सूरह 3
आलि-इम्रान्
मदनी · 200 आयतें · 71 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
यह सूरह 'अलिफ़, लाम, मीम' है। परमेश्वर वह सत्ता है कि उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, जीवित और सब को थामे रखने वाला है। (लोगों को परीक्षा में डालकर वह उनका मार्गदर्शन करने से बेपरवाह नहीं हो सकता था, इसलिए) उसने यह ग्रंथ तुम पर एक निर्णायक बात के साथ उतारा है, उन भविष्यवाणियों की पुष्टि करता हुआ जो इससे पूर्व उपलब्ध हैं, और तौरात और इंजील को भी इससे पहले उसी ने लोगों के लिए मार्गदर्शन बनाकर उतारा था, और अब यह फ़ुर्क़ान भी उसी ने उतारा है। (ये परमेश्वर की आयतें हैं, और) जो लोग (जानबूझकर) परमेश्वर की आयतों को नकारने वाले हों, उनके लिए बड़ा कठोर दण्ड है, और परमेश्वर प्रबल है, वह (ऐसे लोगों से) बदला लेने वाला है। इसलिए कि परमेश्वर से न धरती में कोई चीज़ छिपी हुई है, न आकाश में। वही तो है जो माताओं के गर्भ में तुम्हारे रूप, जिस प्रकार चाहता है, बना देता है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई उपास्य नहीं, वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।
वही है जिसने तुम पर यह ग्रंथ उतारा है, जिसमें आयतें मोहकम भी हैं जो इस ग्रंथ का मूल आधार हैं और (इनके अतिरिक्त) कुछ अन्य आयतें मुतशाबिहात भी हैं। तो जिनके दिल टेढ़े हैं, वे इसमें से सदा मुतशाबिह आयतों के पीछे होते हैं, इसलिए कि बिगाड़ पैदा करें और इसलिए कि उनकी वास्तविकता जान लें, यद्यपि उनकी वास्तविकता परमेश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। इसके विपरीत जो इस ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं कि हम इन्हें मानते हैं, यह सब हमारे प्रभु की ओर से है, और सत्य यह है कि इस प्रकार की बातों को वही समझते हैं जिन्हें परमेश्वर ने बुद्धि प्रदान की है। (वे कहते हैं): प्रभु, तूने हमारा मार्गदर्शन किया है तो इसके बाद अब तू हमारे दिल न फेर और हमें अपने पास से दया प्रदान कर। निस्संदेह, तू ही देने वाला है। प्रभु, तू अवश्य सब लोगों को एक ऐसे दिन उपस्थित होने के लिए एकत्रित कर के रहेगा जिसके आने में कोई संदेह नहीं। यह सत्य है कि परमेश्वर अपने वचनों का उल्लंघन नहीं करता।
इस ग्रंथ के नकारने वालों को, (जिन तक सत्य का पूर्ण रूप से संचार हो गया), परमेश्वर के सामने न उनका धन कोई लाभ देगा और न उनकी संतान, और यही हैं जो नरक का ईंधन बनेंगे। इनका मामला भी वही है जो फ़िरऔनियों और उससे पूर्व के लोगों का था। उन्होंने हमारी आयतों को झूठा कहा तो परमेश्वर ने उनके पापकर्मों के फलस्वरूप उन्हें पकड़ लिया और सत्य यह है कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है।
इन नकारने वालों से कह दो कि शीघ्र ही तुम भी (इसी प्रकार) परास्त हो जाओगे और (इसके बाद) नरक की ओर हाँके जाओगे, और वह कैसा बुरा ठिकाना है। और (तुम्हें यदि हमारी इस बात में कोई संदेह है तो) जिन दो गुटों में भिड़ंत हुई, उनके वृत्तान्त में तुम्हारे लिए एक बड़ी निशानी है। एक मानने वालों का गुट जो परमेश्वर के मार्ग में लड़ रहा था और दूसरा नकारने वालों का जो शैतान के मार्ग में लड़ रहा था। वे (बद्र के मैदान में) मानने वालों को खुल्लम खुल्ला अपने से दोगुना देख रहे थे। सत्य यह है कि परमेश्वर जिसकी चाहता है (इसी प्रकार) अपने समर्थन से सहायता करता है। इसमें उनके लिए अवश्य बड़ी सीख है जो आँखों वाले हों।
उन लोगों के लिए (जो इस अंतर्दृष्टि से वंचित हैं) दुनिया के आकर्षण — स्त्रियाँ, बेटे, सोने चांदी के ढेर, निशान लगाए घोड़ों, चौपायों और खेती का प्रेम बहुत लुभाने की चीज़ बना दी गई है। ये सब दुनिया के जीवन की सामग्री है और अच्छा ठिकाना तो केवल परमेश्वर के पास है। इनसे कहिए कि मैं तुम्हें बताऊँ कि इन चीज़ों से बढ़कर क्या है? परमेश्वर से डर कर रहने वालों के लिए उनके प्रभु के पास बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उसमें सदा रहेंगे और निर्मल पत्नियाँ हैं और सबसे बढ़कर परमेश्वर की प्रसन्नता है, और परमेश्वर अपने इन भक्तों को देख रहा है। ये जो प्रार्थनाएँ करते हैं कि प्रभु, हम मान चुके हैं, इसलिए तू हमारे पापकर्मों को क्षमा करदे और हमें नरक की यातना से बचा ले। ये धैर्य रखने वाले, सच्चे, आज्ञाकारी, परमेश्वर के मार्ग में दान करने वाले और रात की पिछली घड़ियों में उठकर अपने पापकर्मों की क्षमा चाहने वाले।
परमेश्वर ने, उसके फ़रिश्तों ने, और (इस दुनिया में) सच्चा ज्ञान रखने वाले सभी लोगों ने गवाही दी है कि उसके अतिरिक्त अन्य कोई उपास्य नहीं, वह न्याय पर खड़ा है, उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।
(यह सत्य है तो फिर इसमें भी कोई संदेह नहीं कि) परमेश्वर के निकट धर्म केवल इस्लाम है, (इसलिए कि वही परमेश्वर को इस प्रकार मानने का निमंत्रण देता है), और जिन्हें धर्मग्रंथ दिया गया, उन्होंने तो (परमेश्वर की ओर से) इस सत्य का ज्ञान उनके पास आ जाने के बाद केवल आपस की हठ के कारण इसमें मतभेद किया है। (यह स्पष्ट इंकार है), और जो इस प्रकार परमेश्वर की आयतों के नकारने वाले हों, वे उससे निडर न रहें, इसलिए कि परमेश्वर शीघ्र ही हिसाब लेने वाला है। अतः वे यदि तुमसे झगड़ें तो कह दो कि मैंने और मेरे अनुयायियों ने तो अपने आप को परमेश्वर को सौंप दिया है। और अहल-ए-किताब से और (बनी इस्माईल के) इन उम्मियों से पूछो कि क्या तुम भी इसी प्रकार अपने आप को परमेश्वर को सौंपते हो? फिर यदि सौंपें तो मार्ग पा गए और यदि विमुख हो जाएँ तो तुम पर केवल प्रचार करने का दायित्व है। अपने भक्तों को तो परमेश्वर स्वयं देखने वाला है।
रहे ये लोग जो परमेश्वर की आयतों को नकारते रहे हैं और उसके पैग़ंबरों की अकारण हत्या करते रहे हैं, अथवा परमेश्वर के उन भक्तों की हत्या करते रहे हैं जो लोगों में से न्याय पर खड़े रहने का आह्वान करते थे तो इन्हें एक कष्टदायक यातना की शुभ सूचना सुना दो। यही हैं कि जिनके कर्म इस लोक और परलोक, दोनों में बर्बाद हुए और अब इनका कोई सहायक नहीं होगा।
तुमने देखा नहीं उन लोगों को जिन्हें धर्मग्रंथ दिया गया, उन्हें परमेश्वर के ग्रंथ की ओर ही बुलाया जा रहा है कि उनके बीच (मतभेदों का) निपटारा कर दे। फिर देखा नहीं कि उन्हीं में से एक समूह उससे मुँह फेर लेता है और सत्य यह है कि ये मुँह फेरने वाले लोग ही हैं। इनके इस आचरण का कारण यह है कि इनका कहना है कि नरक की आग हमें कदापि नहीं छूएगी। हाँ, गिनती के कुछ दिनों की पीड़ा, अपितु हो सकती है। इस प्रकार ये जो कुछ गढ़ते रहे हैं, उसी ने अपने धर्म के विषय में इन्हें धोके में डाल दिया है। परंतु क्या बनेगा उस समय जब इनको हम एक ऐसे दिन की पेशी के लिए इकट्ठा करेंगे जिसके आने में कोई संदेह नहीं और जिसमें हर व्यक्ति की कमाई का बदला उसे पूरा दिया जाएगा और लोगों के साथ कोई अन्याय नहीं किया जाएगा।
(इनका युग समाप्त हुआ, इसलिए अब) तुम प्रार्थना करो कि हे परमेश्वर, सम्पूर्ण प्रभुत्व के स्वामी, तू जिसको चाहे, प्रभुत्व दे और जिससे चाहे, यह प्रभुत्व छीन ले; और जिसको चाहे सम्मान दे और जिसको चाहे, अपमानित कर दे। सारी भलाई तेरे ही नियंत्रण में है। निस्संदेह तू हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। (हम जानते हैं कि) तू रात को दिन में और दिन को रात में पिरोता हुआ ले आता है और (जानते हैं कि) तू मुर्दे से जीवित को और जीवित से मुर्दे को निकालता है और जिसको चाहता है, असंख्य जीविका प्रदान करता है।
(यह परमेश्वर का निर्णय है और इन अहल-ए-किताब के लिए शीघ्र ही सामने आ जाएगा, इसलिए) मानने वाले अब मुसलमानों को छोड़कर इन नकारने वालों को अपना मित्र न बनाएं और (याद रखें कि) जो यह करेंगे, परमेश्वर से उनका कोई संबंध नहीं है, सिवाय इसके कि तुम उनसे बचो, जैसा कि तुम्हें बचना चाहिए। परमेश्वर तुम्हें अपने आप से डराता है और इसलिए डराता है कि (एक दिन) तुम्हें परमेश्वर ही की ओर लौटना है। (हे पैग़ंबर), इन (मुसलमानों) से कह दो कि जो कुछ तुम्हारे दिलों में है, तुम उसे छिपाओ या व्यक्त करो, परमेश्वर उसे जानता है, और धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, उसे भी जानता है, और परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। जिस दिन प्रत्येक जीव अपनी की हुई भलाई सामने पाएगा और उसने जो बुराई की होगी, उसे भी देखेगा, उस दिन वह आशा करेगा कि काश उसके और इस दिन की उपस्थिति के बीच एक लंबा अंतराल आड़े आ जाता। (यह परमेश्वर का उपदेश है) और परमेश्वर तुम्हें अपने आप से डराता है और इसलिए डराता है कि परमेश्वर अपने भक्तों के लिए बड़ा कृपालु है।1
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- अर्थात परमेश्वर से कोई संबंध तभी होगा, जब उनसे बचोगे। ↩
इनसे कह दो कि यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो, परमेश्वर तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे पापकर्मों को क्षमा करेगा, और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। कह दो कि परमेश्वर और उसके रसूल का आज्ञापालन करो। फिर इसके बाद भी ये मुँह मोड़ें तो (इन्हें बता दो कि) इस प्रकार के नकारने वालों को परमेश्वर प्रिय नहीं रखता।
(ये अहल-ए-किताब तुमसे बहस करना चाहते हैं)। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर ने आदम और नूह को, और इब्राहीम और इमरान के वंश को मानव-मात्र पर श्रेष्ठता देकर (उनके मार्गदर्शन के लिए) चुन लिया। ये एक दूसरे की संतान हैं और (जो कुछ कहते और करते रहे हैं, परमेश्वर उससे परिचित है, इसलिए कि) परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।1
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- सूरह की भूमिका यहाँ समाप्त हुई। इन आयतों से अब अहल-ए-किताब, विशेष रूप से ईसाइयों (नासारा) तक सत्य के निर्णायक रूप से सचारित होने (इत्माम-ए-हुज्जत) का विषय शुरू होता है। ↩
इन्हें वह घटना याद दिलाओ जब इमरान की पत्नी ने प्रार्थना की कि प्रभु, यह मेरे गर्भ में जो बच्चा है, उसको मैंने हर दायित्व से मुक्त करके तुझे अर्पित कर दिया है। तो तू मेरी ओर से इसको स्वीकार कर, निस्संदेह तू ही सुनने वाला और जानने वाला है। फिर जब उसने उसको जन्म दिया तो बोली कि प्रभु, यह तो मैंने लड़की जन दी है — और जो कुछ उसने जना था, परमेश्वर उसे अच्छे से जानता था — और (बोली कि) वह लड़का इस लड़की जैसा न होता। (चलो अब यही है) और मैंने इसका नाम मर्यम रख दिया है और इसको और इसकी संतान को मैं तिरस्कृत शैतान से तेरी शरण में देती हूं। (उसकी भावनाएं यही थीं), फिर भी उसके प्रभु ने उस लड़की को बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया और बड़े अच्छे ढंग से विकसित किया और ज़करिया को उसका अभिभावक बना दिया। (अतः) जब भी ज़करिया प्रार्थना कक्ष में उसके पास जाता तो वहां (परमेश्वर का) उपकार देखता था। (इसी प्रकार के एक अवसर पर) उसने पूछा: मर्यम, यह कहां से पाती हो? उसने उत्तर दिया: यह परमेश्वर के पास से है। (उस लड़की पर यह तुम्हारे प्रभु की कृपा थी), इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर जिसको चाहता है, बेहिसाब देता है।
यही अवसर था कि ज़करिया ने अपने प्रभु को पुकारा। उसने प्रार्थना की कि प्रभु, तू मुझे भी अपने पास से (ऐसी ही) पवित्र संतान प्रदान कर। निस्संदेह तू (अपने भक्तों की) प्रार्थना सुनने वाला है। इसके उत्तर में फ़रिश्तों ने उसे पुकारा, जबकि वह प्रार्थना कक्ष में खड़ा नमाज़ पढ़ रहा था कि परमेश्वर तुझे यह्या की शुभ सूचना देता है जो परमेश्वर के एक शब्द की पुष्टि करने वाला, सरदार और दुनिए के सुखों से अलग और (परमेश्वर के) सदाचारी भक्तों में से एक नबी होगा। उसने आश्चर्य से पूछा: प्रभु, मेरे घर लड़का कहाँ से होगा, मैं तो बूढ़ा हो चुका और मेरी पत्नी भी बांझ है? कहा: परमेश्वर इसी प्रकार जो चाहे, करता है। उसने निवेदन किया: प्रभु, फिर मेरे लिए कोई निशानी निश्चित कर दें। कहा: तुम्हारे लिए निशानी यह है कि तीन दिन तक तुम लोगों से संकेत के अतिरिक्त कोई बात न कर सकोगे। (हाँ, परमेश्वर का गुणगान और स्तुति, अपितु कर सकोगे, इसलिए यह दिन इसी प्रकार बिताना) और (इस बीच) अपने प्रभु को बहुत याद करना और सुबह शाम उसका गुणगान करते रहना।1
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- अर्थात ‘कुन्’ शब्द जिससे सामान्य प्राकृतिक कारणों के विपरीत पैग़ंबर ईसा मसीह (अ.) का जन्म हुआ। ↩
और वह घटना भी इन्हें याद दिलाओ, जब फ़रिश्तों ने मर्यम से कहा: हे मर्यम, परमेश्वर ने तुझे चुन लिया है और पवित्रता प्रदान की है और विश्व की सभी स्त्रियों पर श्रेष्ठता दे कर (अपनी एक महान निशानी के प्रकट होने के लिए) तुम्हारा चयन कर लिया है। (इसलिए), हे मर्यम, अब अपने प्रभु के आज्ञापालन में लगी रहो और उसके आगे झुकने वालों के साथ रुकूअ तथा सजदे करती रहो।
यह परोक्ष की बातें हैं, (हे पैग़ंबर), जो हम तुम्हें वह्य कर रहे हैं, और सत्य यह है कि जब हैकल के सेवक यह निर्णय करने के लिए कि उनमें से कौन मर्यम की देख-रेख करेगा, अपने अपने पाँसे फेंक रहे थे तो तुम उनके पास उपस्थित नहीं थे, और न उस समय उनके पास थे, जब वे इस विषय में एक दूसरे से झगड़ रहे थे।
इन्हें याद दिलाओ, जब फ़रिश्तों ने कहा: हे मर्यम, परमेश्वर तुझे अपने एक शब्द की शुभ सूचना देता है। उसका नाम मर्यम पुत्र मसीह ईसा होगा। वह इस लोक और परलोक, दोनों में उच्च स्थान वाला और परमेश्वर के ख़ास क़रीबी लोगों में से होगा। लोगों से गहवारे में भी (अपनी नुबुव्वत की) बात करेगा और वृद्ध आयु को पहुँच कर भी और सदाचारियों में गिना जाएगा। वह बोली: प्रभु: मेरे यहाँ बच्चा कहाँ से होगा, मुझे तो किसी पुरुष ने छुआ तक नहीं। कहा: इसी प्रकार परमेश्वर जो चाहे, पैदा करता है। वह जब किसी बात का निर्णय कर लेता है तो उसको इतना ही कहता है कि हो जा, फिर वह हो जाता है। (इसलिए इसी प्रकार होगा) और परमेश्वर उसे क़ानून और हिकमत सिखाएगा, अर्थात तौरात और इंजील की शिक्षा देगा और उसको इस्राईलियों की ओर रसूल बनाकर भेजेगा। (अतः यही हुआ और उसने इस्राईलियों को आह्वान किया कि) मैं तुम्हारे प्रभु की ओर से निशानी लेकर आया हूँ। मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से पक्षी का एक रूप बनाता हूँ, फिर मैं उसमें फूंकता हूँ तो परमेश्वर के आदेश से वास्तव में पक्षी बन जाता है; और जन्मजात अंधे और कोढ़ी को ठीक करता हूँ; और परमेश्वर के आदेश से मुरदों को जीवित कर देता हूँ; और मैं तुम्हें बता सकता हूँ जो कुछ तुम खाकर आते हो और जो अपने घरों में इकट्ठा कर के रखते हो। इसमें तुम्हारे लिए एक बड़ी निशानी है, यदि तुम मानने वाले हो। और मैं तौरात की पुष्टि करने वाला बनकर आया हूँ जो मुझसे पूर्व आ चुकी है और इसलिए आया हूँ कि तुम्हारे लिए कुछ उन चीज़ों को वैध घोषित कर दूँ जो तुम्हारे लिए अवैध कर दी गई हैं, और (देखो) मैं तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम्हारे पास निशानी लेकर आया हूँ। इसलिए परमेश्वर से डरो और मेरी बात मानो। अवश्य परमेश्वर ही मेरा भी प्रभु है और तुम्हारा भी, इसलिए तुम उसी की भक्ति करो। यही सीधा मार्ग है।1
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- यह इसलिए कहा कि तौरात (Torah) क़ानून (Law) और इंजील (Gospel) सर्वथा हिकमत (प्रज्ञा/Beliefs and Ethics) है। ↩
फिर जब ईसा ने महसूस किया कि ये लोग नहीं मानेंगे तो उसने (अपने शिष्यों से) कहा: कौन परमेश्वर के मार्ग में मेरा सहयोगी होता है? शिष्यों ने उत्तर दिया: हम हैं परमेश्वर के सहयोगी, हम परमेश्वर को मान चुके हैं और आप साक्षी रहिए कि हमने समर्पण कर लिया है। प्रभु, हमने उसे मान लिया है जो आपने उतारा है और (उसकी मांगों को पूरा करने के लिए) रसूल के अनुसरण को अपनाया है। इसलिए आप हमें उसकी गवाही देने वालों में लिख लें।
(यह हुआ) और इस्राईलियों ने (उसके विरुद्ध) गुप्त योजनाएँ बनाईं, और परमेश्वर ने भी (इसके उत्तर में) गुप्त योजना की और ऐसी योजनाओं में परमेश्वर सबसे बढ़कर है। उस समय, जब परमेश्वर ने कहा: हे ईसा, मैंने निर्णय किया है कि तुझे मृत्यु दूँगा और अपनी ओर उठा लूँगा और तेरे इन नकारने वालों से तुझे अलग करूंगा और तेरे अनुयायियों को क़यामत के दिन तक इन नकारने वालों पर प्रभावी रखूँगा। फिर तुम सबको अंततः मेरे पास आना है तो उस समय मैं तुम्हारे बीच उन बातों का निपटारा कर दूँगा जिनमें तुम मतभेद करते रहे हो। इसलिए यही नकारने वाले हैं जिनको मैं इस लोक और परलोक, दोनों में कठोर दण्ड देता हूँ और वे अपने लिए कोई सहायक नहीं पाते। और जिन्होंने माना और भले कर्म किए तो उनको परमेश्वर उनका पूरा फल प्रदान करता है, और सत्य यह है कि ऐसे दुष्टों को परमेश्वर कदापि मित्र नहीं रखता।1
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- अर्थात वफ़ात (मृत्यु) के बाद तुम्हारा शरीर भी उठा लूँगा। यह इसलिए कि जो लोग उनको सूली देने के चक्कर में थे, वे उनका अपमान न कर सकें। ↩
ये हमारी आयतें और अत्यंत प्रज्ञा से भरी हुई स्मृति है जो हम तुम्हें सुना रहे हैं। परमेश्वर के सामने ईसा का उदाहरण आदम के जैसा है। परमेश्वर ने उसे मिट्टी से बनाया, फिर उसको आदेश दिया कि हो जा तो वह हो जाता है। तुम्हारे प्रभु की ओर से यही सत्य है, इसलिए तुम किसी संदेह में न रहो। फिर यह ज्ञान तुम्हारे पास आ जाने के बाद भी जो इस विषय में तुमसे झगड़ें तो कह दो कि आओ हम भी अपने बच्चों को बुलाएँ और तुम भी अपने बच्चों को ले आओ, और हम भी अपनी स्त्रियों को बुलाएँ और तुम भी अपनी स्त्रियों को ले आओ और हम और तुम स्वयं भी आ जाएँ, फिर प्रार्थना करें और झूठे लोगों पर परमेश्वर का अभिशाप भेजें। इसमें संदेह नहीं कि यही सच्चा वृत्तांत है और सत्य यह है कि परमेश्वर के अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं और परमेश्वर ही प्रबल और प्रज्ञावान है। फिर वह मुँह फेरें तो परमेश्वर इन बिगाड़ पैदा करने वालों से परिचित ही है।
इनसे कह दो: हे अहल-ए-किताब, उस बात की ओर आओ जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है। यह कि हम परमेश्वर को छोड़ किसी की उपासना न करें और न उसके साथ किसी को भागीदार बनाएँ और न हम में से कोई एक दूसरे को परमेश्वर को छोड़ अपना प्रभु बनाए। फिर यदि वे मुँह फेर लें तो, (हे मानने वालो), तुम कह दो कि साक्षी रहो, हम तो मुस्लिम हैं।
हे अहल-ए-किताब, तुम इब्राहीम के बारे में क्यों झगड़ते हो, जबकि तौरात और इंजील तो उसके बाद उतरी हैं। फिर क्या तुम इतनी बात भी नहीं समझते? ये तुम्ही लोग हो कि उन बातों में तो झगड़ चुके जिनके बारे में तुम्हें कुछ जानकारी थी, परंतु अब यह उस बात में क्यों झगड़ रहे हो जिसका तुम्हें कुछ भी ज्ञान नहीं है। और सत्य यह है कि इन सब तथ्यों को परमेश्वर जानता है, परंतु तुम नहीं जानते। इब्राहीम न यहूदी था और न नसरानी, अपितु एक समर्पित मुस्लिम था और वह इन मुश्रिकों में से भी नहीं था। इब्राहीम के साथ संबंध बांधने का ज़्यादा अधिकार उन लोगों को पहुंचता है जिन्होंने उसका अनुसरण किया। अब यह पैग़ंबर इसके अधिकारी हैं और वे भी जो इनको मान चुके हैं । और परमेश्वर तो इन्हीं मानने वालों का साथी है।1
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- अर्थात अपने प्रभु का आज्ञाकारी और पूरी एकाग्रता के साथ तौहीद (एकेश्वरवाद) के मार्ग पर अग्रसर था। ↩
(हे मानने वालो), इन अहल-ए-किताब का एक समूह चाहता है कि किसी प्रकार तुम्हें सन्मार्ग से हटा दें। और सत्य यह है कि इस प्रकार वे अपने आप ही को पथभ्रष्टता में डाल रहे हैं, परंतु नहीं समझते। हे अहल-ए-किताब, तुम परमेश्वर की आयतों के नकारने वाले क्यों होते हो, यद्यपि तुम उनके साक्षी हो? हे अहल-ए-किताब। तुम सत्य को असत्य से क्यों मिलाते हो और सत्य को क्यों छिपाते हो, यद्यपि तुम जानते हो?
और अहल-ए-किताब का एक समूह कहता है कि मुसलमानों पर जो कुछ उतरा हुआ है, उसे सुबह मान लो और शाम को उसे नकार दिया करो ताकि वे भी अपना धर्म त्याग दें, और अपने धर्म वालों को छोड़ किसी की बात न माना करो — इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर) कि मार्गदर्शन तो वास्तव में परमेश्वर का मार्गदर्शन है — इसलिए किसी की बात न माना करो कि कहीं इस प्रकार की चीज़ किसी और को भी मिल जाए जो तुम्हें मिली है या तुम से वे तुम्हारे प्रभु के सामने वाद-विवाद कर सकें। इनसे कह दो कि अनुग्रह तो परमेश्वर के हाथ में है, जिसे चाहता है प्रदान कर देता है और परमेश्वर बड़ा व्यापक और परम ज्ञानी है। वह जिसको चाहता है, अपनी करुणा के लिए ख़ास कर लेता है और परमेश्वर बड़े अनुग्रह वाला है।
(तुम इनसे आशा करते हो कि तुम्हारे पैग़ंबर के बारे में ये न्यायसंगत बात कहेंगे) और इधर स्थिति यह है कि अहल-ए-किताब में वे लोग भी हैं कि यदि तुम धन-संपत्ति का ढेर उनके पास अमानत रख दो तो वे तुम्हें वापस कर देंगे और इनमें वे भी हैं कि यदि तुम एक दीनार भी उनकी अमानत में दे दो तो जब तक उनके सर पर सवार न हो जाओ, वे उसे तुम्हें नहीं लौटाएँगे। यह इस कारण कि उन्होंने कह रखा है कि इन 'उम्मियों' के विषय में हम पर कोई आरोप नहीं है। और सत्य यह है कि वे जानबूझकर परमेश्वर पर झूठ मढ़ते हैं। हाँ, क्यों नहीं? (परमेश्वर की रीति तो यह है कि) जो उससे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करे और सदाचारी रहे, वह उसे प्रिय है, इसलिए कि परमेश्वर सदाचारियों से प्रेम करता है।
इसके विपरीत जो लोग परमेश्वर से की प्रतिज्ञा और अपनी शपथों को थोड़ी धनराशि पर बेच देते हैं, उनके लिए परलोक में कोई हिस्सा नहीं है, और परमेश्वर क़यामत के दिन न उनसे बात करेगा, न उनकी ओर कृपादृष्टि से देखेगा और न उन्हें (पापकर्मों से) मुक्त करेगा, अपितु वहाँ उनके लिए एक कष्टदायक दण्ड है।
और इनमें वे लोग भी हैं कि परमेश्वर के ग्रंथ को पढ़ते हुए अपनी ज़बान को इस प्रकार तोड़ते मरोड़ते हैं कि तुम समझो कि (जो कुछ वे पढ़ रहे हैं), वह धर्मग्रंथ ही का वाक्य है, यद्यपि वह ग्रंथ का वाक्य नहीं होता, और कहते हैं कि यह परमेश्वर की ओर से है, यद्यपि वह परमेश्वर की ओर से नहीं होता, और इस प्रकार जानबूझकर परमेश्वर पर झूठ मढ़ते हैं।
(फिर यही नहीं, वे परमेश्वर के पैग़ंबर पर भी झूठ मढ़ते हैं और नहीं सोचते कि) किसी व्यक्ति के लिए यह शोभनीय नहीं है कि परमेश्वर उसको अपना ग्रंथ दे और उसके अनुसार निर्णय करने की क्षमता और नुबुव्वत प्रदान करे, फिर वह लोगों से यह कहे कि परमेश्वर को छोड़ तुम मेरे भक्त बन जाओ। नहीं, अपितु (वह तो यही कहेगा कि लोगो), ईश्वर-भक्त बनो, इसलिए कि तुम परमेश्वर का ग्रंथ पढ़ते और पढ़ाते हो। और न वह तुमसे यह कहेगा कि फ़रिश्तों और नबियों को अपना उपास्य बना लो। तुम्हारे मुसलमान हो जाने के बाद क्या वह तुम्हें कुफ़्र अपनाने की प्रेरणा देगा?
और इन्हें याद दिलाओ, जब परमेश्वर ने नबियों के बारे में (इनसे) प्रण लिया कि मैंने जो शरीअत और हिकमत तुम्हें प्रदान की है, फिर तुम्हारे पास कोई रसूल उसकी पुष्टि करते हुए आए जो तुम्हारे पास उपलब्ध है तो तुम उसे अवश्य मानोगे और अवश्य उसकी सहायता करोगे। इसके बाद पूछा: क्या तुमने स्वीकार किया और इस पर मेरे प्रण का दायित्व उठा लिया? उन्होंने उत्तर दिया की हमने स्वीकार किया। कहा कि फिर साक्षी रहो और मैं भी तुम्हारे साथ साक्षी हूँ। (कहा कि) फिर जो इसके बाद इस प्रण से फिर जाएँगे तो वही अवज्ञाकारी हैं।
(ये पैग़ंबर इसी प्रकार आए हैं) तो क्या ये लोग अब परमेश्वर के धर्म को छोड़ किसी अन्य धर्म की खोज में हैं, यद्यपि धरती और आकाशों में चाहे-अनचाहे, सब उसी के आज्ञाकारी हैं और उसी की ओर लौटाए जाएँगे। इनसे कह दो कि हमने परमेश्वर को माना है और उस चीज़ को माना है जो हम पर उतारी गई और जो इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़ और याक़ूब और उनके वंश पर उतारी गई, और जो मूसा और ईसा और अन्य सब नबियों को उनके प्रभु की ओर से दी गई। हम इनमें से किसी के बीच कोई भेदभाव नहीं करते। (ये सब परमेश्वर के पैग़ंबर हैं) और हम उसी के आज्ञाकारी हैं। (यही इस्लाम है), और जो इस्लाम को छोड़ कोई अन्य धर्म अपनाना चाहेगा तो उससे वह कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और क़यामत में वह असफल लोगों में से होगा। (तुम चाहते हो कि ये उचित मार्ग पाएं)? परमेश्वर उन लोगों का मार्गदर्शन किस प्रकार करेगा जो मानने के बाद नकारने वाले हो गए, यद्यपि वे इस बात के साक्षी हैं कि ये रसूल सच्चे हैं और (इनकी सच्चाई पर गवाही के लिए) उनके पास स्पष्ट निशानियाँ भी आ चुकी हैं। सत्य यह है कि परमेश्वर इस प्रकार के दुष्टों का मार्गदर्शन नहीं करता। यही हैं कि जिनका दण्ड यह है कि इनपर परमेश्वर और उसके फ़रिश्तों और सारे मनुष्यों का अभिशाप है। ये सदा उसी में रहेंगे, न इनका दण्ड ही हल्का किया जाएगा और न इन्हें अवकाश दिया जाएगा। (इनमें से), अपितु जो इसके बाद पश्चाताप और सुधार कर लें, वे इससे बचे रहेंगे, इसलिए कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। इसके विपरीत जो मानने के बाद नकारने वाले हो गए, फिर अपने इस नकारने में बढ़ते चले गए, (यहाँ तक कि अंतिम घड़ी आ गई), उनका पछतावा कदापि स्वीकार नहीं होगा और वही वस्तुतः उचित मार्ग से भटके हुए हैं। इसी प्रकार जो नकारने वाले बने और इसी नकारने की अवस्था में दुनिया से चल बसे, उनमें से कोई यदि (अपने आप को दण्ड से बचाने के लिए) समस्त धरती का सोना भी बदले में दे तो उससे कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा। यही हैं जिनके लिए कष्टदायक यातना है और वहाँ वे अपना कोई सहायक नहीं पाएंगे।
(इनका यह व्यवहार केवल इस कारण से है कि धर्म के कुछ अनुष्ठान पूरे कर देने के कारण ये अपने आप को बड़ी चीज़ समझते हैं। इनसे कह दो), तुम सही अर्थों में भलाई को कदापि नहीं पा सकते, जब तक उन चीज़ों में से (परमेश्वर के मार्ग में) ख़र्च न करो जो तुम्हें प्रिय हैं, (इस पर विचार करो) और (याद रखो कि) जो कुछ भी तुम ख़र्च करोगे, उसका अच्छा फल तुम्हें अवश्य मिलेगा, इसलिए कि परमेश्वर उसे जानता है।
(इन्हें आपत्ति है कि यह पैग़ंबर तौरात की पुष्टि करते हैं तो उसमें जो चीज़ें अवैध हैं, उनमें से कुछ चीज़ों को वैध क्यों समझते हैं? कह दो कि) खाने के यह सब पदार्थ इस्राईलियों के लिए भी (इसी प्रकार) वैध थे, सिवाए उनके जो इस्राईल ने तौरात के उतरने से पूर्व स्वयं अपने लिए प्रतिबंधित किए थे। कह दो कि नहीं मानते तो लाओ तौरत और उसको पढ़ो, यदि तुम सच्चे हो। फिर इसके बाद भी जो लोग परमेश्वर पर झूठ मढ़ दें, वही दुष्ट हैं। कह दो कि परमेश्वर ने सत्य कहा है, इसलिए, (अपने इस पक्षपात को छोड़कर) इब्राहीम के मार्ग का अनुसरण करो, जो (इस्लाम के मार्ग पर) पूर्णतः एकाग्र था और मुश्रिकों में से नहीं था।
(इसी प्रकार क़िबले के बारे में भी इन्हें आपत्ति है। इनसे कह दो कि) परमेश्वर का पहला घर जो लोगों के लिए बनाया गया, वह निस्संदेह वही है जो मक्का में है, मानव-मात्र के लिए आशीष और मार्गदर्शन के केंद्र के रूप में। इसमें खुली हुई निशानियाँ हैं: इब्राहीम का निवासस्थान है, जो इसमें प्रवेश करे, वह सुरक्षित है और जो लोग वहाँ तक पहुँचने की क्षमता रखते हों उनपर परमेश्वर के लिए इस घर का हज्ज है। (ये इसकी निशानियाँ हैं), और जो इसके बाद भी नकार दें, परमेश्वर को उनकी कोई चिंता नहीं, इसलिए कि परमेश्वर सब दुनिया वालों से निःस्पृह है।1
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- वास्तव में शब्द 'बक्का' (Bakkah) आया है। इसका शाब्दिक अर्थ है शहर, जैसा कि शब्द 'बअल्बक्क' (Baalbek/City of Baal) से इसकी गवाही मिलती है। ↩
इनसे पूछो, हे अहल-ए-किताब, तुम परमेश्वर की इन आयतों को क्यों नकारते हो, यद्यपि जो कुछ तुम कर रहे हो, वह परमेश्वर के सामने है? इनसे पूछो, हे अहल-ए-किताब, तुम उन लोगों को परमेश्वर के मार्ग से क्यों रोकते हो जो मान चुके हैं? तुम इसमें दोष ढूंढते हो, यद्यपि तुम इसके साक्षी बनाए गए हो? (इस पर विचार करो) और (याद रखो कि) जो कुछ तुम कर रहे हो, परमेश्वर उससे अनजान नहीं है।
हे मानने वालो, तुम इन अहल-ए-किताब के एक समूह की बात मान लोगे तो तुम्हारे ईमान के बाद यह फिर तुम्हें कुफ़्र की ओर फेर ले जाएँगे। (इस पर सावधान रहो) और (विचार करो कि) तुम्हारा कुफ़्र में पड़ना किस प्रकार उचित हो सकता है, जबकि तुम्हें परमेश्वर की आयतें सुनाई जा रही हैं और परमेश्वर का रसूल तुम्हारे बीच उपस्थित है। (इसलिए परमेश्वर को मज़बूती से पकड़े रहो) और (याद रखो कि) जो परमेश्वर को मज़बूती से पकड़ेगा तो (समझ लो कि) उसने सीधे मार्ग को पा लिया है।1
टिप्पणियाँ 1
- सूरह का पहला खंड आयत 99 पर समाप्त हुआ। यहाँ से दूसरा खंड शुरू हो रहा है। ↩
हे मानने वालो, परमेश्वर से डरो, जैसा कि उससे डरना चाहिए, और दुनिया से प्रस्थान करो तो हर हाल में इस्लाम के अनुयाई बनकर प्रस्थान करो। और परमेश्वर की रस्सी को सब मिलकर मज़बूती से पकड़ो और गुटबंदी में न पदो, और अपने ऊपर परमेश्वर के इस अनुग्रह को याद रखो कि तुम एक दूसरे के शत्रु थे तो उसने तुम्हारे दिल जोड़ दिए और उसकी कृपा से तुम भाई-भाई बन गए, और याद रखो कि तुम आग के एक गढ़े के ठीक किनारे पर खड़े थे, फिर उसने तुमको उससे बचा लिया। परमेश्वर इसी प्रकार अपनी आयतें तुम्हारे लिए स्पष्ट करता है ताकि तुम उचित मार्ग पर रहो। और चाहिए कि तुम्हारे भीतर से कुछ लोग नियुक्त हों जो पुण्य की ओर बुलाएं, भलाई का उपदेश करें और बुराई से रोकते रहें। (तुम यह प्रबंध करो) और (याद रखो कि) जो यह करेंगे, वही सफलता पाएंगे।
(तुम यह करो) और उन लोगों के समान न हो जाओ जो गुटों और पंथों में बट गए और जिन्होंने अत्यंत स्पष्ट निर्देश अपने पास आ जाने के बाद मतभेद किया और (अब) वही हैं कि जिनके लिए बड़ा भयंकर दण्ड है। उस दिन जब कुछ चेहरे प्रकाशमान होंगे और कुछ चेहरों पर अंधकार छा रहा होगा। अतः जिनके चेहरों पर अंधकार छा रहा होगा, उनसे पूछा जाएगा: क्या तुम ईमान का वरदान मिल जाने के बाद फिर काफ़िर हो गए? तो अपने इस कुफ़्र के बदले अब चखो दण्ड का स्वाद। रहे वे जिनके चेहरे प्रकाशमान होंगे तो वे परमेश्वर की दया की छांव में होंगे, वे उनमें सदा रहेंगे। ये परमेश्वर की आयतें हैं जो हम तुम्हें ठीक-ठीक सुना रहे हैं, और इसलिए सुना रहे हैं कि परमेश्वर नहीं चाहता कि वह दुनिया वालों के साथ कोई अन्याय करे। (इसलिए इन अहल-ए-किताब के समान झूठी आशाओं में न रहो) और (याद रखो कि) धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर ही का है और सभी कार्य परमेश्वर ही के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं।
(हे मानने वालो, इस समय तो परमेश्वर के उपकार से) तुम एक उत्तम संघ हो जो लोगों पर सत्य की गवाही के लिए उठाया गया है। तुम भलाई का उपदेश करते हो, बुराई से रोकते हो और परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रखते हो। और ये अहल-ए-किताब भी (क़ुरआन को) मान लेते तो इनके लिए अच्छा होता। (इसमें संदेह नहीं कि) इनमें मानने वाले भी हैं, परंतु (खेदजनक है कि) इनमें अधिकांश अवज्ञाकारी ही हैं। ये तुम्हें कुछ कष्ट दे सकते हैं, इसके अतिरिक्त ये तुम्हें कभी कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते। और (संतुष्ट रहो कि) यदि ये तुम से लड़ेंगे तो अवश्य पीठ दिखाएंगे। फिर इन्हें कहीं से कोई सहायता नहीं मिलेगी। इन्हें जहाँ देखिए, इन पर अपमान की मार है, हाँ, उस स्थिति में नहीं कि परमेश्वर की रस्सी थाम लें और (उन) लोगों की रस्सी थाम लें (जिन्होंने परमेश्वर की रस्सी थाम ली है)। ये परमेश्वर का प्रकोप लेकर लौटे हैं और इन पर कायरता थोप दी गई है। यह इसलिए है कि ये परमेश्वर की आयतों को नकारने वाले रहे हैं और उसके पैग़ंबरों की अकारण हत्या करते रहे हैं। यह इसलिए कि इन्होंने अवज्ञा की और ये सदा सीमा का उल्लंघन करते रहे हैं।
(यह बात, अपितु स्पष्ट रहे कि) सब अहल-ए-किताब एक समान नहीं हैं। इनमें एक समूह अपनी प्रतिज्ञ पर डटा है। वे रातों को परमेश्वर की आयतों का पाठ करते और (उसके सामने) सजदे में पड़े रहते हैं। परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर सच्चा विश्वास रखते हैं, भलाई का उपदेश करते और बुराई से रोकते हैं, भलाई के कार्यों में पहल करते हैं और वे परमेश्वर के भले भक्तों में से हैं। (इसमें संदेह नहीं कि वे सत्य के सच्चे चाहने वाले हैं) और (अपने इस आचरण के बदले में) जो भलाई भी करेंगे, उसके अच्छे फल से वंचित नहीं होंगे और परमेश्वर इन सदाचारियों से भलीभांति परिचित है।
इसके विपरीत जिन लोगों ने निर्णय कर लिया है कि इंकार करने वाले ही रहेंगे, उनका धन और उनकी संतान परमेश्वर के विरुद्ध उनके कुछ भी काम न आएगी और वे नरक के लोग हैं, उसमें सदा रहेंगे। इस दुनिया के जीवन में जो कुछ वे (बाह्य रूप से परमेश्वर के मार्ग में) ख़र्च करते हैं, उसका उदाहरण ऐसा है जैसे पाले की हवा हो जो उन लोगों की खेती पर चल जाए जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया हो और उसे बर्बाद कर दे। (ये इसी लायक हैं) और सत्य यह है कि परमेश्वर ने इन पर कोई अत्याचार नहीं किया, अपितु ये स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते रहे हैं।
हे मानने वालो, (ये तुम्हारे मित्र नहीं हैं, इसलिए) अपने से बाहर के लोगों को भेदी न बनाओ। तुम्हें क्षति पहुंचाने में ये कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। ये तुम्हारे लिए घावों के इच्छुक हैं। इनकी शत्रुता इनके मुँह से निकल पड़ती है और जो कुछ इनके सीनों में छिपा हुआ है, वह इससे भी बढ़कर है। हमने ये निशानियाँ तुम्हारे लिए स्पष्ट कर दी हैं, यदि तुम समझ रखते हो। यह तुम ही हो कि इनको मित्र रखना चाहते हो, परंतु वे तुम से मित्रता नहीं रखते, यद्यपि तुम परमेश्वर के सारे ग्रंथों को मानते हो। और इनका आचरण यह है कि जब तुमसे मिलते हैं तो कहते हैं कि हम तो ईमान लाए हुए हैं और जब अलग होते हैं तो तुमपर क्रोध के मारे अपनी उँगलियाँ काटते हैं — कह दो कि अपने इस क्रोध में मर जाओ। (परमेश्वर तुम्हारी हर बात को जानता है और) सत्य यह है कि परमेश्वर तो दिलों के भेद तक जानता है — तुम्हें कोई सफलता प्राप्त होती है तो इन्हें पीड़ा होती है और तुम पर कोई संकट आता है तो इससे प्रसन्न होते हैं। (ये तुम्हारे मित्र नहीं हैं, इनकी चिंता न करो) और (याद रखो कि) यदि तुम संयम रखोगे और परमेश्वर से डरते रहोगे तो इनका कोई षड्यंत्र तुम्हें कुछ भी क्षति नहीं पहुंचा सकेगा, इसलिए कि जो कुछ ये कर रहे हैं, परमेश्वर उसको घेरे में लिए हुए है।
(यह सच्चाई इन्हें समझाओ, हे पैग़ंबर), और (इसके लिए) वह घटना याद दिलाओ, जब (उहद के दिन) तुम मुसलमानों को युद्ध के मोर्चों पर खड़ा करने के लिए बहुत सवेरे अपने घर से निकले थे। (उस समय परमेश्वर तुम्हारे इरादों से परिचित था और तुम्हारी बातें सुन रहा था) और परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।
उस समय, जब तुम में से दो गुटों ने साहस छोड़ना चाहा, यद्यपि परमेश्वर उनकी सहायता के लिए उपस्थित था और ईमान वालों को तो परमेश्वर ही पर भरोसा करना चाहिए। परमेश्वर ने (इससे पहले) बद्र में तुम्हारी सहायता की थी, जबकि तुम अत्यंत कमज़ोर थे। (फिर भी कृतघ्नता करते हो)? तो परमेश्वर से डरो ताकि तुम उसके आभारी रहो।
याद करो, जब तुम मुसलमानों से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं है कि तुम्हारा प्रभु तीन हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी सहायता करे जो (इसी उद्देश्य से) उतारे गए हों? हाँ क्यों नहीं, यदि तुम धीरज रखो और परमेश्वर से डरते रहो और तुम्हारे शत्रु इसी समय तुम पर आक्रमण करें तो तुम्हारा प्रभु पाँच हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी सहायता करेगा जो विशेष निशान लगाए हुए होंगे।
और यह तो परमेश्वर ने केवल इसलिए किया कि तुम्हें शुभ सूचना मिले और तुम्हारे दिल इससे संतुष्ट हो जाएं और सहायता तो परमेश्वर ही की ओर से आती है जो प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है। इसलिए किया कि इन नकारने वालों (को मानने की शक्ति दे और इस प्रकार इन) का एक भाग काट ले या इन्हें ऐसा अपमानित करे कि बदहाल होकर लौटें — तुम्हें इस विषय में कोई अधिकार नहीं (कि परमेश्वर इनके साथ यही करे) या इन पर कृपा दृष्टि करे और इनका पश्चाताप स्वीकार कर ले, (यदि यह पश्चाताप करें) या इन पर अपना दण्ड उतार दे, इसलिए कि ये अत्याचारी हैं। (यह परमेश्वर ही का अधिकार है) और धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, वह परमेश्वर ही का है। वह अपने नियम अनुसार जिसको चाहेगा, क्षमा करेगा और जिसको चाहेगा, दंडित करेगा। और सत्य यह है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।
हे मानने वालो, (आगे भी परमेश्वर की सहायता चाहते हो तो) यह बढ़ता और चढ़ता ब्याज खाना छोड़ दो और परमेश्वर से डरते रहो ताकि तुम सफलता पाओ। और उस आग से बचो जो नकारने वालों के लिए तैयार की गई है। और परमेश्वर और उसके रसूल के आज्ञाकारी रहो ताकि तुम पर दया की जाए। और अपने प्रभु की क्षमा और उस स्वर्ग की ओर बढ़ जाने के लिए दौड़ो जिसका फैलाव धरती और समस्त आकाशों जैसा है, उन धर्मनिष्ठ लोगों के लिए तैयार किया गया है जो हर परिस्थिति में दान करते हैं, चाहे विपन्नता हो या संपन्नता, और (जिन्हें दान करते हैं, उनकी ओर से अनुचित व्यवहार भी हो तो) क्रोध को दबा लेते और लोगों को क्षमा कर देते हैं — (यही अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं) और परमेश्वर उन लोगों को मित्र रखता है जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हों — और जिनका मामला यह है कि जब कोई कुकर्म उनसे हो जाता है या अपने बारे में कुछ बुरा कर बैठते हैं तो उन्हें परमेश्वर याद आ जाता है और वे अपने पापकर्मों की क्षमा मांगते हैं — और परमेश्वर के अतिरिक्त कौन है जो पापकर्मों को क्षमा कर दे — और जानबूझकर अपने किए पर हठ नहीं करते। यही हैं कि जिनका फल उनके प्रभु की क्षमा है और वे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उसमें सदा रहेंगे। और कैसा अच्छा फल है यह अच्छे कर्म करने वालों के लिए।
(हे मानने वालो, अंतिम विजय तुम्हारी होगी)। इसके कई उदाहरण तुमसे पूर्व बीत चुके हैं। अतः अपने इस देश ही में चल फिर कर देख लो कि सत्य को झूठा कहने वालों का अंत क्या हुआ है। यह उन लोगों के लिए स्पष्ट चेतावनी है (जो पैग़ंबर को झूठा कहने पर अड़े हैं) और उनके लिए मार्गदर्शन और सदुपदेश है जो परमेश्वर से डरने वाले हैं। (इसलिए संतुष्ट रहो) और (जो क्षति तुम्हें पहुंची है, उससे) हिम्मत न हारो और दुखी न हो, यदि तुम मोमिन हो तो विजय अंततः तुम्हें ही प्राप्त होगी। (इस समय) यदि तुम्हें चोट लगी है तो ऐसी ही चोट (इससे पूर्व) शत्रु को भी लग चुकी है। और लोगों के बीच दिनों का यह उलट फेर तो हम इसलिए करते हैं कि उनकी परीक्षा करें और इसलिए कि परमेश्वर मानने वालों को जान ले और तुम में से उन लोगों को छाँट ले जो (अपने प्राण देकर भी) सत्य की गवाही देने वाले हों — (इन नीतियों को समझने का प्रयत्न करो) और (याद रखो कि) परमेश्वर अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता — और इसलिए करते हैं कि मानने वालों को अलग कर ले और इन नकारने वालों को मिटा दे — क्या तुमने यही समझा कि स्वर्ग में प्रवेश कर जाओगे, और परमेश्वर ने अभी उन लोगों को देखा ही नहीं जिन्होंने तुम्हारे भीतर से जिहाद किया (और जिन्होंने नहीं किया) — और इसलिए करते हैं कि परमेश्वर उन्हें भी जान ले जो दृढ़ संकल्प रहने वाले हों। (अब हिम्मत हार रहे हो) और मृत्यु के (इस प्रकार) सामने आ जाने से पहले तुम उसकी इच्छा करते रहे हो। अतः (तुम्हारी यह इच्छा पूरी हो गई, इसलिए कि) अब तो मृत्यु को तुमने खुली आँखों से देख लिया है।
मुहम्मद एक रसूल ही हैं। (उनकी हत्या की सूचना ने तुम्हारे पाँव डगमगा दिए)। उनसे पहले भी रसूल हो चुके हैं, (और जन्म-मरण के यह चरण उनपर भी आए)। फिर क्या वे मृत्यु पा जाएं या उनकी हत्या कर दी जाए तो तुम लोग उल्टे पाँव फिर जाओगे? (याद रखो), जो उल्टा फिरेगा, वह परमेश्वर का कुछ नहीं बिगाड़ेगा और परमेश्वर शीघ्र ही उनको अच्छा फल देगा जो हर परिस्थिति में उसके आभारी रहे हैं।
(तुमने हिम्मत छोड़ दी) और (इस सत्य को भुला बैठे कि) हर व्यक्ति परमेश्वर की अनुमति से एक नियति के अनुसार ही दुनिया से प्रस्थान करता है और (इसको भी भुला बैठे कि) जो दुनिया का फल चाहेगा, उसको हम उसी में से देंगे और जो परलोक का फल चाहेगा, उसको वहां से देंगे और अपने आभारी भक्तों को हम उनका अच्छा फल अवश्य प्रदान करेंगे।
(इन तथ्यों को समझने का प्रयत्न करो) और (याद रखो कि) कितने ही नबी हुए हैं जिनके साथ होकर बहुत से धर्मात्माओं ने युद्ध किया है तो परमेश्वर के मार्ग में जो संकट उनपर आए, उनसे न तो उनका साहस टूटा, न उन्होंने दुर्बलता दिखाई और ना शत्रुओं के आगे शस्त्र डाले, (अपितु हर परिस्थिति में दृढ़संकल्प रहे) और परमेश्वर ऐसे ही दृढ़संकल्प रहने वालों से प्रेम करता है। उनहोंने केवल यह प्रार्थना की कि प्रभु, हमारे पापकर्मों को क्षमा कर; अपने मामलों में जो कुछ अनुचित व्यवहार हमसे हुआ है, उसे क्षमा कर दे; हमारे पाँव जमा दे और इन नकारने वालों के विरुद्ध हमारी सहायता कर। फिर परमेश्वर ने उनको इस लोक का अच्छा फल भी दिया और परलोक का भी अच्छा फल दिया। (यही हैं जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं) और परमेश्वर उन लोगों से प्रेम करता है जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हों।
हे मानने वालो, यदि इन नकारने वालों की बात मानोगे तो ये तुम्हें उल्टे पाँव फेर कर रहेंगे और तुम असफल हो जाओगे। ये लोग नहीं, अपितु परमेश्वर ही तुम्हारा सहायक है और उसी की सहायता सबसे उत्तम है। (तुम देखोगे कि) इन नकारने वालों के दिल में अब हम तुम्हारा दबदबा बैठा देंगे, इसलिए कि इन्होंने उन चीज़ों को परमेश्वर के साथ भागीदार बना दिया है जिनके पक्ष में उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा है। इनका ठिकाना नरक है और अपने प्राणों पर अत्याचार करने वालों के लिए यह अत्यंत बुरा ठिकाना है।
परमेश्वर ने (अपनी सहायता का) जो वचन तुम्हें दिया था, वह तो उस समय उसने पूरा कर दिया, जब तुम परमेश्वर की अनुमति से उनका संहार कर रहे थे। यहाँ तक के स्वयं तुमने दुर्बलता दिखाई और आज्ञा-पालन में एक दूसरे से मतभेद किया और (पैग़ंबर की) अवज्ञा की, जबकि परमेश्वर ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी जिसके तुम इच्छुक थे। (यह सत्य है कि) तुम में कुछ दुनिया के चाहने वाले थे और कुछ परलोक के। (इसलिए) परमेश्वर ने (इस विजय के बाद) फिर तुम्हें उनसे फेर दिया ताकि तुम्हारी परीक्षा करे, (इसलिए कि जो लोग दुनिया के चाहने वाले हैं, वे तुमसे छंटकर अलग हो जाएं)। और सत्य यह है कि उसने फिर भी तुम्हें क्षमा ही कर दिया और परमेश्वर मुसलमानों पर बड़ी कृपा करने वाला है।
याद करो, जब तुम भागे जा रहे थे और किसी को मुड़ कर देख भी नहीं रहे थे और परमेश्वर का पैग़ंबर (तुम्हारे पीछे) तुम्हारे ही लोगों के एक अन्य समूह में तुम्हें पुकार रहा था (जो उसके साथ खड़ा था) तो परमेश्वर ने तुमको दुख पर दुख पहुंचाया, ताकि (इस परीक्षा से निकलने के बाद कल को) किसी चीज़ के हाथ से जाने और किसी विपत्ति के आने पर तुम दुखी न हो, और (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अवगत है।
इस दुख के बाद फिर परमेश्वर ने तुम पर शांति उतारी, एक ऐसी नींद के रूप में जो तुम में से कुछ लोगों पर छा रही थी और कुछ ऐसे थे कि जिन्हें अपने प्राणों की चिंता थी। वे परमेश्वर के बारे में जाहिली काल की मिथ्या धारणाओं में पड़ रहे थे। वे कह रहे थे कि इन मामलों में हमारा भी कोई हिस्सा है? इनसे कह दो कि सभी मामले परमेश्वर ही के नियंत्रण में हैं। वे अपने दिलों में वे कुछ छिपाए हुए हैं जो तुम्हारे सामने व्यक्त नहीं करते। कहते हैं कि इस मामले में हमारा कोई हस्तक्षेप होता तो हम यहाँ (इस प्रकार) मारे न जाते। कह दो कि यदि तुम अपने घरों में होते तो जिनके लिए मरना लिखा था, वे अपने मरने के स्थानों तक पहुंचकर रहते। (इसलिए इस बात को एक बार फिर अच्छे से समझ लो कि) यह सब केवल इसलिए हुआ कि परमेश्वर तुम्हें अलग-अलग करे और इसलिए कि तुम्हारे सीनों में जो कुछ छिपा हुआ है, उसको जांच ले और इसलिए कि तुम्हारे दिलों के दोष छाँट दे, और सत्य यह है कि परमेश्वर दिलों की बातें जानता है।
तुम में से जो लोग दोनों गुटों की मुठभेड़ के दिन पीठ फेर गए थे, उनकी इस ठोकर का कारण यह था कि उनकी कुछ करतूतों की शामत से शैतान ने उनके पाँव डगमगा दिए थे। फिर भी परमेश्वर ने उन्हें क्षमा कर दिया। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, वह बड़ा सहनशील है।
हे मानने वालो, उन लोगों के जैसे न हो जाओ जो नकारने वाले हैं और जिनके सगे संबंधी कभी यात्रा पर जाते हैं या किसी युद्ध के लिए निकलते हैं (और उनकी मृत्यु हो जाती है) तो उनके बारे में वे कहते हैं कि हमारे पास होते तो न मरते और न उनकी हत्या होती। यह इसलिए कि परमेश्वर इस चीज़ को उनके दिलों की हसरत बना दे, अन्यथा सत्य यह है कि परमेश्वर ही जीवन देता और परमेश्वर ही मृत्यु देता है और जो कुछ तुम करते हो, वह परमेश्वर की दृष्टि में है। और इसके साथ ही यह कि यदि तुम परमेश्वर के मार्ग में मारे जाओगे या मरोगे तो परमेश्वर की जो क्षमा और दया तुम्हें प्राप्त होगी, वह उससे कहीं बढ़कर है जो यह इकट्ठा कर रहे हैं। और यह भी कि तुम मरो या मारे जाओ, तुम्हें फिर भी सिमट कर जाना परमेश्वर ही की ओर है।
अतः यह परमेश्वर का उपकार है कि तुम इनके लिए बड़े कोमल स्वभाव वाले हुए हो, (हे पैग़ंबर)। यदि तुम रूखे और कठोर होते तो ये सब तुम्हारे पास से दूर भाग जाते। इसलिए इनके दोषों को अनदेखा करो, इनके लिए क्षमा चाहो और मामलों में इनसे परमर्श लेते रहो। फिर जब निर्णय कर लो तो परमेश्वर पर भरोसा करो, इसलिए कि परमेश्वर को वही लोग प्रिय हैं जो उस पर भरोसा करने वाले हों। (हे मानने वालो), यदि परमेश्वर तुम्हारी सहायता पर हो तो कोई तुम पर विजय नहीं पा सकता और वह तुम्हें छोड़ दे तो उसके बाद कौन है जो तुम्हारी सहायता करेगा? और मानने वालों को तो परमेश्वर ही पर भरोसा रखना चाहिए।
(ये समझते हैं कि इस युद्ध के लिए बाहर निकल कर पैग़ंबर ने इनका बुरा चाहा है। कदापि नहीं), यह किसी पैग़ंबर को शोभा नहीं देता कि लोगों का बुरा चाहे और (इन्हें जानना चाहिए कि) जो कोई बुरा चाहेगा, क़यामत के दिन वह अपनी इस बुरी चाहत के साथ ही उपस्थित होगा। फिर हर व्यक्ति को उसकी कमाई का पूरा-पूरा बदला मिल जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा। फिर क्या वह व्यक्ति जो परमेश्वर की प्रसन्नता चाहे, वह उन लोगों जैसा हो जाएगा जो परमेश्वर का क्रोध लेकर लौटे और जिन का ठिकाना नरक है, और वह कैसा बुरा ठिकाना है? परमेश्वर के यहाँ इनकी श्रेणियाँ भिन्न-भिन्न होंगी और जो कुछ ये कर रहे हैं, परमेश्वर उसे देख रहा है। सत्य यह है कि परमेश्वर ने तो मुसलमानों पर बड़ा उपकार किया है कि उनके बीच स्वयं उन्हीं में से एक रसूल उठाया है जो उसकी आयतें उन्हें सुनाता है और उनका शुद्धिकरण करता है और इसके लिए उनको क़ानून और हिकमत की शिक्षा देता है। और इसमें संदेह नहीं कि इससे पहले तो वे स्पष्ट पथभ्रष्टता में थे।
और (हां), जब एक विपत्ति तुम्हें पहुंची जिससे दोगुनी विपत्ति (इससे पहले) तुमने उन्हें पहुंचाई थी तो क्या यह बात भी तुमने कही कि यह कहां से आ गई? इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर) कि यह तुम्हारी अपनी ही लाई हुई है। (परमेश्वर विजय देता है तो अपनी प्रज्ञा के अनुसार पराजय भी दिलवाता है), इसलिए कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। और यह भी कि जब दोनों सेनाएं भिड़ीं तो उस दिन जो विपत्ति तुम पर आई, वह परमेश्वर की अनुज्ञा से आई और इसलिए आई परमेश्वर उनको भी देख ले जो सच्चे मानने वाले हैं और उनको भी जो (पहले से ही) ढोंगी आचरण अपनाए हुए थे। (वही कि) उनसे कहा गया कि आओ, परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करो या कम से कम (अपने शहर की) रक्षा ही करो तो उन्होंने कहा था कि यदि हम जानते कि युद्ध होना है तो अवश्य तुम्हारे साथ चलते। उस दिन ईमान से अधिक वे कुफ़्र के समीप थे। वे अपने मुँह से वे बातें कह रहे थे जो उनके दिल में नहीं थीं और परमेश्वर उसे अच्छे से जानता था जो वे छिपाए हुए थे। वही जो बैठे रहे और अपने (उन) भाइयों के बारे में (जो लड़ने के लिए निकले), कह दिया कि यदि वे हमारी बात मान लेते तो (इस प्रकार) मारे न जाते। इनसे कह दो कि अच्छा अब अपने ऊपर से मृत्यु को टाल कर दिखाना, यदि तुम सच्चे हो।
(इन बातों की परवाह न करो, हे पैग़ंबर), और (इस युद्ध में) जो लोग परमेश्वर के मार्ग में मारे गए हैं, उन्हें कदापि मुर्दा न समझो। वे मुर्दा नहीं, अपितु अपने प्रभु के पास जीवित हैं, उन्हें जीविका मिल रही है। परमेश्वर ने जो कुछ अपनी कृपा में से उन्हें दिया है, उस पर हर्षित और आनंदित, उनके पीछे रह जाने वालों में से जो लोग अभी उनसे नहीं मिले, उनके बारे में खुशियां मनाते हुए कि (परमेश्वर के इस अनंत राज्य) में उनके लिए भी न कोई भय है और न वे कभी दुखी होंगे। परमेश्वर के उपहारों और उसके आशीष से प्रसन्न और इस बात से कि मानने वालों के अच्छे फल को परमेश्वर कभी बर्बाद नहीं करेगा। उन लोगों के अच्छे फल को जो चोट खाने के बाद भी परमेश्वर और उसके रसूल के आह्वान पर आगे आए। उनमें से जिन्होंने अच्छे ढंग से कार्य किए और परमेश्वर से डरते रहे, उनके लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है। ये वे लोग हैं जिन्हें लोगों ने कहा कि शत्रु ने तुम्हारे विरुद्ध बड़ी शक्ति इकट्ठा कर ली है, इसलिए उस से डरो तो उनका विश्वास (यह सुनकर) और बढ़ गया और उन्होंने उत्तर दिया कि हमारे लिए परमेश्वर पर्याप्त है और वह सबसे अच्छा बिगड़ी बनाने वाला है। अतः वे परमेश्वर का वरदान और उसका आशीष लेकर (इस अभियान से) वापस आए, उन्हें कोई हानि नहीं पहुंची और वह परमेश्वर की प्रसन्नता के इच्छुक हुए और सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ी कृपा करने वाला है। (अब यह बात तो तुम पर स्पष्ट हो गई कि) यह शैतान ही है जो अपने साथियों के डरावे दे रहा था। इसलिए इनसे मत डरो, यदि तुम सच्चे मानने वाले हो तो केवल मुझसे डरो।
और तुम्हारे लिए, (हे पैग़ंबर), ये लोग किसी दुख का कारण न हों जो (इस समय) अधर्म के मार्ग में बड़े उत्सुक हैं। ये परमेश्वर को कदापि कोई क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे। परमेश्वर चाहता है कि परलोक में इनका कोई हिस्सा न रखे। (ये अपराधी हैं) और इनके लिए वहां एक बड़ा दण्ड है। यह सत्य है कि ईमान को छोड़कर जिन लोगों ने अपने लिए कुफ़्र को खरीदा है, वे परमेश्वर को कदापि कोई क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे और उनके लिए (उसने) बड़ी कष्टदायक यातना तैयार कर रखी है। यह ढील जो हम इनको दे रहे हैं, इसको ये नकारने वाले अपने पक्ष में कदापि कोई भलाई की चीज़ न समझें। (इन्हें जानना चाहिए कि) इनको यह ढील हम केवल इसलिए दे रहे हैं कि अपने पापकर्मों में कुछ और वृद्धि कर लें। (इसके बाद इन्हें हमारे ही पास आना है) और वहां अपमानित कर देने वाला एक कठोर दण्ड इनकी प्रतीक्षा में है।
(इस युद्ध के अवसर पर जो परीक्षा हुई है, ये उसको समझ नहीं रहे। इन्हें बताओ कि) परमेश्वर यह नहीं कर सकता था कि शुद्ध को अशुद्ध से अलग किए बिना मुसलमानों को उसी प्रकार छोड़ दे, जैसे तुम थे, और न यह परमेश्वर की कार्य-प्रणाली है कि तुम्हें परोक्ष की सूचना दे (और इनके मन की दशा जानकर तुम इन्हें अलग-अलग कर लो), अपितु परमेश्वर (की कार्य-प्रणाली यह है कि इसके लिए वह) अपने रसूलों में से जिसको चाहता है, चुन लेता है, (फिर उनके संघर्ष में ऐसी परीक्षा खड़ी करता है कि खोटे और खरे, सब एक दूसरे से अलग हो जाते हैं), इसलिए परमेश्वर और उसके रसूलों पर विश्वास रखो और (जान लो कि) यदि तुम ईमान और संयम अपनाओगे तो तुम्हारे लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है।
और (इनमें से) जो लोग उन चीज़ों में कंजूसी करते हैं जो परमेश्वर ही ने अपने अनुग्रह से उन्हें प्रदान की हैं, वे कदापि यह न सोचें कि यह उनके लिए अच्छा है। नहीं, यह उनके पक्ष में बहुत बुरा है। (उन्हें जानना चाहिए कि) जिस चीज़ पर उन्होंने कंजूसी की है, क़यामत के दिन शीघ्र ही उसका पट्टा उन्हें पहनाया जाएगा और (जानना चाहिए कि) धरती और समस्त आकाशों का उत्तराधिकार परमेश्वर ही के लिए है और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे जानता है। परमेश्वर ने उन लोगों की बात सुन ली है जिन्होंने कहा है कि परमेश्वर दरिद्र है और हम संपन्न हैं। इनकी यह बातें हम लिख रखेंगे और इनका पैग़ंबरों की अन्यायपूर्वक हत्या करना भी हमने लिख रखा है। और (निर्णय के दिन) इनसे कहेंगे कि अब चखो आग का दंड। यह उसी का बदला है जो तुमने अपने हाथों आगे भेजा था और इसलिए है कि परमेश्वर अपने भक्तों पर अत्याचार करने वाला नहीं है।
ये लोग, जिन्होंने कहा है कि परमेश्वर ने हमें यह उपदेश कर रखा है कि हम किसी रसूल की बात तब तक नहीं मानेंगे, जब तक वह हमारे सामने ऐसी आहुति प्रस्तुत न करे जिसे (आकाश से उतर कर) अग्नि खा ले, इनसे कहो: तुम्हारे पास मुझसे पहले अनेक रसूल स्पष्ट निशानियाँ लेकर आ चुके हैं और वह निशानी भी लाए हैं जिसके लिए तुम कह रहे हो, फिर तुमने उनकी हत्या क्यों कर दी, यदि तुम सच्चे हो? इसलिए, (हे पैग़ंबर),ये तुम्हें झूठा कहते हैं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है, बहुत से रसूलों को भी तुमसे पहले भी (इसी प्रकार) झूठा कहा गया है जो स्पष्ट निशानियाँ और पवित्र संहिताएँ और प्रकाशमान ग्रंथ लेकर आए थे। (तुम प्रतीक्षा करो और ये भी प्रतीक्षा करें), प्रत्येक जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है और तुमको तुम्हारा पूरा-पूरा बदला तो क़यामत के दिन ही मिलेगा। फिर जो नरक से बचा लिया जाए और स्वर्ग में भेज दिया जाए, वही सफल है और यह दुनिया का जीवन तो केवल धोखे का सौदा है।
(हे मानने वालो), तुम्हारे प्राण और तुम्हारी संपत्ति में तुम्हारी परीक्षा तो हर स्थिति में होनी है और उन लोगों की ओर से जिन्हें तुम से पूर्व धर्मग्रंथ दिया गया और उन लोगों की ओर से जिन्होंने परमेश्वर के सहभागी बनाए हैं, तुम्हें बहुत सी कष्टप्रद बातें भी सुनना पड़ेंगी। अपितु, यदि तुम दृढ़संकल्प रहे और तुमने धर्मपरायणता अपनाए रखी तो परमेश्वर तुम्हारी सहायता करेगा, इसलिए कि यही वे कार्य हैं जो (इसके लिए) आवश्यक घोषित किए गए हैं। और जिन्हें धर्मग्रंथ दिया गया, उन लोगों को उनका वह वचन भी याद दिलाओ जो परमेश्वर ने उनसे लिया था कि तुम लोगों के सामने इस धर्मग्रंथ को अवश्य पढ़ा करोगे और इसे कदापि नहीं छिपाओगे। फिर उन्होंने इसे पीठ पीछे डाल दिया और इसके बदले में बहुत थोड़ी धनराशि ले ली। अतः कैसी बुरी है वह चीज़ जिसे ये खरीद लाए हैं। तुम उन लोगों को कदापि दण्ड से मुक्त न समझो जो अपनी इन करतूतों में मगन हैं और ऐसे कार्यों पर अपनी प्रशंसा चाहते हैं जो उन्होंने किए नहीं हैं, अपितु उनके लिए एक कष्टदायक दण्ड तैयार है। (वे इस से भागकर कहीं जा नहीं सकते, इसलिए कि) धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य परमेश्वर ही के लिए है और परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।
(ये अक़्ल के अंधे हैं, इसलिए पैग़ंबर को मानने के लिए निशानी मांगते हैं, नहीं तो) सत्य यह है कि धरती और समस्त आकाशों के बनाने में और दिन और रात के बारी-बारी आने में उन लोगों के लिए बहुत सी निशानियाँ है जो अंतर्दृष्टि रखने वाले हैं। उनके लिए जो खड़े और बैठे और अपने पहलुओं पर लेटे हुए, हर स्थिति में परमेश्वर को याद करते और धरती और समस्त आकाशों के सृजन पर चिंतन-मनन करते रहते हैं। (उनकी प्रार्थना यह होती है कि) प्रभु, तूने ये सब निरर्थक नहीं बनाया। तू इससे ऊपर है कि कोई काम निरर्थक करे। अतः हमें नरक के दण्ड से बचा ले। प्रभु, तूने जिसे नरक में डाला, उसे वस्तुतः बड़ा कलंकित कर दिया और (वह ऐसा स्थान है कि) अत्याचारियों का वहाँ कोई सहायक नहीं होगा। प्रभु, हमने एक पुकारने वाले को सुना जो ईमान की ओर बुलाता था कि (लोगो), अपने प्रभु को मानो तो हमने मान लिया। अब तू हमारे पापों को क्षमा कर दे, हे मालिक। हमारे दुष्कर्मों को हमसे दूर करदे और हमें अपने निष्ठावान भक्तों के साथ मृत्यु दे। प्रभु, अपने रसूलों के माध्यम से जो वादे तूने हमसे किए हैं, वे हमारे लिए पूरे कर दे और क़यामत के दिन हमें अपमानित न कर। निस्संदेह, तू अपने वादे के विरुद्ध जाने वाला नहीं है।1
टिप्पणियाँ 1
- सूरह का अंतिम खंड समाप्त हुआ। यहाँ से अब सूरह के समापन की आयतें शुरू होती हैं। ↩
अतः उनके प्रभु ने उनकी यह प्रार्थना इस प्रकार स्वीकार की कि पुरुष हो या स्त्री, मैं तुम में से किसी कर्म करने वाले का कोई कर्म बर्बाद नहीं करूंगा। तुम सब आपस में एक ही हो। इसलिए जिन्होंने प्रवास किया है और जो अपने घरों से निकाले गए हैं और मेरे मार्ग में सताए गए और (मेरे लिए) लड़े और मारे गए हैं, उनके पापकर्म मैं उनसे दूर कर दूंगा और उनको अवश्य ऐसे बाग़ों में भेजूँगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। यह परमेश्वर के पास उनका अच्छा फल है और सबसे अच्छा फल तो परमेश्वर ही के पास है।
इस देश के शहरों में नकारने वालों का यह चलना फिरना तुम्हें किसी भ्रम में न डाल दे, (हे पैग़ंबर)। यह थोड़ा सा आनंद है, फिर इनका ठिकाना नरक है और वह कैसा बुरा स्थान है। इसके विपरीत जो लोग अपने प्रभु से डरते रहे, उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, वे उनमें सदा रहेंगे। यह परमेश्वर के पास उनके लिए पहला अतिथि-सत्कार है और जो कुछ परमेश्वर के पास उसके निष्ठावान भक्तों के लिए है, वह कहीं अच्छा है।
(और इन निष्ठावान भक्तों से अहल-ए-किताब भी वंचित नहीं हैं)। यह सत्य है कि इन अहल-ए-किताब में से ऐसी भी हैं जो परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रखते हैं, उस ग्रंथ पर विश्वास रखते हैं जो तुम्हारी ओर उतारा गया है और उस पर भी जो (इससे पूर्व) उनकी ओर उतारा गया था, परमेश्वर से डरते हुए। वे परमेश्वर की आयतों को थोड़ी धनराशि पर बेच नहीं देते। यही वे लोग हैं जिनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है। (वह अति शीघ्र उन्हें मिल जाएगा), इसलिए कि परमेश्वर हिसाब चुकाने में देर नहीं लगाता।
हे मानने वालो, (अंतिम विजय तुम्हारी होगी, परंतु इसके लिए आवश्यक है कि) धैर्य रखो, अपने शत्रुओं के विरुद्ध शौर्य दिखाओ, युद्ध के लिए तत्पर रहो और (सभी मामलों में) परमेश्वर से डरते रहो ताकि सफलता पाओ।