सूरह 10
यूनुस्
मक्की · 109 आयतें · 30 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का मूलभाव सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है। अपितु, दूसरी सूरह में इस इंज़ार व बशारत के ऐतिहासिक प्रमाण अधिक विस्तार से प्रस्तुत किए गए हैं। दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश से है, और इनकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जिसे 'इत्माम-ए-हुज्जत' का चरण कहा जाता है।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
यह सूरह 'अलिफ़ लाम रा' है। यह उस ग्रंथ की आयतें हैं जो सर्वथा प्रज्ञान है। क्या इन लोगों को इस पर आश्चर्य हो गया कि हमने इन्हीं में से एक व्यक्ति पर वह्य की है कि लोगों को सचेत करो और जो मान लें, उन्हें शुभ सूचना पहुंचा दो कि उनके लिए उनके प्रभु के पास बड़े सम्मान का पद है? (इस सत्य को समझने के बजाए) इन नकारने वालों ने कह दिया कि यह व्यक्ति तो स्पष्ट जादूगर है।
(लोगो), सत्य यह है कि तुम्हारा प्रभु वही परमेश्वर है जिसने समस्त आकाशों और धरती की रचना छः दिन में की, फिर मामलों की व्यवस्था संभाले हुए अपने सिंहासन पर स्थापित हो गया। उसकी अनुमति के बिना कोई (उसके समक्ष) अनुशंसा करने वाला नहीं है। तुम्हारा प्रभु वही परमेश्वर है, इसलिए उसी की भक्ति करो। फिर क्या तुम सोचते नहीं हो? तुम सबको एक दिन उसी की ओर लौट कर जाना है। यह परमेश्वर का सच्चा वादा है। इसमें संदेह नहीं कि वही सृष्टि की उत्पत्ति करता है, फिर वही उसको पुनः उत्पन्न करेगा, इसलिए कि जो लोग मान गए और उन्होंने भले कर्म किए हैं, उनको न्यायपूर्वक (उनके कर्मों का) बदला दे। इसके विपरीत जिन्होंने नकार दिया है, उनके नकारने के बदले में जो वे करते रहे, उनके लिए खौलता हुआ पानी और कष्टदायक यातना है। वही है जिसने सूर्य को ज्वलंत और चाँद को प्रकाशमान बनाया और उसके लिए पड़ाव बना दिए ताकि तुम उससे वर्षों की गिनती और उनका आकलन जान लो। परमेश्वर ने ये सब कुछ उद्देश्य के साथ ही बनाया है। वह उन लोगों के लिए जो जानना चाहें, अपनी निशानियों की व्याख्या करता है। निश्चित रूप से रात और दिन के उलटफेर में और जो कुछ धरती और समस्त आकाशों में परमेश्वर ने पैदा किया है, उसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो डरते हैं। सत्य यह है कि जो लोग हमसे मिलने की आकांक्षा नहीं रखते और इसी दुनिया के जीवन से प्रसन्न और संतुष्ट हो गए हैं और जो हमारी निशानियों से बेपरवाह है, उन्हीं का ठिकाना नरक है, उनके दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप। इसके विपरीत जो लोग मान गए और उन्होंने भले कर्म किए हैं, उनका प्रभु उनके मानने के कारण उन्हें उनके लक्ष्य तक पहुंचा देगा। उनके नीचे सुखमय बाग़ों में उनके लिए नहरें बह रही होंगी। वहाँ उनकी पुकार होगी कि हे परमेश्वर, तू दोषरहित है और उनका अभिवादन शब्द वहाँ सलाम होगा और (जब देखेंगे कि सर्वत्र आनंद ही आनंद है तो) उनकी अंतिम बात यही होगी कि आभार परमेश्वर ही के लिए है जो समस्त लोकों का प्रभु है।
(ये दण्ड मांगते हैं), यदि परमेश्वर लोगों के लिए दण्ड के मामले में भी उसी प्रकार जल्दी करता, जिस प्रकार वह उनके साथ दया में जल्दी करता है तो उनकी अवधि समाप्त कर दी गई होती। (परंतु ये नहीं समझते), अतः हम उन लोगों को जो हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, उनकी अवज्ञा में भटकने के लिए छोड़ देते हैं। (सत्य यह है कि इन्हें कोई दण्ड दिखा भी दिया जाए तो नहीं मानेंगे। इसलिए कि) मनुष्य का मामला यह है कि जब उस पर कोई बुरा समय आता है तो वह लेटे, बैठे या खड़े, (हर स्थिति में) हमको पुकारता है। फिर जब उसका वह कष्ट हम उससे टाल देते हैं तो इस प्रकार चल देता है कि मानो जो कष्ट उसे पहुंचा, उसमें कभी उसने हमको पुकारा ही न था। मर्यादा का अतिक्रमण करने वालों के लिए उनके कर्म इसी प्रकार लुभावने बना दिए गए हैं।
तुमसे पहले की क़ौमों का हमने सर्वनाश कर दिया था, जब वे (इसी प्रकार) अत्याचार के दोषी हुए। उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए और उन्होंने कभी भी नहीं माना। हम अपराधियों को इसी प्रकार (उनके अपराधों का) बदला देते हैं। अब उनके बाद हमने धरती में उनका स्थान तुम्हें दिया है ताकि देखें, तुम कैसे कर्म करते हो।
परंतु इनकी दशा भी वही है, (हे पैग़ंबर) कि जब हमारी स्पष्ट आयतें इन्हें पढ़कर सुनाई जाती हैं तो जिन लोगों को हमसे मिलने का डर नहीं है, वे कहते हैं कि इसके स्थान पर कोई और क़ुरआन लाओ या इसमें संशोधन कर दो। कह दो, (यह परमेश्वर की वाणी है), मुझे क्या अधिकार है कि मैं इसमें अपनी ओर से कोई संशोधन करूँ? मैं तो केवल उस वह्य का पालन करता हूँ जो मेरे पास आती है। यदि मैं अपने प्रभु की अवज्ञा करूँ तो एक भयंकर दिन की यातना से डरता हूँ। कह दो, यदि परमेश्वर चाहता तो न मैं यह क़ुरआन तुम्हें सुनाता, न परमेश्वर इसकी सूचना तुम्हें देता। यह उसी का निर्णय है, इसलिए कि मैं तो इससे पहले एक लंबा जीवन तुम्हारे बीच व्यतीत कर चुका हूँ। (मैंने कब इस प्रकार की कोई बात कभी की है?) फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? अतः उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो परमेश्वर पर झूठा लांछन लगाए या उसकी आयतों को झूठा कह दे? सत्य यह है कि इस प्रकार के अपराधी कभी सफलता नहीं पाएंगे।
(ये इस समय भी झूठ बांध रहे हैं। इसलिए) परमेश्वर के सिवा उनकी पूजा कर रहे हैं जो इनको न क्षति पहुंचा सकें, न लाभ और कहते हैं कि ये परमेश्वर के यहाँ हमारी अनुशंसा करने वाले हैं। इनसे कहो, क्या तुम परमेश्वर को उस बात की सूचना देते हो जिसे वह स्वयं भी नहीं जानता, न समस्त आकाशों में कहीं और न धरती में! वह दोषरहित और ऊँचा है उन चीज़ों से जिन्हें ये सहभागी बनाते हैं। (अपने इस शिर्क के लिए ये पूर्वजों का उल्लेख न करें)। सत्य यह है कि लोग एक ही समूह थे, उन्होंने बाद में मतभेद किया है और यदि तेरे प्रभु की ओर से एक बात पहले निश्चित न कर ली गई होती तो इनके बीच उस चीज़ का निपटारा कर दिया जाता जिसमें ये मतभेद कर रहे हैं।
और ये जो कहते हैं कि नबी पर उसके प्रभु की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गई तो इनसे कहो, (यह अनदेखे लोक के मामले हैं और) अदृष्ट का ज्ञान तो परमेश्वर ही को है। इसलिए प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहा हूं। लोगों की दशा यह है कि (दंड की निशानी मांगते हैं, परंतु) जब किसी संकट के बाद जो उन्हें पहुंचा हो, हम इन लोगों को अपनी दया का स्वाद चखाते हैं तो हमारी निशानियों के विषय में ये उसी समय टालमटोल करने लगते हैं। इनसे कहो, परमेश्वर अपने उपायों में कहीं चतुर है। याद रखो, जो चालबाज़ियाँ तुम कर रहे हो, हमारे फ़रिश्ते उन्हें लिख रहे हैं।
(इसका उदाहरण यह है कि) वह परमेश्वर ही है जो तुम्हें थल और जल में यात्रा कराता है, यहाँ तक कि जब तुम नौका में होते हो और नौकाएँ लोगों को लेकर अनुकूल हवा से चल रही होती हैं और लोग उससे हर्षित व आनंदित होते हैं कि अचानक उस पर तीव्र हवा आ जाती है और नौका के यात्रियों पर हर ओर से लहरें उठने लगती हैं और वे समझ लेते हैं कि आँधी में घिर गए, उस समय वे केवल परमेश्वर के आज्ञाकारी होकर उसको पुकारने लगते हैं कि यदि तूने हमें इससे मुक्ति दे दी तो हम अवश्य आभारी होकर रहेंगे। फिर जब वह उन्हें मुक्ति दे देता है तो तुरंत ही बिना किसी अधिकार के धरती में विद्रोह करने लगते हैं। लोगो, तुम्हारे विद्रोह का बुरा परिणाम तुम्ही पर आने वाला है। दुनिया के जीवन का लाभ उठा लो, फिर तुम को पलट कर हमारे ही पास आना है, उस समय हम तुम्हें बता देंगे जो कुछ तुम कर रहे थे। दुनिया का यह जीवन (जिसने तुम्हें बेपरवाही में डाल दिया है), इसका उदाहरण इस प्रकार है जैसे बारिश कि हमने उसे आकाश से बरसाया तो धरती की वनस्पतियाँ उससे बहुत घनी निकलीं, वे भी जिन्हें लोग खाते हैं और वे भी जिन्हें पशु खाते हैं। यहाँ तक कि जब धरती अपने सौन्दर्य पर आगाई और उसने शृंगार कर लिया और धरती वालों ने सोचा कि अब वे उस पर पूर्ण सामर्थ्य रखते हैं तो अचानक रात या दिन में (किसी समय) हमारा आदेश उस पर आ गया, फिर हमने उसे ऐसा काट कर ढेर कर दिया कि मानो वहाँ कुछ था ही नहीं। हम अपनी निशानियों का उल्लेख उन लोगों के लिए इसी प्रकार करते हैं जो चिंतन मनन करते हैं।
(लोगो, तुम इस जीवन के धोके में पड़े हो) और परमेश्वर तुम्हें शांति के घर की ओर बुलाता है और इसके लिए जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार), सीधा मार्ग दिखा देता है। (फिर) जिन लोगों ने भलाई की, उनके लिए भलाई है और उससे अधिक भी। उनके चेहरों पर न अंधकार छाएगा, न अपमान। वही स्वर्ग के लोग हैं, वे उसमें सदा रहेंगे। इसके विपरीत जिन्होंने बुराइयाँ कमाई हैं तो (परमेश्वर का नियम यह है कि) बुराई का बदला उसके समान है। उनपर अपमान छाएगा — उन्हें कोई परमेश्वर से बचाने वाला नहीं होगा — उनके चेहरे ऐसे होंगे जैसे अंधेरी रात के टुकड़ों से ढक दिए गए हैं। वही नरक के लोग हैं, वे उसमें सदा रहेंगे।
ये उस दिन को याद रखें, जब हम इन सबको इकट्ठा करेंगे, फिर जिन्होंने शिर्क किया है, उनसे कहेंगे कि तुम अपनी जगह ठहरो और तुम्हारे बनाए हुए सहभागी भी। फिर उनके बीच जुदाई डाल देंगे और उनके सहभागी कहेंगे: तुम हमारी पूजा तो नहीं करते थे। अतः परमेश्वर हमारे और तुम्हारे बीच गवाही के लिए पर्याप्त है। सत्य यह है कि हम तुम्हारी पूजा से पूरी तरह अनजान थे। उस समय प्रत्येक व्यक्ति अपने उस कर्म का सामना करेगा जो उसने पहले किया था और लोग परमेश्वर, अपने सच्चे मालिक की ओर लौटा दिए जाएँगे और (दूसरों को उपास्य बना कर) जो झूठ उन्होंने गढ़ रखे थे, सब उनसे जाते रहेंगे।
इनसे पूछो, धरती और आकाश से कौन तुम्हें जीविका देता है? या तुम्हारे कान और आँखें किस के नियंत्रण में हैं? कौन है जो जीवित को मृत से और मृत को जीवित से निकालता है? कौन इस जगत की व्यवस्था को संभाल रहा है? इसके उत्तर में वे अवश्य कहेंगे कि परमेश्वर, तो कहो, फिर उससे डरते नहीं हो? अतः यही परमेश्वर तुम्हारा सच्चा प्रभु है। फिर सत्य के बाद पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और क्या है? भला तुम किधर फिरे जाते हो? इसी प्रकार तेरे प्रभु की बात इन विद्रोह करने वालों के बारे में पूरी हो चुकी है कि ये नहीं मानेंगे।
इनसे पूछो, तुम्हारे बनाए हुए सहभागियों में से कोई है जो पहली बार सृजन करता हो, फिर दूसरी बार भी करे? कह दो, परमेश्वर ही है जो पहली बार सृजन करता है, फिर पुनः भी करेगा। अतः कहां भटके जाते हो? पूछो, तुम्हारे सहभागियों में से कोई है जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता हो? कह दो, परमेश्वर ही है जो सत्य का मार्गदर्शन करता है। फिर बताओ, जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करता है, वह इसका अधिकारी है कि उसका अनुसरण किया जाए या वे जो मार्गदर्शन के बिना स्वयं भी मार्ग नहीं पाते? भला तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसा निर्णय करते हो? सत्य यह है कि इनमें से अधिकांश केवल कल्पना का अनुसरण कर रहे हैं और कल्पना कुछ भी सत्य का स्थान नहीं ले सकती। निस्संदेह परमेश्वर भलीभांति जानता है जो कुछ ये कर रहे हैं।
यह क़ुरआन वह चीज़ नहीं है कि परमेश्वर के बिना बना ली जाए, अपितु उन भविष्यवाणियों की पुष्टि है जो इससे पूर्व उपलब्ध हैं और ईश्वरीय विधान का विवरण है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह समस्त लोकों के प्रभु की ओर से है। क्या ये कहते हैं कि पैग़ंबर ने इसे गढ़ लिया लिया है? इनसे कहो, यदि तुम सच्चे हो तो इसके समान एक सूरह बना लाओ और परमेश्वर के अतिरिक्त जिनको (सहायता के लिए) बुला सकते हो, बुला लो। नहीं, यह बात नहीं है, अपितु ये उस चीज़ को झूठा कह रहे हैं जो इनके ज्ञान की पकड़ में नहीं आई और जिस की वास्तविकता अभी इन पर व्यक्त नहीं हुई। इनसे पूर्व के लोगों ने भी इसी प्रकार नकार दिया था, फिर देख लो कि उन अत्याचारियों का अंत कैसा हुआ।
(तुम आश्वस्त रहो, हे पैग़ंबर)। इनमें वे भी हैं जो इस क़ुरआन को मानेंगे और वे भी जो नहीं मानेंगे। (ये बिगाड़ के तत्पर हैं), और तेरा प्रभु इन बिगाड़ पैदा करने वालों से भलीभांति परिचित है। ये तुम्हें झूठा कहते हैं तो कह दो कि मेरे लिए मेरे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म, तुम पर मेरे कर्मों का कोई दायित्व नहीं है और मुझपर तुम्हारे कर्मों का कोई दायित्व नहीं है। (तुम उनके पीछे क्यों पड़े होते हो जो अंधे और बहरे हो चुके हैं)? इनमें वे भी तो हैं जो तुम्हें कान लगाकर सुनते हैं। फिर क्या बहरों को सुनाओगे, यद्यपि वे कुछ न समझते हों? और इनमें वे भी तो हैं जो पूरे ध्यान के साथ तुम्हें देखते हैं। फिर क्या अंधों को मार्ग दिखाओगे, यदि वे कुछ न देखते हों? सत्य यह है कि परमेश्वर लोगों पर कुछ भी अत्याचार नहीं करता, अपितु लोग स्वयं ही अपने प्राणों पर अत्याचार करते हैं।
(इस समय ये मस्त हैं, परंतु) जिस दिन परमेश्वर इन्हें इकट्ठा करेगा, उस दिन इन्हें लगेगा कि जैसे दिन की एक घड़ी ही के लिए दुनिया में थे। ये एक दूसरे को पहचान रहे होंगे, (जैसे अभी मिल कर आए हैं)। (उस दिन स्पष्ट हो जाएगा कि) वस्तुतः बहुत घाटे में रहे वे लोग जिन्होंने परमेश्वर से मिलने को नकार दिया और सन्मार्ग पर नहीं आए। हम जिस चीज़ का वचन उन्हें दे रहे हैं, उसका कोई हिस्सा हम तुम्हें दिखाएं, (हे पैग़ंबर), या तुमको मृत्यु दें और इसके बाद इनसे निपट लें, जैसा भी हो इन्हें लौटना हमारी ही ओर है, फिर परमेश्वर उस पर साक्षी है जो कुछ ये कर रहे हैं। (उसका नियम यही है कि) प्रत्येक क़ौम के लिए एक रसूल है। फिर जब उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक निर्णय कर दिया जाता है और उनके साथ कोई अन्याय नहीं किया जाता। (इसके उत्तर में) ये कहते हैं कि तुम लोग यदि सच्चे हो तो (हमारे लिए) यह वचन कब पूरा करोगे? इनसे कहो, (मैं इस विषय में क्या कह सकता हूँ)? मैं तो अपने लिए भी किसी लाभ या घाटे का कोई अधिकार नहीं रखता, परंतु जो परमेश्वर की इच्छा। (उसके यहाँ) प्रत्येक क़ौम के लिए एक अवधि निर्धारित है। जब उनका समय आ जाता है तो फिर न एक घड़ी पीछे होते हैं, न आगे। इनसे कहो, यह बताओ कि यदि उसका दण्ड तुम पर रात या दिन में किसी समय आजाए तो क्या कर लोगे? भला क्या चीज़ है जिसके भरोसे पर ये अपराधी जल्दी मचाए हुए हैं? फिर क्या जब आ जाएगी, उस समय उसको मानोगे? अब माने हो, तुम इसी के लिए जल्दी मचाए हुए थे। उस समय इन दुष्टों से कहा जाएगा कि अब अनंत यातना का स्वाद चखो, यह उसी का बदला मिल रहा है जो कुछ तुम कमाते थे।
वे तुम से पूछते हैं: क्या यह वस्तुतः सत्य है? कह दो, हाँ, मेरे प्रभु की सौगंध, यह होनी है और तुम परमेश्वर को परास्त नहीं कर सकते। उस समय प्रत्येक व्यक्ति के पास जो अत्याचार का दोषी हुआ है, यदि वह सब कुछ हो जो पृथ्वी में है तो (अपने आप को बचाने के लिए) वह उसको हरजाने में देना चाहेगा। (उस समय) ये मन ही मन में पछताएंगे, जब दण्ड को (अपनी आंखों से) देख लेंगे और इनके बीच न्यायपूर्वक निर्णय कर दिया जाएगा और इनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। सुनो, धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर का है। सुन रखो, परमेश्वर का वचन होकर रहना है, परंतु (अफ़सोस कि) इनमें से अधिकांश जानते नहीं हैं। (सत्य यह है कि) वही जीवन प्रदान करता है और वही मृत्यु देता है और तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे।
लोगो, तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम्हारे पास सदुपदेश आ गया है और जो सीनों में (धड़कते हैं), उनका उपचार और उनके लिए मार्गदर्शन और दया जो मानने वाले हों। इन्हें बताओ, (हे पैग़ंबर), यह परमेश्वर के अनुग्रह और उसकी दया से आया है। तो चाहिए कि इस पर वे ख़ुशी मनाएं। यह उससे उत्तम है जो कुछ वे इकट्ठा कर रहे हैं।
इनसे पूछो, भला बताओ तो सही कि परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो जीविका उतारी थी, फिर तुमने उसमें से कुछ को अवैध और कुछ को वैध बना लिया। पूछो, इसका आदेश तुम्हें परमेश्वर ने दिया है या तुम परमेश्वर पर झूठ लगा रहे हो? उन लोगों का क़यामत के दिन के बारे में क्या विचार है जो परमेश्वर पर झूठ लगाते हैं? (यह परमेश्वर का अनुग्रह है कि उसने इन्हें छूट दे रखी है, अन्यथा इस दुस्साहस पर इनका सर्वनाश हो जाता)। सत्य यह है कि परमेश्वर लोगों पर बड़ा अनुग्रह करने वाला है, परंतु उनमें से अधिकांश आभार व्यक्त नहीं करते।1
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- यह सवाल कर के जवाब दिए बिना बात इसलिए समाप्त कर दी गई है कि परमेश्वर पर झूठी बात लगाने के अपराध की अत्यंत भीषणता का बोध हो। तात्पर्य यह है कि यह कोई साधारण अपराध नहीं है। ये क्या समझते हैं कि इस दुस्साहस का क्या दंड इनको मिलने वाला है? ↩
(तुम इनकी चिंता न करो और अपना काम किए जाओ, हे पैग़ंबर)। तुम जिस परिस्थिति में भी होते हो और (हमने जो कुछ उतारा है), उसमें से क़ुरआन का जो हिस्सा भी पढ़ कर सुनाते हो और तुम लोग जो काम भी करते हो, हम तुम्हें देख रहे होते हैं, जिस समय तुम उसमें व्यस्त होते हो। सत्य यह है कि तेरे प्रभु से कण बराबर भी कोई चीज़ छिपी हुई नहीं है, न धरती में, न आकाश में और न कण से छोटी, न बड़ी, परंतु वह एक स्पष्ट किताब में लिखी हुई है। (लोगो), सुनो, (परमेश्वर का पैग़ंबर और उसके साथी, सब परमेश्वर के मित्र हैं और) परमेश्वर के मित्रों के लिए, जिन्होंने मान लिया और परमेश्वर से डरते रहे, (क़यामत के दिन) न कोई भय होगा, न वे दुखी होंगे। उनके लिए दुनिया के जीवन में भी शुभ सूचना है और परलोक के जीवन में भी। (यह परमेश्वर की बात है और) परमेश्वर की बातों में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। यही परम सिद्धि है। ये जो कुछ कह रहे हैं, वह तुम्हें दुखी न करे, (हे पैग़ंबर)। सारा सम्मान परमेश्वर ही के लिए है, (तुम उस पर भरोसा रखो और अपना काम किए जाओ), वह सब कुछ सुनता और जानता है।1
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- इसलिए कि रसूलों के विषय में परमेश्वर की रीति यही है कि उन्हें और उनके साथियों को दुनिया में भी अनिवार्य रूप से विजय प्राप्त होती है। ↩
सुन रखो कि जो समस्त आकाशों में हैं और जो धरती में हैं, सब परमेश्वर ही के हैं और जो परमेश्वर के अतिरिक्त दूसरों को पुकारते हैं, वे भागीदारों का अनुसरण नहीं करते। सत्य यह है कि वे केवल भ्रम का अनुसरण करते और एकदम अटकल दौड़ाते हैं। (सुनो), वह परमेश्वर ही है जिसने तुम्हारे लिए रात को अंधेरा बनाया ताकि उसमें विश्राम करो और दिन को प्रकाशमान बना दिया ताकि आर्थिक संघर्ष करो। इसमें अवश्य उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सुनते हैं। इन्होंने कहा है कि परमेश्वर ने संतान बना रखी है। वह इससे मुक्त है (कि किसी को संतान बनाए)। उसे ऐसी किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है। धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब उसी का है। तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है। क्या तुम परमेश्वर पर ऐसी बात लगाते हो जिसका तुम ज्ञान नहीं रखते? कह दो, (हे पैग़ंबर) कि जो परमेश्वर पर झूठ लगाते हैं, वे कभी सफलता नहीं पाएंगे। उनके लिए यही थोड़ा सा लाभ है जो दुनिया में उठा लेंगे। फिर उनको हमारी ही ओर पलटना है। फिर उनके इस कुफ़्र के कारण हम उनको भीषण यातना का स्वाद चखाएंगे।
इन्हें नूह की कथा सुनाओ, (हे पैग़ंबर), जब उसने अपने लोगों से कहा: मेरी क़ौम के लोगो, यदि मेरा आह्वान के लिए खड़ा रहना और परमेश्वर की आयतें सुना कर स्मरण दिलाना तुम्हें बुरा लग गया है तो सुन लो कि मैंने परमेश्वर ही पर भरोसा किया। अतः तुम सब मिलकर अपनी बात ठहरा लो और अपने सहभागियों को भी साथ मिला लो, फिर तुम्हारे इस निर्णय में तुम्हें कोई संकोच न रहे, फिर मेरे साथ जो करना चाहते हो, कर चलो और मुझे मोहलत न दो। इसके बाद भी मुँह मोड़ोगे तो मेरा क्या नुक़सान है कि मैंने तुमसे बदले में कुछ नहीं मांगा है। मेरा बदला तो परमेश्वर के ऊपर है और मुझे आदेश दिया गया है कि (परमेश्वर का) आज्ञाकारी बन कर रहूँ। इस पर भी उन्होंने उसे नकार दिया तो हमने उसको मुक्ति दी और उनको भी जो उसके साथ नाव में थे और उन्हें उत्तराधिकारी बनाया और उन सब लोगों को डुबो दिया जिन्होंने हमारी आयतों को झूठा कहा था। तो देख लो कि उनका अंत क्या हुआ जिन्हें (इस दण्ड से पहले) सावधान कर दिया गया था।
फिर नूह के बाद हमने कितने रसूलों को उनकी क़ौमों की ओर भेजा। तो वे स्पष्ट निशानियाँ लेकर उनके पास आए, परंतु जिस चीज़ को पहले झूठा कह चुके थे, उसे फिर उन्होंने अस्वीकार कर दिया। हम हद से आगे बढ़ जाने वालों के दिलों पर इसी प्रकार मुहर लगा दिया करते हैं।
उनके बाद फिर हमने मूसा और हारून को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर भेजा तो वे भी अकड़ बैठे और सत्य यह है कि वे अपराधी लोग थे। अतः जब हमारी ओर से सत्य उनके सामने आया तो उन्होंने कह दिया कि यह तो स्पष्ट जादू है। मूसा ने कहा: क्या तुम सत्य के बारे में यह कहते हो, जबकि वह तुम्हारे पास आ गया है? क्या यह जादू है? नहीं, कदापि नहीं। यह स्पष्ट सत्य है और सत्य के विरुद्ध जादूगर कभी सफल नहीं होते। उन्होंने उत्तर दिया: क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमें उस मार्ग से फेर दो जिस पर हमने अपने पूर्वजों को देखा है और इस देश में तुम दोनों की बड़ाई स्थापित हो जाए। हम तुम्हारी बात मानने वाले नहीं हैं। फ़िरऔन ने आदेश दिया कि सभी अनुभवी जादूगरों को मेरे पास उपस्थित करो। अतः जब जादूगर आ गए तो मूसा ने उनसे कहा: तुम्हें जो डालना है, डालो। फिर जब उन्होंने डाला तो मूसा ने कहा: यह जो कुछ तुम लाए हो, यह जादू है। विश्वास रखो, परमेश्वर अभी इसे निरस्त कर देगा, इसलिए कि परमेश्वर (इस प्रकार के अवसरों पर) बिगाड़ करने वालों के कार्य को सफल होने नहीं देता। और परमेश्वर अपने आदेशों से सत्य को सत्य कर दिखाता है, यद्यपि अपराधियों को कितना ही अप्रिय हो। पर मूसा को उसके लोगों के कुछ युवाओं के अतिरिक्त किसी ने नहीं माना, फ़िरऔन के भय से और स्वयं अपनी क़ौम के बड़ों के भय से कि कहीं फ़िरऔन उन्हें किसी उत्पीड़न में न डाल दे। सत्य यह है कि फ़िरऔन उस देश में बड़ा क्रूर था और उन लोगों में से था जो हद से आगे चले जाते हैं। मूसा ने कहा: मेरी क़ौम के लोगो: तुमने परमेश्वर को मान लिया है तो उसी पर भरोसा करो, यदि तुम सच में अपने आप को उसे सौंप चुके हो। इस पर उन्होंने उत्तर दिया: हमने परमेश्वर ही पर भरोसा किया है — हे हमारे प्रभु, हमें इन अत्याचारी लोगों के लिए परीक्षा न बना। और अपनी दया से हमें इस नकारने वाली क़ौम से मुक्त कर दे।1
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- जादूगर जब अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहते हैं तो जुए के तीरों की तरह कोई चीज़ आगे डाल देते हैं और उस पर अपना जादू दिखाते हैं। आयत में 'इल्क़ा' यानी 'डालने' का शब्द इसी संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। ↩
(परमेश्वर से यही संबंध जोड़ने के लिए) हमने मूसा और उसके भाई (हारून) की ओर वह्य की कि अपने लोगों के लिए मिस्र में कुछ घर नियुक्त कर लो और जो घर तुम लोग अपने लिए नियुक्त करो, उन्हें क़िब्ला बना लो और (उनमें) नमाज़ का प्रबंध रखो और (हे मूसा), मानने वालों को शुभ सूचना दो (कि सफलता अंततः उन्हीं को प्राप्त होगी)। मूसा ने प्रार्थना की: हे हमारे प्रभु, तूने फ़िरऔन को और उसके सरदारों को दुनिया के जीवन में ठाट-भाट और धन तथा साधनों ने सम्पन्न किया है। हे हमारे प्रभु, ताकि इसका परिणाम यह हो कि वे तेरे लोगों को तेरे मार्ग से भटका दें। हे हमारे प्रभु, उनका धन अब तू नष्ट कर दे और उनके दिलों को इस प्रकार बंद कर दे कि वे न मानें, यहाँ तक कि कष्टदायक यातना देख लें। परमेश्वर ने कहा: तुम्हारी ओर तुम्हारे भाई की प्रार्थना स्वीकार हुई। अब तुम दोनों दृढ़संकल्प रहो और उन लोगों के मार्ग पर न चलो जो ज्ञान नहीं रखते।1
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- मूल शब्द हैं: 'رَبَّنَا، لِیُضِلُّوْا عَنْ سَبِیْلِکَ'। इनमें 'ل' परिणाम को प्रकट करता है। अर्थात धन और साधन प्रदान किए गए तो उसका परिणाम यह निकला। ↩
इस्राईलियों को, (इसके बाद), हमने समुद्र पार कराया तो फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने विद्रोह और दुष्टता के मार्ग से उनका पीछा किया। यहाँ तक कि जब फ़िरऔन डूबने लगा तो बोल उठा: मैंने मान लिया कि उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं जिसे इस्राईली माने हुए हैं और मैं भी आज्ञाकारी लोगों में से हूं — क्या अब? इससे पहले तो तुम अवज्ञा करते रहे और बिगाड़ पैदा करने वालों में से थे। अतः आज हम तेरे शरीर को बचा लेंगे ताकि अपने बाद आने वालों के लिए तू (परमेश्वर के प्रकोप की) निशानी बन कर रहे। सत्य यह है कि बहुत से लोग हमारी निशानियों से बेपरवाह ही रहते हैं। हमने इस्राईलियों को सम्मान का स्थान दिया और उन्हें अत्यंत अच्छी जीविका प्रदान की। फिर उन्होंने जो कुछ भी मतभेद किए, उस समय किए जब उनके पास (परमेश्वर का भेजा हुआ) ज्ञान आ चुका था। विश्वास रखो कि तुम्हारा प्रभु क़यामत के दिन उनके बीच उन चीज़ों का निपटारा कर देगा जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं।
अतः, (हे पैग़ंबर), तुम्हें यदि उस चीज़ के बारे में कोई संदेह हो जो हमने तुम्हारी ओर उतारी है तो (अहल-ए-किताब के) उन (सदाचारी व्यक्तियों) से पूछ लो जो तुमसे पहले ईश्वरीय ग्रंथ पढ़ रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम्हारे पास सत्य ही आया है, इसलिए कदापि संदेह करने वालों में से न बनो। और न उन लोगों में से हो जाओ जिन्होंने परमेश्वर की आयतों को झूठा कहा है कि तुम भी असफल व्यक्तियों में से हो जाओ। सत्य यह है कि तेरे प्रभु की बात जिन लोगों पर पूरी हो चुकी है, उनके सामने, चाहे सारी निशानियाँ आ जाएं, वे नहीं मानेंगे,जब तक कि कष्टदायक यातना न देख लें। अतः ऐसा क्यों न हुआ कि यूनुस की क़ौम के सिवा कोई अन्य बस्ती भी मान जाती, फिर उसका मान जाना उसे लाभ देता? जब उस बस्ती के लोगों ने मान लिया तो हमने दुनिया के जीवन में अपमान करने वाला दण्ड उनसे हटा दिया था और एक अवधि के लिए उनको रहने बसने का अवसर दिया था।
यदि तुम्हारा प्रभु चाहता तो धरती पर जितने लोग हैं, सब के सब मान जाते। फिर क्या लोगों को विवश करोगे कि वे मानने वाले हो जाएं? (अच्छे से समझ लो कि) परमेश्वर की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति के लिए संभव नहीं कि वह (पैग़ंबर को) मान ले। (यह अनुमति उन्हीं को मिलती है जो बुद्धि से काम लें) और जो बुद्धि से काम नहीं लेते, उनपर वह पथभ्रष्टता की गंदगी डाल देता है।
(ये निशानी मांगते हैं)। इनसे कहो, धरती और समस्त आकाशों में क्या कुछ है, उसे देखो। सत्य यह है की निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों को कोई लाभ नहीं पहुंचातीं जो मानना नहीं चाहते। अतः क्या ये उसी प्रकार के किसी दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिस प्रकार के दिनों का सामना इनसे पहले के लोगों ने किया था? कहो, फिर प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूं। (इन्हें बता दो कि) फिर (जब वह दिन आ जाता है तो) हम अपने रसूलों को बचा लेते हैं और उनको भी जिन्होंने उन्हें मान लिया हो। इसी प्रकार हमारा दायित्व है, हम उनको बचा लेंगे जिन्होंने मान लिया है।
(हे पैग़ंबर), कह दो कि लोगो, मेरे धर्म के बारे में यदि (अब भी) संदेह में हो तो सुन लो कि तुम परमेश्वर के अतिरिक्त जिन को पूजते हो, मैं उन्हें नहीं पूजता, अपितु उस परमेश्वर को पूजता हूं जो तुम्हें मृत्यु देता है (कि जवाबदेही के लिए उसके समक्ष उपस्थित हो जाओ)। मुझे आदेश दिया गया है कि मैं मानने वालों में से बनूँ और आदेश दिया गया है कि अपना चेहरा एकाग्रता के साथ सीधा इसी धर्म की ओर कर लो और कदापि मुश्रिकों में से न हो। और यह भी कि परमेश्वर के अतिरिक्त उनको न पुकारो न तुमको लाभ पहुंचा सकते हैं, न क्षति। फिर यदि यही करोगे तो उस समय तुम भी अवश्य अत्याचारियों में से होगे। यदि परमेश्वर तुम्हें किसी कष्ट में पकड़ ले तो उसके अतिरिक्त कोई नहीं जो उसको दूर कर सके और यदि तुम्हारे लिए कोई भलाई चाहे तो उसके अनुग्रह को कोई रोकने वाला नहीं है। वह अपने भक्तों में से जिसको चाहता है, अपने अनुग्रह से सम्पन्न करता है और वह क्षमा करने वाला, बड़ा दया करने वाला है।
इनसे कहो कि लोगो, तुम्हारे प्रभु की ओर से तुम्हारे पास सत्य आ गया है। अब जो मार्गदर्शन स्वीकार करेगा, वह अपने ही लिए करेगा और जो भटकेगा, उसका भार भी उसी पर आएगा और मैं तुम्हारे लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ। (हे पैग़ंबर), तुम उसका अनुसरण करो जो वह्य तुम्हारी ओर की जाती है और धैर्य रखो, यहाँ तक कि परमेश्वर निर्णय कर दे और वह सबसे उत्तम निर्णय करने वाला है।