सूरह 31

लुक़्मान्

मक्की · 34 आयतें · 17 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह मानव प्रकृति पर आधारित धर्म (दीन-ए-फ़ित्रत) के जिन तथ्यों को हकीम लुक़मान के सन्दर्भ से प्रमाणित करती है, दूसरी में उन्हीं के बारे में लोगों की शंकाओं को दूर किया गया है जो उस समय सामने लाई जा रही थीं।

दोनों का विषय वही सचेत करना (इंज़ार) और शुभ सूचना देना (बशारत) है, जो पिछली सूरतों से चला आ रहा है और दोनों में मूल रूप से मक्का के क़ुरैश क़बीले के लोगों को संबोधित किया गया है।

इन सूरतों की विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि मक्का में परमेश्वर के रसूल (स.) के प्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में ये उस समय अवतरित हुई हैं, जब मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) और इस्लाम के नकारने वालों से संबंध तोड़ने (बराअत), तथा विजय और ईश्वरीय सहायता का समय निकट आ गया है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

الٓمٓ ﴿1﴾ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْحَكِيمِ ﴿2﴾ هُدًى وَرَحْمَةً لِّلْمُحْسِنِينَ ﴿3﴾ ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ ﴿4﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَىٰ هُدًى مِّن رَّبِّهِمْ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ ﴿5﴾

यह सूरह 'अलिफ़ लाम मीम' है। यह प्रज्ञा से भरे हुए ग्रंथ की आयतें हैं। उनके लिए जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं मार्गदर्शन और दया बनकर उतरी हैं। ये जो नमाज़ का प्रबंध कर रहे हैं और ज़कात देते हैं, और यही हैं जो परलोक पर सच्चा विश्वास रखते हैं। यही अपने प्रभु के मार्गदर्शन पर हैं और यही सफलता पाने वाले होंगे।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَشْتَرِى لَهْوَ ٱلْحَدِيثِ لِيُضِلَّ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَيَتَّخِذَهَا هُزُوًا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ ﴿6﴾ وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَـٰتُنَا وَلَّىٰ مُسْتَكْبِرًا كَأَن لَّمْ يَسْمَعْهَا كَأَنَّ فِىٓ أُذُنَيْهِ وَقْرًا ۖ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ ﴿7﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمْ جَنَّـٰتُ ٱلنَّعِيمِ ﴿8﴾ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقًّا ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿9﴾

इसके विपरीत लोगों में ऐसे भी हैं जो निरर्थक बातों के ग्राहक बनते हैं ताकि परमेश्वर के मार्ग से बिना किसी ज्ञान के भटकाएँ और उसकी आयतों का मज़ाक़ उड़ाएँ। यही हैं कि जिनके लिए अपमानजनक दण्ड है। इनमें से किसी को जब हमारी ये आयतें सुनाई जाती हैं तो बड़े अहंकार के साथ इस प्रकार मुँह फेर कर चल देता है, जैसे उनको सुना ही नहीं, जैसे कानों से बहरा है। तो इसे एक कष्टदायक दण्ड की शुभ सूचना सुना दो। अपितु जो लोग मान गए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनके लिए सुखदायक बाग़ हैं कि जिन में वे सदा रहेंगे। यह परमेश्वर का वचन पूरा होकर रहेगा और वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।

خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا ۖ وَأَلْقَىٰ فِى ٱلْأَرْضِ رَوَٰسِىَ أَن تَمِيدَ بِكُمْ وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَآبَّةٍ ۚ وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍ كَرِيمٍ ﴿10﴾

उसने समस्त आकाशों को ऐसे स्तंभों के बिना बना दिया है जो तुम्हें दिखाई दें और धरती में पर्वत जमा दिए हैं कि वह तुम्हें लेकर झुक न पड़े और उसमें सब प्रकार के प्राणी फैला दिए हैं। (देखते नहीं हो कि) हमने आकाश से पानी उतारा, फिर इसी धरती में सब प्रकार के लाभ देने वाले पदार्थ पैदा कर दिए हैं।

هَـٰذَا خَلْقُ ٱللَّهِ فَأَرُونِى مَاذَا خَلَقَ ٱلَّذِينَ مِن دُونِهِۦ ۚ بَلِ ٱلظَّـٰلِمُونَ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿11﴾

ये सब तो परमेश्वर का पैदा किया हुआ है, अब मुझे दिखाओ कि (तुम्हारी कल्पना के अनुसार) जो उसके अतिरिक्त हैं, उन्होंने क्या पैदा किया है? कुछ नहीं, अपितु ये दुष्ट स्पष्ट पथभ्रष्टता में हैं।

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا لُقْمَـٰنَ ٱلْحِكْمَةَ أَنِ ٱشْكُرْ لِلَّهِ ۚ وَمَن يَشْكُرْ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ حَمِيدٌ ﴿12﴾

हमने यही प्रज्ञा लुक़्मान् को भी दी और उपदेश किया था कि परमेश्वर का आभार व्यक्त करो — और जो कृतज्ञता करेगा तो वह अपने ही लिए कृतज्ञता करेगा और जो अकृतज्ञता करेगा तो परमेश्वर को उसकी कोई परवाह नहीं, इसलिए कि परमेश्वर निस्पृह है, वह अपने आप में उत्तम गुणों वाला है।

وَإِذْ قَالَ لُقْمَـٰنُ لِٱبْنِهِۦ وَهُوَ يَعِظُهُۥ يَـٰبُنَىَّ لَا تُشْرِكْ بِٱللَّهِ ۖ إِنَّ ٱلشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ ﴿13﴾

(इसका अनिवार्य परिणाम है कि किसी को परमेश्वर का सहभागी न बनाया जाए)। याद करो, जब लुक़्मान् ने अपने बेटे को उपदेश करते हुए कहा था कि बेटा, परमेश्वर के साथ सहभागी न बनाना। सत्य यह है कि शिर्क बहुत बड़ा अन्याय है।

وَوَصَّيْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ بِوَٰلِدَيْهِ حَمَلَتْهُ أُمُّهُۥ وَهْنًا عَلَىٰ وَهْنٍ وَفِصَـٰلُهُۥ فِى عَامَيْنِ أَنِ ٱشْكُرْ لِى وَلِوَٰلِدَيْكَ إِلَىَّ ٱلْمَصِيرُ ﴿14﴾ وَإِن جَـٰهَدَاكَ عَلَىٰٓ أَن تُشْرِكَ بِى مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۖ وَصَاحِبْهُمَا فِى ٱلدُّنْيَا مَعْرُوفًا ۖ وَٱتَّبِعْ سَبِيلَ مَنْ أَنَابَ إِلَىَّ ۚ ثُمَّ إِلَىَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿15﴾

(इसमें संदेह नहीं कि) हमने मनुष्य को उसके माता-पिता के बारे में भी उपदेश किया है। उसकी माँ ने दुख पर दुख उठाकर उसको पेट में रखा और (जन्म के बाद) कहीं दो साल में जाकर उसका दूध छुड़ाना हुआ। (हमने उसको उपदेश किया है) कि मेरे आभारी रहो और अपने माता-पिता के, (और याद रखो कि अंत में) मेरी ही ओर लौट कर आना है। परंतु यदि वे तुम पर दबाव डालें कि किसी को मेरा सहभागी बनाओ जिसके बारे में तुम्हारे पास कोई प्रमाण नहीं है तो उनकी बात न मानना। अपितु, दुनिया में उनके साथ अच्छा व्यवहार रखना और अनुसरण उन्हीं के मार्ग का करना जिनका ध्यान मेरी ओर केंद्रित है। फिर तुमको मेरी ही ओर पलटना है। फिर मैं तुम्हें बता दूंगा जो कुछ तुम करते रहे हो।

يَـٰبُنَىَّ إِنَّهَآ إِن تَكُ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِّنْ خَرْدَلٍ فَتَكُن فِى صَخْرَةٍ أَوْ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ أَوْ فِى ٱلْأَرْضِ يَأْتِ بِهَا ٱللَّهُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَطِيفٌ خَبِيرٌ ﴿16﴾

(लुक़्मान् ने कहा था): बेटा, बात यह है कि कोई कर्म राई के दाने के बराबर भी हो तो चाहे वह किसी घाटी में हो या आकाशों में या धरती में, परमेश्वर उसे निकाल लाएगा। निस्संदेह, परमेश्वर प्रज्ञावान है, वह हर चीज़ से परिचित है।

يَـٰبُنَىَّ أَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ وَأْمُرْ بِٱلْمَعْرُوفِ وَٱنْهَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَٱصْبِرْ عَلَىٰ مَآ أَصَابَكَ ۖ إِنَّ ذَٰلِكَ مِنْ عَزْمِ ٱلْأُمُورِ ﴿17﴾

बेटे, नमाज़ का प्रबंध रखो, भलाई का उपदेश करो और बुराई से रोको, और (इस मार्ग में) जो कठिनाई तुम्हें पहुंचे, उसपर धैर्य रखो। इसलिए कि यही कार्य हैं जिनपर अत्यधिक बल दिया गया है।

وَلَا تُصَعِّرْ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمْشِ فِى ٱلْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ ﴿18﴾ وَٱقْصِدْ فِى مَشْيِكَ وَٱغْضُضْ مِن صَوْتِكَ ۚ إِنَّ أَنكَرَ ٱلْأَصْوَٰتِ لَصَوْتُ ٱلْحَمِيرِ ﴿19﴾

और लोगों से बेरुख़ी न करो और धरती में अकड़ कर न चलो, इसलिए कि परमेश्वर किसी अकड़ने और गौरव जताने वाले को प्रिय नहीं रखता। अपनी चाल में मध्यवर्ती आचरण अपनाओ और अपनी आवाज़ को नीचा रखो, सत्य यह है कि सबसे बुरी आवाज़ गधे की आवाज़ है।

أَلَمْ تَرَوْا۟ أَنَّ ٱللَّهَ سَخَّرَ لَكُم مَّا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ وَأَسْبَغَ عَلَيْكُمْ نِعَمَهُۥ ظَـٰهِرَةً وَبَاطِنَةً ۗ وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يُجَـٰدِلُ فِى ٱللَّهِ بِغَيْرِ عِلْمٍ وَلَا هُدًى وَلَا كِتَـٰبٍ مُّنِيرٍ ﴿20﴾ وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ بَلْ نَتَّبِعُ مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ ءَابَآءَنَآ ۚ أَوَلَوْ كَانَ ٱلشَّيْطَـٰنُ يَدْعُوهُمْ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلسَّعِيرِ ﴿21﴾

(तुमने इसे भुला दिया)। क्या देखते नहीं हो कि परमेश्वर ही है जिसने धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब तुम्हारे काम में लगा दिया है और अपने सब प्रकार के प्रकट और अदृश्य वरदान तुम पर पूरे कर दिए हैं? इसके होते हुए भी लोगों में ऐसे भी हैं जो परमेश्वर के बारे में बिना किसी प्रमाण, बिना किसी मार्गदर्शन और बिना किसी प्रकाशमान ग्रंथ के झगड़ते हैं। और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ का अनुसरण करो जो परमेश्वर ने उतारी है तो कहते हैं कि नहीं, हम तो उसी मार्ग का अनुसरण करेंगे जिस पर हमने अपने पूर्वजों को पाया है। क्या उस स्थिति में भी, जबकि शैतान उन्हें आग के दण्ड की ओर बुला रहा हो?

وَمَن يُسْلِمْ وَجْهَهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَقَدِ ٱسْتَمْسَكَ بِٱلْعُرْوَةِ ٱلْوُثْقَىٰ ۗ وَإِلَى ٱللَّهِ عَـٰقِبَةُ ٱلْأُمُورِ ﴿22﴾ وَمَن كَفَرَ فَلَا يَحْزُنكَ كُفْرُهُۥٓ ۚ إِلَيْنَا مَرْجِعُهُمْ فَنُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ﴿23﴾ نُمَتِّعُهُمْ قَلِيلًا ثُمَّ نَضْطَرُّهُمْ إِلَىٰ عَذَابٍ غَلِيظٍ ﴿24﴾

(नहीं, यह कुछ नहीं, अपितु) जो अपनी दिशा आज्ञाकारी होते हुए परमेश्वर की ओर करेगा और वह अच्छे ढंग से कर्म करने वाला भी है तो उसने मज़बूत रस्सी थाम ली है और अंत में सभी मामले परमेश्वर ही की ओर लौटने वाले हैं। और जिसने नकार दिया तो उसका नकारना तुम्हारे लिए दुख का कारण न हो, (हे पैग़ंबर)। इन सब की वापसी हमारी ही ओर है, फिर हम इन्हें बता देंगे जो कुछ ये करते रहे। निस्संदेह, परमेश्वर दिलों के भेद जानता है। हम इनको कुछ दिन लाभान्वित करेंगे, फिर इन्हें कठोर दण्ड की ओर खींच ले जाएँगे।

وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۚ قُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿25﴾ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْغَنِىُّ ٱلْحَمِيدُ ﴿26﴾

यदि तुम इनसे पूछो कि धरती और समस्त आकाशों को किसने पैदा किया है तो अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर ने। कहो, आभार के योग्य भी परमेश्वर है। (ये जो कुछ मानते हैं, स्वयं उसी को झूठा कह रहे हैं)। नहीं, अपितु इनमें से अधिकांश जानते नहीं हैं। धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, परमेश्वर ही का है। (वह इन के आभार का मोहताज नहीं है)। निस्संदेह, परमेश्वर निस्पृह और अपने आप में प्रशंसनीय है।

وَلَوْ أَنَّمَا فِى ٱلْأَرْضِ مِن شَجَرَةٍ أَقْلَـٰمٌ وَٱلْبَحْرُ يَمُدُّهُۥ مِنۢ بَعْدِهِۦ سَبْعَةُ أَبْحُرٍ مَّا نَفِدَتْ كَلِمَـٰتُ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿27﴾

(सत्य यह है कि) धरती में जितने वृक्ष हैं, यदि वे सारे क़लम बन जाएं और समुद्र स्याही बन जाए, इस प्रकार के इसके बाद उसे सात समुद्र और स्याही दें, परमेश्वर की बातें तब भी लिखी नहीं जा सकतीं। निस्संदेह, परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।

مَّا خَلْقُكُمْ وَلَا بَعْثُكُمْ إِلَّا كَنَفْسٍ وَٰحِدَةٍ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌۢ بَصِيرٌ ﴿28﴾ أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُولِجُ ٱلَّيْلَ فِى ٱلنَّهَارِ وَيُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِى ٱلَّيْلِ وَسَخَّرَ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ كُلٌّ يَجْرِىٓ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى وَأَنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴿29﴾ ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ ٱلْبَـٰطِلُ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْكَبِيرُ ﴿30﴾

तुम सब को पैदा कर देना और (मरने के बाद) तुम्हारा उठा खड़ा करना (उसके लिए) ऐसा ही है, जैसे एक व्यक्ति का पैदा करना और उठा खड़ा करना। निस्संदेह, परमेश्वर सुनने वाला, देखने वाला है। तुमने देखा नहीं कि परमेश्वर रात को दिन में प्रवेश करता है और दिन को रात में प्रवेश करता है और सूरज और चाँद को उसने तुम्हारी सेवा में कर रखा है। सब एक निर्धारित समय तक चले जा रहे हैं। और देखा नहीं कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे परिचित है? यह सब इस कारण है कि परमेश्वर ही सत्य है और जिनको ये उसके अतिरिक्त पुकारते हैं, वे मिथ्या हैं और इस कारण कि परमेश्वर ही सर्वश्रेष्ठ है, वही महान है।

أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱلْفُلْكَ تَجْرِى فِى ٱلْبَحْرِ بِنِعْمَتِ ٱللَّهِ لِيُرِيَكُم مِّنْ ءَايَـٰتِهِۦٓ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ ﴿31﴾ وَإِذَا غَشِيَهُم مَّوْجٌ كَٱلظُّلَلِ دَعَوُا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمْ إِلَى ٱلْبَرِّ فَمِنْهُم مُّقْتَصِدٌ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَّا كُلُّ خَتَّارٍ كَفُورٍ ﴿32﴾

तुमने देखा नहीं कि नौका परमेश्वर ही की कृपा से सागर में चलती है ताकि वह तुम्हें अपनी कुछ निशानियाँ दिखाए। सत्य यह है कि इसमें हर उस व्यक्ति के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं जो धैर्य करने वाला और आभारी हो। और जब लहर छतों के समान उसके यात्रियों को ढक लेती है तो केवल उसी के आज्ञापालन की प्रतिज्ञा करते हुए, वे परमेश्वर को पुकारते हैं। फिर जब वह उन्हें मुक्ति देकर भूमि की ओर ले आता है तो उनमें कुछ मार्ग पर रहते हैं और अधिकांश भटक जाते हैं। और हमारी निशानियों को तो वही सब नकारते हैं जो अत्यंत विश्वासघाती और अकृतज्ञ हैं।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱتَّقُوا۟ رَبَّكُمْ وَٱخْشَوْا۟ يَوْمًا لَّا يَجْزِى وَالِدٌ عَن وَلَدِهِۦ وَلَا مَوْلُودٌ هُوَ جَازٍ عَن وَالِدِهِۦ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّ ۖ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا وَلَا يَغُرَّنَّكُم بِٱللَّهِ ٱلْغَرُورُ ﴿33﴾ إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥ عِلْمُ ٱلسَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ ٱلْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِى ٱلْأَرْحَامِ ۖ وَمَا تَدْرِى نَفْسٌ مَّاذَا تَكْسِبُ غَدًا ۖ وَمَا تَدْرِى نَفْسٌۢ بِأَىِّ أَرْضٍ تَمُوتُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌۢ ﴿34﴾

लोगो, अपने प्रभु की पकड़ से बचो और उस दिन से डरो, जिस दिन न कोई पिता अपनी संतान के काम आएगा और न कोई संतान अपने पिता के कुछ काम आने वाली बन सकेगी। निस्संदेह, परमेश्वर का वादा सत्य है। सो दुनिया का जीवन तुम्हें कदापि धोखे में न डाले और न वह धोखेबाज़ तुम्हें परमेश्वर के बारे में कभी धोखा देने पाए। (पूछते हैं कि यह वादा कब पूरा होगा? कहो), उस घड़ी का ज्ञान केवल परमेश्वर के पास है। (देखते नहीं हो कि) वही बारिश बरसाता है और जानता है जो कुछ गर्भों में होता है। कोई नहीं जानता कि वह कल क्या कमाएगा और कोई नहीं जानता कि किस भूमि में मरेगा। (परंतु कोई बुद्धिमान क्या इन सब बातों को नकार सकता है)? सत्य यह है कि परमेश्वर ही ज्ञानी और जागरूक है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात् शैतान, जिसने धोका देने की प्रतिज्ञा कर रखी है। ↩