सूरह 6

अल्-अन्आम्

मक्की · 165 आयतें · 51 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में जो तथ्य बुद्धि, मानव प्रकृति, और मनुष्य के भीतर और बाहर की दुनिया के प्रमाणों से सिद्ध किए गए हैं, दूसरी में उन्हीं को ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ और निर्णायक तर्क की शैली में साबित किया गया है। पहली सूरह में उपदेश का पहलू और दूसरी में चेतावनी (इंज़ार) का पहलू प्रमुख है। दोनों में क़ुरैश को संबोधित किया गया है और इनकी विषय-वस्तु se स्पष्ट होता है कि मक्का में ये दोनों सूरतें क्रमशः पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के 'इंज़ार-ए-आम' और 'इत्माम-ए-हुज्जत' के चरणों में अवतरित हुई हैं।12

टिप्पणियाँ 2
  1. इंज़ार-ए-आम: सार्वजनिक रूप से सचेत करना ↩
  2. इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩

पहली सूरह 'अल्-अन्आम' का विषय क़ुरैश के लिए तौहीद, रिसालत और मआद की मूल अवधारनाओं की व्याख्या, इन मुद्दों के बारे में उनकी भ्रांतियों पर उन्हें सचेत करना और उन्हें शुद्ध तौहीद को मानने का निमंत्रण देना है।123

टिप्पणियाँ 3
  1. तौहीद: परमेशर के एक और साझीदार-रहित होने की धारणा ↩
  2. रिसालत: पैग़ंबरी, अर्थात परमेश्वर के द्वारा पैग़ंबरों (संदेशवाहकों) की नियुक्ति की धारणा। विशेष अर्थों में रसूल नबियों में से एक अधिक ऊंचे पद पर नियुक्त पैग़ंबर। ↩
  3. मआद: आखिरत या परलोक, अर्थात मृत्यु के बाद के जीवन की धारणा ↩

दूसरी सूरह 'अल्-आराफ़' का विषय क़ुरैश को सचेत करना और उनके लिए इस वास्तविकता की व्याख्या है कि किसी क़ौम में रसूल की नियुक्ति के मुख्य परिणाम और उपप्रमय क्या हैं, और यदि कोई क़ौम अपने रसूल को झूठा कहने पर अड़ जाती है, तो उसे अनिवार्य रूप से इसके क्या परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَجَعَلَ ٱلظُّلُمَـٰتِ وَٱلنُّورَ ۖ ثُمَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ ﴿1﴾ هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن طِينٍ ثُمَّ قَضَىٰٓ أَجَلًا ۖ وَأَجَلٌ مُّسَمًّى عِندَهُۥ ۖ ثُمَّ أَنتُمْ تَمْتَرُونَ ﴿2﴾ وَهُوَ ٱللَّهُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَفِى ٱلْأَرْضِ ۖ يَعْلَمُ سِرَّكُمْ وَجَهْرَكُمْ وَيَعْلَمُ مَا تَكْسِبُونَ ﴿3﴾ وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ ءَايَةٍ مِّنْ ءَايَـٰتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ ﴿4﴾ فَقَدْ كَذَّبُوا۟ بِٱلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُمْ ۖ فَسَوْفَ يَأْتِيهِمْ أَنۢبَـٰٓؤُا۟ مَا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿5﴾ أَلَمْ يَرَوْا۟ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّن قَرْنٍ مَّكَّنَّـٰهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مَا لَمْ نُمَكِّن لَّكُمْ وَأَرْسَلْنَا ٱلسَّمَآءَ عَلَيْهِم مِّدْرَارًا وَجَعَلْنَا ٱلْأَنْهَـٰرَ تَجْرِى مِن تَحْتِهِمْ فَأَهْلَكْنَـٰهُم بِذُنُوبِهِمْ وَأَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قَرْنًا ءَاخَرِينَ ﴿6﴾

आभार परमेश्वर ही के लिए है जिसने धरती और समस्त आकाश बनाए, प्रकाश और अंधेरों को पैदा किया। फिर आश्चर्य है कि ये नकारने वाले अपने प्रभु के सहभागी बनाते हैं! वही है जिसने तुमको मिट्टी से पैदा किया, फिर (तुम्हारे लिए) एक अवधि निश्चित कर दी और एक अन्य अवधि भी है जो उसके यहाँ निश्चित है। आश्चर्य है कि इसके बाद भी उल्टा सीधा वाद-विवाद करते हो! वही परमेश्वर आकाशों में भी है और धरती में भी। वह तुम्हारे खुले और छिपे को जानता है और जो कमाई तुम कर रहे हो, उसे भी जानता है। लोगों का हाल यह है कि उनके पास उनके प्रभु की निशानियों में से जो निशानी भी आती है, वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं। अतः उन्होंने (इस समय भी) सत्य को झूठा कह दिया है, जबकि वह उनके पास आ गया है। इसलिए शीघ्र ही उस चीज़ की सूचनाएं उनके पास आ जाएंगी जिसका वे मज़ाक उड़ाते रहे हैं। क्या उन्होंने देखा नहीं कि उनसे पहले कितनी क़ौमों का हमने सर्वनाश कर दिया जिन्हें धरती पर हमने ऐसी सत्ता प्रदान की थी जो, (क़ुरैश के लोगो), तुम्हें प्रदान नहीं की है? उनपर हमने बहुत बारिशें बरसाई और उनके नीचे नहरें बहा दीं, परंतु (वे नकारने पर अड़े रहे तो) उनके पापकर्मों के बदले में अंततः हमने उनका सर्वनाश कर दिया और उनके बाद उनके स्थान पर अन्य क़ौमों को उठा खड़ा किया।

وَلَوْ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ كِتَـٰبًا فِى قِرْطَاسٍ فَلَمَسُوهُ بِأَيْدِيهِمْ لَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ ﴿7﴾ وَقَالُوا۟ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ مَلَكٌ ۖ وَلَوْ أَنزَلْنَا مَلَكًا لَّقُضِىَ ٱلْأَمْرُ ثُمَّ لَا يُنظَرُونَ ﴿8﴾ وَلَوْ جَعَلْنَـٰهُ مَلَكًا لَّجَعَلْنَـٰهُ رَجُلًا وَلَلَبَسْنَا عَلَيْهِم مَّا يَلْبِسُونَ ﴿9﴾ وَلَقَدِ ٱسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَحَاقَ بِٱلَّذِينَ سَخِرُوا۟ مِنْهُم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿10﴾ قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ ثُمَّ ٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ ﴿11﴾

तुम पर, (हे पैग़ंबर), यदि हम कोई ऐसा ग्रंथ उतार देते जो काग़ज़ पर लिखा हुआ होता और ये उसको अपने हाथों से छूकर देख भी लेते, तब भी ये नकारने वाले यही कहते के यह स्पष्ट जादू के अतिरिक्त कुछ नहीं है। कहते हैं कि इस नबी पर (खुलेआम) कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं उतारा गया? (ये मूर्ख नहीं समझते कि) यदि हमने कोई फ़रिश्ता उतार दिया होता तो अब तक निपटारा हो जाता, फिर इनको कोई ढील नहीं मिलती। और (नहीं समझते कि) यदि हम उसको कोई फ़रिश्ता बना कर भेजते तो उसे भी मनुष्य रूप ही में भेजते। और इस प्रकार इनको उसी संदेह में डाल देते जिसमें ये अब पड़े हुए हैं। सत्य यह है कि तुमसे पहले भी रसूलों का मज़ाक़ उड़ाया गया तो उनका मज़ाक़ उड़ाने वालों को उसी चीज़ ने घेर लिया जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते थे। इनसे कहो, धरती में कुछ चल फिर कर देख लो कि नकारने वालों का अंत क्या हुआ है।

قُل لِّمَن مَّا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ قُل لِّلَّهِ ۚ كَتَبَ عَلَىٰ نَفْسِهِ ٱلرَّحْمَةَ ۚ لَيَجْمَعَنَّكُمْ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ ۚ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿12﴾ وَلَهُۥ مَا سَكَنَ فِى ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿13﴾

इनसे पूछो, धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, वह किसका है? कह दो, परमेश्वर ही का है। उसने अपने ऊपर दया को अनिवार्य कर रखा है। वह तुम सब को इकट्ठा करके अवश्य क़यामत की ओर ले जाएगा जिसमें कोई संदेह नहीं। इसको वही लोग नहीं मानते जिन्होंने अपने आप को घाटे में डाल लिया है। सत्य यह है जो कुछ रात्रि में ठहर जाता और दिन में गतिशील होता है, वह उसी के नियंत्रण में है और वह सुनने वाला और जानने वाला है।

قُلْ أَغَيْرَ ٱللَّهِ أَتَّخِذُ وَلِيًّا فَاطِرِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَهُوَ يُطْعِمُ وَلَا يُطْعَمُ ۗ قُلْ إِنِّىٓ أُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَسْلَمَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿14﴾ قُلْ إِنِّىٓ أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّى عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ﴿15﴾ مَّن يُصْرَفْ عَنْهُ يَوْمَئِذٍ فَقَدْ رَحِمَهُۥ ۚ وَذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْمُبِينُ ﴿16﴾

कह दो, परमेश्वर को छोड़ क्या मैं किसी और को अपना संरक्षक बना लूं जो धरती और समस्त आकाशों का रचयिता है और खाता नहीं खिलाता है? कह दो, मुझे तो आदेश मिला है कि सबसे पहले मैं उसके सामने आज्ञा-पालन के भाव से झुक जाऊं और इस बात पर बल दिया गया है कि तुम कदापि मुश्रिकों में न मिलो। कह दो कि यदि मैं अपने प्रभु की अवज्ञा करूं तो डरता हूं कि एक भयंकर दिन के दण्ड का सामना करूंगा। सत्य यह है कि जिसे उस दिन दण्ड से दूर रखा गया, वही है जिस पर परमेश्वर ने दया की और यही स्पष्ट सफलता है।

وَإِن يَمْسَسْكَ ٱللَّهُ بِضُرٍّ فَلَا كَاشِفَ لَهُۥٓ إِلَّا هُوَ ۖ وَإِن يَمْسَسْكَ بِخَيْرٍ فَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿17﴾ وَهُوَ ٱلْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْخَبِيرُ ﴿18﴾ قُلْ أَىُّ شَىْءٍ أَكْبَرُ شَهَـٰدَةً ۖ قُلِ ٱللَّهُ ۖ شَهِيدٌۢ بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۚ وَأُوحِىَ إِلَىَّ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانُ لِأُنذِرَكُم بِهِۦ وَمَنۢ بَلَغَ ۚ أَئِنَّكُمْ لَتَشْهَدُونَ أَنَّ مَعَ ٱللَّهِ ءَالِهَةً أُخْرَىٰ ۚ قُل لَّآ أَشْهَدُ ۚ قُلْ إِنَّمَا هُوَ إِلَـٰهٌ وَٰحِدٌ وَإِنَّنِى بَرِىٓءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ ﴿19﴾

(विश्वास रखो कि) यदि परमेश्वर तुम्हें किसी दुख में डाल दे तो उसके अतिरिक्त कोई नहीं जो उसे दूर कर सके और यदि भलाई प्रदान करे तो वह हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। अपने भक्तों पर वह हर प्रकार से प्रभावी है और प्रज्ञावान व अवगत है। इनसे पूछो, किस की गवाही सबसे बढ़कर है? कह दो, परमेश्वर की, वह मेरे और तुम्हारे बीच साक्षी है। और मेरी ओर यह क़ुरआन इसलिए वह्य किया गया है ताकि इसके माध्यम से मैं तुम्हें सचेत कर दूं और उन्हें भी जिन्हें यह पहुंचे। क्या तुम इस बात के साक्षी बनते हो कि परमेश्वर के साथ कुछ अन्य उपास्य भी हैं? कह दो, मैं इसकी गवाही नहीं दे सकता। कह दो, वही एकमात्र उपासना के योग्य है और मेरा अवश्य उनसे कोई संबंध नहीं जिन्हें तुम उसका सहभागी बनाते हो।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इससे स्पष्ट है कि क़ुरआन क़यामत (महाप्रलय) तक सचेत (caution) करने का माध्यम है। विद्वानों का कर्तव्य है कि इसी के माध्यम से अपनी क़ौमों को सचेत करते रहें। ↩
ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْرِفُونَهُۥ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَآءَهُمُ ۘ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿20﴾ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۗ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿21﴾ وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشْرَكُوٓا۟ أَيْنَ شُرَكَآؤُكُمُ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ ﴿22﴾ ثُمَّ لَمْ تَكُن فِتْنَتُهُمْ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ وَٱللَّهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِكِينَ ﴿23﴾ ٱنظُرْ كَيْفَ كَذَبُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ ۚ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ ﴿24﴾

जिन्हें हमने ग्रंथ प्रदान किया है, वे इस (क़ुरआन) को पहचानते हैं, जिस प्रकार अपने बेटों को पहचानते हैं। अपितु, जिन लोगों ने अपने आप को घाटे में डाल रखा है, वे इसे नहीं मानते (और शिर्क पर अड़े हैं), यद्यपि उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो परमेश्वर पर झूठ बांधे या उसकी आयतों को झूठा कहे? अवश्य एसे अत्याचारी कभी सफलता नहीं पा सकते। (इसलिए) उस दिन को याद रखो जिस दिन हम इन सब को इकट्ठा करेंगे, इसके बाद इन मुश्रिकों से पूछेंगे कि तुम्हारे बनाए हुए सहभागी कहां हैं जिन्हें तुम परमेश्वर का साझी समझा करते थे? फिर इनका धोखा समाप्त हो जाएगा, परंतु कहेंगे: हमारे प्रभु की सौगंध, हम मुश्रिक नहीं थे। देखो, इन्होंने, (इन अत्याचारी लोगों ने) किस प्रकार स्वयं अपने ऊपर झूठ बोला है और जो मनगढ़ंत बातें ये करते रहे, वे सारी इनसे खोई गईं।

وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُ إِلَيْكَ ۖ وَجَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِىٓ ءَاذَانِهِمْ وَقْرًا ۚ وَإِن يَرَوْا۟ كُلَّ ءَايَةٍ لَّا يُؤْمِنُوا۟ بِهَا ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُوكَ يُجَـٰدِلُونَكَ يَقُولُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿25﴾ وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْـَٔوْنَ عَنْهُ ۖ وَإِن يُهْلِكُونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ ﴿26﴾ وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذْ وُقِفُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ فَقَالُوا۟ يَـٰلَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿27﴾ بَلْ بَدَا لَهُم مَّا كَانُوا۟ يُخْفُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَلَوْ رُدُّوا۟ لَعَادُوا۟ لِمَا نُهُوا۟ عَنْهُ وَإِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ ﴿28﴾

इनमें से ऐसे भी हैं जो कान लगाकर तुम्हें सुनते हैं, परंतु इनके दिलोंदिलों पर हमने (अपने नियम अनुसार) पर्दे डाल दिए हैं ताताकि (जो कुछ सुनते हैं), उसे न समझें और इनके कानों को बहरा कर दिया है कि सुनकर भी न सुनें। यदि येये सब प्रकार की निशानियाँ देख लें, फिर भी उनको नहीं मानेंगे। यहाँ तक कि तुम्हारे पास झगड़ते हुए आएंगे तो ये नकारने वाले कहेंगे कि यह तो केवल पुराने लोगों की कथाएँ हैं। ये इससे दूसरों को भी रोकते हैं और स्वयं भी इससे दूर रहते हैं और सत्य यह है के अपने ही विनाश का प्रबंध कर रहे हैं, परंतु इसका बोध नहीं करते। यदि तुम उस घड़ी को देख सकते, जब ये नरक के किनारे खड़े किए जाएँगे, फिर कहेंगे: काश, हम वापस भेज दिए जाएं कि अंगीकार करें और अपने प्रभु की आयतों को झूठा न कहें और मानने वालों के साथ मिल जाएं।‌ कदापि नहीं, अपितु वह सत्य इनके लिए स्पष्ट हो गया है जो इससे पहले छिपाए हुए थे। यदि इन्हें लौटाया जाए तो वही करेंगे जिससे रोके गए थे, इसलिए कि ये पूर्णतः झूठे हैं।

وَقَالُوٓا۟ إِنْ هِىَ إِلَّا حَيَاتُنَا ٱلدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ ﴿29﴾ وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذْ وُقِفُوا۟ عَلَىٰ رَبِّهِمْ ۚ قَالَ أَلَيْسَ هَـٰذَا بِٱلْحَقِّ ۚ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَرَبِّنَا ۚ قَالَ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ ﴿30﴾ قَدْ خَسِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱللَّهِ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَتْهُمُ ٱلسَّاعَةُ بَغْتَةً قَالُوا۟ يَـٰحَسْرَتَنَا عَلَىٰ مَا فَرَّطْنَا فِيهَا وَهُمْ يَحْمِلُونَ أَوْزَارَهُمْ عَلَىٰ ظُهُورِهِمْ ۚ أَلَا سَآءَ مَا يَزِرُونَ ﴿31﴾ وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا لَعِبٌ وَلَهْوٌ ۖ وَلَلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿32﴾

कहते हैं कि जीवन तो बस यही हमारी दुनिया का जीवन है और मृत्यु के बाद हम कदापि नहीं उठाए जाएँगे। यदि तुम उस घड़ी को देख सकते, जब ये अपने प्रभु के समक्ष खड़े किए जाएँगे। वह इनसे पूछेगा: क्या यह सत्य नहीं है? उत्तर देंगे: हाँ, हमारे प्रभु की सौगंध, यह सत्य है। वह कहेगा: तो अपने नकारने के फलस्वरुप अब दण्ड का स्वाद चखो। अवश्य घाटे में रहे वे लोग जिन्होंने परमेश्वर से इस भेंट का खंडन किया। यहाँ तक कि अचानक जब वह घड़ी उनपर आएगी तो कहेंगे: हाय, हमारी वह भूल जो इस विषय में हमसे हुई है और हाल यह होगा कि अपने बोझ वे अपनी पीठ पर उठाए हुए होंगे। सुनो, अत्यंत ही बुरा है वह बोझ जो ये उठाए हुए होंगे। सत्य यह है कि दुनिया का जीवन तो केवल खेल तमाशा है। परलोक का घर, अपितु कहीं अच्छा है उनके लिए जो आत्मसंयम अपनाएं। फिर क्या तुम समझते नहीं हो?

قَدْ نَعْلَمُ إِنَّهُۥ لَيَحْزُنُكَ ٱلَّذِى يَقُولُونَ ۖ فَإِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَـٰكِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ يَجْحَدُونَ ﴿33﴾ وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِّن قَبْلِكَ فَصَبَرُوا۟ عَلَىٰ مَا كُذِّبُوا۟ وَأُوذُوا۟ حَتَّىٰٓ أَتَىٰهُمْ نَصْرُنَا ۚ وَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَـٰتِ ٱللَّهِ ۚ وَلَقَدْ جَآءَكَ مِن نَّبَإِى۟ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿34﴾

हम इस बात से अवगत रहे हैं कि जो कुछ ये कहते हैं, उससे तुम्हें पीड़ा होती है। तुम उस पर धैर्य रखो, (हे पैग़ंबर), इसलिए कि ये तुम्हें झूठा नहीं कह रहे, ये दुष्ट तो परमेश्वर की निशानियों को नकार रहे हैं। तुमसे पहले भी रसूलों को इसी प्रकार झूठा कहा गया तो अपने खंडन करने और अपने कष्टों पर उन्होंने धैर्य रखा, यहाँ तक कि हमारी सहायता उन्हें पहुंच गई। परमेश्वर की बातों को कोई बदलने वाला नहीं है और (हमारी इस अटल कार्यप्रणाली को समझने के लिए) पैग़ंबरों के कुछ वृत्तांत तुम्हें पहुंच ही चुके हैं।

وَإِن كَانَ كَبُرَ عَلَيْكَ إِعْرَاضُهُمْ فَإِنِ ٱسْتَطَعْتَ أَن تَبْتَغِىَ نَفَقًا فِى ٱلْأَرْضِ أَوْ سُلَّمًا فِى ٱلسَّمَآءِ فَتَأْتِيَهُم بِـَٔايَةٍ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَمَعَهُمْ عَلَى ٱلْهُدَىٰ ۚ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ ﴿35﴾ إِنَّمَا يَسْتَجِيبُ ٱلَّذِينَ يَسْمَعُونَ ۘ وَٱلْمَوْتَىٰ يَبْعَثُهُمُ ٱللَّهُ ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ ﴿36﴾

(इसके होते हुए), इनका मुँह मोड़ना यदि तुम्हें बुरा लग रहा है तो धरती में कोई सुरंग या आकाश में कोई सीढ़ी ढूंढ सकते हो कि इनके पास कोई निशानी ले आओ तो ढूंढ लो। परमेश्वर चाहता तो इन सबको सन्मार्ग पर इकट्ठा कर सकता था, इसलिए कभी भी भावनाओं से परास्त हो जाने वालों में से न बनो। (हमारे इस आह्वान को) वही स्वीकार करेंगे जो सुनने वाले हैं। रहे मुर्दे तो (उनका परिणाम अब यही है कि) परमेश्वर इन्हें उठाएगा, फिर ये उसकी ओर लौटा दिए जाएँगे।

وَقَالُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ ءَايَةٌ مِّن رَّبِّهِۦ ۚ قُلْ إِنَّ ٱللَّهَ قَادِرٌ عَلَىٰٓ أَن يُنَزِّلَ ءَايَةً وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿37﴾ وَمَا مِن دَآبَّةٍ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا طَـٰٓئِرٍ يَطِيرُ بِجَنَاحَيْهِ إِلَّآ أُمَمٌ أَمْثَالُكُم ۚ مَّا فَرَّطْنَا فِى ٱلْكِتَـٰبِ مِن شَىْءٍ ۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يُحْشَرُونَ ﴿38﴾ وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا صُمٌّ وَبُكْمٌ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ مَن يَشَإِ ٱللَّهُ يُضْلِلْهُ وَمَن يَشَأْ يَجْعَلْهُ عَلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿39﴾

कहते हैं कि इस नबी पर इसके प्रभु की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गई? कह दो, परमेश्वर पूरा सामर्थ्य रखता है कि (जब चाहे), कोई निशानी उतार दे, परंतु इनमें से अधिकतर (यह मांग इसलिए करते हैं कि) इसके परिणाम से अवगत नहीं हैं। (देखते नहीं हो कि) धरती पर जितने जानवर अपने पाँव से चलते हैं और हवा में जितने पक्षी अपनी दोनों भुजाओं से उड़ते हैं, सब तुम्हारे ही जैसे समूह हैं (और समझाने की हद तक तो) हमने अपने ग्रंथ में भी कोई कमी नहीं छोड़ी है। इसके बाद (यही बाक़ी है कि एक दिन) ये अपने प्रभु के समक्ष इकट्ठे कर दिए जाएँगे। हमारी आयतों को जिन लोगों ने झूठा कहने का निर्णय कर लिया है, वे बहरे और गूंगे अंधकार में पड़े हुए हैं। (सत्य यह है कि) परमेश्वर (अपने नियम अनुसार) जिसे चाहता है, भटका देता है और जिसे चाहता है, सीधे मार्ग पर लगा देता है।

قُلْ أَرَءَيْتَكُمْ إِنْ أَتَىٰكُمْ عَذَابُ ٱللَّهِ أَوْ أَتَتْكُمُ ٱلسَّاعَةُ أَغَيْرَ ٱللَّهِ تَدْعُونَ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿40﴾ بَلْ إِيَّاهُ تَدْعُونَ فَيَكْشِفُ مَا تَدْعُونَ إِلَيْهِ إِن شَآءَ وَتَنسَوْنَ مَا تُشْرِكُونَ ﴿41﴾

इनसे कहो, भला बताओ, यदि तुम पर परमेश्वर का दण्ड आ जाए या क़यामत की घड़ी आ पहुंचे तो क्या परमेश्वर को छोड़ किसी और को पुकारोगे, यदि तुम (अपने दावों में) सच्चे हो? नहीं, अपितु (ऐसे हर अवसर पर) उसी को पुकारते हो। फिर वह चाहे तो उस संकट को टाल देता है जिसके लिए पुकारते हो, और अपने बनाए हुए सहभागियों को (उस समय) तुम पूर्णतः भूल जाते हो।

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰٓ أُمَمٍ مِّن قَبْلِكَ فَأَخَذْنَـٰهُم بِٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ لَعَلَّهُمْ يَتَضَرَّعُونَ ﴿42﴾ فَلَوْلَآ إِذْ جَآءَهُم بَأْسُنَا تَضَرَّعُوا۟ وَلَـٰكِن قَسَتْ قُلُوبُهُمْ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿43﴾ فَلَمَّا نَسُوا۟ مَا ذُكِّرُوا۟ بِهِۦ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ أَبْوَٰبَ كُلِّ شَىْءٍ حَتَّىٰٓ إِذَا فَرِحُوا۟ بِمَآ أُوتُوٓا۟ أَخَذْنَـٰهُم بَغْتَةً فَإِذَا هُم مُّبْلِسُونَ ﴿44﴾ فَقُطِعَ دَابِرُ ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ۚ وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿45﴾

तुमसे पहले भी हमने बहुत सी क़ौमों की और अपने रसूल भेजे थे (और उन्होंने नहीं माना) तो हमने उन्हें अत्यधिक परेशानियों और पीड़ाओं में डाल दिया था ताकि विनम्रता को अपनाएं। फिर जब हमारी ओर से उनपर कठिनाई आई तो उन्होंने विनम्रता क्यों न अपनाई? अपितु उनके दिल (और भी) कठोर हो गए और शैतान ने उनके लिए (उनके उसी) कर्म को अच्छा बना कर दिखाया जो वे कर रहे थे। फिर वह चीज़ जब उन्होंने भुला दी, जिससे उन्हें याद दिलाया गया था तो हमने हर प्रकार के सुख के द्वार उनपर खोल दिए, यहाँ तक कि जब वे हमारे उन उपकारों पर इतराने लगे जो उनपर किए गए थे तो अचानक हमने उन्हें पकड़ लिया, अब स्थिति यह थी कि पूरे आश्चर्यचकित होकर रह गए। इस प्रकार उन लोगों की जड़ काट दी गई जिन्होंने (अपने प्राणों पर) अत्याचार ढाया था और आभार परमेश्वर ही के लिए है जो जगत प्रभु है (कि उसने धरती को इन अत्याचारों से मुक्त कर दिया)।

قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَخَذَ ٱللَّهُ سَمْعَكُمْ وَأَبْصَـٰرَكُمْ وَخَتَمَ عَلَىٰ قُلُوبِكُم مَّنْ إِلَـٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ يَأْتِيكُم بِهِ ۗ ٱنظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ ﴿46﴾ قُلْ أَرَءَيْتَكُمْ إِنْ أَتَىٰكُمْ عَذَابُ ٱللَّهِ بَغْتَةً أَوْ جَهْرَةً هَلْ يُهْلَكُ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿47﴾ وَمَا نُرْسِلُ ٱلْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۖ فَمَنْ ءَامَنَ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿48﴾ وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يَمَسُّهُمُ ٱلْعَذَابُ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ ﴿49﴾

इनसे पूछो, कभी विचार किया है कि यदि परमेश्वर तुम्हारी देखने और सुनने की क्षमता तुमसे छीन ले और तुम्हारे दिलों पर मुहर कर दे तो परमेश्वर के अतिरिक्त कौन सा देवता है जो उसको तुम्हें वापस ला देगा? देखो, किस प्रकार हम अपनी आयतें अनेक प्रकार से (इनके सामने) प्रस्तुत कर रहे हैं, फिर भी ये मुँह मोड़ते हैं। पूछो: कभी सोचा है कि यदि परमेश्वर का दण्ड तुम पर अचानक आ धमके या घोषणा करके आए तो क्या अत्याचारी लोगों के सिवा किसी और का नाश किया जाएगा? रसूलों को तो हम केवल इसलिए भेजते हैं (कि लोगों के लिए) शुभ सूचना देने वाले और (उन्हें) सचेत करने वाले हों। अतः जिन्होंने मान लिया और सुधार कर लिया तो उन्हें कोई आशंका और कोई दुख नहीं होगा। इसके विपरीत जिन्होंने हमारी आयतों को झूठा कहा, उनकी अवज्ञा के फलस्वरूप हमारा दण्ड उन्हें पकड़ेगा।

قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمْ عِندِى خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعْلَمُ ٱلْغَيْبَ وَلَآ أَقُولُ لَكُمْ إِنِّى مَلَكٌ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ ۚ قُلْ هَلْ يَسْتَوِى ٱلْأَعْمَىٰ وَٱلْبَصِيرُ ۚ أَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ ﴿50﴾

इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर) मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास परमेश्वर के कोष हैं, न मैं परोक्ष का ज्ञान रखता हूं और न तुमसे यह कहता हूं कि मैं कोई फ़रिश्ता हूं। मैं तो केवल उस वह्य का अनुसरण करता हूं जो मुझे की जाती है। कह दो, (मेरा प्रश्न केवल यह है), क्या अंधे और देखने वाले, दोनों समान हो जाएँगे? फिर क्या तुम विचार नहीं करते?

وَأَنذِرْ بِهِ ٱلَّذِينَ يَخَافُونَ أَن يُحْشَرُوٓا۟ إِلَىٰ رَبِّهِمْ ۙ لَيْسَ لَهُم مِّن دُونِهِۦ وَلِىٌّ وَلَا شَفِيعٌ لَّعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ﴿51﴾

(इन्हें अब इनकी इस दशा में छोड़ दो) और इस क़ुरआन के द्वारा उन लोगों को सचेत करो जो डरते हैं कि अपने प्रभु के सामने इस प्रकार प्रस्तुत किए जाएँगे कि उनके लिए उसके अतिरिक्त कोई सहायक और कोई अनुशंसा करने वाला नहीं होगा ताकि वे आत्मसंयम अपनाएं।

وَلَا تَطْرُدِ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِٱلْغَدَوٰةِ وَٱلْعَشِىِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُۥ ۖ مَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَىْءٍ وَمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِم مِّن شَىْءٍ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُونَ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿52﴾ وَكَذَٰلِكَ فَتَنَّا بَعْضَهُم بِبَعْضٍ لِّيَقُولُوٓا۟ أَهَـٰٓؤُلَآءِ مَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْهِم مِّنۢ بَيْنِنَآ ۗ أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَعْلَمَ بِٱلشَّـٰكِرِينَ ﴿53﴾ وَإِذَا جَآءَكَ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِـَٔايَـٰتِنَا فَقُلْ سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمْ ۖ كَتَبَ رَبُّكُمْ عَلَىٰ نَفْسِهِ ٱلرَّحْمَةَ ۖ أَنَّهُۥ مَنْ عَمِلَ مِنكُمْ سُوٓءًۢا بِجَهَـٰلَةٍ ثُمَّ تَابَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَصْلَحَ فَأَنَّهُۥ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿54﴾ وَكَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ وَلِتَسْتَبِينَ سَبِيلُ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿55﴾

(इनके मान लेने की इच्छा में) तुम उन लोगों को अपने से दूर न करो जो सुबह शाम अपने प्रभु को उसकी प्रसन्नता की चाहत में पुकारते हैं। इनके कर्तव्य का कोई हिस्सा तुम पर नहीं है और न तुम्हारे कर्तव्य का कोई हिस्सा इन‌ पर है कि (इनकी इच्छा पर) तुम उन लोगों को दूर करके अत्याचारियों में मिल जाओ। सत्य यह है कि हमने इसी प्रकार इनमें से एक को दूसरे से जांचा है ताकि ये (दुष्ट लोग उन ग़रीबों को देख कर) कहें: क्या यही लोग हैं जिन्हें परमेश्वर ने हम में से अपनी कृपा-दृष्टि के लिए चुन लिया है? (इनसे पूछो), क्या परमेश्वर अपने आभारी भक्तों को सबसे बढ़कर नहीं जानता? (इनकी इच्छा के विपरीत), हमारी आयतों को मानने वाले ये लोग जब तुम्हारे पास आया करें तो उनसे कहो कि तुम पर शांति हो। तुम्हारे प्रभु ने अपने ऊपर दया को अनिवार्य कर रखा है कि तुम में से यदि कोई नादानी के साथ बुराई कर बैठेगा, फिर इसके बाद पश्चाताप और सुधार कर लेगा तो इस प्रकार है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, बड़ा कृपालु है। हम इसी प्रकार अपनी आयतों की व्याख्या करते हैं तकि सदाचारी व्यक्तियों का चाल-चलन भी स्पष्ट हो और अपराधियों ने जो मार्ग अपनाया है, वह भी पूर्णतः स्पष्ट हो जाए।

قُلْ إِنِّى نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ ٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۚ قُل لَّآ أَتَّبِعُ أَهْوَآءَكُمْ ۙ قَدْ ضَلَلْتُ إِذًا وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُهْتَدِينَ ﴿56﴾ قُلْ إِنِّى عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّى وَكَذَّبْتُم بِهِۦ ۚ مَا عِندِى مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِۦٓ ۚ إِنِ ٱلْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۖ يَقُصُّ ٱلْحَقَّ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلْفَـٰصِلِينَ ﴿57﴾ قُل لَّوْ أَنَّ عِندِى مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِۦ لَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿58﴾ وَعِندَهُۥ مَفَاتِحُ ٱلْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَآ إِلَّا هُوَ ۚ وَيَعْلَمُ مَا فِى ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ ۚ وَمَا تَسْقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍ فِى ظُلُمَـٰتِ ٱلْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍ مُّبِينٍ ﴿59﴾

(हे पैग़ंबर), कह दो कि मुझे तो उनकी उपासना से रोका गया है जिन्हें तुम परमेश्वर के सिवा पुकारते हो। कह दो, मैं तुम्हारी इच्छाओं के पीछे नहीं चल सकता। यदि मैंने ऐसा किया तो पथभ्रष्टता में पड़ा और मार्ग पाने वालों में से नहीं रहा। कह दो, मैं अपने प्रभु की ओर से एक कांतिमय प्रमाण पर हूं और तुमने उसे झूठा कह दिया है। तुम जिस चीज़ के लिए जल्दी मचाए हुए हो, वह मेरे अधिकार में नहीं है। उसका निर्णय परमेश्वर ही के अधिकार में है। वही सत्य को स्पष्ट करेगा और वह सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है। कह दो कि जिस चीज़ के लिए तुम जल्दी मचाए हुए हो, यदि वह मेरे हाथ में होती तो मेरे और तुम्हारे बीच इस मामले का निपटारा हो चुका होता। (यह मामला परमेश्वर के हाथ में है) और परमेश्वर अत्याचारियों को भलीभांति जानता है। परोक्ष की चाबियाँ उसी के पास हैं, उन्हें उसके अतिरिक्त कोई नहीं जानता। थल और जल में जो कुछ है, उसकी जानकारी में है। पेड़ से कोई ऐसा पत्ता और पाताल की परतों में कोई ऐसा दाना भी नहीं गिरता और न कोई सूखा और गीला हिस्सा ऐसा है जिसे वह न जानता हो। ये सब (उसके पास) एक स्पष्ट पुस्तक में लिखा है।

وَهُوَ ٱلَّذِى يَتَوَفَّىٰكُم بِٱلَّيْلِ وَيَعْلَمُ مَا جَرَحْتُم بِٱلنَّهَارِ ثُمَّ يَبْعَثُكُمْ فِيهِ لِيُقْضَىٰٓ أَجَلٌ مُّسَمًّى ۖ ثُمَّ إِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ ثُمَّ يُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿60﴾ وَهُوَ ٱلْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِۦ ۖ وَيُرْسِلُ عَلَيْكُمْ حَفَظَةً حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَحَدَكُمُ ٱلْمَوْتُ تَوَفَّتْهُ رُسُلُنَا وَهُمْ لَا يُفَرِّطُونَ ﴿61﴾ ثُمَّ رُدُّوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ مَوْلَىٰهُمُ ٱلْحَقِّ ۚ أَلَا لَهُ ٱلْحُكْمُ وَهُوَ أَسْرَعُ ٱلْحَـٰسِبِينَ ﴿62﴾

वही है जो रात में तुम्हारी रूहें ग्रहण कर लेता है और जो कुछ दिन में करते हो, उसे भी जानता है। फिर उसी में तुम्हें उठा खड़ा करता है ताकि जीवन की निर्धारित अवधि पूरी की जाए। अंत में तुम्हें उसी की ओर लौटना है, फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ करते रहे हो। वह अपने भक्तों पर पूर्णतः प्रभावी है और तुम पर (अपने) निरीक्षक नियुक्त रखता है। यहाँ तक कि जब तुम में से किसी की मृत्यु का समय आ जाता है तो हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते ही उसकी रूह ग्रहण करते हैं और (इस कार्य में) कभी लापरवाही नहीं करते। फिर सब के सब अपने सच्चे स्वामी की ओर लौटा दिए जाते हैं। सुनो, निर्णय का सारा अधिकार उसी के हाथ में है और वह अत्यंत तीव्रता के साथ हिसाब चुकाने वाला है।

قُلْ مَن يُنَجِّيكُم مِّن ظُلُمَـٰتِ ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ تَدْعُونَهُۥ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةً لَّئِنْ أَنجَىٰنَا مِنْ هَـٰذِهِۦ لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ ﴿63﴾ قُلِ ٱللَّهُ يُنَجِّيكُم مِّنْهَا وَمِن كُلِّ كَرْبٍ ثُمَّ أَنتُمْ تُشْرِكُونَ ﴿64﴾ قُلْ هُوَ ٱلْقَادِرُ عَلَىٰٓ أَن يَبْعَثَ عَلَيْكُمْ عَذَابًا مِّن فَوْقِكُمْ أَوْ مِن تَحْتِ أَرْجُلِكُمْ أَوْ يَلْبِسَكُمْ شِيَعًا وَيُذِيقَ بَعْضَكُم بَأْسَ بَعْضٍ ۗ ٱنظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّهُمْ يَفْقَهُونَ ﴿65﴾

इनसे पूछो कि थल और जल (में कठिनाइयों और संकटों) के अंधकार से कौन तुम्हें बचाता है, जबकि तुम गिड़गिड़ा कर और चुपके-चुपके उसे पुकार रहे होते हो कि यदि उसने इस संकट से हमें बचा लिया तो हम अवश्य उसके आभारी भक्त बन कर रहेंगे? कह दो, इससे और हर संकट से परमेश्वर ही तुम्हें मुक्ति देता है, परंतु इसके बाद फिर शिर्क करने लगते हो। कह दो, वह पूरा सामर्थ्य रखता है कि तुम पर तुम्हारे ऊपर से कोई दण्ड भेज दे या तुम्हारे पाँव के नीचे से घटित कर दे या तुम्हें अनेक गुटों में विभाजित करके लड़ाई में लिप्त कर दे और एक दूसरे की शक्ति का स्वाद चखा दे। देखो, किस प्रकार हम अपनी आयतें अनेक प्रकार से प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि वे समझ लें।

وَكَذَّبَ بِهِۦ قَوْمُكَ وَهُوَ ٱلْحَقُّ ۚ قُل لَّسْتُ عَلَيْكُم بِوَكِيلٍ ﴿66﴾ لِّكُلِّ نَبَإٍ مُّسْتَقَرٌّ ۚ وَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ﴿67﴾

तुम्हारे लोगों ने, (हे पैग़ंबर), हमारी इस चेतावनी को झूठा कहा है, यद्यपि यह बात पूर्ण सत्य है। इनसे कह दो कि मैं तुम्हारे ऊपर कोई रखवाला नहीं बनाया गया हूँ (कि तुम्हें अवश्य ही समझा ही दूँ)। हर बात के लिए एक निर्धारित समय है। (इसके बाद दण्ड ही मांगते हो तो) शीघ्र ही यह सत्य तुम भी जान जाओगे।

وَإِذَا رَأَيْتَ ٱلَّذِينَ يَخُوضُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا۟ فِى حَدِيثٍ غَيْرِهِۦ ۚ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ ٱلشَّيْطَـٰنُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ ٱلذِّكْرَىٰ مَعَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿68﴾ وَمَا عَلَى ٱلَّذِينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَىْءٍ وَلَـٰكِن ذِكْرَىٰ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ﴿69﴾ وَذَرِ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ دِينَهُمْ لَعِبًا وَلَهْوًا وَغَرَّتْهُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا ۚ وَذَكِّرْ بِهِۦٓ أَن تُبْسَلَ نَفْسٌۢ بِمَا كَسَبَتْ لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلِىٌّ وَلَا شَفِيعٌ وَإِن تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍ لَّا يُؤْخَذْ مِنْهَآ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ أُبْسِلُوا۟ بِمَا كَسَبُوا۟ ۖ لَهُمْ شَرَابٌ مِّنْ حَمِيمٍ وَعَذَابٌ أَلِيمٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ ﴿70﴾

(इन्हें अब इनके हाल पर छोड़ो) और जब देखो कि लोग हमारी आयतों पर अनुचित आक्षेप कर रहे हैं तो इनसे अलग हो जाया करो, यहाँ तक कि वे किसी अन्य बात में लग जाएँ। और यदि कभी शैतान भुला दे तो भूल की अनुभूति हो जाने के बाद इन अत्याचारी लोगों के साथ न बैठो। इनके हिसाब का कोई दायित्व उन लोगों पर नहीं है जो परमेश्वर से डरने वाले हैं। अपितु, याद दिलाना उनका कर्तव्य है ताकि ये भी डरने वाले बन जाएँ। जिन लोगों ने अपने धर्म को खेल तमाशा बना रखा है और जिन्हें दुनिया के जीवन ने धोके में डाल दिया है, उन्हें छोड़ो और इस क़ुरआन के माध्यम से याद दिलाते रहो कि कहीं कोई व्यक्ति अपने दुष्कर्मों के कारण तबाही में न झोंक दिया जाए। और वह भी इस स्थिति में कि परमेश्वर के समक्ष न उसका कोई सहायक होगा और न अनुशंसा करने वाला, और यदि सब प्रकार का हरजाना भी दे तो उसे स्वीकार नहीं किया जाए। यही लोग हैं जो अपने दुष्कर्मों के कारण तबाही में डाले जाएँगे। जिस क़ुफ़्र के ये दोषी रहे हैं, उसके फलस्वरूप इनके लिए खौलता हुआ पानी और एक कष्टदायक यातना है।

قُلْ أَنَدْعُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُنَا وَلَا يَضُرُّنَا وَنُرَدُّ عَلَىٰٓ أَعْقَابِنَا بَعْدَ إِذْ هَدَىٰنَا ٱللَّهُ كَٱلَّذِى ٱسْتَهْوَتْهُ ٱلشَّيَـٰطِينُ فِى ٱلْأَرْضِ حَيْرَانَ لَهُۥٓ أَصْحَـٰبٌ يَدْعُونَهُۥٓ إِلَى ٱلْهُدَى ٱئْتِنَا ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلْهُدَىٰ ۖ وَأُمِرْنَا لِنُسْلِمَ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿71﴾ وَأَنْ أَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَٱتَّقُوهُ ۚ وَهُوَ ٱلَّذِىٓ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴿72﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۖ وَيَوْمَ يَقُولُ كُن فَيَكُونُ ۚ قَوْلُهُ ٱلْحَقُّ ۚ وَلَهُ ٱلْمُلْكُ يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ ۚ عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْخَبِيرُ ﴿73﴾

इनसे पूछो, क्या हम परमेश्वर के सिवा उन्हें पुकारें जो हमें न लाभ दे सकते हैं, न नुक़सान? और इसके बाद भी कि परमेश्वर ने हमें उचित शिक्षा प्रदान की है, क्या हम उलटे पाँव फिर जाएँ? उस व्यक्ति के समान जिसे शैतानों ने वीराने में बहका दिया और अचंभित व व्यग्र छोड़ दिया हो, यद्यपि उसके साथी उसे उचित मार्ग की ओर बुला रहे हों कि हमारे पास आ जाओ। कह दो, सत्य यह है कि परमेश्वर का मार्गदर्शन ही उचित मार्गदर्शन है और हमें आदेश दिया गया है कि अपने आप को समस्त लोकों के प्रभु को सौंप दें और आदेश दिया गया है कि नमाज़ का प्रबंध करो और उससे डरते रहो, इसलिए कि वही है जिसके पास में तुम सब इकट्ठे किए जाओगे, और वही है जिसने धरती और समस्त आकाशों को सत्य के साथ पैदा किया। जिस दिन कहेगा कि (महाप्रलय घटित) हो जाए तो हो जाएगा। उसकी बात निश्चित है। जिस दिन नरसिंघा फूंका जाएगा, उस दिन उसी का साम्राज्य होगा। वह परोक्ष तथा प्रत्यक्ष, सब बातों का ज्ञान रखता है और वह प्रज्ञावान तथा जागरूक है।

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ ءَازَرَ أَتَتَّخِذُ أَصْنَامًا ءَالِهَةً ۖ إِنِّىٓ أَرَىٰكَ وَقَوْمَكَ فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿74﴾ وَكَذَٰلِكَ نُرِىٓ إِبْرَٰهِيمَ مَلَكُوتَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلِيَكُونَ مِنَ ٱلْمُوقِنِينَ ﴿75﴾

इन्हें इब्राहीम का वृत्तांत सुनाओ, जब उसने अपने पिता आज़र से कहा था: क्या तुम मूर्तियों को पूज्य बना बैठे हो? मैं तो तुम्हें और तुम्हारे लोगों को स्पष्ट पथभ्रष्टता में देख रहा हूँ। इब्राहीम को हम इसी प्रकार धरती और समस्त आकाशों के साम्राज्य का दर्शन कराते थे ताकि वह अपने लोगों तक सत्य को निर्णायक रूप से संचारित करे और स्वयं भी उन लोगों में से हो जाए जो पूरा विश्वास रखने वाले हों।

فَلَمَّا جَنَّ عَلَيْهِ ٱلَّيْلُ رَءَا كَوْكَبًا ۖ قَالَ هَـٰذَا رَبِّى ۖ فَلَمَّآ أَفَلَ قَالَ لَآ أُحِبُّ ٱلْـَٔافِلِينَ ﴿76﴾ فَلَمَّا رَءَا ٱلْقَمَرَ بَازِغًا قَالَ هَـٰذَا رَبِّى ۖ فَلَمَّآ أَفَلَ قَالَ لَئِن لَّمْ يَهْدِنِى رَبِّى لَأَكُونَنَّ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلضَّآلِّينَ ﴿77﴾ فَلَمَّا رَءَا ٱلشَّمْسَ بَازِغَةً قَالَ هَـٰذَا رَبِّى هَـٰذَآ أَكْبَرُ ۖ فَلَمَّآ أَفَلَتْ قَالَ يَـٰقَوْمِ إِنِّى بَرِىٓءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ ﴿78﴾ إِنِّى وَجَّهْتُ وَجْهِىَ لِلَّذِى فَطَرَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ حَنِيفًا ۖ وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿79﴾

अतः (एक दिन) जब उस पर रात छा गई तो उसने तारा देखा (और लोगों को सचेत देखकर) कहा: यह मेरा प्रभु है। फिर (इसी प्रकार के एक अवसर पर) जब तारा डूब गया तो उसने कहा: मुझे (पूजा के लिए) वे अच्छे नहीं लगते जो डूब जाते हैं। फिर (एक दिन) जब चाँद को चमकते देखा तो कहा: यह मेरा प्रभु है। परंतु जब वह भी डूब गया तो उसने कहा: यदि मेरे प्रभु ने मेरा मार्गदर्शन नहीं किया तो मैं भटकने वालों में से होकर रह जाऊंगा। फिर (एक दिन) जब सूर्य को चमकते देखा तो कहा: यह मेरा प्रभु है, यह सबसे बड़ा है। परंतु जब वह भी डूब गया तो उसने (अपने लोगों को संबोधित करके) कहा: मेरी क़ौम के लोगो, मैं उन सबसे विमुख हूँ जिन्हें तुम (परमेश्वर के) सहभागी बनाते हो। मैंने एकाग्र होकर अपना चेहरा उस सत्ता की ओर कर लिया है जिसने धरती और समस्त आकाशों की रचना की है और मैं कदापि शिर्क करने वालों में से नहीं हूँ।1

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  1. यहाँ से आगे पैग़ंबर इब्राहीम (अ.) की उस हुज्जत (निर्णायक तर्क व प्रमाण) का बयान है जो उन्होंने धरती और आकाश में परमेश्वर के साम्राज्य को देखकर अपनी क़ौम के सामने पेश की। ↩
وَحَآجَّهُۥ قَوْمُهُۥ ۚ قَالَ أَتُحَـٰٓجُّوٓنِّى فِى ٱللَّهِ وَقَدْ هَدَىٰنِ ۚ وَلَآ أَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِهِۦٓ إِلَّآ أَن يَشَآءَ رَبِّى شَيْـًٔا ۗ وَسِعَ رَبِّى كُلَّ شَىْءٍ عِلْمًا ۗ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ ﴿80﴾ وَكَيْفَ أَخَافُ مَآ أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُم بِٱللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِۦ عَلَيْكُمْ سُلْطَـٰنًا ۚ فَأَىُّ ٱلْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِٱلْأَمْنِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿81﴾ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَلَمْ يَلْبِسُوٓا۟ إِيمَـٰنَهُم بِظُلْمٍ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ ﴿82﴾

उसकी क़ौम (इस बात पर) उससे झगड़ने लगी। उसने उत्तर दिया: क्या तुम परमेश्वर के बारे में मुझसे झगड़ते हो, यद्यपि उसने मेरा मार्गदर्शन किया है? मैं उनसे नहीं डरता जिन्हें तुम उसका सहभागी बनाते हो। हाँ, यदि मेरा प्रभु ही कुछ चाहे। मेरे प्रभु का ज्ञान हर चीज़ को घेरे हुए है। फिर क्या तुम ध्यान नहीं करते? और मैं उन चीज़ों से कैसे डरूँ जिन्हें तुम सहभागी बनाते हो, जबकि तुम्हारा हाल यह है कि तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने उन चीज़ों को परमेश्वर का सहभागी बना रखा है जिनके पक्ष में उसने तुम पर प्रमाण नहीं उतारा है? अतः (बताओ कि) हम दोनों पक्षों में से कौन शांति व संतोष के लायक है, यदि तुम जानते हो? सत्य यह है कि शांति व संतोष तो उन्हीं के लिए है जो ईमान लाए और उन्होंने अपने मानने को अत्याचार से प्रदूषित नहीं किया और वही मार्ग पाने वाले हैं।

وَتِلْكَ حُجَّتُنَآ ءَاتَيْنَـٰهَآ إِبْرَٰهِيمَ عَلَىٰ قَوْمِهِۦ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَـٰتٍ مَّن نَّشَآءُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ ﴿83﴾ وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ ۚ كُلًّا هَدَيْنَا ۚ وَنُوحًا هَدَيْنَا مِن قَبْلُ ۖ وَمِن ذُرِّيَّتِهِۦ دَاوُۥدَ وَسُلَيْمَـٰنَ وَأَيُّوبَ وَيُوسُفَ وَمُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿84﴾ وَزَكَرِيَّا وَيَحْيَىٰ وَعِيسَىٰ وَإِلْيَاسَ ۖ كُلٌّ مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿85﴾ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَٱلْيَسَعَ وَيُونُسَ وَلُوطًا ۚ وَكُلًّا فَضَّلْنَا عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿86﴾ وَمِنْ ءَابَآئِهِمْ وَذُرِّيَّـٰتِهِمْ وَإِخْوَٰنِهِمْ ۖ وَٱجْتَبَيْنَـٰهُمْ وَهَدَيْنَـٰهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿87﴾ ذَٰلِكَ هُدَى ٱللَّهِ يَهْدِى بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۚ وَلَوْ أَشْرَكُوا۟ لَحَبِطَ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿88﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحُكْمَ وَٱلنُّبُوَّةَ ۚ فَإِن يَكْفُرْ بِهَا هَـٰٓؤُلَآءِ فَقَدْ وَكَّلْنَا بِهَا قَوْمًا لَّيْسُوا۟ بِهَا بِكَـٰفِرِينَ ﴿89﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ هَدَى ٱللَّهُ ۖ فَبِهُدَىٰهُمُ ٱقْتَدِهْ ۗ قُل لَّآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْعَـٰلَمِينَ ﴿90﴾

यह था हमारा वह निर्णायक तर्क जो हमने इब्राहीम को अपनी क़ौम के विरुद्ध प्रदान किया। हम जिसको चाहते हैं, उसे एक के बाद दूसरे पद पर ऊँचा कर देते हैं। सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु प्रज्ञावान तथा ज्ञानी है। (फिर यही नहीं), हमने इब्राहीम को इस्हाक़ और याक़ूब प्रदान किए। उनमें से हर एक का हमने मार्गदर्शन किया। इससे पूर्व यही उपदेश हमने नूह को किया था और (इब्राहीम के बाद) उसकी संतान में से दाऊद, सुलैमान, अय्यूब यूसुफ़ मूसा और हारून को भी। हम भले लोगों को इसी प्रकार बदला दिया करते हैं। और ज़करिया, यह्या, ईसा तथा इल्यास को भी। ये सब सदाचारियों में से थे। और इस्माईल, यसअ, यूनुस और लूत को भी। इनमें से हर एक को हमने दुनिया वालों पर श्रेष्ठता प्रदान की थी। और उनके पूर्वजों, उनकी संतान और उनके भाई बंधुओं का भी हमने मार्गदर्शन किया, उन्हें चुन लिया और (तौहीद के इसी) सीधे मार्ग की ओर उनकी अगुवाई की थी। यह परमेश्वर का मार्गदर्शन है। अपने भक्तों में से वह जिसे चाहता है, (अपने नियम अनुसार) इससे सम्मानित करता है। परंतु यदि कहीं ये लोग भी शिर्क में लिप्त हो गए होते तो इनका सब किया धरा व्यर्थ हो जाता। यही लोग थे जिन्हें हमने दिव्य ग्रंथ और सत्ता और नुबूव्वत प्रदान की थी। इसलिए तुम्हारे ये संबोध्य इसको नकारेंगे तो कोई परवाह नहीं क्योंकि हमने यह वरदान कुछ अन्य लोगों को दे दिया है जो इसको नकारने वाले नहीं होंगे। (नुबुव्वत के ज्ञान को ग्रहण करने वाले जिन लोगों का हमने वर्णन किया है), वही थे जो परमेश्वर की ओर से सीधे मार्ग पर चलने वाला थे, इसलिए उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो। अपितु, इन लोगों से कह दो कि मैं अपने इस आह्वान पर तुमसे कोई दक्षिणा नहीं चाहता (कि नहीं मानोगे तो मेरा कोई घाटा हो जाएगा)। यह तो समस्त मानवता के लिए केवल एक उपदेश है।

وَمَا قَدَرُوا۟ ٱللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِۦٓ إِذْ قَالُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَىٰ بَشَرٍ مِّن شَىْءٍ ۗ قُلْ مَنْ أَنزَلَ ٱلْكِتَـٰبَ ٱلَّذِى جَآءَ بِهِۦ مُوسَىٰ نُورًا وَهُدًى لِّلنَّاسِ ۖ تَجْعَلُونَهُۥ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًا ۖ وَعُلِّمْتُم مَّا لَمْ تَعْلَمُوٓا۟ أَنتُمْ وَلَآ ءَابَآؤُكُمْ ۖ قُلِ ٱللَّهُ ۖ ثُمَّ ذَرْهُمْ فِى خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ ﴿91﴾ وَهَـٰذَا كِتَـٰبٌ أَنزَلْنَـٰهُ مُبَارَكٌ مُّصَدِّقُ ٱلَّذِى بَيْنَ يَدَيْهِ وَلِتُنذِرَ أُمَّ ٱلْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا ۚ وَٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۖ وَهُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ ﴿92﴾

सत्य यह है कि इन लोगों ने परमेश्वर का यथार्थ मोल नहीं पहचाना, जब इन्होंने कह दिया कि परमेश्वर ने किसी मनुष्य पर कुछ नहीं उतारा। इनसे पूछो, फिर उस ग्रंथ को किसने उतारा था जिसको मूसा ले कर आए थे, जो लोगों के लिए प्रकाश और मार्गदर्शन था, जिसका पृष्ठ-पृष्ठ कर के उन्हें दिखाते और अधिकतर भाग छिपा लेते हो और (जिसके माध्यम से) तुम्हें वह ज्ञान दिया गया जिसे न तुम जानते थे न तुम्हारे पूर्वज? कह दो, परमेश्वर ही ने, फिर इन्हें इनके टेढ़े विवादों में छोड़ दो, खेलते रहें। यह (उसी ग्रंथ के समान) एक ग्रंथ है जो हमने उतारा है, बड़े आशीष वाला है, जो कुछ इससे पूर्व आ चुका है, उसकी पुष्टि करता है, इसलिए कि तुम इसके द्वारा लोगों को शुभ समाचार दो और इसलिए कि उन्हें सावधान करो जो उम्मुल्-क़ुरा और उसके आस पास के रहने वाले हैं। (तुम संतुष्ट रहो), जो परलोक को मानते हैं, वही इसे मानेंगे और वही अपनी नमाज़ की रक्षा करते हैं।

وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِىَ إِلَىَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَىْءٌ وَمَن قَالَ سَأُنزِلُ مِثْلَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ ۗ وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذِ ٱلظَّـٰلِمُونَ فِى غَمَرَٰتِ ٱلْمَوْتِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ بَاسِطُوٓا۟ أَيْدِيهِمْ أَخْرِجُوٓا۟ أَنفُسَكُمُ ۖ ٱلْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ ٱلْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ غَيْرَ ٱلْحَقِّ وَكُنتُمْ عَنْ ءَايَـٰتِهِۦ تَسْتَكْبِرُونَ ﴿93﴾ وَلَقَدْ جِئْتُمُونَا فُرَٰدَىٰ كَمَا خَلَقْنَـٰكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَتَرَكْتُم مَّا خَوَّلْنَـٰكُمْ وَرَآءَ ظُهُورِكُمْ ۖ وَمَا نَرَىٰ مَعَكُمْ شُفَعَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ زَعَمْتُمْ أَنَّهُمْ فِيكُمْ شُرَكَـٰٓؤُا۟ ۚ لَقَد تَّقَطَّعَ بَيْنَكُمْ وَضَلَّ عَنكُم مَّا كُنتُمْ تَزْعُمُونَ ﴿94﴾

उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन हो सकता है जो परमेश्वर पर झूठा लांछन लगाए या कहे कि मेरी ओर वह्य आई है, यद्यपि उसकी ओर कोई वह्य न आई हो और उस से बढ़कर जो दावा करे कि मैं भी उस जैसी वाणी उतारे देता हूं, जैसी परमेश्वर ने उतारी है? और कभी तुम देखते, जब ये अत्याचारी मौत की बेहोशियों में होंगे और फ़रिश्ते हाथ बढ़ाए हुए मांग कर रहे होंगे कि लाओ, अपनी जानें सौंप दो, आज तुम्हारे इस अपराध के फलस्वरूप तुम्हें अपमानजनक दण्ड दिया जाएगा कि तुम परमेश्वर पर झूठा लांछन लगाते थे और उसकी आयतों से अहंकार में मुँह फेरते थे। लो, अंततः वैसे ही अकेले-अकेले हमारे पास आ गए हो, जैसे पहली बार हमने तुम्हारी रचना की थी। जो कुछ (दुनिया में) तुम्हें दिया था, वह सब पीछे छोड़ आए हो, और तुम्हारे साथ हम तुम्हारे उन सिफ़ारिशियों को भी नहीं देख रहे जिनके बारे में तुम समझते थे कि तुम्हारे मामले में हमारे सहभागी हैं। तुम्हारे सब संबंध टूट गए और जो कुछ कल्पनाएं तुम किए बैठे थे, वे सब तुम से जाती रही हैं।

إِنَّ ٱللَّهَ فَالِقُ ٱلْحَبِّ وَٱلنَّوَىٰ ۖ يُخْرِجُ ٱلْحَىَّ مِنَ ٱلْمَيِّتِ وَمُخْرِجُ ٱلْمَيِّتِ مِنَ ٱلْحَىِّ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ ﴿95﴾ فَالِقُ ٱلْإِصْبَاحِ وَجَعَلَ ٱلَّيْلَ سَكَنًا وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ حُسْبَانًا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ ﴿96﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلنُّجُومَ لِتَهْتَدُوا۟ بِهَا فِى ظُلُمَـٰتِ ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ ۗ قَدْ فَصَّلْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴿97﴾ وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَكُم مِّن نَّفْسٍ وَٰحِدَةٍ فَمُسْتَقَرٌّ وَمُسْتَوْدَعٌ ۗ قَدْ فَصَّلْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍ يَفْقَهُونَ ﴿98﴾ وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَخْرَجْنَا بِهِۦ نَبَاتَ كُلِّ شَىْءٍ فَأَخْرَجْنَا مِنْهُ خَضِرًا نُّخْرِجُ مِنْهُ حَبًّا مُّتَرَاكِبًا وَمِنَ ٱلنَّخْلِ مِن طَلْعِهَا قِنْوَانٌ دَانِيَةٌ وَجَنَّـٰتٍ مِّنْ أَعْنَابٍ وَٱلزَّيْتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُشْتَبِهًا وَغَيْرَ مُتَشَـٰبِهٍ ۗ ٱنظُرُوٓا۟ إِلَىٰ ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثْمَرَ وَيَنْعِهِۦٓ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكُمْ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿99﴾

दाने और गुठली को फाड़ने वाला परमेश्वर है। वही मृत से जीवित को निकालता है और वही जीवित से मृत को निकाल लाने वाला है। यह है परमेश्वर तो कहां फिरे जाते हो? वही उषा को निकालने वाला है। रात्रि को आराम की चीज़ उसी ने बनाया है और सूरज व चाँद एक माप से रखे हैं। यह उसी परम शक्तिशाली और परम ज्ञानी के बनाए हुए आकलन हैं। वही है जिसने तुम्हारे लिए तारे बनाए ताकि रेगिस्तान और समुद्र के अंधेरों में उनसे रास्ता पा लो। हमने उन लोगों के लिए खोल कर अपनी निशानियों का वर्णन कर दिया है जो जानना चाहें। वही है जिसने तुम्हें एक जान से उत्पन्न किया, फिर हर एक के लिए एक ठहरने का स्थान है और उसके दफ़नाने का स्थान भी। हमने उन लोगों के लिए खोल कर अपनी निशानियों का वर्णन कर दिया है जो समझना चाहें। वही है जिसने आकाश से पानी बरसाया, फिर हमने हर चीज़ के अंकुर उससे निकाले, फिर उससे हरी भरी शाखाएं विकसित कीं जिनसे हम परतों में दाने पैदा कर देते हैं। और खजूर की कोंपलों से लटकते हुए गुच्छे भी इसी से पैदा होते हैं और अंगूरों के बाग़ और ज़ैतून और अनार भी हमने इसी से पैदा किए हैं, जिनके फल एक दूसरे के समान भी हैं और भिन्न-भिन्न भी। (इनमें से) प्रत्येक के फल को देखो, जब वह फलता है और उसके पकने को देखो, जब वह पकता है। इनके अंदर उन लोगों के लिए बड़ी अद्भुत निशानियाँ हैं जो मानना चाहते हैं।

وَجَعَلُوا۟ لِلَّهِ شُرَكَآءَ ٱلْجِنَّ وَخَلَقَهُمْ ۖ وَخَرَقُوا۟ لَهُۥ بَنِينَ وَبَنَـٰتٍۭ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يَصِفُونَ ﴿100﴾ بَدِيعُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُۥ وَلَدٌ وَلَمْ تَكُن لَّهُۥ صَـٰحِبَةٌ ۖ وَخَلَقَ كُلَّ شَىْءٍ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿101﴾ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ خَـٰلِقُ كُلِّ شَىْءٍ فَٱعْبُدُوهُ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ وَكِيلٌ ﴿102﴾ لَّا تُدْرِكُهُ ٱلْأَبْصَـٰرُ وَهُوَ يُدْرِكُ ٱلْأَبْصَـٰرَ ۖ وَهُوَ ٱللَّطِيفُ ٱلْخَبِيرُ ﴿103﴾

परंतु (इनकी मूर्खता की यह दशा है कि) इन्होंने जिन्नों को परमेश्वर का सहभागी बना लिया है, यद्यपि उसी ने उनकी रचना की है और बिना किसी ज्ञान के उसके लिए बेटे और बेटियाँ बना ली हैं। वह पावन और ऊँचा है उन सब बातों से जो ये व्यक्त करते हैं। वह तो धरती आर समस्त आकाशों को अनस्तित्व से अस्तित्व में लाने वाला है। उसकी संतान कहाँ से आई, जबकि उसकी कोई पत्नी ही नहीं है? उसने हर चीज़ की रचना की है और वह सब बातों का जानने वाला है। वही परमेश्वर तुम्हारा प्रभु है, उसके अतिरिक्त कोई उपासना योग्य नहीं, सब वस्तुओं का रचयिता है, इसलिए उसी की भक्ति करो और वह हर चीज़ पर निरीक्षक है। उसको दृष्टि नहीं पा सकती, परंतु वह दृष्टि को पा लेता है। वह अत्यंत प्रज्ञावान और बड़ा जागरूक है।

قَدْ جَآءَكُم بَصَآئِرُ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَنْ أَبْصَرَ فَلِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَنْ عَمِىَ فَعَلَيْهَا ۚ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيْكُم بِحَفِيظٍ ﴿104﴾ وَكَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ وَلِيَقُولُوا۟ دَرَسْتَ وَلِنُبَيِّنَهُۥ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴿105﴾

तुम्हारे प्रभु की ओर से सूझबूझ पैदा करने वाली आयतें तुम्हारे पास आ चुकी हैं। इसलिए अब जो प्रज्ञा प्राप्त करेगा, अपना ही भला करेगा और जो अंधा बना रहेगा, उसका दुष्परिणाम भी वही उठाएगा और (जहां तक मेरा संबंध है तो) मैं तुम पर कोई निरीक्षक नहीं हूँ। हम अपनी आयतें इसी प्रकार अनेक शैलियों से प्रस्तुत करते हैं, ताकि उनपर निर्णायक रूप से सत्य स्थापित हो और ताकि बोल उठें कि तुमने अच्छे से पढ़कर सुना दिया और ताकि हम इसे हर प्रकार से स्पष्ट कर दें उन लोगों के लिए जो जानना चाहें।1

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  1. ये शब्द सीधे पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की ज़बान से हैं। ↩
ٱتَّبِعْ مَآ أُوحِىَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ وَأَعْرِضْ عَنِ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿106﴾ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشْرَكُوا۟ ۗ وَمَا جَعَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ ﴿107﴾

तुम उस चीज़ का अनुसरण करते रहो, (हे पैग़ंबर), जो तुम्हारे प्रभु की ओर से तूम पर वह्य की जा रही है। सत्य यह है कि उसको छोड़ कोई उपासना योग्य नहीं और (ये नहीं मानते तो) इन मुश्रिकों को जाने दो। यदि परमेश्वर चाहता तो ये कभी शिर्क न कर पाते। हमने इनपर तुम्हें निरीक्षक नियुक्त नहीं किया है और न तुम इनके ज़मानत दार हो।

وَلَا تَسُبُّوا۟ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَسُبُّوا۟ ٱللَّهَ عَدْوًۢا بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿108﴾

(ये जिस मूर्खता में पड़े हैं, उस पर भी) तुम लोग उन्हें गाली न दो जिनको परमेश्वर के अतिरिक्त ये पुकारते हैं, कहीं ऐसा न हो कि दुस्साहस करके ये बिना समझे परमेश्वर को गालियां देने लगें। (इसलिए कि) प्रत्येक समुदाय के चाल-चलन को हमने इसी प्रकार उसके लिए आकर्षक बना रखा है, फिर (एक दिन) उन्हें अपने प्रभु की ओर पलटना है, उस समय वह उन्हें बता देगा जो वे करते रहे हैं।

وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ لَئِن جَآءَتْهُمْ ءَايَةٌ لَّيُؤْمِنُنَّ بِهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا ٱلْـَٔايَـٰتُ عِندَ ٱللَّهِ ۖ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَآ إِذَا جَآءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿109﴾ وَنُقَلِّبُ أَفْـِٔدَتَهُمْ وَأَبْصَـٰرَهُمْ كَمَا لَمْ يُؤْمِنُوا۟ بِهِۦٓ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَنَذَرُهُمْ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ ﴿110﴾ وَلَوْ أَنَّنَا نَزَّلْنَآ إِلَيْهِمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ وَكَلَّمَهُمُ ٱلْمَوْتَىٰ وَحَشَرْنَا عَلَيْهِمْ كُلَّ شَىْءٍ قُبُلًا مَّا كَانُوا۟ لِيُؤْمِنُوٓا۟ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ يَجْهَلُونَ ﴿111﴾

ये परमेश्वर की कड़ी-कड़ी क़समें खा कर कहते हैं कि यदि कोई निशानी इनके पास आ जाए तो ये अवश्य उसे मानेंगे। कह दो कि निशानियाँ तो परमेश्वर ही के पास हैं, परंतु, (मुसलमानो), तुम्हें क्या पता कि वे आ भी जाएँ तो ये नहीं मानेंगे। हम (उस समय भी) इनके दिलों और इनकी दृष्टि को उसी प्रकार उलट देंगे, जिस प्रकार इन्होंने पहली बार इस (क़ुरआन) को नहीं माना और इनके विद्रोह में इन्हें भटकता हुआ छोड़ देंगे। हम इनकी ओर फ़रिश्ते भी उतार देते और मुर्दे भी इनसे बातें करने लगते और (दुनिया की) सब चीज़ें इनके सामने समूह के समूह एकत्रित कर देते, जब भी ये मानने वाले नहीं थे, सिवाय इसके कि परमेश्वर चाहे। परंतु (क्या किया जाए कि) इनमें से अधिकांश अज्ञानता में पड़े हैं।

وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِىٍّ عَدُوًّا شَيَـٰطِينَ ٱلْإِنسِ وَٱلْجِنِّ يُوحِى بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ زُخْرُفَ ٱلْقَوْلِ غُرُورًا ۚ وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ مَا فَعَلُوهُ ۖ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُونَ ﴿112﴾ وَلِتَصْغَىٰٓ إِلَيْهِ أَفْـِٔدَةُ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ وَلِيَرْضَوْهُ وَلِيَقْتَرِفُوا۟ مَا هُم مُّقْتَرِفُونَ ﴿113﴾

(यह मामला केवल तुम्हारे साथ नहीं है)। हमने मनुष्यों तथा जिन्नों के दुष्टों को इसी प्रकार प्रत्येक नबी का शत्रु बनाया। वे धोका देने के लिए एक दूसरे को छलपूर्ण बातों की प्रेरणा करते रहते हैं। तेरा प्रभु चाहता तो वे कभी ऐसा न कर पाते। अतः इन्हें इनके दुष्प्रचार में पड़ा रहने दो। इसलिए शत्रु बनाया कि इससे सत्य के प्रति समर्पित व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा स्पष्ट हो जाए और इसलिए कि क़यामत को नकारने वालों के दिल इसी ओर लगे रहें, वे इसी पर संतुष्ट रहें और जो कमाई उन्हें करनी है, कर लें।

أَفَغَيْرَ ٱللَّهِ أَبْتَغِى حَكَمًا وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ إِلَيْكُمُ ٱلْكِتَـٰبَ مُفَصَّلًا ۚ وَٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْلَمُونَ أَنَّهُۥ مُنَزَّلٌ مِّن رَّبِّكَ بِٱلْحَقِّ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ ﴿114﴾ وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدْقًا وَعَدْلًا ۚ لَّا مُبَدِّلَ لِكَلِمَـٰتِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿115﴾ وَإِن تُطِعْ أَكْثَرَ مَن فِى ٱلْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ ﴿116﴾ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ مَن يَضِلُّ عَن سَبِيلِهِۦ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ ﴿117﴾

(तुम मुझसे झगड़ रहे हो) तो (बताओ कि) मैं परमेश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य निर्णय करने वाला ढूंढ लूँ, यद्यपि वही है जिसने तुम्हारी ओर यह ग्रंथ उतारा है जिसमें (धर्म व शरीअत से संबन्धित) हर बात का विस्तारपूर्वक वर्णन है। और जिन्हें हमने (इससे पहले) धर्मग्रंथ प्रदान किया, वे जानते हैं, (हे पैग़ंबर) कि यह तुम्हारे प्रभु की ओर से सत्य के साथ उतारा गया है, इसलिए तुम कहीं संदेह करने वालों से में से न हो जाना। तुम्हारे प्रभु की बात (इन लोगों के बारे में) सत्य तथा न्याय के साथ पूरी हो गई है। उसकी बातें कोई परिवर्तित नहीं कर सकता और वह सुनने वाला और जानने वाला है। धरती वालों में अधिकांश ऐसे हैं कि उनकी बात मानोगे तो तुम्हें परमेश्वर के मार्ग से भटकाकर छोड़ेंगे। ये केवल कल्पनाओं पर चलते और अटकल दौड़ाते हैं। सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु भलीभांति जानता है कि कौन उसके मार्ग से भटक चुका है और जो सीधे मार्ग पर हैं, उन्हें भी वह अच्छे से जानता है।

فَكُلُوا۟ مِمَّا ذُكِرَ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ إِن كُنتُم بِـَٔايَـٰتِهِۦ مُؤْمِنِينَ ﴿118﴾ وَمَا لَكُمْ أَلَّا تَأْكُلُوا۟ مِمَّا ذُكِرَ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ وَقَدْ فَصَّلَ لَكُم مَّا حَرَّمَ عَلَيْكُمْ إِلَّا مَا ٱضْطُرِرْتُمْ إِلَيْهِ ۗ وَإِنَّ كَثِيرًا لَّيُضِلُّونَ بِأَهْوَآئِهِم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُعْتَدِينَ ﴿119﴾ وَذَرُوا۟ ظَـٰهِرَ ٱلْإِثْمِ وَبَاطِنَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْسِبُونَ ٱلْإِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا۟ يَقْتَرِفُونَ ﴿120﴾ وَلَا تَأْكُلُوا۟ مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ وَإِنَّهُۥ لَفِسْقٌ ۗ وَإِنَّ ٱلشَّيَـٰطِينَ لَيُوحُونَ إِلَىٰٓ أَوْلِيَآئِهِمْ لِيُجَـٰدِلُوكُمْ ۖ وَإِنْ أَطَعْتُمُوهُمْ إِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ ﴿121﴾

अतः (तुम लोग चिंता न करो और) यदि उसकी आयतों पर विश्वास रखते हो तो जिन जानवरों को परमेश्वर का नाम लेकर ज़िबह किया गया हो, उन्हें (बिना किसी संकोच के) खाओ। और तुम उन चीज़ों में से क्यों न खाओ जिनपर परमेश्वर का नाम लिया गया हो, यद्यपि उसने जो कुछ तुम्हारे लिए अवैध ठहराया है, उसका विस्तारपूर्वक वर्णन (अपने ग्रंथ में) तुम्हारे लिए कर दिया है, इस छूट के साथ कि तुम किसी चीज़ (को खाने) के लिए विवश हो जाओ। सत्य यह है कि अधिकांश लोग बिना किसी ज्ञान के धर्म में मिलाई हुई अपनी नई प्रथाओं के माध्यम से पथभ्रष्टता फैलाते हैं। मर्यादा तोड़ने वाले इन लोगों को तेरा प्रभु भलीभांति जानता है। तुम इस पाप के प्रकट और अप्रकट, दोनों रूपों को छोड़ दो। जो लोग इस पाप को कमाते हैं, वे शीघ्र ही अपनी इस कमाई का बदला पा लेंगे। परंतु, उन जानवरों में से कदापि मत खाओ जिन्हें परमेश्वर का नाम लेकर ज़िबह नहीं किया गया और याद रखो कि निस्संदेह यह स्पष्ट अवज्ञा है। और सावधान रहो कि शैतान अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरणा कर रहे हैं कि वे (इस मामले में भी) तुमसे झगड़ा करें। और सावधान रहो कि यदि इनका कहा मानोगे तो कोई शक नहीं कि तुम भी मुश्रिक होकर रह जाओगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहाँ पाप से तात्पर्य शिर्क (अर्थात परमेश्वर के सहभागी बनाना) है। ↩
أَوَمَن كَانَ مَيْتًا فَأَحْيَيْنَـٰهُ وَجَعَلْنَا لَهُۥ نُورًا يَمْشِى بِهِۦ فِى ٱلنَّاسِ كَمَن مَّثَلُهُۥ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ لَيْسَ بِخَارِجٍ مِّنْهَا ۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلْكَـٰفِرِينَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿122﴾ وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا فِى كُلِّ قَرْيَةٍ أَكَـٰبِرَ مُجْرِمِيهَا لِيَمْكُرُوا۟ فِيهَا ۖ وَمَا يَمْكُرُونَ إِلَّا بِأَنفُسِهِمْ وَمَا يَشْعُرُونَ ﴿123﴾ وَإِذَا جَآءَتْهُمْ ءَايَةٌ قَالُوا۟ لَن نُّؤْمِنَ حَتَّىٰ نُؤْتَىٰ مِثْلَ مَآ أُوتِىَ رُسُلُ ٱللَّهِ ۘ ٱللَّهُ أَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِسَالَتَهُۥ ۗ سَيُصِيبُ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ صَغَارٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعَذَابٌ شَدِيدٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَمْكُرُونَ ﴿124﴾ فَمَن يُرِدِ ٱللَّهُ أَن يَهْدِيَهُۥ يَشْرَحْ صَدْرَهُۥ لِلْإِسْلَـٰمِ ۖ وَمَن يُرِدْ أَن يُضِلَّهُۥ يَجْعَلْ صَدْرَهُۥ ضَيِّقًا حَرَجًا كَأَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِى ٱلسَّمَآءِ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْعَلُ ٱللَّهُ ٱلرِّجْسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿125﴾ وَهَـٰذَا صِرَٰطُ رَبِّكَ مُسْتَقِيمًا ۗ قَدْ فَصَّلْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍ يَذَّكَّرُونَ ﴿126﴾ لَهُمْ دَارُ ٱلسَّلَـٰمِ عِندَ رَبِّهِمْ ۖ وَهُوَ وَلِيُّهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿127﴾

(तुम इनकी चिंता न करो)। क्या जो मुर्दा था, फिर हमने उसे जीवित कर दिया और उसको एक ऐसा प्रकाश प्रदान किया जिसे वह लोगों के बीच लेकर चल रहा है, उस व्यक्ति जैसा हो जाएग जिसका हाल यह है कि अंधकारों में पड़ा हुआ है, किसी प्रकार उन से निकालने वाला नहीं है? इन नकारने वालों के कर्म इनके लिए इसी प्रकार आकर्षक बना दिए गए हैं। प्रत्येक बस्ती में उसके बड़े-बड़े अपराधियों को हमने इसी प्रकार ढील दी कि उसमें अपनी चालें चल लें। वे ये चालें अपने साथ ही चलते थे, परंतु उन्हें इन का बोध नहीं था। जब उनके सामने कोई आयत आती तो कहते थे: हम कभी नहीं मानेंगे, जब तक हमें वही न दिया जाए जो परमेश्वर के रसूलों को दिया गया है। परमेश्वर भलीभांति जानता है कि अपनी रिसालत का पद किसे प्रदान करे। परमेश्वर के पास ये अपराधी शीघ्र ही अपने षडयंत्रों के परिणामस्वरूप अपमान और कठोर दण्ड के भागी हो जाएँगे। अतः, (ये मार्गदर्शन पाने वाले नहीं हैं, इसलिए कि) परमेश्वर (अपने नियम अनुसार) जिस का मार्गदर्शन करना चाहता है, उसका दिल इस्लाम के लिए खोल देता है और जिसे भटकाना चाहता है, उसका दिल तंग कर देता और ऐसा भींचता है मानो उसे आकाश में चढ़ना पड़ रहा है। परमेश्वर इसी प्रकार उन लोगों पर अपवित्रता थोप देता है जो नहीं मानते। सत्य यह है कि यह मार्ग तेरे प्रभु का सीधा मार्ग है। (इसकी व्याख्या में) अपनी आयतों का वर्णन हमने उन लोगों के लिए विस्तारपूर्वक कर दिया है जो उपदेश प्राप्त करें। उनके कर्मों के बदले में उनके प्रभु के पास उनके लिए शांति का घर है और वह उनकी बिगड़ी बनाने वाला है।

وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا يَـٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ قَدِ ٱسْتَكْثَرْتُم مِّنَ ٱلْإِنسِ ۖ وَقَالَ أَوْلِيَآؤُهُم مِّنَ ٱلْإِنسِ رَبَّنَا ٱسْتَمْتَعَ بَعْضُنَا بِبَعْضٍ وَبَلَغْنَآ أَجَلَنَا ٱلَّذِىٓ أَجَّلْتَ لَنَا ۚ قَالَ ٱلنَّارُ مَثْوَىٰكُمْ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ ﴿128﴾ وَكَذَٰلِكَ نُوَلِّى بَعْضَ ٱلظَّـٰلِمِينَ بَعْضًۢا بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ ﴿129﴾ يَـٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌ مِّنكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِى وَيُنذِرُونَكُمْ لِقَآءَ يَوْمِكُمْ هَـٰذَا ۚ قَالُوا۟ شَهِدْنَا عَلَىٰٓ أَنفُسِنَا ۖ وَغَرَّتْهُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا وَشَهِدُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ كَـٰفِرِينَ ﴿130﴾ ذَٰلِكَ أَن لَّمْ يَكُن رَّبُّكَ مُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا غَـٰفِلُونَ ﴿131﴾ وَلِكُلٍّ دَرَجَـٰتٌ مِّمَّا عَمِلُوا۟ ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ ﴿132﴾ وَرَبُّكَ ٱلْغَنِىُّ ذُو ٱلرَّحْمَةِ ۚ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَسْتَخْلِفْ مِنۢ بَعْدِكُم مَّا يَشَآءُ كَمَآ أَنشَأَكُم مِّن ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ ءَاخَرِينَ ﴿133﴾ إِنَّ مَا تُوعَدُونَ لَـَٔاتٍ ۖ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ ﴿134﴾ قُلْ يَـٰقَوْمِ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنِّى عَامِلٌ ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن تَكُونُ لَهُۥ عَـٰقِبَةُ ٱلدَّارِ ۗ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿135﴾

उस दिन को याद रखो, जब वह इन सब (अपराधियों) को एकत्रित करेगा, (फिर कहेगा): हे जिन्नों के समूह, तुम ने तो मनुष्यों में से अनेकों को अपना लिया और मनुष्यों में से उनके साथी (झट से) कहेंगे: प्रभु, हममें से हर एक ने दूसरे से अच्छा स्वाद उठाया और (आज) अपनी उस अवधि को पहुँच गए हैं जो तू ने हमारे लिए निर्धारित कर दी थी… परमेश्वर कहेगा: अब आग तुम्हारा ठिकाना है, तुम उसमें सदा रहोगे, किंतु जो परमेश्वर चाहे। सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु प्रज्ञावान और ज्ञानी है। हम दुष्टों को उनके दुष्कर्मों के कारण इसी प्रकार एक दूसरे पर थोप देते हैं। हे जिन्नों और मनुष्यों के समूह, क्या तुम्हारे पास स्वयं तुम में से वह पैग़ंबर नहीं आए थे जो मेरी आयतें तुम्हें सुनाते और तुम्हारे इस दिन की भेंट से तुम्हें सूचित करते थे? वे कहेंगे: हम स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी हैं। (इन पर अफ़सोस), दुनिया के जीवन ने इन्हें धोके में डाले रखा और अब स्वयं अपने विरुद्ध गवाही दे रहे हैं कि वे नकारने वाले थे। हमने यह पैग़ंबर इसी लिए भेजे थे कि तुम्हारा प्रभु बस्तियों को उनके अत्याचार के परिणामस्वरूप नष्ट करने वाला नहीं है, जबकि उनके निवासी (सत्य) से अंजान हों। इनमें से हर एक की श्रेणी अब उसके कर्मों के अनुसार है और जो कुछ ये करते रहे हैं, तुम्हारा प्रभु उससे अंजान नहीं है। तुम्हारा प्रभु निःस्पृह है, वह कृपाओं वाला है। यदि वह चाहे तो तुम्हें ले जाए और तुम्हारे बाद तुम्हारे स्थान पर जिसको चाहे, ले आए, जिस प्रकार उसने अन्य लोगों के वंश से तुम्हें उठाया है। (याद रखो), जिस बात का वचन तुम्हें दिया जा रहा है, वह आ कर रहे गी और तुम (परमेश्वर को) विवश नहीं कर सकते। (हे पैग़ंबर), कह दो कि मेरी क़ौम के लोगो, तुम अपने मार्ग पर चलो, मैं अपने मार्ग पर चल रहा हूँ। अतः शीघ्र ही तुम जान लोगे कि अगले घर का अच्छा परिणाम किसके लिए है। सत्य यही है कि अत्याचारी कभी सफलता नहीं पाएँगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. आगे का वाक्य बता रहा है कि मनुष्य जाती के शैतानों की यह बात बीच ही में काट दी जाएगी और उन्हें क्षमा-याचना का अवसर दिए बिना ही परमेश्वर अपना फ़ैसला सुना देगा। ↩
وَجَعَلُوا۟ لِلَّهِ مِمَّا ذَرَأَ مِنَ ٱلْحَرْثِ وَٱلْأَنْعَـٰمِ نَصِيبًا فَقَالُوا۟ هَـٰذَا لِلَّهِ بِزَعْمِهِمْ وَهَـٰذَا لِشُرَكَآئِنَا ۖ فَمَا كَانَ لِشُرَكَآئِهِمْ فَلَا يَصِلُ إِلَى ٱللَّهِ ۖ وَمَا كَانَ لِلَّهِ فَهُوَ يَصِلُ إِلَىٰ شُرَكَآئِهِمْ ۗ سَآءَ مَا يَحْكُمُونَ ﴿136﴾ وَكَذَٰلِكَ زَيَّنَ لِكَثِيرٍ مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ قَتْلَ أَوْلَـٰدِهِمْ شُرَكَآؤُهُمْ لِيُرْدُوهُمْ وَلِيَلْبِسُوا۟ عَلَيْهِمْ دِينَهُمْ ۖ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا فَعَلُوهُ ۖ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُونَ ﴿137﴾ وَقَالُوا۟ هَـٰذِهِۦٓ أَنْعَـٰمٌ وَحَرْثٌ حِجْرٌ لَّا يَطْعَمُهَآ إِلَّا مَن نَّشَآءُ بِزَعْمِهِمْ وَأَنْعَـٰمٌ حُرِّمَتْ ظُهُورُهَا وَأَنْعَـٰمٌ لَّا يَذْكُرُونَ ٱسْمَ ٱللَّهِ عَلَيْهَا ٱفْتِرَآءً عَلَيْهِ ۚ سَيَجْزِيهِم بِمَا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ ﴿138﴾ وَقَالُوا۟ مَا فِى بُطُونِ هَـٰذِهِ ٱلْأَنْعَـٰمِ خَالِصَةٌ لِّذُكُورِنَا وَمُحَرَّمٌ عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِنَا ۖ وَإِن يَكُن مَّيْتَةً فَهُمْ فِيهِ شُرَكَآءُ ۚ سَيَجْزِيهِمْ وَصْفَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ حَكِيمٌ عَلِيمٌ ﴿139﴾ قَدْ خَسِرَ ٱلَّذِينَ قَتَلُوٓا۟ أَوْلَـٰدَهُمْ سَفَهًۢا بِغَيْرِ عِلْمٍ وَحَرَّمُوا۟ مَا رَزَقَهُمُ ٱللَّهُ ٱفْتِرَآءً عَلَى ٱللَّهِ ۚ قَدْ ضَلُّوا۟ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ ﴿140﴾

(इनका अत्याचार यहाँ तक पहुँच चुका है कि) परमेश्वर के लिए इन्होंने स्वयं उसी की पैदा की हुई खेती और चौपायों में से एक हिस्सा निर्धारित किया है और अपने तौर पर, कहते हैं कि यह परमेश्वर का है, और यह हमारे बनाए हुए सहभागियों के लिए है। फिर जो इनके बनाए हुए सहभागियों के लिए है, वह तो परमेश्वर को नहीं पहुँच सकता और जो परमेश्वर का है, वह इनके सहभागियों को पहुँच सकता है। कैसे ही बुरे निर्णय हैं जो ये लोग करते हैं। इसी प्रकार बहुत से मुश्रिकों के लिए उनकी संतान की हत्या को उनके बनाए हुए सहभागियों ने आकर्षक बना दिया है, ताकि उनको बर्बाद कर डालें और ताकि उनके धर्म को उनके लिए संदिग्ध बना दें। परमेश्वर चाहता तो वे ऐसा नहीं कर पाते। इसलिए उन्हें छोड़ो कि अपने इसी झूठ में पड़े रहें। कहते हैं कि ये चौपाये और ये खेती निषिद्ध हैं, इन्हें केवल वही खा सकते हैं जिन्हें हम खिलाना चाहें, अपनी कल्पना के अनुसार। इसी प्रकार कुछ जानवर हैं जिनकी पीठें (इनकी कल्पना में) हराम करदी गई हैं और कुछ जानवर हैं जिन पर केवल परमेश्वर से झूठ बांध कर परमेश्वर का नाम नहीं लेते। परमेश्वर शीघ्र ही उनके इन मनगढ़ंत कार्यों का बदला उनको देगा जो वे करते रहे हैं। और कहते हैं कि जो कुछ इन जानवरों के गर्भ में है, वह हमारे पुरुषों के लिए विशेष है और हमारी स्त्रियों के लिए अवैध है, परंतु यदि वह मृत हो तो दोनों उस (के खाने) में भागी हो सकते हैं। परमेश्वर अति शीघ्र उनकी इन बातों का दण्ड उन्हें देगा। निस्संदेह, वह प्रज्ञावान और ज्ञानी है। अवश्य ही अभागे हुए वे लोग जिन्होंने अपनी संतान की हत्या केवल मूर्खता से, बिना किसी ज्ञान के की और परमेश्वर ने जो जीविका उन्हें प्रदान की थी, उसे परमेश्वर पर झूठ लगा कर अवैध बनाया है। वे अवश्य ही भटक गए हैं और कभी भी सीधे मार्ग पर नहीं रहे।

وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَ جَنَّـٰتٍ مَّعْرُوشَـٰتٍ وَغَيْرَ مَعْرُوشَـٰتٍ وَٱلنَّخْلَ وَٱلزَّرْعَ مُخْتَلِفًا أُكُلُهُۥ وَٱلزَّيْتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُتَشَـٰبِهًا وَغَيْرَ مُتَشَـٰبِهٍ ۚ كُلُوا۟ مِن ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثْمَرَ وَءَاتُوا۟ حَقَّهُۥ يَوْمَ حَصَادِهِۦ ۖ وَلَا تُسْرِفُوٓا۟ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْمُسْرِفِينَ ﴿141﴾ وَمِنَ ٱلْأَنْعَـٰمِ حَمُولَةً وَفَرْشًا ۚ كُلُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴿142﴾

(इनके बनाए हुए सहभागी नहीं, अपितु) वही परमेश्वर है जिसने नाना प्रकार के बाग़ पैदा किए हैं, (इनमें से) कुछ जालियों पर चढ़ाए जाते हैं और कुछ नहीं चढ़ाए जाते। इसी प्रकार खजूर की रचना की और खेतियाँ उगाई हैं जिनके अनेक प्रकार के फल हैं और ज़ैतून और अनार जो एक दूसरे से मिलते जुलते भी हैं और भिन्न-भिन्न भी— इनके उत्पाद से खाओ, जब ये फलें और इनपर जो देय बनता है उसे चुकाया करो, जिस दिन ये काटे जाएँ और लापरवाही से व्यर्थ न उड़ाओ। परमेश्वर (इस प्रकार) व्यर्थ उड़ाने वालों को प्रिय नहीं रखता। सवारी और भार उठाने के चौपायों की रचना भी उसी ने की है और वे उनकी भी जो धरती से लगे हुए चलते हैं। परमेश्वर ने जो कुछ तुम्हें प्रदान किया है, उससे लाभ उठाओ और शैतान के पदचिह्नों का अनुसरण न करो, वह तुम्हारा खुला शत्रु है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात इनमें परमेश्वर का हक़ चुकाओ जो ज़कात के रूप में स्थापित किया गया है। ↩
ثَمَـٰنِيَةَ أَزْوَٰجٍ ۖ مِّنَ ٱلضَّأْنِ ٱثْنَيْنِ وَمِنَ ٱلْمَعْزِ ٱثْنَيْنِ ۗ قُلْ ءَآلذَّكَرَيْنِ حَرَّمَ أَمِ ٱلْأُنثَيَيْنِ أَمَّا ٱشْتَمَلَتْ عَلَيْهِ أَرْحَامُ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۖ نَبِّـُٔونِى بِعِلْمٍ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿143﴾ وَمِنَ ٱلْإِبِلِ ٱثْنَيْنِ وَمِنَ ٱلْبَقَرِ ٱثْنَيْنِ ۗ قُلْ ءَآلذَّكَرَيْنِ حَرَّمَ أَمِ ٱلْأُنثَيَيْنِ أَمَّا ٱشْتَمَلَتْ عَلَيْهِ أَرْحَامُ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۖ أَمْ كُنتُمْ شُهَدَآءَ إِذْ وَصَّىٰكُمُ ٱللَّهُ بِهَـٰذَا ۚ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا لِّيُضِلَّ ٱلنَّاسَ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿144﴾

(तुम इन चौपायों में से) आठ नर और मादाओं को लो, दो भेड़ की प्रजाति से और दो बकरी की प्रजाति से, फिर इनसे पूछो कि परमेश्वर ने इन दोनों के नर हराम किए हैं या मादा या उस बच्चे को हराम घोषित किया है जो मादाओं के गर्भ में है? मुझे किसी प्रमाण के साथ बताओ, यदि तुम सच्चे हो? इसी प्रकार दो ऊंट की प्रजाति से और दो गाय की प्रजाति से, फिर पूछो कि परमेश्वर ने इन दोनों के नर हराम किए हैं या मादा या उस बच्चे को हराम घोषित किया है जो मादाओं के गर्भ में है? क्या तुम उस समय उपस्थित थे, जब परमेश्वर ने तुम्हें इसका निर्देश दिया था? फिर उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो परमेश्वर पर झूठ लगाए, इसलिए कि बिना किसी ज्ञान के लोगों को सीधे मार्ग से भटकाए? परमेश्वर ऐसे अत्याचारी व्यक्तियों को कभी मार्ग नहीं दिखाएगा।

قُل لَّآ أَجِدُ فِى مَآ أُوحِىَ إِلَىَّ مُحَرَّمًا عَلَىٰ طَاعِمٍ يَطْعَمُهُۥٓ إِلَّآ أَن يَكُونَ مَيْتَةً أَوْ دَمًا مَّسْفُوحًا أَوْ لَحْمَ خِنزِيرٍ فَإِنَّهُۥ رِجْسٌ أَوْ فِسْقًا أُهِلَّ لِغَيْرِ ٱللَّهِ بِهِۦ ۚ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿145﴾

इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर कि) जो वह्य मेरे पास आई है, उसमें तो मैं नहीं देखता कि किसी खाने वाले के लिए कोई चीज़ हराम की गई है, जिसे वह खाता है, इसके अतिरिक्त कि वह स्वयं मरा हुआ जानवर हो या बहाया हुआ रक्त हो या सूअर का मांस हो, इसलिए कि ये अशुद्ध हैं, या परमेश्वर की अवज्ञा कर के किसी जानवर को परमेश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य के नाम पर ज़िबह किया गया हो। इस पर भी जो विवश हो जाए, न इच्छुक हो, न सीमा को लांघने वाला तो तेरा प्रभु क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।1

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  1. अर्थात जो उनमें से अवैध (हराम) की गई है जिन्हें वह तैय्यिबात (शुद्ध व पवित्र वस्तुएँ) मान कर खाता है। ↩
وَعَلَى ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ حَرَّمْنَا كُلَّ ذِى ظُفُرٍ ۖ وَمِنَ ٱلْبَقَرِ وَٱلْغَنَمِ حَرَّمْنَا عَلَيْهِمْ شُحُومَهُمَآ إِلَّا مَا حَمَلَتْ ظُهُورُهُمَآ أَوِ ٱلْحَوَايَآ أَوْ مَا ٱخْتَلَطَ بِعَظْمٍ ۚ ذَٰلِكَ جَزَيْنَـٰهُم بِبَغْيِهِمْ ۖ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ ﴿146﴾ فَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل رَّبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍ وَٰسِعَةٍ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُهُۥ عَنِ ٱلْقَوْمِ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿147﴾

(अपितु, यह ठीक है कि) जिन लोगों ने यहूदी धर्म अपना रखा है, उनके लिए हमने सब नाखून वाले जानवर हराम कर दिए थे और गाय और बकरी की चर्बी भी हराम कर दी थी, सिवाए उसके जो उनकी पीठ या अंतड़ियों से लगी हो या किसी हड्डी से लगी हुई रह जाए। यह हमने उनकी अवज्ञा का दण्ड उन्हें दिया था और हम पूर्णतः सच्चे हैं। इसके बाद भी यदि वे तुम्हें झूठा कहें तो कह दो कि तुम्हारे प्रभु की दया में बड़ी व्यापकता है, परंतु (इसके साथ यह भी सत्य है कि उसकी दी दुई ढील समाप्त हो गई तो) अपराधी लोगों पर से उसका दण्ड नहीं टाला जा सकेगा।

سَيَقُولُ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ لَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشْرَكْنَا وَلَآ ءَابَآؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن شَىْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ حَتَّىٰ ذَاقُوا۟ بَأْسَنَا ۗ قُلْ هَلْ عِندَكُم مِّنْ عِلْمٍ فَتُخْرِجُوهُ لَنَآ ۖ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنْ أَنتُمْ إِلَّا تَخْرُصُونَ ﴿148﴾ قُلْ فَلِلَّهِ ٱلْحُجَّةُ ٱلْبَـٰلِغَةُ ۖ فَلَوْ شَآءَ لَهَدَىٰكُمْ أَجْمَعِينَ ﴿149﴾ قُلْ هَلُمَّ شُهَدَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ يَشْهَدُونَ أَنَّ ٱللَّهَ حَرَّمَ هَـٰذَا ۖ فَإِن شَهِدُوا۟ فَلَا تَشْهَدْ مَعَهُمْ ۚ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَآءَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ وَهُم بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ ﴿150﴾

(इसके प्रतिउत्तर में) ये मुश्रिक अब कहेंगे की यदि परमेश्वर चाहता तो न हम शिर्क करते, न हमारे पुरखे और न हम किसी चीज़ को हराम कहते। उन लोगों ने भी इसी प्रकार नकार दिया था जो इनसे पहले चल बसे हैं, यहाँ तक कि उन्होंने हमारे दण्ड का स्वाद चख लिया। इनसे पूछो, तुम्हारे पास कोई ज्ञान है कि हमारे सामने उसे प्रस्तुत कर सको? (सत्य यह है कि) तुम केवल निराधार कल्पना और कोरी अटकलों पर चल रहे हो। इनसे कहो कि परमेश्वर के पास तो (तुम्हारे लिए) केवल निर्णायक प्रमाण है, पहुँच जाने वाला। फिर (यह भी सोचो कि) वह यदि चाहता तो तुम सबको सीधे मार्ग पर ले आता, (कभी शिर्क और भ्रष्ट मार्ग पर न डालता)। इनसे कहो कि लाओ अपने वे साक्षी जो (ज्ञान और विवेक के आधार पर) गवाही दें कि परमेश्वर ने यह चीज़ हराम घोषित की है। फिर यदि वे (ढिठाई के साथ झूठी) गवाही के लिए खड़े हो जाएँ तो तुम उनके साथ यह गवाही न देना और उन लोगों की इच्छाओं का अनुसरण न करना जिन्होंने हमारी आयतों को झूठा कह दिया है, जो परलोक को नहीं मानते और अपने प्रभु के समकक्ष बनाते हैं।

قُلْ تَعَالَوْا۟ أَتْلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمْ عَلَيْكُمْ ۖ أَلَّا تُشْرِكُوا۟ بِهِۦ شَيْـًٔا ۖ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَـٰنًا ۖ وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَوْلَـٰدَكُم مِّنْ إِمْلَـٰقٍ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكُمْ وَإِيَّاهُمْ ۖ وَلَا تَقْرَبُوا۟ ٱلْفَوَٰحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ ۖ وَلَا تَقْتُلُوا۟ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۚ ذَٰلِكُمْ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿151﴾ وَلَا تَقْرَبُوا۟ مَالَ ٱلْيَتِيمِ إِلَّا بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُۥ ۖ وَأَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ وَٱلْمِيزَانَ بِٱلْقِسْطِ ۖ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَإِذَا قُلْتُمْ فَٱعْدِلُوا۟ وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَىٰ ۖ وَبِعَهْدِ ٱللَّهِ أَوْفُوا۟ ۚ ذَٰلِكُمْ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿152﴾ وَأَنَّ هَـٰذَا صِرَٰطِى مُسْتَقِيمًا فَٱتَّبِعُوهُ ۖ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ ٱلسُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُمْ عَن سَبِيلِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمْ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿153﴾

इनसे कहो कि आओ, मैं तुम्हें सुनाऊं कि तुम्हारे प्रभु ने तुम्हारे लिए क्या हराम किया है? यह कि किसी को उसका सहभागी न बनाओ और माता-पिता के साथ उत्तम व्यवहार करो, (उनके साथ कभी कोई बुरा आचरण न अपनाओ) और ग़रीबी के भय से अपनी संतान की हत्या न करो। हम तुम्हें भी जीविका देते हैं और उनको भी देंगे। और अश्लीलता के समीप न जाओ, चाहे वह खुली हो या छिपी हुई। और किसी जीव की, जिसे परमेश्वर ने हराम घोषित किया है, अनुचित रूप से हत्या न करो। ये बातें हैं जिनका परमेश्वर ने तुम्हें उपदेश किया है ताकि तुम समझ से काम लो। और यह कि अनाथ के धन के समीप न जाओ, परंतु ऐसे ढंग से जो (उसके लिए) अच्छा हो, यहाँ तक कि वह वयस्क आयु को पहुँच जाए। और नाप तोल न्यायपूर्वक पूरा रखो। हम किसी व्यक्ति पर उसकी क्षमता से अधिक भार नहीं डालते। और जब बात कहो तो सत्य की बात कहो, यद्यपि मामला अपने किसी सगे-संबंधी ही का हो। और परमेश्वर से की प्रतिज्ञा को पूरा करो। ये बातें हैं जिनका परमेश्वर ने तुम्हें उपदेश किया है ताकि तुम स्मरण प्राप्त करो। और कहा है कि यही मेरा मार्ग है, सीधा। इसलिए इसी का अनुसरण करो और दूसरे मार्गों पर न चलो कि वे तुम्हारे प्रभु के मार्ग से तुम्हें अलग कर दें। ये बातें हैं जिनका उसने तुम्हें उपदेश किया है ताकि तुम उसकी पकड़ से बचे रहो।

ثُمَّ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ تَمَامًا عَلَى ٱلَّذِىٓ أَحْسَنَ وَتَفْصِيلًا لِّكُلِّ شَىْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَّعَلَّهُم بِلِقَآءِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ ﴿154﴾

(यह इब्राहीम का धर्म है, इसके बाद) फिर हमने मूसा को ग्रंथ प्रदान किया, उस पर अपना वरदान पूरा करने के लिए जिसने सदाचार को अपनाया था, (धर्म व शरीअत से संबन्धित) हर बात का विस्तार और मार्गदर्शन तथा साक्षात कृपा बनाकर, ताकि लोग अपने प्रभु से मिलने पर विश्वास करें।

وَهَـٰذَا كِتَـٰبٌ أَنزَلْنَـٰهُ مُبَارَكٌ فَٱتَّبِعُوهُ وَٱتَّقُوا۟ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ﴿155﴾ أَن تَقُولُوٓا۟ إِنَّمَآ أُنزِلَ ٱلْكِتَـٰبُ عَلَىٰ طَآئِفَتَيْنِ مِن قَبْلِنَا وَإِن كُنَّا عَن دِرَاسَتِهِمْ لَغَـٰفِلِينَ ﴿156﴾ أَوْ تَقُولُوا۟ لَوْ أَنَّآ أُنزِلَ عَلَيْنَا ٱلْكِتَـٰبُ لَكُنَّآ أَهْدَىٰ مِنْهُمْ ۚ فَقَدْ جَآءَكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ ۚ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَذَّبَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَصَدَفَ عَنْهَا ۗ سَنَجْزِى ٱلَّذِينَ يَصْدِفُونَ عَنْ ءَايَـٰتِنَا سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ بِمَا كَانُوا۟ يَصْدِفُونَ ﴿157﴾ هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ يَأْتِىَ رَبُّكَ أَوْ يَأْتِىَ بَعْضُ ءَايَـٰتِ رَبِّكَ ۗ يَوْمَ يَأْتِى بَعْضُ ءَايَـٰتِ رَبِّكَ لَا يَنفَعُ نَفْسًا إِيمَـٰنُهَا لَمْ تَكُنْ ءَامَنَتْ مِن قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِىٓ إِيمَـٰنِهَا خَيْرًا ۗ قُلِ ٱنتَظِرُوٓا۟ إِنَّا مُنتَظِرُونَ ﴿158﴾

और अब यह ग्रंथ है, जो हमने उतारा है, कल्याणकारी ग्रंथ। अतः इसका अनुसरण करो और (परमेश्वर से) डरते रहो ताकि तुम पर दया की जाए। इसलिए उतारा है कि कहीं तुम कहो कि धर्मग्रंथ तो हमसे पूर्व के दो समूहों पर उतारा गया था और हम उसके पढ़ने पढ़ाने से पूर्णतः अंजान थे। या कहो कि यदि हम पर धर्मग्रंथ उतारा जाता तो हम उनसे बढ़कर सीधे मार्ग पर होते। इसलिए तुम्हारे प्रभु की ओर से यह एक स्पष्ट प्रमाण और मार्गदर्शन व साक्षात दया तुम्हारे पास आ गई है, अब उनसे बढ़कर कौन अत्याचारी होगा जो परमेश्वर की आयतों को झूठा कहें और उनसे विमुख हो जाएं? जो लोग हमारी आयतों से विमुख हो रहे हैं, उन्हें इस विमुखता के परिणामस्वरूप हम शीघ्र ही अत्यंत बुरा दण्ड देंगे। क्या वे इसी की प्रतीक्षा में हैं कि उन के पास फ़रिश्ते आएं या तेरा प्रभु आ जाए या तेरे प्रभु की निशानियों में से कोई विशेष निशानी प्रकट हो जाए? जिस दिन तेरे प्रभु की निशानियों में से (इस प्रकार की) कोई विशेष निशानी प्रकट हो जाएगी, उस दिन किसी ऐसे व्यक्ति को उसका ईमान कोई लाभ नहीं देगा जो पहले ईमान नहीं लाया हो या अपने ईमान में उसने कोई भलाई न कमाई हो। कह दो कि (इसी की हठ करते हो तो) प्रतीक्षा करो, हम भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُوا۟ دِينَهُمْ وَكَانُوا۟ شِيَعًا لَّسْتَ مِنْهُمْ فِى شَىْءٍ ۚ إِنَّمَآ أَمْرُهُمْ إِلَى ٱللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ ﴿159﴾ مَن جَآءَ بِٱلْحَسَنَةِ فَلَهُۥ عَشْرُ أَمْثَالِهَا ۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَىٰٓ إِلَّا مِثْلَهَا وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿160﴾

(परमेश्वर के बताए हुए इस सीधे मार्ग को छोड़कर, हे पैग़ंबर), जिन लोगों ने अपने धर्म में पगडंडियाँ निकालीं और गुटों में बट गए हैं, उनसे तुम्हारा कोई संबंध नहीं। उनका मामला केवल परमेश्वर के हवाले है। अतः वही उन्हें बताएगा जो कुछ वे करते रहे हैं। (फिर उसके पास) जो पुण्य लेकर आएगा, उसके लिए दस गुना बदला है और जो बुराई लेकर आएगा, उसे उतना ही बदला मिलेगा जितनी उसकी बुराई है और इन लोगों के साथ कोई अन्याय नहीं किया जाएगा।

قُلْ إِنَّنِى هَدَىٰنِى رَبِّىٓ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ دِينًا قِيَمًا مِّلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًا ۚ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿161﴾ قُلْ إِنَّ صَلَاتِى وَنُسُكِى وَمَحْيَاىَ وَمَمَاتِى لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿162﴾ لَا شَرِيكَ لَهُۥ ۖ وَبِذَٰلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلْمُسْلِمِينَ ﴿163﴾ قُلْ أَغَيْرَ ٱللَّهِ أَبْغِى رَبًّا وَهُوَ رَبُّ كُلِّ شَىْءٍ ۚ وَلَا تَكْسِبُ كُلُّ نَفْسٍ إِلَّا عَلَيْهَا ۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ ﴿164﴾ وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَكُمْ خَلَـٰٓئِفَ ٱلْأَرْضِ وَرَفَعَ بَعْضَكُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَـٰتٍ لِّيَبْلُوَكُمْ فِى مَآ ءَاتَىٰكُمْ ۗ إِنَّ رَبَّكَ سَرِيعُ ٱلْعِقَابِ وَإِنَّهُۥ لَغَفُورٌ رَّحِيمٌۢ ﴿165﴾

इनसे कह दो कि मुझे तो मेरे प्रभु ने एक सीधा मार्ग दिखाया है — खरा धर्म, अर्थात इब्राहीम के धर्म का मार्ग, जो पूर्णतः एकाग्र था और कदापि मुश्रिकों में से नहीं था। कह दो कि मेरी नमाज़ और मेरा बलिदान, मेरा जीवन और मेरी मृत्यु, सब जगत प्रभु परमेश्वर के लिए है। उसका कोई सहभागी नहीं। मुझे इसी का आदेश मिला है और मैं सबसे पहले आज्ञापालन करने वाला हूँ। इनसे पूछो, क्या मैं परमेश्वर को छोड़ किसी अन्य प्रभु की खोज करूँ, जबकि वही सब चीज़ों का प्रभु है? (मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। तुम नहीं मानते तो जान लो कि) हर व्यक्ति जो कुछ कमाता है, उसका उत्तरदायी वह स्वयं है और कोई किसी दूसरे का भार नहीं उठाएगा। फिर तुम्हारे प्रभु ही की ओर तुम सब को लौटना है। उस समय वह तुम्हें बता देगा जिस बात में तुम मतभेद कर रहे हो। (याद रखो कि) वही है जिसने तुम्हें धरती की सत्ता प्रदान की और एक को दूसरे से उत्तम पद दिए ताकि जो कुछ उसने तुम्हें प्रदान किया है, उसमें तुम्हारी परीक्षा करे। (तुम संतुष्ट रहो, हे पैग़ंबर), तुम्हारा प्रभु दण्ड देने में भी बहुत तीव्र है और बड़ा क्षमा करने वाला और दया करने वाला भी है।