीं और उनके बाद अन्य लोग उठा खड़े किए। फिर जब उन्होंने हमारे दण्ड की आहट पाई तो उसी समय वहां से भागने लगे। (हमने कहा): अब भागो नहीं, अपने उन्हीं साधनों की ओर जिनमें तुम मौज कर रहे थे और अपने उन्हीं घरों की ओर लौट जाओ जो तुम्हारे विलास स्थान थे ताकि तुमसे पूछा जाए। उन्होंने बड़ा विलाप किया कि हाय हमारा दुर्भाग्य, निस्संदेह, हम ही अत्याचारी थे। अतः यही विलाप करते रहे, यहाँ तक कि हमने उनको काटकर ढेर कर दिया, मानो जैसे बुझे हुए पड़े हैं।
हमने धरती और आकाश को और उसको जो उनके बीच है, किसी लीला के रूप में नहीं बनाया है। यदि हम कोई लीला रचना चाहते तो उसका प्रबंध अपने पास ही से कर लेते, यदि हमको यही करना होता। कदापि नहीं, अपितु (एक दिन आने वाला है कि) हम सत्य को असत्य पर मारेंगे और वह उसका सर तोड़ देगा। फिर उसी समय देखोगे कि वह मिट गया है। सत्य यह है कि तुम्हारे लिए बड़ी बर्बादी है उन बातों के कारण जो तुम कहते हो।
उसी के हैं जो धरती और समस्त आकाशों में हैं और जो उसकी सभा में हैं, (जिन्हें उसकी संतान बना कर पूजते हो), वे उसकी भक्ति से हटते नहीं और न थकते हैं। रात दिन उसकी पवित्रता का जाप करते रहते हैं, कभी विश्राम नहीं करते।
क्या इन्होंने धरती के अलग पूज्य-देवता बना लिए हैं जो उसको जीवन प्रदान करते हैं? यदि धरती और आकाश में परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य उपास्य भी होते तो दोनों अस्त-व्यस्त हो जाते। अतः परमेश्वर, सिंघासन का स्वामी उन सब बातों से मुक्त है जो ये कहते हैं। वह जो कुछ करता है, उसके लिए (किसी के आगे) उत्तरदायी नहीं है और ये सब उत्तरदायी हैं। क्या इन्होंने परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य उपास्य बना लिए हैं? इनसे कहो कि अपना प्रमाण पेश करो। यह उनकी स्मरण-वाणी है जो मेरे साथ हैं और उनकी भी जो मुझसे पूर्व हुए हैं। नहीं, किसी के पास कोई प्रमाण नहीं है, अपितु इनमें से अधिकांश सत्य को नहीं जानते, इसलिए मुँह मोड़े हुए हैं। तुमसे पूर्व जो रसूल भी हमने भेजे हैं, उनकी ओर हम यही वह्य करते रहे हैं कि मेरे अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है, तो मेरी ही भक्ति करो।1
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- अर्थात क़ुरआन भी उपलब्ध है जो मेरे माननेवालों के लिए स्मरण बनकर अवतरित हुआ है, और तौरात, ज़बूर, इंजील और नबियों के दूसरे ग्रंथ भी। ↩
ये कहते हैं कि परम दयालु परमेश्वर की संतान है। वह (इस दोष से) मुक्त है। फ़रिश्ते, जिनको ये परमेश्वर की बेटियां समझते हैं, वे उसकी संतान नहीं, अपितु सम्मानित भक्त हैं। वे उसके सामने कभी बढ़कर नहीं बोलते और उसके आदेश का पालन करते हैं। उनके आगे और पीछे जो कुछ है, वह सब जानता है। वे किसी की सिफ़ारिश नहीं करते, उसके अतिरिक्त जिसके लिए परमेश्वर चाहे और उसके भय से कांपते रहते हैं। उनमें से जो यह कहने का दुस्साहस करे कि परमेश्वर के अतिरिक्त मैं उपास्य हूं तो उसको हम नरक का दण्ड देंगे। हम अत्याचारियों को इसी प्रकार दण्ड देते हैं।
(ये निशानियाँ मांगते हैं)। क्या इन नकारने वालों ने बार-बार देखा नहीं कि आकाश और धरती, दोनों बंद हैं, फिर हमने उनको खोल दिया और हमने प्रत्येक जीवित चीज़ को आकाश के पानी ही से पैदा किया है? क्या वे फिर भी नहीं मानेंगे? और हमने धरती में पर्वत जमा दिए कि वह उनको लेकर झुक न पड़े और उन पर्वतों के अंदर मार्ग के लिए दर्रे बनाए ताकि लोग (अपने लिए) मार्ग पा लें। और आकाश को हमने एक सुरक्षित छत बना दिया और ये लोग हैं कि उसकी निशानियों से मुँह फेरे हुए हैं। सत्य यह है कि वही है जिसने रात और दिन बनाए और सूरज और चाँद की रचना की है। इनमें से प्रत्येक (अपने) एक पथ में गमन कर रहा है।1
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- अर्थात आकाश से वर्षा नहीं हुई और धरती से हरियाली नहीं उगी। इसी को इस आयत में बंद होने के शब्दों में व्यक्त किया गया है। ↩
(ये तुम को नहीं मानते, इसलिए कि तुम्हें भी एक दिन मर जाना है)। तुमसे पहले भी, (हे पैग़ंबर), हमने किसी मनुष्य को अनंत जीवन नहीं दिया, तो क्या यदि तुम मर गए तो ये सदा रहने वाले हैं? सत्य यह है कि प्रत्येक जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है। और (ये अपनी हैसियत पर अभिमान न करें), हम अच्छी और बुरी परिस्थितियों से तुम लोगों की परीक्षा कर रहे हैं, परखने के लिए और (एक दिन) तुम सब हमारी ही ओर लौटाए जाओगे।
ये नकारने वाले जब तुमको देखते हैं तो इसके अतिरिक्त कुछ नहीं करते कि तुम्हें मज़ाक बना लेते हैं। (कहते हैं): अच्छा यही है जो तुम्हारे पूज्य-देवताओं का अपमान करता है और इनकी अपनी दशा यह है कि ये स्वयं परम दयालु परमेश्वर के स्मरण ही के नकारने वाले हैं।
(ये दण्ड के लिए जल्दी मचाए हुए हैं। सत्य यह है कि) मनुष्य उतावलेपन के तत्व से पैदा हुआ है। मैं शीघ्र ही अपनी निशानियाँ तुम्हें दिखाऊंगा, इसलिए मुझसे जल्दी न मचाओ। और कहते हैं कि यह वचन कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो? काश, इन नकारने वालों को उस समय की सूचना होती, जब ये नरक की आग को अपने चेहरों से हटा सकेंगे, न अपनी पीठों से और न इनको कहीं से सहायता पहुंचेगी। यह संकट बताकर नहीं आएगा, अपितु इन पर अचानक आ जाएगा और इन्हें भौंचक्का कर देगा। फिर न उसको हटा सकेंगे और न इन्हें समय में ढील ही दी जाएगी ।
तुमसे पहले भी, (हे पैग़ंबर), रसूलों का मज़ाक़ उड़ाया जा चुका है। फिर जिन्होंने उनका मज़ाक़ उड़ाया था, उनको उसी चीज़ ने घेर लिया, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे थे। इनसे पूछो, (यदि वही चीज़ तुम्हें आ घेरे तो) रात और दिन में कौन परम दयालु परमेश्वर से तुम्हारी रक्षा कर सकता है? कोई नहीं, अपितु ये लोग अपने प्रभु के उपदेश से मुँह मोड़े हुए हैं। क्या इनके लिए हमारे अतिरिक्त कुछ अन्य पूज्य-देवता हैं जो इनको बचा लेंगे? (कदापि नहीं), वे न स्वयं अपनी सहायता कर सकेंगे और न हमारे विरुद्ध कोई उनका साथ दे सकता है।
अपितु सच्ची बात यह है कि हमने इनको और इनके पुरखों को दुनिया के संसाधन दिए, यहाँ तक कि इन पर एक लंबा समय इसी दशा में बीत गया। फिर भी, क्या ये देख नहीं रहे हैं कि इस भूभाग को हम इसकी सभी सीमाओं से कम करते हुए इसकी ओर बढ़ रहे हैं? फिर क्या यही विजयी रहने वाले हैं?1
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- अर्थात मक्का के हरम (Sanctuary) की भूमि को कम करते हुए। यह युद्ध में उन सफलताओं की ओर संकेत है जो इस्लाम के संदेश को मक्का के आसपास प्राप्त हो रही थीं। ↩
इनसे कहो, मैं केवल वह्य के माध्यम से तुमको सचेत कर रहा हूं — परंतु (ये बहरे हैं और) बहरे पुकार को नहीं सुना करते, (हे पैग़ंबर), जब उन्हें सचेत किया जाए। (इस समय तो ये मांगें कर रहे हैं और उधर) बात यह है कि तुम्हारे प्रभु के दण्ड का कोई झोंका भी इन्हें छू जाए तो पुकार उठेंगे कि हाय हमारा दुर्भाग्य! निस्संदेह, हम ही अत्याचारी थे।
(इन्हें बताओ कि) क़यामत के दिन के लिए हम न्याय का तुला रख देंगे। फिर किसी जीव पर थोड़ा सा भी अत्याचार नहीं होगा और यदि राई के दाने के बराबर भी किसी का कर्म होगा तो हम उसको ला कर उपस्थित करेंगे। और हम (लोगों का) हिसाब लेने के लिए पर्याप्त हैं।
उसी प्रकार यह क़ुरआन भी एक आशीषमय उपदेश है जो हमने उतारा है, फिर क्या तुम लोग इसके नकारने वाले ही बने रहोगे?
इससे पहले इब्राहीम को भी हमने (उसके यथोचित) उसके हिस्से का मार्गदर्शन प्रदान किया था और हम उस को भलीभांति जानते थे। जब उसने अपने पिता से और अपनी क़ौम के लोगों से कहा: यह क्या मूर्तियां हैं जिनसे तुम लगे बैठे हो? उन्होंने उत्तर दिया: हमने अपने पूर्वजों को इन्हीं की पूजा करते हुए पाया है। उसने कहा: सत्य यह है कि तुम भी और तुम्हारे पूर्वज भी एक स्पष्ट पथभ्रष्टता में पड़े रहे हो। उन्होंने पूछा: क्या हमारे पास कोई सुविचारित बात लेकर आए हो या मसखरापन कर रहे हो? उसने कहा: नहीं, अपितु तुम्हारा प्रभु वही है जो धरती और समस्त आकाशों का प्रभु है, जिसने उनकी रचना की है और मैं (तुम्हारे सामने) उस पर साक्षी हूं —, (फिर अपने दिल में कहा): परमेश्वर की सौगंध, जब तुम पीठ दिखा कर जा चुकेगे तो मैं तुम्हारी मूर्तियों के साथ अवश्य एक चाल करूंगा। अतः (वे चले गए तो) इब्राहीम ने उन सबको टुकड़े-टुकड़े कर डाला, उनके एक बड़े को छोड़ ताकि वे उसी की ओर वापस जाएँ।
(उन्होंने आ कर मूर्तियों की यह दशा देखी तो) कहने लगे: हमारे पूज्य-देवताओं के साथ यह चेष्टा किसने की है? निस्संदेह वह बड़ा ही अत्याचारी है। लोगों ने बताया कि हमने एक नवयुवक को इन्हें कुछ बुरा कहते हुए सुना था, जिसको इब्राहीम कह कर पुकारते हैं। उन्होंने कहा: तो उसको सब लोगों के सामने प्रस्तुत करो ताकि वे भी देख लें। (अतः इब्राहीम लाए गए तो) उन्होंने पूछा: इब्राहीम, हमारे पूज्य-देवताओं के साथ यह चेष्टा तुम्हीं ने की है? इब्राहीम ने उत्तर दिया: अपितु इनके इस बड़े ने की होगी। तो इन्हीं से पूछ लो, यदि ये बोलते हों। इस बात पर उन्हें अपने अंतर्मन की ओर कुछ ध्यान हुआ और उन्होंने एक-दूसरे से कहा: सत्य में तुम ही अत्याचारी हो। परंतु फिर सर झुकाया और बोले: तुम जानते ही हो कि ये बोलते नहीं हैं। इब्राहीम ने कहा: फिर क्या परमेश्वर को छोड़ उन चीज़ों की पूजा-उपासना करते हो जो तुम्हें न कोई लाभ पहुंचा सकें न हानी? धिक्कार है तुम पर और उनपर भी जिन्हें तुम परमेश्वर को छोड़ पूजते हो। फिर क्या समझते नहीं हो?
(इस पर) वे बोले कि यदि कुछ करना चाहते हो तो इसको आग में जला दो और अपने पूज्य-देवताओं की सहायता करो। (अतः इब्राहीम को आग में झोंक दिया गया, तब) हमने आदेश दिया कि हे अग्नि, तू इब्राहीम के लिए ठंडी हो जा और शांति बन जा। उन्होंने चाहा था कि (इब्राहीम से मुक्ति के लिए) उसके साथ एक चाल चलें, परंतु हमने उनको बुरी तरह असफल बना दिया।
और उसको और (उसके भतीजे) लूत को बचाकर हम उस भूमि की ओर निकाल ले गए, जिसमें हमने दुनिया वालों के लिए आशीष रखे थे। और (उसके बलिदानों के फलस्वरूप) हमने उसको इस्हाक़ प्रदान किया और उसके साथ याक़ूब भी, और हमने हर एक को सदाचारी बनाया। और हमने उनको नेतृत्व प्रदान किया कि हमारे मार्गदर्शन के अनुसार (दुनिया वालों की) अगुआई करते थे और उनको भले कार्य करने और नमाज़ का प्रबंध रखने और ज़कात का भुगतान करने का आदेश भेजा और वे हमारी भक्ति करने वाले थे।1
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- यह कन्आन की भूमि (अर्ज़-ए-कन्आन/Land of Canaan) की ओर संकेत है जिसे परमेश्वर ने लगभग दो हज़ार साल तक अपनी धर्म के प्रचार के लिए विशेष रखा। ↩
हमने लूत को भी सत्ता और ज्ञान प्रदान किया था और इसी प्रकार उसको भी उस बस्ती से मुक्ति दी थी जहाँ के लोग कुकर्म करते थे। सत्य यह है कि वे बड़े ही बुरे, दुष्कर्मी लोग थे। और (इस लोक और परलोक, दोनों में) उसको हमने विशेष अपनी कृपा में प्रवेश किया। इसमें संदेह नहीं कि वह सदाचारी लोगों में से था।
यही मामला हमने नूह के साथ किया था। याद करो, इन सब लोगों से पहले जब उसने पुकारा तो हमने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसे और उसके लोगों को बड़ी आपदा से मुक्ति प्रदान की। और उसकी सहायता में उन लोगों से बदला लिया जिन्होंने हमारी आयतों को झूठा कह दिया था। निस्संदेह वे बड़े ही बुरे लोग थे, तो हमने उन सबको डुबो दिया।
और दाऊद और सुलैमान को भी हमने अपने वरदान से आभूषित किया। याद करो, जब वे खेती के मुकदमे का निर्णय कर रहे थे, जब उसमें रात के समय कुछ लोगों की बकरियां जा पड़ी थीं और उनका यह निर्णय हम स्वयं देख रहे थे। अतः हमने सुलैमान को वह मामला समझा दिया और हमने दोनों को सत्ता और ज्ञान प्रदान किया था। और पर्वतों और पक्षियों को हमने दाऊद का साथी गायक बना दिया था, वे (उसके साथ) परमेश्वर की पवित्रता का जाप करते थे, और (उनके लिए यह) हम ही करने वाले थे। और हमने उसको तुम्हारे लिए एक युद्ध कवच की कला सिखाई थी ताकि वह तुम्हारे युद्धों में तुम्हें बचाए रखे। (वह इन सब वरदानों को पाकर अपने प्रभु का आभार व्यक्त करता था)। फिर क्या तुम भी (इस प्रकार) आभारी बनते हो?
और सुलैमान के लिए हमने तेज़ हवाओं को वशीभूत कर दिया जो उसके आदेश से उस भूभाग की ओर चलती थीं, जिसमें हमने आशीष रखे थे और हम प्रत्येक चीज़ के जानने वाले थे। और शैतानों में से भी हमने उसके अधीन किए थे जो उसके लिए (समुद्रों में) डुबकी लगाते थे और उसके अतिरिक्त अन्य कार्य भी करते थे, और हम ही उनको थामे हुए थे।
और हमने अय्यूब पर भी कृपा की थी, जब उसने अपने प्रभु को पुकारा कि मैं पीड़ा में हूं और तू सब दया करने वालों से बढ़कर दया करने वाला है। (उसने पुकारा) तो हमने उसकी प्रार्थना सुन ली और जिस पीड़ा में वह था, उसको दूर कर दिया और उसके परिवार वाले भी उसको दिए, यहाँ तक कि उनके साथ इतने ही और भी, अपनी विशेष कृपा से और इसलिए कि यह एक स्मरण हो परमेश्वर की भक्ति करने वालों के लिए।
और यही कृपा इस्माईल और इद्रीस और ज़ुल्-किफ़्ल पर भी हुई। ये सब धैर्य रखने वालों में से थे। इनको हमने अपनी दया में प्रवेश कर लिया । इसमें संदेह नहीं कि ये (हमारे) सदाचारी भक्तों में से थे।
और मछली वाले (यूनुस) पर भी, जब वह (अपनी क़ौम से) क्रुद्ध हो कर चला गया और उसने सोचा कि हम उस पर कोई पकड़ नहीं करेंगे। परंतु फिर अंधेरों में पुकार उठा कि (प्रभु), तेरे अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, तू दोषरहित है, निस्संदेह मैं ही दोषी हूं। तब उसकी प्रार्थना हमने स्वीकार कर ली और उसको दुख से मुक्ति दी। मानने वालों को हम इसी प्रकार मुक्ति देते हैं।
और ज़करिय्या पर भी, जब उसने अपने प्रभु को पुकारा कि मेरे प्रभु, मुझे अकेला न छोड़ और तू सब उत्तराधिकारियों से अच्छा उत्तराधिकारी है। फिर उसकी यह प्रार्थना हमने स्वीकार की और उसे यह्या प्रदान किया और उसकी पत्नी को उसके लिए भला चंगा कर दिया। इसमें संदेह नहीं कि ये लोग भले कार्यों में आगे रहते थे और आशा और भय की हर परिस्थिति में हमको पुकारते और हमारे आगे सर झुकाए हुए रहने वाले थे।
और उस स्त्री पर भी जिसने अपने आप को पवित्र रखा तो हमने उसके अंदर अपनी रूह फूंक दी और उसको और उसके पुत्र (ईसा) को दुनिया वालों के लिए एक निशानी बना दिया।
(अतः) यह सत्य है कि यह तुम्हारा संघ है, एक ही संघ और मैं ही तुम्हारा प्रभु हूं, इसलिए मेरी ही भक्ति करो। परंतु (ये लोग हैं कि) इन्होंने अपने धर्म को आपस में टुकड़े-टुकड़े कर डाला है। (तुम इनकी परवाह न करो), ये सब हमारी ही ओर लौटने वाले हैं। फिर जो भले कर्म करेगा और ईमान पर भी होगा तो उसके परिश्रम की उपेक्षा नहीं होगी। हम उसके लिए उसे लिख रहे हैं।
(अब इन नकारने वालों के अधिक पीछे लगने की आवश्यकता नहीं है, हे पैग़ंबर। इसलिए कि) हमने जिस बस्ती वालों के लिए (अपने नियम अनुसार) विनाश निश्चित कर रखा है, उनके लिए वर्जित है कि वे सत्य की ओर आएँ, इसलिए कि वे कभी वापस नहीं आएंगे। यहाँ तक कि वह घड़ी आ जाए, जब याजूज व माजूज खोल दिए जाएं और वे हर ऊँचाई से पिल पड़ें। और (क़यामत का) सच्चा वादा पास आ जाए तो अचानक इन नकारने वालों की आँखें खुली की खुली रह जाएं और बोल उठें कि हाय हमारा दुर्भाग्य! हम इससे बेपरवाही में पड़े रहे, अपितु हम अत्याचारी थे।1
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- यहाँ से आगे सूरह के समापन की आयतें हैं। इनमें 'औद् अलल्-बदअ' (عود علی البدء) की शैली पर उसी विषय को नए सिरे से लिया गया है जिससे सूरह शुरू हुई थी। ↩
तुम और तुम्हारे पूज्य-देवता जिनको परमेश्वर को छोड़ पूजते रहे हो, अब नरक का ईंधन हैं। तुम (रोओ या विनती करो), उसमें प्रविष्ट होकर रहोगे। यदि ये वास्तव में पूजा योग्य होते तो उसमें न जाते — (ये पूजने वाले और जिनको पूजा गया), सब सदा उसी में रहेंगे। अब पूजने वालों को उसमें चिल्लाना है और जिनकी पूजा करते रहे हो, उनकी दशा यह होगी कि उसमें कुछ नहीं सुनेंगे।
अपितु, जिनके लिए हमारी ओर से अच्छे अंत का वादा हो चुका है, वे उससे दूर रखे जाएँगे। वे उसकी आहट भी नहीं सुनेंगे और सदा अपने मन-भाते आनंद में रहेंगे। वह बड़ी घबराहट उनको थोड़ा सा भी दुख में नहीं डालेगी और परमेश्वर के फ़रिश्ते उनको हाथों-हाथ लेंगे। और कहेंगे: यह तुम्हारा वही दिन है, जिसका तुमसे वादा किया जाता था।
उस दिन, जबकि हम आकाश को लपेट देंगे, जिस प्रकार गोल पंजी में पन्ने लपेट दिए जाते हैं। हमने जिस प्रकार प्रथम उत्पत्ति का प्रारम्भ किया था, उसी प्रकार हम उसकी पुनरावृत्ति कर देंगे। यह हमारे ज़िम्मे एक निश्चित वचन है, हम इसको अवश्य करके रहेंगे।
हमने उपदेश व स्मृति के बाद ज़बूर में लिख दिया था कि (उस दिन जो) धरती (अस्तित्व में आएगी, उस) के उत्तराधिकारी मेरे सदाचारी भक्त होंगे। इसमें उन लोगों के लिए बड़ी जानकारी है जो (हमारी) भक्ति करने वाले हैं। (ये तुम से दण्ड की मांग करते हैं) और हमने (हे पैग़ंबर), तुमको जो भेजा है तो दुनिया वालों के लिए साक्षात दया बना कर भेजा है। इनसे कह दो कि मेरी ओर तो केवल यह वह्य की जाती है कि तुम्हारा उपास्य एक ही उपास्य है तो क्या तुम अपने आपको उसे सौंप देते हो? फिर यदि वे मुँह फेरें तो कह दो कि मैंने तुम सबको समान रूप से सचेत कर दिया है। मैं नहीं जानता कि वह घड़ी पास है या दूर जिसका तुम्हें वचन दिया जा रहा है। (अब मामला परमेश्वर के पास है)। निस्संदेह, वही जानता है उसको भी जो सामने कह रहे हो और उसको भी जिसे तुम छिपाते हो। और मैं नहीं जानता, हो सकता है कि यह अवकाश तुम्हारे लिए एक परीक्षा और एक विशेष घड़ी तक लाभ उठा लेने का मौक़ा हो।
पैग़ंबर ने प्रार्थना की कि मेरे प्रभु, सत्य के साथ निर्णय कर दे, और कहा: हमारा प्रभु परम दयालु ही है, जिससे हम उन बातों के विरुद्ध सहायता मांगते हैं जो तुम करते हो।