सूरह 8
अल्-अन्फ़ाल्
मदनी · 75 आयतें · 25 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में जिस अंतिम फैसले के लिए तैयारी और मुसलमानों के शुद्धिकरण (तज़्कियह) व परिष्करण (तत्हीर) के निर्देश दिए गए हैं, दूसरी सूरह उसी फैसले के प्रकट होने का वर्णन करती है। दोनों में मुसलमानों को संबोधित किया गया है, और इनकी विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि मदीना में ये दोनों सूरतें पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जिसे 'जज़ा व सज़ा' (प्रतिफल) का चरण कह सकते हैं।
पहली सूरह— अल्-अन्फ़ाल— का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को नकारने वालों के विरुद्ध अंतिम कार्यवाही की तैयारी और इसके लिए मुसलमानों का तज़्कियह और तत्हीर है।
दूसरी सूरह— अत्-तौबा— का विषय इन्हीं नकारने वालों के लिए, चाहे वे खुले आम नकारने वाले हों या मुनाफ़िक़ (दोहरे चरित्र वाले), परमेश्वर अंतिम फ़ैसले का प्रकट होना है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
वे तुमसे युद्ध में जीती चीज़ों के बारे में पूछते हैं। इन्हें बता दो कि ये सब चीज़ें परमेश्वर और उसके रसूल की हैं। इसलिए परमेश्वर से डरो, (इस विषय में कोई झगड़ा पैदा न करो) और अपने आपस के मामलों को सुधार लो और परमेश्वर और उसके रसूल का आदेश मानो, यदि तुम मानने वाले हो। (याद रखो), मानने वाले तो वही हैं कि जब परमेश्वर का वर्णन किया जाए तो उनके दिल दहल जाते हैं और जब उसकी आयतें उन्हें सुनाई जाती हैं तो उनका ईमान बढ़ा देती हैं और वे (हर विषय में) अपने प्रभु ही पर भरोसा रखते हैं। वे जो नमाज़ का प्रबंध करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से (हमारे मार्ग में) दान करते हैं। यही सच्चे मानने वाले हैं। इनके प्रभु के पास इनके लिए पद हैं, क्षमा है और सम्मान की जीविका है।
इसी प्रकार की परिस्थिति उस समय सामने आई थी, जब तुम्हारा प्रभु तुम्हें एक उचित उद्देश्य के साथ तुम्हारे घर से निकाल लाया और मुसलमानों के एक समूह को यह अत्यंत बुरा लगा। वे इस उचित उद्देश्य के विषय में तुम से झगड़ रहे थे, इसके बाद भी कि उनपर वह अच्छे से स्पष्ट था। उनकी दशा यह थी कि जैसे आंखों देखे मृत्यु की ओर हांके जा रहे हैं। उस घड़ी को याद करो, जब परमेश्वर तुम लोगों से वचन कर रहा था कि दोनों समूहों में से एक तुम्हें मिल जाएगा। तुम चाहते थे कि तुम्हें वह मिले जो सशस्त्र नहीं है और परमेश्वर चाहता था कि अपनी बातों से सत्य को विजयी करे और नकारने वालों की जड़ काट दे। ताकि सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कर दिखाए, चाहे इन अपराधियों को वह कितना ही बुरा लगे।
याद करो, जब तुम अपने प्रभु से प्रार्थना कर रहे थे तो उसने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली और कहा कि मैं एक हज़ार फ़रिश्ते तुम्हारी सहायता के लिए भेज रहा हूं जो निरंतर पहुंचते रहेंगे। यह परमेश्वर ने केवल इसलिए किया कि तुम्हारे लिए शुभ सूचना हो और इसलिए कि तुम्हारे दिल इससे संतुष्ट हों। अन्यथा सत्य यह है कि सहायता तो परमेश्वर ही के पास से आती है। निस्संदेह परमेश्वर प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है। याद करो, जब परमेश्वर अपनी ओर से तुम्हारे चैन के लिए तुम पर नींद डाल रहा था और आकाश से तुम पर पानी बरसा रहा था कि उस के माध्यम से तुम्हें शुद्ध करे और तुमसे शैतान की गंदगी दूर करे और (तुम्हें कुछ समय के लिए सुला कर) तुम्हारे दिलों को इससे दृढ़ करे और तुम्हारे पाँव जमा दे। याद करो, जब तुम्हारा प्रभु फ़रिश्तों को वह्य कर रहा था कि मैं तुम्हारे साथ हूं तो मानने वालों के पाँव जमाए रखो। मैं इन नकारने वालों के दिलों में धाक डाले देता हूं, अतः तुम इनकी गर्दनों पर मारो और इनकी उँगलियों के हर जोड़ पर चोट लगाओ। यह इसलिए कि ये परमेश्वर और उसके रसूल से लड़ने को उठे हैं और जो परमेश्वर और उसके रसूल से लड़ने को उठते हैं, उनको ऐसा ही दण्ड मिलता है, इसलिए कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है — यह है तुम्हारा दंड। तो इसे अभी चखो और जान लो कि (आगे) नकारने वालों के लिए आग की यातना है।1
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- अर्थात् मुसलमानों की तलवारों से। ↩
हे मानने वालो, जब इन नकारने वालों से तुम्हारा सामना संगठित सैन्य कार्यवाही के रूप में हो तो इन्हें पीठ न दिखाओ। और (अच्छे से समझ लो कि) जो उस समय इनको पीठ दिखाएगा, सिवाय इसके कि युद्ध के लिए पैंतरा बदलना चाहता हो या अपनी सेना के किसी अन्य हिस्से से मिलना चाहता हो तो वह परमेश्वर का क्रोध लेकर लौटा। उसका ठिकाना नरक है और वह अत्यंत बुरा ठिकाना है। (हे मानने वालो, तुम क्यों जान चुराओ, जबकि तुम्हारी ओर से परमेश्वर लड़ता है)? तो सच्चाई यह है कि (इस युद्ध में) तुमने इनकी हत्या नहीं की, अपितु परमेश्वर ने इनकी हत्या की है और, (हे पैग़ंबर), जब तुमने इन पर (मिट्टी) फेंकी तो तुमने नहीं फेंकी, अपितु परमेश्वर ने फेंकी है, इसलिए कि नकारने वालों को अपनी बड़ाइयाँ दिखाए और इसलिए कि मुसलमानों को अपनी ओर से अच्छा बदला प्रदान करे। निस्संदेह, परमेश्वर सुनने और जानने वाला है। यह जो कुछ हुआ, तुम्हारे सामने है और इसके साथ ही यह (शुभ सूचना) भी कि परमेश्वर इन नकारने वालों की सभी योजनाएं बेकार करके रहेगा। यदि तुम निर्णय चाहते थे तो (क़ुरैश के लोगो), यह निर्णय आ गया है। यदि (अब भी) सुधर जाओ तो यह तुम्हारे लिए अच्छा है और यदि फिर यही करोगे तो हम भी यही करेंगे और तुम्हारा संगठन, चाहे कितना ही बड़ा हो, तुम्हारे कुछ काम न आएगा। और अच्छे से समझ लो कि परमेश्वर मानने वालों के साथ है।
हे मानने वालो, परमेश्वर और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो, (जिस प्रकार कि अनुपालन करना चाहिए) और रसूल (के आह्वान) से मुँह न फेरो, जबकि तुम (उसको) सुन रहे हो। तुम उन लोगों के समान न हो जाओ जो दावा करते थे कि हमने सुना, परंतु सुनते सुनाते कुछ नहीं थे। निस्संदेह परमेश्वर के सामने सबसे बुरे पशु यही बहरे गूंगे लोग हैं जो बुद्धि से काम नहीं लेते। यदि परमेश्वर इनमें कोई भलाई देखता तो अवश्य इनको सुनने का सौभाग्य देता और यदि इसके बिना सुनवा देता तो ये बेपरवाही के साथ मुँह फेर जाते।
हे मानने वालो, परमेश्वर और उसके रसूल के आह्वान को स्वीकार करो, जबकि रसूल तुम्हें उस चीज़ की ओर बुला रहा है जो तुमको जीवन प्रदान करने वाली है और जान लो कि (एक समय तक ढील देने के बाद) परमेश्वर मनुष्य और उसके दिल के बीच में आ जाता है और याद रखो कि (एक दिन) उसी की ओर समेटे जाओगे। उस दुर्घटना से बचो जो विशेष रूप से उन्हीं लोगों को चपेट में नहीं लेगा जो तुम में से अत्याचार के दोषी हुए हैं और जान लो कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है।
उस समय को याद करो, जब तुम थोड़े थे, धरती पर तुम्हें दुर्बल समझा जाता था, तुम डरते रहते थे कि लोग तुम्हें उचक न लें। फिर परमेश्वर ने तुम्हें शरण दी और अपनी सहायता से तुम्हारा समर्थन किया और तुम्हारी जीविका के लिए तुम्हें शुद्ध चीज़ें प्रदान कीं ताकि तुम आभारी रहो। हे मानने वालो, परमेश्वर और रसूल से विश्वासघात न करो, (यह अमानत में ख़यानत है) और जानबूझकर अपनी अमानतों में ख़यानत के दोषी न बनो। और जान लो कि तुम्हारे धन और तुम्हारी संतान एक परीक्षा हैं और यह भी कि महान प्रतिफल परमेश्वर ही के पास है।
हे मानने वालो, यदि तुम परमेश्वर से डरते रहे तो वह तुम्हारे लिए फ़ुर्क़ान व्यक्त करेगा और तुम्हारे पापकर्म तुमसे झाड़ देगा और तुम्हें क्षमा करेगा। सत्य यह है कि परमेश्वर बड़े अनुग्रह वाला है। उस समय को याद रखो, (हे पैग़ंबर), जब नकारने वाले तुम्हारे बारे में षड्यंत्र कर रहे थे कि तुम्हें क़ैद कर दें या तुम्हारी हत्या कर डालें या (देश से) निकाल दें। वे यह षड्यंत्र कर रहे थे और परमेश्वर भी अपनी योजना कर रहा था और परमेश्वर सबसे अच्छी योजना करने वाला है।1
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- अर्थात् वह वस्तु जो सत्य और असत्य को हर पहलू से स्पष्ट कर देगी। ↩
(ये वही लोग हैं कि) जब इनको हमारी आयतें सुनाई जाती थीं तो कहते थे कि हमने सुन लिया है, यदि हम चाहें तो हम भी ऐसी ही वाणी प्रस्तुत कर दें, यह तो वही पुराने लोगों की कहानियाँ हैं। और याद करो, जब इन्होंने कहा था कि हे परमेश्वर, यदि तेरे पास से यही सत्य (उतरा हुआ) है तो हम पर आकाश से पत्थर बरसा दे या कोई कष्टदायक यातना हम पर ले आ। परमेश्वर (उस समय तो) इनको दण्ड देने वाला नहीं था, जब कि तुम इनके बीच उपस्थित थे और न (उस समय) दण्ड देने वाला हो सकता है, जब कि यह क्षमा चाह रहे हों। परंतु अब इनमें क्या है कि परमेश्वर इन्हें दण्ड न दे, जब कि ये मस्जिद-ए-हराम से रोक रहे हैं, यद्यपि ये उसके सच्चे रखवाले भी नहीं हैं। उसके सच्चे रखवाले तो केवल परमेश्वर से डरने वाले हो सकते हैं। हाँ, परंतु इनमें से अधिकतर लोग इस बात को नहीं जानते। (ये अपनी नमाज़ों के भ्रम में न रहें)। सत्य यह है कि बैतुल्लाह के सामने इनकी नमाज़ सीटी बजाने और ताली पीटने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। लो अब चखो मेरे दण्ड का स्वाद, उस कुफ़्र के परिणामस्वरूप जो तुम करते रहे हो।
जिन लोगों ने कुफ़्र का आचरण अपना रखा है, वे अपना धन परमेश्वर के मार्ग से रोकने के लिए ख़र्च कर रहे हैं। अतः वे आगे भी ख़र्च करते रहेंगे, फिर यह उनके लिए निराशा बन जाएगी, फिर पराजित होंगे और जो इसी प्रकार नकारने वाले रहेंगे, उन सबको इकट्ठा करके नरक की ओर हांक दिया जाएगा। इसलिए कि (अपने स्वर्ग के लिए) परमेश्वर शुद्ध से अशुद्ध को अलग करे और अशुद्धता को एक दूसरे पर रखकर सब का ढेर बनाए, फिर इस ढेर को नरक में झोंक दे। (सत्य यह है कि) यही लोग असफल होने वाले हैं।
इन नकारने वालों से कह दो, (हे पैग़ंबर) कि यदि ये सुधर जाएं तो जो कुछ हो चुका है, वह इन्हें क्षमा कर दिया जाएगा। और यदि ये फिर वही करेंगे तो जान लें कि परमेश्वर की अटल कार्यप्रणाली पिछले लोगों के विषय में बीत चुकी है। (हे मानने वालो), तुम इनसे निरंतर युद्ध किए जाओ, यहाँ तक कि उत्पीड़न बाक़ी न रहे और धर्म (इस भूभाग में) सारा परमेश्वर के लिए हो जाए। तो यदि ये रुक जाएं तो जो कुछ करेंगे, परमेश्वर उसे देख रहा है। और यदि मुँह मोड़ें तो जान लो कि परमेश्वर तुम्हारा संरक्षक है। कैसा उत्तम संरक्षक है और कैसा उत्तम सहायक!1
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- युद्ध का यह उद्देश्य परमेश्वर के अंतिम रसूल, पैग़ंबर मुहम्मद (स.) और उनके साथियों के लिए, और इत्माम-ए-हुज्जत के नियम के अंतर्गत निर्धारित किया गया था। इसका बाद में आने वाले लोगों से कोई संबंध नहीं है। ↩
(तुमने पूछा था तो) जान लो कि जो कुछ युद्ध में जीता धन तुमने प्राप्त किया था, उस का पांचवा हिस्सा परमेश्वर के लिए, उसके पैग़ंबर के लिए, (पैग़ंबर के) सगे संबंधियों और अनाथों, निर्धन व्यक्तियों और यात्रियों के लिए अलग रहेगा। (यह परमेश्वर का आदेश है, इसका बिना किसी हिचकिचाहट के पालन करो), यदि तुम परमेश्वर को मानते हो और उस चीज़ को जो हमने अपने दास पर निर्णय के दिन उतारा था, जिस दिन दोनों समूहों में मुठभेड़ हुई थी, और (जान लो कि) परमेश्वर प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है।
याद करो, जब तुम घाटी के क़रीबी छोर पर थे और वे दूर के छोर पर, और काफ़िला तुमसे नीचे था। यदि तुम आपस में समय तय करके निकलते तो जो समय तय कर लेते, उसमें अवश्य आगे पीछे हो जाते। परंतु परमेश्वर ने कोई फ़र्क नहीं होने दिया, ताकि परमेश्वर उस मामले का निपटारा कर दे जिसको हो कर रहना था ताकि जिसको मरना है, वह निर्णायक प्रमाण देख कर मर जाए और जिसे जीवन प्राप्त करना है, वह निर्णायक प्रमाण देख कर जीवन प्राप्त करे। और इसमें तो कोई संदेह ही नहीं कि परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। याद करो, (हे पैग़ंबर), जब परमेश्वर तुम्हारे सपने में उनको कम दिखा रहा था। यदि वह कहीं तुमको उन्हें अधिक दिखा देता तो अवश्य तुम लोग हिम्मत हार जाते और जिस मामले का तुम्हें सामना था, उसके बारे में झगड़ने लगते, परंतु परमेश्वर ने बचा लिया। निस्संदेह, वह दिलों का हाल तक जानता है। और याद करो, जब तुम्हारी मुठभेड़ के समय वह तुम लोगों की दृष्टि में उन्हें कम कर के दिखा रहा था और तुम्हें उनकी दृष्टि में कम करके दिखा रहा था ताकि परमेश्वर उस मामले का निपटारा कर दे जिसे हो कर रहना था। सत्य यह है कि सारे मामले परमेश्वर ही की ओर लौटते हैं।
हे मानने वालो, जब (भविष्य में भी) किसी समूह से तुम्हारी लड़ाई हो तो दृढ़संकल्प रहो और परमेश्वर को बहुत याद करो ताकि तुम सफल हो। और परमेश्वर और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो और आपस में झगड़ो नहीं कि इसके परिणामस्वरूप हिम्मत हार जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी। दृढ़संकल्प रहो, इसलिए कि परमेश्वर उनके साथ है जो दृढ़संकल्प रहने वाले हों। तुम उन लोगों के जैसे न बनो जो अपने घरों से इतराते और लोगों को अपनी महिमा दिखाते हुए निकले और जिनका आचरण यह है कि परमेश्वर के मार्ग से रोकते हैं, यद्यपि जो कुछ वे कर रहे हैं, परमेश्वर उसको घेरे हुए है। याद करो, जब शैतान ने उनके कर्म उन्हें अच्छे बनाकर दिखाए और कहा कि आज लोगों में कोई नहीं जो तुम पर विजय पा सके और (संतुष्ट रहो), मैं तुम्हारे साथ हूं। परंतु जब दोनों गुटों का आमना सामना हुआ तो वह उल्टे पाँव चलता बना और कहने लगा कि मैं तुमसे अलग हूं, मैं वह कुछ देख रहा हूं जो तुम नहीं देख रहे हो, मैं परमेश्वर से डरता हूं, सत्य यह है कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है। याद करो, जब मुनाफ़िक़ीन और वे भी जिनके दिलों को रोग लगा हुआ है, (स्वयं तुम्हारे बारे में) कह रहे थे कि इनके धर्म ने इन लोगों को धोखे में डाल दिया है, यद्यपि जो परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, परमेश्वर अवश्य उनकी सहायता करता है, इसलिए कि परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।
यदि तुम देख पाते (तो देखते कि उस समय क्या बीत रही था), जब फ़रिश्ते इन नकारने वालों की रूहें ग्रहण कर रहे थे, इनके चेहरों और इनकी पीठों पर मारते हुए और यह कहते हुए कि अब चखो जलने का दंड। यह उसका बदला है जो तुमने अपने हाथों से आगे भेजा था और इसलिए है कि परमेश्वर अपने बंदों पर कुछ भी अत्याचार करने वाला नहीं है।1
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- अतः ठीक वही व्यवहार कर रहा है जिसके तुम अपने बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप अधिकारी हो चुके हो। ↩
इनके साथ वही मामला हुआ है जो फ़िरऔन के वंश और उनसे पहले के लोगों के साथ हुआ था। उन्होंने परमेश्वर की आयतों को नकार दिया तो परमेश्वर ने उनके पापकर्मों पर उन्हें पकड़ लिया। निस्संदेह, परमेश्वर शक्तिशाली है, वह कठोर दण्ड देने वाला है। यह इस कारण से हुआ कि परमेश्वर किसी उपहार को जो उसने किसी क़ौम को प्रदान किया हो, उस समय तक नहीं बदलता, जब तक वे स्वयं अपनी हालत में परिवर्तन न करें। और इस कारण से कि परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। वही हुआ है जो फ़िरऔन के वंश और उससे पहले के लोगों के साथ हुआ था। उन्होंने अपने प्रभु की निशानियों को झूठा कहा तो अंततः उनके पापकर्मों के परिणामस्वरूप हमने उन्हें नष्ट किया और फ़िरऔन के लोगों को डुबो दिया। ये सब अत्याचारी लोग थे।
अवश्य ही परमेश्वर के सामने सबसे बुरे जानवर वे लोग हैं जिन्होंने नकार दिया है, फिर किसी प्रकार मानने के लिए तैयार नहीं हैं। विशेष रूप से वे लोग जिन से, (है पैग़ंबर), तुमने वचन लिया, फिर हर बार वे अपना वचन तोड़ देते हैं और थोड़ा सा भी नहीं डरते (कि इसका परिणाम क्या होगा)। अतः इन्हें लड़ाई में पाओ तो इनको ऐसी मार मारो कि जो इनके पीछे हैं, उनको भी अस्त व्यस्त कर दो ताकि वे सबक़ सीखें। (अपितु, तुम लोग हर स्थिति में वचन का पालन करो) और यदि किसी क़ौम से विश्वासघात की आशंका हो तो उनका वचन उसी प्रकार बराबरी के साथ उनके आगे फेंक दो। सत्य यह है कि परमेश्वर वचन तोड़ने वालों से प्रेम नहीं करता।
ये नकारने वाले इस भ्रम में न रहें कि निकल भागे हैं, ये कदापि हमारे वश से बाहर नहीं जा सकते। तुम लोगों से जिस प्रकार हो सके, इनके लिए सेना और बंधे हुए घोड़े तत्पर रखो जिससे परमेश्वर के शत्रुओं पर और तुम्हारे इन शत्रुओं पर तुम्हारी धाक रहे और इनके अतिरिक्त दूसरों पर भी जिन्हें तुम नहीं जानते हो, परमेश्वर उन्हें जानता है। (इस उद्देश्य के लिए) जो कुछ तुम परमेश्वर के मार्ग में ख़र्च करोगे, वह तुम्हें पूरा कर दिया जाएगा कर और तुम्हारे लिए कोई कमी नहीं होगी।
ये लोग यदि संधि की ओर झुकें, (हे पैग़ंबर), तो तुम भी इसके लिए झुक जाओ और परमेश्वर पर भरोसा रखो। निस्संदेह, वह सुनने वाला, जानने वाला है। यदि वे तुमको धोखा भी देना चाहेंगे तो संतुष्ट रहो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए पर्याप्त है। वही है जिसने अपनी सहायता से और मानने वालों के माध्यम से तुम्हारा समर्थन किया। और मानने वालों के दिल एक दूसरे के साथ जोड़ दिए। यदि तुम धरती में जो कुछ है, सब ख़र्च कर डालते, तब भी उनके दिलों को नहीं जोड़ सकते थे, परंतु परमेश्वर ने उन्हें जोड़ दिया। निस्संदेह, परमेश्वर प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।
हे पैग़ंबर, तुम्हारे लिए परमेश्वर पर्याप्त है और यही मानने वाले पर्याप्त हैं जिन्होंने तुम्हारा अनुसरण कर लिया है। हे पैग़ंबर, इन मानने वालों को (उस) युद्ध पर उभारो (जिसका आदेश पीछे दिया गया है)। यदि तुम्हारे लोगों में बीस आदमी दृढ़संकल्प होंगे तो दो सौ आदमियों पर प्रभावी होंगे और यदि तुम्हारे सौ होंगे तो हज़ार नकारने वालों पर भारी रहेंगे, इसलिए कि ये ऐसे लोग हैं जो अंतर्दृष्टि नहीं रखते।
इस समय, अपितु परमेश्वर ने तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया है, इसलिए कि उसने जान लिया कि तुममें कुछ दुर्बलता है। अतः तुम्हारे सौ दृढ़संकल्प व्यक्ति होंगे तो दो सौ पर भारी पड़ेंगे और यदि तुम्हारे हज़ार ऐसे होंगे तो परमेश्वर के आदेश से दो हज़ार पर भारी रहेंगे। और परमेश्वर उन लोगों के साथ है जो (उसके मार्ग में) दृढ़संकल्प रहें।
(इन्हें आपत्ति है कि तुम लोगों ने यह सब रक्तपात बंधक पकड़ कर उनसे फ़िरौती लेने के लिए किया है। सत्य यह है कि) किसी पैग़ंबर को यह शोभा नहीं देता कि उसको बंधक हाथ आएँ, यहाँ तक कि (इसके लिए) वह देश में रक्तपात मचा दे। (क़ुरैश के लोगो), ये तुम हो जो दुनिया की सामग्री चाहते हो, परमेश्वर तो परलोक चाहता है और परमेश्वर प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है। यदि परमेश्वर का निर्णय पहले न लिखा जा चुका होता (कि अभी तुम्हें थोड़ी और ढील देनी है) तो जो आचरण तुमने अपनाया था, उसके कारण तुम पर एक बहुत बड़ा दण्ड उतर जाता।
अतः(मुसलमानो, तुम इनकी आपत्तियों की परवाह न करो और फ़िरौती लेकर) जो युद्ध में जीता धन तुमने प्राप्त किया है, उसको वैध और शुद्ध समझ कर खाओ और परमेश्वर से डरते रहो। निस्संदेह परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
हे पैग़ंबर, तुम्हारे अधिकार में जो बंधक हैं, उनसे कह दो कि परमेश्वर तुम्हारे दिलों में कोई भलाई देखेगा तो जो कुछ तुम से लिया गया है, उससे अच्छा तुम को प्रदान करेगा और तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा। सत्य यह है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और यदि यह तुम्हारे साथ विश्वासघात करना चाहते हैं तो इनसे इसी की अपेक्षा है, इसलिए कि इससे पहले इन्होंने परमेश्वर के साथ किया वचन तोड़ा है। फिर इसी का परिणाम था कि परमेश्वर ने तुमको इन पर नियंत्रण दे दिया और परमेश्वर सब कुछ जानता है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।
(हे मानने वालो, इस परिस्थिति में यदि कोई मुसलमान समर्थन और सहायता चाहता हो तो उससे कहो कि मदीना आ जाए। इसलिए कि) जिन लोगों ने मान लिया और प्रवास किया और परमेश्वर के मार्ग में अपने प्राण और संपत्ति से युद्ध किया है, और जिन लोगों ने (पलायन करने वालों को) शरण दी और (उनकी) सहायता की है, वही एक दूसरे के समर्थक और सहायक हैं। रहे वे लोग जो मान तो गए, परंतु प्रवास करके (मदीना) नहीं आए, तुम्हारा उनसे सहायता और समर्थन का कोई संबंध नहीं हो सकता, जब तक वे प्रवास करके न आ जाएँ। हाँ, यदि वे धर्म के विषय में तुम से सहायता मांगें तो उनकी सहायता करना तुम्हारा कर्तव्य है, परंतु किसी ऐसी क़ौम के विरुद्ध नहीं जिससे तुम्हारा सम्झौता हो। (याद रखो), जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देख रहा है। जो लोग सत्य को नकारने वाले हैं, वे एक दूसरे के सहायक और समर्थक हैं, (इसलिए हे मानने वालो), तुम अपने इन (प्रताड़ित भाइयों के लिए) यह नहीं करोगे तो देश में उत्पात और बड़ा बिगाड़ पैदा हो जाएगा। (यह बात अब तुम में से हर व्यक्ति को समझ लेनी चाहिए कि) जिन लोगों ने ईमान स्वीकार किया और प्रवास किया और परमेश्वर के मार्ग में जिहाद किया, और जिन लोगों ने प्रवास करने वालों को शरण दी और उनकी सहायता की है, वही सच्चे मानने वाले हैं। उन के लिए क्षमा और सम्मान की जीविका है। और जो इसके बाद मान गए और प्रवास किया और तुम्हारे साथ जिहाद में मिल गए, वे भी तुम ही लोगों में से हैं। अपितु, सगे संबंधी, ईश्वरीय विधान में एक-दूसरे के अधिक हक़दार हैं। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर हर चीज़ का जानने वाला है।