विषय
क़ुरैश तक सत्य का निर्णायक रूप से संचार (इत्माम-ए-हुज्जत)
मुसलमानों का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर)
और क़ुरैश और अहल-ए-किताब, दोनों के लिए
परमेश्वर के अंतिम फ़ैसले की अभिव्यक्ति का वर्णन
परिचय
यह पवित्र क़ुरआन का दूसरा अध्याय है। इसमें 'अल्-अन्आम' से 'अत्-तौबा' तक चार सूरतें हैं। इन सूरतों की विषय-वस्तु से यह मालूम होता है कि इनमें से पहली दो — 'अल्-अनआम' और 'अल्-आराफ़' — मक्का में और अंतिम दो — 'अल्-अन्फ़ाल' और 'अत्-तौबा' — हिज्रत के बाद मदीना में उतरी (नाज़िल हुई) हैं।
क़ुरआन के अन्य सभी अध्यायों की भाँति यह बात इस अध्याय में भी ध्यान में रखी गई है कि यह मक्का में उतरी हुई (मक्की) सूरतों से शुरू होता है और हिज्रत के बाद मदीना में उतरी हुई (मदनी) सूरतों पर समाप्त हो जाता है।
इसकी मक्की सूरतों में क़ुरैश और मदनी सूरतों में मुसलमान संबोधित हैं; ‘यहूदियों और ईसाइयों’ (अहल-ए-किताब) का उल्लेख यदि कहीं हुआ है, तो वह गौण रूप से हुआ है। अतः इसकी मक्की सूरतों में तर्क भी अधिकतर बुद्धि, मानव प्रकृति, और मनुष्य के भीतर और बाहर की दुनिया के प्रमाणों से है, या फिर इतिहास के साक्ष्यों और क़ुरैश के सर्वमान्य सिद्धांतों से। इसका कारण यह है कि वे उचित भी थे और क़ुरैश उन्हें स्वीकार भी करते थे।
इसका विषय क़ुरैश पर इत्माम-ए-हुज्जत, मुसलमानों का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर), और क़ुरैश तथा अहल-ए-किताब, दोनों के लिए परमेश्वर के अंतिम फ़ैसले के प्रकट होने का वर्णन है।
यह अध्याय क़ुरआन का शिखर है, जिसमें इसके आगे और पीछे के सभी अध्याय अपनी पराकाष्ठा को पहुँचते हैं और रसूलों के संदर्भ में परमेश्वर की वह अटल कार्यप्रणाली (सुन्नत) प्रकट होती है, जिसके अंतर्गत उन्हें विजय प्राप्त होती है और उनके विरोधी अनिवार्य रूप से परास्त हो जाते हैं।
यह विषय इस अध्याय में जिस क्रम के साथ प्रस्तुत हुआ है, वह यह है:
अल्-अन्आम: धर्मप्रचार (दावत) व सचेत करना (इंज़ार)।
अल्-आराफ़: इंज़ार और इत्माम-ए-हुज्जत।
अल्-अन्फ़ाल: इत्माम-ए-हुज्जत के बाद परमेश्वर के अंतिम फ़ैसले के लिए मुसलमानों का शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) और उन्हें सशस्त्र संघर्ष (जिहाद) की तैयारी के निर्देश।
अत्-तौबा: अंतिम फ़ैसले (दैनूनत) का प्रकटन।