सूरह 1

अल्-फ़ातिहा

मक्की · 6 आयतें · 2 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

अपने विषय के अनुसार, यह सूरह जगत-प्रभु परमेश्वर से उस सीधे मार्ग के लिए मार्गदर्शन की एक प्रार्थना है, जो पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की नियुक्ति के समय में हर सच्चे इंसान की आकांक्षा थी। यहूदियों और ईसाइयों ने अपनी पथभ्रष्टता और विकृति से धर्म का जो स्वरूप बिगाड़ दिया था, उसके बाद इस मार्गदर्शन की आकांक्षा जैसे हर दिल की पुकार बन गई थी जिसे परमेश्वर ने इस सूरह के अद्वितीय और अमर शब्दों में अपने पैग़ंबर की ज़बान से व्यक्त किया है।

तौरात और इंजील के बाद, एक नए मार्गदर्शन की प्रार्थना, यही इस सूरह का मुख्य विषय है। इस प्रकार, कुरआन की इस सूरह का इस अध्याय की बाक़ी ‘मदनी’ सूरतों के साथ संबंध, जैसा कि इस अध्याय के परिचय में बताया गया है, संक्षेप और विस्तार ही का है। परंतु अपने इस विषय के अनुसार, यह कुरआन की एक उपयुक्त प्रस्तावना भी है।

इस दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह कुरआन की पहली सूरह है जो मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) की नियुक्ति के बाद उनपर अवतरित हुई है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहाँ 'إقرأہ علی الناس' का अर्थ अरबी भाषा के सिद्धांतों के अनुसार अंतर्निहित है, अर्थात परमेश्वर के नाम से यह क़ुरआन लोगों को पढ़कर सुनाओ। ↩

इस अनुवाद में बिस्मिल्लाह अलग रखी गई है। इस सूरह की आयतें 1 से 6 तक हैं।

ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿1﴾ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ﴿2﴾ مَـٰلِكِ يَوْمِ ٱلدِّينِ ﴿3﴾

आभार परमेश्वर ही के लिए है, जगत प्रभु, सर्वथा दया, जिसकी कृपा शाश्वत है, जो प्रतिफल के दिन का स्वामी है।

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ ﴿4﴾ ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ ﴿5﴾ صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ ٱلْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا ٱلضَّآلِّينَ ﴿6﴾

(प्रभु), हम तेरी ही उपासना करते हैं और तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधे मार्ग का निदेशन प्रदान कर। उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने अनुग्रह किया है, जो न तेरे प्रचंड क्रोध के भागी हुए हैं, न मार्ग से भटके हैं।