सूरह 4
अन्-निसा
मदनी · 176 आयतें · 82 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में जिस उम्मत के लिए एक अच्छे समाज के मूलभूत तत्व स्पष्ट किए गए हैं, दूसरी सूरह में उसी उम्मत पर परमेश्वर के उपकारों की पूर्ति और उसके साथ परमेश्वर के अंतिम वादे का उल्लेख किया गया है। इन सूरतों में संबोधन यद्यपि अहल-ए-किताब से भी हुआ है और नबी (स.) से भी, परंतु इन दोनों सूरतों में संबोधन मूल रूप से मुसलमानों से हुआ है। इनकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि बक़रह और आलि इम्रान् की तरह, ये भी मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद मदीना में उस समय अवतरित हुई हैं, जब मुसलमानों का एक संगठित राज्य वहां स्थापित हो चुका था और पैग़ंबर मुहम्मद (स.) अहल-ए-किताब पर इत्माम-ए-हुज्जत कर रहे थे और मुसलमानों का शुद्धिकरण व परिष्करण (तज़्कियह व तत्हीर) कर रहे थे।
पहली सूरह — अन्-निसा — का विषय मुस्लिम गंघ (उम्मत-ए-मुसलिमा) के लिए अच्छी सभ्यता के मूलभूत तत्व और उसका शुद्धिकरण व परिष्करण है।
दूसरी सूरह — अल्-माइदह — का विषय इस उम्मत पर परमेश्वर के उपकारों की पूर्ति और इसके साथ जगत-प्रभु, परमेश्वर के अंतिम वादे का उल्लेख है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
लोगो, अपने उस प्रभु से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया और उसी की प्रजाति से उसका जोड़ा बनाया और इन दोनों से अनेक नर-नारी (दुनिया में) फैला दिए। उस परमेश्वर से डरो जिसके नाम पर तुम एक दूसरे से सहायता चाहते हो और डरो रिश्ते-नातों को तोड़ने से। निस्संदेह, परमेश्वर तुम पर निरीक्षक है।
(परमेश्वर से डरो) और अनाथों का धन उन्हें सौंप दो और उनके लिए उनके अच्छे धन को अपने बुरे धन से न बदलो और न उनके धन को अपने धन के साथ मिला कर खाओ, इसलिए कि यह महापाप है।
और यदि डर हो कि अनाथों के विषय में न्याय नहीं कर सकोगे तो उनके साथ जो स्त्रियाँ हैं, उनमें से जो तुम्हारे लिए उचित हों, उनमें से दो- दो, तीन-तीन, चार-चार से विवाह कर लो। फिर यदि डर हो कि (उनके बीच) न्याय नहीं कर सकोगे तो (ऐसी परिस्थिति में भी) एक ही पत्नी रखो या फिर दासियाँ जो तुम्हारे स्वामित्व में हों। यह इसके अधिक निकट है कि तुम अन्याय से बचे रहो। और इन स्त्रियों को भी इनके महर {अर्थात स्त्रीधन} दो, जैसा महर दिया जाता है। फिर यदि वे उसमें से तुम्हारे लिए अपनी इच्छा से कुछ छोड़ दें तो उसको, अपितु तुम आनंद से खा सकते हो।1
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- अर्थात उनकी माताएँ या बहनें। ↩
और (अनाथ यदि अभी नादान और नासमझ हों तो) अपनी वे संपत्तियाँ जिनको परमेश्वर ने तुम्हारे लिए स्थिरता और रक्षा का माध्यम बनाया है, इन नासमझों को मत सौंपो। हाँ, निश्चचिंत होकर इन सम्पत्तियों से उनको खिलाओ, पहनाओ और उनसे भलाई की बात करो। और विवाह की आयु को पहुँचने तक इन अनाथों की जांच करते रहो, फिर यदि उनमें क्षमता पाओ तो उनकी धन-संपत्ति उन्हें सौंप दो, और इस आशंका से कि बड़े हो जाएँगे, उनकी धन-संपत्ति उड़ा कर और जल्दी कर के खा न जाओ। और (अनाथ का) जो (अभिभावक) समृद्ध हो, उसे चाहिए कि (उसके धन से) दूर रहे और जो निर्धन हो, वह (अपनी सेवा के बदले में) नियम अनुसार (उससे) लाभ उठाए। फिर जब उनकी संपत्तियाँ उनको सौंपने लगो तो उनपर गवाह बना लो, अन्यथा हिसाब के लिए तो परमेश्वर पर्याप्त है।1
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- इससे यह मालूम हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति की संपत्ति जिस प्रकार उसकी अपनी है, उसी प्रकार वह पूरे समाज का भी है। ↩
(तुम्हारे) माता पिता और संबंधी जो कुछ छोड़ें, उसमें पुरुषों का भी एक हिस्सा है और (तुम्हारे) माता पिता और संबंधी जो कुछ छोड़ें, उसमें स्त्रियों का भी एक हिसा है, चाहे छोड़ी हुई संपत्ति कम हो या अधिक, एक निश्चचित हिस्से के रूप में। परंतु विभाजन के समय जब सगे-संबंधी और अनाथ और निर्धन व्यक्ति वहाँ आ जाएँ तो उसमें से उनको भी कुछ दे दो और उनसे भलाई की बात करो। उन लोगों को डरना चाहिए जो यदि अपने पीछे कमज़ोर बच्चे छोड़ते तो उनके बारे में उन्हें बहुत कुछ चिंता होती। अतः चाहिए कि परमेश्वर से डरें और (हर विषय में) सीधी बात करें।
(सुनो, सावधान रहो), यह सत्य है कि जो लोग अनाथों का धन अनुचित रूप से खाते हैं, वे अपने पेट में आग ही भरते हैं और शीघ्र ही वे नरक की भड़कती आग में जाएँगे।
तुम्हारी संतान के बारे में परमेश्वर तुम्हें शिक्षा देता है कि उनमें से लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के समान है। फिर यदि संतान में केवल लड़कियां हों और वे दो या दो से अधिक हों तो उन्हें छोड़ी हुई संपत्ति का दो तिहाई दिया जाएगा और यदि एक ही लड़की हो तो उसके लिए आधा है।
परंतु छोड़ी हुई संपत्ति का छठा हिस्सा, (इससे पहले) मृतक के माता पिता में से हर एक को मिलना चाहिए, यदि उसकी संतान हो। और यदि संतान न हो और माता पिता ही उसके वारिस हों तो तीसरा हिस्सा उसकी मां का है और बाक़ी उसके पिता का। परंतु उसके भाई बहन हों तो मां के लिए वही छठा हिस्सा है और पिता के लिए भी वही छठा हिस्सा है। ये हिस्से उस समय दिए जाएं, जब वसीयत जो उसने की हो, वह पूरी करदी जाए और ऋण, (यदि हो तो) चुका दिया जाए।1
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- ये शब्द मूल रूप में यहाँ लुप्त (omitted) हैं जिनकी ओर 'وَرِثَهُ أَبَوَاهُ’ (वरिसहू अबवाहु) का वाक्यांश संकेत कर रहा है। यही मामला आगे "और पिता के लिए भी वही छठा हिस्सा" के शब्दों का है। ↩
तुम नहीं जानते कि तुम्हारे माता पिता और तुम्हारी संतान में फ़ायदे के लिहाज़ से कौन तुम्हारे सबसे क़रीब है। परमेश्वर ने ये हिस्से इसी आधार पर निर्धारित हर दिए हैं, इसलिए कि परमेश्वर ज्ञानी और प्रज्ञावान है।
और तुम्हारी पत्नियों ने जो कुछ छोड़ा हो, उसका आधा हिस्सा तुम्हें मिलेगा, यदि उनकी संतान नहीं है। और यदि संतान है तो उनकी छोड़ी संपत्ति का एक चौथाई तुम्हारा है, जबकि जो वसीयत उन्होंने की हो वह पूरी कर दी जाए और ऋण (यदि हो तो) चुका दिया जाए। और वे तुम्हारी छोड़ी संपत्ति में से एक चौथाई का अधिकार रखती हैं, यदि तुम्हारी संतान नहीं है। और यदि संतान है तो तुम्हारी छोड़ी संपत्ति का आठवाँ हिस्सा उनका है, जबकि जो वसीयत तुमने की हो, वह पूरी करदी जाए आर ऋण (यदि हो तो) चुका दिया जाए। और (इन वारिसों की अनुपस्थिति में) यदि किसी पुरुष या स्त्री को उससे नातेदारी के आधार पर वारिस बना दिया जाता है और उसका एक भाई या बहन है तो भाई और बहन, हर एक को छठा हिस्सा मिलेगा, और यदि एक से अधिक हों तो एक तिहाई में सब भागीदार होंगे और बाक़ी उसको मिलेगा जिसे वारिस बनाया गया है, जबकि जो वसीयत की गई हो, पूरी करदी जाए और ऋण (यदि हो तो) चुका दिया जाए, बिना किसी को हानि पहुंचाए। यह आदेश है परमेश्वर की ओर से और परमेश्वर ज्ञानी है, वह बड़ा सहनशील है।1
टिप्पणियाँ 1
- यह वाक्यांश भी मूल रूप में यहाँ लुप्त है जिसकी ओर ‘یورث’ (यूरसु) का शब्द संकेत करता है। ↩
यह परमेश्वर की बनाई हुई मर्यादाएँ हैं, (इनका ध्यान रखो) और (याद रखो कि) जो परमेश्वर और उसके रसूल का आज्ञापालन करेंगे, उन्हें वह ऐसे बाग़ों में प्रवेश देगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उनमें सदा रहेंगे और यही परम सिद्धि है।
और तुम्हारी स्त्रियों में से जो व्यभिचार करती हैं, उनपर अपने अंदर से चार गवाह मांगो। फिर यदि वे गवाही दे दें तो उन्हें घरों में बंद कर दो, यहाँ तक कि उनकी मृत्यु हो जाए या परमेश्वर उनके लिए कोई अन्य मार्ग निकाल दे ।1
टिप्पणियाँ 1
- यह निर्देश वेश्याओं के लिए एक अस्थायी आदेश था। इस प्रकरण में मूल समस्या क्योंकि स्त्री ही की होती है, इसलिए पुरुषों का उल्लेख नहीं आया। ↩
और जो पुरुष अथवा स्त्री तुम्हारे लोगों में से यह अपराध करें, उन्हें शारीरिक दण्ड दो। फिर यदि पश्चाताप करें और सुधार कर लें तो उन्हें जाने दो। निस्संदेह, परमेश्वर पश्चाताप को बहुत स्वीकार करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।1
टिप्पणियाँ 1
- यही वह दंड है जिसे बाद में सौ कोड़ों के रूप में निर्धारित कर दिया गया। ↩
(यह बात, अपितु स्पष्ट रहनी चाहिए कि) परमेश्वर पर पश्चाताप स्वीकार करने का दायित्व उन्हीं लोगों के लिए है जो भावनाओं में बह कर कोई पापकर्म कर बैठते हैं, फिर तुरंत ही पश्चाताप कर लेते हैं। अतः वही हैं जिन पर परमेश्वर कृपा करता और उनका पश्चाताप स्वीकार करता है और परमेश्वर ज्ञानी और प्रज्ञावान है। इसके विपरीत उन लोगों के लिए कोई पश्चाताप नहीं जो पापकर्म किए चले जाते हैं, यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मृत्यु का समय पास आ जाता है, उस समय वह कहता है कि अब मैंने पश्चाताप कर लिया है। इस प्रकार उनके लिए भी पश्चाताप नहीं है जो मरने के समय तक नकारने वाले ही रहें। यही तो हैं जिनके लिए हमने कष्टदायक दण्ड तैयार कर रखा है।
हे मानने वालो, तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि ज़बरदस्ती स्त्रियों के वारिस बन जाओ और न यह वैध है कि (विवाह कर लेने के बाद) जो कुछ तुमने उन्हें दिया है, उसका कुछ हिस्सा वापस लेने के लिए उन्हें तंग करो। हाँ, इस स्थिति में कि वे किसी स्पष्ट व्यभिचार की दोषी बनें। और उनके साथ अच्छा व्यवहार करो, इसलिए कि यदि तुम उन्हें पसंद नहीं करते हो तो हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें प्रिय न हो और परमेश्वर उसी में तुम्हारे लिए बहुत कुछ भलाई उत्पन्न करदे।
और यदि एक पत्नी के स्थान पर दूसरी पत्नी ले आने की इच्छा कर लो और तुमने उनमें से किसी को ढेर सारा धन भी दे रखा हो तो उसमें से कुछ वापस न लो। क्या तुम झूठा आरोप लगा कर और स्पष्ट अधिकार हनन कर के उसे लोगे? और किस प्रकार लोगे, जबकि तुम एक दूसरे के आगे निर्वस्त्र हो चुके हो और वे तुमसे दृढ़ वचन ले चुकी हैं।
और जिन स्त्रियों से तुम्हारे पिता विवाह कर चुके हों, उनसे कदापि विवाह न करो, किंतु जो पहले हो चुका, सो हो चुका। निस्संदेह, यह घोर अभद्रता है, बहुत घिनौनी बात है और अत्यंत बुरी रीति है।
तुम्हारे लिए तुम्हारी माताएँ, तुम्हारी बेटियाँ, तुम्हारी बहनें, तुम्हारी फूफियाँ, तुम्हारी मौसियाँ, तुम्हारी भतीजियाँ और तुम्हारी भांजियाँ अवैध की गई हैं और तुम्हारी वे माताएँ भी जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया और दूध पिलाने के इस संबंध से तुम्हारी बहनें भी। इसी प्रकार तुम्हारी पत्नियों की माताएँ अवैध की गई हैं और तुम्हारी पत्नियों की बेटियाँ अवैध की गई हैं जो तुम्हारी गोदों में पली हैं — उन पत्नियों की लड़कियां जिनसे तुमने मिलन किया हो, परंतु यदि मिलन नहीं किया हो तो तुम पर कोई पाप नहीं — और तुम्हारे सगे बेटों की पत्नियाँ भी। और यह भी अवैध है कि तुम दो बहनों को एक ही विवाह संबंध में इकट्ठा करो, पर जो हो चुका सो हो चुका। परमेश्वर अवश्य क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
और वे स्त्रियाँ भी तुम्हारे लिए अवैध हैं जो किसी के विवाह में हों, किंतु उस स्थिति में नहीं कि वे तुम्हारे स्वामित्व में आजाएँ। यह परमेश्वर का नियम है जिसका पालन तुम्हारे लिए अनिवार्य किया गया है। और उनके अतिरिक्त जो स्त्रियाँ हैं, (उनका महर चुका के) अपने धन के द्वारा उन्हें प्राप्त करना तुम्हारे लिए वैध है, इस शर्त के साथ कि तुम निष्कलंक चरित्र के साथ रहने वाले हो न कि व्यभिचार करने वाले। फिर (इससे पहले यदि महर नहीं चुकाया है तो) जो लाभ उनसे उठाया है, उसके बदले में उनका महर उन्हें चुका दो, एक कर्तव्य के तौर पर। महर निर्धारित करने के बाद, अपितु आपस की सहमति से जो कुछ तय कर लो तो उसमें तुम पर कोई पाप नहीं है। निस्संदेह, परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।1
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- अतः कोई भी व्यभिचारी यह अधिकार नहीं रखता कि किसी पवित्र (अफ़ीफ़ा) स्त्री से विवाह करे, और न कोई व्यभिचारिणी यह अधिकार रखती है कि किसी पवित्र (अफ़ीफ़) पुरुष से विवाह करे — सिवाय इसके कि मामला न्यायालय तक न पहुँचा हो और वे पश्चाताप तथा क्षमायाचना के माध्यम से स्वयं को इस पाप से शुद्ध कर लें। ↩
और तुम में से जो स्वतंत्र मुस्लिम स्त्रियों के साथ विवाह का सामर्थ्य न रखते हों, उन्हें चाहिए कि तुम्हारी उन मुस्लिम दासियों से विवाह कर लें जो तुम्हारे स्वामित्व में हों, और (यह सत्य अपने सामने रखें कि) परमेश्वर तुम्हारे ईमान से भलीभांति परिचित है। तुम सब एक ही प्रजाती से हो। अतः उनके मालिकों की अनुमति से उनके साथ विवाह कर लो और नियम अनुसार उनका महर भी उन्हें दो, इस शर्त के साथ कि वे निष्कलंक रखी जाएँ और इसके बाद यदि किसी व्यभिचार की दोषी हों तो उनके लिए उस दण्ड का आधा दण्ड है जो स्वतंत्र स्त्रियों के लिए निर्धारित किया गया है। विवाह की यह अनुमति तुम में से उन लोगों के लिए है जिन्हें पाप में गिर जाने का डर हो। अन्यथा धैर्य रखो तो यह तुम्हारे लिए अच्छा है और (संतुष्ट रहो कि सावधानी के बाद भी कोई भूल हो जाती है तो) परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
परमेश्वर की इच्छा है कि तुम पर अपनी आयतें स्पष्ट कर दे और तुम्हें उन लोगों के मार्ग पर चलाए जो तुमसे पूर्व चल बसे हैं और तुम पर कृपा दृष्टि करे, और परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।
परमेश्वर तो यही चाहता है कि तुम पर कृपा दृष्टि करे, परंतु जो लोग अपनी इच्छाओं का अनुसरण कर रहे हैं, उनकी इच्छा इसके विपरीत यह है कि तुम सत्य के मार्ग से पूर्णतः भटक कर रह जाओ।
परमेश्वर तुम पर से बंधनों को हल्का करना चाहता है, (इसलिए कि तुम्हारी असमर्थता के प्रति उदारता दिखाए) और सत्य यह है कि मनुष्य बड़ा ही शक्तिहीन पैदा किया गया है।
हे मानने वालो, एक दूसरे का धन आपस में अनुचित ढंग से न खाओ, किंतु यह कि तुम्हारी आपसी सहमति का व्यापार हो, जिससे कोई धन प्राप्त हो जाए, और न एक दूसरे की हत्या करो। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर तुम पर बड़ी कृपा करने वाला है। और (याद रखो कि) जो लोग अत्याचार तथा अनुचित व्यवहार के साथ ऐसा करेंगे, उनको हम अवश्य एक भड़कती हुई आग में झोंक देंगे, और यह परमेश्वर के लिए अत्यंत सहज है। (इन पापकर्मों से बचो, इसलिए कि) तुम्हें जिन चीज़ों से रोका जा रहा है, उनके बड़े-बड़े पापकर्मों से यदि तुम बचते रहे तो तुम्हारी छोटी बुराइयों को हम तुम्हारे खाते से मिटा देंगे और तुम्हें सम्मान के स्थान में प्रवेश देंगे।
और परमेश्वर ने जो कुछ तुम में से एक को दूसरे पर वरीयता दी है, उसकी कामना न करो, इसलिए कि पुरुषों ने जो कुछ कमाया है, उसका हिस्सा उन्हें मिल जाएगा और स्त्रियों ने जो कुछ कमाया है, उसका हिस्सा उन्हें भी अवश्य मिल जाएगा। (एक दूसरे से आगे बढ़ने की इच्छा हो तो इस मैदान में आगे बढ़ो) और (इसके लिए) परमेश्वर से उसके उपकार का हिस्सा मांगो। परमेश्वर अवश्य हर चीज़ का ज्ञान रखता है। (यही वरीयताएँ विरासत के विभाजन में भी ध्यान में हैं) और माता पिता और सगे संबंधियों के छोड़े हुए धन में (इन्हीं के अनुसार) हमने हर एक के लिए वारिस बना दिए हैं। (इनमें परिवर्तन का प्रयास न करो), रहे वे लोग जिनसे तुम्हारा समझौता हो तो उनका हिस्सा उन्हें दो। (अपितु, इसमें किसी उत्तराधिकारी को क्षति पहुंचाने की कोई भावना नहीं होनी चाहिए), इसलिए कि परमेश्वर हर चीज़ पर निरीक्षक है।
(पति-पत्नी के संबंध के विषय में भी इसी सिद्धांत के अनुसार) पुरुष स्त्रियों के अधिपति बनाए गए हैं, इसलिए कि परमेश्वर ने एक को दूसरे पर श्रेष्ठता प्रदान की है और इसलिए कि उन्होंने अपने धन ख़र्च किए हैं। फिर जो भली स्त्रियाँ हैं, वे (अपने पतियों की) आज्ञाकारी होती हैं, भेदों की रक्षा करती हैं, इस आधार पर कि परमेश्वर ने भी भेदों की रक्षा की है। और (इसी सिद्धान्त पर तुम्हें अधिकार दिया गया है कि) जिन स्त्रियों से तुम्हें बग़ावत का डर हो, उन्हें समझाओ और उनके बिस्तरों पर उन्हें अकेला छोड़ दो और (इससे भी न मानें तो) उन्हें दंडित करो। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगें तो उनपर आरोप लगाने का बहाना न ढूंडो। निस्संदेह, परमेश्वर बहुत ऊँचा है, वह बहुत महान है।1
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- यह इसलिए क्योंकि अवज्ञा व उद्दंडता पर अडिग रहने के बाद यह अधिकार हर व्यवस्था को प्राप्त हो जाता है, चाहे वह राज्य की व्यवस्था हो या परिवार की या किसी संस्था की। ↩
और यदि (इसके बाद भी स्थिति में सुधार न हो और) तुम लोगों को पति-पत्नी के बीच फूट पड़ने की आशंका लगे तो एक निर्णयकर्ता पुरुष के लोगों में से और एक स्त्री के लोगों में से नियुक्त कर दो। (इससे आशा है कि) यदि (पति-पत्नी), दोनों सुधार चाहेंगे तो परमेश्वर उनके बीच सामंजस्य पैदा कर देगा। निस्संदेह, परमेश्वर जानने वाला और अवगत है।
तुम सब परमेश्वर की भक्ति करो और उसके साथ किसी चीज़ को सहभागी न बनाओ, माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो और सगे-संबंधियों, अनाथों, निर्धन व्यक्तियों और नातेदार पड़ोसियों और अंजान पड़ोसियों और साथ में उठने बैठने वालों के साथ भी उत्तम शिष्टाचार बरतो। इसी प्रकार यात्रियों और ग़ुलामों व दासियों के साथ जो तुम्हारे स्वामित्व में हों। परमेश्वर उन लोगों से प्रेम नहीं करता जो अकड़ते और अपनी बड़ाई पर घमंड करते हैं। जो स्वयं भी कंजूसी करते और दूसरों को भी इसी का सुझाव देते हैं और परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से जो कुछ उन्हें दिया है, उसे छिपाते हैं। ऐसे अकृतज्ञ व्यक्तियों के लिए हमने अपमानित कर देने वाला दण्ड तैयार कर रखा है — जो अपना धन लोगों को दिखाने के लिए दान करते हैं और न परमेश्वर को मानते हैं और न क़यामत के दिन को मानते हैं। (उनका साथी शैतान है) और सत्य यह है कि जिसका साथी शैतान बन जाए तो वह बहुत ही बुरा साथी है। इनका क्या जाता, यदि ये परमेश्वर को और क़यामत के दिन को मानते और परमेश्वर ने जो कुछ इन्हें दिया है, उसमें से दान करते और सत्य यह है कि परमेश्वर इनसे भलीभांति परिचित है। परमेश्वर रत्ती भर भी अन्याय नहीं करेगा और किसी का एक पुण्य होगा तो उसे कई गुना बढ़ाएगा और (इसके साथ) विशेष अपने पास से उसको बडा प्रतिफल प्रदान करेगा।
फिर उस दिन ये क्या करेंगे, जब हम प्रत्येक समुदाय में से एक साक्षी लाएँगे और इन लोगों पर, (हे पैग़ंबर), तुम्हें साक्षी बनाकर खड़ा करेंगे। (फिर) उस दिन वे लोग जो नकारने पर अड़े रहे और जिन्होंने रसूल की अवज्ञा की है, इच्छा करेंगे कि काश, धरती उनपर उनके समेत बराबर कर दी जाए और वहाँ वे परमेश्वर से कोई बात भी छिपा नहीं सकेंगे।
हे मानने वालो, (परमेश्वर की भक्ति का जो आदेश तुम्हें ऊपर दिया गया है, उसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति नमाज़ है, इसलिए) तुम नशे में हो तो नमाज़ की जगह के पास न जाओ, यहाँ तक कि जो कुछ कह रहे हो, उसे समझने लगो और इसी प्रकार जनाबत की दशा में भी, जब तक स्नान न कर लो, परंतु उस स्थिति में नहीं जब केवल निकल जाना उद्देश्य हो। और यदि तुम अस्वस्थ हो या यात्रा में हो या तुम में से कोई शौच करके आए या तुमने स्त्रियों से मिलाप किया हो, फिर पानी न मिले तो कोई पवित्र स्थान देखो और अपने चेहरे और हाथों पर हाथ फेर लो। (परमेश्वर ने तुम्हें यह छूट दी है), इस लिए कि परमेश्वर दोषों को अनदेखा करने वाला और क्षमा करने वाला है।
तुमने देखा नहीं उन लोगों को जिन्हें परमेश्वरीय ग्रंथ मिला? (उनके सामने यह उसी ग्रंथ के भेजने वाले की शरीअत प्रस्तुत की जाती है तो इसके विरोध में) वह भटकने को प्रमुखता देते हैं और चाहते हैं कि तुम भी मार्ग से भटक जाओ। तुम्हारे इन शत्रुओं से परमेश्वर भलीभांति परिचित है। (तुम इनकी चिंता न करो) और संतुष्ट रहो कि तुम्हारे समर्थन के लिए परमेश्वर पर्याप्त है और तुम्हारी सहायता के लिए परमेश्वर पर्याप्त है।
(फिर इनमें से विशेषतः) जो यहूदी बन गए हैं, उनका एक गुट ज़बान को तोड़ मरोड़कर और धर्म पर कटाक्ष करते हुए शब्दों को उनके प्रसंग से हटा देता है और "समि'अना व 'असैना", "इस्म'अ ग़ैर मुस्म'इन" और "राइना" कहता है। यद्यपि यदि वे "समिअ'ना व अत'अना", "इस्म'अ" और "उनज़ुरना" कहते तो उनके लिए अच्छा होता और प्रसंग के अनुसार भी। परंतु उनके नकारने के कारण परमेश्वर ने उन्हें अभिशाप दे दिया है, इसलिए वे कम ही मानेंगे।
हे लोगो, जिन्हें धर्मग्रंथ मिला, उस चीज़ को मान लो जो हमने उन चीज़ों की पुष्टि में उतारी है जो स्वयं तुम्हारे पास उपलब्ध हैं। मान लो, इससे पहले कि हम चेहरे बिगाड़ दें और उनको पीछे की ओर उलट कर बराबर कर दें या उन्हें भी (जिनके ये चेहरे हैं) उसी प्रकार अभिशाप दें, जिस प्रकार हमने सब्त वालों को अभिशाप दिया था और (याद रखो कि) परमेश्वर की बात हो कर रहती है।1
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- अर्थात उन लोगों को, जिन्होंने सब्त (Sabbath) के नियमों का उल्लंघन किया था। ↩
(ये समझते हैं कि इनकी आस्थाएँ और कर्म जैसे भी हों, ये अवश्य स्वर्ग में जाएँगे। इन्हें जानना चाहिए कि) परमेश्वर इस बात को क्षमा नहीं करेगा कि (जानबूझकर किसी को) उसका सहभागी बनाया जाए। इसके नीचे, अपितु जिसके लिए जो पापकार्म चाहेगा, (अपने नियम अनुसार) क्षमा कर देगा, और (इसमें तो कोई संदेह ही नहीं कि) जो परमेश्वर का सहभागी बनाता है, वह एक महापाप का गठन करता है। तुमने देखा नहीं उन लोगों को जो (शिर्क जैसे पाप के दोषी हैं और इसके बाद भी) अपने आप को विशुद्ध बताते हैं। कदापि नहीं, अपितु परमेश्वर ही जिसे चाहता है (अपने नियमानुसार) शुद्धता प्रदान करता है। (ये अपने दुष्कर्मों का दण्ड अवश्य भुगतेंगे) और इनके साथ रत्ती बराबर भी अन्याय नहीं किया जाएगा। इन्हें देखो, (अपने इन दावों से) ये परमेश्वर पर कैसा झूठ मढ़ रहे हैं और सत्य यह है के स्पष्ट पाप होने के लिए तो यही अपने आप में पर्याप्त है।
तुमने देखा नहीं इन लोगों को जिन्हें परमेश्वरीय ग्रंथ मिला? यह ‘जिब्त’ तथा ‘ताग़ूत’ पर विश्वास रखते हैं और नकारने वालों के बारे में कहते हैं कि मानने वालों से अधिक उचित मार्ग पर तो ये हैं। यही लोग हैं कि जिन्हें परमेश्वर ने अभिशाप दिया है और जिन्हें परमेश्वर अभिशाप दे, फिर तुम उनका कोई सहायक नहीं पा सकते। क्या परमेश्वर के साम्राज्य में इनका भी कोई हिस्सा है? यदि ऐसा होता तो ये लोगों को फूटी कौड़ी भी देने के लिए तैयार नहीं होते। क्या ये लोगों से परमेश्वर के उस उपकार के कारण जलते हैं जो उसने उनपर किया है? यही बात है तो सुन लें कि हमने तो इब्राहीम की संतान (की इस शाखा) को अपनी शरीअत और अपनी हिकमत प्रदान कर दी और उन्हें एक महान राज्य प्रदान किया है।1
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- 'जिब्त' से तात्पर्य जादू-टोने या तंत्र-मंत्र, अर्थात गंदे शैतानी श्रेणी की विद्याएँ (occult/witchcraft) हैं। क्योंकि इनमें शैतानी शक्तियों को प्रभावशाली माना जाता है, इसलिए 'जिब्त' के साथ 'ताग़ूत' का भी उल्लेख हुआ है। क़ुरआन में ये दोनों शब्द लगभग समान अर्थों में प्रयुक्त होते हैं। ↩
परंतु, (इन पर अफ़सोस, इन्होंने अभी तक उसका मूल्य नहीं पहचाना, सो) इनमें ऐसे भी हैं जिन्होंने इस (हिकमत और इस शरीअत) को माना है और ऐसे भी हैं जो इससे विमुख हो गए हैं। इस प्रकार कि लोगों के लिए नरक की भड़कती आग ही पर्याप्त है। जिन लोगों ने हमारी आयतों को मानने से इनकार कर दिया है, उन्हें हम शीघ्र ही एक बड़ी आग में झोंक देंगे। उनकी चमड़ियाँ जब पक जाएंगी, हम उनकी जगह दूसरी चमड़ियाँ पैदा कर देंगे ताकि वे बहुत अच्छे से यातना का स्वाद चखें। निस्संदेह, परमेश्वर प्रबल और प्रज्ञावान है। और जिन लोगों ने (हमारी आयतों को) माना और भले कर्म किए, उनको शीघ्र ही हम ऐसे बाग़ों में प्रवेश देंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उनमें सदा-सदा रहेंगे। उनके लिए वहां निर्मल पत्नियां होंगी और उन्हें हम घनी छांव में रखेंगे।
(हे मानने वालो, परमेश्वर ने तुम्हें एक महान राज्य प्रदान करने का निर्णय किया है तो इस अवसर पर) परमेश्वर तुम्हें निर्देश देता है की अमानतें उनके हक़दारों को दे दो और जब लोगों के बीच निर्णय करो तो न्याय के साथ करो। यह अत्यंत भली बात है जिसका परमेश्वर तुम्हें उपदेश देता है। निस्संदेह, परमेश्वर सुनने वाला और देखने वाला है।
हे मानने वालो, (यह परमेश्वर का राज्य है, इसमें) परमेश्वर की आज्ञा का पालन करो और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो और उनकी भी जो तुम में से विभिन्न कार्यों के अधिकारी बनाए जाएं। फिर यदि किसी विषय में तुम्हारा मतभेद हो तो (निर्णय के लिए) उसे परमेश्वर और उसके रसूल की और लौटा दो, यदि तुम परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास रखते हो। यह उत्तम है और परिणाम के दृष्टिकोण से अच्छा है।1
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- यह इसलिए कहा गया है क्योंकि उस समय सीधे तौर पर (directly) परमेश्वर की प्रत्यक्ष सत्ता स्थापित थी जिसके मुखिया स्वयं अल्लाह के रसूल पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) थे। ↩
तुमने देखा नहीं उन लोगों को जो दावा करते हैं कि उन्होंने उसे भी माना है जो तुम्हारी ओर उतारा गया और उसे भी जो तुम से पूर्व उतारा गया था, परंतु चाहते हैं कि (परमेश्वर और रसूल को छोड़कर) अपने मामलों के निपटारे के लिए उसी विद्रोही की ओर जाएं जो बुराई का मुखिया है, यद्यपि उन्हें निर्देश दिया गया था कि उसको नकार दें। (ये शैतान के अनुयायी हैं) और शैतान चाहता है कि इन्हें दूरवर्ती पथभ्रष्टता में डाल दे। जब इनसे कहा जाता है कि परमेश्वर के उतारे हुए ग्रंथ और उसके रसूल की ओर आओ तो इन ढोंगी लोगों को तुम देखते हो कि वे तुमसे स्पष्ट कतरा जाते हैं। परंतु उस समय क्या होगा, जब इनके हाथों का लाया हुआ कोई संकट इन पर आ पड़ेगा, फिर ये परमेश्वर की शपथ खाते हुए तुम्हारे पास आएंगे कि हमने तो केवल सुधार की इच्छा की थी और हम तो यही चाहते थे कि कुछ तालमेल पैदा हो जाए। ये वे लोग हैं कि परमेश्वर जानता है जो कुछ इनके मन में है। इसलिए, इनकी ओर ध्यान न दो और इन्हें उपदेश करो और इनके बारे में इनके साथ इस प्रकार बात करो कि मन में उतर जाए। (इन्हें बताओ कि) हमने जो रसूल भी भेजा है, इसीलिए भेजा है कि परमेश्वर की अनुमति से उसका आज्ञा-पालन किया जाए। (इन्हें बताओ कि रसूल की अदालत को छोड़कर इन्होंने एक बड़ा अपराध किया है।) यदि ये उस समय तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाते, जब इन्होंने अपने प्राणों पर अत्याचार किया था, फिर परमेश्वर से क्षमा मांगते और रसूल भी इनके लिए क्षमा की विनती करता तो परमेश्वर को क्षमा याचना स्वीकार करने वाला और अत्यंत कृपा करने वाला पाते। परंतु नहीं, (हे पैग़ंबर,) तुम्हारे प्रभु की सौगंध, ये लोग कभी मोमिन नहीं हो सकते, जब तक अपने मतभेदों में केवल तुम्हें निर्णय करने वाला न मान लें, फिर जो कुछ तुम निर्णय कर दो, उस पर अपने मन में कोई दुर्भावना न रखें और जी-जान से उसके आगे समर्पण कर दें। (यह मानने का दावा करते हैं) और सत्य यह है कि यदि हम इन पर अनिवार्य कर देते कि अपने लोगों की हत्या करो और अपने घरों को छोड़कर निकल आओ, (जिस प्रकार हमने मूसा के समय में किया था,) तो इनमें से कम ही इस आदेश का पालन करते। इस समय जो उपदेश इन्हें किया जा रहा है, यदि ये उसके अनुसार कार्य करते तो इनके लिए बहुत अच्छा होता और (इसके परिणामस्वरूप) यह (धर्म पर) अधिक दृढ़ता के साथ जमे रहते। यह ऐसा करते तो इन्हें हम अपनी ओर से बहुत बडा प्रतिफल प्रदान करते और इन्हें सीधा मार्ग दिखा देते। (इन्हें बताओ) कि जो परमेश्वर और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेंगे, वही हैं जो उन लोगों के साथ होंगे जिन पर परमेश्वर ने कृपा दृष्टि की है, अर्थात पैग़ंबर, सत्यवादी, साक्षी रहने वाले और सदाचारी। कैसे अच्छे हैं ये साथी! यह परमेश्वर की कृपा है और (इसके लिए) परमेश्वर का ज्ञान पर्याप्त है।
हे मानने वालो, अपने शस्त्र संभालो और (प्रताड़ित लोगों की सहायता के लिए) निकलो, (जैसी परिस्थिति हो,) अलग-अलग टुकड़ियों के रूप में या इकट्ठे होकर। तुम में अवश्य वे लोग भी हैं जो (ऐसी परिस्थितियों में) पूरी तरह से ढीले पड़ जाएँगे, फिर यदि तुम्हें कोई हनी पहुंचे तो कहेंगे कि परमेश्वर ने मुझपर बड़ी कृपा की कि मैं इनके साथ नहीं था और यदि तुम पर परमेश्वर की कोई कृपा हो जाए तो अवश्य कहेंगे — और इस प्रकार कहेंगे कि जैसे उनके और तुम्हारे बीच कभी कोई प्रेम का रिश्ता नहीं था — कि काश, मैं भी इनके साथ होता तो बड़ी सफलता प्राप्त कर लेता। (ऐसे लोगों की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है,) इसलिए वही लोग परमेश्वर के मार्ग में लड़ने के लिए निकलें जो परलोक के बदले में दुनिया के जीवन को त्याग देने के लिए तैयार हों। (उनके लिए शुभ सूचना है कि) जो परमेश्वर के मार्ग में लड़ेगा और मारा जाएगा या विजयी होगा, उसे हम अवश्य बडा प्रतिफल प्रदान करेंगे।
(हे मानने वालो,) तुम्हें क्या हो गया है कि तुम परमेश्वर के मार्ग में और उन असहाय पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए नहीं लड़ते जो गुहार कर रहे हैं कि प्रभु, हमें इस बस्ती से निकाल कि जिसके लोग अत्याचारी हैं और हमारे लिए अपने पास से सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति पैदा कर दे और अपने पास से समर्थक और सहायक पैदा कर दे।
(इन्हें बताओ, हे पैग़ंबर कि) मानने वाले परमेश्वर के मार्ग में लड़ते हैं और नकारने वाले अपने शैतानों के मार्ग में। (ये शैतान के मित्र हैं,) इसलिए तुम शैतान के इन मित्रों से लड़ो और बेपरवाह हो जाओ, इसलिए के शैतान की चाल बड़ी कच्ची है।
तुमने देखा नहीं इन लोगों को जिन से कहा जाता था कि (अभी लड़ने का समय नहीं है, इसलिए) अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ का प्रबंध करो और ज़कात देते रहो (तो ये नमाज़ और ज़कात से जी चुराते और युद्ध के लिए उतावले होते थे,) परंतु जब इन के लिए युद्ध अनिवार्य कर दिया गया तो अब इनकी दशा यह है कि इनमें से एक दल लोगों से उसी प्रकार डरता है, जिस प्रकार परमेश्वर से डरा जाता है या उससे भी अधिक। कहते हैं कि प्रभु, तूने यह लड़ाई हमारे लिए क्यों अनिवार्य कर दी है? हमें कुछ थोड़ी सी मोहलत और क्यों नहीं दी? इनसे कह दो, दुनिया की पूंजी बहुत थोड़ी है और जो लोग संयम अपनाएं, उनके लिए परलोक उससे कहीं बढ़कर है और वहां तुम्हारे साथ रत्ती बराबर भी अन्याय नहीं होगा। रह गई मृत्यु तो तुम जहाँ कहीं भी हो, वह कैसे भी तुम्हें आकर रहेगी, चाहे तुम कितने ही पक्के और ऊँचे क़िलों में हो। (मुँह से ये तुम्हारे रसूल होने को स्वीकार करते हैं) और यदि उन्हें कोई सफलता प्राप्त होती है तो कहते हैं, यह परमेश्वर की ओर से है और यदि कोई क्षति पहुंचती है तो कहते हैं, यह तुम्हारे कारण है। कह दो, हर चीज़ परमेश्वर ही की ओर से है, (इसलिए कि जो कुछ होता है, उसी की अनुमति से होता है।) भला इन लोगों को क्या हो गया है कि कोई बात समझने के लिए तैयार नहीं होते। (यह सत्य है कि) तुम्हें जो भलाई भी पहुंचती है, परमेश्वर की कृपा से पहुंचती है और जो संकट आता है, वह तुम्हारे अपने अस्तित्व की ओर से आता है। (इनका मूल रोग यह है कि ये तुम्हारे रसूल होने के बारे में दुविधा में हैं। इनकी परवाह न करो,) हमने तुम्हें लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा है और (इसके लिए) परमेश्वर की गवाही पर्याप्त है। (इन्हें जानना चाहिए कि) जो रसूल की आज्ञा का पालन करता है, उसने वस्तुतः परमेश्वर की आज्ञा का पालन किया और जिस ने मुँह मोड़ लिया तो (उसका कोई दायित्व तुम पर नहीं है, इसलिए कि) हमने तुम्हें इन पर निरीक्षक बना कर तो नहीं भेजा है।
कहते हैं कि हम आज्ञाकारी हैं, फिर जब तुम्हारे पास से हटते हैं तो इनमें से एक दल अपनी इस बात के ठीक विपरीत परामर्श करता है। इनकी ये सब कानाफूसी परमेश्वर लिख रहा है। इसलिए इनकी ओर ध्यान न दो और परमेश्वर पर भरोसा रखो और (जान लो कि) परमेश्वर भरोसा करने के लिए पर्याप्त है। (तुम्हारे रसूल होने के बारे में इन्हें दुविधा क्यों है?) फिर क्या ये लोग क़ुरआन पर चिंतन नहीं करते? यदि ये परमेश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो इसमें वे बहुत कुछ विरोधाभास पाते।
(हे मानने वालो, ये तुम्हारे शुभचिंतक नहीं हैं, इसलिए) इन्हें जब शांति या संकट की कोई बात पहुंचती है तो ये उसे फैला देते हैं, यद्यपि यदि ये परमेश्वर के रसूल और उन लोगों के सामने उसे प्रस्तुत करते जो उनमें से विभिन्न कार्यों के प्रभारी बनाए गए हैं तो जो लोग उनमें से बात की जड़ तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, वे उसको समझ लेते। (परंतु इन्होंने शैतान का मार्ग अपनाया है) और यदि तुम पर परमेश्वर की कृपा और उसकी दया न होती तो थोड़े से लोगों को छोड़कर तुम सब शैतान का अनुसरण करते।
(अतः, हे पैग़ंबर, इन्हें छोड़ो और) परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करो — तुम पर अपने आप के अतिरिक्त किसी का दायित्व नहीं है — और मानने वालों को (युद्ध के लिए) प्रेरित करो। बहुत संभव है कि परमेश्वर उन लोगों का प्रभाव तोड़ दे जो नकारने वाले हो गए हैं। परमेश्वर सबसे अधिक बलवान है और (इस प्रकार के नकारने वालों को) वह भयंकर दण्ड देने वाला है। (ये जिहाद से बचने की सलाह देते हैं। इन्हें बताओ कि) जो अच्छी बात के पक्ष में कहेगा, वह उसमें से हिस्सा पाएगा और जो बुराई के पक्ष में कहेगा, वह उसमें से हिस्सा पाएगा। (यह परमेश्वर का निर्णय है) और परमेश्वर हर चीज़ का सामर्थ्य रखने वाला है।
(तुम युद्ध के लिए निकलो) और जब (किसी व्यक्ति की ओर से) तुम को सलाम कहा जाए तो तुम भी सलाम कहो, उससे उत्तम या उसी समान। और किसी के साथ अन्याय न करो, इसलिए कि परमेश्वर अवश्य हर चीज़ का हिसाब लेने वाला है। परमेश्वर को छोड़ कोई उपासना योग्य नहीं है, वह तुम सबको क़यामत के दिन की ओर ले जाकर रहेगा जिसके आने में कोई संदेह नहीं। और परमेश्वर से बढ़कर सच्ची बात कहने वाला कौन हो सकता है।
(तुम उन लोगों को जानते हो जो मानने के बाद पलट गए हैं,) फिर तुम्हें क्या हो गया है कि इन कपटी लोगों के बारे में दो दलों में विभाजित हो रहे हो। परमेश्वर ने तो उनके किए के कारण उन्हें उल्टा फेर दिया है। क्या तुम उनका मार्गदर्शन करना चाहते हो जिन का मार्ग परमेश्वर ने (अपने नियम अनुसार) भ्रष्ट कर दिया है। यद्यपि जिन्हें परमेश्वर पथभ्रष्ट कर दे, उनके लिए तुम कोई मार्ग नहीं पा सकते। वे चाहते हैं कि जिस प्रकार वे स्वयं नकारने वाले हैं, उसी प्रकार तुम भी नकारने वाले हो जाओ ताकि वे और तुम सब एक समान हो जाएं। इसलिए उनमें से किसी को अपना साथी न बनाओ, जब तक वे परमेश्वर के मार्ग में प्रवास करके न आ जाएं। फिर यदि वे इसकी ओर ध्यान न करें तो उन्हें पकड़ो और जहाँ पाओ, उनका वध करो और उनमें से किसी को अपना साथी और सहायक न बनाओ। अपितु, इससे वे लोग अलग हैं जो किसी ऐसे समाज से जा मिले हैं जिनसे तुम्हारी कोई संधि है। इसी प्रकार वे लोग भी इससे अलग हैं जो तुम्हारे पास इस प्रकार आएँ कि अपने अंदर न तुमसे लड़ने का साहस पाते हों न अपने समाज से। परमेश्वर चाहता तो उन्हें तुम्हारे विरुद्ध निडर बना देता और वे भी तुमसे लड़ते। इसलिए यदि वे तुमसे अलग रहें और युद्ध न करें और तुम्हारी ओर समझौते तथा शांति का हाथ बढ़ाएं तो परमेश्वर तुम्हें भी उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही करने की अनुमति नहीं देता।1
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- इसका अर्थ यह है कि मक्का से मदीना प्रवास (हिजरत) के बाद अब हिजरत ही उनकी आस्था (ईमान) और उनके इस्लाम की कसौटी है। यदि वे इसके लिए तैयार नहीं होते तो उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाएगा जो पैग़ंबर की ओर से सत्य के निर्णायक रूप से संचार (अर्थात इत्माम-ए-हुज्जत) के बाद इस्लाम और मुसलमानों के शत्रुओं के साथ करने को कहा गया है। ↩
(इनके अतिरिक्त) कुछ अन्य लोग तुम ऐसे भी देखोगे जो चाहते हैं कि तुम्हारे साथ भी शांति से रहें और अपने समाज के साथ भी, परंतु जब कभी उपद्रव की ओर बुलाए जाते हैं तो मुँह के बल उसमें जा गिरते हैं। इसलिए यदि वे तुम से दूरी न बनाएं और तुम्हारी ओर समझौते तथा शांति का हाथ न बढ़ाएँ और अपने हाथ न रोकें तो उन्हें भी पकड़ो और जहाँ पाओ, उनका वध करो। ये लोग हैं जिनके विरुद्ध हमने तुम्हें स्पष्ट अनुमति दी है।
(परंतु कोई असावधानी नहीं होनी चाहिए, इसलिए कि) किसी मुसलमान के लिए वैध नहीं है कि वह किसी मुसलमान का वध करे, सिवाय इसके कि उससे ग़लती हो जाए। और जो किसी मुसलमान की ग़लती से हत्या करे, उसके ऊपर है कि एक मुसलमान को ग़ुलामी से मुक्त करे और उसके घर वालों को दीय्यत चुका दे, परंतु तब नहीं कि वे क्षमा कर दें। फिर जिसकी हत्या हुई हो यदि वह तुम्हारे किसी शत्रु समाज से संबंध रखता हो, परंतु मुसलमान हो तो एक मुसलमान को ग़ुलामी से मुक्त कर देना ही पर्याप्त है। और यदि वह किसी ऐसे समाज का सदस्य है जिसके साथ तुम्हारी संधि है तो उसके वारिसों को दीय्यत भी दी जाएगी और तुम एक मुसलमान ग़ुलाम भी मुक्त करोगे। फिर जिसके पास ग़ुलाम न हो, उसे निरंतर दो महीने का उपवास रखना होगा। (यह उस पापकर्म को क्षमा करवाने की विधि है,) परमेश्वर की ओर से विशेष अनुग्रह के रूप में और परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है। उस व्यक्ति का दंड, अपितु नरक है जो जानबूझकर किसी मुसलमान की हत्या करे, वह उसमें सदा रहेगा, उस पर परमेश्वर का प्रकोप और उसका अभिशाप है और उसके लिए उसने एक बाद दण्ड तैयार कर रखा है।1
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- कुरआन ने ग़ुलामी/दासत्व (slavery) को समाप्त करने के लिए जो उपाय किए, यह भी उन्हीं में से एक है। ↩
हे मानने वालो, जब तुम परमेश्वर के मार्ग में (इस युद्ध के लिए) निकलो तो (किसी कार्यवाही से पहले) जांच कर लिया करो और जो तुम्हें सलाम करे, उसे यह न कहा करो कि तुम मुसलमान नहीं हो। तुम दुनिया के जीवन का सामान चाहते हो तो परमेश्वर के पास (तुम्हारे लिए) युद्ध में जीती बहुत कुछ सामग्री है। इससे पहले तुम भी इसी दशा में थे, फिर परमेश्वर ने तुम पर उपकार किया। अतः जांच कर लिया करो, इसलिए कि परमेश्वर भलीभांति जानता है जो कुछ तुम करते हो।
(इस युद्ध के लिए निकलो, क्योंकि) जिन मुसलमानों की कोई मजबूरी नहीं है और वे घरों में बैठे रहें और जो अपने प्राण व संपत्ति से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद करें, दोनों समान नहीं हैं। परमेश्वर ने अपने प्राण व संपत्ति से जिहाद करने वालों को बैठने वालों पर एक दर्जे की वरीयता प्रदान की है। इसमें संदेह नहीं कि इनमें से प्रत्येक के लिए परमेश्वर ने भलाई का वचन दिया है, परंतु जिहाद करने वालों को बैठने वालों पर परमेश्वर ने एक महान प्रतिफल की बड़ाई प्रदान की है — उसकी ओर से उच्च श्रेणियां और क्षमा और कृपा। और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
(इस अवसर पर भी जो लोग उन बस्तियों से निकलने के लिए तैयार नहीं हैं, जहाँ उन्हें धर्म के कारण प्रताड़ित किया जा रहा है, उन्हें बताओ, हे पैग़ंबर कि) जिन लोगों के प्राण फ़रिश्ते इस दशा में ग्रहण करेंगे कि (अपने ईमान को संकट में डाल कर) वे अपने प्राणों पर अत्याचार कर रहे थे, उनसे वे पूछेंगे कि तुम किस परिस्थिति में पड़े रहे? वे उत्तर देंगे कि हम तो इस देश में पूर्णतः असहाय थे। फ़रिश्ते कहेंगे: क्या परमेश्वर की धरती इतनी विशाल नहीं थी कि तुम उसमें प्रवास कर जाते। इसलिए यही लोग हैं जिनका ठिकाना नरक है और वह कैसा बुरा ठिकाना है। हाँ, वह पुरुष, महिलाएं और बच्चे जो वास्तव में असहाय हैं और न कोई उपाय कर सकते हैं न मार्ग पाते हैं, उनके लिए आशा है कि परमेश्वर उन्हें क्षमा करे। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला और दोषों को अनदेखा करने वाला है। (ये लोग घरों से निकलें और संतुष्ट रहें कि) जो परमेश्वर के मार्ग में प्रवास करेगा, वह धरती में शरण के लिए बड़े ठिकाने और बड़ी संभावना पाएगा। और जो अपने घर से परमेश्वर और उसके रसूल की ओर प्रवास के लिए निकले, फिर उसे मृत्यु आ जाए तो उसका अच्छा फल परमेश्वर के ऊपर अनिवार्य हो गया, और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
तुम लोग (इस युद्ध के लिए) यात्रा में निकलो तो तुम पर कोई दोष नहीं कि नमाज़ में कमी कर लो, यदि आशंका हो कि नकारने वाले तुम्हें सताएंगे, इसलिए कि ये नकारने वाले तुम्हारे खुले शत्रु हैं।
और (हे पैग़ंबर,) जब तुम इनके बीच हो और (संकट के स्थानों पर) इन्हें नमाज़ पढ़ाने के लिए खड़े हो तो चाहिए कि उनमें से एक दल तुम्हारे साथ खड़ा हो और अपने शस्त्र लिए रहे। फिर जब वे सज्दा कर चुकें तो तुम्हारे पीछे हो जाएं और दूसरा गुट आए, जिसने अभी नमाज़ नहीं पढ़ी है और तुम्हारे साथ नमाज़़ पढ़े। वे भी अपने सुरक्षा का सामान और आवश्यक शस्त्र लिए हुए हों। ये नकारने वाले तो चाहते हैं कि तुम अपने शस्त्रों और अपने सुरक्षा के सामान से थोड़ा लापरवाह हो तो तुम पर एक साथ टूट पड़ें। अपितु, इसमें कोई दोष नहीं कि यदि तुम्हें बारिश से कष्ट हो या तुम अस्वस्थ हो तो अपने शस्त्र उतार दो। हाँ, यह आवश्यक है कि सुरक्षा का सामान लिए रहो। तुम विश्वास रखो कि परमेश्वर ने इन नकारने वालों के लिए बड़ा अपमानजनक दण्ड तैयार कर रखा है।1
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- यहाँ से आगे एक समस्या का समाधान बताया है जो पैगंबर मुहम्मद (स.) के जीवनकाल ही में उत्पन्न हो सकती थी। ↩
फिर जब नमाज़ समाप्त कर लो तो खड़े और बैठे और अपनी बगल पर लेटे हुए, (हर स्थिति में) परमेश्वर का स्मरण करते रहो। परंतु जब संतुष्ट हो जाओ तो नियमित रूप से पूरी नमाज़ पढ़ो और (इसके लिए जो समय निर्धारित है, उसका पालन करो,) इसलिए कि नमाज़ मुसलमानों पर नियमित समय के साथ अनिवार्य की गई है।
(हे मानने वालो, इस युद्ध के लिए निकलो) और शत्रु का पीछा करने में ढीलापन न दिखाओ। यदि तुम कष्ट उठा रहे हो तो तुम्हारे समान वे भी कष्ट उठा रहे हैं,परंतु तुम परमेश्वर से वह आशा रखते हो जो वे नहीं रखते, और (सदा याद रखो कि) परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है।
हमने यह ग्रंथ तुम्हारी ओर सत्य के साथ उतारा है ताकि परमेश्वर ने जो कुछ तुम्हें दिखाया है, उसके अनुसार लोगों के बीच निर्णय करो कि (इनमें से कौन निष्ठावान है और कौन ढोंगी,) और इन वचन तोड़ने वालों के पक्षधर कदापि न बनो। और परमेश्वर से क्षमा की याचना करते रहो, निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। उन लोगों की वकालत न करो जो अपने आप से विश्वासघात कर रहे हैं। परमेश्वर ऐसे किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करता जो वचन तोड़ने वाला है और अधिकार हनन करने वाला है। ये लोगों से छिप सकते हैं, परंतु परमेश्वर से नहीं छिप सकते। वे तो उस समय भी उनके साथ होता है, जब वे उसकी इच्छा के विरुद्ध बातों की कानाफूसी करते हैं। और जो कुछ वे करते हैं, परमेश्वर उनमें से हर चीज़ को घेरे हुए है।
यह तुम हो कि दुनिया के जीवन में तो इन (अपराधियों) की ओर से तुमने झगड़ा कर लिया, किंतु क़यामत के दिन कौन इनकी ओर से परमेश्वर से झगड़ा करेगा या कौन इनका उत्तरदायी बनेगा? हाँ, जो कोई बुराई कर डाले या अपने प्राण पर अत्याचार करे, फिर परमेश्वर से क्षमा चाहे तो परमेश्वर को क्षमा करने वाला और बड़ी कृपा करने वाला पाएगा। (अपने पापकर्म दूसरों पर मढ़कर यह अपने आप को बचाने का प्रयास करते हैं। इन्हें बताओ कि) जो बुराई कमाता है तो उसकी इस कमाई का दुःख उसी पर आता है। (यह परमेश्वर का नियम है) और परमेश्वर जानने वाला और प्रज्ञावान है। (इन्हें बताओ कि) जो किसी ग़लती या पापकर्म का दोषी बनता है, फिर उसका झूठा आरोप किसी निर्दोष पर लगा देता है, उसने तो एक बड़ी बदनामी और स्पष्ट पापकर्म का बोझ अपने सर ले लिया है।
तुम पर परमेश्वर की कृपा और उसकी दया न होती, (हे पैग़ंबर) तो इनमें से एक दल ने तो निर्णय कर लिया था कि तुम्हें सन्मार्ग से हटाकर रहेगा, यद्यपि वे स्वयं को छोड़ किसी को सन्मार्ग से नहीं हटा रहे और न तुम्हें कोई क्षति पहुंचा रहे हैं। (वे तुम्हें किस प्रकार सन्मार्ग से हटा सकते हैं?) परमेश्वर ने तो तुम पर अपना क़ानून और अपनी हिकमत उतारी है और इस प्रकार तुम्हें वह चीज़ सिखाई है जो तुम नहीं जानते थे और परमेश्वर की तुम पर बड़ी कृपा है।
इनकी अधिकांश कानाफूसियों में कोई भलाई नहीं होती। हाँ, उन लोगों की कानाफूसी में अवश्य भलाई है जो दान का उपदेश करें या पुण्य का मार्ग सुझाएँ या लोगों के मामलों के सुधार के लिए कहें। और जो परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए ऐसा करेंगे, उन्हें शीघ्र ही हम बडा प्रतिफल प्रदान करेंगे। इसके विपरीत जो अपने सामने उचित मार्ग के पूरी तरह स्पष्ट हो जाने के बाद रसूल का विरोध करेंगे और उन लोगों के मार्ग को छोड़कर कोई अन्य मार्ग अपनाएंगे जो तुम्हें सच्चे दिल से मान चुके हैं, उन्हें हम उसी मार्ग पर डाल देंगे जिस पर वे स्वयं गए हैं और अंततः नरक में झोंकेंगे। वह अत्यंत बुरा ठिकाना है।
(अतः यही हुआ और ईमान का मार्ग छोड़कर अब ये मुश्रिकों से जा मिले हैं। इन्हें बताओ कि) परमेश्वर इस चीज़ को क्षमा नहीं करेगा कि उसके सहभागी बनाए जाएं। इसके नीचे, अपितु जिसके लिए चाहेगा, (अपने नियम अनुसार) क्षमा कर देगा। (इसलिए शिर्क से दूर रहो) और (याद रखो कि) जो परमेश्वर के सहभागी बनाएगा, वह बहुत दूर की पथभ्रष्टता में जा पड़ा है। (इनके लिए दुख की बात है,) ये परमेश्वर को छोड़ पुकारते भी हैं तो देवियों को पुकारते हैं और पुकारते भी हैं तो उसी शैतान को पुकारते हैं जो बाग़ी हो चुका है, जिसे परमेश्वर ने अभिशाप दिया और जिस ने कह रखा है कि मैं तेरे मनुष्यों में से एक निश्चित संख्या लेकर रहूंगा, मैं उन्हें अवश्य बहकाऊंगा, उन्हें मनोकामनाओं में उलझाऊंगा, उन्हें सिखाऊंगा तो वे चौपायों के कान फाड़ेंगे और उन्हें सिखाऊंगा तो वे परमेश्वर की संरचना को बिगाड़ेंगे। (इन्हें बताओ कि) परमेश्वर को छोड़कर जिसने शैतान को अपना संरक्षक बना लिया, उसके लिए कोई संरक्षक नहीं है, अतः वह स्पष्ट घाटे में पड़ गया है। वह उनसे वादे करता है और उन्हें आशाएं दिलाता है, परंतु उनसे शैतान के ये वादे सर्वथा धोखा हैं, इसलिए यही वे लोग हैं जिनका ठिकाना नरक है और उससे भागने के लिए ये कोई मार्ग नहीं पाएंगे।
इसके विपरीत जो लोग मान चुके और उन्होंने अच्छे कर्म किए हैं, उन्हें हम शीघ्र ही ऐसे बाग़ों में प्रवेश देंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उनमें सदा-सदा रहेंगे। परमेश्वर का वचन सत्य है और परमेश्वर से बढ़कर कौन अपनी बात में सच्चा हो सकता है?
(तुम लोगों पर स्पष्ट होना चाहिए कि मोक्ष) न तुम्हारी मनोकामनाओं पर आधारित है न अहल-ए-किताब की मनोकामनाओं पर। (कदापि नहीं,) अपितु जो बुराई करेगा, उसका बदला पाएगा और परमेश्वर के विरुद्ध में वह अपने लिए कोई पक्षधर और सहायक नहीं पा सकेगा। और जो पुण्य का कोई काम करेगा, चाहे पुरुष हो या स्त्री और वह ईमान भी रखता है तो ऐसे ही लोग हैं जो परमेश्वर के स्वर्ग में प्रवेश करेंगे और उनका थोड़ा सा भी अधिकार-हनन नहीं होगा।
(मानने वालों के मुक़ाबले में ये ढोंगी मुश्रिकों को वरीयता देते हैं) और (नहीं समझते के) उस व्यक्ति से अच्छा किसका धर्म हो सकता है जो अपने आप को परमेश्वर को सौंप दे और अच्छे ढंग से कर्म करने वाला हो और इब्राहीम के मार्ग का अनुसरण करे जो पूरी तरह एकाग्र था — और इब्राहीम को परमेश्वर ने (इसी आधार पर) अपना मित्र बनाया था। (परमेश्वर के अतिरिक्त कौन इसका अधिकारी है कि अपने आप को उसे सौंप दिया जाए, इसलिए कि) धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, परमेश्वर का है और परमेश्वर हर चीज़ को घेरे हुए हैं।
1- वे तुमसे स्त्रियों के बारे में फ़त्वा पूछते हैं। उनसे कह दो कि परमेश्वर तुम्हें उनके बारे में फ़त्वा देता है और जिन स्त्रियों के अधिकार तुम नहीं देना चाहते, परंतु उनसे विवाह करना चाहते हो, उनके अनाथ बच्चों के विषय में जो निर्देश इस ग्रंथ में तुम्हें दिए जा रहे हैं, उनके बारे में और (अन्य) बेसहारा बच्चों के बारे में भी फ़त्वा देता है कि स्त्रियों के अधिकार हर स्थिति में दो और अनाथ बच्चों के साथ हर स्थिति में न्याय पर क़ायम रहो और (याद रखो कि इसके अतिरिक्त भी) जो भलाई तुम करोगे, उसका फल अवश्य पाओगे, इसलिए कि वह परमेश्वर की जानकारी में रहेगी। हाँ, यदि किसी स्त्री को अपने पति से अरुचि या बेपरवाही की आशंका हो तो उनपर पाप नहीं कि दोनों आपस में कोई समझौता कर लें। इसलिए कि समझौता अच्छा है। और (यह तो तुम जानते ही हो कि) लालच लोगों की प्रवृत्ति में है, परंतु अच्छा व्यवहार दिखाओगे और संयम अपनाओ तो अच्छा फल पाओगे, इसलिए कि जो कुछ तुम करोगे, परमेश्वर उसे जानता है।1
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- अपनी विषय-वस्तु की दृष्टि से यहाँ सूरह समाप्त हुई। इससे आगे अब एक परिशिष्ट (Appendix) है जिस में परमेश्वर ने उन प्रश्नों का उत्तर दिया है जो इस सूरह को पढ़ते हुए इसमें दिए गए निर्देशों के बारे में लोगों ने किए। ↩
पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय तो यदि तुम चाहो भी तो नहीं कर सकते, इसलिए इतना पर्याप्त है की एक ही की ओर इस प्रकार न झुक जाओ कि दूसरी अधर में लटकती रह जाए। हाँ, यदि अपने आप को सुधारते रहोगे और परमेश्वर से डरते रहोगे तो परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और यदि पति पत्नी, दोनों अलग ही हो जाएँगे तो परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को अपने सामर्थ्य से धनवान कर देगा। परमेश्वर बड़ा सामर्थ्य रखने वाला और बड़ा प्रज्ञावान है।
(ये परमेश्वर के निर्देश हैं। नहीं मानोगे तो अपना ही बुरा करोगे, इसलिए कि) धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर का है। तुमसे पहले जिन लोगों को परमेश्वरीय ग्रंथ दिया गया, उन्हें भी हमने यही उपदेश किया था और तुम्हें भी यही उपदेश कर रहे हैं कि परमेश्वर से डरते रहो और (याद रखो कि) नहीं मानोगे तो परमेश्वर का कुछ नहीं बिगाड़ोगे, इसलिए कि धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर का है और परमेश्वर निस्पृह है, उत्तम गुणों वाला है। (एक बार फिर सुनो कि) धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर का है और भरोसे के लिए परमेश्वर पर्याप्त है। (इसलिए वही इस योग्य है कि जीवन के सब मामले उसे सौंप दिए जाएं। तुम्हारी अवज्ञा की स्थिति में) वह यदि चाहे तो लोगो, तुम सब को नष्ट कर दे और दूसरों को (तुम्हारी जगह) ले आए, परमेश्वर इस चीज़ का पूर्ण सामर्थ्य रखता है। (अपने हितों के लिए तुम परमेश्वर की शरीअत से भाग जाते हो। तुम्हें जानना चाहिए कि) जो दुनिया का फल चाहता है तो दुनिया का फल भी परमेश्वर के पास है और जो परलोक का फल चाहता है तो परमेश्वर के पास इस लोक का फल भी है और परलोक का फल भी, और परमेश्वर सुनने वाला और देखने वाला है।
2- हे मानने वालो, न्याय पर क़ायम रहो, परमेश्वर के लिए उसकी गवाही देते हुए, यद्यपि यह गवाही स्वयं तुम्हारे अपने, तुम्हारे माता-पिता और तुम्हारे सगे संबंधियों के विरुद्ध ही पड़े। धनवान हो या ग़रीब, (परमेश्वर ही का दोनों पर ज़्यादा अधिकार है कि उसके विधान का पालन किया जाए।) इसलिए (परमेश्वर के मार्गदर्शन को छोड़कर) तुम मनोकामनाओं का अनुसरण न करो कि इसके परिणामस्वरूप सत्य से हट जाओ (और याद रखो कि) यदि (सत्य और न्याय की बात को) बिगाड़ने (या उससे) बचने का प्रयास करोगे तो उसका दण्ड अवश्य पाओगे, इसलिए कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे भलीभांति जानता है। हे मानने वालो, परमेश्वर को मानो और उसके रसूल को मानो और उस ग्रंथ को जो उसने अपने रसूल पर उतारा है और उस ग्रंथ को भी जो वह इससे पहले उतार चुका है और (जान लो कि) जो परमेश्वर और उसके फ़रिश्तों और उसके ग्रंथों और उसके रसूलों और क़यामत के दिन (उसके सामने उपस्थित होने) को नकारते हों, वे बहुत दूर की पथभ्रष्टता में जा पड़े हैं। रहे वे लोग जिन्होंने माना, फिर कुफ़्र किया, फिर माना, फिर कुफ़्र किया, फिर इसी कुफ़्र में बढ़ते चले गए, तो परमेश्वर न उन्हें क्षमा करने वाला है और न उन्हें कभी मार्ग दिखाएगा। इन ढोंगियों को शुभ सूचना दो, (हे पैग़ंबर), जो मानने वालों को छोड़कर तुम्हारे नकारने वालों को अपना मित्र बनाए हुए हैं कि इनके लिए एक कष्टदायक यातना है। ये उनके यहाँ सम्मान चाहते हैं? सत्य यह है कि सम्मान तो सारे का सारा परमेश्वर ही के लिए है।
वह इसी ग्रंथ में तुम पर यह उपदेश उतार चुका है कि जहाँ तुम सुनो कि परमेश्वर की दिव्य आयतों का इंकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है, वहां उन (मज़ाक़ उड़ाने वालों) के साथ न बैठो, जब तक वे किसी अन्य बात में न लग जाएँ, अन्यथा तुम भी उन्हीं के समान हो जाओगे। परमेश्वर का निर्णय है कि वह इस प्रकार के सब ढोंगियों और नकारने वालों को नरक में एक ही जगह एकत्रित कर देगा, इनको जो तुम्हारे ऊपर संकटों के आने की प्रतीक्षा में हैं। इसलिए परमेश्वर की ओर से तुम्हारी कोई विजय होती है तो ये कहते हैं कि क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे? और यदि तुम्हारे नकारने वालों की विजय हो जाए तो कहते हैं कि क्या हम तुम्हें घेरे में लिए हुए नहीं रहे और हमने मुसलमानों से तुम को बचाया नहीं है? इसलिए तुम्हारे बीच अब परमेश्वर ही क़यामत के दिन निर्णय करेगा और (परमेश्वर का निर्णय है कि वह) इन नकारने वालों को मानने वालों के विरुद्ध कदापि कोई रास्ता नहीं देगा।
ये ढोंगी परमेश्वर को धोखा देना चाहते हैं, यद्यपि उसी ने इन्हें धोखे में डाल रखा है। (तुम इन्हें देखते हो,) ये जब नमाज़ के लिए उठते हैं तो निराश होते हुए केवल लोगों को दिखाने के लिए उठते हैं और परमेश्वर का स्मरण कम ही करते हैं। बीच में ही लटक रहे हैं, न इधर हैं न उधर हैं। (इनके अपराधों के कारण परमेश्वर ने इन्हें दिशाहीन कर दिया है) और जिसे परमेश्वर दिशाहीन कर दे, उसके लिए तुम कोई मार्ग नहीं पा सकते।
हे मानने वालो, (इनकी बातों में आकर) तुम मुसलमानों को छोड़कर (पैग़ंबर के) नकारने वालों को अपना मित्र न बनाओ। क्या तुम चाहते हो कि परमेश्वर को अपने विरुद्ध स्पष्ट प्रमाण दे दो। (तुम्हें जानना चाहिए कि) ये ढोंगी नरक के सबसे निचले खंड में होंगे और तुम इनके लिए कोई सहायक नहीं पाओगे। हाँ, जो प्रायश्चित करेंगे और (अपने आचरण को) सुधारेंगे और परमेश्वर को दृढ़तापूर्वक पकड़ेंगे और अपने आज्ञा-पालन को परमेश्वर के लिए विशुद्ध करेंगे, वही मानने वालों के साथ होंगे और परमेश्वर मानने वालों को शीघ्र ही बडा प्रतिफल प्रदान करेगा।
(परमेश्वर के भक्तो), यदि तुम कृतज्ञता अपनाओ और सच्चे मानने वाले बन कर रहो तो परमेश्वर को क्या पड़ी है कि तुम्हें दंडित करे। परमेश्वर तो बड़ा स्वीकार करने वाला और (हर चीज़ का) जानने वाला है।
(हे मानने वालो, ये ढोंगी तुम्हारे साथ अनुचित व्यवहार करें और तुम उत्तर देना चाहो तो दे सकते हो, इसलिए कि) परमेश्वर को पीड़ित के अतिरिक्त किसी का बुरी बात कहना अच्छा नहीं लगता और परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। (परंतु इसके स्थान पर) यदि प्रत्यक्ष रूप से या छिपे हुए, पुण्य ही किए जाओगे या (कम से कम) बुराई को क्षमा करोगे तो यही अच्छा है, इसलिए कि परमेश्वर (का गुण भी यही है कि) बड़ा सामर्थ्य रखने वाला (होते हुए भी), वह क्षमा करने वाला है।
(अपितु, यह सत्य स्पष्ट रहना चाहिए कि) जो लोग परमेश्वर और उसके रसूल को नकारने वाले हो रहे हैं और चाहते हैं कि परमेश्वर और उसके रसूलों के बीच भेद करें और कहते हैं कि किसी को मानेंगे और किसी को नहीं मानेंगे और चाहते हैं कि मानने और नकारने के बीच कोई मार्ग निकालें, वही पक्के नकारने वाले हैं और हमने इन नकारने वालों के लिए अपमानित कर देने वाली यातना तैयार कर रखी है। इसके विपरीत जो परमेश्वर और उसके रसूलों को मान रहे हैं और उनमें से किसी के बीच उन्होंने कोई भेदभाव नहीं किया है, वही हैं जिनको परमेश्वर अवश्य उनका अच्छा फल प्रदान करेगा और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
3- ये अहल-ए-किताब तुमसे मांग कर रहे हैं कि (इस क़ुरआन के बजाय) इन पर सीधे आकाश से एक ग्रंथ उतार लाओ। इसलिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, उन्होंने मूसा से इससे भी बड़ी मांग की थी। इन्होंने मांग की थी कि हमें परमेश्वर का साक्षात दर्शन कराओ तो इनके इस विद्रोह के कारण इनको कड़क ने धर लिया था। फिर इन्होंने बछड़े को उपास्य बना लिया, इसके बाद कि इनके पास स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी थीं। इस पर भी हमने इन्हें क्षमा किया और मूसा को (इन पर) स्पष्ट प्रभुता प्रदान की थी। और हमने तूर पर्वत को इन पर उठा लिया, इनसे एक वचन के साथ और इन्हें आदेश दिया था कि (नगर के) द्वार में सर झुकाए हुए प्रविष्ट हों और इनसे कहा था कि 'सब्त' के विषय में अवज्ञा न करना और (इन सब चीज़ों पर) हमने इनसे दृढ़ वचन लिया था।
फिर इनके अपना वचन तोड़ देने के कारण (हमनें इन्हें अभिशप्त कर दिया,) और इस कारण कि इन्होंने परमेश्वर की आयतों को नहीं माना और इनके नबियों की अन्यायपूर्वक हत्या कर देने के कारण और इस कारण कि इन्होंने कहा कि हमारे दिलों पर तो पट्टियाँ हैं — नहीं, अपितु इनके कुफ़्र के कारण परमेश्वर ने इनके दिलों पर मुहर कर दी है, इसलिए (अब) ये कम ही मानेंगे — और इनके कुफ़्र के कारण और मर्यम पर बड़ा लांछन लगाने के कारण और इनके इस दावे के कारण कि हमने परमेश्वर के रसूल, मर्यम-पुत्र ईसा मसीह की हत्या कर दी है — यद्यपि इन्होंने न उसकी हत्या की और न उसे सूली दी, अपितु मामला इनके लिए अस्पष्ट बना दिया गया। जो लोग इसमें मतभेद कर रहे हैं, वे इस मामले में संदेह में पड़े हुए हैं, उनको इसके विषय में कोई ज्ञान नहीं, वे केवल अटकलों के पीछे चल रहे हैं। उन्होंने कदापि उसकी हत्या नहीं की, अपितु परमेश्वर ही ने उसे अपनी ओर उठा लिया था और परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात उनकी मृत्यु के बाद उठा लिया था। इसको सूरह आलि-इम्रान् (3) की आयत 55 में स्पष्ट किया गया है। ↩
(ये इनके अपराध हैं, इसलिए अब क़ुरआन के अतिरिक्त ये सीधे आकाश से उतरे हुए किसी ग्रंथ की मांग कर रहे हैं तो इनकी परवाह न करो, हे पैग़ंबर,) इन अहल-ए-किताब में से प्रत्येक व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले अवश्य इसी (क़ुरआन) को मान लेगा और क़यामत के दिन यह इन पर गवाही देगा।
फिर इन यहूदियों के अत्याचार ही के कारण कि ये परमेश्वर के मार्ग से बहुत रोकते रहे हैं और इस कारण कि ब्याज लेते रहे हैं, यद्यपि इन्हें इस से रोका गया था और इस कारण कि ये लोगों का धन अनुचित रूप से खाते रहे हैं, और ये इन्हीं के नकारने वाले हैं जिनके लिए हमने कष्टदायक यातना तैयार कर रखी है। अपितु, इनमें से जो ज्ञान में पक्के हैं और जो मानने वाले हैं, वे उस चीज़ को मानते हैं जो तुम्हारी ओर उतारी गई और जो तुमसे पूर्व उतारी गई है और विशेष रुप से नमाज़ का प्रबंध करने वाले हैं, और ज़कात देने वाले और परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास रखने वाले हैं। यही वे लोग हैं जिन्हें हम शीघ्र ही बडा प्रतिफल प्रदान करेंगे।
(इनकी परवाह न करो, हे पैग़ंबर,) हमने तुम्हारी तरफ़ उसी प्रकार वह्य की है जिस प्रकार नूह की तरफ़ और उसके बाद आने वाले पैग़ंबरों की तरफ़ की थी। हमने इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब, याक़ूब की संतान, ईसा, अय्यूब, यूनुस, हारून और सुलैमान की तरफ़ भी वह्य की और दाऊद को हमने ज़ुबूर प्रदान की थी। हमने उन रसूलों की तरफ़ भी वह्य भेजी जिनका वर्णन पहले तुमसे कर चुके हैं और उन रसूलों की तरफ़ भी जिनका वर्णन तुमसे नहीं किया और मूसा से तो परमेश्वर ने संवाद किया था जिस प्रकार संवाद किया जाता है। ये रसूल जो शुभ सूचना देने वाले और सचेत करने वाले बना कर भेजे गए ताकि लोगों के लिए इन रसूलों के बाद परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करने के लिए कोई बहाना बाक़ी न रहे। परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।
(ये नकारते हैं तो नकारें,) परंतु परमेश्वर गवाही देता है कि उसने जो कुछ तुम्हारी ओर उतारा है, उसको अपने ज्ञान के साथ उतारा है और उसके फ़रिश्ते भी गवाही देते हैं और गवाही के लिए तो परमेश्वर ही पर्याप्त है। जिन लोगों ने मानने से इनकार किया है और परमेश्वर के मार्ग से रोका है, वे बड़ी दूर की पथभ्रष्टता में जा पड़े हैं। जिन लोगों ने मानने से इनकार किया और इस प्रकार स्वयं अपने प्राणों पर अत्याचार किया है, परमेश्वर उन्हें क्षमा करने वाला नहीं है और न उन्हें नरक के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग दिखाने वाला है। ये उस में सदा-सदा रहेंगे और परमेश्वर के लिए यह अत्यंत सहज है।
लोगो, तुम्हारे पास यह रसूल तुम्हारे प्रभु की ओर से सत्य लेकर आ गया है। इसलिए (इसको) मान लो, इसी में तुम्हारी भलाई है। और यदि नकारने पर जमे रहोगे तो याद रखो कि परमेश्वर का कुछ नहीं बिगड़ोगे, इसलिए कि धरती और समस्त आकाशें में जो कुछ है, सब परमेश्वर ही का है। (वह हर एक को उसके कर्मों का फल देगा, परंतु उसी समय जो उसने तय कर रखा है) और परमेश्वर ज्ञानी और प्रज्ञावान है। हे अहल-ए-किताब, अपने धर्म में अत्युक्ति न करो और परमेश्वर के विषय में सत्य के सिवा कोई बात न कहो। सत्य यह है कि मर्यम-पुत्र ईसा मसीह परमेश्वर का एक रसूल और उसका शब्द मात्र था जो उसने मर्यम की ओर डाल दिया था और उसकी ओर से एक प्राण था (जो परमेश्वर ने उसमें फूंक दिया था।) इसलिए परमेश्वर और उसके रसूलों को मानो और (परमेश्वर को) तीन न बनाओ। रुक जाओ, इसी में तुम्हारी भलाई है। परमेश्वर ही एकमात्र उपास्य है, वह इससे दूर है कि उसकी संतान हो। धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, उसी का है और उनकी व्यवस्था को देखने के लिए परमेश्वर ही पर्याप्त है। मसीह कदापि इस बात से लज्जित न होगा कि वह परमेश्वर का एक भक्त है और न परमेश्वर के क़रीबी फ़रिश्ते इसे कभी अपमान समझेंगे। यदि कोई परमेश्वर की भक्ति को अपने लिए अपमान समझता और अहंकार करता है तो शीघ्र ही वह सब को घेरकर अपने सामने इकट्ठा कर लेगा। फिर जिन्होंने माना और भले कर्म किए हैं, उन्हें वह उनका पूरा फल देगा और अपने अनुग्रह से उनको और भी अधिक प्रदान करेगा। और जिन लोगों ने उसकी भक्ति को अपमान समझा और अहंकार किया, उन्हें वह कष्टदायक दण्ड देगा और परमेश्वर के विरुद्ध वे अपने लिए कोई पक्षधर और सहायक नहीं पाएंगे।
लोगो, तुम्हारे प्रभु का निर्णायक प्रमाण तुम्हारे पास आ गया है और हमने तुम्हारी ओर एक ऐसा प्रकाश उतारा है जो (हर बात को) स्पष्ट करने वाला है। इसलिए जिन लोगों ने परमेश्वर को माना और उन्होंने उसे दृढ़ता से पकड़ लिया, वह शीघ्र ही उन्हें अपनी दया और अपनी कृपाओं की (छाँव में) प्रवेश देगा और अपनी ओर आने का सीधा मार्ग दिखाएगा।
4- वे तुमसे फ़तवा पूछते हैं। इनसे कहो कि परमेश्वर तुम्हें कलाला रिश्तेदारों के बारे में फ़तवा देता है: यदि कोई व्यक्ति बिना संतान के मरे और उसकी एक बहन ही हो तो उसके लिए उसके छोड़े हुए धन का आधा है और यदि बहन बिना संतान के मरे तो उसका वारिस उसका भाई है। और बहनें यदि दो हों तो उन्हें उसके छोड़े हुए धन में से दो तिहाई मिलेगा और यदि अनेक भाई बहन हों तो एक पुरुष का भाग दो स्त्रियों के समान है। परमेश्वर तुम्हारे लिए विस्तृत वर्णन करता है ताकि तुम भटकते न फिरो और परमेश्वर हर चीज़ को जनता है।