सूरह 20

ता-हा

मक्की · 135 आयतें · 32 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का मूलभाव सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है। पहली सूरह में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को इस इंज़ार और बशारत के कार्य से जन्म लेने वाली प्रतिक्रिया पर धीरज रखने और प्रतीक्षा करने का उपदेश किया गया है, और दूसरी सूरह में उनके संबोधितों को कड़ी चेतावनी दी गई है कि उनके हिसाब की घड़ी निकट आ गई है। अब पैग़ंबर को अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। उनके नेतृत्व और प्रभुत्व का दायरा सिमटता जा रहा है। वे सावधान हो जाएँ, उनके लिए परमेश्वर का फैसला शीघ्र ही जारी होने वाला है।

पहली सूरह में संबोधन पूरी तरह से पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से है, और दूसरी सूरह में मक्का के क़ुरैश क़बीले से।

इन सूरतों की विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में उस समय अवतरित हुई हैं, जब मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) का समय पास आ गया है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

طه ﴿1﴾ مَآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْقُرْءَانَ لِتَشْقَىٰٓ ﴿2﴾ إِلَّا تَذْكِرَةً لِّمَن يَخْشَىٰ ﴿3﴾ تَنزِيلًا مِّمَّنْ خَلَقَ ٱلْأَرْضَ وَٱلسَّمَـٰوَٰتِ ٱلْعُلَى ﴿4﴾ ٱلرَّحْمَـٰنُ عَلَى ٱلْعَرْشِ ٱسْتَوَىٰ ﴿5﴾ لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَمَا تَحْتَ ٱلثَّرَىٰ ﴿6﴾

यह सूरह 'ता हा' है। हमने यह क़ुरआन तुम पर इसलिए नहीं उतारा है कि तुम संकट में पड़ जाओ। यह तो केवल एक स्मरण है उनके लिए जो बिन देखे अपने प्रभु से डरें। यह अत्यंत प्रबंध के साथ उस सत्ता की ओर से उतारा गया है जिसने धरती को और तुम्हारे ऊपर इन ऊँचे आकाशों की रचना की है। वही दयालु, वह इस जगत के राजसिंहासन पर विराजमान है। धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है और जो कुछ उनके मध्य है और जो कुछ धरती के नीचे है, सब उसी के नियंत्रण में है।

وَإِن تَجْهَرْ بِٱلْقَوْلِ فَإِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلسِّرَّ وَأَخْفَى ﴿7﴾ ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰ ﴿8﴾

तुम चाहे अपनी बात खुल कर कहो या चुपके से कहो, उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, इसलिए कि वह तो चुपके से कही हुई बात, अपितु उससे अधिक गुप्त बातों को भी जानता है। वह परमेश्वर है, उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है। सभी अच्छे नाम उसी के हैं।

وَهَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ ﴿9﴾ إِذْ رَءَا نَارًا فَقَالَ لِأَهْلِهِ ٱمْكُثُوٓا۟ إِنِّىٓ ءَانَسْتُ نَارًا لَّعَلِّىٓ ءَاتِيكُم مِّنْهَا بِقَبَسٍ أَوْ أَجِدُ عَلَى ٱلنَّارِ هُدًى ﴿10﴾

तुम्हें कुछ मूसा की कथा भी पहुंची है? जब उसने दूर एक चिंगारी देखी तो अपने घरवालों से कहा: तुम लोग तनिक ठहरो, मुझे आग सी दिखाई दी है। मैं वहां जाता हूं, शायद उसमें से तुम्हारे लिए कुछ अंगारे ले आऊं या आग पर बैठे हुए लोगों से मुझे मार्ग का कुछ ज्ञान मिल जाए।

فَلَمَّآ أَتَىٰهَا نُودِىَ يَـٰمُوسَىٰٓ ﴿11﴾ إِنِّىٓ أَنَا۠ رَبُّكَ فَٱخْلَعْ نَعْلَيْكَ ۖ إِنَّكَ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًى ﴿12﴾ وَأَنَا ٱخْتَرْتُكَ فَٱسْتَمِعْ لِمَا يُوحَىٰٓ ﴿13﴾ إِنَّنِىٓ أَنَا ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعْبُدْنِى وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِذِكْرِىٓ ﴿14﴾ إِنَّ ٱلسَّاعَةَ ءَاتِيَةٌ أَكَادُ أُخْفِيهَا لِتُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍۭ بِمَا تَسْعَىٰ ﴿15﴾ فَلَا يَصُدَّنَّكَ عَنْهَا مَن لَّا يُؤْمِنُ بِهَا وَٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ فَتَرْدَىٰ ﴿16﴾

फिर जब वह उसके पास पहुंचा तो आवाज़ आई: हे मूसा। यह तो मैं तुम्हारा प्रभु हूं, सो अपने जूते उतार दो, इसलिए कि तुम तुवा की पवित्र घाटी में हो। और मैंने तुम्हें चुन लिया है, इसलिए जो वह्य की जा रही है, उसको ध्यान से सुनो। इसमें संदेह नहीं कि मैं ही परमेश्वर हूं, मेरे अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है। तो मेरी ही भक्ति करो और मेरी याद के लिए नमाज़ का प्रबंध रखो। सत्य यह है कि क़यामत अवश्य आने वाली है — मैं उसको छिपाए रखने को हूँ — इसलिए आने वाली है कि हर व्यक्ति को उसके कर्मों का बदला दिया जाए। अतः कोई ऐसा व्यक्ति जो परलोक को नहीं मानता और अपनी इच्छाओं का अनुयायी है, तुमको नमाज़ से रोक न दे कि तुम बर्बाद हो जाओ।

وَمَا تِلْكَ بِيَمِينِكَ يَـٰمُوسَىٰ ﴿17﴾ قَالَ هِىَ عَصَاىَ أَتَوَكَّؤُا۟ عَلَيْهَا وَأَهُشُّ بِهَا عَلَىٰ غَنَمِى وَلِىَ فِيهَا مَـَٔارِبُ أُخْرَىٰ ﴿18﴾ قَالَ أَلْقِهَا يَـٰمُوسَىٰ ﴿19﴾ فَأَلْقَىٰهَا فَإِذَا هِىَ حَيَّةٌ تَسْعَىٰ ﴿20﴾ قَالَ خُذْهَا وَلَا تَخَفْ ۖ سَنُعِيدُهَا سِيرَتَهَا ٱلْأُولَىٰ ﴿21﴾ وَٱضْمُمْ يَدَكَ إِلَىٰ جَنَاحِكَ تَخْرُجْ بَيْضَآءَ مِنْ غَيْرِ سُوٓءٍ ءَايَةً أُخْرَىٰ ﴿22﴾ لِنُرِيَكَ مِنْ ءَايَـٰتِنَا ٱلْكُبْرَى ﴿23﴾

और यह तुम्हारे हाथ में क्या है, हे मूसा? उसने कहा: यह मेरी लाठी है, मैं इस पर टेक लगाता हूं और इससे अपनी बकरियों पर पत्ते झाड़ता हूं और इसमें मेरे कुछ अन्य काम भी हैं। परमेश्वर ने कहा: इसको धरती पर डाल दो, हे मूसा! इस पर मूसा ने लाठी को धरती पर डाल दिया तो क्या देखता है कि वह एक सांप है जो दौड़ रहा है। परमेश्वर ने कहा: इसको उठा लो और डरो नहीं, अभी हम इसको वैसा ही कर देंगे, जैसी यह पहले थी। और अपने हाथ को तुम थोड़ा अपने बाज़ू की ओर समेटो, वह बिना किसी रोग के श्वेत होकर निकलेगा, एक दूसरी निशानी के रूप में। यह इसलिए कि इन के माध्यम से हम अपनी कुछ बड़ी-बड़ी निशानियाँ तुम्हें दिखाएं।

ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ ﴿24﴾ قَالَ رَبِّ ٱشْرَحْ لِى صَدْرِى ﴿25﴾ وَيَسِّرْ لِىٓ أَمْرِى ﴿26﴾ وَٱحْلُلْ عُقْدَةً مِّن لِّسَانِى ﴿27﴾ يَفْقَهُوا۟ قَوْلِى ﴿28﴾ وَٱجْعَل لِّى وَزِيرًا مِّنْ أَهْلِى ﴿29﴾ هَـٰرُونَ أَخِى ﴿30﴾ ٱشْدُدْ بِهِۦٓ أَزْرِى ﴿31﴾ وَأَشْرِكْهُ فِىٓ أَمْرِى ﴿32﴾ كَىْ نُسَبِّحَكَ كَثِيرًا ﴿33﴾ وَنَذْكُرَكَ كَثِيرًا ﴿34﴾ إِنَّكَ كُنتَ بِنَا بَصِيرًا ﴿35﴾ قَالَ قَدْ أُوتِيتَ سُؤْلَكَ يَـٰمُوسَىٰ ﴿36﴾

अच्छा, अब फ़िरऔन के पास जाओ, वह अत्यंत विद्रोही हो गया है। मूसा ने निवेदन किया: प्रभु, तू मेरा सीना खोल दे। और मेरे कार्य को मेरे लिए सरल बना दे। और मेरी ज़बान की गांठ सुलझा दे। कि लोग मेरी बात को समझें। और मेरे परिवार से तू मेरे लिए एक सचिव नियुक्त कर दे। हारून को, जो मेरा भाई है। उसके माध्यम से तू मेरी कमर सशक्त कर। और उसे मेरे कार्यभार में सहभागी बना दे। कि हम अधिक से अधिक तेरी पवित्रता का जाप करें। और अधिक से अधिक तेरा चर्चा फैलाएँ। निस्संदेह, तू बराबर हमारे हाल पर निरीक्षक रहा है। परमेश्वर ने कहा: तुम्हार निवेदन स्वीकार हुआ, हे मूसा!

وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَيْكَ مَرَّةً أُخْرَىٰٓ ﴿37﴾ إِذْ أَوْحَيْنَآ إِلَىٰٓ أُمِّكَ مَا يُوحَىٰٓ ﴿38﴾ أَنِ ٱقْذِفِيهِ فِى ٱلتَّابُوتِ فَٱقْذِفِيهِ فِى ٱلْيَمِّ فَلْيُلْقِهِ ٱلْيَمُّ بِٱلسَّاحِلِ يَأْخُذْهُ عَدُوٌّ لِّى وَعَدُوٌّ لَّهُۥ ۚ وَأَلْقَيْتُ عَلَيْكَ مَحَبَّةً مِّنِّى وَلِتُصْنَعَ عَلَىٰ عَيْنِىٓ ﴿39﴾ إِذْ تَمْشِىٓ أُخْتُكَ فَتَقُولُ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ مَن يَكْفُلُهُۥ ۖ فَرَجَعْنَـٰكَ إِلَىٰٓ أُمِّكَ كَىْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ ۚ وَقَتَلْتَ نَفْسًا فَنَجَّيْنَـٰكَ مِنَ ٱلْغَمِّ وَفَتَنَّـٰكَ فُتُونًا ۚ فَلَبِثْتَ سِنِينَ فِىٓ أَهْلِ مَدْيَنَ ثُمَّ جِئْتَ عَلَىٰ قَدَرٍ يَـٰمُوسَىٰ ﴿40﴾

और याद करो, हम तुम्हारे ऊपर एक बार और भी उपकार कर चुके हैं। जब हमने तुम्हारी माता के दिल में वह बात डाली थी जो इस समय तुम्हें वह्य की जा रही है कि इस बच्चे को संदूक में रखो, फिर संदूक को नदी में डाल दो। फिर नदी उसको किनारे पर डाल दे कि उसको वह व्यक्ति उठा ले जो मेरा भी शत्रु है और इस बच्चे का भी शत्रु है। और मैंने तुम पर अपनी ओर से प्रेम की एक किरण डाल दी थी ताकि वह भी करुणा के लिए विवश हो जाए और ताकि तुम मेरे निरीक्षण में पाले जाओ। उस समय, जब तुम्हारी बहन अनजान बनकर बार-बार जाती, फिर उनसे कहती थी कि तुम कहो तो मैं तुम्हें उन लोगों का पता दो जो इस बच्चे का पालन-पोषण करें? इस प्रकार हमने तुमको तुम्हारी माता की ओर लौटा दिया कि उसकी आँखें ठंडी हों और उसको दुख न रहे। और याद करो कि तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। फिर हमने तुम को इस दुख से भी मुक्ति दी और तुमको अच्छे से जांचा। फिर हमारी कृपा से तुम कई वर्षों तक मद्यन के लोगों के बीच रहे। फिर ठीक एक निर्धारित समय पर यहाँ पहुंच गए हो, हे मूसा!

وَٱصْطَنَعْتُكَ لِنَفْسِى ﴿41﴾

और अब इन सब चरणों से निकलकर मैंने तुम्हें अपने इस विशेष कार्य के लिए तैयार कर लिया है।

ٱذْهَبْ أَنتَ وَأَخُوكَ بِـَٔايَـٰتِى وَلَا تَنِيَا فِى ذِكْرِى ﴿42﴾ ٱذْهَبَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ ﴿43﴾ فَقُولَا لَهُۥ قَوْلًا لَّيِّنًا لَّعَلَّهُۥ يَتَذَكَّرُ أَوْ يَخْشَىٰ ﴿44﴾

इसके बाद मूसा मिस्र पहुंचे तो परमेश्वर ने कहा: तुम और तुम्हारा भाई मेरी निशानियों के साथ जाओ और देखो, मेरे स्मरण में आलस्य न करना। तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ, सत्य यह है कि वह बड़ा विद्रोही हो गया है। तो उससे नरमी के साथ बात करना, शायद वह स्मरण प्राप्त करे या मेरे दण्ड से डरे।

قَالَا رَبَّنَآ إِنَّنَا نَخَافُ أَن يَفْرُطَ عَلَيْنَآ أَوْ أَن يَطْغَىٰ ﴿45﴾ قَالَ لَا تَخَافَآ ۖ إِنَّنِى مَعَكُمَآ أَسْمَعُ وَأَرَىٰ ﴿46﴾ فَأْتِيَاهُ فَقُولَآ إِنَّا رَسُولَا رَبِّكَ فَأَرْسِلْ مَعَنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ وَلَا تُعَذِّبْهُمْ ۖ قَدْ جِئْنَـٰكَ بِـَٔايَةٍ مِّن رَّبِّكَ ۖ وَٱلسَّلَـٰمُ عَلَىٰ مَنِ ٱتَّبَعَ ٱلْهُدَىٰٓ ﴿47﴾ إِنَّا قَدْ أُوحِىَ إِلَيْنَآ أَنَّ ٱلْعَذَابَ عَلَىٰ مَن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ ﴿48﴾

उन्होंने निवेदन किया कि हे हमारे प्रभु, हमें आशंका है कि इसको सुनते ही वह हम पर अत्याचार करे या उसकी उद्दंडता कुछ और बढ़ जाए। परमेश्वर ने कहा: डरो नहीं, मैं तुम दोनों के साथ हूं, सब कुछ सुनता और देखता हूं। अतः उसके पास जाओ और उससे कहो कि हम तेरे प्रभु के दूत हैं, इसलिए इस्राईलियों को हमारे साथ जाने दो और उनको सताओ नहीं। हम तेरे प्रभु की ओर से एक बड़ी निशानी लेकर तेरे पास आए हैं और यह संदेश भी कि शांति उन्हीं पर है जो उचित मार्ग का अनुसरण करें। अपितु, हमको वह्य की गई है कि उनपर प्रकोप है जो नकारें और मुँह मोड़ें।

قَالَ فَمَن رَّبُّكُمَا يَـٰمُوسَىٰ ﴿49﴾ قَالَ رَبُّنَا ٱلَّذِىٓ أَعْطَىٰ كُلَّ شَىْءٍ خَلْقَهُۥ ثُمَّ هَدَىٰ ﴿50﴾ قَالَ فَمَا بَالُ ٱلْقُرُونِ ٱلْأُولَىٰ ﴿51﴾ قَالَ عِلْمُهَا عِندَ رَبِّى فِى كِتَـٰبٍ ۖ لَّا يَضِلُّ رَبِّى وَلَا يَنسَى ﴿52﴾ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ مَهْدًا وَسَلَكَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَخْرَجْنَا بِهِۦٓ أَزْوَٰجًا مِّن نَّبَاتٍ شَتَّىٰ ﴿53﴾ كُلُوا۟ وَٱرْعَوْا۟ أَنْعَـٰمَكُمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّأُو۟لِى ٱلنُّهَىٰ ﴿54﴾ مِنْهَا خَلَقْنَـٰكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ ﴿55﴾

उन्होंने यही बात आकर कह दी तो फ़िरऔन ने पूछा: अच्छा तो फिर तुम दोनों का प्रभु कौन है, हे मूसा? उसने उत्तर दिया: हमारा प्रभु वही है, जिसने हर चीज़ को उसका स्वरूप प्रदान किया, फिर मार्गदर्शन किया है। फ़िरऔन ने कहा: फिर पूर्वकालीन क़ौमों का क्या हाल है? मूसा ने उत्तर दिया: उनका ज्ञान मेरे प्रभु के पास एक अभिलेख में सुरक्षित है। मेरा प्रभु न भटकता है, न भूलता है। — वही जिसने धरती को तुम्हारे लिए बिछौना बनाया और उसमें तुम्हारे लिए अनेक मार्ग निकाल दिए और आकाश से पानी बरसाया, फिर उससे हमने विभिन्न वनस्पतियों के अनेक वर्ग पैदा कर दिए। खाओ और अपने मवेशियों को चराओ। इसमें विवेकशील लोगों के लिए, अवश्य बड़ी निशानियाँ हैं। तुम यदि समझो तो सत्य यह है कि हमने इसी धरती से तुम्हारी रचना की है, हम इसी में तुमको लौटाएँगे और इसी से तुमको पुनः निकाल खड़ा करेंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहाँ से आगे की आयतें पैग़ंबर मूसा (अ) की बात का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि अंतर्वेशन (insertion/तज़्मीन) के रूप में परमेश्वर की ओर से हैं। ↩
وَلَقَدْ أَرَيْنَـٰهُ ءَايَـٰتِنَا كُلَّهَا فَكَذَّبَ وَأَبَىٰ ﴿56﴾ قَالَ أَجِئْتَنَا لِتُخْرِجَنَا مِنْ أَرْضِنَا بِسِحْرِكَ يَـٰمُوسَىٰ ﴿57﴾ فَلَنَأْتِيَنَّكَ بِسِحْرٍ مِّثْلِهِۦ فَٱجْعَلْ بَيْنَنَا وَبَيْنَكَ مَوْعِدًا لَّا نُخْلِفُهُۥ نَحْنُ وَلَآ أَنتَ مَكَانًا سُوًى ﴿58﴾

हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखा दीं। इस पर भी वह नकारते चला गया और नहीं माना। उसने कहा: मूसा, क्या तुम इसलिए हमारे पास आए हो कि अपने जादू के बल पर हमें हमारे देश से निकाल बाहर करो? यही बात है तो हम भी तुम्हारे विरुद्ध ऐसा ही जादू लेकर आएंगे। तो हमारे और अपने बीच एक वादा ठहरा लो, कोई बीच का स्थान, न हम उसका उल्लंघन करें न तुम करोगे।

وَلَقَدْ أَرَيْنَـٰهُ ءَايَـٰتِنَا كُلَّهَا فَكَذَّبَ وَأَبَىٰ ﴿56﴾ قَالَ أَجِئْتَنَا لِتُخْرِجَنَا مِنْ أَرْضِنَا بِسِحْرِكَ يَـٰمُوسَىٰ ﴿57﴾ فَلَنَأْتِيَنَّكَ بِسِحْرٍ مِّثْلِهِۦ فَٱجْعَلْ بَيْنَنَا وَبَيْنَكَ مَوْعِدًا لَّا نُخْلِفُهُۥ نَحْنُ وَلَآ أَنتَ مَكَانًا سُوًى ﴿58﴾ قَالَ مَوْعِدُكُمْ يَوْمُ ٱلزِّينَةِ وَأَن يُحْشَرَ ٱلنَّاسُ ضُحًى ﴿59﴾ فَتَوَلَّىٰ فِرْعَوْنُ فَجَمَعَ كَيْدَهُۥ ثُمَّ أَتَىٰ ﴿60﴾ قَالَ لَهُم مُّوسَىٰ وَيْلَكُمْ لَا تَفْتَرُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا فَيُسْحِتَكُم بِعَذَابٍ ۖ وَقَدْ خَابَ مَنِ ٱفْتَرَىٰ ﴿61﴾

मूसा ने कहा: तुम्हारे साथ उत्सव के दिन का वादा है और यह कि इसके लिए लोग दिन चढ़े एकत्रित किए जाएँगे। यह बात तय हो गई तो फ़िरऔन वहां से हटा और अपने सारे दांव इकट्ठे किए, फिर सामना करने के लिए आ गया। उस दिन, जब लोग इकट्ठे हुए तो मूसा ने मुक़ाबले से पहले उन्हें सचेत किया, कहा: शामत के मारो, परमेश्वर के सहभागी बनाकर तुम परमेश्वर पर झूठ न मढ़ो कि किसी प्रकोप से वह तुम्हारी जड़ उखाड़ दे। याद रखो, परमेश्वर पर जिसने भी झूठ मढ़ा, वह असफल हुआ है।

فَتَنَـٰزَعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ وَأَسَرُّوا۟ ٱلنَّجْوَىٰ ﴿62﴾ قَالُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَٰنِ لَسَـٰحِرَٰنِ يُرِيدَانِ أَن يُخْرِجَاكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِمَا وَيَذْهَبَا بِطَرِيقَتِكُمُ ٱلْمُثْلَىٰ ﴿63﴾ فَأَجْمِعُوا۟ كَيْدَكُمْ ثُمَّ ٱئْتُوا۟ صَفًّا ۚ وَقَدْ أَفْلَحَ ٱلْيَوْمَ مَنِ ٱسْتَعْلَىٰ ﴿64﴾

इस पर वह अपने उस विषय में आपसी वाद विवाद और चुपके-चुपके परामर्श करने लगे। अंततः उन्होंने कहा: निस्संदेह ये दोनों बड़े पहुंचे हुए जादूगर हैं। ये चाहते हैं कि अपने जादू के बल पर तुमको तुम्हारे देश से निकाल दें और तुम्हारी इस आदर्श जीवन पद्धति का अंत कर दें। अतः अपनी सब योजनाएं इकट्ठी कर लो, फिर संगठित होकर इनके मुक़ाबले में आओ और अच्छे से समझ लो कि आज वही सफल रहेगा जो विजयी होगा।

قَالُوا۟ يَـٰمُوسَىٰٓ إِمَّآ أَن تُلْقِىَ وَإِمَّآ أَن نَّكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَلْقَىٰ ﴿65﴾ قَالَ بَلْ أَلْقُوا۟ ۖ فَإِذَا حِبَالُهُمْ وَعِصِيُّهُمْ يُخَيَّلُ إِلَيْهِ مِن سِحْرِهِمْ أَنَّهَا تَسْعَىٰ ﴿66﴾ فَأَوْجَسَ فِى نَفْسِهِۦ خِيفَةً مُّوسَىٰ ﴿67﴾ قُلْنَا لَا تَخَفْ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْأَعْلَىٰ ﴿68﴾ وَأَلْقِ مَا فِى يَمِينِكَ تَلْقَفْ مَا صَنَعُوٓا۟ ۖ إِنَّمَا صَنَعُوا۟ كَيْدُ سَـٰحِرٍ ۖ وَلَا يُفْلِحُ ٱلسَّاحِرُ حَيْثُ أَتَىٰ ﴿69﴾ فَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سُجَّدًا قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ هَـٰرُونَ وَمُوسَىٰ ﴿70﴾

जादूगर बोले: मूसा, या तुम फेंको या फिर यह हो कि पहले हम ही फेंकते हैं? मूसा ने कहा: नहीं, अपितु तुम ही फेंको। उन्होंने फेंका तो अचानक उनकी रस्सियाँ और लाठियां उनके जादू के बल से उसको इस प्रकार दिखाई देने लगीं कि जैसे दौड़ रही हैं। इस पर मूसा अपने मन ही मन में कुछ डरा। हमने कहा: डरो नहीं, निस्संदेह तुम ही विजयी रहोगे। और उसको जो तुम्हारे हाथ में है, धरती पर डाल दो। उन्होंने जो कुछ बनाया है, यह अभी उसको निगल जाएगा। इसलिए कि जो कुछ उन्होंने बनाया है, यह केवल जादूगर का धोका है और जादूगर जहाँ से भी आए, सत्य के विरुद्ध वह कभी सफल नहीं हो सकता। अंततः यही हुआ कि जादूगर सजदे में गिर पड़े। उन्होंने अनायास कहा: हम मूसा और हारून के प्रभु को मान चुके हैं।

قَالَ ءَامَنتُمْ لَهُۥ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِى عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحْرَ ۖ فَلَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَـٰفٍ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ فِى جُذُوعِ ٱلنَّخْلِ وَلَتَعْلَمُنَّ أَيُّنَآ أَشَدُّ عَذَابًا وَأَبْقَىٰ ﴿71﴾

इस पर फ़िरऔन ने कहा: तुमने मेरी अनुमति के बिना ही उसकी पुष्टि कर दी है? निस्संदेह वही तुम्हारा गुरु है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अच्छा तो अब मैं तुम्हारे हाथ और पाँव विपरीत दिशाओं से कटवाऊंगा और तुम्हें सबके सामने अवश्य खजूर के तनों पर सूली दूंगा। तुम्हें भलीभांति पता चल जाएगा कि हम दोनों में से किस का दण्ड अधिक कठोर और अधिक देर तक रहने वाला है।

قَالُوا۟ لَن نُّؤْثِرَكَ عَلَىٰ مَا جَآءَنَا مِنَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلَّذِى فَطَرَنَا ۖ فَٱقْضِ مَآ أَنتَ قَاضٍ ۖ إِنَّمَا تَقْضِى هَـٰذِهِ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَآ ﴿72﴾ إِنَّآ ءَامَنَّا بِرَبِّنَا لِيَغْفِرَ لَنَا خَطَـٰيَـٰنَا وَمَآ أَكْرَهْتَنَا عَلَيْهِ مِنَ ٱلسِّحْرِ ۗ وَٱللَّهُ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰٓ ﴿73﴾

जादूगरों ने उत्तर दिया: हम उन स्पष्ट निशानियाँ पर कदापि तुमको प्राथमिकता नहीं देंगे जो हमारे सामने आ चुकी हैं और न उस परम सत्ता पर जिसने हमारी रचना की है। इसलिए तुम्हें जो करना है, करो। तुम जो कुछ कर सकते हो, इसी दुनिया के जीवन का कर सकते हो। हम तो अपने प्रभु को मान चुके हैं, इसलिए कि वह हमारे पापकर्मों को क्षमा कर दे और उस जादू को भी क्षमा कर दे जिस के लिए तूने हमें विवश किया है। परमेश्वर ही अच्छा है और वही शेष रहने वाला है।

إِنَّهُۥ مَن يَأْتِ رَبَّهُۥ مُجْرِمًا فَإِنَّ لَهُۥ جَهَنَّمَ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ ﴿74﴾ وَمَن يَأْتِهِۦ مُؤْمِنًا قَدْ عَمِلَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلدَّرَجَـٰتُ ٱلْعُلَىٰ ﴿75﴾ جَنَّـٰتُ عَدْنٍ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَآءُ مَن تَزَكَّىٰ ﴿76﴾

सत्य यह है कि जो व्यक्ति भी अपराधी बन कर अपने प्रभु के सामने उपस्थित होगा, उसके लिए नरक है, वह उसमें न मरेगा, न जिएगा। इसके विपरीत जो मोमिन होकर उसके सामने आएंगे, जिन्होंने भले कर्म किए होंगे तो यही लोग हैं जिनके लिए उच्च स्थान हैं। सदा रहने वाले बाग़ जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उनमें वे सदा रहेंगे। और यह बदला है उनका जो पवित्रता अपनाएं।1

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  1. यहाँ से आगे आयत 76 तक अंतर्वेशन (insertion/तज़्मीन) है। ↩
وَلَقَدْ أَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِى فَٱضْرِبْ لَهُمْ طَرِيقًا فِى ٱلْبَحْرِ يَبَسًا لَّا تَخَـٰفُ دَرَكًا وَلَا تَخْشَىٰ ﴿77﴾ فَأَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ بِجُنُودِهِۦ فَغَشِيَهُم مِّنَ ٱلْيَمِّ مَا غَشِيَهُمْ ﴿78﴾ وَأَضَلَّ فِرْعَوْنُ قَوْمَهُۥ وَمَا هَدَىٰ ﴿79﴾

इसके बाद कुछ समय बीत गया, यहाँ तक कि सत्य पूर्ण व निर्णायक रूप से स्पष्ट हो गया, तब हमने मूसा को वह्य भेज दी कि मेरे भक्तों को रात्रि में लेकर निकल जाओ। फिर समुद्र सामने आए तो अपनी छड़ी से उसमें उनके लिए एक सूखा रास्ता बना लो, तुम आराम से पार हो जाओगे। तुम्हें न किसी के आ कर पकड़ने का ख़तरा होगा, न डूबने की आशंका। फिर जब वे निकले तो फ़िरऔन ने अपनी सेनाओं के साथ उनका पीछा किया। फिर उसको और उसकी सेनाओं को समुद्र से ढक लिया, जिस चीज़ ने ढक लिया। सत्य यह है किफ़िरऔन ने अपनी क़ौम को भटका ही दिया था, उसको उचित मार्ग नहीं दिखाया था।

يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ قَدْ أَنجَيْنَـٰكُم مِّنْ عَدُوِّكُمْ وَوَٰعَدْنَـٰكُمْ جَانِبَ ٱلطُّورِ ٱلْأَيْمَنَ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْمَنَّ وَٱلسَّلْوَىٰ ﴿80﴾ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ وَلَا تَطْغَوْا۟ فِيهِ فَيَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبِى ۖ وَمَن يَحْلِلْ عَلَيْهِ غَضَبِى فَقَدْ هَوَىٰ ﴿81﴾ وَإِنِّى لَغَفَّارٌ لِّمَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًا ثُمَّ ٱهْتَدَىٰ ﴿82﴾

हे इस्राईलियो, हमने इस प्रकार तुम्हारे इस शत्रु से तुमको मुक्ति दी थी और तुमसे तूर पर्वत के पवित्र किनारे का वचन तय किया और तुम पर मन्न व सल्वा उतारा था। इस निर्देश के साथ कि हमारी दी हुई निर्मल चीज़ें खाओ और उनके विषय में विद्रोह न करो कि तुम पर मेरा प्रकोप उतर जाए और याद रखो कि जिस पर मेरा प्रकोप उतरा, वह फिर गिर के रहा। अपितु, जो तौबा करें और मान जाएं और भले कर्म करें, फिर सन्मार्ग पर रहें तो उनके लिए मैं अत्यंत क्षमा करने वाला हूं।

وَمَآ أَعْجَلَكَ عَن قَوْمِكَ يَـٰمُوسَىٰ ﴿83﴾ قَالَ هُمْ أُو۟لَآءِ عَلَىٰٓ أَثَرِى وَعَجِلْتُ إِلَيْكَ رَبِّ لِتَرْضَىٰ ﴿84﴾ قَالَ فَإِنَّا قَدْ فَتَنَّا قَوْمَكَ مِنۢ بَعْدِكَ وَأَضَلَّهُمُ ٱلسَّامِرِىُّ ﴿85﴾ فَرَجَعَ مُوسَىٰٓ إِلَىٰ قَوْمِهِۦ غَضْبَـٰنَ أَسِفًا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَلَمْ يَعِدْكُمْ رَبُّكُمْ وَعْدًا حَسَنًا ۚ أَفَطَالَ عَلَيْكُمُ ٱلْعَهْدُ أَمْ أَرَدتُّمْ أَن يَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبٌ مِّن رَّبِّكُمْ فَأَخْلَفْتُم مَّوْعِدِى ﴿86﴾

फिर हुआ यह कि मूसा उस वचन के लिए समय से पहले ही पहुंच गया, परमेश्वर ने कहा): यह अपने लोगों को छोड़कर तुम जल्दी क्यों चले आए हो, मूसा? उसने निवेदन किया: वे लोग भी यह मेरे पीछे ही हैं और प्रभु, मैं तेरी प्रसन्नता के लिए तेरे समक्ष जल्दी चला आया हूं। परमेश्वर ने कहा: अच्छा यह बात है तो सुन लो कि हमने तुम्हारी क़ौम को तुम्हारे पीछे परीक्षा में डाल दिया और सामिरी ने उनको भटका दिया है। इस पर मूसा अत्यंत क्रोध और शोक की अवस्था में अपनी क़ौम की ओर पलटा। उसने जाकर उनसे कहा: मेरी क़ौम के लोगो, क्या तुम्हारे प्रभु ने तुम्हें अत्यंत अच्छा वचन नहीं दिया था? फिर क्या तुम पर अधिक समय बीत गया या तुमने यह चाहा कि तुम पर तुम्हारे प्रभु का प्रकोप उतर जाए, इसलिए तुमने मेरे वचन का उल्लंघन कर डाला है?

قَالُوا۟ مَآ أَخْلَفْنَا مَوْعِدَكَ بِمَلْكِنَا وَلَـٰكِنَّا حُمِّلْنَآ أَوْزَارًا مِّن زِينَةِ ٱلْقَوْمِ فَقَذَفْنَـٰهَا فَكَذَٰلِكَ أَلْقَى ٱلسَّامِرِىُّ ﴿87﴾

उन्होंने उत्तर दिया: हमने आपके साथ किए वचन का उल्लंघन कुछ अपने अधिकार से नहीं किया है, अपितु हुआ यह कि हमसे लोगों के गहनों का बोझ उठवाया गया था। फिर उनकी मांग पर वह हमने उतार फेंका और इस प्रकार सामिरी ने यह कला दिखाई है।

فَأَخْرَجَ لَهُمْ عِجْلًا جَسَدًا لَّهُۥ خُوَارٌ فَقَالُوا۟ هَـٰذَآ إِلَـٰهُكُمْ وَإِلَـٰهُ مُوسَىٰ فَنَسِىَ ﴿88﴾ أَفَلَا يَرَوْنَ أَلَّا يَرْجِعُ إِلَيْهِمْ قَوْلًا وَلَا يَمْلِكُ لَهُمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا ﴿89﴾

अतः उन्हीं के गहनों से सामिरी ने उनके लिए एक बछड़ा बना कर निकाल खड़ा किया, एक धड़ जिससे बैल जैसी ध्वनि निकलती थी। इस पर वे कहने लगे कि यही तुम्हारा उपास्य है और यही मूसा का उपास्य है, परंतु वह उसे भूल गया है। उनपर अफ़सोस, फिर क्या वे देखते नहीं थे कि वह न उनकी किसी बात का उत्तर दे सकता है और न उनको कोई लाभ या हानि पहुंचा सकता है?

وَلَقَدْ قَالَ لَهُمْ هَـٰرُونُ مِن قَبْلُ يَـٰقَوْمِ إِنَّمَا فُتِنتُم بِهِۦ ۖ وَإِنَّ رَبَّكُمُ ٱلرَّحْمَـٰنُ فَٱتَّبِعُونِى وَأَطِيعُوٓا۟ أَمْرِى ﴿90﴾ قَالُوا۟ لَن نَّبْرَحَ عَلَيْهِ عَـٰكِفِينَ حَتَّىٰ يَرْجِعَ إِلَيْنَا مُوسَىٰ ﴿91﴾

हारून इससे पहले ही उनसे कह चुका था कि मेरी क़ौम के लोगो, तुम इस बछड़े के माध्यम से परीक्षा में डाल दिए गए हो। तुम्हारा प्रभु तो वास्तव में परम दयालु परमेश्वर है। अतः तुम मेरा अनुसरण करो और मेरी बात मानो। परंतु उन्होंने कह दिया कि हम तो इसी बछड़े की पूजा में लगे रहेंगे, जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाए।

قَالَ يَـٰهَـٰرُونُ مَا مَنَعَكَ إِذْ رَأَيْتَهُمْ ضَلُّوٓا۟ ﴿92﴾ أَلَّا تَتَّبِعَنِ ۖ أَفَعَصَيْتَ أَمْرِى ﴿93﴾ قَالَ يَبْنَؤُمَّ لَا تَأْخُذْ بِلِحْيَتِى وَلَا بِرَأْسِىٓ ۖ إِنِّى خَشِيتُ أَن تَقُولَ فَرَّقْتَ بَيْنَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ وَلَمْ تَرْقُبْ قَوْلِى ﴿94﴾

तो क़ौम के सरदारों से पूछने के बाद मूसा हारून की ओर पलटा और बोला: हारून, जब तुमने देखा कि ये भटके जा रहे हैं तो तुम्हारा हाथ किस चीज़ ने पकड़ लिया था कि तुम मेरा अनुसरण न करो? फिर क्या तुमने मेरे आदेश की अवहेलना कर डाली? हारून ने उत्तर दिया: हे मेरी माता के जने, न मेरी दाढ़ी पकड़ो, न मेरा सर। मुझे डर हुआ कि तुम आकर कहोगे कि तुमने इसराईलियों के बीच फूट डाल दी और मेरी बात का सम्मान नहीं किया है।

قَالَ فَمَا خَطْبُكَ يَـٰسَـٰمِرِىُّ ﴿95﴾ قَالَ بَصُرْتُ بِمَا لَمْ يَبْصُرُوا۟ بِهِۦ فَقَبَضْتُ قَبْضَةً مِّنْ أَثَرِ ٱلرَّسُولِ فَنَبَذْتُهَا وَكَذَٰلِكَ سَوَّلَتْ لِى نَفْسِى ﴿96﴾ قَالَ فَٱذْهَبْ فَإِنَّ لَكَ فِى ٱلْحَيَوٰةِ أَن تَقُولَ لَا مِسَاسَ ۖ وَإِنَّ لَكَ مَوْعِدًا لَّن تُخْلَفَهُۥ ۖ وَٱنظُرْ إِلَىٰٓ إِلَـٰهِكَ ٱلَّذِى ظَلْتَ عَلَيْهِ عَاكِفًا ۖ لَّنُحَرِّقَنَّهُۥ ثُمَّ لَنَنسِفَنَّهُۥ فِى ٱلْيَمِّ نَسْفًا ﴿97﴾ إِنَّمَآ إِلَـٰهُكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِى لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ وَسِعَ كُلَّ شَىْءٍ عِلْمًا ﴿98﴾

मूसा ने कहा: और सामिरी, तेरा क्या मामला है? उसने उत्तर दिया: मैंने वह चीज़ देखी जो दूसरों ने नहीं देखी तो उसी के अनुसार मैंने ईशदूत के पदचिह्न से मिट्टी की एक मुट्ठी उठा ली, फिर उसको बछड़े में ड़ाल दिया। मेरे जी ने मुझे कुछ ऐसा ही सुझाव दिया था। मूसा ने कहा: यह बात है तो दूर हो जा, अब जीवन भर तुझे यही कहना है कि मुझे कोई छुए नहीं और मृत्यु के बाद तेरे लिए एक निश्चित समय और भी है जो तुझसे किसी तरह टलेगा नहीं। और अपने उस उपास्य को देख जिस पर तू लगा बैठा था। हमारा निर्णय है कि हम अभी उसको जला देंगे, फिर समुद्र में बिखेर कर बहा देंगे। लोगो, तुम्हारा उपास्य तो केवल परमेश्वर है, जिसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है। उसका ज्ञान हर चीज़ पर भारी है।1

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  1. यह सामिरी ने अपने आप को विवश ठहराने के लिए बात गढ़ी है। ↩
كَذَٰلِكَ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ مَا قَدْ سَبَقَ ۚ وَقَدْ ءَاتَيْنَـٰكَ مِن لَّدُنَّا ذِكْرًا ﴿99﴾ مَّنْ أَعْرَضَ عَنْهُ فَإِنَّهُۥ يَحْمِلُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وِزْرًا ﴿100﴾ خَـٰلِدِينَ فِيهِ ۖ وَسَآءَ لَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ حِمْلًا ﴿101﴾ يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ ۚ وَنَحْشُرُ ٱلْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍ زُرْقًا ﴿102﴾ يَتَخَـٰفَتُونَ بَيْنَهُمْ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا عَشْرًا ﴿103﴾ نَّحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ إِذْ يَقُولُ أَمْثَلُهُمْ طَرِيقَةً إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا يَوْمًا ﴿104﴾

इसी प्रकार, हे पैग़ंबर, हम तुम्हें अतीत की कथाएँ सुनाते हैं और इसके लिए हमने विशेष अपने पास से तुमको एक स्मृति प्रदान कर दी है। जो इससे मुँह मोड़ लेंगे, वे क़यामत के दिन एक भारी बोझ उठाएंगे। और सदा उसी के प्रभाव में रहेंगे, और क़यामत के दिन वह उनके लिए बहुत बुरा भार होगा। जिस दिन नरसिंघा फूंका जाएगा और अपराधियों को हम उस दिन इस दशा में इकट्ठा करेंगे कि भय के मारे उनकी आँखें नीली पड़ी होंगी। वे चुपके-चुपके आपस में कहते होंगे कि तुम दुनिया में शायद ही दस दिन रहे होगे। हम अच्छे से जानते हैं जो कुछ वे कहेंगे, जबकि उनमें से जो उनके विचार में सबसे सटीक अनुमान लगाने वाला होगा, वह कहेगा कि तुम एक दिन से अधिक नहीं रहे हो।

وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْجِبَالِ فَقُلْ يَنسِفُهَا رَبِّى نَسْفًا ﴿105﴾ فَيَذَرُهَا قَاعًا صَفْصَفًا ﴿106﴾ لَّا تَرَىٰ فِيهَا عِوَجًا وَلَآ أَمْتًا ﴿107﴾ يَوْمَئِذٍ يَتَّبِعُونَ ٱلدَّاعِىَ لَا عِوَجَ لَهُۥ ۖ وَخَشَعَتِ ٱلْأَصْوَاتُ لِلرَّحْمَـٰنِ فَلَا تَسْمَعُ إِلَّا هَمْسًا ﴿108﴾ يَوْمَئِذٍ لَّا تَنفَعُ ٱلشَّفَـٰعَةُ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَرَضِىَ لَهُۥ قَوْلًا ﴿109﴾ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يُحِيطُونَ بِهِۦ عِلْمًا ﴿110﴾ وَعَنَتِ ٱلْوُجُوهُ لِلْحَىِّ ٱلْقَيُّومِ ۖ وَقَدْ خَابَ مَنْ حَمَلَ ظُلْمًا ﴿111﴾ وَمَن يَعْمَلْ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا يَخَافُ ظُلْمًا وَلَا هَضْمًا ﴿112﴾

वे तुमसे पर्वतों के बारे में पूछते हैं कि उस दिन उनका क्या होगा? तो कहो कि मेरा प्रभु उनको धूल बनाकर उड़ा देगा। फिर धरती को सपाट मैदान बनाकर छोड़ देगा। कि तुम उसमें कोई मोड़ और कोई टीला नहीं देखोगे। उस दिन सब पुकारने वाले के पीछे चल पड़ेंगे, उससे कुछ भी इधर उधर न हो सकेंगे और सभी आवाज़ें परम दयालु परमेश्वर के आगे हीन हो जाएंगी, तो तुम एक धीमी-धीमी कानाफूसी कोके सिवा कुछ नहीं सुनोगे। उस दिन अनुशंसा लाभ नहीं देगी, सिवाय इसके कि परम दयालु परमेश्वर किसी को अनुमति दे और उसके लिए कोई बात कहना पसंद करे। (इसलिए कि) वह उनके आगे और पीछे जो कुछ है, उसको जानता है और उनका ज्ञान उसको घेर नहीं सकता। सबके चेहरे उस नित्य व जीवंत सत्ता के सामने झुके होंगे। उस दिन असफलता है उनके लिए जो अत्याचार का भार उठाए हुए हों। इसके विपरीत जो भले कर्म करेगा और इसके साथ ईमान भी रखता होगा, उसको, अपितु उस दिन किसी अन्याय और किसी अधिकार हनन का भय नहीं होगा।

وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَـٰهُ قُرْءَانًا عَرَبِيًّا وَصَرَّفْنَا فِيهِ مِنَ ٱلْوَعِيدِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ أَوْ يُحْدِثُ لَهُمْ ذِكْرًا ﴿113﴾ فَتَعَـٰلَى ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ۗ وَلَا تَعْجَلْ بِٱلْقُرْءَانِ مِن قَبْلِ أَن يُقْضَىٰٓ إِلَيْكَ وَحْيُهُۥ ۖ وَقُل رَّبِّ زِدْنِى عِلْمًا ﴿114﴾

हमने, हे पैग़ंबर, इस उपदेश को इसी प्रकार अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा है और इसमें अपनी चेतावनी का वर्णन अनेक प्रकार से कर दिया है ताकि ये लोग परमेश्वर के प्रकोप से बचें या इनके अंदर वह कुछ सोच पैदा कर दे। अतः सर्वोच्च है परमेश्वर, सच्चा सम्राट। वह अपनी प्रज्ञता के अनुसार इसको उसी क्रम से उतारेगा जो उसने निर्धारित कर दिया है। और देखो तुम अपनी ओर इस वह्य के पूरा हो जाने से पहले इस क़ुरआन को पाने की जल्दी न करो, और प्रार्थना करते रहो कि प्रभु, मेरे ज्ञान में वृद्धि कर दे।

وَلَقَدْ عَهِدْنَآ إِلَىٰٓ ءَادَمَ مِن قَبْلُ فَنَسِىَ وَلَمْ نَجِدْ لَهُۥ عَزْمًا ﴿115﴾ وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰ ﴿116﴾ فَقُلْنَا يَـٰٓـَٔادَمُ إِنَّ هَـٰذَا عَدُوٌّ لَّكَ وَلِزَوْجِكَ فَلَا يُخْرِجَنَّكُمَا مِنَ ٱلْجَنَّةِ فَتَشْقَىٰٓ ﴿117﴾ إِنَّ لَكَ أَلَّا تَجُوعَ فِيهَا وَلَا تَعْرَىٰ ﴿118﴾ وَأَنَّكَ لَا تَظْمَؤُا۟ فِيهَا وَلَا تَضْحَىٰ ﴿119﴾ فَوَسْوَسَ إِلَيْهِ ٱلشَّيْطَـٰنُ قَالَ يَـٰٓـَٔادَمُ هَلْ أَدُلُّكَ عَلَىٰ شَجَرَةِ ٱلْخُلْدِ وَمُلْكٍ لَّا يَبْلَىٰ ﴿120﴾ فَأَكَلَا مِنْهَا فَبَدَتْ لَهُمَا سَوْءَٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ ٱلْجَنَّةِ ۚ وَعَصَىٰٓ ءَادَمُ رَبَّهُۥ فَغَوَىٰ ﴿121﴾ ثُمَّ ٱجْتَبَـٰهُ رَبُّهُۥ فَتَابَ عَلَيْهِ وَهَدَىٰ ﴿122﴾ قَالَ ٱهْبِطَا مِنْهَا جَمِيعًۢا ۖ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُم مِّنِّى هُدًى فَمَنِ ٱتَّبَعَ هُدَاىَ فَلَا يَضِلُّ وَلَا يَشْقَىٰ ﴿123﴾ وَمَنْ أَعْرَضَ عَن ذِكْرِى فَإِنَّ لَهُۥ مَعِيشَةً ضَنكًا وَنَحْشُرُهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ أَعْمَىٰ ﴿124﴾ قَالَ رَبِّ لِمَ حَشَرْتَنِىٓ أَعْمَىٰ وَقَدْ كُنتُ بَصِيرًا ﴿125﴾ قَالَ كَذَٰلِكَ أَتَتْكَ ءَايَـٰتُنَا فَنَسِيتَهَا ۖ وَكَذَٰلِكَ ٱلْيَوْمَ تُنسَىٰ ﴿126﴾ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى مَنْ أَسْرَفَ وَلَمْ يُؤْمِنۢ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِۦ ۚ وَلَعَذَابُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبْقَىٰٓ ﴿127﴾

इसलिए कि तुम जिस दायित्व को पूरा करने के लिए भेजे गए हो, वह एक भारी दायित्व है। हमने इससे पहले आदम पर एक वचन का दायित्व डाला था तो वह भूल गया था और हमने उसमें संकल्प की दृढ़ता नहीं पाई थी। याद करो, जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो तो वे सजदे में गिर गए, परंतु इब्लीस नहीं माना, उसने नकार दिया। इस पर हमने कहा कि हे आदम, यह तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का शत्रु है तो ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को इस बाग़ से निकलवा दे, फिर तुम वंचित होकर रह जाओगे। यहाँ तो तुम्हें यह सुविधा है कि न इसमें भूखे रहते हो न वस्त्र की आवश्यकता होती है। न तुमको इसमें प्यास सताती है न धूप लगती है। परंतु शैतान ने उसको बहकाया। उसने कहा: आदम, मैं तुमको वह वृक्ष बताऊं जिसमें सदा का जीवन है और उस राज्य का पता दूं जिसका कभी पतन नहीं होगा? अतः उसके प्रोत्साहन से आदम और हव्वा, दोनों ने उस वृक्ष का फल खा लिया तो उनके गुप्त अंग उनपर खुल गए और उनको छिपाने के लिए वे दोनों अपने ऊपर उस बाग़ के पत्ते बांधने लगे। इस प्रकार आदम ने अपने प्रभु की अवज्ञा की और उचित मार्ग से भटक गया। फिर उसके प्रभु ने उसको चुन लिया। तो अपने उपकार से उसका प्रायश्चित स्वीकार किया और उसका मार्गदर्शन किया। परमेश्वर ने कहा: तुम दोनों पक्ष यहाँ से उतर जाओ, इकट्ठे। तुम एक दूसरे के शत्रु रहोगे फिर मेरी ओर से यदि कोई मार्गदर्शन तुम्हारे पास आए तो उसका अनुसरण करो, इसलिए कि जो मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण करेगा, वह न भटकेगा न वंचित रहेगा। और जो मेरे उपदेश से मुँह मोड़ेगा तो उसके लिए मनोव्यथा का जीवन है और क़यामत के दिन हम उसको अंधा उठाएंगे। वह कहेगा: प्रभु, तूने मुझे अंधा क्यों उठाया है, मैं तो आंखों वाला था। कहा जाएगा: हमारी आयतें तुम्हारे पास आई थीं तो तुमने इसी प्रकार उन्हें अनदेखा कर दिया था। आज तुम्हें भी उसी प्रकार अनदेखा कर दिया जाएगा। जो मर्यादा भंग कर गए और अपने प्रभु की आयतों को नहीं माना, हम उनको इसी प्रकार बदला देंगे। और परलोक का दण्ड तो अधिक कठोर और अधिक स्थायी है।1

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  1. इससे तात्पर्य वही वंश-वृक्ष (tree of procreation/शजर-ए-तनासुल) है जिसका फल खाने के कारण मनुष्य इस दुनिया में अपने आप को बाक़ी रखे हुए है। ↩
أَفَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ ٱلْقُرُونِ يَمْشُونَ فِى مَسَـٰكِنِهِمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّأُو۟لِى ٱلنُّهَىٰ ﴿128﴾ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَكَانَ لِزَامًا وَأَجَلٌ مُّسَمًّى ﴿129﴾ فَٱصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ ٱلشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا ۖ وَمِنْ ءَانَآئِ ٱلَّيْلِ فَسَبِّحْ وَأَطْرَافَ ٱلنَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضَىٰ ﴿130﴾ وَلَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِۦٓ أَزْوَٰجًا مِّنْهُمْ زَهْرَةَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا لِنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَرِزْقُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ﴿131﴾ وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِٱلصَّلَوٰةِ وَٱصْطَبِرْ عَلَيْهَا ۖ لَا نَسْـَٔلُكَ رِزْقًا ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكَ ۗ وَٱلْعَـٰقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ ﴿132﴾

फिर क्या इन लोगों का इससे मार्गदर्शन नहीं हुआ कि इनसे पहले हम कितनी ही क़ौमों का विनाश कर चुके हैं जिनकी बस्तियों में अब ये चलते फिरते हैं? सत्य यह है कि इसमें बुद्धिजीवियों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं। तुम्हारे प्रभु की ओर से, हे पैग़ंबर, यदि एक बात पहले निश्चित न कर दी गई होती और ढील की एक निर्धारित अवधि न होती तो जो आचरण इन्होंने अपनाया है, उसके परिणामस्वरूप इन पर अवश्य दण्ड आ जाता। तो जो कुछ ये कहते हैं, उस पर धैर्य रखो और अपने प्रभु की स्तुति के साथ उसकी पवित्रता का जाप करते रहो, सूर्योदय और सूर्यास्त से पहले और रात की घड़ियों में भी तसबीह करो और दिन के किनारों पर भी। इसलिए कि उसके फलस्वरूप परमेश्वर के उपकारों से निहाल हो जाओ। और इनके कुछ गुटों को दुनिया के जीवन की चमक-दमक का जो साधन हमने उसमें उनकी परीक्षा के लिए दे रखा है, उसकी ओर आंख उठाकर भी न देखो और याद रखो कि तुम्हारे प्रभु की जीविका ही अच्छी है और वहीं शेष रहने वाली है। तुम अपने लोगों को नमाज़ का उपदेश करो और स्वयं भी उसका प्रबंध करो। हम उनके लिए तुमसे कोई जीविका नहीं मांगते कि तुम्हें किसी के साधनों की ओर देखने की आवश्यकता हो। जीविका तो हम तुम्हें देंगे। हम तुमसे संयम चाहते हैं और अंत की सफलता संयम ही के लिए है।

وَقَالُوا۟ لَوْلَا يَأْتِينَا بِـَٔايَةٍ مِّن رَّبِّهِۦٓ ۚ أَوَلَمْ تَأْتِهِم بَيِّنَةُ مَا فِى ٱلصُّحُفِ ٱلْأُولَىٰ ﴿133﴾ وَلَوْ أَنَّآ أَهْلَكْنَـٰهُم بِعَذَابٍ مِّن قَبْلِهِۦ لَقَالُوا۟ رَبَّنَا لَوْلَآ أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ ءَايَـٰتِكَ مِن قَبْلِ أَن نَّذِلَّ وَنَخْزَىٰ ﴿134﴾ قُلْ كُلٌّ مُّتَرَبِّصٌ فَتَرَبَّصُوا۟ ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ أَصْحَـٰبُ ٱلصِّرَٰطِ ٱلسَّوِىِّ وَمَنِ ٱهْتَدَىٰ ﴿135﴾

इन्हें ज़िद है के अपने प्रभु के पास से यह हमारे लिए कोई निशानी क्यों नहीं लाते? क्या इनके पास पिछले धर्मग्रंथों में जो कुछ है, उसकी गवाही नहीं पहुंची? यदि हम इससे पहले ही इनका किसी दण्ड से सर्वनाश कर देते तो ये कहते कि प्रभु, तूने हमारे पास कोई रसूल क्यों नहीं भेजा कि अपमानित होने से पहले हम तेरी आयतों का अनुसरण कर लेते? इनसे कहो कि हर एक प्रतीक्षा में है तो तुम भी प्रतीक्षा करो, फिर शीघ्र ही जान लोगे कि कौन सीधे मार्ग पर चलने वाला है और कौन अनुचित मार्ग पर है, और कौन लक्ष्य तक पहुंचा और कौन मार्ग से भटक गया है।