सूरह 5
अल्-माइदह्
मदनी · 120 आयतें · 45 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
हे मानने वालो, (अपने प्रभु से बांधे हुए सब) वचन पूरे करो। तुम्हारे लिए मवेशियों की प्रजाति के सभी चौपाये वैध बनाए गए हैं, सिवाए उनके जो तुम्हें बताए जा रहे हैं। परंतु एहराम की अवस्था में शिकार को वैध न कर लो। (यह परमेश्वर का आदेश है और) परमेश्वर जो चाहता है, आदेश देता है।
हे मानने वालो, परमेश्वर के प्रतीकों का अनादर न करो, न पवित्र महीनों का, न हदी के जानवरों का, न (उनमें से विशेषतः) उन जानवरों का जिनके गले में मनौती के पट्टे बंधे हुए हों, और न बैत-उल्-हराम के यात्रियों का जो अपने प्रभु की कृपाओं और उसकी प्रसन्नता की खोज में निकलते हैं। हाँ, एहराम की अवस्था से निकल जाओ तो शिकार कर सकते हो। तुम्हारे लिए मस्जिद-ए-हराम का मार्ग कुछ लोगों ने बंद कर दिया था तो उनके साथ इस आधार पर तुम्हारी शत्रुता भी तुम्हें इतना न भड़का दे कि तुम मर्यादाओं का उल्लंघन करो। (नहीं, हर परिस्थिति में परमेश्वर की मर्यादाओं का पालन करते रहो), और पुण्य व धर्मपरायणता के कार्यों में सहयोग करो, परंतु अधिकार हनन व अत्याचार में सहयोग न करो और परमेश्वर से डरते रहो, इसलिए कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है।
तुम्हारे लिए मृत पशु और ख़ून और सूअर का मांस और परमेश्वर के सिवा किसी अन्य के नाम का ज़बीहा अवैध बनाया गया है और (इसी के अंतर्गत) वह जानवर भी जो गला घुटने से मरा हो, जो चोट से मरा हो, जो ऊपर से गिर कर मरा हो, जो सींग लगकर मरा हो, जिसे किसी दरिंदे ने फाड़ दिया हो, सिवाए उसके जिसे तुमने (जीवित पाकर) ज़िबह कर लिया। इसी प्रकार, ऐसे जानवर भी अवैध हैं जो किसी देवी-देवता आदि की चौखट पर ज़िबह किए गए हों और यह भी कि तुम (उनका मांस) जूए के तीरों से बाँट दो। (तुम्हें जानना चाहिए कि) ये सब परमेश्वर की अवज्ञा के कार्य हैं। ये नकारने वाले अब तुम्हारे धर्म की ओर से निराश हो गए हैं, इसलिए (इन निषेधात्मक निर्देशों के विषय में) इनसे न डरो, मुझी से डरो। तुम्हारे धर्म को आज मैंने तुम्हारे लिए पूरा कर दिया है और तुम पर अपना उपकार संपन्न कर दिया है और तुम्हारे लिए धर्म के रूप में इस्लाम को चुन लिया है। (अतः मेरे इन निर्देशों का पालन करो ), फिर जो भूख से विवश हो कर इनमें से कोई चीज़ खा ले, बिना पाप की ओर आकर्षित हुए तो इसमें संकोच नहीं, इसलिए कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
वे तुमसे पूछते हैं कि उनके लिए क्या चीज़ हलाल की गई है? कह दो, सभी स्वच्छ चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल हैं और शिकारी जानवरों में से जिनको तुमने शिकार पर दौड़ाने के लिए प्रशिक्षित किया है, जिन्हें तुम उस ज्ञान में से कुछ सिखाकर प्रशिक्षित करते हो जो परमेश्वर ने तुम्हें सिखाया है, (उनका किया हुआ शिकार भी हलाल है)। इसलिए जो वे तुम्हारे लिए रोक रखें, उसमें से खाओ और (जानवर को शिकार पर छोड़ने से पहले) उस पर परमेश्वर का नाम ले लिया करो और परमेश्वर से डरते रहो। निस्संदेह, परमेश्वर शीघ्र ही हिसाब चुकाने वाला है।
सभी स्वच्छ चीज़ें अब तुम्हारे लिए हलाल कर दी गई हैं। (इसलिए) अहल-ए-किताब का खाना तुम्हारे लिए वैध है और तुम्हारा खाना उनके लिए वैध है। इसी प्रकार (शिर्क और तौहीद की सीमाएं भी स्पष्ट हो गई हैं, इसलिए) मुसलमानों की शुद्ध चरित्रवाली स्त्रियाँ तुम्हारे लिए वैध हैं और उन लोगों की शुद्ध चरित्रवाली स्त्रियाँ भी वैध हैं जिन्हें तुमसे पूर्व धर्मग्रंथ दिया गया, जब तुम उनके महर उन्हें चुका देते हो, इस शर्त के साथ कि तुम भी सदाचारी रहने वाले हो न कि व्यभिचार करने वाले और न चोरी छिपे प्रेम संबंध रखने वाले। (अपितु, अपने ईमान को हर स्थिति में विशुद्ध रखो) और (जानते रहो कि) जो ईमान के नकारने वाले होंगे, उनका सारा परिश्रम व्यर्थ हुआ और क़यामत के दिन वे असफल व्यक्तियों में से होंगे।
हे मानने वालो, (यही शुद्धता परमेश्वर के सामने उपस्थित होने के लिए भी चाहिए, इसलिए) जब नमाज़ के लिए उठो तो अपने चेहरों को और हाथों को कुहनियों तक धो लिया करो और अपने सिरों पर हाथ फेर लो और अपने पैरों को भी टखनों तक धो लो। और यदि जनाबत की हालत में हो तो नहा कर पवित्र हो जाओ। और यदि कभी ऐसा हो कि तुम अस्वस्थ हो या यात्रा में हो या तुम में से कोई शौच कर के आए या स्त्रियों से मिलाप किया हो और तुमको पानी न मिले तो कोई पवित्र जगह देखो और उससे अपने चेहरे और हाथों का मसह कर लो। परमेश्वर तुम पर कोई कठिनाई नहीं डालना चाहता, परंतु यह अवश्य चाहता है कि तुम्हें विशुद्ध बनाए, (इसलिए वुज़ू और स्नान को अनिवार्य बनाता है) और चाहता है कि अपना वरदान तुम पर संपन्न करे, (इसलिए मजबूरी की परिस्थिति में तयम्मुम की अनुमति देता है) ताकि तुम उसके आभारी रहो।
(इस छूट से लाभ उठाओ) और अपने ऊपर परमेश्वर के उस वरदान को याद रखो और उसके उस वचन को भी जो उसने तुम्हें दिया था, जब तुमने कहा कि हमने सुन लिया और हम आज्ञाकारी हैं, (इसे याद रखो) और परमेश्वर से डरो, इसलिए कि परमेश्वर दिलों के भेद तक जानता है। हे मानने वालो, (इस वचन की मांग है कि) परमेश्वर के लिए खड़े हो जाओ, न्याय की गवाही देते हुए और किसी क़ौम की शत्रुता भी तुम्हें इस पर न उकसाए कि न्याय से फिर जाओ। न्याय करो, यही धर्मपरायणता के अधिक निकट है और परमेश्वर से डरते रहो, इसलिए कि परमेश्वर तुम्हारे हर कर्म से परिचित है। परमेश्वर ने उन लोगों से वादा कर रखा है जिन्होंने माना और जिन्होंने अच्छे कर्म किए हैं कि उनके लिए क्षमा और एक बड़ा प्रतिफल है। इसके विपरीत जो नकारने वाले हैं और उन्होंने हमारी आयतों को झूठा कहा है, वही नरक में जाने वाले हैं। हे मानने वालो, और अपने ऊपर परमेश्वर के उस उपकार को भी याद करो जब एक क़ौम ने तुम पर हमला करने की इच्छा की तो परमेश्वर ने उनके हाथ तुमसे रोक दिए और परमेश्वर से डरते रहो और (याद रखो कि) मानने वालों को तो परमेश्वर ही पर भरोसा करना चाहिए।
परमेश्वर ने इसी प्रकार इस्राईलियों से भी वचन लिया था और (उसके निरीक्षण के लिए) हमने उनमें से बारह प्रधान नियुक्त किए थे और परमेश्वर ने उन्हें वचन दिया था कि मैं तुम्हारे साथ रहूंगा। यदि तुमने नमाज़ का प्रबंध किया और ज़कात दी और मेरे रसूलों को माना और उनकी सहायता की और परमेश्वर, (अपने प्रभु) को ऋण देते रहे, उत्तम ऋण तो विश्वास रखो कि मैं तुम्हारी त्रुटियां तुमसे दूर कर दूंगा और तुम्हें अवश्य ऐसे बाग़ों में प्रवेश दूँगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। फिर इस (वचन) के बाद भी जो तुम में से नकारने वाले हों तो उन्हें जानना चाहिए कि वे सीधे मार्ग से भटक गए हैं। अतः अपने इसी वचन को तोड़ देने ही के कारण हमने उन्हें अभिशाप दिया और उनके दिल कठोर कर दिए। (अब इनकी दशा यह है कि) ये बात को उसके संदर्भ से हटा देते हैं और जिस चीज़ के माध्यम से इन्हें याद दिलाया गया था, उसका एक हिस्सा भुला बैठे हैं और (यह इसी का परिणाम है कि) आए दिन तुम इनकी किसी न किसी बेईमानी की सूचना पाते हो। इनमें से बहुत थोड़े हैं जो इन चीज़ों से बचे हुए हैं। (इनसे अब तुम किसी भलाई की आशा नहीं कर सकते), इसलिए जाने दो, (हे पैग़ंबर) और इन्हें अनदेखा करते रहो, इसलिए कि परमेश्वर उन लोगों से प्रेम करता है जो भला आचरण अपनाते हैं।
इसी प्रकार हमने उनसे भी वचन लिया था जो कहते हैं कि हम नसारा हैं। फिर जिस चीज़ के माध्यम से उन्हें याद दिलाया गया, उसका एक हिस्सा वे भी भुला बैठे तो हमने क़यामत तक के लिए इन दोनों के बीच विद्वेष और शत्रुता की आग भड़का दी। (अब उसी में जल रहे हैं) और परमेश्वर शीघ्र ही इन्हें बता देगा जो कुछ ये करते रहे हैं।
हे अहल-ए-किताब, हमारा पैग़ंबर तुम्हारे पास आ गया है जो परमेश्वरीय ग्रंथ की ऐसी बहुत सी बातें तुम्हारे लिए खोल रहा है जिन्हें तुम छुपाते रहे हो और बहुत सी बातों को अनदेखा भी कर रहा है। तुम्हारे पास यह परमेश्वर की ओर से एक प्रकाश आ गया है, अर्थात एक ऐसा ग्रंथ जो (धर्म व शरीअत से संबंधित हर बात को) स्पष्ट कर देने वाला है। इसके माध्यम से परमेश्वर उन लोगों को जो उसकी प्रसन्नता चाहते हैं, शांति के अनेक मार्ग दिखाता है और अपनी कृपा से उन्हें अंधेरों से निकालकर उजाले की ओर लाता है और एक सीधे मार्ग की ओर उनकी अगुआई करता है।
इसमें संदेह नहीं कि उन लोगों ने कुफ़्र किया है जिन्होंने कहा कि परमेश्वर तो यही मर्यम-पुत्र ईसा मसीह है। इनसे पूछो कि परमेश्वर के आगे किसका कुछ चलता है, यदि वह चाहे कि मर्यम-पुत्र ईसा मसीह का, उसकी मां का और सभी धरती वासियों का विनाश कर दे। (उसके निर्णयों पर कोई प्रभावी नहीं हो सकता, इसलिए कि) धरती और समस्त आकाशों और उनके बीच में जो कुछ है, उसका साम्राज्य परमेश्वर ही के लिए है। वह जो कुछ चाहता है, उत्पन्न कर देता है और परमेश्वर हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।
इन यहूदियों और नसरानियों का दावा है कि हम परमेश्वर के पुत्र और उसके लाडले हैं। इनसे पूछो, फिर तुम्हारे पापकर्मों पर वह तुम्हें दण्ड क्यों देता रहा है? कदापि नहीं, अपितु तुम भी उस के पैदा किए हुए मनुष्यों में से मनुष्य ही हो। वह तुम में से जिसको चाहेगा, क्षमा कर देगा और जिसको चाहेगा, अपने नियमानुसार दण्ड देगा। उसके फ़ैसलों पर कोई प्रभावी नहीं हो सकता, इसलिए कि धरती और समस्त आकाशों और उनके बीच में जो कुछ है, उसका साम्राज्य परमेश्वर ही के लिए है और तुम में से हर एक को उसी की ओर लौटना है।
हे अहल-ए-किताब, हमारा यह पैग़ंबर रसूलों की नियुक्ति में एक अंतराल के बाद तुम्हारे पास आया है और धर्म को (हर पहलू से) तुम्हारे लिए स्पष्ट कर रहा है ताकि तुम यह न कह सको कि हमारे पास तो कोई शुभ सूचना देने वाला और सचेत करने वाला आया ही नहीं। इसलिए देख लो, वह शुभ सूचना देने वाला और सचेत करने वाला तुम्हारे पास आ गया है (कि पकड़ से पहले तुम्हारे विरुद्ध अपने प्रमाणों का संचार निर्णायक रूप से कर दे) और परमेश्वर हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।
(अपने अपराधों के परिणाम से डरो, हे अहल-ए-किताब), और याद करो वह घटना जब मूसा ने अपने लोगों से कहा: मेरी क़ौम के लोगो, अपने ऊपर परमेश्वर के उस वरदान को याद करो कि उसने तुम में नबी बनाए और तुम्हें राजा बनाया है और तुम्हें वह कुछ दे दिया है जो दुनिया वालों में से उसने किसी को नहीं दिया है। मेरी क़ौम के लोगो, इसके लिए उस पवित्र भूमि में चले जाओ जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए लिख दी है और अपनी पीठ पर उल्टे न फिरो, अन्यथा असफल हो जाओगे। उन्होंने उत्तर दिया: मूसा, उसमें बड़े शक्तिशाली लोग रहते हैं, हम उस में कदापि प्रवेश नहीं करेंगे, जब तक वे वहां से निकल न जाएँ। हाँ, यदि वे निकल जाएं तो हम अवश्य प्रवेश करेंगे। इन डरने वालों में दो व्यक्ति, अपितु ऐसे थे जिन पर परमेश्वर की कृपा थी, उन्होंने कहा: तुम इस नगर के लोगों पर चढ़ाई करके इसके द्वार में घुस जाओ। फिर जब उसमें घुस जाओगे तो तुम्ही विजयी रहोगे और परमेश्वर ही पर भरोसा करो, यदि तुम उसके मानने वाले हो। परंतु उन्होंने फिर यही कहा कि मूसा, जब तक वे वहां उपस्थित हैं, हम उस में कभी प्रवेश नहीं करेंगे, इसलिए तुम और तुम्हारा प्रभु, दोनों जाओ और लड़ो, हम तो यहाँ बैठे हुए हैं।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात् फ़लस्तीन (Palestine), जिसे परमेश्वर ने अपने धर्मप्रचार के लिए विशेष रूप से चुन लिया था और इसी आधार पर आदेश दिया था कि उसके निवासियों से उसे ख़ाली करा लिया जाए। ↩
इस पर मूसा ने प्रार्थना की: प्रभु, मेरे और मेरे भाई के सिवा किसी पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, इसलिए तू हमें और इन अवज्ञाकारी लोगों को अलग-अलग कर दे। परमेश्वर ने कहा: यही बात है तो यह भूमि चालीस वर्षों के लिए इनके लिए वर्जित है, ये धरती में मारे-मारे फिरेंगे, इसलिए अब इन अवज्ञाकारियों पर अफ़सोस न करो।
(तुम्हारे विरोध में अब ये उत्पात मचाने को तत्पर हैं, हे पैग़ंबर), इन्हें आदम के दो बेटों की घटना सुनाओ, ठीक-ठीक, जब उन दोनों ने क़ुर्बानी प्रस्तुत की तो उनमें से एक की क़ुर्बानी स्वीकार कर ली गई और दूसरे की स्वीकार नहीं की गई। (फिर जिस की क़ुर्बानी स्वीकार नहीं की गई), उसने कहा: मैं तुझे मार डालूंगा। दूसरे ने उत्तर दिया: परमेश्वर तो अपने उन्हीं भक्तों की क़ुर्बानी स्वीकार करता है जो उससे डरने वाले हों। तुम मेरी हत्या करने के लिए अपना हाथ मुझपर उठाओगे तो भी मैं तुम्हारी हत्या के लिए तुम पर अपना हाथ उठाने वाला नहीं हूं, मैं जगत प्रभु परमेश्वर से डरता हूं। मैं चाहता हूं कि (तुमने मेरी हत्या का संकल्प कर लिया है तो) अपने और मेरे पाप का भार तुम ही ले जाओ और नरक वासी बन कर रहो। इस प्रकार के अत्याचारियों का यही दण्ड है।
(इस पर भी वह नहीं रुका और) उसके जी ने अंततः अपने भाई की हत्या पर उसको प्रेरित कर लिया और उसकी हत्या कर वह उन लोगों में मिल गया जो घाटा उठाने वाले हैं। फिर परमेश्वर ने एक कौए को भेजा जो भूमि खोदने लगा ताकि उसको बताए कि वह अपने भाई का शव किस प्रकार छिपाए। (यह देखकर) वह बोला: हाय मेरा दुर्भाग्य, मैं इस कौए जैसा भी न हो सका कि अपने भाई का शव ही छिपा लेता। अतः इस पर वह अत्यंत शर्मिंदा हुआ।
(मनुष्य का) यही (विद्रोह) है जिसके कारण हमने (मूसा को शरीअत दी तो उसमें) इस्राईलियों के लिए भी अपना यह फ़रमान लिख दिया था कि जिसने किसी एक मनुष्य की हत्या की, बिना इसके कि उसने किसी की हत्या की हो या धरती में कोई उपद्रव फैलाया हो तो मानो उसने समस्त मानवता की हत्या कर दी और जिसने किसी एक मनुष्य को जीवन प्रदान किया, उसने जैसे समस्त मानवता को जीवन प्रदान किया। फिर यही नहीं, इसके साथ यह भी सच है कि (इन पर इत्माम-ए-हुज्जत के लिए) हमारे पैग़ंबर इनके पास अत्यंत स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, परंतु इसके बाद भी इनमें से बहुत से हैं जो धरती में अतिक्रमण करने वाले हैं।
(इन्हें बता दिया जाए कि) जो परमेश्वर और उसके रसूल से लड़ेंगे और इस प्रकार धरती में बिगाड़ पैदा करने का प्रयास करेंगे, उनका दण्ड फिर यही है कि भयंकर रूप से उनकी हत्या की जाए या सूली पर चढ़ाए जाएं या उनके हाथ और पाँव विपरीत दिशाओं में काट दिए जाएं या उन्हें देश से निकाल दिया जाए। यह उनके लिए दुनिया में दुर्गति है और परलोक में उनके लिए एक बड़ी यातना है, परंतु उनके लिए नहीं जो तुम्हारे वश में आने से पहले प्रायश्चित कर लें। इसलिए (उनके विरुद्ध अतिक्रमण न करो और) अच्छे से समझ लो कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
(यह परमेश्वर की शरीअत है)। हे मानने वालो, तुम (इसके बारे में) परमेश्वर से डरते रहो, उसकी निकटता ढूंढो और इसके लिए उसके मार्ग में निरंतर संघर्ष करते रहो ताकि सफलता पाओ। रहे वे लोग जो (पैग़ंबर की ओर से सत्य का निर्णायक रूप से संचार होने पर भी इसके) नकारने वाले हैं तो उन्हें यदि धरती का सारा धन प्राप्त हो जाए और उसके साथ इतना ही और भी, इसलिए कि उसे बदले में देकर वे अपने आप को क़यामत के दिन की यातना से छुड़ा लें तो उनसे वह स्वीकार नहीं किया जाएगा और उन्हें कष्टदायक यातना मिलकर रहेगी। वे आग से निकलना चाहेंगे, परंतु उससे कभी निकल नहीं सकेंगे। उनके लिए वहां स्थायी यातना है।
(यह परमेश्वर की शरीअत है, इसे दृढ़तापूर्वक पकड़ो) और चोर पुरुष हो या स्त्री, उनका अपराध सिद्ध हो जाए तो उनके हाथ काट दो, उनके कर्म के परिणामस्वरूप और परमेश्वर की ओर से शिक्षाप्रद दण्ड के रूप में और (याद रखो कि) परमेश्वर सब पर प्रभावी है, वह बड़ा प्रज्ञावान है। फिर जिसने अपने इस उत्पीड़न के बाद प्रायश्चित और सुधार कर लिया तो परमेश्वर उस पर कृपादृष्टि करेगा। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। क्या तुम नहीं जानते कि धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य परमेश्वर ही के लिए है? वह जिसको चाहेगा, दण्ड देगा और जिसको चाहेगा, (अपने नियम और अपनी प्रज्ञा के अनुसार) क्षमा कर देगा। परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।
तुम्हें वे लोग दुखी न करें, हे पैग़ंबर, जो (परमेश्वर की शरीअत को) नकारने में एक दूसरे से बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, वे भी जो मुँह से कहते हैं कि हमने माना है, यद्यपि उन्होंने दिल से नहीं माना और वे भी जो यहूदी हो चुके हैं। ये झूठ पर कान लगाते हैं, उन लोगों के झूठ पर जो इनसे अलग एक अन्य समूह हैं, जो कभी तुम्हारे पास नहीं आए, बात का संदर्भ निर्धारित हो जाने पर भी उसको वास्तविक अर्थ से हटा देते हैं, कहते हैं कि तुम्हारे मामले का निपटारा ऐसा हो तो मानो और न हो तो उससे बचकर रहो। (ये परीक्षा में पड़ चुके हैं) और जिसको परमेश्वर परीक्षा में डालना चाहे, वह उसमें पड़ कर रहता है। फिर परमेश्वर के विरुद्ध तुम उसके लिए कुछ भी नहीं कर सकते। यही हैं जिनके बारे में परमेश्वर ने नहीं चाहा कि इनके दिलों को शुद्ध करे। इनके लिए दुनिया में भी दुर्गति है और परलोक में भी एक भीषण दण्ड है। ये झूठ पर कान लगाते और (झूठी गवाही के लिए) निसंकोच हराम खाते हैं, इसलिए (निर्णय के लिए) तुम्हारे पास आएं तो तुम्हें अधिकार है कि इनका निर्णय करो या टाल दो। तुम इन्हें टाल दोगे तो ये तुम्हें कोई क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे और यदि निर्णय करोगे तो तुम पर अनिवार्य है कि उनके बीच न्यायसंगत निर्णय करो। इसलिए कि परमेश्वर उन्हीं लोगों से प्रेम करता है जो न्यायसंगत निर्णय करते हैं। ये तुमसे किस प्रकार निर्णय कराते हैं, यद्यपि इनके पास तौरात है जिसमें परमेश्वर का निर्णय उपलब्ध है, फिर निर्णय के लिए तुम्हारे पास आने के बाद उससे भी फिर जाते हैं? सत्य यह है कि ये मानने वाले लोग ही नहीं हैं।
यह तौरात हमने ही उतारी, जिसमें मार्गदर्शन भी था और प्रकाश भी। परमेश्वर के आज्ञाकारी नबी, यहूदी विद्वान और धर्माचार्य इन यहूदियों के मामलों का निपटारा इसी के अनुसार करते थे, इसलिए कि उन्हें इस धर्मग्रंथ का रखवाला और इस पर साक्षी बनाया गया था। फिर (यह निर्देश भी इसके बारे में दिया गया था कि) लोगों से न डरो, अपितु मुझसे डरो और मेरी आयतों को थोड़ी धनराशि के बदले में न बेचो और (याद रखो कि) जो लोग परमेश्वर के उतारे हुए विधान के अनुसार निर्णय न करें, वही नकारने वाले हैं। और इसी ग्रंथ में हमने इनपर अनिवार्य किया था कि जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, दाँत के बदले दाँत और इसी प्रकार अन्य घावों का भी क़िसास है। फिर जिसने उसे क्षमा कर दिया तो उसके लिए प्रायश्चित बन जाएगा। (यह परमेश्वर का विधान है) और जो परमेश्वर के उतारे हुए विधान के अनुसार निर्णय न करें, वही अत्याचारी हैं।1
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- अर्थात् क़िसास (प्रतिशोध/retaliation) क्षमा कर दिया। ↩
इन्हीं (नबियों) के पीछे-पीछे हमने मर्यम-पुत्र ईसा को भेजा, उससे पहले जो तौरात उपलब्ध थी, वह उसकी पुष्टि करने वाला था। और हमने उसको इंजील प्रदान की जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था और वह भी तौरात की पुष्टि करने वाली थी जो उससे पूर्व उपलब्ध थी, परमेश्वर से डरने वालों के लिए मार्गदर्शन और सदुपदेश के रूप में और इस आदेश के साथ कि इंजील वाले भी उसी के अनुसार निर्णय करें, जो परमेश्वर ने उसमें उतारा है और जो परमेश्वर के उतारे हुए विधान के अनुसार निर्णय न करें, वही आज्ञाकारी हैं।
फिर हमने, (हे पैग़ंबर), तुम्हारी ओर यह ग्रंथ उतारा है, निर्णायक बात के साथ और उस ग्रंथ की पुष्टि में जो इससे पूर्व उपलब्ध है और उसका रखवाला बनाकर। इसलिए तुम इनका निपटारा उस विधान के अनुसार करो जो परमेश्वर ने उतारा है और जो सत्य तुम्हारे पास आ चुका है, उससे हटकर अब इनकी इच्छाओं का अनुसरण न करो — तुम में से हर एक के लिए हमने एक शरीअत, अर्थात एक कार्यविधि निर्धारित की है। परमेश्वर चाहता तो तुम्हें एक ही समूह बना देता, परंतु उसने यह नहीं किया इसलिए कि जो कुछ उसने तुम्हें प्रदान किया है, उसमें तुम्हारी परीक्षा करे। अतः भलाई के कार्यों में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करो। तुम सबको (एक दिन) परमेश्वर ही की ओर लौटना है, फिर वह तुम्हें बता देगा सब चीज़ें जिनमें तुम मतभेद करते रहे हो — और वही बात कि इनका निर्णय उस विधान के अनुसार करो जो परमेश्वर ने उतारा है और इनकी इच्छाओं का अनुसरण न करो और इनसे सावधान रहो कि कहीं ऐसा न हो कि ये लोग तुम्हें मार्गदर्शन की किसी बात से बहका दें जो परमेश्वर ने तुम्हारी ओर उतारी है। फिर यदि वे मुँह मोड़ें तो जान लो कि परमेश्वर इनको इनके कुछ पापकर्मों का दण्ड देना चाहता है और सत्य यह है कि इन लोगों में से अधिकांश लोग अवज्ञाकारी हैं। (परमेश्वर के विधान को छोड़कर) फिर क्या ये जाहिली काल का निर्णय चाहते हैं? यद्यपि उन लोगों के लिए परमेश्वर से अच्छा निर्णय किसका हो सकता है जो (परमेश्वर और परलोक) पर विश्वास रखते हैं।
हे मानने वालो, तुम इन यहूदियों और ईसाइयों को मित्र न बनाओ, ये एक दूसरे के मित्र हैं, और (याद रखो कि) तुम में से यदि कोई (इस चेतावनी के होते हुए) इन्हें अपना मित्र बनाता है तो फिर उसे इन्हीं में से माना जाएगा। सत्य यह है कि परमेश्वर इस प्रकार के अत्याचारियों को कभी सीधा मार्ग नहीं दिखाता। अतः तुम देखते हो कि जिनके दिलों में (निफ़ाक़ का) रोग है, वे इनसे मेल-जोल बढ़ाने में उत्सुक हैं। कहते हैं कि हमें डर है कि किसी संकट में न फंस जाएँ। अतः अधिक संभावना है कि परमेश्वर (तुम्हें) विजयी कर दे या अपनी ओर से कोई अन्य बात प्रकट कर दे तो इन्हें उस बात पर पछताना पड़े जो अपने दिलों में छिपाए हुए हैं। (विश्वास रखो कि इनके साथ यही होगा) और मानने वाले (उस अवसर पर) कहेंगे कि क्या यह वही हैं जो परमेश्वर के नाम की बड़ी सौगंध खाकर विश्वास दिलाते थे कि वे तुम्हारे साथ हैं? (अफ़सोस), इनके सब कर्म व्यर्थ चले गए और ये दुर्भाग्यशाली होकर रह गए।
हे मानने वालो, (यह आचरण धर्म त्याग देने का आचरण है। अतः याद रखो कि) तुम में से जो अपने धर्म से फिरेगा, परमेश्वर को उसकी कोई चिन्ता नहीं, इसलिए कि परमेश्वर शीघ्र ही ऐसे व्यक्ति उठा देगा जिनसे वह प्रेम करेगा और वे उससे प्रेम करेंगे, मुसलमानों के लिए उदार और इन नकारने वालों के विरुद्ध अत्यंत कठोर होंगे, परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करेंगे और (इसमें) किसी निंदा करने वाले की निंदा की चिन्ता नहीं करेंगे। यह परमेश्वर का उपकार है, वह (अपने नियम और अपनी प्रज्ञा अनुसार) जिसको चाहेगा, प्रदान करेगा। परमेश्वर बड़ा सामर्थ्य रखने वाला है, वह सब कुछ जानता है।
(ये तुम्हारे मित्र नहीं हैं)। तुम्हारे मित्र तो वास्तव में परमेश्वर और उसका रसूल और वे मानने वाले हैं जो विनम्रता तथा भक्ति सहित नमाज़ का प्रबंध करते और ज़कात देते हैं। और जो परमेश्वर और उसके रसूल और सच्चे मानने वालों को अपना मित्र बना लें, वही प्रभावी रहेंगे, इसलिए कि परमेश्वर का संघ ही है जो प्रभावी रहने वाला है।
हे मानने वालो, तुमसे पहले जिन्हें धर्मग्रंथ दिया गया, उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे धर्म को हंसी और खेल बना लिया है, उन्हें और अन्य नकारने वालों को अपना मित्र न बनाओ और परमेश्वर से डरो, यदि तुम मोमिन हो। (तुम देखते नहीं हो कि) जब तुम नमाज़ के लिए बुलाते हो तो वे उसका मज़ाक़ उड़ाते और खेल बना लेते हैं। इसका कारण यह है कि ये वे लोग हैं जो बुद्धि से काम नहीं लेते। इनसे कहो, हे अहल-ए-किताब, क्या इसी बात का गुस्सा हम पर निकाल रहे हो कि हमने परमेश्वर पर विश्वास किया है और उस धर्मग्रंथ पर विश्वास किया है जो हमारी ओर उतारा गया है और उसपर भी जो इससे पूर्व उतारा गया, और इस कारण कि तुम में से अधिकांश लोग अवज्ञाकारी हैं। इनसे कहो, मैं तुम्हें उन लोगों का पता दूँ जिनका अंत पामेश्वर के पास उससे भी बुरा है (जो तुम हमारे लिए सोचते हो)? ये वे हैं जिनपर परमेश्वर का अभिशाप हुआ, जिनपर उसका प्रकोप हुआ, जिनके भीतर से उसने बंदर और सूअर बनाए और जिन्होंने शैतान की पूजा की है। ये सबसे नीच और उचित मार्ग से बहुत दूर भटके हुए हैं।
ये जब तुम्हारे पास आते हैं तो कहते हैं कि हम तो ईमान लाए हुए हैं, यद्यपि कुफ़्र लिए हुए आते और उसी के साथ वापस लौट जाते हैं और (नहीं समझते कि) परमेश्वर अच्छे प्रकार से जानता है जो कुछ ये दिलों में छिपाए हुए हैं। तुम देखते हो कि इनमें से अधिकांश व्यक्ति अधिकार हनन, अन्याय तथा अत्याचार और अपनी हरामखोरी के लिए सक्रिय हैं। कैसा बुरा है जो कुछ ये कर रहे हैं। इनके विद्वान और धर्माचार्य इन्हें पाप की बात कहने और निषिद्ध पदार्थ खाने से क्यों नहीं रोकते? कैसा ही बुरा है जो कुछ ये कर रहे हैं।
यहूदी कहते हैं कि परमेश्वर के हाथ बंधे हुए हैं — इन्हीं के हाथ बँध जाएँ और इनकी इस बात के कारण ये अभिशप्त हों — कदापि नहीं, अपितु उसके दोनों हाथ खुले हैं, वह जिस प्रकार चाहता है, प्रदान करता है। सत्य यह है कि इनमें से अनेक लोगों की अकड़ और इनके कुफ़्र को वह चीज़ बढ़ाकर रहेगी जो तुमपर तुम्हारे प्रभु के ओर से उतरी है। (इनका यही आचरण है जिसके कारण) हमने क़यामत के दिन तक के लिए इनमें शत्रुता और घृणा डाल दी है। ये जब कभी युद्ध की आग भड़काते हैं, परमेश्वर उसे बुझा देता है, (नहीं तो ये इसी प्रकार विद्रोह फैलाते) और धरती में उपद्रव मचाने का प्रयास करते हैं, परंतु परमेश्वर इन उपद्रवियों से कदापि प्रेम नहीं करता।1
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- अर्थात् इस बात के लिए बँधे हुए हैं कि वह हमारे सिवा किसी और पर अपनी वाणी अवतरित करे और उसे नुबुव्वत (prophethood) तथा धर्मग्रन्थ प्रदान करे। ↩
इसके विपरीत यदि ये अहल-ए-किताब (हमारे पैग़ंबर को) स्वीकार करते और संयम अपनाते तो (इसके फलस्वरूप) हम इनकी बुराइयाँ इनसे दूर कर देते और इनको राहत के बाग़ों पहुँचाते। और यदि ये (सामूहिक रूप से) तौरात और इंजील और उस चीज़ का पालन करते जो इनके प्रभु की ओर से इनपर उतारी गई है तो अपने ऊपर से और पाँव के नीचे से जीविका पाते। (इसमें संदेह नहीं कि) इनमें एक समूह ऐसा भी है जो सदाचार पर क़ायम है, परंतु इनमें से अधिकांश वही हैं जिनके कर्म बहुत बुरे हैं।
(इनकी चिंता न करो), हे पैग़ंबर, (और) जो कुछ तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम पर उतारा गया है, वह इन्हें यथार्थ रूप से पहुंचा दो और (याद रखो कि) यदि तुम ने ऐसा न किया तो यही समझा जाएगा कि तुमने परमेश्वर का संदेश नहीं पहुंचाया। (तुम संतुष्ट रहो), परमेश्वर इन लोगों से तुम्हारी रक्षा करेगा, इसलिए कि परमेश्वर इस नकारने वाली क़ौम को कभी भी सफलता का मार्ग नहीं दिखाएगा।
इनसे स्पष्ट कह दो, हे अहल-ए-किताब, तुम आधारहीन हो, जब तक तुम तौरात और इंजील पर और उस चीज़ पर न क़ायम हो जाओ जो तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम पर उतारी गई है, परंतु होगा यही कि वह चीज़ इनमें से अनेक लोगों की अवज्ञा और कुफ़्र को अवश्य बढ़ा देगी जो तुम पर तुम्हारे प्रभु कि ओर से उतारी गई है। इसलिए इन नकारने वालों पर अफ़सोस न करो। सत्य यह है कि (परमेश्वर के यहाँ से मोक्ष पर किसी का एकाधिकार नहीं है, इसलिए) जो मुसलमान हैं और जो (इनसे पूर्व) यहूदी हुए और जो साबी और नासारा कहलाते हैं, इनमें से जो लोग भी परमेश्वर को मानते हैं और क़यामत के दिन को मानते हैं और जिन्होंने भले कर्म किए हैं, उनके लिए न (परमेश्वर के सामने) कोई आशंका होगी और न वे दुखी होंगे।1
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- यह शुभ सूचना इस शर्त के साथ है कि उनमें से किसी ने कोई ऐसा अपराध न किया हो जो आस्था (ईमान) व सत्कर्म को निष्फल कर दे। उदाहरण के लिए, किसी बेगुनाह की हत्या करना या जानबूझकर परमेश्वर के किसी सच्चे पैग़ंबर (prophet) को मानने से इनकार कर देना। ↩
यह सत्य है कि हमने इस्राईलियों से (शरीअत के पालन का) वचन लिया और (उसे याद दिलाने के लिए) अनेक पैग़ंबर उनकी ओर भेजे, (परंतु हुआ यह कि) जब कभी कोई पैग़ंबर उनकी मनपसंद चाहतों के विपरीत कुछ लेकर उनके पास आया तो किसी को झूठा कह दिया और किसी की हत्या करते रहे और यही समझा कि इस पर कोई पकड़ नहीं होगी। अतः अंधे और बहरे बन गए। फिर परमेश्वर ने कृपा की और उनकी क्षमा याचना स्वीकार कर ली। इसके बाद भी उनमें से अधिकांश अंधे और बहरे ही बनते चले गए। (अब भी यही परिस्थिति है) और जो कुछ ये कर रहे हैं, परमेश्वर उसे देख रहा है।
उन लोगों ने भी अवश्य कुफ़्र किया जिन्होंने कहा कि परमेश्वर तो यही मर्यम-पुत्र ईसा मसीह है, यद्यपि ईसा मसीह ने तो कहा था कि हे इस्राईलियो, परमेश्वर की उपासना करो जो मेरा भी प्रभु है और तुम्हारा भी। (उन्हें जानना चाहिए कि) जो परमेश्वर का साझीदार बनाएगा, उसके लिए परमेश्वर ने स्वर्ग को वर्जित कर दिया और उसका ठिकाना नरक है और ऐसे अत्याचारियों का वहां कोई सहायक न होगा। इसी प्रकार उन लोगों ने भी अवश्य कुफ़्र किया है जिन्होंने कहा कि परमेश्वर तीन में से तीसरा है, यद्यपि एक परमेश्वर के अतिरिक्त कोई परमेश्वर नहीं है। यह अपनी बातों से नहीं रुके तो इनमें से जो (पैग़ंबर की ओर से इतमाम-ए-हुज्जत के बाद भी) अपने कुफ़्र पर क़ायम रहेंगे, उन्हें एक भीषण दण्ड आ पकड़ेगा। फिर क्या ये परमेश्वर की ओर नहीं पलटेंगे और उससे क्षमा नहीं मांगेंगे? सत्य यह है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। मर्यम-पुत्र ईसा मसीह केवल एक रसूल थे, उनसे पहले भी अनेक रसूल हुए हैं और उनकी माता (परमेश्वर की) एक सदाचारी दासी थी, वे दोनों खाना खाते थे। देखो, हम अपनी आयतों का वर्णन इनके सामने किस प्रकार स्पष्टता से कर रहे हैं। पुनः देखो कि ये किस प्रकार उल्टे फिरे जाते हैं। इनसे कहो, क्या तुम परमेश्वर को छोड़कर उनकी उपासना करते हो जो तुम्हारे लिए किसी लाभ अथवा क्षति का सामर्थ्य नहीं रखते? यद्यपि परमेश्वर ही सुनने वाला और जानने वाला है। कह दो, हे अहल-ए-किताब, अपने धर्म में अनुचित अतिवाद न करो और धर्म में मिलाई हुई उन लोगों की नई प्रथाओं का अनुसरण न करो जो पहले ही भटक चुके थे और जिन्होंने अनेक लोगों को भटका दिया और जो सीधे मार्ग से भटक गए।
इस्राईलियों में से जिन लोगों ने (इससे पूर्व) कुफ़्र किया, उन्हें दाऊद की ज़बान से और मर्यम-पुत्र ईसा मसीह की ज़बान से अभिशाप दिया गया, इसलिए कि उन्होंने (परमेश्वर की) अवज्ञा की और (मनुष्यों के विषय में भी) वे (परमेश्वर की निर्धारित) सीमाओं से आगे बढ़ जाया करते थे। वे जिन बुराइयों के दोषी होते, उनसे किसी प्रकार नहीं रुकते थे। अत्यंत बुरा आचरण था जो उन्होंने अपना लिया था। (इस समय भी) तुम उनमें से बड़ी संख्या में लोगों को देखते हो कि वे नकारने वालों को अपना मित्र बनाते हैं। अत्यंत बुरी सामग्री है जो उन्होंने स्वयं अपने लिए आगे बनाकर भेजी है। यही कि उनपर परमेश्वर का प्रकोप हुआ और वे सदैव यातना में रहने वाले हैं। यदि ये सच में परमेश्वर और उसके पैग़ंबर और उस चीज़ के मानने वाले होते जो पैग़ंबर की ओर उतरी तो कभी इन (नकारने वालों) को अपना मित्र नहीं बनाते, किंतु इनमें से अधिकांश अवज्ञाकारी हो चुके हैं।
सच यह है कि मुसलमानों से शत्रुता में तुम सबसे अधिक कठोर यहूदी और मुश्रिक लोगों को पाओगे और मुसलमानों से मित्रता में सबसे अधिक निकट उन लोगों को पाओगे जिन्होंने कहा कि हम नसारा हैं। यह इस कारण कि उनके अंदर विद्वान और संसार त्यागने वाले संत हैं और वे अहंकार नहीं करते और जब उस चीज़ को सुनते हैं जो परमेश्वर के रसूल पर उतरी है तो तुम देखते हो कि सत्य को पहचान लेने के कारण उनकी आंखों से आंसू बह निकलते हैं। वे पुकार उठते हैं कि प्रभु, हमने मान लिया, अतः हमारा नाम तू इसकी गवाही देने वालों में लिख ले। और हम परमेश्वर को और उस सत्य को क्यों न मानें जो हमारे पास आ गया है, जबकि हम आशा रखते हैं कि हमारा प्रभु हमें भले लोगों में मिला लेगा। अतः परमेश्वर का निर्णय है कि उनकी इस बात के फलस्वरूप उनको ऐसे बाग़ प्रदान करे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे सदा उनमें रहेंगे। यह उन लोगों का अच्छा फल है जो भला आचरण अपनाने वाले हों। रहे वे लोग जो नकारने वाले हुए और हमारी आयतों को झूठा कहा तो वही नरक वासी हैं।
1- हे मानने वालो, जो शुद्ध चीज़ें परमेश्वर ने तुम्हारे लिए वैध की हैं, उन्हें अवैध न बनाओ और न सीमाओं का उल्लंघन करो। परमेश्वर सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से प्रेम नहीं करता। जो वैध तथा निर्मल चीज़ें परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान की हैं, उन्हें खाओ पियो और (अपने) उस परमेश्वर से डरो जिसे तुमने माना है। (तुम में से कुछ लोग किसी चीज़ को अपने लिए अवैध करने की क़सम खा बैठते हैं, अतः जान लो कि) परमेश्वर तुम्हारी उन कसमों के विषय में तुमसे नहीं पूछेगा जो तुम निच्छापूर्वक खा लेते हो, परंतु जो क़सम दिल के पक्के इरादे से खाते हो, उस पर अवश्य तुम्हें पूछेगा। इसलिए इस प्रकार की क़सम अगर तोड़ दी जाए तो उसका प्रायश्चित यह है कि दस ग़रीबों को उस स्तर का भोजन कराया जाए जो तुम सामान्यतः अपने परिवार को कराते हो या उन्हें पहनने के कपड़े दिए जाएं या एक दास को मुक्त किया जाए। फिर जो यह न कर सके, उसके लिए तीन दिन का उपवास है। यह तुम्हारी क़समों की भरपाई है, जब तुम क़सम खा बैठते हो। (इसे चुका दो) और अपनी क़समों की रक्षा करो। परमेश्वर इसी प्रकार तुम्हारे लिए अपनी आयतों का विस्तार करता है ताकि तुम उसके आभारी रहो।1
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- अपनी विषय-वस्तु की दृष्टि से सूरह यहाँ समाप्त हुई। इसके आगे अब उसी प्रकार का परिशिष्ट (appendix) है जिस प्रकार सूरह निसा के अन्त में है। इसमें परमेश्वर ने उन प्रश्नों का उत्तर दिया है जो इस सूरह के विषयों के बारे में लोगों के मन में उत्पन्न हुए हैं। ↩
2- हे मानने वालो, यह शराब और जुआ और थान और क़िसमत के तीर, ये सब गंदे शैतानी काम हैं, इसलिए इनसे बचो ताकि तुम सफलता पाओ। शैतान तो यही चाहता है कि तुम्हें शराब और जूए में लगाकर तुम्हारे बीच द्वेष और ईर्ष्या डाल दे और तुम्हें परमेश्वर के स्मरण से और नमाज़ से रोक दे। फिर क्या (इन कार्यों से) रुक जाते हो? (इनसे रुक जाओ) परमेश्वर की आज्ञा का पालन करो और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो और (अवज्ञा से) बचते रहो। परंतु (हमारे इस मार्गदर्शन से) मुँह मोड़ोगे तो जान लो कि हमारे पैग़ंबर पर तो इसके अतिरिक्त कोई दायित्व नहीं है के विस्तार के साथ बात पहुंचा दे। (तुम में से) जो लोग मान चुके हैं और भले कर्म करने लगे हैं, उन्होंने पहले जो कुछ खाया पिया था, उसमें उनपर कोई पाप नहीं है, जबकि उन्होंने आत्म-संयम अपना लिया, ईमान लाए और अच्छा कर्म करते रहे, फिर इसके अतिरिक्त यह कि आत्म-संयम अपनाया था और अपने ईमान पर जमे रहे, फिर यही नहीं, आत्म-संयम अपनाया और (परमेश्वर के हर निर्देश का) उत्तम रूप से पालन किया। और सत्य यह है कि परमेश्वर उत्तम आचरण अपनाने वालों से प्रेम करता है।
3- हे मानने वालो, परमेश्वर कुछ ऐसे शिकार के माध्यम से तुम्हें अवश्य परीक्षा में डालेगा जो तुम्हारे हाथों और भालों की पहुंच में होगा ताकि परमेश्वर देख ले कि (तुम में से) कौन बिन देखे उससे डरता है (और कौन नहीं डरता)। फिर जिसने इस चेतावनी के बाद भी परमेश्वर की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन किया, उसके लिए एक भीषण दण्ड है। हे मानने वालो, एहराम की अवस्था में शिकार न मारो। (यह निषिद्ध है), और (याद रखो कि) तुम में से जिसने जानबूझकर उसे मारा, उसका बदला तुम्हारे पशुओं में से उसी के समान कोई जानवर है, जैसा उसने मारा है, जिसका निर्णय तुम में से दो न्यायप्रिय व्यक्ति करेंगे और यह चढ़ावे के रूप में काबा पहुंचाया जाएगा। या नहीं तो इस पाप की भरपाई में निर्धन व्यक्तियों को खाना खिलाना होगा या इसी के समान उपवास रखना होगा ताकि वह अपने किए का दण्ड भोगे। इससे पूर्व जो कुछ हो चुका, उसे परमेश्वर ने क्षमा कर दिया है, परंतु अब यदि किसी ने उसे पुनः किया तो परमेश्वर उससे बदला लेगा। परमेश्वर प्रबल है, वह बदला लेने वाला है। तुम्हारे लिए समुद्र का शिकार और उसका खाना वैध है, तुम्हारे और तुम्हारे यात्रीदल के भोजन के लिए। जब तक तुम एहराम की अवस्था में हो, थल का शिकार, अपितु तुम्हारे लिए अवैध किया गया है। (इसके पास न जाओ) और परमेश्वर से डरते रहो जिसके समक्ष तुम सब उपस्थित किए जाओगे। परमेश्वर ने प्रतिष्ठित गृह, काबा को लोगों के लिए केंद्र बनाया है और प्रतिष्ठित महीनों, क़ुर्बानी के जानवरों और उन सब जानवरों को धार्मिक प्रतीक बना दिया है जिनके गले में (भेंट की निशानी के रूप में) पट्टे डाल दिए गए हों। यह इसलिए (धार्मिक प्रतीक बनाए गए हैं) कि तुम पर स्पष्ट रहे कि परमेश्वर जानता है जो कुछ धरती और समस्त आकाशों में है और यह भी कि परमेश्वर हर चीज़ से अवगत है। सावधान हो जाओ, परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है, और परमेश्वर अत्यंत क्षमा करने वाला और दयावान भी है। पैग़ंबर पर तो केवल पहुंचा देने का कार्यभार है और परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम व्यक्त करते और जो कुछ तुम छिपाते हो। कह दो कि पवित्र और अपवित्र, दोनों समान नहीं हैं, यद्यपि अपवित्र की भरमार तुम्हें कितना ही मोहित करने वाली हो। इसलिए, बुद्धिजीवियो, परमेश्वर से डरते रहो, ताकि तुम सफलता पाओ।
4- हे मानने वालो, ऐसी बातें न पूछा करो जो यदि तुम्हें बता दी जाएं तो तुम पर भारी हों, और ऐसे समय में कि क़ुरआन उतर रहा है, तुम उन्हें पूछोगे तो वे तुम्हें बता दी जाएंगी। (इस समय तो) यह चीज़ें परमेश्वर ने क्षमा कर दी हैं और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, वह अत्यंत सहनशील है। तुम से पूर्व एक समुदाय ने इसी प्रकार की बातें पूछीं, फिर उनको नकारने वाले होकर रह गए। (फिर भी तुम्हारे प्रश्न का उत्तर यह है कि) परमेश्वर ने न कोई बहीरा निर्धारित किया है, न साइबा, न वसीला, न हाम, किंतु यह काफ़िर परमेश्वर पर झूठ बांधते हैं और इनमें अधिकांश वे हैं जो बुद्धि से काम नहीं लेते। और जब इनसे कहा जाता है कि परमेश्वर ने जो कुछ उतारा है, उसकी ओर आओ और परमेश्वर के रसूल की ओर आओ तो कहते हैं कि हमारे लिए वही पर्याप्त है जिस पर हमने अपने पूर्वजों को पाया है। क्या उस स्थिति में भी जबकि इनके पूर्वज कुछ नहीं जानते हों और न उचित मार्ग पर रहे हों? हे मानने वालो, तुम अपने ऊपर ध्यान दो, तुम उचित मार्ग पर हो तो जिन्होंने अनुचित मार्ग को अपना लिया है, वे तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ेंगे। तुम सबको परमेश्वर ही की ओर पलटना है, फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो।
5- हे मानने वालो, तुम में से किसी की मृत्यु का समय आ जाए और वह वसीयत कर रहा हो तो उसके लिए तुम्हारे अंदर गवाही इस प्रकार होगी कि तुम में से दो विश्वसनीय व्यक्ति गवाह बनाए जाएं या यदि तुम कहीं यात्रा में हो और वहां मृत्यु का संकट आ पहुंचे तो तुम्हारे समुदाय से बाहर के दो गवाह ले लिए जाएँ। (पहली स्थिति में), यदि तुम्हें (उनके बारे में) कोई संदेह हो जाए तो तुम उन्हें नमाज़ के बाद रोक लोगे, फिर वे परमेश्वर की शपथ खाएंगे कि हम इस गवाही के बदले में कोई धनराशि स्वीकार नहीं करेंगे, यद्यपि कोई रिश्तेदारी ही क्यों न हो, और न हम परमेश्वर की गवाही को छिपाएंगे। हमने ऐसा किया तो पापियों में गिने जाएँगे। फिर यदि पता चले कि ये दोनों किसी के अधिकार हनन के दोषी हुए हैं तो उनके स्थान पर अन्य दो व्यक्ति उन लोगों में से खड़े होंगे, जिनके अधिकारों का हनन पहले दो गवाहों ने किया है। फिर वे परमेश्वर की शपथ लें कि हमारी गवाही इन दोनों की गवाही से अधिक उचित है और हमने अपनी गवाही में कोई अन्याय नहीं किया है। हमने ऐसा किया हो तो हम अत्याचारियों में से होंगे। इस प्रक्रिया से अधिक आशा है कि वे ठीक-ठीक गवाही दें या कम से कम इस बात से डरें कि उनकी शपथ दूसरों की शपथ के बाद रद्द हो जाएगी। परमेश्वर से डरो और (जो आदेश दिया जाए, उसको) सुनो। (ऐसा नहीं करोगे तो यह स्पष्ट अवज्ञा है) और परमेश्वर अवज्ञाकारी लोगों को कभी उचित मार्ग नहीं दिखाता।1
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- अर्थात जब मुसलमानों में किसी को साक्षी बनाया जाए। ↩
(परमेश्वर की गवाही जिन लोगों ने छिपाई है, वे) उस दिन को याद रखें, जब परमेश्वर रसूलों को इकट्ठा करेगा, फिर पूछेगा कि (तुम्हारे समुदायों की ओर से) तुम्हें क्या उत्तर दिया गया? वे कहेंगे: हमें इसका कोई ज्ञान नहीं, सभी छिपी हुई बातों के जानने वाले तो आप ही हैं। जब परमेश्वर कहेगा: हे मर्यम-पुत्र ईसा, मेरे उस उपकार को याद करो जो मैंने तुम पर और तुम्हारी माता पर किया था, उस समय, जब मैंने रूहुल-क़ुदुस से तुम्हारी सहायता की, तुम झूले में भी (अपनी नुबुव्वत की) बात करते थे और बड़ी आयु को पहुँच कर भी। और उस समय, जब मैंने तुम्हें क़ानून और हिकमत सिखाई, अर्थात तौरात और इंजील की शिक्षा दी। और उस समय, जब तुम मेरी आज्ञा पर पक्षी का एक रूप मिट्टी से बनाते थे, फिर उसमें फूंकते थे और वह मेरे आदेश से पक्षी बन जाता था और जन्मजात अंधों और कोढ़ के रोगियों को मेरे आदेश से ठीक कर देते थे। और उस समय, जब तुम मुर्दों को मेरी आज्ञा से निकाल खड़ा करते थे। और उस समय, जब मैंने इस्राईलियों के हाथ तुमसे रोक दिए, जब तुम स्पष्ट निशानियाँ लेकर उनके पास आए और उनके नकारने वालों ने कहा कि कुछ नहीं, यह तो स्पष्ट जादू है। और उस समय, जब मैंने हवारियों को प्रेरणा दी कि मुझे और मेरे पैग़ंबर को मानो तो उन्होंने कहा: हमने मान लिया और आप साक्षी रहिए कि हम मुसलमान हैं। उस समय, जब हवारियों ने कहा: हे मर्यम-पुत्र ईसा, क्या तुम्हारा प्रभु यह कर सकता है कि हमपर आकाश से (खाने का) एक थाल उतारे? ईसा ने कहा: परमेश्वर से डरो, यदि तुम सच्चे मानने वाले हो। उन्होंने कहा: हम तो केवल यह चाहते हैं कि इस थाल से खाएं और इसके परिणामस्वरूप हमारे दिल संतुष्ट हों और हम यह जान लें कि तूने हमसे सच्ची बात काही थी और हम इस पर साक्षी बन जाएं। इस पर मर्यम-पुत्र ईसा ने प्रार्थना की: हे परमेश्वर, हे हमारे प्रभु, तू आकाश से एक थाल उतार दे जो हमारे अगलों और पिछलों के लिए एक यादगार बन जाए और तेरी ओर से एक निशानी हो। (प्रभु), हमें प्रदान कर और तो सबसे अच्छा देने वाला है। परमेश्वर ने कहा: मैं इसको तुम पर अवश्य उतारूँगा, किंतु इसके बाद जो तुम में से नकारने वाले होंगे, उन्हें ऐसा कठोर दण्ड दूँगा जो दुनिया में किसी को नहीं दिया होगा।
(परमेश्वर की गवाही जिन लोगों ने छिपाई है, वे उस दिन को याद रखें, जब यह बातें होंगी) और यह भी कि जब (इन्हें याद दिलाकर) परमेश्वर पूछेगा: हे मर्यम-पुत्र ईसा, क्या तुमने लोगों से कहा था कि परमेश्वर को छोड़ मुझे और मेरी माता को उपास्य बना लो। वह निवेदन करेगा: परमेश्वर परम पवित्र है, यह कैसे उचित था कि मैं वह बात कहूँ जिसका मुझे कोई अधिकार नहीं है। यदि मैंने यह बात कही होती तो आप की जानकारी में होती, (इसलिए कि) आप जानते हैं जो कुछ मेरे दिल में है और आपके दिल की बातें मैं नहीं जानता। सभी छिपी हुई बातों के जानने वाले तो आप ही हैं। मैंने तो उनसे वही बात कही थी जिसका आपने मुझे आदेश दिया था कि परमेश्वर की उपासना करो जो मेरा भी प्रभु है और तुम्हारा भी। मैं उनकी देख-भाल करता रहा, जबतक मैं उनके बीच था। फिर जब आपने मुझे मृत्यु दी तो उसके बाद आप उनके निरीक्षक रहे हैं और आप हर चीज़ पर साक्षी हैं। अब यदि आप उन्हें दंडित करें तो वे आपके दास हैं और यदि क्षमा कर दें तो आप ही प्रबल हैं, बड़े प्रज्ञावान हैं। परमेश्वर कहेगा: यह वह दिन है जिसमें सच्चे लोगों की सच्चाई उनके काम आएगी। उनके लिए बाग़ होंगे जिनके नीचे नहरें बह रही हैं, वे उनमें सदा-सदा रहेंगे। परमेश्वर उनसे प्रसन्न हुआ और वे परमेश्वर से प्रसन्न हुए। यही बड़ी सफलता है। धरती और आकाश और उनमें जो कुछ है उसका साम्राज्य परमेश्वर ही के लिए है और वह हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।