सूरह 2

अल्-बक़रह

मदनी · 286 आयतें · 152 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में यहूदियों और दूसरी में यहूदियों के साथ, विशेष रूप से ईसाइयों के लिए सत्य को निर्णायक रूप से स्पष्ट करने (इत्माम-ए-हुज्जत) के बाद, बनी इस्माईल में से एक नई उम्मत — "उम्मत-ए-मुसलिमा" (मुस्लिम संघ) — की स्थापना की घोषणा की गई है। इन सूरतों में संबोधन यद्यपि कुछ हद तक पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से भी हुआ है और अरब के मुश्रिकों से भी, परंतु मूल रूप से दोनों सूरतों में संबोधन यहूदियों और ईसाइयों (अहल-ए-किताब) और उनके बाद मुसलमानों से है। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) के बाद मदीना में उस समय अवतरित हुई हैं, जब मुसलमानों का एक संगठित राज्य वहां स्थापित हो चुका था और नबी (स.) अहल-ए-किताब पर इत्माम-ए-हुज्जत कर रहे थे और मुसलमानों का शुद्धिकरण व परिष्करण (तज़्कियह व तत्हीर) कर रहे थे। पहली सूरह — अल्-बक़रह — का विषय अहल-ए-किताब पर इत्माम-ए-हुज्जत करना, उनकी जगह एक नई उम्मत की स्थापना और उसके कर्तव्यों का वर्णन है।

दूसरी सूरह — आलि इम्रान् — का विषय अहल-ए-किताब, विशेष रूप से ईसाइयों पर इत्माम-ए-हुज्जत करना, उनकी जगह एक नई उम्मत की स्थापना और उसका शुद्धिकरण व परिष्करण है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

الٓمٓ ﴿1﴾ ذَٰلِكَ ٱلْكِتَـٰبُ لَا رَيْبَ ۛ فِيهِ ۛ هُدًى لِّلْمُتَّقِينَ ﴿2﴾ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱلْغَيْبِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ ﴿3﴾ وَٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ وَبِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ ﴿4﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَىٰ هُدًى مِّن رَّبِّهِمْ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ ﴿5﴾

यह सूरह 'अलिफ़, लाम, मीम' है। यह ईश्वरीय ग्रंथ है, इसके ईश्वरीय ग्रंथ होने में कोई संदेह नहीं। मार्गदर्शन है इन परमेश्वर से डरने वालों के लिए जो बिन देखे मान रहे हैं और नमाज़ का प्रबंध कर रहे हैं और जो कुछ हमने इन्हें दिया है, उसमें से (हमारे मार्ग में) दान कर रहे हैं। और जो उसे भी मान रहे हैं जो तुम्हारी ओर उतारा गया और उसे भी जो तुम से पूर्व उतारा गया और वे परलोक पर विश्वास रखते हैं। यही अपने प्रभु के मार्ग पर हैं और यही हैं जो सफलता पाने वाले हैं।

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْهِمْ ءَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿6﴾ خَتَمَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَعَلَىٰ سَمْعِهِمْ ۖ وَعَلَىٰٓ أَبْصَـٰرِهِمْ غِشَـٰوَةٌ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿7﴾

(इसके विपरीत) जिन लोगों ने इस ग्रंथ को अस्वीकार करने का निर्णय कर लिया है, उनके लिए समान है, तुम उन्हें सचेत करो या न करो, वे नहीं मानेंगे। उनके दिलों और कानों पर अब परमेश्वर ने (अपने नियम अनुसार) मुहर लगा दी है और उनकी आंखों पर पर्दा है, और क़यामत के दिन एक भीषण यातना है, जो उनकी प्रतीक्षा में है।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَمَا هُم بِمُؤْمِنِينَ ﴿8﴾ يُخَـٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ ﴿9﴾ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَهُمُ ٱللَّهُ مَرَضًا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْذِبُونَ ﴿10﴾ وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ قَالُوٓا۟ إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ ﴿11﴾ أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلْمُفْسِدُونَ وَلَـٰكِن لَّا يَشْعُرُونَ ﴿12﴾ وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ كَمَآ ءَامَنَ ٱلنَّاسُ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ كَمَآ ءَامَنَ ٱلسُّفَهَآءُ ۗ أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلسُّفَهَآءُ وَلَـٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ ﴿13﴾ وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوْا۟ إِلَىٰ شَيَـٰطِينِهِمْ قَالُوٓا۟ إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِءُونَ ﴿14﴾ ٱللَّهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ ﴿15﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلضَّلَـٰلَةَ بِٱلْهُدَىٰ فَمَا رَبِحَت تِّجَـٰرَتُهُمْ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ ﴿16﴾

और इन्हीं लोगों में वे (ढोंगी) भी हैं जो ये कहते हैं कि हमने परमेश्वर को माना है और क़यामत के दिन को माना है, यद्यपि वे इनमें से किसी चीज़ को भी नहीं मानते। वे परमेश्वर और मानने वालों, दोनों को धोखा देना चाहते हैं, और वस्तुतः अपने आप ही को धोखा दे रहे हैं, परंतु इसकी समझ नहीं रखते। इनके दिलों में (ईर्ष्या का) रोग था तो परमेश्वर ने अब इनके इस रोग को और बढ़ा दिया है, और इनके इस अपराध के कारण कि ये झूठ बोलते रहे हैं, इनके लिए बड़ी कष्टदायक यातना है। और जब इनसे कहा जाता है कि (अपने इस आचरण से) तुम इस देश में बिगाड़ पैदा न करो, तो जवाब में कहते हैं कि हम ही तो सुधार करने वाले हैं। सावधान! यही बिगाड़ पैदा करने वाले हैं, परंतु इसको समझ नहीं रहे। और जब इनसे कहा जाता है कि तुम भी उसी प्रकार मान लो, जिस प्रकार (तुम्हारे सामने) ये लोग मान गए हैं तो (बड़े अहंकार से) कहते हैं कि क्या हम इन मूर्खों की तरह मान लें? सुन लो, यही मूर्ख हैं, परंतु नहीं जानते। और जब मुसलमानों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हमने मान लिया और जब अलग से अपने शैतानों के पास पहुंचते हैं तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो मज़ाक कर रहे थे। (ये क्या मज़ाक करेंगे? सच यह है कि) परमेश्वर इनके साथ मज़ाक कर रहा है और इनके अहंकार में इनकी रस्सी (अपने नियम अनुसार) लंबी किए जाता है, इस प्रकार कि भटकते फिर रहे हैं। यही हैं जिन्होंने सन्मार्ग पर मार्ग से भटकने को प्राथमिकता दी तो इनका यह सौदा (इनके लिए) कुछ भी लाभदायक न हुआ और न ये उचित मार्ग पा सके हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात परमेश्वर का जो न्याय (Divine Judgment) इस भूभाग में सक्रिय अथवा जारी है, उसमें लोगों को ईमान का (अर्थात मानने का) आह्वान करने और इस प्रकार शांति की ओर प्रेरित करने के बजाय युद्ध की आग न भड़काओ। ↩
مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ ٱلَّذِى ٱسْتَوْقَدَ نَارًا فَلَمَّآ أَضَآءَتْ مَا حَوْلَهُۥ ذَهَبَ ٱللَّهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ فِى ظُلُمَـٰتٍ لَّا يُبْصِرُونَ ﴿17﴾ صُمٌّۢ بُكْمٌ عُمْىٌ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَ ﴿18﴾ أَوْ كَصَيِّبٍ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فِيهِ ظُلُمَـٰتٌ وَرَعْدٌ وَبَرْقٌ يَجْعَلُونَ أَصَـٰبِعَهُمْ فِىٓ ءَاذَانِهِم مِّنَ ٱلصَّوَٰعِقِ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ ۚ وَٱللَّهُ مُحِيطٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿19﴾ يَكَادُ ٱلْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَـٰرَهُمْ ۖ كُلَّمَآ أَضَآءَ لَهُم مَّشَوْا۟ فِيهِ وَإِذَآ أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُوا۟ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿20﴾

इनका उदाहरण ठीक उस व्यक्ति का सा है जिसने (अंधेरी रात में) आग जलायी, फिर जब आग ने उसके आस-पास को प्रकाशित कर दिया तो जिनके लिए आग जलायी गई थी, परमेश्वर ने उनका प्रकाश छीन लिया और उन्हें इस प्रकार अँधेरों में छोड़ दिया कि वे कुछ देख नहीं सकते; बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, सो अब वे कभी न लौटेंगे। या ऐसी है जैसे आकाश से बारिश हो रही है, उसमें अंधेरी घटाएँ भी हैं और गरज-चमक भी, वे मृत्यु के भय से गरज के मारे अपनी उँगलियाँ अपने कानों में ठूँस रहे हैं, यद्यपि इस प्रकार के नकारने वालों को परमेश्वर हर दिशा से घेरे हुए है। बिजली की चमक इनकी आँखें चौंधिया रही है; जब इनपर चमकती है, ये उसमें कुछ चल लेते हैं और जब इनपर अंधेरा छा जाता है तो खड़े रह जाते हैं। यदि परमेश्वर चाहता तो इनके कान और आँखें भी छीन लेता। निस्संदेह, परमेश्वर हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعْبُدُوا۟ رَبَّكُمُ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿21﴾ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ فِرَٰشًا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءً وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءً فَأَخْرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزْقًا لَّكُمْ ۖ فَلَا تَجْعَلُوا۟ لِلَّهِ أَندَادًا وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿22﴾

(इन के पीछे लगकर तुम अपने आप को बर्बाद क्यों करते हो)? तुम अपने उस प्रभु की भक्ति करो, लोगो, जिसने तुम्हें पैदा किया है और तुमसे पहले लोगों को भी, ताकि तुम (उसके दण्ड से) बचे रहो। (वही) जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना और आकाश को छत बनाया है और आकाश से पानी उतारा है, फिर उससे तुम्हारे पालन-पोषण के लिए अनेक प्रकार के फल पैदा कर दिए हैं। इसलिए तुम परमेश्वर के सहभागी न बनाओ, यद्यपि तुम इन सब बातों को जानते हो।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहूदियों को अनदेखा कर के यह कुछ देर के लिए मदीना और उसके आस पास के मुश्रिकों को संबोधित किया गया है। ↩
وَإِن كُنتُمْ فِى رَيْبٍ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا۟ بِسُورَةٍ مِّن مِّثْلِهِۦ وَٱدْعُوا۟ شُهَدَآءَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿23﴾ فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا۟ وَلَن تَفْعَلُوا۟ فَٱتَّقُوا۟ ٱلنَّارَ ٱلَّتِى وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلْحِجَارَةُ ۖ أُعِدَّتْ لِلْكَـٰفِرِينَ ﴿24﴾ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أَنَّ لَهُمْ جَنَّـٰتٍ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ كُلَّمَا رُزِقُوا۟ مِنْهَا مِن ثَمَرَةٍ رِّزْقًا ۙ قَالُوا۟ هَـٰذَا ٱلَّذِى رُزِقْنَا مِن قَبْلُ ۖ وَأُتُوا۟ بِهِۦ مُتَشَـٰبِهًا ۖ وَلَهُمْ فِيهَآ أَزْوَٰجٌ مُّطَهَّرَةٌ ۖ وَهُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿25﴾

(यही इस ग्रन्थ का आह्वान है, इसे स्वीकार करो), और जो कुछ हमने अपने बन्दे पर उतारा है, उसके बारे में यदि तुम्हें संदेह है तो (जाओ और) इस जैसी एक सूरह ही बना लाओ और (इसके लिए) परमेश्वर के अतिरिक्त तुम्हारे जो समर्थक हैं, उन्हें भी बुला लो, यदि तुम (अपनी इस कल्पना में) सच्चे हो। फिर यदि न कर सको और कदापि न कर सकोगे तो उस आग से डरो जिसका ईंधन वे लोग भी होंगे जो नहीं मानते और उनके वे पत्थर भी जिन्हें वे पूजते हैं। वह इन्हीं नकारने वालों के लिए तैयार की गई है। और उनको जो (इस ग्रन्थ को) मान चुके और उन्होंने अच्छे कर्म किए, इस बात की शुभ-सूचना दो, (हे पैग़ंबर) कि उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। उनका कोई फल उन्हें जब भी खाने के लिए दिया जाएगा तो कहेंगे: यह वही है जो इससे पहले हमें दिया गया, यद्यपि उनको यह उससे मिलता जुलता दिया जाएगा, और उनके लिए वहां निर्मल पत्नियाँ होंगी और वे उनमें सदा रहेंगे।

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَسْتَحْىِۦٓ أَن يَضْرِبَ مَثَلًا مَّا بَعُوضَةً فَمَا فَوْقَهَا ۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ فَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَيَقُولُونَ مَاذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِهَـٰذَا مَثَلًا ۘ يُضِلُّ بِهِۦ كَثِيرًا وَيَهْدِى بِهِۦ كَثِيرًا ۚ وَمَا يُضِلُّ بِهِۦٓ إِلَّا ٱلْفَـٰسِقِينَ ﴿26﴾ ٱلَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهْدَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مِيثَـٰقِهِۦ وَيَقْطَعُونَ مَآ أَمَرَ ٱللَّهُ بِهِۦٓ أَن يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿27﴾

(यह स्वर्ग का दृष्टांत है, और) परमेश्वर इस बात से नहीं शर्माता कि (किसी वास्तविकता की व्याख्या के लिए) वह मच्छर या इससे भी छोटी किसी चीज़ का उदाहरण दे। फिर जो मानने वाले हैं, वे जानते हैं कि यह उनके प्रभु की ओर से सत्य आया है, और जो नहीं मानते, वे कहते हैं कि इस उदाहरण से परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? (इस प्रकार) परमेश्वर अनेक लोगों को इससे भटकाता है और अनेक लोगों का इसके द्वारा मार्गदर्शन करता है, और सत्य यह है कि वह इससे भटकाता तो अवज्ञाकारियों ही को है जो परमेश्वर से की हुई अपनी प्रतिज्ञा को तत्पश्चात तोड़ देते हैं और परमेश्वर ने जिस चीज़ को जोड़ने का आदेश दिया है, उसे काटते हैं, और इस प्रकार धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं। यही हैं जो (इस लोक और परलोक, दोनों में) असफल हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इससे अभिप्राय खूनी रिश्तों और परिवार के संबोधन को काटना है। ↩
كَيْفَ تَكْفُرُونَ بِٱللَّهِ وَكُنتُمْ أَمْوَٰتًا فَأَحْيَـٰكُمْ ۖ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿28﴾ هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ لَكُم مَّا فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًا ثُمَّ ٱسْتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ فَسَوَّىٰهُنَّ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍ ۚ وَهُوَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿29﴾

(लोगो), तुम परमेश्वर को किस प्रकार नकारते हो, यद्यपि तुम मृत थे तो उसने तुम्हें जीवन प्रदान किया? फिर वही तुमको मारता है, फिर वही जीवित करेगा, फिर तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे। वही जिसने तुम्हारे लिए धरती के सब पदार्थ उत्पन्न किए, फिर आकाश की ओर ध्यान किया और सात आकाश बराबर संतुलित कर दिए, और वह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है।

وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِنِّى جَاعِلٌ فِى ٱلْأَرْضِ خَلِيفَةً ۖ قَالُوٓا۟ أَتَجْعَلُ فِيهَا مَن يُفْسِدُ فِيهَا وَيَسْفِكُ ٱلدِّمَآءَ وَنَحْنُ نُسَبِّحُ بِحَمْدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿30﴾ وَعَلَّمَ ءَادَمَ ٱلْأَسْمَآءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمْ عَلَى ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ فَقَالَ أَنۢبِـُٔونِى بِأَسْمَآءِ هَـٰٓؤُلَآءِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿31﴾ قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَكَ لَا عِلْمَ لَنَآ إِلَّا مَا عَلَّمْتَنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ ﴿32﴾ قَالَ يَـٰٓـَٔادَمُ أَنۢبِئْهُم بِأَسْمَآئِهِمْ ۖ فَلَمَّآ أَنۢبَأَهُم بِأَسْمَآئِهِمْ قَالَ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ إِنِّىٓ أَعْلَمُ غَيْبَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَأَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ ﴿33﴾

(इनसे पूछो, हे पैग़ंबर कि ये किस प्रकार नकारने वाले हो सकते हैं)? और (इस दुनिया के बारे में हमारी योजना को समझने के लिए) वह घटना इन्हें सुनाओ, जब तुम्हारे प्रभु ने फ़रिश्तों से कहा: मैं पृथ्वी में एक ऐसे प्राणी की रचना करने वाला हूं जिसे (उसका) साम्राज्य दिया जाएगा। उन्होंने निवेदन किया: क्या आप उसमें ऐसा प्राणी बनाएंगे जो वहां बिगाड़ पैदा करेगा और खून बहाएगा, और इधर हमारा मामला यह है कि आप की स्तुति व प्रशंसा के साथ हम आपकी पवित्रता का जाप कर रहे हैं? परमेश्वर ने कहा: मैं जानता हूं जो तुम नहीं जानते, और (उन्हें समझाने के लिए) आदम को सब नाम सिखा दिए। फिर (जिनके नाम सिखाए), उन व्यक्तियों को फ़रिश्तों के सामने प्रस्तुत किया। फिर कहा: मुझे इन लोगों के नाम बताओ, यदि तुम (अपने इस विचार में) सच्चे हो। उन्होंने निवेदन किया: आप तो दोषरहित हैं, हम तो इतना ही जानते हैं, जितना आप ने हमें बताया है, सर्वज्ञ और प्रज्ञावान तो वास्तव में आप ही हैं। परमेश्वर ने कहा: आदम, तुम इन लोगों के नाम इन्हें बताओ। फिर जब उसने उनका परिचय उन्हें करा दिया तो परमेश्वर ने कहा: मैंने तुमसे कहा न था कि मैं समस्त आकाशों और पृथ्वी के भेद जानता हूं और मैं जानता हूं जो तुम व्यक्त कर रहे हो और जो तुम छिपा रहे थे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात उन लोगों के नाम जो अपने आचरण से साबित कर देंगे कि आदम की संतान में केवल उपद्रवी और ख़ून बहाने वाले व्यक्ति ही नहीं होंगे, अपितु सत्य और न्याय के ऐसे ध्वजवाहक भी होंगे जिन्हें दुनिया नबी, रसूल, धर्म का पुनरुत्थान करने वाले (मुजद्दिद), सुधारक (मुस्लेह), सत्य के साक्षी (शहीद) और सदाचारी (सिद्दीक) के नाम से याद करेगी। ↩
وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰ وَٱسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿34﴾ وَقُلْنَا يَـٰٓـَٔادَمُ ٱسْكُنْ أَنتَ وَزَوْجُكَ ٱلْجَنَّةَ وَكُلَا مِنْهَا رَغَدًا حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَـٰذِهِ ٱلشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿35﴾ فَأَزَلَّهُمَا ٱلشَّيْطَـٰنُ عَنْهَا فَأَخْرَجَهُمَا مِمَّا كَانَا فِيهِ ۖ وَقُلْنَا ٱهْبِطُوا۟ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ ۖ وَلَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَمَتَـٰعٌ إِلَىٰ حِينٍ ﴿36﴾ فَتَلَقَّىٰٓ ءَادَمُ مِن رَّبِّهِۦ كَلِمَـٰتٍ فَتَابَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿37﴾ قُلْنَا ٱهْبِطُوا۟ مِنْهَا جَمِيعًا ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُم مِّنِّى هُدًى فَمَن تَبِعَ هُدَاىَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿38﴾ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿39﴾

और (हमारी इस योजना में मनुष्य की परीक्षा को समझने के लिए) वह घटना भी इन्हें सुनाओ, जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम के सामने झुक जाओ तो इब्लीस के सिवा वे सब उसके सामने झुक गए। उसने नहीं माना और अकड़ बैठा और इस प्रकार नकारने वालों में से हुआ। और हमने कहा: हे आदम, तुम और तुम्हारी पत्नी, दोनों इस बाग़ में रहो और इसमें से जहाँ से चाहो, निःसंकोच होकर खाओ। हाँ, परंतु तुम दोनों इस पेड़ के पास न जाना, अन्यथा अत्याचारी हो जाओगे। फिर शैतान ने उनको वहां से फिसला दिया और जिस हालत में वे थे, उससे उन्हें निकलवा कर छोड़ा। और हमने कहा: (यहाँ से) उतर जाओ, अब तुम एक दूसरे के शत्रु हो और तुम्हें एक निश्चित अवधि तक पृथ्वी पर ठहरना है और वहीं जीवन बिताना है। फिर आदम ने अपने प्रभु से (पछतावे) के कुछ शब्द सीख लिए (और उनके माध्यम से क्षमा मांगी) तो उसपर उसने कृपा की और उसे क्षमा कर दिया। निस्संदेह, वही बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। हमने कहा: तुम सब यहाँ से उतर जाओ, फिर मेरी ओर से यदि कोई मार्गदर्शन तुम्हें प्राप्त हो, तो उसी पर चलना, इसलिए कि जो लोग मेरे इस मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे, उनका बदला स्वर्ग है, अतः उनके लिए न वहां कोई आशंका है और न वे कभी दुखी होंगे। और जिन्होंने (इसको) नकारा और हमारी आयतों को झूठा कहा, वे नरक वासी हैं, वे सदा उसी में रहेंगे।1

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  1. इस पेड़ से अभिप्राय वही प्रजनन है जिसका फल खाने के कारण मनुष्य इस दुनिया में अपने आप को बाक़ी रखे हुए है। ↩
يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَوْفُوا۟ بِعَهْدِىٓ أُوفِ بِعَهْدِكُمْ وَإِيَّـٰىَ فَٱرْهَبُونِ ﴿40﴾ وَءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلْتُ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُوٓا۟ أَوَّلَ كَافِرٍۭ بِهِۦ ۖ وَلَا تَشْتَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِى ثَمَنًا قَلِيلًا وَإِيَّـٰىَ فَٱتَّقُونِ ﴿41﴾ وَلَا تَلْبِسُوا۟ ٱلْحَقَّ بِٱلْبَـٰطِلِ وَتَكْتُمُوا۟ ٱلْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿42﴾ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱرْكَعُوا۟ مَعَ ٱلرَّٰكِعِينَ ﴿43﴾ أَتَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ ٱلْكِتَـٰبَ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿44﴾ وَٱسْتَعِينُوا۟ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى ٱلْخَـٰشِعِينَ ﴿45﴾ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَأَنَّهُمْ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ ﴿46﴾

(क़ुरआन तुम्हारे लिए यही मार्गदर्शन लेकर आया है, इसलिए) हे इस्राईलियो, मेरे उस उपकार को याद करो जो मैंने तुम पर किया था और मुझसे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करो, मैं तुमसे की हुई अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करूंगा और मुझी से डरते रहो, और इस (क़ुरआन) को मान लो जो मैंने उस चीज़ की पुष्टि में उतारा है जो तुम्हारे पास है, और सबसे पहले तुम ही इसके नकारने वाले न बन जाओ, और थोड़ी धनराशि के बदले मेरी आयतें न बेचो, और मेरे ही क्रोध से बचो; और सत्य को असत्य के साथ न मिलाओ, (यह सत्य को छिपाने का प्रयत्न है) और जानबूझकर सत्य को छिपाने का प्रयत्न न करो; और नमाज़ का प्रबंध करो और ज़कात देते रहो; और इन झुकने वालों के साथ तुम भी (परमेश्वर के सामने) झुक जाओ। क्या तुम लोगों को भलाई का उपदेश करते हो और अपने आप को भूल जाते हो, यद्यपि तुम ईश्वरीय ग्रंथ का पाठ करते हो? फिर क्या तुम समझते नहीं हो? और (इस मार्ग पर चलने के लिए) धैर्य और नमाज़ के द्वारा सहायता चाहो, और इसमें संदेह नहीं कि यह सब अत्यंत भारी है, परंतु उनके लिए भारी नहीं जो परमेश्वर से डरने वाले हैं, जिन्हें याद है कि उन्हें अपने प्रभु से मिलना है और उनको (एक दिन) उसी की ओर पलट कर जाना भी है।1

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  1. सूरह की भूमिका समाप्त हुई। अब यहाँ से मूल संबोधन शुरू होता है। ↩
يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿47﴾ وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًا لَّا تَجْزِى نَفْسٌ عَن نَّفْسٍ شَيْـًٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا شَفَـٰعَةٌ وَلَا يُؤْخَذُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿48﴾

हे इस्राईलियो, मेरे उस उपकार को याद करो जो मैंने तुम पर किया था और इस बात को कि मैंने तुम्हें समस्त मानवता पर श्रेष्ठता प्रदान की थी, और उस दिन से डरो, जब कोई किसी के कुछ भी काम न आएगा और न उससे कोई अनुशंसा स्वीकार की जाएगी और न उससे कोई हर्जाना लिया जाएगा और न लोगों को कोई सहायता ही मिलेगी।

وَإِذْ نَجَّيْنَـٰكُم مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ يُذَبِّحُونَ أَبْنَآءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَآءَكُمْ ۚ وَفِى ذَٰلِكُم بَلَآءٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌ ﴿49﴾

और याद करो, जब हमने तुमको फ़िरऔन के लोगों से छुड़ाया। वे तुम्हें बुरी यातनाएं चखाते थे, तुम्हारे बेटों को ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतार देते थे और तुम्हारी स्त्रियाँ जीवित रखते थे और (तुम्हें) इस (यातना से छुड़ाने) में तुम्हारे प्रभु की ओर से (तुम्हारे लिए) बड़ी कृपा थी।

وَإِذْ فَرَقْنَا بِكُمُ ٱلْبَحْرَ فَأَنجَيْنَـٰكُمْ وَأَغْرَقْنَآ ءَالَ فِرْعَوْنَ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ ﴿50﴾

और याद करो, जब हमने तुम्हें साथ लेकर सागर को चीर दिया और इस प्रकार तुम्हें बचा लिया और फ़िरऔन के लोगों को तुम्हारे देखते-देखते हमने उसी सागर में डुबो दिया।

وَإِذْ وَٰعَدْنَا مُوسَىٰٓ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً ثُمَّ ٱتَّخَذْتُمُ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَنتُمْ ظَـٰلِمُونَ ﴿51﴾ ثُمَّ عَفَوْنَا عَنكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿52﴾

और याद करो, जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा किया। फिर उसकी अनुपस्थिति में तुमने वह बछड़ा बना लिया, और उस समय तुम अपने आप पर अत्याचार कर रहे थे। फिर इसके बाद भी हमने तुम्हें क्षमा कर दिया, ताकि तुम आभार व्यक्त करने वाले बन जाओ।1

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  1. यह उस बछड़े का वर्णन है जिसे मिस्र से निकालने के बाद इस्राईलियों ने अपना इष्ट या उपास्य बना लिया था। ↩
وَإِذْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْفُرْقَانَ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴿53﴾

और याद करो, जब हमने मूसा को धर्मग्रंथ, अर्थात (सत्य-असत्य में भेद करने के लिए) कसौटी प्रदान की, ताकि (इसके माध्यम से) तुम मार्गदर्शन प्राप्त करो।

وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦ يَـٰقَوْمِ إِنَّكُمْ ظَلَمْتُمْ أَنفُسَكُم بِٱتِّخَاذِكُمُ ٱلْعِجْلَ فَتُوبُوٓا۟ إِلَىٰ بَارِئِكُمْ فَٱقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ عِندَ بَارِئِكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿54﴾

और याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा: मेरी क़ौम के लोगो, तुमने यह बछड़ा बनाकर अपने ऊपर अत्याचार किया है, इसलिए अब अपने रचयिता की ओर लौटो, और (इसके लिए) अपने इन लोगों का (अपने हाथों से) वध करो। यह तुम्हारे लिए तुम्हारे पैदा करने वाले के निकट अच्छा है। अतः तुमने यह किया तो उसने तुम पर कृपा की और तुमको क्षमा कर दिया। निस्संदेह, वही बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

وَإِذْ قُلْتُمْ يَـٰمُوسَىٰ لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ نَرَى ٱللَّهَ جَهْرَةً فَأَخَذَتْكُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ ﴿55﴾ ثُمَّ بَعَثْنَـٰكُم مِّنۢ بَعْدِ مَوْتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿56﴾ وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْمَنَّ وَٱلسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ ۖ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ ﴿57﴾

और याद करो, जब तुमने कहा कि हे मूसा, हम तुम्हारी बात पर कदापि विश्वास नहीं करेंगे, जब तक हम परमेश्वर को साक्षात न देख लें। इस पर तुमको कड़क ने आ पकड़ा और तुम देखते रह गए। फिर तुम्हारी इस मृत्यु के पश्चात हमने तुम्हें उठा खडा किया, ताकि तुम आभारी बन कर रहो। और तुम पर बादलों का साया किया और तुम पर मन्न व सल्वा उतारे, खाओ ये निर्मल चीज़ें जो हमने तुम्हें दी हैं। (अफ़सोस कि जिन पर यह कृपा हुई, उन्होंने इसका अनादर किया) और (इस प्रकार) उन्होंने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा, अपितु अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे।

وَإِذْ قُلْنَا ٱدْخُلُوا۟ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةَ فَكُلُوا۟ مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًا وَٱدْخُلُوا۟ ٱلْبَابَ سُجَّدًا وَقُولُوا۟ حِطَّةٌ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَـٰيَـٰكُمْ ۚ وَسَنَزِيدُ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿58﴾ فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ قَوْلًا غَيْرَ ٱلَّذِى قِيلَ لَهُمْ فَأَنزَلْنَا عَلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ رِجْزًا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ ﴿59﴾

और याद करो, जब हमने कहा कि इस बस्ती में प्रवेश करो, फिर इसमें से जहाँ से चाहो, आनंदपूर्वक खाओ और (याद रखो कि) इसके द्वार में (विनम्रता के साथ) सर झुकाए हुए प्रवेश करना और प्रार्थना करना कि (प्रभु), हमारे पापकर्म क्षमा कर दे, हम तुम्हारे पापकर्मों को क्षमा कर देंगे और (तुम में से) वे लोग जो भला आचरण अपनाएंगे उनपर शीघ्र ही हम और भी कृपा करेंगे। फिर जो बात उनसे कही गई थी, अत्याचारियों ने उसे एक दूसरी बात से बदल दिया। अतः इन अत्याचारियों पर हमने आकाश से दण्ड उतारा, अवज्ञा के उन कार्यों के फलस्वरूप जो वे कर रहे थे।

وَإِذِ ٱسْتَسْقَىٰ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦ فَقُلْنَا ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْحَجَرَ ۖ فَٱنفَجَرَتْ مِنْهُ ٱثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍ مَّشْرَبَهُمْ ۖ كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ مِن رِّزْقِ ٱللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ﴿60﴾

और याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी की प्रार्थना की तो हमने कहा: अपनी लाठी इस पत्थर पर मारो। (उसने मारी) तो उससे बारह धाराएं बह निकलीं, इस प्रकार कि प्रत्येक कुटुंब ने अपने लिए पानी लेने का स्थान निर्धारित कर लिया। परमेश्वर की इस जीविका से खाओ और पियो, (हे इस्राईलियो ), और पृथ्वी में बिगाड़ न फैलाते फिरो।

وَإِذْ قُلْتُمْ يَـٰمُوسَىٰ لَن نَّصْبِرَ عَلَىٰ طَعَامٍ وَٰحِدٍ فَٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ مِنۢ بَقْلِهَا وَقِثَّآئِهَا وَفُومِهَا وَعَدَسِهَا وَبَصَلِهَا ۖ قَالَ أَتَسْتَبْدِلُونَ ٱلَّذِى هُوَ أَدْنَىٰ بِٱلَّذِى هُوَ خَيْرٌ ۚ ٱهْبِطُوا۟ مِصْرًا فَإِنَّ لَكُم مَّا سَأَلْتُمْ ۗ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ ٱلذِّلَّةُ وَٱلْمَسْكَنَةُ وَبَآءُو بِغَضَبٍ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَقْتُلُونَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ۗ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا۟ وَّكَانُوا۟ يَعْتَدُونَ ﴿61﴾

और याद करो, जब तुमने कहा: हे मूसा, हम एक ही खाने पर कदापि धैर्य न करेंगे। अतः हमारे लिए अपने प्रभु से प्रार्थना करो कि यह सब्ज़ी, ककड़ी, लहसुन, मसूर और प्याज़ जो धरती उगाती है, वह इन चीज़ों में से हमारे लिए निकाल कर लाए। उसने कहा: तुम एक उत्तम वस्तु को तुच्छ वस्तुओं से बदलना चाहते हो? अच्छा तो जाओ, किसी मिस्र ही में जा कर रहो। इसलिए कि यह जो कुछ तुम मांगते हो, वहां तुमको मिल जाएगा। (वे यही करते रहे) और उनपर अपमान तथा दरिद्रता थोप दी गई और उन्हें परमेश्वर का प्रकोप प्राप्त हुआ। यह इस कारण हुआ कि वे परमेश्वर की आयतों को नहीं मानते थे और उसके नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह इस कारण हुआ कि उन्होंने अवज्ञा की और वे (परमेश्वर की बनाई किसी मर्यादा) का पालन नहीं करते थे।

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱلَّذِينَ هَادُوا۟ وَٱلنَّصَـٰرَىٰ وَٱلصَّـٰبِـِٔينَ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَعَمِلَ صَـٰلِحًا فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿62﴾

(अतः कर्मों के अच्छे और बुरे फल का नियम पूर्णतः निष्पक्ष है, इसलिए) वे लोग जो (पैग़ंबर मुहम्मद को) मान चुके हैं और जो (इनसे पहले) यहूदी हुए और जो ईसाई तथा साबी कहलाते हैं, उनमें से जिन लोगों ने भी परमेश्वर को माना और क़यामत के दिन को माना और भले कर्म किए हैं, उनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है और (उसके यहाँ) उनके लिए न कोई आशंका होगी और न वे कभी दुखी होंगे।1

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  1. यह शुभ समाचार इस शर्त के साथ है कि उनमें से किसी ने कोई ऐसा अपराध न किया हो जो उनकी आस्था और उनके कर्मों को बर्बाद कर दे। उदाहरणार्थ किसी निर्दोष की हत्या करना या जानबूझकर परमेश्वर के किसी सच्चे पैग़ंबर को नकार देना। ↩
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍ وَٱذْكُرُوا۟ مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿63﴾ ثُمَّ تَوَلَّيْتُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ ۖ فَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ لَكُنتُم مِّنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ ﴿64﴾ وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ ٱلَّذِينَ ٱعْتَدَوْا۟ مِنكُمْ فِى ٱلسَّبْتِ فَقُلْنَا لَهُمْ كُونُوا۟ قِرَدَةً خَـٰسِـِٔينَ ﴿65﴾ فَجَعَلْنَـٰهَا نَكَـٰلًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهَا وَمَا خَلْفَهَا وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ ﴿66﴾

और याद करो, जब हमने तुमसे वचन लिया था और (इसके लिए) तूर पर्वत को तुम पर उठाया था और कहा था कि उस चीज़ को दृढ़तापूर्वक पकड़ो जो हमने तुम्हें दी है, और जो कुछ उसमें (लिखा) है उसे याद रखो ताकि तुम (परमेश्वर के प्रकोप से) बचे रहो। फिर इसके बाद भी तुम उससे फिर गए। अतः सत्य यह है कि यदि परमेश्वर की कृपा और उसकी दया तुम पर न होती तो (अपने इस आचरण के कारण) तुम बड़े असफल होते, और तुम उन्हें भी जानते ही हो जिन्होंने तुम्हारे लोगों में से सब्त के दिन का अनादर किया तो हमने उनसे कहा: जाओ तिरस्कृत बंदर बन जाओ। इस प्रकार उनकी उस बस्ती को, (जिसमें उन्होंने सब्त का अनादर किया था), हमने उसके आसपास के लिए एक उदाहरण और परमेश्वर से डरने वालों के लिए शिक्षा का एक माध्यम बना दिया।12

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  1. यह परमेश्वर की शक्ति और उसके प्रताप की एक झलक थी और यह इसलिए दिखाई गई कि इस्राईली हमेशा इस बात को याद रखें कि जिस परमेश्वर के साथ वे यह प्रतिज्ञा कर रहे हैं, उसकी शक्ति कैसी अपार है और उन्होंने यदि इसको तोड़ा तो वह उनके साथ क्या कर सकता है। ↩
  2. अर्थात उस दिन का अनादर किया जिसमें इस्राईलियों के लिए काम-काज, सैर, शिकार, यहाँ तक कि घरों में चूल्हा जलाना और दासियों व ग़ुलामों से कोई सेवा लेने की भी मनाही की गई थी । ↩
وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَن تَذْبَحُوا۟ بَقَرَةً ۖ قَالُوٓا۟ أَتَتَّخِذُنَا هُزُوًا ۖ قَالَ أَعُوذُ بِٱللَّهِ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ ﴿67﴾ قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِىَ ۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا فَارِضٌ وَلَا بِكْرٌ عَوَانٌۢ بَيْنَ ذَٰلِكَ ۖ فَٱفْعَلُوا۟ مَا تُؤْمَرُونَ ﴿68﴾ قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا لَوْنُهَا ۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ صَفْرَآءُ فَاقِعٌ لَّوْنُهَا تَسُرُّ ٱلنَّـٰظِرِينَ ﴿69﴾ قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِىَ إِنَّ ٱلْبَقَرَ تَشَـٰبَهَ عَلَيْنَا وَإِنَّآ إِن شَآءَ ٱللَّهُ لَمُهْتَدُونَ ﴿70﴾ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَّا ذَلُولٌ تُثِيرُ ٱلْأَرْضَ وَلَا تَسْقِى ٱلْحَرْثَ مُسَلَّمَةٌ لَّا شِيَةَ فِيهَا ۚ قَالُوا۟ ٱلْـَٔـٰنَ جِئْتَ بِٱلْحَقِّ ۚ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا۟ يَفْعَلُونَ ﴿71﴾

और याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा: परमेश्वर तुम्हें आदेश देता है कि (ख़ून पर क़समें लेने के लिए) तुम एक गाय का वध करो। वे कहने लगे: क्या तुम हमसे मज़ाक़ करते हो? उसने कहा: मैं परमेश्वर की शरण मांगता हूं कि इस प्रकार का दुस्साहसी बन जाऊं। उन्होंने कहा: अच्छा, अपने प्रभु को हमारे लिए पुकारो कि वह हमें बताए कि गाय कैसी होनी चाहिए। उसने कहा: वह कहता है कि गाय न बूढ़ी हो न बछिया, उनके बीच के आयु की हो। अब जाओ और वह करो जिसका तुम्हें आदेश दिया जा रहा है। बोले: अपने प्रभु को हमारे लिए पुकारो कि वह हम पर यह भी स्पष्ट करे कि उसका रंग कैसा हो। उसने कहा: वह कहता है कि वह गाय सुनहरी हो, गहरे रंग वाली, ऐसी कि देखने वालों को प्रसन्न करे। बोले: (एक बार और) अपने प्रभु को हमारे लिए पुकारो कि हमको अच्छी तरह स्पष्टता के साथ बताए कि वह कैसी हो, हमें गायों के विषय में कुछ दुविधा हो रही है, और प्रभु ने चाहा तो अब हम अवश्य उसका पता लगा लेंगे। उसने कहा: वह कहता है कि वह गाय काम-काज वाली न हो कि भूमि जोतती और खेती को पानी देती हो। वह एक ही रंग की हो उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट न हो। बोले: अब तुम स्पष्ट बात लाए हो। इस प्रकार उन्होंने उसका वध किया और लगता न था कि वे ऐसा करेंगे।

وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَٱدَّٰرَْٰٔتُمْ فِيهَا ۖ وَٱللَّهُ مُخْرِجٌ مَّا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ ﴿72﴾ فَقُلْنَا ٱضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا ۚ كَذَٰلِكَ يُحْىِ ٱللَّهُ ٱلْمَوْتَىٰ وَيُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿73﴾

और वह घटना भी याद करो, जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी। फिर (झूठी क़समें खाईं और) इसका आरोप एक दूसरे पर धरने लगे, और परमेश्वर ने निर्णय कर लिया कि जो कुछ तुम छिपा रहे थे, वह उसे प्रकट कर देगा। अतः हमने कहा: इस (मुर्दे) को उसी (गाय) का एक टुकड़ा मारो (जो क़समें खाने लिए मारी गई है तो वह जीवित हो गया)। परमेश्वर इसी प्रकार मृतकों को जीवित करेगा और वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है ताकि तुम समझ से काम लो।

ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ فَهِىَ كَٱلْحِجَارَةِ أَوْ أَشَدُّ قَسْوَةً ۚ وَإِنَّ مِنَ ٱلْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ ٱلْأَنْهَـٰرُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ ٱلْمَآءُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ ٱللَّهِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿74﴾

(तुम यही करते रहे, यहाँ तक कि) इसके बाद फिर तुम्हारे दिल कठोर हो गए, इस प्रकार कि जैसे वे पत्थर हैं या उनसे भी अधिक कठोर। और पत्थरों में तो ऐसे भी हैं जिनसे नहरें फूटती हैं और उनमें ऐसे भी हैं जो फट जाते हैं और उनसे पानी बह निकलता है और उनमें ऐसे भी हैं कि परमेश्वर के भय से गिर पड़ते हैं। (यह वास्तविकता है कि तुम यही करते रहे हो), और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है।

أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا۟ لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَـٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُۥ مِنۢ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿75﴾ وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ قَالُوٓا۟ أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَآجُّوكُم بِهِۦ عِندَ رَبِّكُمْ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿76﴾ أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ﴿77﴾ وَمِنْهُمْ أُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّآ أَمَانِىَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ ﴿78﴾ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ يَكْتُبُونَ ٱلْكِتَـٰبَ بِأَيْدِيهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هَـٰذَا مِنْ عِندِ ٱللَّهِ لِيَشْتَرُوا۟ بِهِۦ ثَمَنًا قَلِيلًا ۖ فَوَيْلٌ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتْ أَيْدِيهِمْ وَوَيْلٌ لَّهُم مِّمَّا يَكْسِبُونَ ﴿79﴾ وَقَالُوا۟ لَن تَمَسَّنَا ٱلنَّارُ إِلَّآ أَيَّامًا مَّعْدُودَةً ۚ قُلْ أَتَّخَذْتُمْ عِندَ ٱللَّهِ عَهْدًا فَلَن يُخْلِفَ ٱللَّهُ عَهْدَهُۥٓ ۖ أَمْ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿80﴾ بَلَىٰ مَن كَسَبَ سَيِّئَةً وَأَحَـٰطَتْ بِهِۦ خَطِيٓـَٔتُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿81﴾ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿82﴾

इतना होते हुए भी, (मुसलमानो), क्या तुम (इनसे) यह आशा रखते हो कि ये तुम्हारी बात मान लेंगे? और (ये वे लोग हैं) कि इनमें से एक समूह परमेश्वर की वाणी सुनता रहा है और उसे अच्छी तरह समझ लेने के बाद जानबूझकर कर उसमें परिवर्तन करता रहा है। और (ये वे लोग हैं कि) जब मुसलमानों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हमने मान लिया और जब आपस में अकेले होते हैं तो कहते हैं: क्या तुम इनको वह बताते हो जो परमेश्वर ने तुम पर व्यक्त किया है कि वह इसके आधार पर तुम्हारे प्रभु के पास तुमसे वाद-विवाद करें। फिर क्या तुम समझते नहीं हो? क्या ये नहीं जानते कि जो कुछ ये छिपाते हैं और जो कुछ व्यक्त करते हैं, परमेश्वर उन सब बातों से अवगत है? और (ये वे लोग हैं कि) इनमें अनपढ़ जनमानस भी हैं जो परमेश्वर के ग्रंथ को केवल (अपनी) इच्छाओं का एक संग्रह समझते हैं और अपनी अटकलों ही पर चलते हैं- अतः विनाश ही है उनके लिए जो अपने हाथों से शरीअत लिखते हैं, फिर कहते हैं: यह परमेश्वर की ओर से है ताकि इसके माध्यम से थोड़ी सी धनराशि प्राप्त कर लें। अतः विनाश है उनके लिए उस चीज़ के कारण जो उनके हाथों ने लिखी और विनाश है उनके लिए उस चीज़ के कारण जो (उसके माध्यम से) वे कमाते हैं- और (ये वे लोग हैं कि) इन्होंने दावा किया है कि नरक की आग हमें कदापि न छूएगी। हाँ, मात्र कुछ दिनों का कष्ट, अपितु हो सकता है। इनसे पूछो, क्या परमेश्वर से तुमने कोई वचन लिया है? इसलिए कि यदि वचन लिया है तो परमेश्वर किसी परिस्थिति में अपने वचन को नहीं तोड़ेगा या तुम परमेश्वर पर ऐसा लांछन लगाते रहे हो जिसके बारे में तुम कुछ नहीं जानते। हाँ, क्यों नहीं, जिन लोगों ने कोई बुराई कमाई है और उनके पाप ने उन्हें सर्वत्र घेर लिया है, वही नरक वासी हैं, वे उसमें सदा रहेंगे। और जिन्होंने मान लिया और भले कर्म किए, वही स्वर्ग के निवासी हैं। वे उसमें सदा रहेंगे।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ لَا تَعْبُدُونَ إِلَّا ٱللَّهَ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَانًا وَذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَقُولُوا۟ لِلنَّاسِ حُسْنًا وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا مِّنكُمْ وَأَنتُم مُّعْرِضُونَ ﴿83﴾

और याद करो, जब हमने इस्राईलियों से वचन लिया कि तुम परमेश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना नहीं करोगे और माता-पिता के साथ और रिश्तेदारों और अनाथ और असहाय लोगों के साथ भला व्यवहार करोगे। और वचन लिया कि लोगों से अच्छी बात कहो और नमाज़ का प्रबंध करो और ज़कात का भुगतान करो। फिर तुम में से कुछ लोगों के सिवा तुम सब (उससे) फिर गए और वास्तव में तुम फिर जाने वाले लोग ही हो।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَآءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ ﴿84﴾ ثُمَّ أَنتُمْ هَـٰٓؤُلَآءِ تَقْتُلُونَ أَنفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًا مِّنكُم مِّن دِيَـٰرِهِمْ تَظَـٰهَرُونَ عَلَيْهِم بِٱلْإِثْمِ وَٱلْعُدْوَٰنِ وَإِن يَأْتُوكُمْ أُسَـٰرَىٰ تُفَـٰدُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ ۚ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ ٱلْكِتَـٰبِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍ ۚ فَمَا جَزَآءُ مَن يَفْعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمْ إِلَّا خِزْىٌ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰٓ أَشَدِّ ٱلْعَذَابِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿85﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿86﴾

और याद करो, जब हमने तुमसे वचन लिया कि आपस में ख़ून नहीं बहाओगे और अपने लोगों को अपनी बस्तियों से नहीं निकालोगे। फिर तुमने स्वीकार किया और तुम इसके साक्षी हो। फिर यह तुम्ही हो कि अपनों की हत्या करते हो और अपने ही एक समूह को उनकी बस्तियों से निकालते हो, इस प्रकार कि अत्याचार और अधिकार हनन के साथ उनके विरुद्ध एक दूसरे की सहायता करते हो, यदि वे तुम्हारे पास बन्दी बनकर आएँ तो अर्थदण्ड देकर उन्हें छुड़ाते हो, यद्यपि उनका निकालना ही तुम्हारे लिए अनुचित था। फिर क्या तुम ईश्वरीय ग्रंथ के एक भाग को मानते और दूसरे भाग को नकारते हो? अतः तुम में से जो यह करते हैं, उनका दण्ड दुनिया के जीवन में अपमान के अतिरिक्त कुछ नहीं और क़यामत के दिन वे कठोर से कठोर यातना में पहुंचा दिए जाएँगे। (तुम यही करते हो) और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है — यही वे लोग हैं जिन्होंने परलोक देकर दुनिया का जीवन ख़रीद लिया, इसलिए अब न इनकी यातना ही हल्की होगी और न कोई सहायता इन्हें मिलेगी।

وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَقَفَّيْنَا مِنۢ بَعْدِهِۦ بِٱلرُّسُلِ ۖ وَءَاتَيْنَا عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَأَيَّدْنَـٰهُ بِرُوحِ ٱلْقُدُسِ ۗ أَفَكُلَّمَا جَآءَكُمْ رَسُولٌۢ بِمَا لَا تَهْوَىٰٓ أَنفُسُكُمُ ٱسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًا تَقْتُلُونَ ﴿87﴾ وَقَالُوا۟ قُلُوبُنَا غُلْفٌۢ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ ٱللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَّا يُؤْمِنُونَ ﴿88﴾

और हमने मूसा को धर्मग्रंथ दिया था और उसके पीछे निरंतर अपने पैग़ंबर भेजे थे, और मर्यम के पुत्र ईसा को (इन सब के बाद) स्पष्ट निशानियाँ दीं, और रूह-उल-कुदुस द्वारा उसकी सहायता की (तो जानते हो कि उनके साथ तुम्हारा व्यवहार कैसा रहा)? फिर क्या यही होगा कि जब भी (हमारा) कोई पैग़ंबर वे बातें लेकर तुम्हारे पास आएगा जो तुम्हारी इच्छाओं के विपरीत होंगी, तो तुम (उसके सामने) घमंड ही करोगे? फिर एक समूह को झूठा कहोगे और एक समूह की हत्या करोगे — और (ये वे लोग हैं कि) इन्होंने कहा: हमारे दिलों पर पट्टियाँ हैं। नहीं, अपितु इनके इस नकारने के कारण परमेश्वर ने इन्हें अभिशप्त किया है, इसलिए (अब) ये कम ही मानेंगे।

وَلَمَّا جَآءَهُمْ كِتَـٰبٌ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا۟ مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَلَمَّا جَآءَهُم مَّا عَرَفُوا۟ كَفَرُوا۟ بِهِۦ ۚ فَلَعْنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿89﴾ بِئْسَمَا ٱشْتَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا۟ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۖ فَبَآءُو بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍ ۚ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ ﴿90﴾

और (ये वे लोग हैं कि) जब परमेश्वर की ओर से एक ग्रंथ इनके पास आया, उन भविष्यवाणियों की पुष्टि में जो इनके पास हैं, और इससे पहले ये (उसी के नाम पर) अपने धर्म को नकारने वालों के विरुद्ध विजय की प्रार्थनाएँ कर रहे थे, फिर जब वह चीज़ इनके पास आई जिससे अच्छी तरह परिचित थे तो ये उसको नकारने वाले बन गए। अतः परमेश्वर का अभिशाप है इन नकारने वालों पर। कैसी बुरी है वह चीज़ जिसके बदले में इन्होंने अपने आप को बेच दिया कि केवल इस हठ के कारण कि परमेश्वर अपने भक्तों में से जिसपर चाहे अपना अनुग्रह उतारे, ये उस चीज़ को नकार दें जो परमेश्वर ने उतारी है। अतः ये प्रकोप पर प्रकोप कमा लाए और (इस लोक और परलोक में) इन नकारने वालों के लिए (अब) अत्यंत अपमानजनक दण्ड है।

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ نُؤْمِنُ بِمَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَآءَهُۥ وَهُوَ ٱلْحَقُّ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنۢبِيَآءَ ٱللَّهِ مِن قَبْلُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿91﴾ وَلَقَدْ جَآءَكُم مُّوسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ثُمَّ ٱتَّخَذْتُمُ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَنتُمْ ظَـٰلِمُونَ ﴿92﴾

और (ये वे लोग हैं) जब इनसे बार-बार कहा जाता है कि उस चीज़ को मान लो जो परमेश्वर ने उतारी है तो उत्तर देते हैं कि हम तो उसे ही मानते हैं जो हम पर उतरा है और इस प्रकार जो कुछ उसके अतिरिक्त है, उसको स्पष्टतः नकार देते हैं, यद्यपि वही सत्य है, उन भविष्यवाणियों के ठीक अनुरूप जो इनके यहाँ उपलब्ध हैं। इनसे पूछो, (वह मार्गदर्शन जो तुम पर उतरा है), यदि तुम (उसके) मानने वाले हो तो इससे पहले फिर परमेश्वर के (उन) नबियों की हत्या क्यों करते रहे हो (जो तुम्हारी ओर आए)? और वस्तुतः मूसा तुम्हारे पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आया, फिर उसकी अनुपस्थिति में तुमने बछड़े को उपास्य बना लिया और उस समय तुम बड़ा अन्याय कर रहे थे।

وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍ وَٱسْمَعُوا۟ ۖ قَالُوا۟ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَأُشْرِبُوا۟ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْ ۚ قُلْ بِئْسَمَا يَأْمُرُكُم بِهِۦٓ إِيمَـٰنُكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿93﴾

और याद करो, जब हमने तुमसे वचन लिया और (इसके लिए) तूर पर्वत को तुम पर उठा दिया और आदेश दिया कि यह जो कुछ हमने तुम्हें दिया है, इसे दृढ़ता से पकड़ो, और सुनो (और मानो) तो (तुम्हारे पूर्वजों ने जो चाल-चलन उसके साथ अपनाया, उसने बता दिया कि) उन्होंने (जैसे उस समय यही) कहा कि हमने सुना और नहीं माना। और उनके इस कुफ़्र के कारण वह बछड़ा उनके दिलों में बसा दिया गया। इनसे पूछो, यदि तुम मानने वाले हो तो कैसी बुरी हैं यह बातें जो तुम्हारा यह ईमान तुम्हें सिखाता है!1

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  1. अर्थात उसका प्रेम बसा दिया गया कि उसे इष्ट और उपास्य बनाकर उसकी उपासना करें। ↩
قُلْ إِن كَانَتْ لَكُمُ ٱلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ عِندَ ٱللَّهِ خَالِصَةً مِّن دُونِ ٱلنَّاسِ فَتَمَنَّوُا۟ ٱلْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿94﴾ وَلَن يَتَمَنَّوْهُ أَبَدًۢا بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿95﴾

इनसे कहो, यदि परलोक का घर परमेश्वर के पास, सब लोगों को छोड़ कर केवल तुम्हारे लिए आरक्षित है तो मृत्यु की कामना करो, यदि तुम (अपने इस दावे में) सच्चे हो, और (तुम देखोगे कि) अपने हाथों की जो कमाई ये आगे भेज चुके हैं, उसके कारण ये कभी इसकी कामना नहीं करेंगे और वस्तुतः परमेश्वर इन अत्याचारियों को भलीभांति जानता है।

وَلَتَجِدَنَّهُمْ أَحْرَصَ ٱلنَّاسِ عَلَىٰ حَيَوٰةٍ وَمِنَ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ ۚ يَوَدُّ أَحَدُهُمْ لَوْ يُعَمَّرُ أَلْفَ سَنَةٍ وَمَا هُوَ بِمُزَحْزِحِهِۦ مِنَ ٱلْعَذَابِ أَن يُعَمَّرَ ۗ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِمَا يَعْمَلُونَ ﴿96﴾

और इन्हें तुम सबसे बढ़कर जीने का लोभी पाओगे, और (इतना अधिक कि) उन लोगों से भी बढ़कर जिन्होंने शिर्क को अपना धर्म बनाया है। इनमें से हर एक यह चाहता है कि काश, वह हज़ार वर्ष जीता रहे, यद्यपि यदि यह आयु भी उसे मिल जाए तो (इससे) वह अपने आप को परमेश्वर के दण्ड से बचा नहीं सकेगा। और (इसमें संदेह नहीं कि) जो कुछ ये करते हैं, परमेश्वर उसे देख रहा है।

قُلْ مَن كَانَ عَدُوًّا لِّجِبْرِيلَ فَإِنَّهُۥ نَزَّلَهُۥ عَلَىٰ قَلْبِكَ بِإِذْنِ ٱللَّهِ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ ﴿97﴾ مَن كَانَ عَدُوًّا لِّلَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَىٰلَ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَدُوٌّ لِّلْكَـٰفِرِينَ ﴿98﴾

(क़ुरआन की शत्रुता में अब ये जिबरील के भी शत्रु हो गए हैं), इनसे कह दो, जो लोग जिबरील के शत्रु हैं, वे वास्तव में परमेश्वर के शत्रु हैं, इसलिए कि उसने तो (हे पैग़ंबर), इसे परमेश्वर की अनुमति ही से तुम्हारे दिल पर उतारा है, उन भविष्यवाणियों की पुष्टि में जो इससे पूर्व की गई हैं और उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और शुभ-सूचना के तौर पर जो मानने वाले हैं। (इन्हें जानना चाहिए कि) जो परमेश्वर और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों तथा जिबरील और मीकाईल के शत्रु हैं तो परमेश्वर भी ऐसे काफ़िरों का शत्रु है।

وَلَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍ ۖ وَمَا يَكْفُرُ بِهَآ إِلَّا ٱلْفَـٰسِقُونَ ﴿99﴾ أَوَكُلَّمَا عَـٰهَدُوا۟ عَهْدًا نَّبَذَهُۥ فَرِيقٌ مِّنْهُم ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿100﴾

और, (इस क़ुरआन के रूप में, हे पैग़ंबर), हमने तुम्हारी ओर अत्यंत स्पष्ट प्रमाण उतार दिए हैं, और सत्य यह है कि उन्हें केवल इस प्रकार के अवज्ञाकारी ही नहीं मानते। क्या यही होता रहेगा कि जब ये कोई वचन बांधेंगे, इनमें से एक समूह उसे उठाकर फेंक देगा? अपितु (सत्य यह है कि) इनमें से अधिकांश तो ईमान नहीं रखते।

وَلَمَّا جَآءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ كِتَـٰبَ ٱللَّهِ وَرَآءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿101﴾ وَٱتَّبَعُوا۟ مَا تَتْلُوا۟ ٱلشَّيَـٰطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَـٰنَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَـٰنُ وَلَـٰكِنَّ ٱلشَّيَـٰطِينَ كَفَرُوا۟ يُعَلِّمُونَ ٱلنَّاسَ ٱلسِّحْرَ وَمَآ أُنزِلَ عَلَى ٱلْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَـٰرُوتَ وَمَـٰرُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَآ إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِۦ بَيْنَ ٱلْمَرْءِ وَزَوْجِهِۦ ۚ وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِۦ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا۟ لَمَنِ ٱشْتَرَىٰهُ مَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَـٰقٍ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿102﴾

और (अब भी यही हुआ है कि) जब परमेश्वर की ओर से एक पैग़ंबर उन भविष्यवाणियों के अनुकूल इनकी ओर आ गया है जो इनके पास हैं तो ये लोग जिन्हें धर्मग्रंथ दिया गया, इनमें से एक समूह ने परमेश्वर के इस ग्रंथ को इस प्रकार अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया, जैसे कि वे इसे जानते ही नहीं, और (पैग़ंबर को नुक़सान पहुंचाने के लिए) उस चीज़ के पीछे लग गए जो सुलैमान के राज्य के नाम पर शैतान पढ़ते पढ़ाते हैं। (यह उसे सुलैमान से जोड़ते हैं) यद्यपि सुलैमान ने कभी कुफ़्र नहीं किया अपितु इसी प्रकार के शैतानों ने कुफ़्र किया। वे लोगों को जादू सिखाते थे। और उस विद्या के पीछे लग गए जो बाबिल में दो फ़रिश्तों, हारूत और मारुत, पर उतारी गई थी, यद्यपि वे दोनों उस समय तक किसी को कुछ नहीं सिखाते थे, जब तक उसे बता नहीं देते कि हम तो तुम्हारे लिए केवल एक परीक्षा हैं, इसलिए तुम इस कुफ़्र में मत पड़ो। फिर भी ये उनसे वह विद्या सीखते थे जिससे पति-पत्नी में फूट डाल दें, और वास्तव में परमेश्वर की अनुमति के बिना ये उससे किसी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते थे। (ये इस बात से परिचित थे) और फिर भी वे चीज़ें सीखते थे जो इन्हें कोई लाभ नहीं देती थीं, अपितु हानि पहुंचाती थीं, यद्यपि ये जानते थे कि जो इन चीज़ों का व्यापारी है, उसके लिए फिर परलोक में कोई हिस्सा नहीं है। कैसी बुरी है वह चीज़ जिसके बदले में इन्होंने अपने प्राण भेच दिए। काश, ये जानते।1

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  1. यह जादू-टोना से पूरी तरह अलग एक विद्या थी जिसमें न परमेश्वर के सहभागी बनाने वाली कोई मिलावट थी और न इसमें शैतान और जिन्नों का कोई हस्तक्षेप था, लेकिन अपने प्रभाव के दृष्टिकोण से यह जादू ही के समान प्रभावी था। सूफ़ियों, योगियों और पीरों के यहाँ इसी के कुछ अवशेष हैं जो अब भी मिलते हैं। ↩
وَلَوْ أَنَّهُمْ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّقَوْا۟ لَمَثُوبَةٌ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ خَيْرٌ ۖ لَّوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ﴿103﴾

और यदि ये ईमान एवं संयम अपनाते तो परमेश्वर के पास जो बदला इन्हें मिलता, वह (इनके लिए) कहीं अच्छा था। काश, ये समझते।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَقُولُوا۟ رَٰعِنَا وَقُولُوا۟ ٱنظُرْنَا وَٱسْمَعُوا۟ ۗ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿104﴾ مَّا يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ وَلَا ٱلْمُشْرِكِينَ أَن يُنَزَّلَ عَلَيْكُم مِّنْ خَيْرٍ مِّن رَّبِّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ ﴿105﴾

(इनके उत्पात से बचने के लिए), हे मानने वालो, (तुम परमेश्वर के पैग़ंबर के चरणों में बैठो) तो ‘राइना’ न कहा करो, ‘उन्ज़ुर्ना’ कहा करो और जो कुछ कहा जाए, उसे ध्यान से सुनो, और इस बात को याद रखो कि इन काफ़िरों के लिए भीषण यातना है। अहल-ए-किताब हों या मुश्रिक, इनमें से जिन लोगों ने कुफ़्र किया है, वे नहीं चाहते कि तुम्हारे प्रभु की ओर से कोई भलाई तुम पर उतारी जाए। (ये मूर्ख नहीं जानते कि) परमेश्वर जिसको चाहता है, अपनी कृपा के लिए चुन लेता है, और (नहीं जानते कि) परमेश्वर बड़ी कृपा करने वाला है।

مَا نَنسَخْ مِنْ ءَايَةٍ أَوْ نُنسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍ مِّنْهَآ أَوْ مِثْلِهَآ ۗ أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿106﴾ أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ ﴿107﴾

(इन्हें आपत्ति है कि तौरात के विधान में हम कोई परिवर्तन क्यों करते हैं? इन्हें बता दो कि) हम (इस ग्रंथ की) जो आयत भी निरस्त करते हैं या उसे भुला देते हैं, (क़ुरआन में) उसकी जगह उससे उत्तम या उस जैसी कोई दूसरी ले आते हैं। क्या तुम नहीं जानते, (लोगो) कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है? क्या तुम नहीं जानते कि धरती और समस्त आकाशों का राज्य परमेश्वर ही के लिए है? (वह जिसको चाहेगा, अपनी शरीअत सौंप देगा), और (तुम यदि उसका यह निर्णय स्वीकार नहीं करते तो) परमेश्वर के अतिरिक्त तुम्हारे लिए (इस जीवन में फिर) न कोई मित्र है और न कोई सहायक।

أَمْ تُرِيدُونَ أَن تَسْـَٔلُوا۟ رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۗ وَمَن يَتَبَدَّلِ ٱلْكُفْرَ بِٱلْإِيمَـٰنِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ ﴿108﴾

(हे मानने वालो, इनके अनुसरण में), क्या तुम भी अपने रसूल से उसी प्रकार की बातें पूछना चाहते हो, जिस प्रकार की बातें इससे पहले मूसा से पूछी गई थीं? (तुम्हें मालूम होना चाहिए कि यह मानने का ढंग नहीं है) और (मालूम होना चाहिए कि) जिसने ईमान के बदले में कुफ़्र को ले लिया, वह फिर सन्मार्ग से भटक गया।

وَدَّ كَثِيرٌ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَوْ يَرُدُّونَكُم مِّنۢ بَعْدِ إِيمَـٰنِكُمْ كُفَّارًا حَسَدًا مِّنْ عِندِ أَنفُسِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَٱعْفُوا۟ وَٱصْفَحُوا۟ حَتَّىٰ يَأْتِىَ ٱللَّهُ بِأَمْرِهِۦٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿109﴾ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِندَ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿110﴾

बहुत से अहल-ए-किताब केवल अपने मन के द्वेष के कारण यह चाहते हैं कि तुम्हारे मान लेने के बाद वह फिर तुम्हें कुफ़्र की ओर पलटा दें, यद्यपि सत्य उनपर अच्छी तरह स्पष्ट हो चुका है। अतः उन्हें क्षमा करो और अनदेखा करो, यहाँ तक कि परमेश्वर अपना निर्णय घोषित कर दे। निस्संदेह, परमेश्वर प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है। और (इनके उत्पात का सामना करने के लिए) नमाज़ का प्रबंध रखो और ज़कात देते रहो, और (याद रखो कि) जो भलाई भी तुम अपने लिए आगे भेजोगे, उसे तुम परमेश्वर के पास पा लोगे। इसमें संदेह नहीं कि जो कुछ तुम कर रहे हो, परमेश्वर उसे देख रहा है।

وَقَالُوا۟ لَن يَدْخُلَ ٱلْجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ ۗ تِلْكَ أَمَانِيُّهُمْ ۗ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿111﴾ بَلَىٰ مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ فَلَهُۥٓ أَجْرُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿112﴾ وَقَالَتِ ٱلْيَهُودُ لَيْسَتِ ٱلنَّصَـٰرَىٰ عَلَىٰ شَىْءٍ وَقَالَتِ ٱلنَّصَـٰرَىٰ لَيْسَتِ ٱلْيَهُودُ عَلَىٰ شَىْءٍ وَهُمْ يَتْلُونَ ٱلْكِتَـٰبَ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْ ۚ فَٱللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ﴿113﴾

ये कहते हैं कि कोई व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकेगा, जब तक वह यहूदी या ईसाई न हो। यह इन्होंने केवल कल्पनाएँ बांध ली हैं। इनसे कहो, तुम सच्चे हो तो (इसके लिए) अपना कोई प्रमाण प्रस्तुत करो। (इनकी इस बात में कोई वास्तविकता नहीं)। हाँ, यह अवश्य है कि अपना आप जिन लोगों ने परमेश्वर को सौंप दिया, और वे अच्छे प्रकार से कर्म करने वाले हैं, उनके लिए उनका फल उनके प्रभु के पास सुरक्षित है, और उनके लिए न वहां कोई आशंका है और न वे कभी दुखी होंगे। (अपने संप्रदाय से बाहर ये किसी सत्य को नहीं मानते, इसलिए) यहूदी कहते हैं कि ईसाई आधारहीन हैं और ईसाई कहते हैं कि यहूदियों का कोई आधार नहीं, यद्यपि दोनों ईश्वरीय ग्रंथ का पाठ करते हैं। इसी प्रकार ठीक इनके जैसी बात उन लोगों ने भी कही जो (ईश्वरीय ग्रंथ का कोई) ज्ञान नहीं रखते। अतः अब परमेश्वर इनके बीच क़यामत के दिन ही इस बात का निर्णय करेगा जिसमें ये झगड़ रहे हैं।

وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن مَّنَعَ مَسَـٰجِدَ ٱللَّهِ أَن يُذْكَرَ فِيهَا ٱسْمُهُۥ وَسَعَىٰ فِى خَرَابِهَآ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ أَن يَدْخُلُوهَآ إِلَّا خَآئِفِينَ ۚ لَهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا خِزْىٌ وَلَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿114﴾ وَلِلَّهِ ٱلْمَشْرِقُ وَٱلْمَغْرِبُ ۚ فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا۟ فَثَمَّ وَجْهُ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ ﴿115﴾

(अपने इन्हीं मतभेदों के कारण ये एक दूसरे के पूजा स्थलों को वीरान करते रहे हैं)। और उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन है जो परमेश्वर के पूजा स्थलों में इस बात से रोके कि वहां उसका नाम लिया जाए और उन्हें वीरान करने का प्रयत्न करे। इनके लिए इसके अतिरिक्त कुछ उचित न था कि इन (पूजा स्थलों) में जाएं तो परमेश्वर से डरते हुए जाएं। (लेकिन इन्होंने उद्दंडता को अपनाया तो अब) इनके लिए दुनिया में भी अपमान है और क़यामत में भी एक बड़ा दण्ड इनकी प्रतीक्षा में है। (ये इस कारण हुआ कि इनमें से किसी ने पूरब को क़िब्ला बना लिया और किसी ने पश्चिम को), और वास्तव में पूरब और पश्चिम सब परमेश्वर ही के लिए हैं। अतः (परमेश्वर के आदेश अनुसार) तुम जिधर मुँह करोगे, वहीं परमेश्वर का मुख है। निस्संदेह परमेश्वर बड़ा व्यापक है, वह हर चीज़ को जानता है।

وَقَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدًا ۗ سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ بَل لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ كُلٌّ لَّهُۥ قَـٰنِتُونَ ﴿116﴾ بَدِيعُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَإِذَا قَضَىٰٓ أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ ﴿117﴾

(फिर यही नहीं, अपनी मुक्ति के ये दावेदार इतने पतित हो चुके हैं कि) उन्होंने कहा है कि परमेश्वर की संतान है। (निस्संदेह) वह पवित्र है इन बातों से, अपितु धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, उसी का है, सब उसके आज्ञाकारी हैं। धरती और समस्त आकाशों को वही अभाव से अस्तित्व में लाने वाला है और जब किसी बात का संकल्प कर लेता है तो उसके लिए इतना ही कहता हे कि हो जा तो वह हो जाती है।

وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا ٱللَّهُ أَوْ تَأْتِينَآ ءَايَةٌ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ ۘ تَشَـٰبَهَتْ قُلُوبُهُمْ ۗ قَدْ بَيَّنَّا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍ يُوقِنُونَ ﴿118﴾ إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ بَشِيرًا وَنَذِيرًا ۖ وَلَا تُسْـَٔلُ عَنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْجَحِيمِ ﴿119﴾

और इसी तरह उन लोगों ने भी कहा है जो (ईश्वरीय ग्रंथ का) ज्ञान नहीं रखते कि परमेश्वर हमसे (प्रत्यक्ष रूप से) क्यों बात नहीं करता या हमारे पास कोई स्पष्ट निशानी क्यों नहीं आती? ठीक इसी प्रकार जो लोग इनसे पहले हुए हैं, उन्होंने भी इन्हीं के जैसी बात कही थी। इन सब के दिल एक जैसे हैं। हमने अपनी निशानियाँ उन लोगों के लिए सब प्रकार से स्पष्ट कर दी हैं जो मानना चाहें, (इसलिए तुम्हारा कोई दायित्व नहीं कि इनकी चाहत के अनुसार इन्हें चमत्कार और निशानियाँ दिखाओ)। हमने तुम्हें सत्य के साथ भेजा है, (हे पैग़ंबर), शुभ सूचना देने वाला और सावधान करने वाला बनाकर, और तुम से इन नरक वासियों के बारे में कोई भी पूछताछ नहीं होगी।

وَلَن تَرْضَىٰ عَنكَ ٱلْيَهُودُ وَلَا ٱلنَّصَـٰرَىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلْهُدَىٰ ۗ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم بَعْدَ ٱلَّذِى جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ مَا لَكَ مِنَ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ ﴿120﴾

ये यहूदी और ईसाई तुमसे कभी संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक तुम इनका धर्म न अपना लो। (इसलिए) कह दो कि परमेश्वर का मार्गदर्शन ही वास्तविक मार्गदर्शन है, और (जान लो कि) यदि तुम उस ज्ञान के पश्चात जो तुम्हारे पास आ चुका है, इनकी इच्छाओं पर चले तो परमेश्वर के विरुद्ध तुम्हारा कोई मित्र और कोई सहायक न होगा।

ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَتْلُونَهُۥ حَقَّ تِلَاوَتِهِۦٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿121﴾

(तुम्हें संतुष्ट रहना चाहिए कि) वे लोग जिन्हें हमने धर्मग्रंथ सौंपा और उनका आचरण यह रहा कि वे उसको यथायोग्य पढ़ते रहे, वही इस (मार्गदर्शन) को स्वीकार करेंगे और जो इसको नकारने वाले होंगे तो वही वास्तव में घाटा उठाने वाले हैं।

يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿122﴾ وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًا لَّا تَجْزِى نَفْسٌ عَن نَّفْسٍ شَيْـًٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَـٰعَةٌ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿123﴾

हे इस्राईलियो, मेरे उस वरदान को याद करो जो मैंने तुम पर किया था और इस बात को कि मैंने तुम्हें दुनिया वालों पर श्रेष्ठता प्रदान की थी और उस दिन से डरो, जब कोई किसी के कुछ भी काम नहीं आएगा और न उससे कोई बदला स्वीकार किया जाएगा, न उसे कोई अनुशंसा लाभ- देगी और न लोगों को कोई सहायता ही मिलेगी।1

टिप्पणियाँ 1
  1. सूरह का पहला खंड आयत 121 पर समाप्त हुआ। यहाँ से दूसरा खंड लगभग उन्हीं शब्दों से शुरू हो रहा है जो पिछले खंड के प्रारंभ में हम देख चुके हैं। ↩
وَإِذِ ٱبْتَلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ رَبُّهُۥ بِكَلِمَـٰتٍ فَأَتَمَّهُنَّ ۖ قَالَ إِنِّى جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا ۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿124﴾

और याद करो, जब इब्राहीम को उसके प्रभु ने कुछ बातों में परखा तो उसने वे पूरी कर दीं, परमेश्वर ने कहा: मैंने निर्णय किया है कि तुम्हें लोगों का अग्रणी बनाऊँगा। उसने निवेदन किया: और मेरी संतान में से? कहा: मेरा यह वचन उनमें से अत्याचारियों के लिए नहीं है।

وَإِذْ جَعَلْنَا ٱلْبَيْتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَأَمْنًا وَٱتَّخِذُوا۟ مِن مَّقَامِ إِبْرَٰهِـۧمَ مُصَلًّى ۖ وَعَهِدْنَآ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِىَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلْعَـٰكِفِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ ﴿125﴾

और याद करो, जब हमने (अरब की धरती में) इस पवित्र घर को लोगों का केन्द्रीय-स्थल और उनके लिए आश्रय-स्थान निर्धारित किया और आदेश दिया कि इब्राहीम के इस निवास स्थान में नमाज़ की एक जगह बनाओ और इब्राहीम तथा इस्माईल को बाध्य किया कि मेरे इस घर को उन लोगों के लिए पवित्र रखो जो (इसमें) परिक्रमा करने, एतिकाफ़ करने और रुकू तथा सज्दा करने के लिए आएँ।

وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَـٰذَا بَلَدًا ءَامِنًا وَٱرْزُقْ أَهْلَهُۥ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ مَنْ ءَامَنَ مِنْهُم بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُۥ قَلِيلًا ثُمَّ أَضْطَرُّهُۥٓ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلنَّارِ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ ﴿126﴾

और याद करो, जब इब्राहीम ने प्रार्थना की कि हे प्रभु, इस नगर को शांति का नगर बना दे और इसके लोगों में से जो परमेश्वर तथा क़यामत को मानने वाले हों, उन्हें पैदावार की जीविका प्रदान कर। (परमेश्वर ने) कहा: और जो अविश्वासी हैं, (इन पदार्थों से) कुछ दिनों के लिए लाभ उठाने की अनुमति तो मैं उन्हें भी दूँ गा, फिर उनको नरक की यातना में पकड़ के लाऊँगा और वह अत्यंत बुरा स्थान है।

وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَٰهِـۧمُ ٱلْقَوَاعِدَ مِنَ ٱلْبَيْتِ وَإِسْمَـٰعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿127﴾

और याद करो, जब इब्राहीम तथा इस्माईल (मेरे) इस घर की नींव डाल रहे थे। (उस समय उनके होंठों पर प्रार्थना थी कि) प्रभु, तू हमारी ओर से यह प्रार्थना स्वीकार कर। इसमें संदेह नहीं कि तू ही सुनने वाला, जानने वाला है।

رَبَّنَا وَٱجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَآ أُمَّةً مُّسْلِمَةً لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿128﴾ رَبَّنَا وَٱبْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ ﴿129﴾

प्रभु, और हम दोनों को तू अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान से भी अपना एक आज्ञाकारी समुदाय उठा और हमें हमारी उपासना की विधि बता और हम पर कृपा दृष्टि कर। इसमें संदेह नहीं कि तू ही बड़ी कृपा करने वाला (और अपने भक्तों पर) दया करने वाला है। प्रभु, और उन्हीं में से तू उनके भीतर एक रसूल उठा जो तेरी आयतें उन्हें सुनाए और उन्हें क़ानून तथा हिकमत सिखाए और इस प्रकार उन्हें पावन बनाए। इस में संदेह नहीं कि तू ही बड़ा प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।

وَمَن يَرْغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبْرَٰهِـۧمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفْسَهُۥ ۚ وَلَقَدِ ٱصْطَفَيْنَـٰهُ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿130﴾ إِذْ قَالَ لَهُۥ رَبُّهُۥٓ أَسْلِمْ ۖ قَالَ أَسْلَمْتُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿131﴾

और कौन है जो इब्राहीम के धर्म से भटक जाए?  हाँ, वही जो अपने आप को मूर्खता में डाल दे। हमने उसे दुनिया में भी अपने लिए चुन लिया था, और क़यामत में भी वह सदाचारियों में से होगा। (वही इब्राहीम कि) जब उसके प्रभु ने उसे आदेश दिया कि अपने आप को सौंप दो, उसने तुरंत कहा: मैंने अपने आप को जगत-प्रभु को सौंप दिया।

وَوَصَّىٰ بِهَآ إِبْرَٰهِـۧمُ بَنِيهِ وَيَعْقُوبُ يَـٰبَنِىَّ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰ لَكُمُ ٱلدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ ﴿132﴾

और इसी धर्म का उपदेश इब्राहीम ने अपने बेटों को किया था और इसी का उपदेश याक़ूब ने किया था। (उसने कहा था कि) मेरे बच्चो, परमेश्वर ने यही धर्म तुम्हारे लिए चुन लिया है, इसलिए अब मृत्यु के समय तक तुम्हें हर हाल में मुसलमान ही रहना है।

أَمْ كُنتُمْ شُهَدَآءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ ٱلْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِنۢ بَعْدِى قَالُوا۟ نَعْبُدُ إِلَـٰهَكَ وَإِلَـٰهَ ءَابَآئِكَ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ إِلَـٰهًا وَٰحِدًا وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ ﴿133﴾

फिर क्या तुम लोग उस समय उपस्थित थे, जब याक़ूब इस दुनिया से प्रस्थान कर रहा था, उस समय जब उसने अपने बेटों से पूछा: तुम मेरे बाद किसकी उपासना करोगे? उन्होंने उत्तर दिया: हम उसी एक देवता की उपासना करेंगे जो तेरा देवता है और तेरे पूर्वजों- इब्राहीम, इस्माईल और इस्हाक़- का देवता है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं।

تِلْكَ أُمَّةٌ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿134﴾

यह एक समूह था जो चल बसा, उनका है जो उन्होंने किया और तुम्हारा है जो तुमने किया, तुमसे यह नहीं पूछा जाएगा कि वे क्या करते थे।

وَقَالُوا۟ كُونُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ تَهْتَدُوا۟ ۗ قُلْ بَلْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِـۧمَ حَنِيفًا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿135﴾ قُولُوٓا۟ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَآ أُنزِلَ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطِ وَمَآ أُوتِىَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَآ أُوتِىَ ٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ ﴿136﴾

(इनके पूर्वजों की परंपरा तो यह है) और इधर इनकी ज़िद है कि यहूदी या ईसाई बनो तो मार्गदर्शन पाओगे। इनसे कह दो, अच्छा है कि इब्राहीम का धर्म स्वीकार करो जो (अपने प्रभु के लिए) पूर्णतः एकाग्र था और अनेक देवताओं की उपासना करने वालों में से नहीं था। (हे मानने वालो), इनसे कह दो कि हमने परमेश्वर को माना है और उस चीज़ को माना है जो हमारी ओर उतारी गई है और जो इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़ और याक़ूब और उनके वंश की ओर उतारी गई और जो मूसा तथा ईसा और अन्य सब नबियों को उनके प्रभु की ओर से दी गई। हम इनमें से किसी के बीच कोई भेद-भाव नहीं करते। (ये सब परमेश्वर के पैग़ंबर हैं) और हम उसी के आज्ञाकारी हैं।

فَإِنْ ءَامَنُوا۟ بِمِثْلِ مَآ ءَامَنتُم بِهِۦ فَقَدِ ٱهْتَدَوا۟ ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا هُمْ فِى شِقَاقٍ ۖ فَسَيَكْفِيكَهُمُ ٱللَّهُ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿137﴾

फिर यदि वे इस प्रकार मान लें, जिस प्रकार तुमने माना है तो उचित मार्ग पा गए और यदि विमुख हो जाएँ तो वही ज़िद पर हैं। अतः इनके विरुद्ध, (हे पैग़ंबर), परमेश्वर तुम्हारे लिए पर्याप्त है, और वह सुनने वाला है, हर चीज़ से अवगत है।

صِبْغَةَ ٱللَّهِ ۖ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ ٱللَّهِ صِبْغَةً ۖ وَنَحْنُ لَهُۥ عَـٰبِدُونَ ﴿138﴾ قُلْ أَتُحَآجُّونَنَا فِى ٱللَّهِ وَهُوَ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ وَلَنَآ أَعْمَـٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَـٰلُكُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُخْلِصُونَ ﴿139﴾

(इनसे कह दो, तुम) परमेश्वर का यह रंग अपनाओ और परमेश्वर के रंग से किसका रंग अच्छा है और (कह दो कि) हम तो (हर हाल में) उसी की भक्ति करते हैं। कह दो, क्या तुम परमेश्वर के बारे में हमसे झगड़ा करते हो, यद्यपि वही हमारा प्रभु है और तुम्हारा भी? और (यदि ऐसा नहीं, तो फिर) हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म और हम तो केवल उसी के हैं।

أَمْ تَقُولُونَ إِنَّ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطَ كَانُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ ۗ قُلْ ءَأَنتُمْ أَعْلَمُ أَمِ ٱللَّهُ ۗ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَـٰدَةً عِندَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿140﴾

क्या तुम कहते हो कि इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब और उनके वंश के लोग यहूदी या ईसाई थे? इनसे पूछो, तुम अधिक जानते हो या परमेश्वर? (हाय), उन लोगों से अधिक अत्याचारी कौन हो सकता है जिनके पास परमेश्वर की ओर से कोई गवाही हो और वे उसे छिपा लें। और सत्य यह है कि परमेश्वर उन चीज़ों से अंजान नहीं है जो तुम कर रहे हो।

تِلْكَ أُمَّةٌ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿141﴾

यह एक समूह था जो बीत गया, उनका है जो उन्होंने किया और तुम्हारा है जो तुमने किया, तुमसे यह नहीं पूछा जाएगा कि वे क्या करते थे।

سَيَقُولُ ٱلسُّفَهَآءُ مِنَ ٱلنَّاسِ مَا وَلَّىٰهُمْ عَن قِبْلَتِهِمُ ٱلَّتِى كَانُوا۟ عَلَيْهَا ۚ قُل لِّلَّهِ ٱلْمَشْرِقُ وَٱلْمَغْرِبُ ۚ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿142﴾ وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَـٰكُمْ أُمَّةً وَسَطًا لِّتَكُونُوا۟ شُهَدَآءَ عَلَى ٱلنَّاسِ وَيَكُونَ ٱلرَّسُولُ عَلَيْكُمْ شَهِيدًا ۗ وَمَا جَعَلْنَا ٱلْقِبْلَةَ ٱلَّتِى كُنتَ عَلَيْهَآ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يَتَّبِعُ ٱلرَّسُولَ مِمَّن يَنقَلِبُ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ ۚ وَإِن كَانَتْ لَكَبِيرَةً إِلَّا عَلَى ٱلَّذِينَ هَدَى ٱللَّهُ ۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِيعَ إِيمَـٰنَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِٱلنَّاسِ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ ﴿143﴾

(इब्राहीम की बनाई हुई मस्जिद को, हे पैग़ंबर, हमने तुम्हारे लिए क़िब्ला बनाने का निर्णय किया है तो) अब इन लोगों में से जो मूर्ख हैं, वे कहेंगे: इन्हें किस बात ने इनके उस क़िब्ले से फेर दिया जिस पर ये पहले थे? इनसे कह दो, पूरब और पश्चिम, सब परमेश्वर ही के हैं, वह जिसे चाहता है, (इस पक्षपात से निकाल कर) सीधा मार्ग दिखा देता है। (हमने यही किया है) और (जिस प्रकार मस्जिद-ए-हराम को तुम्हारा क़िब्ला बनाया है), उसी प्रकार हमने तुम्हें भी एक मध्यवर्ती समुदाय बना दिया है ताकि तुम दुनिया के सब लोगों पर (सत्य के) साक्षी बनो और परमेश्वर का रसूल तुम पर यह गवाही दे। और इससे पहले, (हे पैग़ंबर), जिस क़िब्ले पर तुम थे, उसे तो हमने केवल यह देखने के लिए निर्धारित किया था कि कौन रसूल का आज्ञा-पालन करता है और कौन उलटे पाँव फिर जाता है। इसमें संदेह नहीं कि यह एक भारी बात थी, परंतु उनके लिए नहीं, जिनका मार्गदर्शन परमेश्वर करे। और परमेश्वर ऐसा नहीं है कि (इस प्रकार की परीक्षा से वह) तुम लोगों के ईमान को निरर्थक करना चाहे। परमेश्वर तो लोगों के लिए अत्यंत करुणामय है, सर्वथा दया है।

قَدْ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِى ٱلسَّمَآءِ ۖ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَىٰهَا ۚ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۥ ۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ لَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ ﴿144﴾ وَلَئِنْ أَتَيْتَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ بِكُلِّ ءَايَةٍ مَّا تَبِعُوا۟ قِبْلَتَكَ ۚ وَمَآ أَنتَ بِتَابِعٍ قِبْلَتَهُمْ ۚ وَمَا بَعْضُهُم بِتَابِعٍ قِبْلَةَ بَعْضٍ ۚ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ إِنَّكَ إِذًا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿145﴾ ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْرِفُونَهُۥ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَآءَهُمْ ۖ وَإِنَّ فَرِيقًا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ ٱلْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿146﴾ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ ﴿147﴾

तुम्हारे चेहरे का बार-बार आकाश की ओर उठना हम देखते रहे हैं, (हे पैग़ंबर), सो हमने निर्णय कर लिया है कि तुम्हें उस क़िब्ले के ओर फेर दें जो तुमको पसंद है। अतः अब अपना चेहरा मस्जिद-ए-हराम की ओर फेर दो और तुम लोग जहाँ कहीं भी हो, (नमाज़ में) अपना चेहरा उसी ओर करो। ये लोग जिन्हें धर्माग्रंथ दिया गया था, जानते हैं कि उनके प्रभु की ओर से यही सत्य है, (लेकिन तब भी नकार रहे हैं), और जो कुछ ये कर रहे हैं, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है। और इन अहल-ए-किताब के सामने, (हे पैग़ंबर), तुम यदि सब प्रकार की निशानियाँ भी प्रस्तुत कर दो तो ये तुम्हारे क़िब्ले का अनुपालन नहीं करेंगे। और (इसके साथ यह भी सच है कि जो ज्ञान तुम्हारे पास आ चुका है, इसके आधार पर) तुम भी इनका क़िब्ला नहीं मान सकते और (इनकी यह हठ केवल तुम्हारे साथ नहीं है, सत्य यह है कि) इनमें से कोई समुदाय भी दूसरे का क़िब्ला मानने के लिए तैयार नहीं है। (इसलिए इनको कोई बात यदि संतुष्ट कर सकती है तो यही कि तुम इनका क़िब्ला मान लो), लेकिन उस ज्ञान के बाद जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुम यदि इनकी इच्छाओं के पीछे चलते हो तो तुम भी अवश्य इन्हीं अत्याचारियों में से हो जाओगे। (यह सच है कि) जिनको हमने धर्मग्रंथ दिया है, वे इस चीज़ को ऐसा पहचानते हैं, जैसा अपने बेटों को पहचानते हैं। और इनमें यह एक समूह है जो जानबूझकर सत्य को छिपाता है। (तुम पर स्पष्ट हो कि) तुम्हारे प्रभु की ओर से यही सत्य है, इसलिए (इसके विषय में) तुम को कदापि संदेह में नहीं पड़ना चाहिए।

وَلِكُلٍّ وِجْهَةٌ هُوَ مُوَلِّيهَا ۖ فَٱسْتَبِقُوا۟ ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ أَيْنَ مَا تَكُونُوا۟ يَأْتِ بِكُمُ ٱللَّهُ جَمِيعًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿148﴾

और इनमें से हर एक ने (अपने लिए क़िब्ले की) एक दिशा निर्धारित कर रखी है, वह उसी ओर अपना चेहरा करता है। इसलिए (तुम लोग इन्हें छोड़ो और) पुण्य के रास्ते में आगे बढ़ने का प्रयत्न करो। तुम जहाँ भी होगे, परमेश्वर तुम सब को (निर्णय के लिए) इकट्ठा करेगा। परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।

وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۖ وَإِنَّهُۥ لَلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿149﴾

(इन्हें छोड़ो, हे पैग़ंबर) और (यात्रा में भी प्रायः) जहाँ से निकलो, (नमाज़ के लिए) अपना चेहरा मस्जिद-ए-हराम ही की ओर करो। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे प्रभु की ओर से यही सत्य है, और (याद रखो कि) जो कुछ तुम लोग करते हो, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है।

وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۥ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيْكُمْ حُجَّةٌ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْهُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَٱخْشَوْنِى وَلِأُتِمَّ نِعْمَتِى عَلَيْكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ﴿150﴾ كَمَآ أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًا مِّنكُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِنَا وَيُزَكِّيكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ ﴿151﴾ فَٱذْكُرُونِىٓ أَذْكُرْكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِى وَلَا تَكْفُرُونِ ﴿152﴾

और (एक बार फिर सुनो कि यात्रा में भी प्रायः) जहाँ से निकलो, (नमाज़ के लिए) अपना चेहरा मस्जिद-ए-हराम ही की ओर करो, और (सामान्य परिस्थितियों में भी) तुम लोग जहाँ कहीं हो, अपने चेहरे इसी (मस्जिद) की ओर करो, ताकि इन लोगों को तुम्हारे विरुद्ध तर्क-वितर्क का कोई मुद्दा न मिले – हाँ इनमें से जो अत्याचारी हैं, उनका मुँह तो कोई चीज़ भी बंद नहीं कर सकती, अतः तुम उनसे न डरो, अपितु मुझसे डरो ---- और इसलिए कि मैं तुम पर अपना वरदान पूरा करूँ, और इसलिए कि तुम उचित मार्ग पा लो। इसलिए (यही उद्देश्य हैं जिनके लिए) हमने एक रसूल तुम में से तुम्हारे अंदर भेजा है जो हमारी आयतें तुम्हें सुनाता है और तुम्हारा शुद्धिकरण करता है और इसके लिए तुम्हें क़ानून और हिकमत की शिक्षा देता है और इस प्रकार वे चीज़ें तुम्हें सिखाता है जो तुम नहीं जानते थे। इसलिए तुम मुझे याद रखो, मैं तुम्हें याद रखूँगा और मेरे आभारी बनकर रहो, मेरी अकृतज्ञता न करो।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱسْتَعِينُوا۟ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿153﴾ وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَن يُقْتَلُ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَمْوَٰتٌۢ ۚ بَلْ أَحْيَآءٌ وَلَـٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ ﴿154﴾ وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَىْءٍ مِّنَ ٱلْخَوْفِ وَٱلْجُوعِ وَنَقْصٍ مِّنَ ٱلْأَمْوَٰلِ وَٱلْأَنفُسِ وَٱلثَّمَرَٰتِ ۗ وَبَشِّرِ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿155﴾ ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَـٰبَتْهُم مُّصِيبَةٌ قَالُوٓا۟ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ ﴿156﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَٰتٌ مِّن رَّبِّهِمْ وَرَحْمَةٌ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُهْتَدُونَ ﴿157﴾

हे मानने वालो, (यह वरदान तुम्हें प्राप्त हुआ है तो अब तुम्हारे विरोधियों की ओर से जो कठिनाइयाँ भी सामने आएँ, उनमें) दृढ़संकल्प और नमाज़ से सहायता चाहो। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर उनके साथ है जो (कठिनाइयों के विरुद्ध) दृढ़संकल्प रहने वाले हों। और जो लोग परमेश्वर के (इस) मार्ग में मारे जाएँ, उन्हें यह न कहो कि मुर्दा हैं। वे मुर्दा नहीं, अपितु जीवित हैं, लेकिन तुम (उस जीवन की वास्तविकता) नहीं समझते। हम (इस मार्ग में) अवश्य तुम्हें कुछ भय, कुछ भूख और कुछ प्राण तथा संपत्ति और कुछ फलों की क्षति से जाँचेंगे। और (इसमें) जो लोग दृढ़संकल्प होंगे, (हे पैग़ंबर), उन्हें (इस लोक और परलोक, दोनों में सफलता की) शुभ सूचना दो। (वही) जिन्हें कोई कष्ट पहुंचे तो कहें कि निस्संदेह, हम परमेश्वर ही के हैं और हमें (एक दिन) उसी की ओर पलटकर जाना है। यही वे लोग हैं जिनपर उनके प्रभु की कृपायें और उसकी दया होगी और यही हैं जो उसके मार्गदर्शन के भागी होने वाले हैं।

إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ ٱلْبَيْتَ أَوِ ٱعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ ﴿158﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَآ أَنزَلْنَا مِنَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلْهُدَىٰ مِنۢ بَعْدِ مَا بَيَّنَّـٰهُ لِلنَّاسِ فِى ٱلْكِتَـٰبِ ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَلْعَنُهُمُ ٱللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ ٱللَّـٰعِنُونَ ﴿159﴾ إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ وَأَصْلَحُوا۟ وَبَيَّنُوا۟ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنَا ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ﴿160﴾

(बैत-उल्-हराम ही की तरह सफ़ा और मर्वह की सच्चाई को भी इन यहूदियों ने सदा से छिपाने का प्रयास किया है। इसलिए क़िब्ला-परिवर्तन के इस अवसर पर यह बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि) सफ़ा और मर्वह निस्संदेह परमेश्वर के प्रतीकों में से हैं। इसलिए वे लोग जो इस घर का हज्ज या उम्रह करने के लिए आएँ, उनपर कोई दोष नहीं है यदि वे इन दोनों की परिक्रमा भी कर लें, (बल्कि यह एक पुण्य का काम है) और जिसने स्वेच्छा से पुण्य का कोई काम किया तो परमेश्वर उसे स्वीकार करने वाला है, उससे पूरी तरह अवगत है। (इस विषय में) जो तथ्य हमने उतारे और जो मार्गदर्शन भेजा था, उसे जो लोग छिपाते हैं, भले ही हमने इन लोगों के लिए अपने धर्मग्रंथ में उसका स्पष्टता पूर्वक वर्णन कर दिया था, निस्संदेह वही हैं जिन्हें परमेश्वर अभिशाप देता है और अभिशाप देने वाले भी जिन्हें अभिशाप देंगे। किंतु, इनमें से जो पश्चाताप करें और (अपने इस आचरण को) सुधारें और (जो कुछ छिपाते थे, उसे) खुलकर बता दें तो मैं अपनी दया से उनका पश्चाताप स्वीकार करूंगा और सत्य यह है कि मैं पश्चाताप को अत्यंत स्वीकार करने वाला हूँ, मेरी कृपा शाश्वत है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَمَاتُوا۟ وَهُمْ كُفَّارٌ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَيْهِمْ لَعْنَةُ ٱللَّهِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ ﴿161﴾ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ﴿162﴾

इसके विपरीत, जो नकारने पर जमे रहे, और उनकी मृत्यु भी इसी नकारने की अवस्था में हुई, निस्संदेह वही हैं जिनपर परमेश्वर और उसके फ़रिश्तों और सब लोगों का अभिशाप है। वे उसमें सदा रहेंगे, न तो उनका दण्ड ही हल्का किया जाएगा और न उन्हें कोई छूट दी जाएगी।

وَإِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌ وَٰحِدٌ ۖ لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلرَّحِيمُ ﴿163﴾ إِنَّ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَـٰفِ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ وَٱلْفُلْكِ ٱلَّتِى تَجْرِى فِى ٱلْبَحْرِ بِمَا يَنفَعُ ٱلنَّاسَ وَمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن مَّآءٍ فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَآبَّةٍ وَتَصْرِيفِ ٱلرِّيَـٰحِ وَٱلسَّحَابِ ٱلْمُسَخَّرِ بَيْنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ ﴿164﴾

(हे मानने वालो, इन्हें निर्णय करने दो) और (इस बात की परवाह किए बिना तुम अब यह तथ्य समझ लो कि) तुम्हारा उपास्य एक ही उपास्य है, उसके अतिरिक्त कोई उपासना योग्य नहीं है, वह सर्वथा दया है, उसकी कृपा शाश्वत है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि समस्त आकाशों और धरती के निर्माण में, और रात और दिन के बदल कर आने में, और लोगों के लिए समुद्र में लाभदायक सामग्री ले कर चलती हुई नौकाओं में,  और उस पानी में जो परमेश्वर ने आकाश से उतारा है, फिर उससे धरती को उसकी मृत्यु के बाद जीवित किया है और उसमें सभी प्रकार के प्राणी फैलाए हैं — और हवाओं के फेरने में, और आकाश और पृथ्वी के मध्य आज्ञाकारी बादलों में, (इस सत्य को समझने के लिए) कई निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. आयत 162 पर इस सूरह का दूसरा खंड समाप्त हुआ। अब यहाँ से तीसरा खंड शुरू हो रहा है। ↩
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَتَّخِذُ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَندَادًا يُحِبُّونَهُمْ كَحُبِّ ٱللَّهِ ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَشَدُّ حُبًّا لِّلَّهِ ۗ وَلَوْ يَرَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ إِذْ يَرَوْنَ ٱلْعَذَابَ أَنَّ ٱلْقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا وَأَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعَذَابِ ﴿165﴾

और (धरती और समस्त आकाशों की इन निशानियों के होते हुए) कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दूसरों को परमेश्वर के बराबर बनाते हैं। वे उनसे उसी प्रकार प्रेम करते हैं, जैसे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, जबकि मानने वालों को तो सर्वाधिक प्रेम (अपने) परमेश्वर से होता है। और यदि ये दुष्ट उस घड़ी को देखें, जब ये दण्ड देखेंगे (तो इनपर यह सत्य खुल जाएगा) कि शक्ति और अधिकार, सब परमेश्वर ही का है और यह कि (इस प्रकार के लोगों को) परमेश्वर अत्यंत कठोर यातना देने वाला है।

إِذْ تَبَرَّأَ ٱلَّذِينَ ٱتُّبِعُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوا۟ وَرَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ وَتَقَطَّعَتْ بِهِمُ ٱلْأَسْبَابُ ﴿166﴾ وَقَالَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوا۟ لَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةً فَنَتَبَرَّأَ مِنْهُمْ كَمَا تَبَرَّءُوا۟ مِنَّا ۗ كَذَٰلِكَ يُرِيهِمُ ٱللَّهُ أَعْمَـٰلَهُمْ حَسَرَٰتٍ عَلَيْهِمْ ۖ وَمَا هُم بِخَـٰرِجِينَ مِنَ ٱلنَّارِ ﴿167﴾

उस समय जब वे लोग जिनका अनुसरण किया गया, अपने अनुयायियों से विरक्ति प्रकट करेंगे और दण्ड भोगेंगे और उनके संबंध अचानक टूट जाएँगे और उनके अनुयायी कहेंगे कि काश, हमें एक बार फिर दुनिया में जाने का अवसर मिले तो हम भी इनसे विरक्ति प्रकट करें, जिस प्रकार उन्होंने हमसे विरक्ति प्रकट की है। इस प्रकार परमेश्वर उनके कर्मों को उनके लिए सर्वथा निराशा बनाकर उन्हें दिखाएगा और नरक से निकलने के लिए वे कोई मार्ग नहीं पा सकेंगे।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ كُلُوا۟ مِمَّا فِى ٱلْأَرْضِ حَلَـٰلًا طَيِّبًا وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴿168﴾ إِنَّمَا يَأْمُرُكُم بِٱلسُّوٓءِ وَٱلْفَحْشَآءِ وَأَن تَقُولُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿169﴾

लोगो, (अपने इन नेताओं के बनाए हुए अंधविश्वासों के अंतर्गत तुमने जो वैध और अवैध की धारणाएँ बनाई हैं, वे सब मिथ्या हैं, इसलिए) धरती की चीज़ों में से जो वैध तथा पवित्र हैं, उन्हें खाओ और शैतान के साथ-साथ न चलो। वह तुम्हारा खुला शत्रु है। वह तो यही करेगा कि तुम्हें पाप और निर्लज्जता की प्रेरणा दे और इसकी प्रेरणा दे कि तुम वे बातें परमेश्वर के नाम लगाओ जो तुम नहीं जानते।

وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ بَلْ نَتَّبِعُ مَآ أَلْفَيْنَا عَلَيْهِ ءَابَآءَنَآ ۗ أَوَلَوْ كَانَ ءَابَآؤُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ شَيْـًٔا وَلَا يَهْتَدُونَ ﴿170﴾

और जब इन्हें बुलाया जाता है कि (अपनी इन बातों को छोड़कर) उस चीज़ का अनुसरण करो जो परमेश्वर ने उतारी है तो कहते हैं कि नहीं, अपितु हम तो उसी मार्ग पर चलेंगे जिस पर हमने अपने पूर्वजों को चलते पाया है। क्या उस स्थिति में भी कि यदि इनके पूर्वजों ने अपनी बुद्धि से कुछ भी काम न लिया हो और न सन्मार्ग पाया हो?

وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ كَمَثَلِ ٱلَّذِى يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ إِلَّا دُعَآءً وَنِدَآءً ۚ صُمٌّۢ بُكْمٌ عُمْىٌ فَهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ﴿171﴾

और सत्य यह है कि ये लोग जिन्होंने (परमेश्वर के बताए हुए मार्ग पर चलने को इस प्रकार) नकार दिया है, इनका उदाहरण ऐसा है, जैसे कोई व्यक्ति उन चीज़ों को पुकारे जो पुकारने और चिल्लाने के अतिरिक्त कुछ नहीं सुनती हों। ये बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, इसलिए ये कुछ नहीं समझते।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِلَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ ﴿172﴾ إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ ٱلْمَيْتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحْمَ ٱلْخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ بِهِۦ لِغَيْرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿173﴾

हे मानने वालो, (यदि ये धर्म में मिलाई हुई नई प्रथाओं को नहीं छोड़ते तो इन्हें इनकी दशा में रहने दो, और) जो निर्मल चीज़ें हमने तुम्हें प्रदान की हैं, उन्हें (बिना किसी संकोच के) खाओ और परमेश्वर ही के आभारी बनो, यदि तुम केवल उसी की उपासना करने वाले हो। उसने तो तुम्हारे लिए केवल मृत-पशु और खून और सूअर का मांस और परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी के नाम का ज़बीहा अवैध किया है। फिर भी जो विवश हो जाए, इस प्रकार कि न चाहने वाला हो, न सीमा तोड़ने वाला तो उस पर कोई पाप नहीं। परमेश्वर अवश्य क्षमा करने वाला है, वह सर्वथा दया है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात उन चीज़ों में से अवैध (हराम) किया है जिन्हें लोग शुद्ध चीज़ें (तय्यिबात) समझ कर खा सकते थे। ↩
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَيَشْتَرُونَ بِهِۦ ثَمَنًا قَلِيلًا ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِى بُطُونِهِمْ إِلَّا ٱلنَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿174﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلضَّلَـٰلَةَ بِٱلْهُدَىٰ وَٱلْعَذَابَ بِٱلْمَغْفِرَةِ ۚ فَمَآ أَصْبَرَهُمْ عَلَى ٱلنَّارِ ﴿175﴾

(ये अहल-ए-किताब तो जानते थे कि यही सत्य है, परंतु इन्होंने इसे छिपाया)। सत्य यह है कि जो लोग उस विधान को छिपाते हैं जो परमेश्वर ने उतारा है और उसके बदले में (दुनिया की) बहुत थोड़ी धनराशि स्वीकार कर लेते हैं, वे अपने पेट में केवल नरक की आग भरते हैं। क़यामत के दिन परमेश्वर न उनसे बात करेगा, न उनका शुद्धिकरण करेगा और उनके लिए वहाँ एक भीषण दण्ड निश्चित है। यही लोग हैं जिन्होंने सन्मार्ग के बदले पथभ्रष्टता और क्षमा के बदले यातना का सौदा किया है। अतः ये कितने दुस्साहसी हैं नरक को सहने के विषय में!

ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ نَزَّلَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ ۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ ٱخْتَلَفُوا۟ فِى ٱلْكِتَـٰبِ لَفِى شِقَاقٍۭ بَعِيدٍ ﴿176﴾

यह इस कारण होगा कि परमेश्वर ने अपना यह धर्मग्रंथ निर्णायक सत्य के साथ उतारा है, परंतु ये लोग जिन्होंने इस धर्मग्रंथ के विषय में मतभेद किया है, ये अपनी ज़िद में बहुत दूर निकल गए हैं।

لَّيْسَ ٱلْبِرَّ أَن تُوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ قِبَلَ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ وَلَـٰكِنَّ ٱلْبِرَّ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلْكِتَـٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ وَءَاتَى ٱلْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِۦ ذَوِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينَ وَٱبْنَ ٱلسَّبِيلِ وَٱلسَّآئِلِينَ وَفِى ٱلرِّقَابِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَـٰهَدُوا۟ ۖ وَٱلصَّـٰبِرِينَ فِى ٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ وَحِينَ ٱلْبَأْسِ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُتَّقُونَ ﴿177﴾

(ये समझते हैं कि परमेश्वर के प्रति यथायोग्य निष्ठा का कर्तव्य धर्म की कुछ प्रथाएँ पूरी करने से पूरा हो जाएगा। इन्हें जानना चाहिए कि) परमेश्वर के प्रति निष्ठा केवल यह नहीं कि तुम ने (नमाज़ में) अपना चेहरा पूरब या पश्चिम की ओर कर लिया, अपितु निष्ठा तो उनकी निष्ठा है जो पूरे दिल से परमेश्वर को मानें और क़यामत के दिन को मानें और परमेश्वर के फ़रिश्तों को मानें और उसके ग्रन्थों को मानें और उसके नबियों को मानें और धन से प्रेम होते हुए उसे सगे-संबंधियों, अनाथों, निर्धन व्यक्तियों, यात्रियों तथा मांगने वालों पर और गुलामों की मुक्ति के लिए ख़र्च करें, और नमाज़ का प्रबंध करें और ज़कात दें। और निष्ठा तो उनकी निष्ठा है कि जब प्रतिज्ञा करें तो अपनी इस प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले हों और विशेषतः उनकी जो अभाव और बीमारी में और युद्ध के अवसर पर दृढ़संकल्प रहने वाले हों। यही हैं जो (परमेश्वर के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा में) सच्चे हैं और यही हैं जो वास्तव में आत्म-संयम रखने वाले हैं।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِصَاصُ فِى ٱلْقَتْلَى ۖ ٱلْحُرُّ بِٱلْحُرِّ وَٱلْعَبْدُ بِٱلْعَبْدِ وَٱلْأُنثَىٰ بِٱلْأُنثَىٰ ۚ فَمَنْ عُفِىَ لَهُۥ مِنْ أَخِيهِ شَىْءٌ فَٱتِّبَاعٌۢ بِٱلْمَعْرُوفِ وَأَدَآءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَـٰنٍ ۗ ذَٰلِكَ تَخْفِيفٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ ۗ فَمَنِ ٱعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُۥ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿178﴾ وَلَكُمْ فِى ٱلْقِصَاصِ حَيَوٰةٌ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿179﴾

हे मानने वालो, (तुम में से) जिन लोगों की हत्या कर दी जाए, उनके मुक़द्दमों में क़िसास तुमपर अनिवार्य किया गया है। इस प्रकार कि हत्यारा आज़ाद हो तो उसके बदले में वही आज़ाद, ग़ुलाम हो तो उसके बदले में वही ग़ुलाम, स्त्री हो तो उसके बदले में वही स्त्री। फिर जिसके लिए उसके भाई की ओर से कुछ छूट दी जाए (तो उसको तुम स्वीकार कर सकते हो, परंतु यह स्वीकार कर ली जाए) तो सामान्य नियम अनुसार उसका पालन किया जाएगा और जो कुछ भी अर्थदण्ड हो, वह भले तरीके से उसे दे दिया जाएगा। यह तुम्हारे प्रभु की ओर से एक प्रकार की छूट और तुम पर उसकी कृपा है। फिर इसके बाद जो अत्याचार करे तो उसके लिए (क़यामत में) कष्टदायक दण्ड है — और तुम्हारे लिए क़िसास में जीवन है, बुद्धिजीवियो, ताकि तुम परमेश्वर की मर्यादा का पालन करते रहो।

كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ ٱلْمَوْتُ إِن تَرَكَ خَيْرًا ٱلْوَصِيَّةُ لِلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُتَّقِينَ ﴿180﴾ فَمَنۢ بَدَّلَهُۥ بَعْدَ مَا سَمِعَهُۥ فَإِنَّمَآ إِثْمُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿181﴾ فَمَنْ خَافَ مِن مُّوصٍ جَنَفًا أَوْ إِثْمًا فَأَصْلَحَ بَيْنَهُمْ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿182﴾

(इसी प्रकार धन के विवादों से बचने के लिए) तुम पर अनिवार्य किया गया है कि तुम में से जब किसी की मृत्यु का समय आ जाए और वह कुछ संपत्ति छोड़ रहा हो तो माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए विधि अनुसार वसीयत करे। परमेश्वर से डरने वाले इसके बाध्य हैं। फिर जो इस वसीयत को इसके सुनने के बाद बदल डाले तो उसका पाप उन बदलने वालों ही पर होगा। (उन्हें याद रखना चाहिए कि) परमेश्वर अवश्य सब कुछ सुनता और जानता है। अपितु, जिसको किसी वसीयत करने वाले की ओर से पक्षपात या अधिकार हनन का डर हो और वह उनके बीच समझौता करा दे तो उसपर कोई पाप नहीं है। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ﴿183﴾ أَيَّامًا مَّعْدُودَٰتٍ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَهُوَ خَيْرٌ لَّهُۥ ۚ وَأَن تَصُومُوا۟ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿184﴾

(यह परमेश्वर की मर्यादाएँ हैं और इनका पालन वही कर सकते हैं जो परमेश्वर से डरने वाले हों, इसलिए) हे मानने वालो, उपवास तुम्हारे लिए अनिवार्य किया गया है, जिस प्रकार तुमसे पूर्व के लोगों के लिए अनिवार्य किया गया था ताकि तुम परमेश्वर से डरने वाले बन जाओ। यह गिनती के कुछ दिन हैं। इसपर भी जो तुम में से अस्वस्थ हो या यात्रा में हो तो वह अन्य दिनों में यह गिनती पूरी कर ले। और जो इसका सामर्थ्य रखते हों कि एक निर्धन को भोजन करा दें तो उनपर हर उपवास का बदला एक निर्धन का भोजन है। फिर जो स्वेच्छा से कोई पुण्य करे तो उसके लिए अच्छा है, और उपवास रख लो तो यह तुम्हारे लिए और भी अच्छा है, यदि तुम समझ रखते हो।

شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَـٰتٍ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا۟ ٱلْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا۟ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ﴿185﴾

रमज़ान का महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, लोगों के लिए परिपूर्ण मार्गदर्शन बनाकर और अत्यंत स्पष्ट प्रमाणों के रूप में जो (अपने स्वरूप अनुसार) मार्गदर्शन भी हैं और सत्य-असत्य का निर्णय भी। अतः तुम में से जो व्यक्ति इस महीने में उपस्थित हो, उसे चाहिए कि इसका उपवास रखे। और जो अस्वस्थ हो या यात्रा में हो तो वह अन्य दिनों में यह गिनती पूरी कर ले। (यह छूट इसलिए दी गई है कि) परमेश्वर तुम्हारे लिए सुविधा चाहता है और नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ कठोरता करे। और (फ़िद्ये की अनुमति) इसलिए (समाप्त कर दी गई है) कि तुम उपवास की संख्या पूरी करो, (और जो शुभ आशीष इसमें छिपा हुआ है, उससे वंचित न रहो)। और (इस उद्देश्य के लिए रमज़ान का महीना) इसलिए (अलग किया गया है) कि (क़ुरआन के रूप में) परमेश्वर ने जो मार्गदर्शन तुम्हें प्रदान किया है, उसपर उसकी बड़ाई करो और इसलिए कि तुम उसके आभारी बनो।

وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِى عَنِّى فَإِنِّى قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ ٱلدَّاعِ إِذَا دَعَانِ ۖ فَلْيَسْتَجِيبُوا۟ لِى وَلْيُؤْمِنُوا۟ بِى لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ ﴿186﴾

और मेरे (किसी निर्देश के) बारे में, (हे पैग़ंबर), जब मेरे बंदे तुमसे कोई प्रश्न करें तो (उनसे कह दो कि इस समय) मैं उनके पास ही हूँ। पुकारने वाला जब मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार का उत्तर देता हूँ। इसलिए उन्हें चाहिए कि वे मेरा आदेश मानें और मुझपर विश्वास रखें ताकि वे उचित मार्ग पर रहें।

أُحِلَّ لَكُمْ لَيْلَةَ ٱلصِّيَامِ ٱلرَّفَثُ إِلَىٰ نِسَآئِكُمْ ۚ هُنَّ لِبَاسٌ لَّكُمْ وَأَنتُمْ لِبَاسٌ لَّهُنَّ ۗ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَخْتَانُونَ أَنفُسَكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ وَعَفَا عَنكُمْ ۖ فَٱلْـَٔـٰنَ بَـٰشِرُوهُنَّ وَٱبْتَغُوا۟ مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَكُمْ ۚ وَكُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ ٱلْخَيْطُ ٱلْأَبْيَضُ مِنَ ٱلْخَيْطِ ٱلْأَسْوَدِ مِنَ ٱلْفَجْرِ ۖ ثُمَّ أَتِمُّوا۟ ٱلصِّيَامَ إِلَى ٱلَّيْلِ ۚ وَلَا تُبَـٰشِرُوهُنَّ وَأَنتُمْ عَـٰكِفُونَ فِى ٱلْمَسَـٰجِدِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَقْرَبُوهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ ءَايَـٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ﴿187﴾

(तुम पूछना चाहते हो तो लो हम बताए देते हैं कि) उपवास की रात में अपनी पत्नियों के पास जाना तुम्हारे लिए वैध किया गया है। वे तुम्हारे लिए वस्त्र समान हैं और तुम उनके लिए वस्त्र समान हो। परमेश्वर ने देखा कि तुम अपने आप से विश्वासघात कर रहे थे तो उसने तुम पर कृपा की और तुम्हें क्षमा किया। अतः अब (निःसंकोच) अपनी पत्नियों के पास जाओ और (इसका) जो (परिणाम) परमेश्वर ने तुम्हारे लिए लिख रखा है, उसकी कामना करो, और खाओ पियो, यहाँ तक कि रात की अश्वेत धारी से फ़ज्र [उषाकाल] की श्वेत धारी तुम्हारे लिए पूर्णतः अलग हो जाए। फिर रात तक अपना उपवास पूरा करो। और हाँ, तुम मस्जिदों में ‘एतिकाफ़’ में बैठे हो तो रात को भी पत्नियों के पास न जाना। यह परमेश्वर की निर्धारित सीमाएं हैं, तो इनके पास न जाओ। परमेश्वर इसी प्रकार अपनी आयतें लोगों के लिए स्पष्ट करता है ताकि वे संयम अपनाएँ।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात इस संबंध के द्वारा,यदि चाहो तो संतान भी पैदा करो। क्रिया और परिणाम, दोनों के दृष्टिकोण से अब इस मामले में तुम्हें कोई संकोच नहीं होना चाहिए। ↩
وَلَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَكُم بَيْنَكُم بِٱلْبَـٰطِلِ وَتُدْلُوا۟ بِهَآ إِلَى ٱلْحُكَّامِ لِتَأْكُلُوا۟ فَرِيقًا مِّنْ أَمْوَٰلِ ٱلنَّاسِ بِٱلْإِثْمِ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿188﴾

और (इसी संयम का परिणाम है कि) तुम अन्यायपूर्ण ढंग से आपस में एक दूसरे का धन न खाओ और उसे अधिकारियों तक पहुँचने का माध्यम न बनाओ, ताकि इस प्रकार लोगों के धन का कोई भाग तुम्हें उनके अधिकारों का हनन करके खाने का अवसर मिल जाए, यद्यपि तुम (अधिकार के इस हनन को) जानते हो।

يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْأَهِلَّةِ ۖ قُلْ هِىَ مَوَٰقِيتُ لِلنَّاسِ وَٱلْحَجِّ ۗ وَلَيْسَ ٱلْبِرُّ بِأَن تَأْتُوا۟ ٱلْبُيُوتَ مِن ظُهُورِهَا وَلَـٰكِنَّ ٱلْبِرَّ مَنِ ٱتَّقَىٰ ۗ وَأْتُوا۟ ٱلْبُيُوتَ مِنْ أَبْوَٰبِهَا ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ ﴿189﴾

वे तुमसे प्रतिष्ठित महीनों के बारे में पूछते हैं। कह दो, ये लोगों की भलाई और हज्ज के अवसर हैं, (इसलिए इनका यह सम्मान इसी प्रकार बनाए रखा जाएगा)। और (तुमने यह प्रश्न किया है तो अब यह भी जान लो कि) यह कदापि कोई पुण्य नहीं है कि (एहराम की अवस्था में और हज्ज से वापसी पर) तुम घरों के पीछे से प्रवेश करते हो, अपितु पुण्य तो वास्तव में उसका है जो संयम अपनाए। इसलिए अब घरों में उनके द्वारों ही से प्रवेश करो, और परमेश्वर से डरते रहो ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो जाए।

وَقَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يُقَـٰتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُعْتَدِينَ ﴿190﴾ وَٱقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأَخْرِجُوهُم مِّنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ ۚ وَٱلْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ ٱلْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقَـٰتِلُوهُمْ عِندَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَـٰتِلُوكُمْ فِيهِ ۖ فَإِن قَـٰتَلُوكُمْ فَٱقْتُلُوهُمْ ۗ كَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿191﴾ فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿192﴾ وَقَـٰتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ لِلَّهِ ۖ فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَلَا عُدْوَٰنَ إِلَّا عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿193﴾

और परमेश्वर के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो (हज्ज का मार्ग रोकने के लिए) तुमसे लड़ें और (इसमें) कोई अत्याचार न करो। निस्संदेह, परमेश्वर अत्याचार करने वालों से प्रेम नहीं करता। और इन लड़ने वालों को जहाँ पाओ, उनकी हत्या करो और उन्हें वहाँ से निकालो, जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है और (याद रखो कि) उत्पीड़न हत्या से भी अधिक बुरा कार्य है। और मस्जिद-ए-हराम के पास तुम इनसे (खुद पहल करके) युद्ध न करो, जब तक ये तुमसे उसमें युद्ध न करें। फिर यदि ये युद्ध छेड़ दें तो (निःसंकोच) इनकी हत्या करो। इस प्रकार के काफ़िरों का यही दण्ड है। परंतु यदि वे सुधर जाएँ तो परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और तुम यह युद्ध उनसे बराबर किए जाओ, जब तक कि उत्पीड़न बाक़ी न रहे और धर्म इस भूभाग में परमेश्वर ही का हो जाए। फिर भी यदि वे सुधर जाएँ तो (जान लो कि) सैन्य कार्यवाही केवल अत्याचारियों के विरुद्ध ही वैध है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. युद्ध का यह लक्ष्य परमेश्वर के अंतिम रसूल, और उनके साथियों के लिए, और इत्माम-ए-हुज्जत के क़ानून के अंतर्गत निर्धारित किया गया था। इसका बाद में आने वालों के साथ कोई संबंध नहीं है। ↩
ٱلشَّهْرُ ٱلْحَرَامُ بِٱلشَّهْرِ ٱلْحَرَامِ وَٱلْحُرُمَـٰتُ قِصَاصٌ ۚ فَمَنِ ٱعْتَدَىٰ عَلَيْكُمْ فَٱعْتَدُوا۟ عَلَيْهِ بِمِثْلِ مَا ٱعْتَدَىٰ عَلَيْكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلْمُتَّقِينَ ﴿194﴾

परम-पावन महीने का बदला परम-पावन महीना है और इसी प्रकार अन्य पवित्र मर्यादाओं में भी बदले हैं। इसलिए जो तुम पर अत्याचार करें, उनको अपने ऊपर इस अत्याचार के समान ही उत्तर दो, और परमेश्वर से डरते रहो, और जान लो कि परमेश्वर उनके साथ है जो उसकी मर्यादाओं का पालन करते हैं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात यदि ये परम-पावन महीने की प्रतिष्ठा (हुर्मत) ध्यान में नहीं रखते तो इसके बदले में तुम भी उससे बेपरवाह हो सकते हो, इसलिए कि इस प्रकार की मर्यादाएं पारस्परिक रूप से क़ायम राखी जा सकती हैं, इन्हें कोई पक्ष एकतरफ़ा क़ायम नहीं रख सकता। ↩
وَأَنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا تُلْقُوا۟ بِأَيْدِيكُمْ إِلَى ٱلتَّهْلُكَةِ ۛ وَأَحْسِنُوٓا۟ ۛ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿195﴾

और (इस जिहाद के लिए) परमेश्वर के मार्ग में दान करो, और (इससे बच के) अपने ही हाथों से अपने आप को बरबादी में न डालो, और तुम (यह दान) अच्छे ढंग से करो, इसलिए कि परमेश्वर अच्छे ढंग से काम करने वालों से प्रेम करता है।

وَأَتِمُّوا۟ ٱلْحَجَّ وَٱلْعُمْرَةَ لِلَّهِ ۚ فَإِنْ أُحْصِرْتُمْ فَمَا ٱسْتَيْسَرَ مِنَ ٱلْهَدْىِ ۖ وَلَا تَحْلِقُوا۟ رُءُوسَكُمْ حَتَّىٰ يَبْلُغَ ٱلْهَدْىُ مَحِلَّهُۥ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ بِهِۦٓ أَذًى مِّن رَّأْسِهِۦ فَفِدْيَةٌ مِّن صِيَامٍ أَوْ صَدَقَةٍ أَوْ نُسُكٍ ۚ فَإِذَآ أَمِنتُمْ فَمَن تَمَتَّعَ بِٱلْعُمْرَةِ إِلَى ٱلْحَجِّ فَمَا ٱسْتَيْسَرَ مِنَ ٱلْهَدْىِ ۚ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَـٰثَةِ أَيَّامٍ فِى ٱلْحَجِّ وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ ۗ تِلْكَ عَشَرَةٌ كَامِلَةٌ ۗ ذَٰلِكَ لِمَن لَّمْ يَكُنْ أَهْلُهُۥ حَاضِرِى ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ ﴿196﴾

और हज्ज तथा उम्रह (का मार्ग यदि तुम्हारे लिए खोल दिया जाए तो उनके सभी संस्कारों के साथ उन) को परमेश्वर के लिए ही पूरा करो। फिर यदि रास्ते में घिर जाओ तो जो पशु भी बलि के लिए उपलब्ध हो, उसे भेंट कर दो, और अपने सर का मुंडन उस समय तक न करो, जब तक क़ुर्बानी अपने स्थान पर न पहुँच जाए। फिर जो तुम में से अस्वस्थ हो या उसके सर में कोई समस्या हो (और उसे बलिदान से पहले ही सर का मुंडन करवाना पड़ जाए) तो उसे चाहिए कि उपवास या दान या क़ुर्बानी के रूप में उसका फ़िद्या दे। फिर जब तुम्हारे लिए शांति की परिस्थिति पैदा हो जाए तो जो कोई इस यात्रा से लाभ उठाकर हज्ज का समय आने तक उम्रह भी कर ले तो उसे क़ुर्बानी करना होगा, जैसे भी उपलब्ध हो जाए। और यदि क़ुर्बानी उपलब्ध न हो तो उपवास रखना होगा: तीन दिन हज्ज के अंतराल में और सात, जब (हज्ज से) वापस आओ। यह पूरे दस दिन हुए। (इस प्रकार एक ही यात्रा में हज्ज के साथ उम्रे की) यह (छूट) केवल उन लोगों के लिए है जिनके घर बार मस्जिद-ए-हराम के पास न हों। (इसका पालन करो) और परमेश्वर से डरते रहो, और अच्छे से जान लो कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है।

ٱلْحَجُّ أَشْهُرٌ مَّعْلُومَـٰتٌ ۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ ٱلْحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِى ٱلْحَجِّ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍ يَعْلَمْهُ ٱللَّهُ ۗ وَتَزَوَّدُوا۟ فَإِنَّ خَيْرَ ٱلزَّادِ ٱلتَّقْوَىٰ ۚ وَٱتَّقُونِ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿197﴾

हज्ज के महीने निर्धारित हैं। अतः जो व्यक्ति भी इनमें (एहराम बांध कर) हज्ज का संकल्प कर ले, उसे फिर हज्ज के इस समय में न कोई काम-वासना की बात करनी है, न परमेश्वर की अवज्ञा की और न लड़ाई झगड़े की कोई बात उससे निकलनी चाहिए। और (याद रहे कि) जो पुण्य भी तुम करोगे, परमेश्वर उसे जानता है। और (हज्ज की इस यात्रा में पुण्यशीलता का) पाथेय ले कर निकलो, इसलिए कि सर्वोत्तम पाथेय यही पुण्यशीलता का पाथेय है। और (इसके लिए), बुद्धिजीवियो, मुझसे डरते रहो।

لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَبْتَغُوا۟ فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ ۚ فَإِذَآ أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَـٰتٍ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ عِندَ ٱلْمَشْعَرِ ٱلْحَرَامِ ۖ وَٱذْكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمْ وَإِن كُنتُم مِّن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ ﴿198﴾

(इसके साथ, अपितु) तुम पर कोई दोष नहीं कि अपने प्रभु की कृपा की खोज करो, परंतु (ध्यान रहे कि मुज़्दलिफ़ा कोई खेल तमाशे और व्यापार का स्थान नहीं है, इसलिए) जब अरफ़ात से प्रस्थान करो तो मश्आर-ए-हराम के पास परमेश्वर को याद करो और उसको उसी प्रकार याद करो, जिस प्रकार उसने तुम्हारा मार्गदर्शन किया है। और इससे पहले तो, निस्संदेह तुम लोग भटकने वालों में थे।

ثُمَّ أَفِيضُوا۟ مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ ٱلنَّاسُ وَٱسْتَغْفِرُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿199﴾

फिर (यह भी आवश्यक है कि) जहाँ से अन्य सब लोग पलटते हैं, तुम भी, (कुरैश के लोगो), वहीं से पलटो और परमेश्वर की क्षमा चाहो। परमेश्वर अवश्य क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

فَإِذَا قَضَيْتُم مَّنَـٰسِكَكُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَذِكْرِكُمْ ءَابَآءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًا ۗ فَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا وَمَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَـٰقٍ ﴿200﴾ وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ ﴿201﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌ مِّمَّا كَسَبُوا۟ ۚ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ ﴿202﴾

(और यह भी कि) इसके बाद जब अपने हज्ज के सब संस्कार संपन्न कर लो तो जिस प्रकार पहले अपने पूर्वजों को याद करते रहे हो, उसी प्रकार अब परमेश्वर को याद करो, बल्कि उससे भी अधिक। (यह परमेश्वर से मांगने का अवसर है), परंतु लोगों में ऐसे भी हैं कि वे (इस अवसर पर भी यही कहते हैं कि प्रभु, हमें (जो कुछ देना है, इसी) जीवन में दे दे, और (इसका परिणाम यह निकलता है कि फिर) परलोक में उनका कोई भाग नहीं रहता। और उनमें ऐसे भी हैं कि जिनकी प्रार्थना यह होती है कि प्रभु, हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और परलोक में भी, और हमें आग के दण्ड से बचा ले। यही हैं जो अपनी कमाई का भाग पा लेंगे, और परमेश्वर को हिसाब चुकाते कभी देर नहीं लगती।

وَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ فِىٓ أَيَّامٍ مَّعْدُودَٰتٍ ۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِى يَوْمَيْنِ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ لِمَنِ ٱتَّقَىٰ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُمْ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴿203﴾

और (मिना के) कुछ निर्धारित दिनों में परमेश्वर का स्मरण करो। फिर जिसने जल्दी की और दो ही दिनों में चल खड़ा हुआ, उस पर भी कोई पाप नहीं और जो देर से चला उस पर भी कोई पाप नहीं। (हाँ, परंतु) उनके लिए जो परमेश्वर से डरें और तुम भी परमेश्वर से डरते रहो, और अच्छे से जान लो कि (एक दिन) तुम उसी के सामने इकट्ठे किए जाओगे।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يُعْجِبُكَ قَوْلُهُۥ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَيُشْهِدُ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا فِى قَلْبِهِۦ وَهُوَ أَلَدُّ ٱلْخِصَامِ ﴿204﴾ وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِى ٱلْأَرْضِ لِيُفْسِدَ فِيهَا وَيُهْلِكَ ٱلْحَرْثَ وَٱلنَّسْلَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلْفَسَادَ ﴿205﴾ وَإِذَا قِيلَ لَهُ ٱتَّقِ ٱللَّهَ أَخَذَتْهُ ٱلْعِزَّةُ بِٱلْإِثْمِ ۚ فَحَسْبُهُۥ جَهَنَّمُ ۚ وَلَبِئْسَ ٱلْمِهَادُ ﴿206﴾

(यह उपासना है जिसका मार्ग रोकने वालों से तुमको लड़ना है) और इधर परिस्थिति यह है कि तुम्हारे लोगों में से कुछ ऐसे हैं कि जिनकी बातें तो इस दुनिया के जीवन में तुम्हें भली लगती हैं, और वे अपने दिल के इरादों पर परमेश्वर को साक्षी भी बनाते हैं, परंतु वे सबसे बुरे शत्रु हैं। (तुम्हारे सामने वे यही करते हैं) और जब वहां से हट जाते हैं तो उनकी सारी भागदौड़ इसलिए होती है कि धरती में बिगाड़ फैलाएं और खेतों को बर्बाद करें और पीढ़ियों का विनाश करें, और (तुम जानते हो कि) परमेश्वर बिगाड़ को प्रिय नहीं रखता। और जब उनसे कहा जाता है कि परमेश्वर से डरो तो पाप पर उद्यत रहने के साथ उनका अभिमान उन्हें जकड़ लेता है। अतः उनके लिए नरक पर्याप्त है और वह अत्यंत बुरा ठिकाना है।

وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَشْرِى نَفْسَهُ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ رَءُوفٌۢ بِٱلْعِبَادِ ﴿207﴾

और इन्हीं लोगों में कुछ ऐसे भी हैं कि परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अपने प्राण देने के तत्पर हैं। (यही हैं कि जिनसे कोई भूल हो जाए तो परमेश्वर उसे क्षमा कर देता है), और इस प्रकार के भक्तों पर परमेश्वर अत्यंत कृपा करने वाला है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱدْخُلُوا۟ فِى ٱلسِّلْمِ كَآفَّةً وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴿208﴾ فَإِن زَلَلْتُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْكُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿209﴾

हे मानने वालो, (मानने के साथ यह दो चाल-चलन नहीं हो सकते, इसलिए) तुम सब (एक ही ढंग से) परमेश्वर के आज्ञा-पालन में आ जाओ और शैतान के मार्ग का अनुसरण न करो। वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है। इन स्पष्ट चेतावनियों के बाद भी, जो तुम्हारे पास आई हैं, यदि तुम लड़खड़ाते हो तो जान लो कि परमेश्वर प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।

هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن يَأْتِيَهُمُ ٱللَّهُ فِى ظُلَلٍ مِّنَ ٱلْغَمَامِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ ﴿210﴾ سَلْ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ كَمْ ءَاتَيْنَـٰهُم مِّنْ ءَايَةٍۭ بَيِّنَةٍ ۗ وَمَن يُبَدِّلْ نِعْمَةَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ ﴿211﴾ زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۘ وَٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ فَوْقَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ وَٱللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ ﴿212﴾

(इस इत्माम-ए-हुज्जत के होते हुए) क्या ये इसी की प्रतीक्षा में हैं कि परमेश्वर और उसके फ़रिश्ते बादलों के साए में इनके सामने प्रकट हो जाएं और मामले का निपटारा कर दिया जाए? (परंतु यह परमेश्वर की कार्यप्रणाली नहीं है) और इस प्रकार के मामले तो परमेश्वर ही के हाथ में हैं। इस्राईलियों से पूछो, हमने उनको कितनी स्पष्ट निशानियाँ दीं, (परंतु इसका क्या लाभ हुआ)? और वास्तव में जो लोग परमेश्वर के (मार्गदर्शन जैसे) वरदान को पा लेने के बाद उसको (पथभ्रष्टता से) बदलते हैं, वे परमेश्वर की पकड़ से नहीं बच सकते, इसलिए कि परमेश्वर कड़ी पकड़ करने वाला है। इन नकारने वालों के लिए दुनिया का जीवन बड़ा लुभावना बना दिया गया है। (इसके परिणाम से इन्हें सचेत किया जाए तो नहीं सुनते) और मानने वालों का मज़ाक उड़ाते हैं, यद्यपि परमेश्वर से डरने वाले क़यामत के दिन इनकी तुलना में श्रेष्ठ होंगे। (यह उनके लिए परमेश्वर की कृपा है) और परमेश्वर जिसको चाहेगा, अपना असीम अनुग्रह प्रदान करेगा।

كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةً وَٰحِدَةً فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۚ وَمَا ٱخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا ٱلَّذِينَ أُوتُوهُ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لِمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ مِنَ ٱلْحَقِّ بِإِذْنِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿213﴾

(अपने ढोंग के लिए ये मतभेदों को बहाना बनाते हैं। इन्हें जानना चाहिए कि) मनुष्य एक ही समूह थे। फिर (उनमें मतभेद पैदा हुआ तो) परमेश्वर ने नबी भेजे, शुभ सूचना देते और सचेत करते हुए और उनके साथ निर्णायक बात के रूप में अपना ग्रंथ उतारा ताकि लोगों के बीच वह उनके मतभेदों का निपटारा कर दे। यह जिन को दिया गया, इसमें मतभेद भी उन्हीं लोगों ने किया, अत्यंत स्पष्ट प्रमाण उनके सामने आ जाने के बाद, केवल आपस के बैर के कारण। फिर ये जो (क़ुरआन के) मानने वाले हैं, परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से उस सत्य के विषय में इनका मार्गदर्शन किया जिसमें ये मतभेद कर रहे थे। और परमेश्वर जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार) सीधा मार्ग दिखा देता है।

أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِكُم ۖ مَّسَّتْهُمُ ٱلْبَأْسَآءُ وَٱلضَّرَّآءُ وَزُلْزِلُوا۟ حَتَّىٰ يَقُولَ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ مَتَىٰ نَصْرُ ٱللَّهِ ۗ أَلَآ إِنَّ نَصْرَ ٱللَّهِ قَرِيبٌ ﴿214﴾

(ये ढोंगी समझते हैं कि इनपर कोई ज़िम्मेदारी डाले बिना ही इस मार्ग की सब कठिनाइयां परमेश्वर की सहायता से दूर हो जानीं चाहिएँ। ईश्वर भक्तो), तुम्हारा विचार है कि तुम स्वर्ग में प्रवेश कर जाओगे, यद्यपि वह परिस्थितियां अभी तुम्हारे सामने ही नहीं आईं (जो रसूलों की नियुक्ति के परिणामस्वरूप) उन लोगों के सामने आईं थीं जो तुमसे पहले चल बसे हैं? उनपर विपत्तियां आईं, कष्ट आए‌ और वे इतना झंझोड़े गए, कि रसूल और उसके मानने वाले सहयोगी सब पुकार उठे कि परमेश्वर की सहायता कब आएगी? (उस समय शुभ सूचना दी गई कि) सुनो, परमेश्वर की सहायता पास ही है।

يَسْـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ ۖ قُلْ مَآ أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍ فَلِلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌ ﴿215﴾

वे तुम से पूछते हैं कि अच्छा, फिर क्या दान करें? कह दो कि जितना धन भी दान करोगे, वह तुम्हारे माता-पिता, रिश्तेदारों और (तुम्हारे ही समाज के) अनाथ, निर्धन व्यक्तियों और यात्रियों के लिए है, (इसलिए जितनी हिम्मत है, दान करो) और (संतुष्ट रहो कि) जो पुण्य भी तुम करोगे, वह कदापि व्यर्थ न होगा, इसलिए कि परमेश्वर उससे पूर्णतः परिचित है।

كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰٓ أَن تَكْرَهُوا۟ شَيْـًٔا وَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰٓ أَن تُحِبُّوا۟ شَيْـًٔا وَهُوَ شَرٌّ لَّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿216﴾

तुम पर युद्ध अनिवार्य किया गया और (परमेश्वर के मार्ग में दान करने की तरह) वह भी तुम्हें प्रिय नहीं, यद्यपि यह पूर्णतः संभव है कि तुम किसी कार्य को अप्रिय समझो और तुम्हारे लिए वही अच्छा हो और पूर्णतः संभव है कि तुम किसी कार्य को अच्छा समझो और वह तुम्हारे लिए बुरा हो। और सत्य यह है कि परमेश्वर जानता है और (इस प्रकार की बहुत सी चीज़ों को) तुम नहीं जानते।

يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلشَّهْرِ ٱلْحَرَامِ قِتَالٍ فِيهِ ۖ قُلْ قِتَالٌ فِيهِ كَبِيرٌ ۖ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَكُفْرٌۢ بِهِۦ وَٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِۦ مِنْهُ أَكْبَرُ عِندَ ٱللَّهِ ۚ وَٱلْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ ٱلْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَـٰتِلُونَكُمْ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ ٱسْتَطَـٰعُوا۟ ۚ وَمَن يَرْتَدِدْ مِنكُمْ عَن دِينِهِۦ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿217﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ ٱللَّهِ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿218﴾

वे तुम से पूछते हैं कि प्रतिष्ठित महीने में युद्ध का क्या आदेश है? कह दो के इस में युद्ध बड़ी ही गंभीर बात है, परंतु परमेश्वर के मार्ग से रोकना और उसको न मानना और बैत-उल-हराम का मार्ग लोगों पर बंद करना और उसके रहने वालों को वहाँ से निकालना परमेश्वर के निकट इससे भी अधिक गंभीर है। और अत्याचार तथा दबाव के माध्यम से लोगों को धर्म से फेरना तो हत्या से भी बड़ा पाप है। (तुम्हें जानना चाहिए कि जिन लोगों से युद्ध का आदेश तुम्हें दिया गया है, उन्होंने तय कर लिया है कि) वे तुमसे निरंतर लड़ेंगे यहाँ तक कि यदि उनके लिए संभव हो तो तुम्हें तुम्हारे धर्म से वापस ले जाएं। और तुम में से जो कोई अपना धर्म त्याग देगा और फिर इसी कुफ़्र की दशा में मर जाएगा तो इसी प्रकार के लोग हैं जिनके कर्म इस लोक और परलोक दोनों में विफल हुए और यही नरक में पड़ने वाले हैं, ये उसमें सदा रहेंगे। इसके विपरीत जो लोग ईमान पर जमे रहे हैं और जिन्होंने प्रवास किया और परमेश्वर के मार्ग में जिहाद किया है, वही परमेश्वर की दया के पात्र हैं और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْخَمْرِ وَٱلْمَيْسِرِ ۖ قُلْ فِيهِمَآ إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَـٰفِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَآ أَكْبَرُ مِن نَّفْعِهِمَا ۗ وَيَسْـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ قُلِ ٱلْعَفْوَ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ ﴿219﴾ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۗ وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْيَتَـٰمَىٰ ۖ قُلْ إِصْلَاحٌ لَّهُمْ خَيْرٌ ۖ وَإِن تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَٰنُكُمْ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ ٱلْمُفْسِدَ مِنَ ٱلْمُصْلِحِ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَعْنَتَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿220﴾

वे तुमसे जुए और शराब के बारे में पूछते हैं, (इसलिए कि यह भी इनके यहाँ ग़रीबों की सहायता का एक माध्यम है)। कह दो कि इन दोनों में पाप बहुत बड़ा है और (इसमें संदेह नहीं कि) लोगों के लिए इनमें कुछ लाभ भी हैं, परंतु इनका पाप इनके इस लाभ से कहीं बढ़कर है। और पूछते हैं कि (अच्छा, यह तो स्पष्ट कीजिए कि) क्या दान करें? कह दो कि वही जो आवश्यकता से अधिक है। परमेश्वर इसी प्रकार तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है ताकि तुम इस लोक और परलोक, दोनों के विषय में विचार करते रहो। और वे तुमसे पूछते हैं कि (युद्ध हुआ और लोग मारे गए तो उनके) अनाथ बच्चों के साथ क्या मामला किया जाए? कह दो: जिसमें उनकी भलाई हो, वही अच्छा है। और यदि तुम (उनकी माताओं से विवाह करके) उन्हें अपने साथ मिला लो तो वे तुम्हारे भाई हैं, और परमेश्वर जानता है कि कौन बिगाड़ने वाला है और कौन सुधार करने वाला है। और यदि परमेश्वर चाहता तो (इसकी अनुमति न देकर) तुम्हें कठिनाई में डाल देता। निस्संदेह, परमेश्वर बड़ा प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।

وَلَا تَنكِحُوا۟ ٱلْمُشْرِكَـٰتِ حَتَّىٰ يُؤْمِنَّ ۚ وَلَأَمَةٌ مُّؤْمِنَةٌ خَيْرٌ مِّن مُّشْرِكَةٍ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ ۗ وَلَا تُنكِحُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَتَّىٰ يُؤْمِنُوا۟ ۚ وَلَعَبْدٌ مُّؤْمِنٌ خَيْرٌ مِّن مُّشْرِكٍ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَدْعُونَ إِلَى ٱلنَّارِ ۖ وَٱللَّهُ يَدْعُوٓا۟ إِلَى ٱلْجَنَّةِ وَٱلْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِۦ ۖ وَيُبَيِّنُ ءَايَـٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ﴿221﴾

और (अनाथों की भलाई के उद्देश्य से भी) मुश्रिक स्त्रियों से विवाह न करो, जब तक वे ईमान न लाएँ। और (याद रखो कि) एक मुसलमान दासी बड़े परिवार की किसी मुश्रिक स्त्री से अच्छी है, यद्यपि वह तुम्हें भाती हो। और अपनी स्त्रियों को भी मुश्रिकों के विवाह में न दो, जब तक वे ईमान न लाएँ। और (याद रखो कि) एक मुसलमान ग़ुलाम बड़े परिवार के किसी मुश्रिक पुरुष से अच्छा है, यद्यपि वह तुम्हें भाता हो। यह (मुश्रिक लोग तुम्हें) नरक की ओर बुलाते हैं और परमेश्वर अपने अनुग्रह से स्वर्ग और क्षमा की ओर बुलाता है, और लोगों के लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है ताकि वे ध्यान दें।

وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْمَحِيضِ ۖ قُلْ هُوَ أَذًى فَٱعْتَزِلُوا۟ ٱلنِّسَآءَ فِى ٱلْمَحِيضِ ۖ وَلَا تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّىٰ يَطْهُرْنَ ۖ فَإِذَا تَطَهَّرْنَ فَأْتُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَمَرَكُمُ ٱللَّهُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلتَّوَّٰبِينَ وَيُحِبُّ ٱلْمُتَطَهِّرِينَ ﴿222﴾ نِسَآؤُكُمْ حَرْثٌ لَّكُمْ فَأْتُوا۟ حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ ۖ وَقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُم مُّلَـٰقُوهُ ۗ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿223﴾

और (विवाह का वर्णन हुआ है तो) वे तुमसे पूछते हैं कि (स्त्रियों के) मासिक-धर्म का क्या निर्देश है? कह दो, यह एक प्रकार की अपवित्रता है। अतः मासिक-धर्म की अवस्था में स्त्रियों से अलग रहो और जब तक वे ख़ून से शुद्ध न हो जाएं, उनके पास न जाओ। फिर जब वे नहा कर शुद्धता प्राप्त कर लें तो उनसे मिलाप करो, जहाँ से परमेश्वर ने तुम्हें (उसका) आदेश दिया है। परमेश्वर अवश्य उनको प्रिय रखता है जो प्रायश्चित करने वाले हों और उनको जो विशुद्धता को अपनाने वाले हों। तुम्हारी ये स्त्रियाँ तुम्हारे लिए खेती समान हैं, इसलिए तुम अपनी इस खेती में जिस प्रकार चाहो, आओ और (इसके माध्यम से इस लोक और परलोक, दोनों में) अपने लिए आगे का प्रबंध करो और परमेश्वर से डरते रहो और अच्छे से जान लो कि तुम्हें (एक दिन) अवश्य उससे मिलना है। और मानने वालों को, (हे पैग़ंबर, इस भेंट के अवसर पर सफलता तथा कल्याण की) शुभ सूचना सुनाओ।

وَلَا تَجْعَلُوا۟ ٱللَّهَ عُرْضَةً لِّأَيْمَـٰنِكُمْ أَن تَبَرُّوا۟ وَتَتَّقُوا۟ وَتُصْلِحُوا۟ بَيْنَ ٱلنَّاسِ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿224﴾ لَّا يُؤَاخِذُكُمُ ٱللَّهُ بِٱللَّغْوِ فِىٓ أَيْمَـٰنِكُمْ وَلَـٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ ﴿225﴾ لِّلَّذِينَ يُؤْلُونَ مِن نِّسَآئِهِمْ تَرَبُّصُ أَرْبَعَةِ أَشْهُرٍ ۖ فَإِن فَآءُو فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿226﴾ وَإِنْ عَزَمُوا۟ ٱلطَّلَـٰقَ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿227﴾

(स्त्रियों से संबन्धित कुछ अन्य मामले भी हैं, इन्हें भी समझ लो) और अपनी शपथों के लिए परमेश्वर के नाम को दूसरों से अच्छा व्यवहार करने और परमेश्वर की मर्यादा का पालन करने और लोगों के बीच समझौता कराने में अड़चन न बनाओ और (सावधान रहो कि) परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। परमेश्वर तुम्हारी उन क़समों पर तो तुम्हें नहीं पकड़ेगा जो तुम अनिच्छित रूप से खा लेते हो, परंतु वे क़समें जो अपने मन के संकल्प से खाते हो, उस पर अवश्य तुम्हें पूछेगा और सत्य यह है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, वह धैर्यवान है। (इसलिए) जो लोग अपनी पत्नियों से सहवास न करने की शपथ खा बैठें, उनके लिए चार महीने की ढील है। फिर वे वापस संपर्क कर लें तो निस्संदेह परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और यदि तलाक़ का निर्णय कर लें तो  परमेश्वर से डरते हुए करें, इसलिए कि परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।

وَٱلْمُطَلَّقَـٰتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَـٰثَةَ قُرُوٓءٍ ۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكْتُمْنَ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِىٓ أَرْحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤْمِنَّ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِى ذَٰلِكَ إِنْ أَرَادُوٓا۟ إِصْلَـٰحًا ۚ وَلَهُنَّ مِثْلُ ٱلَّذِى عَلَيْهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيْهِنَّ دَرَجَةٌ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿228﴾

और (यह दूसरी परिस्थिति पैदा हो जाए तो) जिन स्त्रियों को तलाक़़ दी गई हो, वे अपने आपको तीन मासिक धर्म तक प्रतीक्षा में रखें। और यदि वे परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास रखती हैं तो उनके लिए वैध नहीं है कि जो कुछ परमेश्वर ने उनके पेट में पैदा किया है, उसे छिपाएं। और उनके पति यदि सम्बन्धों को सुधारना चाहें तो इस (इद्दत की) अवधि में ज़्यादा अधिकार रखते हैं कि उन्हें वापस लें और (यह इसलिए है कि इसमें तो संदेह नहीं कि) इन स्त्रियों के लिए भी उसी प्रकार अधिकार हैं, जिस प्रकार विधि अनुसार उनके ऊपर (पतियों के) अधिकार हैं, परंतु पुरुषों को (पति होने के नाते) पत्नियों पर एक पद की वरीयता प्राप्त है। (यह परमेश्वर का निर्देश है) और परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।

ٱلطَّلَـٰقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌۢ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌۢ بِإِحْسَـٰنٍ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا۟ مِمَّآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ شَيْـًٔا إِلَّآ أَن يَخَافَآ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا ٱفْتَدَتْ بِهِۦ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿229﴾

यह तलाक़़ (एक विवाह बंधन में) दो बार (दिया जा सकता) है। इसके बाद फिर भले ढंग से रोक लेना है या सज्जनता के साथ विदा कर देना है। और विदा कर देने का निर्णय हो तो तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुमने इन स्त्रियों को दिया है, उसमें से कुछ भी इस अवसर पर वापस लो। अपितु, उस समय अवैध नहीं जब दोनों को डर हो कि वे परमेश्वर की मर्यादा पर जमे नहीं रह सकेंगे। फिर, (लोगो), यदि तुम्हें भी डर हो कि वे परमेश्वर की मर्यादा पर जमे नहीं रह सकते तो (पती की दी हुई) उन वस्तुओं के विषय में उन दोनों पर कोई पाप नहीं है जो स्त्री फ़िद्ये में देकर तलाक़़ प्राप्त कर ले। यह परमेश्वर की निर्धारित सीमाएं हैं, इसलिए इनसे आगे न बढ़ो और (जान लो कि) जो परमेश्वर की सीमाओं से आगे बढ़ते हैं, वही अत्याचारी हैं।

فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُۥ مِنۢ بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُۥ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَآ أَن يَتَرَاجَعَآ إِن ظَنَّآ أَن يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ﴿230﴾

फिर यदि (दो बार तलाक़़ से फिर जाने के बाद) पति ने (इस विवाह बंधन में) पत्नी को (तीसरी बार) तलाक़़ दे दी तो अब वह उसके लिए वैध नहीं होगी, जब तक उसके सिवा किसी अन्य पति से विवाह न करे। परंतु यदि उस (दूसरे पति) ने भी उसे तलाक़ दे दी तो पहले पति-पत्नी के लिए एक दूसरे की ओर पलटने में कोई आपत्ति नहीं है, यदि यह आशा करते हों कि अब वे परमेश्वर की मर्यादा पर क़ायम रह सकेंगे। यह परमेश्वर की निर्धारित सीमाएं हैं जिन्हें वह उन लोगों के लिए स्पष्ट कर रहा है जो ज्ञान प्राप्त करना चाहते हों।

وَإِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ ۚ وَلَا تُمْسِكُوهُنَّ ضِرَارًا لِّتَعْتَدُوا۟ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۥ ۚ وَلَا تَتَّخِذُوٓا۟ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ هُزُوًا ۚ وَٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمَآ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَٱلْحِكْمَةِ يَعِظُكُم بِهِۦ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿231﴾

और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दो और उनकी इद्दत पूरी होने को आ जाए तो उन्हें भले प्रकार से रोक लो या भले प्रकार से विदा कर दो और उन्हें हानि पहुंचाने की इच्छा से कभी भी न रोको कि इस प्रकार उनपर अत्याचार करो। और (जान लो कि) जो ऐसा करेगा, वह स्वयं अपने आप पर अत्याचार ढाएगा। और परमेश्वर की आयतों को मज़ाक़ न बनाओ, और अपने ऊपर परमेश्वर के उपकार को याद रखो, और उस क़ानून और हिकमत को याद रखो जो उसने तुम पर उतारी है, जिसका वह तुम्हें उपदेश करता है, और परमेश्वर से डरते रहो और अच्छे से जान रखो के परमेश्वर हर बात से परिचित है।

وَإِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحْنَ أَزْوَٰجَهُنَّ إِذَا تَرَٰضَوْا۟ بَيْنَهُم بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ مِنكُمْ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۗ ذَٰلِكُمْ أَزْكَىٰ لَكُمْ وَأَطْهَرُ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ ﴿232﴾

और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दो और वे अपनी इद्दत पूरी कर लें तो अब इसमें बाधा न डालो कि वे अपने होने वाले पतियों से विवाह कर लें, जब वे विधि अनुसार आपस में विवाह करने के लिए मान जाएं। यह उपदेश तुम में से उन लोगों को किया जाता है जो परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास रखते हैं। यही तुम्हारे लिए अधिक शालीन और अधिक पवित्र मार्ग है। और सत्य यह है कि परमेश्वर जानता है और तुम नहीं जानते।

وَٱلْوَٰلِدَٰتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَـٰدَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ ۖ لِمَنْ أَرَادَ أَن يُتِمَّ ٱلرَّضَاعَةَ ۚ وَعَلَى ٱلْمَوْلُودِ لَهُۥ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ لَا تُكَلَّفُ نَفْسٌ إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَا تُضَآرَّ وَٰلِدَةٌۢ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوْلُودٌ لَّهُۥ بِوَلَدِهِۦ ۚ وَعَلَى ٱلْوَارِثِ مِثْلُ ذَٰلِكَ ۗ فَإِنْ أَرَادَا فِصَالًا عَن تَرَاضٍ مِّنْهُمَا وَتَشَاوُرٍ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا ۗ وَإِنْ أَرَدتُّمْ أَن تَسْتَرْضِعُوٓا۟ أَوْلَـٰدَكُمْ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِذَا سَلَّمْتُم مَّآ ءَاتَيْتُم بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿233﴾

और (तलाक़ के बाद भी) माताएं उन लोगों के लिए जो दूध पिलाने की अवधि पूरी करना चाहते हों, अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष दूध पिलाएंगी और बच्चे के पिता को (इस परिस्थिति में) विधि अनुसार उनका खाना कपड़ा देना होगा। किसी पर उसके सामर्थ्य से अधिक भार नहीं डाला जाए। न किसी मां को उसके बच्चे के कारण हानि पहुंचाई जाए और न किसी पिता को उसके बच्चे के कारण — और इसी प्रकार का दायित्व उसके वारिस पर भी है — फिर यदि दोनों आपसी सहमति और आपसी परामर्श से दूध छुड़ाना चाहें तो दोनों पर कोई पाप नहीं है। और यदि तुम अपने बच्चों को किसी और से दूध पिलवाना चाहो तो इसमें भी तुम्हारे लिए कोई आपत्ति नहीं, इस शर्त के साथ कि (बच्चे की माता से) जो कुछ तुमने देने का वादा किया है, वह नियम अनुसार उसे दे दो। और परमेश्वर से डरते रहो, और ध्यान रखो कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देख रहा है।

وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَٰجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِىٓ أَنفُسِهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴿234﴾ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا عَرَّضْتُم بِهِۦ مِنْ خِطْبَةِ ٱلنِّسَآءِ أَوْ أَكْنَنتُمْ فِىٓ أَنفُسِكُمْ ۚ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمْ سَتَذْكُرُونَهُنَّ وَلَـٰكِن لَّا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّآ أَن تَقُولُوا۟ قَوْلًا مَّعْرُوفًا ۚ وَلَا تَعْزِمُوا۟ عُقْدَةَ ٱلنِّكَاحِ حَتَّىٰ يَبْلُغَ ٱلْكِتَـٰبُ أَجَلَهُۥ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ فَٱحْذَرُوهُ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ ﴿235﴾

और तुम में से जिन लोगों की मृत्यु हो जाए और अपने पीछे पत्नियां छोड़ें तो वे भी अपने आप को चार महीने दस दिन प्रतीक्षा में रखें। फिर जब उनकी इद्दत पूरी हो जाए तो अपने लिए विधि अनुसार जो कुछ वे करें, उसका तुम पर कोई पाप नहीं है। और जो कुछ तुम करते हो परमेश्वर उसे अच्छे से जानता है। और तुम्हारे लिए इसमें भी कोई पाप नहीं जो तुम संकेत के रूप में विवाह का संदेश स्त्रियों को दो या उसको अपने मन में छिपाए रखो। परमेश्वर जानता है कि तुम उनसे यह बात तो करोगे ही। अतः करो, परंतु (इसमें) कोई वादा उन से छिपकर न करना। अपितु, विधि अनुसार कोई बात कह सकते हो। और विवाह की गांठ उस समय तक न बांधो, जब तक क़ानून अपनी अवधि पूरी न कर ले। और जान लो कि परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम्हारे मन में है, इसलिए उससे डरो और जान लो कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है वह बड़ा धैर्यवान है।

لَّا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِن طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا۟ لَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى ٱلْمُوسِعِ قَدَرُهُۥ وَعَلَى ٱلْمُقْتِرِ قَدَرُهُۥ مَتَـٰعًۢا بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿236﴾ وَإِن طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةً فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إِلَّآ أَن يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَا۟ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ عُقْدَةُ ٱلنِّكَاحِ ۚ وَأَن تَعْفُوٓا۟ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۚ وَلَا تَنسَوُا۟ ٱلْفَضْلَ بَيْنَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿237﴾

और यदि तुम स्त्रियों को इस स्थिति में तलाक़ दो कि तुमने उन्हें हाथ नहीं लगाया या उनका महर निर्धारित नहीं किया तो महर के विषय में तुम पर कोई पाप नहीं है, परंतु यह तो अवश्य होना चाहिए कि विधि अनुसार उन्हें जीवन व्यतीत करने की कुछ सामग्री दे कर विदा करो, अच्छी हालत वाले अपनी स्थिति के अनुसार और निर्धन अपनी स्थिति के अनुसार। यह दायित्व है उनपर जो भला आचरण अपनाने वाले हों। परंतु तुमने यदि तलाक़ तो उन्हें हाथ लगाने से पहले दी, किंतु उनका महर निर्धारित कर चुके हो तो निर्धारित महर का आधा उन्हें देना होगा, पर उस स्थिति में नहीं कि वे अपना अधिकार छोड़ें या वह छोड़ दे जिसके हाथ में विवाह की गांठ है। और यह पुण्यशीलता के अधिक निकट है कि तुम पुरुष अपना अधिकार छोड़ दो और अपने बीच की श्रेष्ठता मत भूलो। निस्संदेह परमेश्वर उसको देख रहा है जो तुम कर रहे हो।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात पति, इसलिए कि विवाह की गांठ बंध जाए तो उसको खोलने का अधिकार फिर उसी के पास होता है। अतः पत्नी अलग होना चाहे तो वह भी उसे से मांग करती है कि वह यह गांठ खोल दे। ↩
حَـٰفِظُوا۟ عَلَى ٱلصَّلَوَٰتِ وَٱلصَّلَوٰةِ ٱلْوُسْطَىٰ وَقُومُوا۟ لِلَّهِ قَـٰنِتِينَ ﴿238﴾ فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًا ۖ فَإِذَآ أَمِنتُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ ﴿239﴾

(यह परमेश्वर की शरीअत है। इस पर क़ायम रहना चाहते हो तो) अपनी नमाज़ों की रक्षा करो, विशेषतः उस नमाज़ की जो (दिन और रात की नमाज़ों के) मध्य में आती है, (जब तुम्हारे लिए अपने काम-काज से निकलना सहज नहीं होता), और (सब कुछ छोड़कर) परमेश्वर के सामने अत्यंत आदर के साथ खड़े हो जाओ। फिर यदि खतरे का अवसर हो तो पैदल या सवारी पर, जिस प्रकार चाहे पढ़ लो। परंतु जब शांति हो जाए तो परमेश्वर को उसी रूप में याद करो, जो उसने तुम्हें सिखाया है, जिसे तुम नहीं जानते थे।

وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَٰجًا وَصِيَّةً لِّأَزْوَٰجِهِم مَّتَـٰعًا إِلَى ٱلْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍ ۚ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِى مَا فَعَلْنَ فِىٓ أَنفُسِهِنَّ مِن مَّعْرُوفٍ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿240﴾

और हाँ, (विधवा और तलाक़ पाई हुई स्त्री के विषय में जो निर्देश तुम्हें दिए गए हैं, उनसे संबंधित यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि) तुम में से जो लोग मर जाएं और अपने पीछे पत्नियां छोड़ रहे हों, वे अपनी उन पत्नियों के लिए साल भर की जीवन सामग्री वसीयत कर जाएं और यह भी कि (इस अवधि में) उन्हें घर से न निकाला जाए। परंतु वे स्वयं घर छोड़ दें तो जो कुछ नियम की बात वे अपने विषय में करें, उसका तुम पर कोई पाप नहीं है। (यह परमेश्वर का नियम है) और परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।

وَلِلْمُطَلَّقَـٰتِ مَتَـٰعٌۢ بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُتَّقِينَ ﴿241﴾

और (इसी प्रकार यह स्पष्टीकरण भी आवश्यक है कि) तलाक़ पाई हुई स्त्रियों को हर स्थिति में विधि अनुसार कुछ जीवन सामग्री देकर विदा करना चाहिए। यह हक़ है उनपर जो परमेश्वर से डरने वाले हों।

كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿242﴾

परमेश्वर इसी प्रकार तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है ताकि तुम समझने वाले बनो।

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ خَرَجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ ٱللَّهُ مُوتُوا۟ ثُمَّ أَحْيَـٰهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ ﴿243﴾

(ये विषय जिहाद और दान के बारे में तुम्हारे प्रश्नों से पैदा हुए थे। हे मानने वालो, इनके निर्देश तुम्हें बुरे नहीं लगने चाहिए)। क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो हज़ारों की संख्या में थे और मृत्यु के भय से अपने घर छोड़कर उनसे निकल भागे? इस पर परमेश्वर ने उनसे कहा कि मुर्दे हो कर जियो। (वे बरसों इसी स्थिति में रहे), फिर परमेश्वर ने उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर लोगों पर अत्यंत कृपा करने वाला है, परंतु लोगों में अधिकांश ऐसे हैं जो (उसके) आभारी नहीं होते।1

टिप्पणियाँ 1
  1. सूरह का चौथा और अंतिम खण्ड यहाँ से शुरू हो रहा है। इसमें जिहाद और इंफ़ाक़ के उसी विषय का समापन हुआ है जो पिछले खण्ड में तभी के तभी कुछ प्रश्नों के पैदा हो जाने के कारण आगे नहीं बढ़ सका था। ↩
وَقَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿244﴾ مَّن ذَا ٱلَّذِى يُقْرِضُ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا فَيُضَـٰعِفَهُۥ لَهُۥٓ أَضْعَافًا كَثِيرَةً ۚ وَٱللَّهُ يَقْبِضُ وَيَبْصُۜطُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿245﴾

(हे मानने वालो, इससे सीख लो) और परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करो और अच्छे से जान लो कि परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। कौन है जो (इस युद्ध के लिए) परमेश्वर को उधार देगा, अच्छा उधार कि परमेश्वर उसके लिए उसे कई गुना बढ़ा दे। और (जो मुँह फेरे तो उसे जानना चाहिए कि) परमेश्वर ही है जो धन में कमी भी करता है और विस्तार भी, और तुमको (एक दिन) उसी की ओर लौटना भी है।

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلْمَلَإِ مِنۢ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مِنۢ بَعْدِ مُوسَىٰٓ إِذْ قَالُوا۟ لِنَبِىٍّ لَّهُمُ ٱبْعَثْ لَنَا مَلِكًا نُّقَـٰتِلْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ قَالَ هَلْ عَسَيْتُمْ إِن كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِتَالُ أَلَّا تُقَـٰتِلُوا۟ ۖ قَالُوا۟ وَمَا لَنَآ أَلَّا نُقَـٰتِلَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَدْ أُخْرِجْنَا مِن دِيَـٰرِنَا وَأَبْنَآئِنَا ۖ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ ٱلْقِتَالُ تَوَلَّوْا۟ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿246﴾

तुमने मूसा के बाद इस्राईलियों के सरदारों को नहीं देखा, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा: आप हमारे लिए एक राजा नियुक्त कर दें ताकि हम (उसके आदेश पर) परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करें? इसपर नबी ने कहा: ऐसा न हो कि तुम पर जिहाद अनिवार्य किया जाए और फिर तुम जिहाद न करो? वे बोले: हम क्यों परमेश्वर के मार्ग में जिहाद नहीं करेंगे, जब कि हमें हमारे घरों और हमारे बच्चों से दूर निकाल दिया गया है? परंतु (हुआ यही) कि जब उनपर जिहाद अनिवार्य किया गया तो उनमें से थोड़े से लोगों को छोड़ कर बाक़ी सब फिर गए, और सत्य यह है कि परमेश्वर इन अत्याचारियों से भलीभांति परिचित था।

وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ٱللَّهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًا ۚ قَالُوٓا۟ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُ ٱلْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِٱلْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةً مِّنَ ٱلْمَالِ ۚ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُۥ بَسْطَةً فِى ٱلْعِلْمِ وَٱلْجِسْمِ ۖ وَٱللَّهُ يُؤْتِى مُلْكَهُۥ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ ﴿247﴾ وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ءَايَةَ مُلْكِهِۦٓ أَن يَأْتِيَكُمُ ٱلتَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌ مِّمَّا تَرَكَ ءَالُ مُوسَىٰ وَءَالُ هَـٰرُونَ تَحْمِلُهُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿248﴾

और (उनकी इस मांग पर) उनके नबी ने उन्हें बताया कि परमेश्वर ने तालूत को तुम्हारे लिए राजा नियुक्त कर दिया है। बोले: उसका शासन हम पर किस प्रकार हो सकता है, जबकि हम उससे बढ़कर इस राज्य के अधिकारी हैं और वह कोई धनवान व्यक्ति भी नहीं है? नबी ने उत्तर दिया: परमेश्वर ने उसी को (तुम पर शासन के लिए) चुन लिया है और इस उद्देश्य के लिए उसे ज्ञान और शारीरिक बनावट, दोनों में व्यापक क्षमता प्रदान की है। (यह सत्ता परमेश्वर की है) और परमेश्वर अपनी यह सत्ता, (अपने ज्ञान के अनुसार), जिसको चाहे, प्रदान करता है। (तुम मामलों को अपनी सीमित दृष्टि से देखते हो) और परमेश्वर व्यापक क्षमता रखने वाला है, वह हर चीज़ से परिचित है। और उनके नबी ने उनके लिए और स्पष्ट किया कि (परमेश्वर की ओर से) उसके राजा नियुक्त किए जाने की निशानी यह है कि (तुम्हारा) वह संदूक (तुम्हारे शत्रुओं के हाथ से निकल कर) तुम्हारे पास आ जाएगा जिसमें तुम्हारे प्रभु की ओर से (तुम्हारे लिए) सदैव बड़ी प्रशांति रही है और जिसमें वह विशेष स्मृतियाँ भी हैं जो मूसा और हारून के वंशजों ने (तुम्हारे लिए) छोड़ी हैं। उसे फ़रिश्ते उठाए हुए होंगे। इसमें, अवश्य तुम्हारे लिए एक बड़ी निशानी है, यदि तुम मानने वाले हो।

فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِٱلْجُنُودِ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ مُبْتَلِيكُم بِنَهَرٍ فَمَن شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّى وَمَن لَّمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُۥ مِنِّىٓ إِلَّا مَنِ ٱغْتَرَفَ غُرْفَةًۢ بِيَدِهِۦ ۚ فَشَرِبُوا۟ مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ ۚ فَلَمَّا جَاوَزَهُۥ هُوَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ قَالُوا۟ لَا طَاقَةَ لَنَا ٱلْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ ۚ قَالَ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ ٱللَّهِ كَم مِّن فِئَةٍ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةً كَثِيرَةًۢ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ ﴿249﴾ وَلَمَّا بَرَزُوا۟ لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ قَالُوا۟ رَبَّنَآ أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿250﴾ فَهَزَمُوهُم بِإِذْنِ ٱللَّهِ وَقَتَلَ دَاوُۥدُ جَالُوتَ وَءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلْمُلْكَ وَٱلْحِكْمَةَ وَعَلَّمَهُۥ مِمَّا يَشَآءُ ۗ وَلَوْلَا دَفْعُ ٱللَّهِ ٱلنَّاسَ بَعْضَهُم بِبَعْضٍ لَّفَسَدَتِ ٱلْأَرْضُ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ ذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿251﴾

(इस्राईलियों के सत्ता संभालने के बाद) फिर जब तालूत सेना लेकर निकले तो उन्होंने लोगों को बताया कि परमेश्वर ने निर्णय किया है कि वह एक नदी के माध्यम से तुम्हारी परीक्षा करेगा। यह इस प्रकार होगा कि जो इसका पानी पिएगा, वह मेरा साथी नहीं है और जिसने इस नदी से कुछ नहीं चखा, वह मेरा साथी है। हाँ, परंतु अपने हाथ से एक चुल्लू कोई पी ले तो पी ले। परंतु हुआ यह कि उनमें से थोड़े लोगों के सिवा बाक़ी सब ने उस नदी का पानी पी लिया। फिर जब तालूत उसके पार उतरे तो उनके वे साथी भी जो अपने ईमान पर क़ायम रहे, (और सेनाएँ देखीं) तो (जो लोग परीक्षा में पूरे नहीं उतरे थे), उन्होंने कह दिया कि हम तो आज जालूत और उसकी सेनाओं का सामना नहीं कर सकते। इसपर वे लोग जिन्हें ध्यान था कि उनको परमेश्वर से मिलना है, बोल उठे कि (साहस करो, इसलिए कि) अनेक बार ऐसा हुआ है कि परमेश्वर की आज्ञा से छोटे समूहों ने बड़े समूहों पर विजय पाई है, और परमेश्वर तो दृढ़संकल्प वालों के साथ होता है। और (यही सच्चे मुसलमान थे कि) जब जालूत और उसकी सेनाओं का सामना हुआ तो उन्होंने प्रार्थना की कि प्रभु, हम पर धैर्य की कृपा कर और हमारे पाँव जमा दे और इन नकारने वाले लोगों पर हमें विजय प्रदान करदे। अतः (उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई और) परमेश्वर के आदेश से उन्होंने अपने शत्रु को पराजित कर दिया और दाऊद ने जालूत का संहार कर दिया और परमेश्वर ने उसे साम्राज्य दिया और प्रज्ञा प्रदान की और उसे उस ज्ञान में से सिखाया जो परमेश्वर चाहता है कि अपने इस प्रकार के भक्तों को सिखाए — और सत्य यह है कि यदि परमेश्वर एक को दूसरे से नहीं हटाता तो धरती बिगाड़ से भर जाती, परंतु (उसने इसी प्रकार हटाया है, इसलिए कि) परमेश्वर दुनिया वालों पर बड़ी कृपा करने वाला है।

تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِٱلْحَقِّ ۚ وَإِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ ﴿252﴾ تِلْكَ ٱلرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۘ مِّنْهُم مَّن كَلَّمَ ٱللَّهُ ۖ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَـٰتٍ ۚ وَءَاتَيْنَا عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَأَيَّدْنَـٰهُ بِرُوحِ ٱلْقُدُسِ ۗ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقْتَتَلَ ٱلَّذِينَ مِنۢ بَعْدِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ وَلَـٰكِنِ ٱخْتَلَفُوا۟ فَمِنْهُم مَّنْ ءَامَنَ وَمِنْهُم مَّن كَفَرَ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقْتَتَلُوا۟ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ ﴿253﴾

यह परमेश्वर की आयतें हैं जो हम तुम्हें सत्य के साथ सुना रहे हैं, और इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम परमेश्वर के रसूलों में से हो। (इस्राईली भी इस बात को जानते हैं, परंतु मानते इसलिए नहीं हैं कि) ये जो रसूल हैं, हमने इनमें से एक को दूसरे पर श्रेष्ठता दी, (इस प्रकार कि) इनमें से किसी से परमेश्वर ने स्वयं बात की और किसी का स्तर उसने (कुछ अन्य प्रकार से) ऊँचा किया और (अंत में) मर्यम के पुत्र ईसा को हमने अत्यंत स्पष्ट निशानियाँ दीं और रूह-उल-क़ुदुस से उसका समर्थन किया। (अतः यही बात इन रसूलों के मानने वालों में एक दूसरे को झूठा बताने का कारण बन गई)। और यदि परमेश्वर चाहता तो अत्यंत स्पष्ट प्रमाण उनके सामने आ गए थे, उनके बाद ये रसूलों के उत्तराधिकारी एक दूसरे से न लड़ते, परंतु (परमेश्वर ने यह नहीं चाहा कि लोगों पर कुछ जबरन थोपे, इसलिए) उन्होंने मतभेद किया। अतः उनमें से कोई (इन रसूलों पर) ईमान लाया और किसी ने मानने से इंकार कर दिया। (तुमको न मानने का कारण भी यही है, हे पैग़ंबर), और यदि परमेश्वर चाहता तो वह कभी भी आपस में न लड़ते, परंतु परमेश्वर (अपनी प्रज्ञा के अनुसार) जो चाहता है करता है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَـٰكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌ وَلَا شَفَـٰعَةٌ ۗ وَٱلْكَـٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿254﴾

हे मानने वालो, (तुम इन्हें इनकी दशा में छोड़ो और) जो कुछ हमने तुम्हें दिया है, उसमें से (परमेश्वर के मार्ग में) उस दिन के आने से पहले दान कर लो, जिसमें न ख़रीदना-बेचना होगा, न (किसी की) मित्रता काम आएगी और न कोई अनुशंसा लाभ देगी। और सत्य यह है कि उस दिन को नकारने वाले ही अपने आप पर अत्याचार करने वाले हैं।

ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُۥ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ مَن ذَا ٱلَّذِى يَشْفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَىْءٍ مِّنْ عِلْمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ ﴿255﴾

(उस दिन मामला केवल परमेश्वर से होगा)। परमेश्वर, जिसके अतिरिक्त कोई उपासना योग्य नहीं, जीवंत-सत्ता और सब को थामे रखने वाला। न उसको ऊंघ आती है न नींद। धरती और समस्त आकशों में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है जो बिना उसकी अनुमति के उसके समक्ष किसी की अनुशंसा करे। लोगों के आगे और पीछे की हर बात जानता है और वे उसके ज्ञान में से कुछ भी अपनी पकड़ में नहीं ले सकते, परंतु जितना वह चाहे। उसका शासन धरती और समस्त आकाशों पर छाया हुआ है और उनकी रक्षा उसके लिए कुछ भी भारी नहीं होती, और वह सर्वोच्च है, बड़ी महिमा वाला है।

لَآ إِكْرَاهَ فِى ٱلدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ ٱلرُّشْدُ مِنَ ٱلْغَىِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِٱلطَّـٰغُوتِ وَيُؤْمِنۢ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱسْتَمْسَكَ بِٱلْعُرْوَةِ ٱلْوُثْقَىٰ لَا ٱنفِصَامَ لَهَا ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿256﴾

(यह जो आचरण चाहें, अपनाएं), धर्म के विषय में (परमेश्वर की ओर से) कोई ज़बरदस्ती नहीं है। सत्य यह है कि सीधा मार्ग (इस क़ुरआन के बाद अब) दूषित मार्ग से पूर्णतः अलग हो चुका है। इसलिए जिसने शैतान को नकारा और परमेश्वर को माना तो जैसे उसने अत्यंत मज़बूत रस्सी पकड़ ली जो कभी टूट नहीं सकती। और (यह इसलिए कि) परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है।

ٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُخْرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَوْلِيَآؤُهُمُ ٱلطَّـٰغُوتُ يُخْرِجُونَهُم مِّنَ ٱلنُّورِ إِلَى ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿257﴾

(यह मार्गदर्शन पाना चाहें तो) परमेश्वर मानने वालों का सहायक है। वह उन्हें अँधेरों से प्रकाश की ओर निकाल ले जाता है। इसके विपरीत नकारने वालों के सहायक उनके शैतान हैं, वे उन्हें प्रकाश से अँधेरों की ओर निकाल ले जाते हैं। यही नरकवासी हैं, ये उसमें सदा रहेंगे।

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِى حَآجَّ إِبْرَٰهِـۧمَ فِى رَبِّهِۦٓ أَنْ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلْمُلْكَ إِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّىَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا۠ أُحْىِۦ وَأُمِيتُ ۖ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَأْتِى بِٱلشَّمْسِ مِنَ ٱلْمَشْرِقِ فَأْتِ بِهَا مِنَ ٱلْمَغْرِبِ فَبُهِتَ ٱلَّذِى كَفَرَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿258﴾

(इस बात को समझना चाहते हो तो उसके कई उदाहरण हैं)। क्या तुमने उस व्यक्ति को नहीं देखा जिसने इब्राहीम से उसके प्रभु के बारे में वाद-विवाद करना चाहा, इसलिए कि परमेश्वर ने उसे सत्ता प्रदान की थी? उस समय, जब इब्राहीम ने उससे कहा कि मेरा प्रभु तो वह है जो मृत्यु देता और जीवित करता है। उसने उत्तर दिया कि मैं भी मारता हूँ और जीवित करता हूँ। इब्राहीम ने उसी क्षण कहा: अच्छा तो ऐसा है कि परमेश्वर सूर्य को पूरब से निकालता है, तुम उसे पश्चिम से निकाल लाओ। अतः (यह सुन कर) वह सत्य को नकारने वाला पूर्णतः अचंभित रह गया। और सत्य यह है कि इस प्रकार के अत्याचारी लोगों का परमेश्वर कभी मार्गदर्शन नहीं करता।

أَوْ كَٱلَّذِى مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍ وَهِىَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْىِۦ هَـٰذِهِ ٱللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا ۖ فَأَمَاتَهُ ٱللَّهُ مِا۟ئَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُۥ ۖ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ ۖ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِا۟ئَةَ عَامٍ فَٱنظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَٱنظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ ءَايَةً لِّلنَّاسِ ۖ وَٱنظُرْ إِلَى ٱلْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا ۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿259﴾

या उस व्यक्ति का उदाहरण है जो एक ऐसी बस्ती के पास से निकला जो अपनी छतों पर गिरी पड़ी थी। उसने आश्चर्य से कहा: इसके इस प्रकार नष्ट हो जाने के बाद परमेश्वर इसे कैसे पुनः जीवित करेगा? इसपर परमेश्वर ने उसे सौ वर्ष के लिए मृत्यु दी, फिर उसको उठाया (और) पूछा: कितने समय तक पड़े रहे? उसने उत्तर दिया: एक दिन या उससे भी कुछ कम रहा हूँ गा। परमेश्वर ने कहा: नहीं, अपितु सौ वर्ष इसी अवस्था में तुम पर निकल गए। अब ज़रा अपने खाने और पीने की चीज़ों को देखो, इनमें से कोई सड़ी नहीं। दूसरी ओर ज़रा अपने गधे को देखो कि हम उसको किस प्रकार जीवित करते हैं, इसलिए कि तुम्हें इस बस्ती के उठाए जाने पर विश्वास हो और इसलिए कि हम लोगों के लिए तुम्हें (आशा की) एक निशानी बना दें, और हड्डियों की ओर देखो, हम कैसे उनको उठाते और फिर उनपर मांस चढ़ाते हैं। इस प्रकार जब सत्य उसपर स्पष्ट हो गया तो वह पुकार उठा कि (अब कोई संदेह नहीं रहा), मैं जानता हूँ कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यह शायद पैग़ंबर यहेजकेल (Ezekiel) के उन दिव्य दर्शनों में से है जो इस्राईलियों में धर्म-प्रचार और उनके पुनरुत्थान के संघर्ष के लिए उठने से पहले उन्हें कराए गए। ↩
وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّ أَرِنِى كَيْفَ تُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَـٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِى ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةً مِّنَ ٱلطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ ٱجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍ مِّنْهُنَّ جُزْءًا ثُمَّ ٱدْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًا ۚ وَٱعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ﴿260﴾

और (इस विषय में) वह घटना भी सामने रहे, जब इब्राहीम ने कहा था कि प्रभु, मुझे दिखा दें कि आप मुरदों को कैसे जीवित करेंगे? परमेश्वर ने कहा: क्या तुम विश्वास नहीं रखते? इब्राहीम ने निवेदन किया: विश्वास तो रखता हूँ, परंतु इच्छा है कि मेरा दिल पूर्णतः संतुष्ट हो जाए। कहा: अच्छा, तो चार पक्षी लो, फिर उनको अपने साथ हिला-मिला लो, फिर (उनको काट कर के) हर पहाड़ी पर उनमें से एक-एक को रख दो, फिर उन्हें पुकारो, वे (जीवित होकर) दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ जाएँगे, और (भविष्य के लिए) अच्छे से समझ लो कि परमेश्वर प्रबल है, वह बड़ा प्रज्ञावान है।

مَّثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنۢبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِى كُلِّ سُنۢبُلَةٍ مِّا۟ئَةُ حَبَّةٍ ۗ وَٱللَّهُ يُضَـٰعِفُ لِمَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ ﴿261﴾ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَآ أَنفَقُوا۟ مَنًّا وَلَآ أَذًى ۙ لَّهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿262﴾ قَوْلٌ مَّعْرُوفٌ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌ مِّن صَدَقَةٍ يَتْبَعُهَآ أَذًى ۗ وَٱللَّهُ غَنِىٌّ حَلِيمٌ ﴿263﴾ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُبْطِلُوا۟ صَدَقَـٰتِكُم بِٱلْمَنِّ وَٱلْأَذَىٰ كَٱلَّذِى يُنفِقُ مَالَهُۥ رِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ فَمَثَلُهُۥ كَمَثَلِ صَفْوَانٍ عَلَيْهِ تُرَابٌ فَأَصَابَهُۥ وَابِلٌ فَتَرَكَهُۥ صَلْدًا ۖ لَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَىْءٍ مِّمَّا كَسَبُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿264﴾

(मार्गदर्शन और मार्गभ्रष्टता के विषय में परमेश्वर की कार्यप्रणाली यही है। इसलिए ये नहीं मानते तो इन्हें छोड़ो और तुम अच्छे से समझ लो कि) परमेश्वर के मार्ग में अपना धन दान करने वालों का यह कार्य एक ऐसे दाने जैसा है जिससे सात बालियाँ निकलीं, इस प्रकार कि हर बाली में सौ दाने हों। परमेश्वर (अपनी प्रज्ञा के अनुसार) जिसके लिए चाहता है, इसी प्रकार बढ़ा देता है। और सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ा व्यापक है, वह हर चीज़ से परिचित है। जो लोग परमेश्वर के मार्ग में अपने धन को दान करते हैं, फिर जो कुछ दान किया है, उसके बाद न उपकार जताते हैं, न दिल दुखाते हैं, उनके लिए उनके प्रभु के पास उनका अच्छा फल है और उनके लिए न वहाँ कोई आशंका है और न वे कभी दुखी होंगे। एक अच्छा बोल और (एक अप्रिय घटना के समय) क्षमा करना उस दान से कहीं अच्छा है जिसके साथ कष्ट लगा हुआ हो। और (तुम्हें जानना चाहिए कि) इस प्रकार के दान की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है, (इस आचरण पर वह तुम्हें वंचित कर देता, परंतु उसका मामला यह है कि) इसके साथ वह बड़ा सहनशील भी है। हे मानने वालो, उपकार जताकर और (दूसरों का) मन दुखाकर के अपने दान को उन लोगों के समान नष्ट मत करो जो अपना धन लोगों को दिखाने के लिए देते हैं और वे न परमेश्वर को मानते हैं और न क़यामत के दिन को मानते हैं। अतः उनका उदाहरण ऐसा है कि एक चटान हो जिसपर कुछ मिट्टी हो, फिर उस पर भारी बारिश हो और उसको पूरी तरह चटान की चटान छोड़ जाए। (क़यामत के दिन) उनकी कमाई में से कुछ भी उनके हाथ न आएगा। और सत्य यह है कि इस प्रकार के अकृतज्ञ लोगों का परमेश्वर कभी मार्गदर्शन नहीं करता।

وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمُ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ وَتَثْبِيتًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ كَمَثَلِ جَنَّةٍۭ بِرَبْوَةٍ أَصَابَهَا وَابِلٌ فَـَٔاتَتْ أُكُلَهَا ضِعْفَيْنِ فَإِن لَّمْ يُصِبْهَا وَابِلٌ فَطَلٌّ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿265﴾

परमेश्वर की प्रसन्नता को चाहने के लिए और अपने आप को सत्य पर क़ायम रखने के उद्देश्य से अपना धन दान करने वाले उस बाग़ के समान हैं जो ऊंची और समतल भूमि पर स्थित हो। उस पर भारी बारिश हो जाए तो अपना फल दुगुना लाए और भारी बारिश न हो तो हल्की फुहार भी पर्याप्त हो जाए। (यह उदाहरण सामने रखो) और (संतुष्ट रहो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देख रहा है।

أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُۥ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ لَهُۥ فِيهَا مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ وَأَصَابَهُ ٱلْكِبَرُ وَلَهُۥ ذُرِّيَّةٌ ضُعَفَآءُ فَأَصَابَهَآ إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ فَٱحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ ﴿266﴾

क्या तुम में किसी को यह अच्छा लगेगा कि उसके पास खजूरों और अंगूरों का बाग़़ हो जिसके नीचे नहरें बहती हों। उसमें उसके लिए सब प्रकार के फल हों और वह बूढ़ा हो जाए और उसके बच्चे अभी अशक्त हों और बाग़़ पर एक आग भरा बगूला फिर जाए और वह जल कर राख हो जाए। (उपकार जता कर और दूसरों की भावनाएँ आहत कर के अपना दान बर्बाद कर लेने वालों की स्थिति क़यामत में यही होगी)। परमेश्वर इसी प्रकार अपनी आयतें तुम्हारे लिए स्पष्ट करता है ताकि तुम ध्यान दो।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنفِقُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّآ أَخْرَجْنَا لَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ ۖ وَلَا تَيَمَّمُوا۟ ٱلْخَبِيثَ مِنْهُ تُنفِقُونَ وَلَسْتُم بِـَٔاخِذِيهِ إِلَّآ أَن تُغْمِضُوا۟ فِيهِ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ حَمِيدٌ ﴿267﴾

हे मानने वालो, अपनी पवित्र कमाई में से दान करो और उसमें से भी जो हमने तुम्हारे लिए धरती में से निकाला है, और उसमें से कोई बुरी चीज़ (परमेश्वर के मार्ग में) दान करने की तो कल्पना भी न करो। तुम इस प्रकार की चीज़ों में से दान करते हो, परंतु अपना हाल यह है कि उसका दाम घटा न लो तो उसे लेने के लिए उत्सुक नहीं होते और जान लो कि (तुम्हारे इस दान से) परमेश्वर निस्पृह है, वह उत्तम गुणों वाला है।

ٱلشَّيْطَـٰنُ يَعِدُكُمُ ٱلْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِٱلْفَحْشَآءِ ۖ وَٱللَّهُ يَعِدُكُم مَّغْفِرَةً مِّنْهُ وَفَضْلًا ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ ﴿268﴾ يُؤْتِى ٱلْحِكْمَةَ مَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ ٱلْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِىَ خَيْرًا كَثِيرًا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ ﴿269﴾

शैतान तुम्हें धन के अभाव से डराता और (ख़र्च के लिए) निर्लज्जता के मार्ग का सुझाव देता है और परमेश्वर अपनी ओर से तुम्हारे साथ क्षमा और उपकार का वादा करता है, और परमेश्वर बड़ा व्यापक और परम ज्ञानी है। वह (अपने नियम अनुसार) जिसको चाहता है, इस वादे की समझ बूझ प्रदान करता है, और जिसे यह समझ बूझ दी गई, उसे तो वास्तव में विपुल सौभाग्य का एक भंडार दे दिया गया। परंतु (इस प्रकार की बातों से) केवल बुद्धिजीवी ही स्मरण प्राप्त करते हैं।

وَمَآ أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُهُۥ ۗ وَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ ﴿270﴾

(इस बात को समझ लो) और (संतुष्ट रहो कि) जो दान भी तुम करोगे या जो मनौती भी तुम मानोगे, उसका बदला अवश्य पाओगे, इसलिए कि परमेश्वर उसे जानता है और (परमेश्वर की इस शिक्षा से विमुख हो कर) अपने आप पर अत्याचार करने वालों का (परमेश्वर के पास) कोई सहायक न होगा।

إِن تُبْدُوا۟ ٱلصَّدَقَـٰتِ فَنِعِمَّا هِىَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا ٱلْفُقَرَآءَ فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّـَٔاتِكُمْ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴿271﴾

तुम अपने दान सब के सामने दो तो यह भी क्या अच्छी बात है और उसे छिपाओ और ग़रीबों को दे दो तो यह तुम्हारे लिए और अच्छा है। (परमेश्वर तुमको इसका अच्छा बदला देगा) और तुम्हारे बहुत से पाप तुमसे झाड़ देगा और सत्य यह है कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे पूर्णतः अवगत है।

لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَىٰهُمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهْدِى مَن يَشَآءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ٱبْتِغَآءَ وَجْهِ ٱللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ ﴿272﴾

(इस्राईली नहीं मानते तो हे पैग़ंबर), इनको सन्मार्ग पर ले आना तुम्हारा दायित्व नहीं है, अपितु परमेश्वर ही जिसका चाहता है, (अपने नियम अनुसार) मार्गदर्शन करता है। (अपितु, हे मानने वालो, तुम समझ लो कि) जो धन भी तुम दान करोगे, उसका लाभ तुम्हें ही मिलना है, और तुम इसी लिए तो धन लुटा रहे हो कि परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त हो, और (इस उद्देश्य से) जो धन भी तुम दान करोगे, वह (क़यामत में) तुम्हें पूरा कर दिया जाएगा और तुम्हारी कमाई में थोड़ा सा भी घाटा न होगा।

لِلْفُقَرَآءِ ٱلَّذِينَ أُحْصِرُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًا فِى ٱلْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ ٱلْجَاهِلُ أَغْنِيَآءَ مِنَ ٱلتَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَـٰهُمْ لَا يَسْـَٔلُونَ ٱلنَّاسَ إِلْحَافًا ۗ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌ ﴿273﴾ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُم بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ سِرًّا وَعَلَانِيَةً فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿274﴾

यह विशेषतः उन ग़रीबों के लिए है जो परमेश्वर के मार्ग में घिरे हुए हैं, (अपने व्यापार के लिए) धरती में कोई दौड़-धूप नहीं कर सकते, उनके आत्मसम्मान के कारण अंजान व्यक्ति उनको धनवान समझता है, उनके चेहरों से तुम उन्हें पहचान सकते हो, वे लोगों से लिपट कर भिक्षा नहीं मांगते। (उनकी सहायता करो) और (समझ लो कि इस उद्देश्य के लिए) जो धन भी तुम दोगे, उसका अच्छा फल तुम्हें अवश्य मिलेगा, इसलिए कि परमेश्वर उसे भलीभांति जानता है। जो लोग दिन रात, खुले हुए और चुपके-चुपके अपना धन (परमेश्वर के मार्ग में) देते हैं, उनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है और वहाँ उनके लिए न कोई आशंका है और न वे कभी दुखी होंगे।

ٱلَّذِينَ يَأْكُلُونَ ٱلرِّبَوٰا۟ لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ ٱلَّذِى يَتَخَبَّطُهُ ٱلشَّيْطَـٰنُ مِنَ ٱلْمَسِّ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّمَا ٱلْبَيْعُ مِثْلُ ٱلرِّبَوٰا۟ ۗ وَأَحَلَّ ٱللَّهُ ٱلْبَيْعَ وَحَرَّمَ ٱلرِّبَوٰا۟ ۚ فَمَن جَآءَهُۥ مَوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّهِۦ فَٱنتَهَىٰ فَلَهُۥ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ۖ وَمَنْ عَادَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿275﴾ يَمْحَقُ ٱللَّهُ ٱلرِّبَوٰا۟ وَيُرْبِى ٱلصَّدَقَـٰتِ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ أَثِيمٍ ﴿276﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ ﴿277﴾

इसके विपरीत जो लोग ब्याज खाते हैं, वे क़यामत में उठेंगे तो ठीक ऐसे व्यक्ति के समान जिसे शैतान ने अपने छूने से पागल बना दिया हो। यह इस कारण कि उन्होंने कहा कि व्यापार भी तो अंततः ब्याज ही के समान है और आश्चर्य है कि परमेश्वर ने व्यापार को वैध और ब्याज को अवैध घोषित किया है। (इसमें कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर ने उसे अवैध घोषित किया है), इसलिए जिसे उसके प्रभु की चेतावनी पहुंची और वह सुधर गया तो जो कुछ वह ले चुका, सो ले चुका। (उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होगी) और उसका मामला परमेश्वर के लिए है। और जो (इस चेतावनी के बाद भी) फिर से ब्याज लेंगे तो वे नरकवासी हैं, वे उसमें सदा रहेंगे। (उस दिन) परमेश्वर ब्याज को मिटाएगा और दान को बढ़ाएगा और सत्य यह है कि परमेश्वर किसी अकृतज्ञ और किसी के अधिकारों का हनन करने वाले से प्रेम नहीं करता। हाँ, जो लोग मान गए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और नमाज़ का प्रबंघ किया और ज़कात की, उनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है और वहाँ उनके लिए न कोई आशंका होगी और न वे कोई दुख कभी उठाएंगे।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَذَرُوا۟ مَا بَقِىَ مِنَ ٱلرِّبَوٰٓا۟ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿278﴾ فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا۟ فَأْذَنُوا۟ بِحَرْبٍ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۖ وَإِن تُبْتُمْ فَلَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَٰلِكُمْ لَا تَظْلِمُونَ وَلَا تُظْلَمُونَ ﴿279﴾ وَإِن كَانَ ذُو عُسْرَةٍ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيْسَرَةٍ ۚ وَأَن تَصَدَّقُوا۟ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿280﴾ وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًا تُرْجَعُونَ فِيهِ إِلَى ٱللَّهِ ۖ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ﴿281﴾

हे मानने वालो, यदि तुम सच्चे मानने वाले हो तो परमेश्वर से डरो और जितना ब्याज बाक़ी रह गया है, उसे छोड़ दो। परंतु यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो परमेश्वर और उसके रसूल की ओर से युद्ध के लिए सावधान हो जाओ, और यदि प्रायश्चित कर लो तो तुम्हारी मूल धनराशि का तुम्हें अधिकार है। न तुम किसी के साथ अन्याय करोगे, न तुम्हारे साथ अन्याय किया जाएगा। और ऋणी कभी कठिनाई में हो तो समृद्ध होने तक उसे छूट दो और यदि तुम क्षमा करो तो यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम समझते हो। और उस दिन से डरो, जिसमें परमेश्वर की ओर लौटाए जाओगे। फिर हर व्यक्ति को उसकी कमाई वहाँ पूरी मिल जाएगी और लोगों से साथ कोई अन्याय नहीं होगा।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيْنٍ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى فَٱكْتُبُوهُ ۚ وَلْيَكْتُب بَّيْنَكُمْ كَاتِبٌۢ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَلَا يَأْبَ كَاتِبٌ أَن يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ ٱللَّهُ ۚ فَلْيَكْتُبْ وَلْيُمْلِلِ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْـًٔا ۚ فَإِن كَانَ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا أَوْ لَا يَسْتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُۥ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَٱسْتَشْهِدُوا۟ شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌ وَٱمْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ ٱلشُّهَدَآءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَىٰهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَىٰهُمَا ٱلْأُخْرَىٰ ۚ وَلَا يَأْبَ ٱلشُّهَدَآءُ إِذَا مَا دُعُوا۟ ۚ وَلَا تَسْـَٔمُوٓا۟ أَن تَكْتُبُوهُ صَغِيرًا أَوْ كَبِيرًا إِلَىٰٓ أَجَلِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمْ أَقْسَطُ عِندَ ٱللَّهِ وَأَقْوَمُ لِلشَّهَـٰدَةِ وَأَدْنَىٰٓ أَلَّا تَرْتَابُوٓا۟ ۖ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَـٰرَةً حَاضِرَةً تُدِيرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَلَّا تَكْتُبُوهَا ۗ وَأَشْهِدُوٓا۟ إِذَا تَبَايَعْتُمْ ۚ وَلَا يُضَآرَّ كَاتِبٌ وَلَا شَهِيدٌ ۚ وَإِن تَفْعَلُوا۟ فَإِنَّهُۥ فُسُوقٌۢ بِكُمْ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱللَّهُ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿282﴾

हे मानने वालो, (उधार के मामले फिर भी होंगे। इसलिए) तुम किसी निर्धारित अवधि के लिए उधार का लेन देन करो तो उसे लिख लो और चाहिए कि उसको तुम्हारे बीच कोई लिखने वाला न्यायपूर्वक लिखे। और जिसे लिखना आता हो, वह लिखने से मना न करे, अपितु जिस प्रकार परमेश्वर ने उसे सिखाया है, वह भी दूसरों के लिए लिख दे। और यह दस्तावेज़ उसे लिखवानी चाहिए जिस पर उधार को चुकाने का दायित्व होता है। और वह अपने प्रभु परमेश्वर से डरे और उसमें कोई कटौती न करे। फिर यदि वह व्यक्ति जिस पर उधार चुकाने का दायित्व होता है, नासमझ या कमज़ोर हो या लिखवा न सकता हो तो उसके अभिभावक को चाहिए कि वह न्यायपूर्वक लिखवा दे। और तुम इस पर अपने पुरुषों में से दो व्यक्तियों की गवाही करा लो, परंतु यदि दो पुरुष न हों तो एक पुरुष और दो महिलाएं हों, तुम्हारे मनपसंद गवाहों में से। दो महिलाएं इसलिए कि यदि एक उलझेगी तो दूसरी उसको याद दिला देगी। और ये गवाह जब बुलाए जाएँ तो उन्हें मना नहीं करना चाहिए। और मामला छोटा हो या बड़ा, उसकी समय सीमा तक उसे लिखने में सुस्ती न करो। परमेश्वर की दृष्टि में यह प्रक्रिया अधिक न्यायसंगत है, गवाही को अधिक दोषरहित रखने वाला है और इससे तुम्हारी शंकाओं में पड़ने की संभावना कम हो जाती है। हाँ, यदि लेन देन आमने सामने हाथों हाथ हो, तब उसके न लिखने में तुम्हारे लिए कोई समस्या नहीं है। और सौदा करते समय भी गवाह बना लिया करो, और (सावधान रहो कि) लिखने वाले या गवाही देने वाले को कोई हानि न पहुंचाई जाए, और यदि तुम ऐसा करोगे तो यह ऐसा पाप है जो तुम्हारे साथ चिपक जाएगा। और परमेश्वर से डरते रहो, और (इस बात को समझो कि) परमेश्वर तुम्हें शिक्षा दे रहा है, और परमेश्वर हर बात से परिचित है।1

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  1. अर्थात पुरुषों के सामने और अदालत के माहौल में घबराकर यदि कोई ग़लती करेगी तो दूसरी सुधार देगी। यह सतर्कता (सद्द-ए-ज़रिया) के तौर पर दिया गया निर्देश है। अतः महिलाओं की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन के कारण इसकी आवश्यकता यदि बाक़ी न रहे तो इसका अनुसरण भी आवश्यक नहीं होगा। ↩
وَإِن كُنتُمْ عَلَىٰ سَفَرٍ وَلَمْ تَجِدُوا۟ كَاتِبًا فَرِهَـٰنٌ مَّقْبُوضَةٌ ۖ فَإِنْ أَمِنَ بَعْضُكُم بَعْضًا فَلْيُؤَدِّ ٱلَّذِى ٱؤْتُمِنَ أَمَـٰنَتَهُۥ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ ۗ وَلَا تَكْتُمُوا۟ ٱلشَّهَـٰدَةَ ۚ وَمَن يَكْتُمْهَا فَإِنَّهُۥٓ ءَاثِمٌ قَلْبُهُۥ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ ﴿283﴾

और यदि तुम यात्रा में हो और तुम्हें कोई लिखने वाला न मिले तो ऋण का मामला गिरवी रखने के रूप में भी हो सकता है। फिर यदि एक दूसरे पर भरोसे की स्थिति पैदा हो जाए तो जिसके पास (गिरवी वस्तु) सुरक्षित रखी गई है, वह यह वस्तु वापस कर दे और अपने प्रभु, परमेश्वर से डरता रहे (और इस विषय में गवाही करा ले), और गवाही (जिस रूप में भी हो, उस) को कभी भी न छिपाओ और (याद रखो कि) जो उसे छिपाएगा, उसका दिल पापी होगा, और (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे जानता है।

لِّلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَإِن تُبْدُوا۟ مَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُم بِهِ ٱللَّهُ ۖ فَيَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿284﴾

धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर ही का है, (इसलिए, हे इस्राईलियो, तुम भी एक दिन उसी की ओर लौटाए जाओगे) और जो कुछ तुम्हारे दिल में है, उसे तुम व्यक्त करो या छिपाओ, परमेश्वर उसका हिसाब तुमसे लेगा। फिर जिसको चाहेगा, (अपने नियम अनुसार) क्षमा कर देगा और जिसको चाहेगा, दंडित करेगा, और परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यह इस महान सूरह का अंतिम हिस्सा है जिसमें इस्राईलियों (Israelites) से संबंध तोड़ने (बराअत) के बाद एक अद्वितीय प्रार्थना इस नवीन मुस्लिम संघ (उम्मत) की ज़बान पर जारी हो गई है जो पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को मानने के बाद इस्माईलियों (इस्माईल की संतान/Ishmaelites) में से उठाया गया। ↩
ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِۦ ۚ وَقَالُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ ٱلْمَصِيرُ ﴿285﴾ لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا ٱكْتَسَبَتْ ۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَآ إِن نَّسِينَآ أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَآ إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِۦ ۖ وَٱعْفُ عَنَّا وَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَآ ۚ أَنتَ مَوْلَىٰنَا فَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿286﴾

(तुम नहीं मानते तो इसका परिणाम भी तुम्हें ही देखना है)। हमारे पैग़ंबर ने तो उस चीज़ को मान लिया है जो उसके प्रभु की ओर से उस पर उतारी गई है, और उसके मानने वालों ने भी। इन सब ने परमेश्वर को माना, और उसके फ़रिश्तों और उसके ग्रन्थों और उसके पैग़ंबरों को माना। (यह स्वीकार करते हैं कि) हम परमेश्वर के पैग़ंबरों में से किसी के बीच कोई भेद-भाव नहीं करते और उन्होंने कह दिया है कि हमने सुना और आज्ञा का पालन किया। प्रभु, हम तेरी क्षमा चाहते हैं, और (जानते हैं कि) हमें लौट कर तेरे ही पास पहुँचना है।  — यह सत्य है कि परमेश्वर किसी पर उसकी शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता। (उसका नियम है कि) उसी को मिलेगा जो उसने कमाया है और वही भोगेगा जो उसने किया है — प्रभु, हम भूल जाएं या ग़लती कर जाएं तो उस पर हमारी पकड़ न कर। और प्रभु, तू हम पर कोई ऐसा बोझ न डाल जो तूने हमसे पूर्व लोगों पर डाला था। और प्रभु, कोई ऐसा बोझ जिसको उठाने की क्षमता हम नहीं रखते, तू हम से न उठवा, और हमारे पापकर्मों को अनदेखा कर और हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर। तू हमारा स्वामी है, अतः इन नकारने वालों के विरुद्ध (जो हमारे शत्रु बनकर उठ खड़े हुए हैं), तू हमारी सहायता कर।