सूरह 9
अत्-तौबह्
मदनी · 129 आयतें · 41 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
परमेश्वर और उसके रसूल की ओर से उन मुश्रिकों के लिए संबंध तोड़ने की घोषणा है जिनसे तुम लोगों ने समझौते किए थे। इसलिए, (हे अरब के मुश्रिको), अब देश में चार महीने और चल फिर लो और जान लो कि तुम परमेश्वर को परास्त नहीं कर सकते और यह भी कि परमेश्वर (अपने पैग़ंबर को) नकारने वालों को अपमानित कर के रहेगा। (फिर हज्ज का अवसर आए तो इस भूभाग के) सब लोगों तक पहुंचाने के लिए बड़े हज्ज के दिन परमेश्वर और उसके रसूल की ओर से सार्वजनिक घोषणा भी कर दी जाए कि परमेश्वर मुश्रिकों के प्रति दायित्व से विमुक्त है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम लोग प्रायश्चित कर लो तो तुम्हारे लिए अच्छा है और यदि मुँह फेरोगे तो जान लो कि तुम परमेश्वर से भाग नहीं सकते। (हे पैग़ंबर), इन नकारने वालों को कष्टदायक यातना की शुभ सूचना सुना दो। अपितु, वे मुश्रिक दायित्व से मुक्ति की इस घोषणा से अलग हैं जिनसे तुमने संधि की, फिर उसको पूरा करने में उन्होंने तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता की है। इसलिए उनकी संधि उनसे उनकी अवधि तक पूरी करो, इसलिए कि परमेश्वर उन लोगों से प्रेम करता है जो वचन तोड़ने से बचने वाले हों। (बड़े हज्ज के दिन) इस (घोषणा) के बाद जब प्रतिष्ठित महीने बीत जाएँ तो इन मुश्रिकों को जहाँ पाओ, इनकी हत्या करो और इस उद्देश्य के लिए इनको पकड़ो, इनको घेरो और हर घात की जगह इनकी ताक में बैठो। फिर यदि ये प्रायश्चित करें और नमाज़ का प्रबंध करें और ज़कात दें तो इन्हें जाने दो। निस्संदेह परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और यदि (ढील की इस अवधि में) इन मुश्रिकों में से कोई व्यक्ति तुमसे शरण चाहे (कि वे तुम्हारा संदेश सुनना चाहता है) तो उसको शरण दे दो, यहाँ तक कि वह परमेश्वर की वाणी सुन ले। फिर उसको उसके सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दो। यह इसलिए कि ये ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की बातों को बहुत कुछ नहीं जानते।12
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- इस सूरह के शुरू में ‘बिस्मिल्लाह् अर्-रहमान अर्-रहीम’ नहीं लिखी जाती। इसका कारण यह है कि इसमें उस ईश्वरीय दण्ड की घोषणा की गई है जो परमेश्वर के इत्माम-ए-हुज्जत के क़ानून (अर्थात सत्य का निर्णायक रूप से संचार होने से संबन्धित विधान) के अनुसार पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के नकारने वालों पर अवतरित किया गया। अतः सूरह का आरंभ जिन शब्दों से हुआ है, उनके साथ बिलकुल अनुचित था कि परमेश्वर की दया और कृपा की बात की जाए। ↩
- अर्थात हज्ज के बाद ज़ुल-हिज्जा और मुहर्रम के जो लगभग पचास दिन बाक़ी होंगे, वे बीत जाएँ। इन दिनों के लिए ये शब्द ठीक उसी प्रकार अपनाए गए हैं, जैसे हम अपनी भाषा में कभी-कभी नवंबर या दिसंबर के महीनों में कहते हैं कि "यह वर्ष बीत जाए तो अमुक काम किया जाएगा।" ↩
परमेश्वर और उसके रसूल के यहाँ इन मुश्रिकों के साथ कोई सम्झौता किस प्रकार बाक़ी रह सकता है? हाँ जिन लोगों से तुमने मस्जिद-ए-हराम के पास (हुदैबिया में) समझौता किया था, अतः जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तुम भी उनके साथ सीधे रहो, इसलिए कि परमेश्वर उन लोगों से प्रेम करता है जो समझौता तोड़ने से बचने वाले हैं — किस प्रकार बाक़ी रह सकता है, जबकि हाल यह है कि यदि वे तुम पर कहीं हावी हो जाएं तो न तुम्हारे बारे में किसी रिश्तेदारी का ध्यान रखें, न किसी समझौते का? अपने मुँह की बातों से वे तुम्हें मनाना चाहते हैं, परंतु उनके दिल नकार रहे हैं और उनमें से अधिकांश वचन तोड़ने वाले हैं। परमेश्वर की आयतों के बदले में उन्होंने थोड़ी धनराशि स्वीकार कर ली, फिर उसके मार्ग से रुक गए हैं। निस्संदेह बहुत बुरा है जो कुछ ये कर रहे हैं। किसी मुसलमान के बारे में उन्हें किसी रिश्तेदारी का ध्यान है, न वचन का और वही अतिक्रमण करने वाले हैं। अतः यदि प्रायश्चित कर लें और नमाज़ का प्रबंध करें और ज़कात का भुगतान करें तो तुम्हारे धार्मिक भाई हैं। हम उन लोगों के लिए अपनी आयतों की व्याख्या किए दे रहे हैं जो जानना चाहते हों। और उस समझौते के बाद भी जो उन्होंने कर रखा है, यदि वे अपने वचन तोड़ डालें और तुम्हारे धर्म में दोष लगाएं तो कुफ़्र के इन नेताओं से भी लड़ो। इनके वचन कुछ नहीं, (ये आज नहीं तो कल अपना वचन तोड़ देंगे), इसलिए लड़ो ताकि ये इस कुफ़्र और शिर्क से रुक जाएं।
(हे मानने वालो), क्या अब भी उन लोगों से नहीं लड़ोगे जिन्होंने अपने वचन तोड़ दिए हैं और (इससे पहले) रसूल को (उसके निवास स्थान से) निकालने का दुस्साहस भी कर चुके हैं और वही हैं जिन्होंने तुमसे युद्ध छेड़ने में पहल की है। क्या तुम उनसे डरते हो? तो परमेश्वर ज़्यादा अधिकारी है कि तुम उस से डरो, यदि तुम वस्तुतः मानने वाले हो। उनसे लड़ो, परमेश्वर तुम्हारे हाथों से उनको दंडित करेगा और उन्हें अपमानित करेगा और तुम्हें अपनी सहायता से उनपर विजय प्रदान करेगा और मानने वालों के एक समूह के कलेजे (इससे) ठंडे करेगा और उनके दिलों का दुख व आक्रोश दूर करेगा और (इन नकारने वालों में से) जिनको चाहेगा, परमेश्वर अपनी कृपा से प्रायश्चित का सौभाग्य भी देगा। परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।1
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- यह सूरह उन कुछ अंशों का संग्रह है जो पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के संघर्ष के विभिन्न चरणों में नकारने वालों पर आने वाले दंड के संदर्भ में उतरे थे, और उन्हीं चरणों के क्रम के अनुसार इस अध्याय में संकलित कर दिए गए। इनमें से पहला भाग आयत 12 पर समाप्त हो गया है। यहाँ से दूसरा भाग शुरू होता है। ↩
क्या तुमने समझ रखा है कि यूं ही छोड़ दिए जाओगे, हालांकि परमेश्वर ने उन लोगों को अभी जाना ही नहीं जिन्होंने तुम में से जिहाद किया और परमेश्वर और उसके रसूल और उनके मानने वालों के अतिरिक्त किसी को मित्र नहीं बनाया? (याद रखो), जो कुछ तुम कर रहे हो, परमेश्वर उसे भलीभांति जानता है। (तुम इन्हें बैतुल्लाह का रख-रखाव करने वाले समझते और इसी आधार पर उनसे सहानुभूति रखते हो? सत्य यह है कि) इन मुश्रिकों को यह अधिकार नहीं पहुंचता कि परमेश्वर की मस्जिदों की व्यवस्था चलाएं, यद्यपि वे स्वयं अपने ऊपर कुफ़्र के साक्षी हैं। वही हैं कि उनके सारे कर्म नष्ट हो गए और वे सदा नरक में रहने वाले हैं। परमेश्वर की मस्जिदों की व्यवस्था चलाने वाले तो वही लोग हो सकते हैं जो परमेश्वर और परलोक को मानते हों, नमाज़ का प्रबंध करते हों, ज़कात देते हों और परमेश्वर के अतिरिक्त किसी से न डरते हों। इसलिए आशा है कि यही लोग उचित मार्ग पाएंगे। क्या तुमने हाजियों के पानी पिलाने और मस्जिद-ए-हराम की सेवा करने को उन लोगों के बराबर कर दिया है जिन्होंने परमेश्वर और परलोक को माना और जिन्होंने परमेश्वर के मार्ग में जिहाद किया है? परमेश्वर के यहाँ ये दोनों बराबर नहीं हो सकते? सत्य यह है कि (मस्जिद-ए-हराम के इन सेवकों ने अपने ऊपर अत्याचार किया है और अब) परमेश्वर इन अत्याचारी लोगों का मार्गदर्शन नहीं करेगा। परमेश्वर के यहाँ उन लोगों का स्तर ऊँचा है जिन्होंने माना और जिन्होंने प्रवास किया और अपने प्राण तथा संपत्ति से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद किया और वही सफल होंगे। उनका प्रभु उन्हें अपनी कृपा और प्रसन्नता और ऐसी बाग़ों की शुभ सूचना देता है जिनमें उनके लिए अनंत सुख है। वे उनमें सदा-सदा रहेंगे। इसमें संदेह नहीं कि महान प्रतिफल परमेश्वर ही के पास है।
हे मानने वालो, अपने पिताओं और भाइयों को भी अपना मित्र न बनाओ, यदि वे ईमान के विरुद्ध कुफ़्र को प्रिय रखें। तुम में से जो लोग उन्हें मित्र बनाएंगे, वही (अपने ऊपर) अत्याचार करने वाले होंगे। इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर) कि यदि तुम्हारे पिता और तुम्हारे पुत्र; तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नियां, तुम्हारा परिवार और तुम्हारा वह धन जो तुमने कमाया है और वह व्यापार जिसके मंद होने से तुम डरते हो और तुम्हारे वे घर जिनसे तुम प्रेम करते हो, ये सब तुम्हें परमेश्वर से, उसके रसूल से और उसके मार्ग में जिहाद से अधिक प्रिय हैं तो प्रतीक्षा करो, यहाँ तक कि परमेश्वर अपना निर्णय जारी कर दे। और (जान लो कि) इस प्रकार के वचन तोड़ने वाले लोगों का परमेश्वर मार्गदर्शन नहीं करेगा। सत्य यह है कि परमेश्वर ने बहुत से अवसरों पर तुम्हारी सहायता की है। अभी हुनैन के दिन भी, जब तुम अपनी विशाल संख्या पर इतरा रहे थे। फिर वह तुम्हारे कुछ काम न आई और धरती अपने पूरे फैलाव के होते हुए भी तुम पर छोटी हो गई, फिर तुम पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए। अंत में परमेश्वर ने अपने रसूल पर और उसके मानने वालों पर अपनी शांति उतारी और (उनकी सहायता के लिए) ऐसी सेनाएं उतार दीं जिन्हें तुमने नहीं देखा और उन लोगों को दंडित किया जो (पैग़ंबर के) नकारने वाले हैं, और इस प्रकार के नकारने वालों का यही दण्ड है। फिर इसके बाद परमेश्वर, जिस पर चाहे, कृपा करता और उसे प्रायश्चित करने का सौभाग्य भी देता है। परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।1
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- यहाँ से तीसरा भाग शुरू होता है। इसके विषयों से स्पष्ट है कि यह 9 हिजरी में उस समय उतरा था जब पूरे अरब के लोगों से संबंध तोड़ने (बराअत) की घोषणा की जा चुकी थी। ↩
हे मानने वालो, ये मुश्रिक पूर्णतः अशुद्ध हैं, इसलिए अपने इस साल के बाद ये मस्जिद-ए-हराम के पास न फटकने पाएं और (इसके परिणामस्वरुप) यदि तुम्हें ग़रीबी की आशंका है तो (संतुष्ट रहो), परमेश्वर चाहेगा तो शीघ्र ही अपने अनुग्रह से तुम्हें समृद्ध कर देगा। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।1
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- यह आदेश उन मुश्रिकों (अर्थात परमेश्वर के साझीदार ठहराने वालों) के लिए था जिनके सामने उनके शिर्क (अर्थात परमेश्वर के साझीदार ठहराने) की गंदगी को निर्णायक रूप से स्पष्ट कर दिया गया था। इसका उन लोगों से कोई संबंध नहीं है जो उनके बाद अब तौहीद (अर्थात परमेश्वर के एक और अद्वितीय होने की मान्यता) के इस केंद्र को देखने और इसके संदेश को समझने के लिए वहाँ जाना चाहते हों। ↩
(इन मुश्रिकों के अतिरिक्त) उन अहल-ए-किताब से भी लड़ो जो न परमेश्वर और अंतिम दिन पर विश्वास रखते हैं, न परमेश्वर और उसके रसूल के अवैध किए हुए को अवैध बताते हैं और न सत्य धर्म को अपना धर्म बनाते हैं, (उनसे लड़ो), यहाँ तक कि अपने हाथों से जिज़्या दें और अधीनस्थ बन कर रहें।
(उनका धर्म अब यही है कि) यहूदी कहते हैं कि उज़ैर परमेश्वर के पुत्र हैं और ईसाई कहते हैं कि ईसा मसीह परमेश्वर के पुत्र हैं। ये उनके अपने मुँह की बातें हैं। वे उन्हीं नकारने वालों के जैसी बात कह रहे हैं जो उनसे पहले चल बसे हैं। उनपर परमेश्वर का अभिशाप, वे कहां से फिरे जाते हैं। परमेश्वर को छोड़ उन्होंने अपने धर्माचार्यों और संतों को उपास्य बना डाला है और मर्यम पुत्र ईसा मसीह को भी। यद्यपि उन्हें एक ही उपास्य की उपासना का आदेश दिया गया था, उसके अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं, वह विशुद्ध है उन चीज़ों से जिन्हें वे सहभागी बनाते हैं। चाहते हैं कि परमेश्वर के इस प्रकाश को अपने मुँह की फूँकों से बुझा दें और परमेश्वर ने निर्णय कर रखा है कि वह अपने प्रकाश को पूरा करके रहेगा, चाहे इन नकारने वालों को यह कितना ही बुरा हो। वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्य धर्म के साथ भेजा है ताकि (इस भूभाग के) सभी धर्मों पर उसे प्रभावी कर दे, चाहे मुश्रिक लोग भी इसे कितना ही बुरा मानें।
हे मानने वालो, इन धर्माचार्यों और संतों में कई ऐसे हैं जो लोगों का धन अनैतिक रूपों से खाते और परमेश्वर के मार्ग से रोकते हैं। तो उन लोगों को कष्टदायक यातना की शुभ सूचना दो जो (इनमें से) सोना और चांदी ढेर कर रहे हैं और उसे परमेश्वर के मार्ग में दान नहीं करते। उस दिन जब उनके इस सोने और चांदी पर नरक में आग सुलगाई जाएगी, फिर उनके माथे और उनके पहलू और उनके पृष्ठ भाग उससे दाग़े जाएँगे — यही है जिसको तुमने अपने लिए एकत्रित कर रखा था, तो चखो उसको जो तुम इकट्ठा करते रहे हो।
(हे मानने वालो, तुम इनसे लड़ो और याद रखो कि) परमेश्वर के यहाँ, जिस दिन से उसने धरती और समस्त आकाशों को पैदा किया है, महीनों की संख्या परमेश्वर के विधान में बारह ही है जिनमें चार महीने प्रतिष्ठित हैं। यही सीधा धर्म है, इसलिए इन चार महीनों में (किसी के विरुद्ध कार्यवाही से) अपने प्राण पर कोई अत्याचार न कर बैठो और मुश्रिकों से, (विशेषतः) सब मिलकर लड़ो, जिस प्रकार वे सब मिलकर तुमसे लड़ते हैं और जान लो कि परमेश्वर उनके साथ है जो अत्याचार करने से बचने वाले हों। (सत्य यह है कि) महीनों का हटा देना इनके कुफ़्र ही में एक बढ़ोतरी है जिससे ये नकारने वाले पथभ्रष्टता में डाले जाते हैं। किसी साल ये प्रतिष्ठित महीने को वैध कर लेते हैं और किसी साल उसको अवैध बनाते हैं ताकि परमेश्वर के अवैध किए हुए महीनों की गिनती पूरी करके परमेश्वर के अवैध किए हुए को (अपने लिए) वैध बना लें। इनके बुरे कर्म इनके लिए लुभावने बना दिए गए हैं। परमेश्वर का निर्णय है कि इस प्रकार के नकारने वाले लोगों का वह मार्गदर्शन नहीं करेगा।1
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- र्थात सीधा मार्ग और पूरी तरह सत्य धर्म है। ↩
हे मानने वालो, तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि परमेश्वर के मार्ग में (जिहाद के लिए) निकलो तो धरती पर ढेर हुए जाते हो? क्या तुम परलोक की तुलना में दुनिया के जीवन पर संतुष्ट हो गए हो? अतः (सत्य यह है कि) दुनिया के जीवन की यह सामग्री तो परलोक में बहुत थोड़ी निकलेगी? (इसलिए उठो), यदि नहीं उठोगे तो (याद रखो कि) परमेश्वर तुम्हें कष्टदायक दण्ड देगा और तुम्हारे स्थान पर किसी अन्य समूह को ले आएगा और तुम परमेश्वर का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकोगे। परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। यदि तुम पैग़ंबर की सहायता नहीं करोगे तो कोई परवाह नहीं, इसलिए कि उसकी सहायता तो परमेश्वर ने उस समय की, जब इन्हीं नकारने वालों ने उसको इस प्रकार निकाला था कि वह केवल दो में दूसरा था, जब वे दोनों गुफ़ा में थे, जब वह अपने साथी से कह रहा था कि दुखी न हो, परमेश्वर हमारे साथ है। परमेश्वर ने उस समय उस पर अपनी शांति उतारी और ऐसी सेनाओं से उसकी सहायता की जो तुम्हें दिखाई नहीं दिए और नकारने वालों की बात उसने नीची करदी और परमेश्वर की बात ही ऊंची रही। परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।1
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- यह चौथा भाग है और 9 हिजरी में किसी समय अवतरित हुआ है, जब पैग़ंबर मुहम्मद (स.) तबूक के युद्ध की तैयारी कर रहे थे। ↩
तुम निकलो, चाहे तुम हल्के हो या बोझल, और अपने प्राण और धन से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद करो। यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम जानो। (हे पैग़ंबर), यदि लाभ निकट और यात्रा हल्की होती तो ये लोग अवश्य तुम्हारे पीछे हो लेते, परंतु यह पड़ाव इन पर कठिन हो गया। अब ये परमेश्वर की क़समें खाएंगे कि यदि हम निकल सकते तो अवश्य तुम्हारे साथ निकलते। ये अपने आप को बर्बादी में डाल रहे हैं और परमेश्वर जानता है कि ये पूरे झूठे हैं।
परमेश्वर तुम्हें क्षमा करे, (हे पैग़ंबर), तुमने इस यात्रा से इन्हें पीछे रहने क्यों दे दिया? तुम्हें चाहिए था कि ऐसा न करते, यहाँ तक कि तुम पर स्पष्ट हो जाता कि कौन सच्चे हैं और झूठों को भी तुम जान लेते। जो लोग परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर सच्चा विश्वास रखते हैं, वे कभी तुमसे पीछे रहने की अनुमति मांगने नहीं आएंगे कि उन्हें अपने प्राण और धन के साथ जिहाद से अलग रखा जाए। परमेश्वर उन्हें भलीभांति जानता है (जिनकी मजबूरी वास्तविक है और) जो उससे डरने वाले हैं। तुमसे अनुमति मांगने तो वही आते हैं जो परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास नहीं रखते और जिनके दिल शंका में पड़े हुए हैं, इसलिए अपनी इसी शंका में अचंभित भटक रहे हैं। यदि वे निकलना चाहते तो अवश्य उसका कुछ प्रबंध करते, परंतु परमेश्वर को उनका उठना अच्छा नहीं लगा, इसलिए उन्हें रोक कर बिठा दिया और कह दिया गया कि बैठने वालों के साथ बैठे रहो।
(सत्य यह है कि) यदि ये लोग तुम्हारे अंदर सम्मिलित होकर निकलते तो तुम्हारे लिए बरबादी ही को बढ़ाने का कारण बनते और तुम्हारे बीच इनकी सारी दौड़-धूप लोगों को भड़का कर आपस में लड़ा देने के लिए होती, इसलिए कि तुम्हारे भीतर ऐसे भी हैं जो कान लगाकर इनकी सुन लेते हैं। परमेश्वर इन अत्याचारियों को भलीभांति जानता है। उन्होंने पहले भी लोगों को भड़का कर आपस में लड़ाने का प्रयास किया है और तुम्हारे लिए मामलों का उलटफेर करते रहे हैं, यहाँ तक की इनकी मनोकामना के विरुद्ध सत्य आया और परमेश्वर का निर्देश प्रकट हो गया।
इनमें ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि मुझे अनुमति दीजिए और मुझको परीक्षा में न डालिए — सुन लो, ये परीक्षा में पड़ चुके और (अब) नरक इन नकारने वालों को घेरे हुए है। यदि तुम्हारा कुछ भला होता है तो इन्हें दुख होता है और तुम पर कोई संकट आता है तो कहते हैं कि (अच्छा हुआ), हमने पहले ही अपना बचाव कर लिया था और आनंदित लौटते हैं। इन्हें बता दो कि हमें वही चीज़ पहुंचेगी जो परमेश्वर ने हमारे लिए लिख रखी है। वह हमारा संरक्षक है और मानने वालों को परमेश्वर ही पर भरोसा करना चाहिए। इनसे कह दो कि तुम हमारे मामले में जिस चीज़ की प्रतीक्षा में हो, वह इसके अतिरिक्त क्या है कि दो भलाइयों में से एक भलाई है। परंतु हम तुम्हारे बारे में जिस चीज़ की प्रतीक्षा में हैं, वह यह है कि परमेश्वर तुम पर अपने पास से दण्ड भेजेगा या हमारे हाथों से। इसलिए प्रतीक्षा करो, हम भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वालों में हैं।1
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- अर्थात जिस यात्रा के लिए निकल रहे हैं, उसमें सफलता मिले या असफलता—ये दोनों हमारे लिए भलाई के ही रूप हैं। पहली स्थिति में हम परमेश्वर का आभार व्यक्त करेंगे और दूसरी स्थिति में धैर्य तथा साहस के साथ और पश्चाताप की भावना से अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास करेंगे। ↩
(अपने ढोंग को छिपाने के लिए ये कुछ न कुछ दान करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं), इनसे कह दो, तुम अपना धन स्वेच्छा से ख़र्च करो या अनिच्छापूर्वक, वह तुमसे कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा, इसलिए कि तुम वचन तोड़ने वाले लोग हो। इनका दान स्वीकार करने योग्य नहीं है तो इसका कारण इसके अतिरिक्त कुछ नहीं इन्होंने परमेश्वर से और उसके रसूल से कुफ़्र किया और नमाज़ के लिए आते हैं तो मारे बांधे आते हैं और दान करते हैं तो पूरे मन से दान नहीं करते हैं। इसलिए इनकी संपत्ति और संतान को कोई महत्व न दो, परमेश्वर तो अब यही चाहता है कि इनके माध्यम से इन्हें दुनिया के जीवन में दण्ड दे और इनके प्राण इस दशा में निकलें कि ये काफ़िर हों।
यह परमेश्वर की शपथ खा-खा कर तसल्ली दिलाते हैं कि तुम में से हैं, जबकि ये तुम में से नहीं है, अपितु ऐसे लोग हैं जो डरते हैं। यदि ये कोई ठिकाना, कोई गुफ़ा या कोई घुस बैठने की जगह पा लेते तो रस्सी तुड़ा कर उधर भाग खड़े होते।
इनमें ऐसे भी हैं, (हे पैग़ंबर), जो दान (के विभाजन) के विषय में तुम पर दोष लगाते हैं। (ये वे लोग हैं जिन्हें लालच ने तुम्हारे साथ बांध रखा है)। इसलिए यदि उस धन में से इन्हें दिया जाए तो संतुष्ट रहते हैं और उसमें से न दिया जाए तो तुरंत बुरा मान जाते हैं। इनके लिए कहीं अच्छा होता, यदि ये उस पर संतुष्ट रहते जो परमेश्वर और उसके रसूल ने इन्हें दिया था और कहते कि हमारे लिए परमेश्वर पर्याप्त है, परमेश्वर आगे अपने उपकार से हमको बहुत कुछ देगा और उसका रसूल भी, हमें तो परमेश्वर चाहिए। (इन्हें बता दो कि) दान तो वास्तव में ग़रीबों और असहाय लोगों के लिए है और उनके लिए जो उनकी व्यवस्था पर नियुक्त हों, और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना अपेक्षित हो। और इसलिए कि ग़ुलामों की मुक्ति में और आर्थिक रूप से क्षतिग्रस्त व्यक्तियों को संभालने में और परमेश्वर के मार्ग में और यात्रियों के कल्याण में दिया जाए। यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित कर्तव्य है और परमेश्वर ज्ञानी और प्रज्ञावान है।
इन्हीं में वे लोग भी हैं, जो (अपनी बातों से) पैग़ंबर को दुख देते हैं और कहते हैं कि यह व्यक्ति जो सुनता है उस पर विश्वास कर लेता है। कह दो, वह तुम्हारी भलाई के लिए सुनता है। वह परमेश्वर को मानता है, मानने वालों पर भरोसा करता है और उनके लिए सर्वथा दया है जिन्होंने तुम में से पूरी सच्चाई के साथ माना है। (सुन लो), जो परमेश्वर के रसूल को दुख दे रहे हैं, उनके लिए कष्टदायक दण्ड है। वे तुम्हारे सामने परमेश्वर की कसमें खाते हैं कि तुम्हें मना लें, हालांकि यदि वे मोमिन हैं तो परमेश्वर और उसका रसूल ज़्यादा अधिकारी हैं कि वे उसको मना लें। क्या वे नहीं जानते कि जो परमेश्वर और उसके रसूल का विरोध करेगा तो क्या नहीं जानते कि उसके लिए नरक की आग है, जिसमें वह सदा रहेगा? यह बहुत बड़ा अपमान है।
ये ढोंगी डरते हैं कि कहीं उनपर कोई ऐसी सूरह न उतार दी जाए जो उनके दिलों के भेद उनपर खोल दे। इनसे कहो, (कुछ देर और) मज़ाक़ उड़ा लो, परमेश्वर उस चीज़ को खोल कर रहेगा जिससे तुम डरते हो। (इनके इस आचरण के बारे में) यदि इनसे पूछोगे तो कह देंगे कि हम तो केवल यूं ही कुछ बातें और दिल्लगी कर रहे थे। इनसे कहो, क्या तुम परमेश्वर से, उसकी आयतों से और उसके रसूल से हंसी दिल्लगी कर रहे थे? बातें न बनाओ, तुमने ईमान के बाद कुफ़्र किया है। यदि हम तुम्हारे किसी दल को अनदेखा भी कर लेंगे तो दूसरे को अवश्य (इसी दुनिया में) दण्ड देंगे, इसलिए कि वे वस्तुतः अपराधी हैं।
ढोंगी पुरुष और ढोंगी महिलाएं, सब एक ही प्रकार के लोग हैं। ये बुराई का उपदेश करते, भलाई से रोकते और अपने हाथ (हर अच्छाई के लिए) बंद रखते हैं। ये परमेश्वर को भूल गए तो परमेश्वर ने भी इन्हें भुला दिया। सत्य यह है कि यही ढोंगी हैं जो बड़े वचन तोड़ने वाले हैं। इन ढोंगी पुरुषों और ढोंगी स्त्रियों और खुलेआम नकारने वालों के लिए परमेश्वर की ओर से नरक की आग की धमकी है, जिसमें ये सदा रहेंगे। इनके लिए यही पर्याप्त है। इन पर परमेश्वर का अभिशाप है और इनके लिए नित्य यातना है। (मानने का झूठा दावा करने वालो), उन्हीं लोगों के समान जो तुमसे पहले चल बसे। वे तुमसे अधिक बलवान और संपत्ति व संतान की संख्या में तुमसे बढ़े हुए थे। अतः उन्होंने अपने हिस्से से लाभ उठाया और तुमने अपने हिस्से से लाभ उठा लिया, इसी प्रकार जैसे तुमसे पूर्व के लोगों ने अपने हिस्से से लाभ उठाया था और तुमने वही वाद-विवाद किए, जिस प्रकार उन्होंने किए थे। यही वे लोग हैं जिनके कर्म इस लोक और परलोक में बर्बाद हो गए और यही असफल होने वाले हैं। क्या इन्हें उन लोगों की सूचना नहीं मिली जो इनसे पहले चल बसे — नूह की क़ौम, आद व समूद, इब्राहीम की क़ौम, मद्यन वालों और उन बस्तियों की सूचना, जिन्हें उलट दिया गया? उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए। तो ऐसा नहीं था कि परमेश्वर उनपर अत्याचार करता, अपितु वे स्वयं अपने प्राणों पर अत्याचार करते थे।
मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ, वे भी एक दूसरे के साथी हैं। (इन ढोंगियों के विपरीत) वे भलाई का उपदेश करते हैं और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ का प्रबंध करते हैं, ज़कात देते हैं और परमेश्वर और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। यही लोग हैं जिनपर परमेश्वर शीघ्र ही अपनी कृपा करेगा। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है। इन मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों से परमेश्वर का वचन है उन बाग़ों के लिए जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उनमें सदा रहेंगे, और नित्य बाग़ों में पवित्र भवनों के लिए। और परमेश्वर की प्रसन्नता, वह सबसे बढ़कर है। यही परम सिद्धि है।
हे पैग़ंबर, इन सब नकारने वालों और ढोंगियों से जिहाद करो और इनके लिए कठोर बन जाओ। इनका ठिकाना नरक है और वह अत्यंत बुरा ठिकाना है। ये परमेश्वर की कसमें खाते हैं कि उन्होंने वह बात नहीं कही, यद्यपि कुफ़्र की वह बात इन्होंने अवश्य कही है और इस प्रकार इस्लाम स्वीकार करने के बाद कुफ़्र के दोषी हुए हैं और इन्होंने वह चाहा है जो पा नहीं सके हैं। इनका यह द्वेष इसी बात का परिणाम है कि परमेश्वर और उसके रसूल ने अपनी कृपा से इनको समृद्ध कर दिया है। तो यदि ये अब भी प्रायश्चित कर लें तो इनके लिए अच्छा है और यदि मुँह फेरेंगे तो परमेश्वर इनको कष्टदायक दण्ड देगा, दुनिया में भी और परलोक में भी। और धरती में इनका न कोई पक्षधर होगा, न सहायक।1
टिप्पणियाँ 1
- यहाँ से पांचवां भाग शुरू होता है। इसके विषयों से स्पष्ट है कि यह तबूक की यात्रा के दौरान या वहां से वापसी की यात्रा में किसी समय उतरा था। ↩
इनमे वे भी हैं जिन्होंने परमेश्वर से वचन बांधा कि यदि उसने हमपर अपना अनुग्रह किया तो हम अवश्य दान करेंगे और बहुत सारे पुण्यकर्म करने वालों में से होंगे। परंतु जब परमेश्वर ने उनपर अपना अनुग्रह किया तो उसमें कंजूसी करने लगे और विचलित हो कर मुँह फेर लिया। तो इसका परिणाम यह हुआ कि परमेश्वर ने उस दिन तक कि उससे मिलेंगे, उनके दिलों में कपट बिठा दिया, इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर से किए हुए वचन का विरोध किया और इसलिए कि वे झूठ बोलते रहे। क्या वे नहीं जानते कि परमेश्वर उनके भेदों और उनकी कानाफूसी को जानता है और परमेश्वर हर छिपी हुई बात को भलीभांति जानने वाला है? वे जो दान के विषय में उन मुसलमानों पर कटाक्ष करते हैं जो उत्साहपूर्वक देते हैं और जिनके पास देने के लिए वही कुछ है जो वे अपनी मेहनत मज़दूरी से कमा लाते हैं तो उनका वे मज़ाक़ उड़ाते हैं। परमेश्वर इन मज़ाक़ उड़ाने वालों का मज़ाक़ उड़ाता है और इनके लिए कष्टदायक दण्ड है। तुम इनके लिए क्षमा चाहो या न चाहो। यदि तुम सत्तर बार भी इनके लिए क्षमा चाहोगे तो परमेश्वर इनको क्षमा करने वाला नहीं है। इसलिए कि इन्होंने परमेश्वर और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया है और इस प्रकार के वचन तोड़ने वाले लोगों का परमेश्वर मार्गदर्शन नहीं करता।
(तबूक की इस यात्रा में) जो लोग पीछे छोड़ दिए गए थे, वे परमेश्वर के रसूल से पीछे बैठ रहने पर अत्यंत उत्साहित हुए और उन्हें अच्छा नहीं लगा कि अपने प्राण और धन से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद करें। उन्होंने लोगों से कहा कि इस गर्मी में न निकलो। कह दो, नरक की आग इससे कहीं अधिक गर्म है। काश, वे समझते! अब वे हंसें कम और रोयें ज़्यादा, उसके बदले में जो कुछ करते रहे। तो, (हे पैग़ंबर), परमेश्वर उनमें से किसी दल की ओर यदि तुम्हें वापस ले जाए और वे तुमसे जिहाद के लिए निकलने की अनुमति मांगें तो स्पष्ट कह देना कि तुम मेरे साथ कभी नहीं निकलोगे और न मेरे साथ होकर किसी शत्रु से लड़ोगे। तुमने पहले बैठे रहने को प्राथमिकता दी तो अब भी उनके साथ बैठे रहो जो पीछे रहने वाले हैं।
और भविष्य में उनमें से जिसकी मृत्यु हो जाए, उसके जनाज़े पर कभी नमाज़ न पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर प्रार्थना के लिए खड़े होना, इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर और उसके रसूल को नकारा है और इस दशा में मरे हैं कि वचन भंजक थे। तुम उनकी संपत्ति और संतान को कोई महत्व न दो, परमेश्वर यही चाहता है कि इनके माध्यम से उन्हें दुनिया के जीवन में दंडित करे और उनके प्राण इस हालत में निकलें कि वे काफ़िर हों। जब कोई सूरह उतरती है कि परमेश्वर को मानो, जिस प्रकार उसे मानना चाहिए और उसके रसूल के साथ होकर जिहाद करो तो उनके सक्षम व्यक्ति भी तुमसे पीछे रहने की अनुमति मांगने आ खड़े होते हैं और कहते हैं कि हमें छोड़ दीजिए, हम यहाँ ठहरने वालों के साथ रह जाएँगे। उन्होंने पसंद किया कि उन स्त्रियों के साथ हों जो पीछे घरों में बैठी रहती हैं और उनके दिलों पर इसके परिणामस्वरूप मुहर कर दी गई, इसलिए कुछ नहीं समझते। परमेश्वर के रसूल ने, अपितु अपने प्राण और धन से जिहाद किया है और उन लोगों ने भी जो उसके साथ मान गए हैं, और अब वही हैं जिनके लिए (इस लोक और परलोक की) भलाइयाँ हैं और वही सफलता पाने वाले हैं। परमेश्वर ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं जिन के नीचे नहरें बहती हैं। वे उनमें सदा रहेंगे। यही परम सिद्धि है।
देहाती अरबों में से भी बहाना करने वाले आए कि उन्हें भी (पीछे रहने की) अनुमति मिल जाए और जिन्होंने परमेश्वर और उसके रसूल को (ईमान का) झोठा वचन दिया था, (इसके बिना ही घरों में) बैठे रहे। इनके नकारने वालों को शीघ्र ही एक कष्टदायक दण्ड पकड़ेगा।
अपितु, उन लोगों पर कोई पाप नहीं जो अशक्त हैं और उनपर जो बीमार हैं और उनपर भी जो दान करने के लिए कुछ नहीं पाते, जबकि वे परमेश्वर और उसके रसूल के शुभचिंतक हैं। ऐसे सदाचारियों पर कोई दोष नहीं है और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। इसी प्रकार उनपर भी कोई दोष नहीं है कि जब तुम्हारे पास आते हैं कि उनके लिए सवारी का प्रबंध कर दो, तुम कहते हो कि मैं तुम्हारे लिए सवारी का प्रबंध नहीं कर सकता तो इस प्रकार लौट जाते हैं कि उनकी आंखों से इस दुख में आंसू बह रहे होते हैं कि वे अपने ख़र्च पर जाने की क्षमता नहीं रखते। दोष तो उन लोगों पर है जो तुम से अनुमति मांगते हैं, यद्यपि वे समृद्ध हैं। वे इस पर संतुष्ट हो गए कि उनके साथ हो जाएं जो पीछे (घरों में) बैठने वाली हैं और परमेश्वर ने इसके परिणामस्वरूप उनके दिलों पर मुहर कर दी है। अब वे कुछ नहीं जानते कि किस अंत की ओर बढ़ रहे हैं?
तुम लोग (इस यात्रा से) उनकी ओर पलटोगे तो वे तुम्हारे सामने अनेक प्रकार के बहाने प्रस्तुत करेंगे। तुम स्पष्ट कह देना कि बहाने न बनाओ, हम तुम्हारी किसी बात का विश्वास नहीं करेंगे, परमेश्वर ने हमको तुम्हारी स्थिति बता दी है। अब परमेश्वर और उसका रसूल तुम्हारा आचरण देखेंगे, फिर तुम उसके सामने प्रस्तुत किए जाओगे जो खुले और छिपे का जानने वाला है और वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो। तुम्हारी वापसी पर वे तुम्हारे सामने अब परमेश्वर की कसमें खाएंगे कि तुम उन्हें जाने दो। तो उन्हें जाने ही दो, इसलिए कि वे सर्वथा गंदगी हैं और इसके बदले में जो कमाते रहे, उनका ठिकाना नरक है। अभी तुम्हारे सामने कसमें खाएंगे कि तुम उनसे प्रसन्न हो जाओ। तो यदि तुम उनसे प्रसन्न हो भी जाओ तब भी परमेश्वर प्रसन्न नहीं होगा, इसलिए कि ऐसे वचन तोड़ने वाले लोगों से परमेश्वर कभी प्रसन्न होने वाला नहीं है। ये देहाती अरब कुफ़्र और ढोंग में बहुत अधिक पक्के हैं और इसी योग्य हैं कि परमेश्वर ने अपने रसूल पर जो कुछ उतारा है, उसकी मर्यादा से अपरिचित रहें। परमेश्वर सब कुछ जानता है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।
इन देहाती अरबों में वे भी हैं जो परमेश्वर के मार्ग में दान करने को एक अर्थदंड समझते हैं और तुम्हारे लिए समय बदलने की प्रतीक्षा में हैं। बुरे दिन तो इन्हीं के लिए हैं और परमेश्वर सब कुछ सुनता और सब कुछ जानता है। और इन्हीं देहाती अरबों में वे लोग भी हैं जो परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर सच्चा विश्वास रखते हैं और जो कुछ दान करते हैं, उसको और रसूल की प्रार्थनाओं को परमेश्वर के क़रीब होने का माध्यम समझते हैं। तो इसमें संदेह नहीं कि ये दोनों उनके लिए परमेश्वर के क़रीब होने के माध्यम हैं। परमेश्वर उनको अवश्य अपनी कृपा में समाएगा। परमेश्वर अवश्य क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
मुहाजिरों और अन्सार के उन लोगों से परमेश्वर प्रसन्न हुआ और वे परमेश्वर से प्रसन्न हुए जो सबसे पहले आगे निकलने वाले हैं और वे भी जिन्होंने बहुत अच्छे ढंग से उनका अनुसरण किया है। परमेश्वर ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। वे उनमें सदा-सदा रहेंगे। यही परम सिद्धि है।
तुम्हारे आसपास जो देहाती रहते हैं, उनमें भी कई सारे ढोंगी हैं और मदीने के रहने वालों में भी। वे अपने ढोंगी आचरण में पक्के हो चुके हैं। तुम उनको नहीं जानते, हम उनको जानते हैं। उन्हें शीघ्र ही हम दो बार दण्ड देंगे। फिर वे एक भीषण यातना की ओर धकेल दिए जाएँगे।1
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- अर्थात एक बार मुसलमानों के हाथों और दूसरी बार आलम-ए-बर्ज़ख़ (मृत्यु और पुनः जीवित होने के दिन के बीच के लोक) में, जब वे इस दुनिया से विदा होंगे। ↩
(इनके अतिरिक्त) कुछ अन्य लोग भी हैं जिन्होंने अपने पापकर्मों को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने मिले-जुले कर्म किए थे, कुछ भले और कुछ बुरे। आशा है कि परमेश्वर उनपर कृपा करे, इसलिए कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। तुम उनके धन का दान स्वीकार कर लो, इससे तुम उन्हें पवित्र बनाओगे और उनका शुद्धीकरण करोगे। और उनके लिए प्रार्थना करो, इसलिए कि तुम्हारी प्रार्थना उनके लिए सुकून का कारण होगी। परमेश्वर सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है। क्या वे नहीं जानते कि परमेश्वर ही है जो अपने भक्तों का प्रायश्चित करना स्वीकार करता है और उनके दान की सराहना करता है और नहीं जानते कि परमेश्वर बहुत प्रायश्चित स्वीकार करने वाला और दया करने वाला है? और उनसे कह दो कि कर्म करो, अब परमेश्वर और उसका रसूल और उनके मानने वाले तुम्हारे कर्म को देखेंगे और तुम शीघ्र ही उसके सामने उपस्थित किए जाओगे जो सब खुले और छिपे का जानने वाला है, फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो।
इसी प्रकार कुछ दूसरे हैं जिन का मामला अभी परमेश्वर के निर्णय तक ठहरा हुआ है। वह उन्हें दंडित करेगा या उनपर कृपा करेगा और उनका प्रायश्चित स्वीकार कर लेगा। परमेश्वर सब कुछ जानता है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।
और जिन्होंने एक मस्जिद बनाई है, ताकि इस्लाम को क्षति पहुंचाएं और कुफ़्र को मज़बूत करें और मानने वालों में फूट डालें और उन लोगों के लिए एक गुप्त स्थान उपलब्ध कराएं जो इससे पहले परमेश्वर और उसके रसूल के साथ युद्ध करते रहे हैं, (वे भी आएंगे) और (आ कर) कसमें खाएंगे कि हमने तो केवल भलाई चाही थी। परंतु परमेश्वर साक्षी है कि वे पूर्णतः झूठे हैं। तुम उसमें कभी खड़े न होना, (हे पैग़ंबर)। वही मस्जिद इसकी अधिकारी है कि तुम उसमें (उपासना के लिए) खड़े हो जाओ जिसकी नींव पहले दिन से परमेश्वर की चेतना पर स्थापित की गई है। उसमें ऐसे लोग हैं जो पवित्र रहने को अच्छा समझते हैं और परमेश्वर उन्हीं से प्रेम करता है जो पवित्रता अपनाने वाले हों। फिर क्या वह व्यक्ति अच्छा है जिसने अपने भवन की नींव ईश्वर-चेतना और उसकी प्रसन्नता पर रखी हो या वह जिसने अपना भवन एक खोखली कगार के किनारे पर उठाया जो गिरने को है और उसको लेकर नरक की आग में जा गिरा? इस प्रकार के अत्याचारी लोगों का परमेश्वर कभी मार्गदर्शन नहीं करेगा। यह भवन जो उन्होंने बनाया है, सदा उनके दिलों में संशय का आधार रहेगा, सिवाय इसके कि उनके दिल ही टुकड़े हो जाएँ। परमेश्वर सब कुछ जानता है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।
सत्य यह है कि जो लोग (पैग़ंबर के हाथ में हाथ देकर वचन कर के) मान चुके हैं, उनके प्राण और धन परमेश्वर ने इस वादे पर उनसे ख़रीद लिए हैं कि उनके बदले में वह उनको स्वर्ग प्रदान करेगा। वे परमेश्वर के मार्ग में लड़ते हैं, फिर मारते हैं और मारे जाते हैं। यह एक सत्य वचन है जो परमेश्वर के ज़िम्मे है, तौरात और इंजील और क़ुरआन में। और परमेश्वर से बढ़कर कौन है जो अपने वचन को पूरा करने वाला हो? तो अपने इस सौदे पर उत्सव मनाओ जो तुमने परमेश्वर से किया है। (याद रखो), यही सबसे बड़ी सफलता है। वे प्रायश्चित करने वाले हैं, उपासना करने वाले हैं, आभार व्यक्त करने वाले हैं, (परमेश्वर के मार्ग में) यात्रा करने वाले हैं, (उसके आगे) झुकने और माथा टेकने वाले हैं, भलाई का उपदेश करने वाले हैं, बुराई से रोकने वाले हैं और परमेश्वर की मर्यादा की रक्षा करने वाले हैं। वही सच्चे मानने वाले हैं, (हे पैग़ंबर), और इन मानने वालों को शुभ सूचना दे दो।
नबी और उसके मानने वालों को शोभा नहीं देता कि (जिन) मुश्रिकों से (विमुक्ति की घोषणा हो चुकी है, उन) के लिए क्षमा की प्रार्थना करें, यद्यपि वे उनके सगे-संबंधी ही क्यों न हों, जबकि उनपर स्पष्ट हो चुका कि वे नरक के लोग हैं। इब्राहीम ने तो अपने पिता के लिए केवल उस वचन के कारण क्षमा मांगी थी जो उसने अपने पिता से कर लिया था। परंतु जब उस पर स्पष्ट हो गया कि वह परमेश्वर का शत्रु है तो उसने उस से नाता तोड़ दिया। सत्य यह है कि इब्राहीम अत्यंत कोमल दिल का व्यक्ति और सहिष्णु था। (तुम याद रखो कि) परमेश्वर की कार्यप्रणाली यह नहीं है कि वह किसी जनसमूह का मार्गदर्शन करने के बाद पुनः पथभ्रष्टता में डाल दे, जब तक कि उन्हें स्पष्ट वह बातें न बता दे जिनसे उन्हें बचना है। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर सर्वज्ञ है। परमेश्वर ही है कि धरती और समस्त आकाशों पर जिसका साम्राज्य है। वही जीवन प्रदान करता और वही मृत्यु देता है और परमेश्वर के अतिरिक्त न तुम्हारा कोई पक्षधर है और न सहायक।1
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- यह छठा और अंतिम भाग है जो पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के तबूक की यात्रा से मदीना वापस आने के बाद किसी समय उतरा था। ↩
परमेश्वर ने नबी पर और (नबी के साथी) उन मुहाजिरों और अन्सार पर कृपा-दृष्टि की जिन्होंने कठिन समय में नबी का साथ दिया, इसके बाद कि उनमें से कुछ व्यक्तियों के दिल टेढ़पन की ओर आकर्षित हो चले थे। फिर परमेश्वर ने उनपर कृपा-दृष्टि की। सत्य यह है कि वह उनपर दयावान है, बड़ी कृपा करने वाला है। इसी प्रकार उन तीनों व्यक्तियों पर कृपा-दृष्टि की जिनका मामला स्थगित किया गया था। यहाँ तक कि जब धरती अपने फैलाव के होते हुए उनपर सीमित हो गई और वे स्वयं अपने प्राणों से ऊब गए और उन्होंने समझ लिया कि परमेश्वर से परमेश्वर के अतिरिक्त कोई शरण का स्थान नहीं है, फिर परमेश्वर ने अपनी कृपा से ध्यान किया कि वे उसकी ओर पलटें। निस्संदेह परमेश्वर ही है जो अत्यंत प्रायश्चित स्वीकार करने वाला और दया करने वाला है।
हे मानने वालो, (इन त्रुटियों से बचना चाहते हो तो) परमेश्वर से डरो और सच्चे लोगों के साथ रहो। सत्य यह है कि मदीना के रहने वालों और उनके आसपास के देहातियों को शोभा नहीं देता था कि वे परमेश्वर के रसूल को छोड़कर पीछे बैठे रहें और न यह शोभा देता था कि अपने प्राण को उसके प्राण से प्रिय रखें। यह इसलिए कि जो प्यास, थकान और भूख भी उनको परमेश्वर के मार्ग में लगती है और (पैग़ंबर के) नकारने वालों को दुख पहुंचाने वाला जो कार्य भी वे करते हैं और (उसके) किसी शत्रु को जो क्षति भी पहुंचाते हैं, उन सबके बदले में एक पुण्य उनके लिए लिख दिया जाता है। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर अच्छे ढंग से कार्य करने वालों का फल बर्बाद नहीं करता। इसी प्रकार जो छोटा या बड़ा दान वे करते हैं और (सत्य के मार्ग में) जो घाटी भी तय करते हैं, सब उनके लिए लिखा जाता है ताकि परमेश्वर उनके कर्मों का अच्छे से अच्छा बदला उन्हें दे। यह तो संभव नहीं था कि मुसलमान, सब के सब निकल खड़े होते, परंतु ऐसा क्यों नहीं हुआ कि उनके प्रत्येक समूह में से कुछ लोग निकलते ताकि धर्म की गहरी समझ पैदा करते और अपने समाज के लोगों को (उनके इन रवैयों पर) सचेत करते, जब उनकी ओर लौटते, ताकि वे पमरेश्वर की पकड़ से बचते।
हे मानने वालो, (इन चेतावनियों के बाद अब निकलो और जिस प्रकार पीछे आदेश दिया गया है), अपने आसपास के नकारने वालों से युद्ध करो और चाहिए के वे तुम्हारे अंदर कठोरता पाएं, और जानते रहो कि परमेश्वर उनके साथ है जो आत्मसंयम अपनाने वाले हों। (इनपर अफ़सोस, ये कहां निकलेंगे? इनकी स्थिति तो यह है कि) जब कोई सूरह उतरती है तो इनमें से कुछ वे भी हैं जो पूछते हैं कि इसने तुम में से किसके ईमान में वृद्धि की है? तो सत्य यह है कि जो वस्तुतः मान गए हैं, उनके ईमान में तो उसने वृद्धि कर दी और वे उससे खुशियां मनाते हैं। रहे वे जिनके दिलों में कपट का रोग है तो उनकी गंदगी पर उसने एक और गंदगी बढ़ा दी और वे मृत्यु तक नकारने वाले ही रहे। क्या वे नहीं देखते कि प्रत्येक वर्ष में एक बार या दो बार वे परीक्षा में डाले जाते हैं, फिर भी न प्रायश्चित करते हैं, न स्मरण प्राप्त करते हैं? और (किसी नए अभियान की तैयारी के लिए) जब कोई सूरह उतारी जाती है तो एक दूसरे को देखते हैं कि तुम्हें कोई देखता तो नहीं, फिर निकल भागते हैं। परमेश्वर ने इनके दिल (अपने नियम अनुसार) फेर दिए हैं, इसलिए कि ये समझने वाले लोग ही नहीं हैं।
(लोगो), तुम्हारे पास स्वयं तुम में से एक रसूल आया है। तुम्हारा घाटे में पड़ना उसके लिए असहनीय है। वह तुम्हारी भलाई का अभिलाषी है। मानने वालों के लिए सर्वथा करुणा और दया है। फिर भी ये विरोध करते हैं तो, (हे पैग़ंबर), कह दो कि मेरे लिए परमेश्वर पर्याप्त है। उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं। मैंने उसी पर भरोसा किया और वह महान सिंहासन का स्वामी है।