सूरह 39

अज़्-ज़ुमर्

मक्की · 75 आयतें · 36 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों में सचेत करने (इंज़ार) और शुभ समाचार देने (बशारत) के साथ-साथ एक, अद्वितीय और साझेदार रहित परमेश्वर को मानने (तौहीद) का निमंत्रण दिया गया है। हालांकि, पहली सूरह में तौहीद का प्रमाण अधिक स्पष्ट है, जबकि दूसरी में नकारने वालों के लिए चेतावनी और डराने का पहलू, तथा मानने वालों के लिए सांत्वना, प्रोत्साहन और हौसला बढ़ाने का पहलू प्रमुख है। इसी प्रकार, जो लोग अभी संदेह में थे, उन्हें भी निर्देश दिया गया है कि वे संकोच छोड़कर आगे बढ़ें और सत्य की ओर बुलाने के इस संघर्ष में पैग़ंबर के साथी बन जाएं। दोनों की शुरुआत शब्दों के मामूली अंतर के साथ एक ही आयत से हुई है। इससे स्वयं क़ुरआन ने इनके इस संबंध की ओर संकेत किया है और शब्दों के इस अंतर से यह बात भी स्पष्ट कर दी है कि पहली सूरह में तर्क का आधार परमेश्वर की प्रज्ञा (हिक्मत) है और दूसरी सूरह में उसका ज्ञान (इल्म) है।

इन सूरतों के बाद की छह सूरतों के विषय भी लगभग वही हैं जो ऊपर सूरह 'अल्-मोमिन' के बताए गए हैं। इसलिए, इनका नाम भी परमेश्वर ने एक ही, अर्थात “हा मीम्” रखा है और इसी आधार पर इन्हें अरबी में “हवामीम्” कहा जाता है।

दोनों सूरतें क़ुरैश क़बीले को संबोधित करती हैं और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के ‘हिज्रत व बराअत’ के चरण में अवतरित हुई हैं।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

تَنزِيلُ ٱلْكِتَـٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَكِيمِ ﴿1﴾ إِنَّآ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ فَٱعْبُدِ ٱللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ ٱلدِّينَ ﴿2﴾ أَلَا لِلَّهِ ٱلدِّينُ ٱلْخَالِصُ ۚ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلْفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِى مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى مَنْ هُوَ كَـٰذِبٌ كَفَّارٌ ﴿3﴾

यह ग्रंथ परमेश्वर की ओर से उतारा गया है, अत्यंत प्रबंध के साथ, जो प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है। हमने, (हे पैग़ंबर), इस ग्रंथ को तुम्हारी ओर निर्णायक बात के साथ उतारा है। अतः परमेश्वर ही की भक्ति करो, अपने आज्ञापालन को उसी के लिए विशुद्ध करते हुए। सुनो, विशुद्ध आज्ञापालन परमेश्वर ही के लिए है। परमेश्वर के अतिरिक्त जिन लोगों ने कुछ अन्य बिगड़ी बनाने वाले गढ़ रखे हैं, और कहते हैं कि हम तो उनकी पूजा केवल इसलिए करते हैं कि वे हमको परमेश्वर के और पास कर दें, परमेश्वर अवश्य उनके बीच उस बात का निर्णय करेगा जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं। निस्संदेह, परमेश्वर उन लोगों का मार्गदर्शन नहीं करता जो झूठे और अकृतज्ञ हैं।

لَّوْ أَرَادَ ٱللَّهُ أَن يَتَّخِذَ وَلَدًا لَّٱصْطَفَىٰ مِمَّا يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ هُوَ ٱللَّهُ ٱلْوَٰحِدُ ٱلْقَهَّارُ ﴿4﴾

(ये मूर्ख सोचते नहीं कि) यदि परमेश्वर चाहता कि किसी को संतान बनाए तो अपनी सृष्टि में से जो चाहता, (अपने लिए) स्वयं चुन लेता। (परंतु) वह इससे विमुक्त है। वह अकेला परमेश्वर है, सब पर क़ाबू रखने वाला।

خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۖ يُكَوِّرُ ٱلَّيْلَ عَلَى ٱلنَّهَارِ وَيُكَوِّرُ ٱلنَّهَارَ عَلَى ٱلَّيْلِ ۖ وَسَخَّرَ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ ۖ كُلٌّ يَجْرِى لِأَجَلٍ مُّسَمًّى ۗ أَلَا هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْغَفَّـٰرُ ﴿5﴾

धरती और समस्त आकाशों को उसने एक उद्देश्य से पैदा किया है। वह रात को दिन पर लपेटता है और दिन को रात पर लपेटता है और सूरज और चाँद को उसी ने वश में कर रखा है। सब एक निर्धारित समय के लिए चले जा रहे हैं । सुनो, वही प्रबल है, बड़ा ही क्षमा करने वाला है।

خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَٰحِدَةٍ ثُمَّ جَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ ٱلْأَنْعَـٰمِ ثَمَـٰنِيَةَ أَزْوَٰجٍ ۚ يَخْلُقُكُمْ فِى بُطُونِ أُمَّهَـٰتِكُمْ خَلْقًا مِّنۢ بَعْدِ خَلْقٍ فِى ظُلُمَـٰتٍ ثَلَـٰثٍ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ لَهُ ٱلْمُلْكُ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ ﴿6﴾

उसी ने तुम्हें एक जान से पैदा किया, फिर उसी की प्रजाति से उसका जोड़ा बनाया और तुम्हारे लिए आठ प्रकार के चौपायों को उतारा, नर और मादा। (इसलिए कि उनसे अपनी आर्थिक ज़रूरतें पूरी करो)। तुम्हारी माताओं के पेट में वह एक के बाद दूसरी रचना में तुम्हें तीन अँधेरों में पैदा करता है। वही परमेश्वर तुम्हारा प्रभु है। उसी का साम्राज्य है। उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं है। फिर कहां भटका दिए जाते हो!

إِن تَكْفُرُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ عَنكُمْ ۖ وَلَا يَرْضَىٰ لِعِبَادِهِ ٱلْكُفْرَ ۖ وَإِن تَشْكُرُوا۟ يَرْضَهُ لَكُمْ ۗ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۗ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ﴿7﴾

यदि तुम अकृतज्ञता करोगे तो परमेश्वर का कुछ नहीं बिगाड़ोगे, इसलिए कि परमेश्वर तुमसे निस्पृह है। हाँ, वह अपने भक्तों के लिए अकृतज्ञता को प्रिय नहीं रखता। और यदि आभारी रहोगे तो उसको वह तुम्हारे लिए अच्छा समझेगा। (याद रखो, क़यामत के दिन) कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम्हारी वापसी तुम्हारे प्रभु ही की ओर होगी, तो जो कुछ तुम करते रहे हो, वह तुम्हें बता देगा। सत्य यह है कि वह तो दिलों के भेद तक जानता है।

وَإِذَا مَسَّ ٱلْإِنسَـٰنَ ضُرٌّ دَعَا رَبَّهُۥ مُنِيبًا إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا خَوَّلَهُۥ نِعْمَةً مِّنْهُ نَسِىَ مَا كَانَ يَدْعُوٓا۟ إِلَيْهِ مِن قَبْلُ وَجَعَلَ لِلَّهِ أَندَادًا لِّيُضِلَّ عَن سَبِيلِهِۦ ۚ قُلْ تَمَتَّعْ بِكُفْرِكَ قَلِيلًا ۖ إِنَّكَ مِنْ أَصْحَـٰبِ ٱلنَّارِ ﴿8﴾

मनुष्य (का मामला भी अजीब है कि उस) को जब कोई संकट पहुंचता है तो वह अपने प्रभु की ओर ध्यान करके उसको पुकारता है। फिर जब उसका प्रभु अपनी ओर से उसको अनुग्रह प्रदान करता है तो पहले जिस चीज़ के लिए पुकार रहा था, उसको भूल जाता है और परमेश्वर के साझीदार बनाने लगता है कि उसके मार्ग से लोगों को भटका दे। इससे कहो, (हे पैग़ंबर) कि कुछ दिन अपने इस कुफ़्र के साथ लाभान्वित हो जाओ, इसमें संदेह नहीं कि अंततः तुम नरक वालों में होगे।

أَمَّنْ هُوَ قَـٰنِتٌ ءَانَآءَ ٱلَّيْلِ سَاجِدًا وَقَآئِمًا يَحْذَرُ ٱلْـَٔاخِرَةَ وَيَرْجُوا۟ رَحْمَةَ رَبِّهِۦ ۗ قُلْ هَلْ يَسْتَوِى ٱلَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿9﴾

(लोगो), क्या वे जो रात की घड़ियों में (अपने प्रभु के आगे) कभी झुके हुए और कभी खड़े हुए विनति करने वाले हैं, परलोक से भयभीत और अपने प्रभु की दया के अभिलाषी हैं और वे जो अपने सहभागियों के सहारे पर उसको भुलाए हुए हैं, समान हो जाएँगे? इनसे पूछो, क्या ज्ञानी और अज्ञानी कभी समान हो सकते हैं? सत्य यह है कि (इन सब बातों से) उपदेश तो केवल बुद्धिजीवी ही प्राप्त करते हैं।

قُلْ يَـٰعِبَادِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ ٱللَّهِ وَٰسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى ٱلصَّـٰبِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ ﴿10﴾

(इन्हें अब इनकी दशा में छोड़ो, हे पैग़ंबर, और मेरे भक्तों से) कह दो कि मेरे भक्तो जो मान गए हो, तुम अपने प्रभु से डरते रहो (और याद रखो कि) जो लोग इस दुनिया में भलाई अपनाएंगे, उनके लिए परलोक में भलाई है। (तुम्हारे देश की धरती यदि तुम्हारे लिए तंग कर दी गई है तो निराश न हो), परमेश्वर की धरती बहुत बड़ी है, (वह उसके मार्ग तुम्हारे लिए खोल देगा और उसके) जो (भक्त इन संकटों में) दृढ़संकल्प रहेंगे, उन्हीं के लिए उनका फल असंख्य पूरा किया जाएगा।

قُلْ إِنِّىٓ أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ ٱللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ ٱلدِّينَ ﴿11﴾ وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ ٱلْمُسْلِمِينَ ﴿12﴾ قُلْ إِنِّىٓ أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّى عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴿13﴾

कह दो कि मुझे तो आदेश मिला है कि मैं परमेश्वर ही की भक्ति करूँ, अपने आज्ञापालन को उसी के लिए विशुद्ध रखते हुए और आदेश मिला है कि मैं सबसे पहला मुसलमान बनूँ। कह दो कि यदि मैं अपने प्रभु की अवज्ञा करूं तो मैं एक बड़े डरावने दिन के दण्ड से डरता हूं।

قُلِ ٱللَّهَ أَعْبُدُ مُخْلِصًا لَّهُۥ دِينِى ﴿14﴾ فَٱعْبُدُوا۟ مَا شِئْتُم مِّن دُونِهِۦ ۗ قُلْ إِنَّ ٱلْخَـٰسِرِينَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ أَلَا ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْخُسْرَانُ ٱلْمُبِينُ ﴿15﴾ لَهُم مِّن فَوْقِهِمْ ظُلَلٌ مِّنَ ٱلنَّارِ وَمِن تَحْتِهِمْ ظُلَلٌ ۚ ذَٰلِكَ يُخَوِّفُ ٱللَّهُ بِهِۦ عِبَادَهُۥ ۚ يَـٰعِبَادِ فَٱتَّقُونِ ﴿16﴾

कह दो कि मैं तो परमेश्वर ही की भक्ति करता हूं, अपने आज्ञापालन को उसी के लिए विशुद्ध रखते हुए। रहे तुम तो उसके अतिरिक्त जिसकी भक्ति चाहो, करो, (मैं उससे विमुक्त हूं)। कह दो के घाटे में तो वस्तुतः वही लोग हैं जिन्होंने अपने आप को और अपने परिवार को क़यामत के दिन घाटे में डाल दिया। सुनो, यही स्पष्ट घाटा है। उनके लिए उनके ऊपर से भी आग की छतें होंगी और उनके नीचे से भी। यही चीज़ है जिससे परमेश्वर अपने भक्तों को डराता है। मेरे भक्तों, इसलिए मुझसे डरो।

وَٱلَّذِينَ ٱجْتَنَبُوا۟ ٱلطَّـٰغُوتَ أَن يَعْبُدُوهَا وَأَنَابُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ لَهُمُ ٱلْبُشْرَىٰ ۚ فَبَشِّرْ عِبَادِ ﴿17﴾ ٱلَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ ٱلْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُۥٓ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ هَدَىٰهُمُ ٱللَّهُ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمْ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿18﴾

इसके विपरीत जो शैतान से बचे कि उसकी भक्ति करें और परमेश्वर की ओर ध्यान देने वाले रहे, उनके लिए शुभ समाचार है। तो मेरे इन भक्तों को शुभ समाचार दो, ये जो बात को ध्यान से सुनते, फिर उसके सबसे अच्छे भाग का अनुसरण करते हैं। यही है जिनका परमेश्वर ने मार्गदर्शन किया और यही हैं जो बुद्धिजीवी हैं।

أَفَمَنْ حَقَّ عَلَيْهِ كَلِمَةُ ٱلْعَذَابِ أَفَأَنتَ تُنقِذُ مَن فِى ٱلنَّارِ ﴿19﴾ لَـٰكِنِ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ رَبَّهُمْ لَهُمْ غُرَفٌ مِّن فَوْقِهَا غُرَفٌ مَّبْنِيَّةٌ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ وَعْدَ ٱللَّهِ ۖ لَا يُخْلِفُ ٱللَّهُ ٱلْمِيعَادَ ﴿20﴾

फिर क्या जिस पर दण्ड की बात पूरी हो चुकी और जिस का ठिकाना अब नरक ही है तो क्या तुम उसको बचाओगे जो नरक में पड़ा है? अपितु जो अपने प्रभु से डरते रहे, उनके लिए ऊंची कोठियाँ और ऊंची कोठियों के ऊपर भी सजाई हुई ऊंची कोठियाँ हैं। उनके नीचे नहरें बह रही होंगी। यह परमेश्वर का पक्का वचन है। परमेश्वर अपने वचन का उल्लंघन नहीं करेगा।

أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَسَلَكَهُۥ يَنَـٰبِيعَ فِى ٱلْأَرْضِ ثُمَّ يُخْرِجُ بِهِۦ زَرْعًا مُّخْتَلِفًا أَلْوَٰنُهُۥ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَىٰهُ مُصْفَرًّا ثُمَّ يَجْعَلُهُۥ حُطَـٰمًا ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَذِكْرَىٰ لِأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿21﴾

(ये समझते हैं कि इनकी सत्ता का पतन नहीं होगा)? तुमने देखा नहीं, (हे पैग़ंबर कि) परमेश्वर ने आकाश से पानी उतारा और धरती में उसके झरने बहा दिए। फिर वह उससे अनेक प्रकार के रंग बदलती खेती निकालता है, फिर वह सूखने लगती है तो उसको तुम देखते हो कि पीली पड़ गई है। फिर वह उसको चूर-चूर कर देता है। इसमें, निःसदेह बुद्धिजीवियों के लिए बड़ा उपदेश है।

أَفَمَن شَرَحَ ٱللَّهُ صَدْرَهُۥ لِلْإِسْلَـٰمِ فَهُوَ عَلَىٰ نُورٍ مِّن رَّبِّهِۦ ۚ فَوَيْلٌ لِّلْقَـٰسِيَةِ قُلُوبُهُم مِّن ذِكْرِ ٱللَّهِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿22﴾

(इन पर अफ़सोस, इनके दिल कठोर हो गए)। फिर क्या वे जिनकी छाती परमेश्वर ने इस्लाम के लिए खोल दी है और वे अपने प्रभु की ओर से प्रकाश पर हैं, उन लोगों के समान हो जाएँगे जिनके दिल कठोर हो चुके हैं? अतः बर्बादी है उनके लिए जिनके दिल परमेश्वर के उपदेश के मामले में कठोर हो गए। यही स्पष्ट पथभ्रष्टता में हैं।

ٱللَّهُ نَزَّلَ أَحْسَنَ ٱلْحَدِيثِ كِتَـٰبًا مُّتَشَـٰبِهًا مَّثَانِىَ تَقْشَعِرُّ مِنْهُ جُلُودُ ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ ثُمَّ تَلِينُ جُلُودُهُمْ وَقُلُوبُهُمْ إِلَىٰ ذِكْرِ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ هُدَى ٱللَّهِ يَهْدِى بِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِنْ هَادٍ ﴿23﴾

(लोगो), परमेश्वर ने सबसे अच्छी वाणी उतारी है, एक ऐसे ग्रंथ के रूप में जिसका हर भाग दूसरे भाग से संगति रखने वाला और जिसकी सूरतें जोड़े-जोड़े हैं। इससे उन लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं जो अपने प्रभु से डरते हैं। फिर उनके शरीर और उनके दिल नरम होकर परमेश्वर की याद की ओर झुक पड़ते हैं। यह परमेश्वर का मार्गदर्शन है, इससे वह जिसका चाहता है, (अपने नियम अनुसार) मार्गदर्शन करता है (और उसी के अनुसार भटका भी देता है), और जिसको परमेश्वर पथभ्रष्टता में डाल दे, उसका फिर कोई मार्गदर्शन करने वाला नहीं है।

أَفَمَن يَتَّقِى بِوَجْهِهِۦ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ وَقِيلَ لِلظَّـٰلِمِينَ ذُوقُوا۟ مَا كُنتُمْ تَكْسِبُونَ ﴿24﴾

फिर क्या जो क़यामत के दिन बुरे दण्ड की मार अपने चेहरे पर रोकेगा, वह इन मार्गदर्शन पाने वालों के समान हो जाएगा? ऐसे दुष्टों से कहा जाएगा कि अब चखो उस कमाई का स्वाद जो तुम करते थे।

كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَأَتَىٰهُمُ ٱلْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ ﴿25﴾ فَأَذَاقَهُمُ ٱللَّهُ ٱلْخِزْىَ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿26﴾

इनसे पहले वालों ने भी इसी प्रकार नकार दिया था तो उनपर हमारा दण्ड वहाँ से आ गया, जहाँ से उन्होंने सोचा भी न था। फिर परमेश्वर ने उनको दुनिया के जीवन में भी अपमान का स्वाद चखाया और परलोक का दण्ड तो इससे कहीं बढ़कर है। काश, ये लोग इसको समझते!

وَلَقَدْ ضَرَبْنَا لِلنَّاسِ فِى هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ مِن كُلِّ مَثَلٍ لَّعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴿27﴾ قُرْءَانًا عَرَبِيًّا غَيْرَ ذِى عِوَجٍ لَّعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ﴿28﴾ ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا رَّجُلًا فِيهِ شُرَكَآءُ مُتَشَـٰكِسُونَ وَرَجُلًا سَلَمًا لِّرَجُلٍ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿29﴾

हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए सब प्रकार के उदाहरणों का वर्णन कर दिया है, ताकि वे स्मरण प्राप्त करें। ऐसे क़ुरआन के रूप में जो अरबी भाषा में है, जिसके अंदर कोई टेढ़ापन नहीं है, ताकि वे परमेश्वर के दण्ड से बचें। (ये शिर्क और तौहीद की वास्तविकता को समझना चाहते हैं तो) परमेश्वर (इनके लिए) एक ग़ुलाम के उदाहरण का वर्णन करता है जिसमें कई मालिक साझीदार हैं जो आपस में विरोधी हैं और एक दूसरा ग़ुलाम का उदाहरण जो केवल एक ही व्यक्ति की संपत्ति है। क्या इन दोनों की दशा समान होगी? (कदापि नहीं, सत्य यह है कि) आभार के योग्य केवल परमेश्वर है, परंतु इनमें से अधिकांश लोग जानते नहीं हैं।

إِنَّكَ مَيِّتٌ وَإِنَّهُم مَّيِّتُونَ ﴿30﴾ ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ عِندَ رَبِّكُمْ تَخْتَصِمُونَ ﴿31﴾ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَذَبَ عَلَى ٱللَّهِ وَكَذَّبَ بِٱلصِّدْقِ إِذْ جَآءَهُۥٓ ۚ أَلَيْسَ فِى جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَـٰفِرِينَ ﴿32﴾

(इनकी हठधर्मिता पर दुखी न हो, हे पैग़ंबर)। तुमको भी अवश्य मरना है और ये भी मरने वाले हैं। फिर निश्चित है कि तुम सब लोग अपना मुकद्दमा क़यामत के दिन अपने प्रभु के सामने पेश करोगे। अतः उस दिन उनसे बढ़कर अपने प्राण पर अत्याचार करने वाला कौन होगा जिन्होंने परमेश्वर पर झूठ बांधा और सत्य को झूठा कह दिया, जब वह उनके पास आ गया! ऐसे नकारने वालों का ठिकाना क्या नरक में नहीं होगा?

وَٱلَّذِى جَآءَ بِٱلصِّدْقِ وَصَدَّقَ بِهِۦٓ ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُتَّقُونَ ﴿33﴾ لَهُم مَّا يَشَآءُونَ عِندَ رَبِّهِمْ ۚ ذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿34﴾ لِيُكَفِّرَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ أَسْوَأَ ٱلَّذِى عَمِلُوا۟ وَيَجْزِيَهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿35﴾

हाँ, जो सत्य लेकर आया और जिन्होंने पूरे दिल के साथ उसको सत्य माना, वहीं दण्ड से बचने वाले हैं। उनके लिए उनके प्रभु के यहाँ, जो चाहेंगे, होगा। यह फल है उनका जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं। इसलिए कि जो कर्म उन्होंने किए थे, उनके बुरे परिणाम को परमेश्वर उनसे दूर करे और उनका अच्छा फल उनको प्रदान करे, उनके कर्मों का सबसे अच्छा प्रतिफल।

أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِكَافٍ عَبْدَهُۥ ۖ وَيُخَوِّفُونَكَ بِٱلَّذِينَ مِن دُونِهِۦ ۚ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِنْ هَادٍ ﴿36﴾ وَمَن يَهْدِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن مُّضِلٍّ ۗ أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِعَزِيزٍ ذِى ٱنتِقَامٍ ﴿37﴾

(तुम इनसे क्यों डरो, हे पैग़ंबर)? क्या परमेश्वर अपने भक्तों के लिए पर्याप्त नहीं है? ये तुमको उनसे डराते हैं जो इन्होंने उसके अतिरिक्त बना रखे हैं। (इनकी परवाह न करो, इन्हें परमेश्वर ने पथभ्रष्टता में डाल दिया है) और जिन्हें परमेश्वर (अपने नियम अनुसार) पथभ्रष्टता में डाल दे, उनका फिर कोई मार्गदर्शन करने वाला नहीं है और जिनका परमेश्वर मार्गदर्शन करे, उन्हें कोई भटकाने वाला नहीं हो सकता। (इसलिए क्यों डरो)? क्या परमेश्वर प्रबल और प्रतिशोध लेने वाला नहीं है?

وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۚ قُلْ أَفَرَءَيْتُم مَّا تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ إِنْ أَرَادَنِىَ ٱللَّهُ بِضُرٍّ هَلْ هُنَّ كَـٰشِفَـٰتُ ضُرِّهِۦٓ أَوْ أَرَادَنِى بِرَحْمَةٍ هَلْ هُنَّ مُمْسِكَـٰتُ رَحْمَتِهِۦ ۚ قُلْ حَسْبِىَ ٱللَّهُ ۖ عَلَيْهِ يَتَوَكَّلُ ٱلْمُتَوَكِّلُونَ ﴿38﴾

यदि तुम इनसे पूछो कि धरती और समस्त आकाशों को किसने पैदा किया है तो अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर ने। कहो, फिर तुमने सोचा है कि यदि परमेश्वर मुझे कोई कष्ट पहुंचाना चाहे तो परमेश्वर को छोड़ जिन देवियों को तुम पुकारते हो, क्या ये उसके पहुंचाए हुए कष्ट को दूर कर सकती हैं? या परमेश्वर मुझपर कोई कृपा करना चाहे तो क्या ये उसकी कृपा को रोकने वाली हो सकती हैं? कह दो, मेरे लिए परमेश्वर पर्याप्त है, भरोसा करने वाले उसी पर भरोसा करते हैं।

قُلْ يَـٰقَوْمِ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنِّى عَـٰمِلٌ ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ﴿39﴾ مَن يَأْتِيهِ عَذَابٌ يُخْزِيهِ وَيَحِلُّ عَلَيْهِ عَذَابٌ مُّقِيمٌ ﴿40﴾

कह दो कि मेरी क़ौम के लोगो, तुम अपने ढंग से काम करो, मैं अपने ढंग से करता रहूंग। फिर शीघ्र ही तुम जान जाओगे कि किस पर वह दण्ड आता है जो उसको अपमानित कर देता है और किस पर वह दण्ड उतरता है जो टिक कर रह जाता है।

إِنَّآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ لِلنَّاسِ بِٱلْحَقِّ ۖ فَمَنِ ٱهْتَدَىٰ فَلِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ ﴿41﴾

(तुम पर इनको समझाने ही का दायित्व है, हे पैग़ंबर)। इसमें कोई संदेह नहीं कि लोगों के मार्गदर्शन के लिए यह ग्रंथ हमने तुम पर सत्य के साथ उतारा है। इसलिए जो मार्गदर्शन पाएगा, वह अपने लिए पाएगा और जो पथभ्रष्टता अपनाएगा तो उसके भटकने का भार भी उसी पर होगा। तुम इन पर कोई उत्तरदाई नहीं बनाए गए हो।

ٱللَّهُ يَتَوَفَّى ٱلْأَنفُسَ حِينَ مَوْتِهَا وَٱلَّتِى لَمْ تَمُتْ فِى مَنَامِهَا ۖ فَيُمْسِكُ ٱلَّتِى قَضَىٰ عَلَيْهَا ٱلْمَوْتَ وَيُرْسِلُ ٱلْأُخْرَىٰٓ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ ﴿42﴾

सत्य यह है कि परमेश्वर ही अंतःकरण ग्रहण करता है, जब उनकी मृत्यु का समय आ जाता है और जिनकी मृत्यु नहीं आई होती, उन्हें भी नींद की अवस्था में इसी प्रकार ग्रहण कर लेता है। फिर जिनकी मृत्यु का निर्णय कर चुका, उनको रोक लेता है और जो बाक़ी हैं, उन्हें एक निर्धारित समय तक के लिए छोड़ देता है। इसमें, अवश्य उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो विचार करते हैं।

أَمِ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ شُفَعَآءَ ۚ قُلْ أَوَلَوْ كَانُوا۟ لَا يَمْلِكُونَ شَيْـًٔا وَلَا يَعْقِلُونَ ﴿43﴾ قُل لِّلَّهِ ٱلشَّفَـٰعَةُ جَمِيعًا ۖ لَّهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿44﴾ وَإِذَا ذُكِرَ ٱللَّهُ وَحْدَهُ ٱشْمَأَزَّتْ قُلُوبُ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَإِذَا ذُكِرَ ٱلَّذِينَ مِن دُونِهِۦٓ إِذَا هُمْ يَسْتَبْشِرُونَ ﴿45﴾ قُلِ ٱللَّهُمَّ فَاطِرَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ عَـٰلِمَ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ أَنتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِى مَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ﴿46﴾

(ऐसा होने पर भी), क्या इन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध दूसरों को अनुशंसा करने वाला बना रखा है? इनसे कहो, यद्यपि वे कुछ अधिकार न रखते हों और न कुछ बुद्धि रखते हों? कहो कि अनुशंसा सारी की सारी परमेश्वर ही के अधिकार में है। धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य उसी का है। फिर तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे। (यह इसी मूर्खता का परिणाम है कि) जब केवल परमेश्वर का वर्णन किया जाए तो जो लोग परलोक को नहीं मानते (कि उसमें परमेश्वर की निष्पक्ष अदालत अपना निर्णय सुनाएगी), उनके दिल कुढ़ते हैं और जब परमेश्वर के अतिरिक्त दूसरों का वर्णन होता है तो तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। (इनका मामला अब परमेश्वर को सौंप दो और) कहो कि हे परमेश्वर, धरती और समस्त आकाशों के रचयिता, प्रत्यक्ष और परोक्ष के जानने वाले, अपने भक्तों के बीच तू ही उस चीज़ का निर्णय करेगा जिसमें वे मतभेद कर रहे हैं।

وَلَوْ أَنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مَا فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُۥ مَعَهُۥ لَٱفْتَدَوْا۟ بِهِۦ مِن سُوٓءِ ٱلْعَذَابِ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ وَبَدَا لَهُم مِّنَ ٱللَّهِ مَا لَمْ يَكُونُوا۟ يَحْتَسِبُونَ ﴿47﴾ وَبَدَا لَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا كَسَبُوا۟ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿48﴾

(ये इस समय नहीं मान रहे, परंतु) इन दुष्टों के पास यदि वह सब कुछ हो जो धरती में है और उसके साथ उतना ही और भी तो बुरे दण्ड से बचने के लिए ये (बिना किसी संकोच के) क़यामत के दिन उसको बंधन मुक्ति में देना चाहेंगे। परंतु परमेश्वर की ओर से इनके साथ वही किया जाएगा, जिसकी ये कल्पना भी नहीं करते थे। इनके कर्मों के बुरे फल इनके सामने आ जाएँगे और इन्हें वही चीज़ घेर लेगी जिसका ये मज़ाक़ उड़ाते रहे थे।

فَإِذَا مَسَّ ٱلْإِنسَـٰنَ ضُرٌّ دَعَانَا ثُمَّ إِذَا خَوَّلْنَـٰهُ نِعْمَةً مِّنَّا قَالَ إِنَّمَآ أُوتِيتُهُۥ عَلَىٰ عِلْمٍۭ ۚ بَلْ هِىَ فِتْنَةٌ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿49﴾ قَدْ قَالَهَا ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَمَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ ﴿50﴾ فَأَصَابَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا كَسَبُوا۟ ۚ وَٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْ هَـٰٓؤُلَآءِ سَيُصِيبُهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا كَسَبُوا۟ وَمَا هُم بِمُعْجِزِينَ ﴿51﴾ أَوَلَمْ يَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿52﴾

अतः मनुष्य (का मामला भी आश्चर्यजनक है, उस) को जब कोई संकट पहुंचता है तो वह हमें पुकारता है, फिर जब उस पर हम अपनी ओर से कृपा करते हैं तो कहता है कि यह तो मुझे मेरे ज्ञान के कारण मिला है। कदापि नहीं, अपितु यह एक परीक्षा है, परंतु इनके अधिकांश लोग जानते नहीं हैं। इनसे पहले वालों ने भी यही बात कही थी तो जो कुछ वे कमाते रहे, उनके कुछ भी काम नहीं आया और उनके कर्मों के बुरे परिणाम उनके सामने आ गए। इन लोगों में से भी, जिन्होंने अपने प्राण पर अत्याचार किया है, उनके कर्मों के बुरे परिणाम, शीघ्र ही उनके सामने आ जाएँगे और ये परमेश्वर को पराजित नहीं कर सकेंगे। क्या ये नहीं जानते कि परमेश्वर जिसके लिए चाहता है, जीविका बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है, कम कर देता है? सत्य यह है इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो मानना चाहते हों।

قُلْ يَـٰعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ أَسْرَفُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا۟ مِن رَّحْمَةِ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَغْفِرُ ٱلذُّنُوبَ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ﴿53﴾ وَأَنِيبُوٓا۟ إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَأَسْلِمُوا۟ لَهُۥ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ ٱلْعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ ﴿54﴾

इनसे कहो कि मेरे भक्तो, जिन्होंने (मेरे सहभागी बनाकर) अपने अंतःकरण पर अत्याचार किया है, परमेश्वर की दया से निराश न हो। परमेश्वर सभी पापकर्मों को क्षमा कर देगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह बड़ा ही क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। तुम अपने प्रभु की ओर पलटो और उसके आज्ञाकारी बन जाओ, इससे पहले कि तुम पर उसका दण्ड आ जाए। फिर तुम्हारी कोई सहायता नहीं की जाएगी।

وَٱتَّبِعُوٓا۟ أَحْسَنَ مَآ أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ ٱلْعَذَابُ بَغْتَةً وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ ﴿55﴾ أَن تَقُولَ نَفْسٌ يَـٰحَسْرَتَىٰ عَلَىٰ مَا فَرَّطتُ فِى جَنۢبِ ٱللَّهِ وَإِن كُنتُ لَمِنَ ٱلسَّـٰخِرِينَ ﴿56﴾ أَوْ تَقُولَ لَوْ أَنَّ ٱللَّهَ هَدَىٰنِى لَكُنتُ مِنَ ٱلْمُتَّقِينَ ﴿57﴾ أَوْ تَقُولَ حِينَ تَرَى ٱلْعَذَابَ لَوْ أَنَّ لِى كَرَّةً فَأَكُونَ مِنَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿58﴾ بَلَىٰ قَدْ جَآءَتْكَ ءَايَـٰتِى فَكَذَّبْتَ بِهَا وَٱسْتَكْبَرْتَ وَكُنتَ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿59﴾

तुम उस उत्तम चीज़ का अनुसरण करो जो तुम पर तुम्हारे प्रभु की ओर से उतारी गई है, इससे पहले कि तुम पर अचानक दण्ड आए और तुम्हें उसकी सूचना भी न हो। कहीं ऐसा ना हो कि (बाद में) कोई कहे के हाय, मेरी उस भूल पर जो मुझसे परमेश्वर के विषय में हुई, और सत्य यह है कि मैं तो मज़ाक़ ही उड़ाता रहा। या यह कहे कि यदि परमेश्वर ने मेरा मार्गदर्शन किया होता तो मैं भी उससे डरने वालों में होता। या दण्ड को देखे तो कहे कि काश, मुझे दुनिया में फिर जाना हो कि मैं भी अच्छे ढंग से कर्म करने वालों के साथ जुड़ जाऊं! क्यों नहीं, (मैंने तो मार्गदर्शन किया था, अतः) मेरी आयतें तुम्हारे पास आई थीं, पर तुमने उन्हें झूठा कहा और अहंकार किया और नकारने वालों में मिले रहे।

وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ تَرَى ٱلَّذِينَ كَذَبُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ وُجُوهُهُم مُّسْوَدَّةٌ ۚ أَلَيْسَ فِى جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْمُتَكَبِّرِينَ ﴿60﴾ وَيُنَجِّى ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ بِمَفَازَتِهِمْ لَا يَمَسُّهُمُ ٱلسُّوٓءُ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿61﴾ ٱللَّهُ خَـٰلِقُ كُلِّ شَىْءٍ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ وَكِيلٌ ﴿62﴾ لَّهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿63﴾

(लोगो), क़यामत के दिन तुम देखोगे कि उनके चेहरे अंधकारपूर्ण हैं, जिन्होंने (परमेश्वर के सहभागी बना कर) परमेश्वर पर झूठ बांधा है। इन अहंकार करने वालों का ठिकाना क्या नरक में नहीं होगा? (उस दिन) परमेश्वर उन लोगों को उनके शांति स्थल में मुक्ति प्रदान करेगा जो उससे डरते रहे। उनको न वहां कोई हानि पहुंचेगी और न वे दुखी होंगे। (सत्य यह है कि) परमेश्वर ही हर चीज़ का रचयिता है और वही हर चीज़ पर अभिरक्षक है। धरती और समस्त आकाशों की चाबियां उसी के पास हैं। (उसके खज़ानों से कोई दूसरा किसी को कुछ नहीं दे सकता, इसलिए) जिन्होंने परमेश्वर की आयतों को नकार दिया है, वही घाटे में रहने वाले हैं।

قُلْ أَفَغَيْرَ ٱللَّهِ تَأْمُرُوٓنِّىٓ أَعْبُدُ أَيُّهَا ٱلْجَـٰهِلُونَ ﴿64﴾ وَلَقَدْ أُوحِىَ إِلَيْكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكَ لَئِنْ أَشْرَكْتَ لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ ﴿65﴾ بَلِ ٱللَّهَ فَٱعْبُدْ وَكُن مِّنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ ﴿66﴾

इनसे कहो, मूर्ख लोगो, (ये स्पष्ट तथ्य हैं), क्या फिर भी तुम मुझे परमेश्वर को छोड़ दूसरों की भक्ति के लिए कहते हो? यद्यपि तुम्हारी ओर भी, (हे पैग़ंबर), यह वह्य भेजी जा चुकी है और उनकी ओर भी जो तुमसे पहले हो चुके हैं कि यदि तुम परमेश्वर के साझी बनाओगे तो तुम्हारा कर्म व्यर्थ होकर रह जाएगा और तुम अवश्य घाटे में पड़ोगे। इसलिए कभी भी शिर्क न करो, अपितु केवल परमेश्वर की भक्ति करो और उसी के आभारी भक्तों में रहो।

وَمَا قَدَرُوا۟ ٱللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِۦ وَٱلْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَٱلسَّمَـٰوَٰتُ مَطْوِيَّـٰتٌۢ بِيَمِينِهِۦ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿67﴾ وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَصَعِقَ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا مَن شَآءَ ٱللَّهُ ۖ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَىٰ فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنظُرُونَ ﴿68﴾ وَأَشْرَقَتِ ٱلْأَرْضُ بِنُورِ رَبِّهَا وَوُضِعَ ٱلْكِتَـٰبُ وَجِا۟ىٓءَ بِٱلنَّبِيِّـۧنَ وَٱلشُّهَدَآءِ وَقُضِىَ بَيْنَهُم بِٱلْحَقِّ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿69﴾ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ وَهُوَ أَعْلَمُ بِمَا يَفْعَلُونَ ﴿70﴾

इन लोगों ने परमेश्वर को यथायोग्य महत्व नहीं दिया (और उसके भागीदार बना दिए, वरना उसकी महानता ऐसी है कि) क़यामत के दिन पूरी धरती (मानो) उसकी मुट्ठी में होगी और समस्त आकाश उसके दाहिने हाथ में लिपटे हुए होंगे। वह विशुद्ध और ऊँचा है उन चीज़ों से जिन्हें ये सहभागी बनाते हैं। (उस दिन सम्पूर्ण जगत की दशा यह होगी कि) जब नरसिंघा में फूंका जाएगा तो धरती और समस्त आकाशों में जो भी हैं, सब बेहोश हो कर गिर पड़ेंगे, किंतु वे नहीं जिन्हें परमेश्वर चाहे। फिर उसमें पुनः फूंका जाएगा तो उसी पल वे खड़े हो कर देखने लगेंगे और धरती अपने प्रभु के प्रकाश से चमक उठेगी और कर्मों का खाता रख दिया जाएगा और (गवाही के लिए) पैग़ंबर प्रस्तुत किए जाएँगे और वे भी जो गवाही के पद पर नियुक्त किए गए और लोगों के बीच न्यायपूर्वक निर्णय कर दिया जाएगा, उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा और प्रत्येक व्यक्ति को, जो कुछ उसने किया था, पूरा दे दिया जाएगा। परमेश्वर भलीभांति जानता है जो कुछ वे करते रहे हैं।

وَسِيقَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِلَىٰ جَهَنَّمَ زُمَرًا ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُوهَا فُتِحَتْ أَبْوَٰبُهَا وَقَالَ لَهُمْ خَزَنَتُهَآ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌ مِّنكُمْ يَتْلُونَ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِ رَبِّكُمْ وَيُنذِرُونَكُمْ لِقَآءَ يَوْمِكُمْ هَـٰذَا ۚ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَلَـٰكِنْ حَقَّتْ كَلِمَةُ ٱلْعَذَابِ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿71﴾ قِيلَ ٱدْخُلُوٓا۟ أَبْوَٰبَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ فَبِئْسَ مَثْوَى ٱلْمُتَكَبِّرِينَ ﴿72﴾

(इसके बाद तौहीद के आह्वान को) नकारने वाले समूहों के रूप में नरक की ओर हाँके जाएँगे, यहाँ तक कि जब उसके पास पहुंचेंगे तो उसके द्वार (उनके लिए) खोल दिए जाएँगे और उसके दारोगे उनसे पूछेंगे कि क्या तुम्हारे पास तुम्ही लोगों में से पैग़ंबर नहीं आए थे जो तुम्हारे प्रभु की आयतें तुम्हें सुनाते और तुम्हारे इस दिन के मिलने से तुम्हें डराते थे? वे उत्तर देंगे: हाँ, आए तो थे, परंतु दण्ड की बात नकारने वालों पर पूरी हो कर रही। कहा जाएगा: नरक के द्वारों में प्रवेश हो जाओ, उसमें सदा रहने के लिए। अतः अहंकार करने वालों का यह कैसा बुरा ठिकाना है!

وَسِيقَ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ رَبَّهُمْ إِلَى ٱلْجَنَّةِ زُمَرًا ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُوهَا وَفُتِحَتْ أَبْوَٰبُهَا وَقَالَ لَهُمْ خَزَنَتُهَا سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمْ طِبْتُمْ فَٱدْخُلُوهَا خَـٰلِدِينَ ﴿73﴾ وَقَالُوا۟ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى صَدَقَنَا وَعْدَهُۥ وَأَوْرَثَنَا ٱلْأَرْضَ نَتَبَوَّأُ مِنَ ٱلْجَنَّةِ حَيْثُ نَشَآءُ ۖ فَنِعْمَ أَجْرُ ٱلْعَـٰمِلِينَ ﴿74﴾

इसके विपरीत जो लोग अपने प्रभु से डरते रहे, वे समूहों में स्वर्ग की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब उसके पास पहुंचेंगे और उसके द्वार (उनके लिए) खोल दिए जाएँगे और उसके द्वारपाल उनसे कहेंगे कि तुम पर शांति हो, खुश रहो और इसमें सदा के लिए प्रवेश हो जाओ, और वे उनके उत्तर में कहेंगे कि आभार है उस परमेश्वर का जिसने हमारे साथ अपना वचन पूरा कर दिखाया और हमको इस धरती का उत्तराधिकारी बना दिया, अब हम स्वर्ग में, जहाँ चाहें, ठहरें, तो यह बदला होगा उनका। अतः कर्म करने वालों का यह कैसा अच्छा बदला है।

وَتَرَى ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ حَآفِّينَ مِنْ حَوْلِ ٱلْعَرْشِ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ ۖ وَقُضِىَ بَيْنَهُم بِٱلْحَقِّ وَقِيلَ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿75﴾

(उस दिन, जब धरती अपने प्रभु के प्रकाश से प्रकाशित होगी) और तुम फ़रिश्तों को देखोगे कि ईश्वरीय सिंहासन के सब ओर घेरा बनाए हुए अपने प्रभु की स्तुति के साथ उसका गुणगान कर रहे हैं। उस दिन लोगों के बीच ठीक-ठीक निर्णय कर दिया जाएगा और (सब ओर से) आवाज़ ऊंची होगी कि आभार के योग्य परमेश्वर है, समस्त लोकों का प्रभु!