सूरह 11

हूद्

मक्की · 123 आयतें · 27 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

الٓر ۚ كِتَـٰبٌ أُحْكِمَتْ ءَايَـٰتُهُۥ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِن لَّدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ ﴿1﴾ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ ۚ إِنَّنِى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ ﴿2﴾ وَأَنِ ٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ يُمَتِّعْكُم مَّتَـٰعًا حَسَنًا إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى وَيُؤْتِ كُلَّ ذِى فَضْلٍ فَضْلَهُۥ ۖ وَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ كَبِيرٍ ﴿3﴾ إِلَى ٱللَّهِ مَرْجِعُكُمْ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ قَدِيرٌ ﴿4﴾

यह सूरह 'अलिफ़ लाम रा' है। यह ग्रंथ है जिसकी आयतें पहले संक्षिप्त की गईं, फिर प्रज्ञावान और जागरूक परमेश्वर की ओर से उनका विस्तार किया गया है कि तुम परमेश्वर के अतिरिक्त किसी की भक्ति न करो, मैं उसकी ओर से तुम्हें सचेत करने वाला और शुभ सूचना देने वाला हूँ। और यह कि तुम अपने प्रभु से क्षमा चाहो, फिर उसकी ओर वापस पलटो, वह एक निश्चित अवधि तक तुम्हारा अच्छे से भरण-पोषण करेगा और प्रत्येक उस व्यक्ति पर जो उसके अनुग्रह के योग्य है, अपना अनुग्रह करेगा। परंतु यदि मुँह फेरोगे तो मैं तुम्हारे लिए एक बड़े भीषण दिन के दण्ड से डरता हूं। तुम सबको परमेश्वर ही की ओर पलटना है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।

أَلَآ إِنَّهُمْ يَثْنُونَ صُدُورَهُمْ لِيَسْتَخْفُوا۟ مِنْهُ ۚ أَلَا حِينَ يَسْتَغْشُونَ ثِيَابَهُمْ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ ﴿5﴾ وَمَا مِن دَآبَّةٍ فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا ۚ كُلٌّ فِى كِتَـٰبٍ مُّبِينٍ ﴿6﴾

इन्हें देखते हो, ये अपने सीने मोड़ते हैं कि परमेश्वर से छुप जाएं। सावधान, जब (इस उद्देश्य से) अपने ऊपर चादरें लपेटते हैं, (ये उस समय भी उसकी दृष्टि में होते हैं)। वह जानता है जो कुछ ये छिपाते और जो कुछ व्यक्त करते हैं। वह उन भेदों को भी जानता है जो सीनों में होते हैं। धरती पर चलने वाला कोई प्राणी नहीं है, जिसकी जीविका परमेश्वर के ऊपर न हो। वह उसके ठिकाने को भी जानता है और उस स्थान को भी जहाँ वह (मृत्यु के बाद धरती को) सौंप दिया जाएगा। ये सब एक खुले खाते में लिखा है।

وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ فِى سِتَّةِ أَيَّامٍ وَكَانَ عَرْشُهُۥ عَلَى ٱلْمَآءِ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا ۗ وَلَئِن قُلْتَ إِنَّكُم مَّبْعُوثُونَ مِنۢ بَعْدِ ٱلْمَوْتِ لَيَقُولَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ ﴿7﴾ وَلَئِنْ أَخَّرْنَا عَنْهُمُ ٱلْعَذَابَ إِلَىٰٓ أُمَّةٍ مَّعْدُودَةٍ لَّيَقُولُنَّ مَا يَحْبِسُهُۥٓ ۗ أَلَا يَوْمَ يَأْتِيهِمْ لَيْسَ مَصْرُوفًا عَنْهُمْ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ ﴿8﴾ وَلَئِنْ أَذَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِنَّا رَحْمَةً ثُمَّ نَزَعْنَـٰهَا مِنْهُ إِنَّهُۥ لَيَـُٔوسٌ كَفُورٌ ﴿9﴾ وَلَئِنْ أَذَقْنَـٰهُ نَعْمَآءَ بَعْدَ ضَرَّآءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ ذَهَبَ ٱلسَّيِّـَٔاتُ عَنِّىٓ ۚ إِنَّهُۥ لَفَرِحٌ فَخُورٌ ﴿10﴾ إِلَّا ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ ﴿11﴾

और वही है जिसने समस्त आकाशों और धरती की रचना छः दिन में की है और (तुम्हारी रचना से पहले) उसका सिंहासन पानी पर था — इसलिए रचना की है कि तुमको परख कर देखे कि तुम में कौन उत्तम कर्म करने वाला है। अब, (हे पैग़ंबर) यदि तुम इनसे कहते हो कि (लोगो), मृत्यु के बाद तुम पुनः उठाए जाओगे तो ये नकारने वाले अवश्य बोल उठेंगे की यह तो स्पष्ट जादू है। और यदि कुछ समय के लिए हम इनसे दुनिया के इस दण्ड को टाल देंगे तो अवश्य पूछेंगे कि इसे क्या चीज़ रोके हुए है? सुनो, जिस दिन वह इनके ऊपर आ पड़ेगा तो इनसे फेरा न जा सकेगा और वही चीज़ इनको आ घेरेगी जिस का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं। मनुष्य का मामला यह है कि हम उसपर यदि अपना कोई अनुग्रह करें, फिर उससे उसे वंचित कर दें तो अवश्य शिकायत करेगा, इसलिए कि वह जल्दी निराश हो जाने वाला और अत्यंत अकृतज्ञ है। और यदि किसी कष्ट के बाद जो उसको पहुंचा हो, हम उसे वरदान का स्वाद चखाएँ तो अवश्य कहेगा कि मेरे सारे कष्ट मुझसे दूर हो गए (और फूला नहीं समाएगा), इसलिए कि वह बड़ा घमंड करने वाला और डींगें मारने वाला है। इससे वही बचे हैं जो धैर्य रखते और अच्छे कर्म करते हैं। उन्हीं के लिए क्षमा भी है और बड़ा प्रतिफल भी।

فَلَعَلَّكَ تَارِكٌۢ بَعْضَ مَا يُوحَىٰٓ إِلَيْكَ وَضَآئِقٌۢ بِهِۦ صَدْرُكَ أَن يَقُولُوا۟ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ كَنزٌ أَوْ جَآءَ مَعَهُۥ مَلَكٌ ۚ إِنَّمَآ أَنتَ نَذِيرٌ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ وَكِيلٌ ﴿12﴾ أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ فَأْتُوا۟ بِعَشْرِ سُوَرٍ مِّثْلِهِۦ مُفْتَرَيَـٰتٍ وَٱدْعُوا۟ مَنِ ٱسْتَطَعْتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ ﴿13﴾ فَإِلَّمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَكُمْ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَآ أُنزِلَ بِعِلْمِ ٱللَّهِ وَأَن لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَهَلْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ ﴿14﴾

तो, (इनके इस आचरण के कारण, हे पैग़ंबर), तुम उसमें से शायद कुछ छोड़ना चाहते हो जो तुम्हारी ओर वह्य किया जा रहा है और इस बात पर दुखी हो रहे हो कि ये लोग कहेंगे कि इस पर धन का कोई भंडार क्यों नहीं उतारा गया या इसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया? (सत्य यह है कि) तुम तो केवल सचेत करने वाले हो और आगे हर चीज़ परमेश्वर के अधिकार में है। क्या ये कहते हैं कि पैग़ंबर ने स्वयं इसे गढ़ लिया है? इनसे कहो, फिर तुम भी इसी प्रकार की गढ़ी हुई दस सूरतें बनाकर ले आओ और परमेश्वर के अतिरिक्त जिन को बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम सच्चे हो। परंतु यदि वे तुम्हारी सहायता को न पहुंचें तो जान लो कि यह परमेश्वर के ज्ञान से उतरा हुआ है और यह भी कि परमेश्वर के अतिरिक्त कोई उपासना योग्य नहीं है। फिर क्या तुम मानते हो?

مَن كَانَ يُرِيدُ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا وَزِينَتَهَا نُوَفِّ إِلَيْهِمْ أَعْمَـٰلَهُمْ فِيهَا وَهُمْ فِيهَا لَا يُبْخَسُونَ ﴿15﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَيْسَ لَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ إِلَّا ٱلنَّارُ ۖ وَحَبِطَ مَا صَنَعُوا۟ فِيهَا وَبَـٰطِلٌ مَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿16﴾

(ये इसलिए नकारने वाले हो रहे हैं कि दुनिया के जीवन ने इन्हें धोखे में डाल दिया है, इन्हें बता दो कि) जो दुनिया का जीवन और उसका सौन्दर्य चाहते हैं, हम उनके कर्मों का फल उनको यहीं चुका देते हैं और उसमें उनके साथ कोई कमी नहीं की जाती। यही लोग हैं जिनके लिए परलोक में आग के अतिरिक्त कुछ नहीं है। दुनिया में जो कुछ उन्होंने बनाया, वह सब बर्बाद हुआ और उनका किया धरा अब व्यर्थ है।

أَفَمَن كَانَ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّهِۦ وَيَتْلُوهُ شَاهِدٌ مِّنْهُ وَمِن قَبْلِهِۦ كِتَـٰبُ مُوسَىٰٓ إِمَامًا وَرَحْمَةً ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۚ وَمَن يَكْفُرْ بِهِۦ مِنَ ٱلْأَحْزَابِ فَٱلنَّارُ مَوْعِدُهُۥ ۚ فَلَا تَكُ فِى مِرْيَةٍ مِّنْهُ ۚ إِنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿17﴾ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُعْرَضُونَ عَلَىٰ رَبِّهِمْ وَيَقُولُ ٱلْأَشْهَـٰدُ هَـٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ كَذَبُوا۟ عَلَىٰ رَبِّهِمْ ۚ أَلَا لَعْنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿18﴾ ٱلَّذِينَ يَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ كَـٰفِرُونَ ﴿19﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَمْ يَكُونُوا۟ مُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كَانَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِنْ أَوْلِيَآءَ ۘ يُضَـٰعَفُ لَهُمُ ٱلْعَذَابُ ۚ مَا كَانُوا۟ يَسْتَطِيعُونَ ٱلسَّمْعَ وَمَا كَانُوا۟ يُبْصِرُونَ ﴿20﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ ﴿21﴾ لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمُ ٱلْأَخْسَرُونَ ﴿22﴾ إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَأَخْبَتُوٓا۟ إِلَىٰ رَبِّهِمْ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿23﴾ مَثَلُ ٱلْفَرِيقَيْنِ كَٱلْأَعْمَىٰ وَٱلْأَصَمِّ وَٱلْبَصِيرِ وَٱلسَّمِيعِ ۚ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴿24﴾

तो क्या वह व्यक्ति जो अपने प्रभु की ओर से एक प्रमाण पर है, फिर (उसके समर्थन में) उसके बाद एक गवाह भी उसके प्रभु की ओर से आ जाता है और उससे पहले मूसा का ग्रंथ भी मार्गदर्शक और साक्षात दया के रूप में आया हुआ उपलब्ध है, इस क़ुरआन को नकार सकता है? (कदापि नहीं)। इस प्रकार के लोग तो इसे मान ही लेंगे। और (तुम्हारे संबोध्यों के) इन गुटों में जो व्यक्ति भी इसे नकारता होगा, उसके लिए वचन का स्थान नरक है। अतः, (हे पैग़ंबर), तुम इसके बारे में किसी संदेह में न पड़ो, इसलिए कि यह सत्य है तुम्हारे प्रभु की ओर से, परंतु अधिकांश लोग मानते नहीं हैं। (इन्हें बता दो कि) उनसे बढ़कर अत्याचारी कौन है जो परमेश्वर पर झूठ गढ़ें? वे अपने प्रभु के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँगे और गवाही देने वाले गवाही देंगे कि यही हैं जिन्होंने अपने प्रभु पर झूठ गढ़ा था। सुनो, परमेश्वर का अभिशाप है उन अत्याचारियों पर जो परमेश्वर के मार्ग से रोकते हैं और उसमें टेढ़ापन पैदा करना चाहते हैं और वही परलोक को नकारने वाले हैं। वे धरती में परमेश्वर की पकड़ से बाहर नहीं थे और न परमेश्वर के अतिरिक्त उनका वहां कोई पक्षधर था। (फिर भी जो ढ़ील हमने उन्हें दे रखी थी, उसके आधार पर वे यही समझते रहे)। उन्हें अब दुगना दण्ड दिया जाएगा, इसलिए कि न सुन सकते थे और न देखते थे। वही हैं जिन्होंने अपने आप को घाटे में डाला और जो कुछ गढ़ते थे, वह सब उनसे खो गया। इसमें संदेह नहीं कि परलोक में वही सबसे अधिक घाटे में होंगे। इसके विपरीत जो मान गए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और अपने प्रभु की ओर झुके रहे, वही स्वर्ग के लोग हैं, वे उसमें सदा रहेंगे। इन दोनों पक्षों का उदाहरण ऐसा है जैसे एक अंधा और बहरा हो और एक देखने वाला और सुनने वाला। क्या दोनों की दशा एक समान हो सकती है? फिर क्या सोचते नहीं हो?

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦٓ إِنِّى لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴿25﴾ أَن لَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ ۖ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ ﴿26﴾ فَقَالَ ٱلْمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ مَا نَرَىٰكَ إِلَّا بَشَرًا مِّثْلَنَا وَمَا نَرَىٰكَ ٱتَّبَعَكَ إِلَّا ٱلَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِىَ ٱلرَّأْىِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍۭ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَـٰذِبِينَ ﴿27﴾

इसी प्रकार नूह को हमने उसकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा था। (उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा): मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेत करने वाला हूं कि तुम परमेश्वर के सिवा किसी की भक्ति न करो। (ऐसा करोगे तो) मैं तुम पर एक कष्टदायक दिन की यातना की आशंका रखता हूं। इस पर उसकी क़ौम के सरदारों ने, जो नकारने वाले थे, उत्तर दिया: हम तो तुम्हें अपने जैसा एक मनुष्य ही देखते हैं और हमारे अंदर जो सबसे नीच हैं, उन्हीं को देखते हैं कि बिना समझे बूझे तुम्हारे पीछे लग गए हैं। हम नहीं देखते कि हमारे ऊपर तुम्हें कोई श्रेष्ठता प्राप्त है, अपितु हम तो तुम्हें पूर्णतः झूठा समझ रहे हैं।

قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَءَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّى وَءَاتَىٰنِى رَحْمَةً مِّنْ عِندِهِۦ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ أَنُلْزِمُكُمُوهَا وَأَنتُمْ لَهَا كَـٰرِهُونَ ﴿28﴾ وَيَـٰقَوْمِ لَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ ۚ إِنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَلَـٰكِنِّىٓ أَرَىٰكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ ﴿29﴾ وَيَـٰقَوْمِ مَن يَنصُرُنِى مِنَ ٱللَّهِ إِن طَرَدتُّهُمْ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ ﴿30﴾ وَلَآ أَقُولُ لَكُمْ عِندِى خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعْلَمُ ٱلْغَيْبَ وَلَآ أَقُولُ إِنِّى مَلَكٌ وَلَآ أَقُولُ لِلَّذِينَ تَزْدَرِىٓ أَعْيُنُكُمْ لَن يُؤْتِيَهُمُ ٱللَّهُ خَيْرًا ۖ ٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا فِىٓ أَنفُسِهِمْ ۖ إِنِّىٓ إِذًا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿31﴾ قَالُوا۟ يَـٰنُوحُ قَدْ جَـٰدَلْتَنَا فَأَكْثَرْتَ جِدَٰلَنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿32﴾ قَالَ إِنَّمَا يَأْتِيكُم بِهِ ٱللَّهُ إِن شَآءَ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ ﴿33﴾ وَلَا يَنفَعُكُمْ نُصْحِىٓ إِنْ أَرَدتُّ أَنْ أَنصَحَ لَكُمْ إِن كَانَ ٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يُغْوِيَكُمْ ۚ هُوَ رَبُّكُمْ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ﴿34﴾

नूह ने उत्तर दिया: मेरी क़ौम के लोगो, ज़रा सोचो, यदि मैं अपने प्रभु की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हूं, फिर उसने मुझे अपने पास से विशेष कृपा भी प्रदान की और वह तुम्हें दिखाई नहीं दी तो क्या हम (बलपूर्वक) उसको तुम पर चिपका दें, जबकि तुम उससे अप्रसन्न भी हो?ۣ मेरी क़ौम के लोगो, मैं इस सेवा पर तुम से कोई धन नहीं मांग रहा हूं (कि तुम्हारी हर बात मानने के लिए विवश हो जाऊं)। मेरा फल तो परमेश्वर के ऊपर है और (तुम्हें प्रसन्न करने के लिए) मैं उन लोगों को कदापि निकाल देने वाला नहीं हूं जो मान गए हैं। वे (अपनी इसी आस्था के साथ) अपने प्रभु से मिलने वाले हैं। (उनके मोल का निर्णय वही करेगा), परंतु मैं देखता हूं कि तुम लोग अज्ञानता में पड़े हो। मेरी क़ौम के लोगो, यदि मैं उनको निकाल दूं तो परमेश्वर से बचाने के लिए कौन मेरी सहायता करेगा? फिर क्या सोचते नहीं हो? मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास परमेश्वर के कोष हैं और न मैं परोक्ष का ज्ञान रखता हूं, न यह दावा करता हूं कि मैं कोई फ़रिश्ता हूं और न उन लोगों के बारे में जिन्हें तुम्हारी आँखें नीच देखती हैं, (तुम्हारी तरह) यह कहने का दुस्साहस कर सकता हूं कि परमेश्वर उन्हें कोई भलाई दे ही नहीं सकता। उनके दिलों में जो कुछ है, उसे परमेश्वर ही अच्छे से जानता है। मैं यदि ऐसा करूं तो फिर मैं अत्याचारी हूंगा। (इस पर) उन लोगों ने कहा: हे नूह, तुमने हमसे बहस की है और बहुत कर ली है, अब यदि तुम सच्चे हो तो वह चीज़ हम पर ले आओ जिसकी तुम हमें धमकी सुना रहे हो। नूह ने उत्तर दिया: वह तो परमेश्वर ही तुम पर लाएगा, यदि चाहेगा और उस समय तुम उसकी पकड़ से निकल नहीं सकोगे। मैं यदि तुम्हारा शुभचिंतक बनना भी चाहूं तो मेरा भला चाहना तुम्हें कोई लाभ नहीं दे सकती, यदि (तुम्हारे इस आचरण के परिणामस्वरूप) परमेश्वर ने तुम को भटका देने का निर्णय कर लिया है। वही तुम्हारा प्रभु है और तुम्हें उसी की ओर पलटना है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. तात्पर्य यह है कि अपने स्वभाव की विकृति के कारण इतने विमुख हो चुके हो तो मैं तुम्हारे ऊपर एक ऐसी चीज़ किस प्रकार चिपका सकता हूँ, जिसके चिपकने के लिए तुम्हारे भीतर सत्य को ग्रहण करने की कोई क्षमता ही बाक़ी नहीं रही है। ↩
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ إِنِ ٱفْتَرَيْتُهُۥ فَعَلَىَّ إِجْرَامِى وَأَنَا۠ بَرِىٓءٌ مِّمَّا تُجْرِمُونَ ﴿35﴾

क्या ये कहते हैं कि (हम पर चिपकाने के लिए) इस व्यक्ति ने यह कथा स्वयं गढ़ ली है? इनसे कहो, (हे पैग़ंबर) यदि मैंने यह स्वयं गढ़ा है तो मेरे अपराध का बुरा परिणाम मेरे ही ऊपर है, परंतु (जानबूझकर तथ्यों को नकार देने का) जो अपराध तुम कर रहे हो, उसका भार तुम्हीं पर है, मैं उस से मुक्त हूं।

وَأُوحِىَ إِلَىٰ نُوحٍ أَنَّهُۥ لَن يُؤْمِنَ مِن قَوْمِكَ إِلَّا مَن قَدْ ءَامَنَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ ﴿36﴾ وَٱصْنَعِ ٱلْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا وَلَا تُخَـٰطِبْنِى فِى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ ۚ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ ﴿37﴾ وَيَصْنَعُ ٱلْفُلْكَ وَكُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ مَلَأٌ مِّن قَوْمِهِۦ سَخِرُوا۟ مِنْهُ ۚ قَالَ إِن تَسْخَرُوا۟ مِنَّا فَإِنَّا نَسْخَرُ مِنكُمْ كَمَا تَسْخَرُونَ ﴿38﴾ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن يَأْتِيهِ عَذَابٌ يُخْزِيهِ وَيَحِلُّ عَلَيْهِ عَذَابٌ مُّقِيمٌ ﴿39﴾ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَمْرُنَا وَفَارَ ٱلتَّنُّورُ قُلْنَا ٱحْمِلْ فِيهَا مِن كُلٍّ زَوْجَيْنِ ٱثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ ٱلْقَوْلُ وَمَنْ ءَامَنَ ۚ وَمَآ ءَامَنَ مَعَهُۥٓ إِلَّا قَلِيلٌ ﴿40﴾ وَقَالَ ٱرْكَبُوا۟ فِيهَا بِسْمِ ٱللَّهِ مَجْر۪ىٰهَا وَمُرْسَىٰهَآ ۚ إِنَّ رَبِّى لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿41﴾

(फिर) नूह को वह्य की गई कि तुम्हारी क़ौम के लोगों में से जो मान चुके, अब उनके अतिरिक्त कोई मानने वाला नहीं है। अतः इनके दुष्कर्मों पर दुखी होना छोड़ो। और हमारे निरीक्षण में और हमारी निर्देश के अनुसार नौका बनाओ। इन अत्याचारियों के पक्ष में मुझसे कोई बात न करना, ये अब डूब कर रहेंगे। नूह (इस निर्देश के अनुसार) नाव बनाने लगा और उसकी क़ौम के सरदार जब उसके पास से होकर निकलते तो उसकी हंसी उड़ाते। वह उन्हें उत्तर देता कि यदि हमारे ऊपर हंसते हो तो जिस प्रकार तुम हंसते हो, उसी प्रकार (एक दिन) हम भी तुम पर हसेंगे। फिर शीघ्र ही जान लोगे कि वे कौन हैं जिन पर वह दण्ड आता है जो उन्हें अपमानित करके रख देता है और वह प्रकोप उतरता है जो उनपर (उतर कर) ठहर जाता है। वे यही करते रहे, यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ पहुंचा और तूफ़ान उबल पड़ा तो हमने कहा: हर प्रकार के (पशुओं के) जोड़े इसमें रख लो, (नर व मादा) दो-दो और अपने घर वालों को भी इस नौका में सवार कर लो, सिवाय उनके जिनके बारे में आदेश जारी हो चुका है, और उनको भी जो मान गए हैं — और थोड़े ही लोग थे जो उसके साथ मान गए थे। नूह ने कहा: इसमें चढ़ जाओ, इसका चलना और ठहरना परमेश्वर ही के नाम से है। अपितु, मेरा प्रभु क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यह आवश्यकता के दृष्टिकोण से है, अर्थात हर उस पशु के जोड़े जिसकी प्रलयकारी बाढ़ के बाद आवश्यकता हो सकती थी। ↩
وَهِىَ تَجْرِى بِهِمْ فِى مَوْجٍ كَٱلْجِبَالِ وَنَادَىٰ نُوحٌ ٱبْنَهُۥ وَكَانَ فِى مَعْزِلٍ يَـٰبُنَىَّ ٱرْكَب مَّعَنَا وَلَا تَكُن مَّعَ ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿42﴾ قَالَ سَـَٔاوِىٓ إِلَىٰ جَبَلٍ يَعْصِمُنِى مِنَ ٱلْمَآءِ ۚ قَالَ لَا عَاصِمَ ٱلْيَوْمَ مِنْ أَمْرِ ٱللَّهِ إِلَّا مَن رَّحِمَ ۚ وَحَالَ بَيْنَهُمَا ٱلْمَوْجُ فَكَانَ مِنَ ٱلْمُغْرَقِينَ ﴿43﴾ وَقِيلَ يَـٰٓأَرْضُ ٱبْلَعِى مَآءَكِ وَيَـٰسَمَآءُ أَقْلِعِى وَغِيضَ ٱلْمَآءُ وَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ وَٱسْتَوَتْ عَلَى ٱلْجُودِىِّ ۖ وَقِيلَ بُعْدًا لِّلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿44﴾ وَنَادَىٰ نُوحٌ رَّبَّهُۥ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ٱبْنِى مِنْ أَهْلِى وَإِنَّ وَعْدَكَ ٱلْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ ٱلْحَـٰكِمِينَ ﴿45﴾ قَالَ يَـٰنُوحُ إِنَّهُۥ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ ۖ إِنَّهُۥ عَمَلٌ غَيْرُ صَـٰلِحٍ ۖ فَلَا تَسْـَٔلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌ ۖ إِنِّىٓ أَعِظُكَ أَن تَكُونَ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ ﴿46﴾ قَالَ رَبِّ إِنِّىٓ أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْـَٔلَكَ مَا لَيْسَ لِى بِهِۦ عِلْمٌ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِى وَتَرْحَمْنِىٓ أَكُن مِّنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ ﴿47﴾ قِيلَ يَـٰنُوحُ ٱهْبِطْ بِسَلَـٰمٍ مِّنَّا وَبَرَكَـٰتٍ عَلَيْكَ وَعَلَىٰٓ أُمَمٍ مِّمَّن مَّعَكَ ۚ وَأُمَمٌ سَنُمَتِّعُهُمْ ثُمَّ يَمَسُّهُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿48﴾

वह नौका पर्वतों के समान उठती हुई लहरों के बीच उनको लेकर चलने लगी और नूह ने अपने पुत्र को पुकारा, जो (कुछ दूरी पर उससे) अलग था। बेटा, हमारे साथ सवार हो जाओ और इन नकारने वालों के साथ न रहो। उसने पलट कर उत्तर दिया: मैं अभी किसी पर्वत की शरण ले लूंगा जो मुझे इस पानी से बचा लेगा। नूह ने कहा: आज परमेश्वर के आदेश से कोई बचाने वाला नहीं है, परंतु जिस पर वह दया करे। इतने में एक लहर दोनों के बीच आ गई और वह भी डूबने वालों में मिल गया। आदेश हुआ: हे धरती, अपना पानी निगल ले और हे आकाश, थम जा। अतः पानी उतार दिया गया, बदला चुका दिया गया, नौका जूदी पर्वत पर टिक गई और कह दिया गया कि इस अत्याचारी क़ौम पर परमेश्वर की फटकार है। नूह ने अपने प्रभु को पुकारा और कहा कि प्रभु, मेरा बेटा तो मेरे घर वालों में से है और इसमें संदेह नहीं कि तेरा वचन सत्य है और तू सब निर्णय करने वालों से उत्तम निर्णय करने वाला है। परमेश्वर ने कहा: हे नूह, वह तेरे घर वालों में से नहीं है, वह अत्यंत दुष्ट है। तू मुझसे उस बात के बारे में प्रश्न न कर जिसका तुझे ज्ञान नहीं है। मैं तुझे उपदेश करता हूँ कि भावनाओं में बह जाने वालों में से न बनो। नूह ने तुरंत निवेदन किया: प्रभु, मैं तेरी शरण में आता हूँ कि तुझसे कोई ऐसी चीज़ मांगूँ जिसका मुझे ज्ञान नहीं है। अब यदि तू मुझे क्षमा नहीं करेगा और मुझपर दया नहीं करेगा तो मैं असफल लोगों में से हो जाऊंगा। कहा गया: हे नूह, उतार जाओ, हमारी ओर से शांति के साथ और अनेक आशीषों के साथ, तुम पर भी और उन समूहों पर भी जो उनसे निकलेंगे जो तुम्हारे साथ हैं। और (इनके बाद) कुछ ऐसे समूह भी हैं जिन्हें हम आगे सौभाग्यशाली करेंगे, फिर (उनके अपराधों के फलस्वरूप) उनको भी हमारी ओर से एक कष्टदायक दण्ड पकड़ लेगा।

تِلْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْغَيْبِ نُوحِيهَآ إِلَيْكَ ۖ مَا كُنتَ تَعْلَمُهَآ أَنتَ وَلَا قَوْمُكَ مِن قَبْلِ هَـٰذَا ۖ فَٱصْبِرْ ۖ إِنَّ ٱلْعَـٰقِبَةَ لِلْمُتَّقِينَ ﴿49﴾

यह परोक्ष की सूचनाएं हैं जो, (हे पैग़ंबर), हम तुम्हारी ओर वह्य कर रहे हैं। इससे पूर्व न तुम इनको जानते थे, न तुम्हारी क़ौम के लोग इनसे परिचित थे। इसलिए दृढ़संकल्प रहो, अंत में सफलता उन्हीं के लिए है जो परमेश्वर से डरने वाले हैं।

وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا مُفْتَرُونَ ﴿50﴾ يَـٰقَوْمِ لَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱلَّذِى فَطَرَنِىٓ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿51﴾ وَيَـٰقَوْمِ ٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ يُرْسِلِ ٱلسَّمَآءَ عَلَيْكُم مِّدْرَارًا وَيَزِدْكُمْ قُوَّةً إِلَىٰ قُوَّتِكُمْ وَلَا تَتَوَلَّوْا۟ مُجْرِمِينَ ﴿52﴾ قَالُوا۟ يَـٰهُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍ وَمَا نَحْنُ بِتَارِكِىٓ ءَالِهَتِنَا عَن قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ ﴿53﴾ إِن نَّقُولُ إِلَّا ٱعْتَرَىٰكَ بَعْضُ ءَالِهَتِنَا بِسُوٓءٍ ۗ قَالَ إِنِّىٓ أُشْهِدُ ٱللَّهَ وَٱشْهَدُوٓا۟ أَنِّى بَرِىٓءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ ﴿54﴾ مِن دُونِهِۦ ۖ فَكِيدُونِى جَمِيعًا ثُمَّ لَا تُنظِرُونِ ﴿55﴾ إِنِّى تَوَكَّلْتُ عَلَى ٱللَّهِ رَبِّى وَرَبِّكُم ۚ مَّا مِن دَآبَّةٍ إِلَّا هُوَ ءَاخِذٌۢ بِنَاصِيَتِهَآ ۚ إِنَّ رَبِّى عَلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ ﴿56﴾ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقَدْ أَبْلَغْتُكُم مَّآ أُرْسِلْتُ بِهِۦٓ إِلَيْكُمْ ۚ وَيَسْتَخْلِفُ رَبِّى قَوْمًا غَيْرَكُمْ وَلَا تَضُرُّونَهُۥ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ رَبِّى عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ حَفِيظٌ ﴿57﴾ وَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا هُودًا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍ مِّنَّا وَنَجَّيْنَـٰهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ ﴿58﴾

इसी प्रकार आद की ओर हमने उनके भाई हूद को भेजा। उसने उन्हें आह्वान किया कि मेरी क़ौम के लोगो, परमेश्वर की भक्ति करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं है। (सत्य यह है कि उसके विरुद्ध) तुम केवल झूठ गढ़ रहे हो। मेरी क़ौम के लोगो, (मैं यह बात तुम्हारी भलाई के लिए कहता हूं), मैं इस पर तुमसे कोई दक्षिणा नहीं मांगता। मेरी दक्षिणा तो उसी के ऊपर है जिसने मुझे पैदा किया है। फिर क्या समझते नहीं हो? मेरी क़ौम के लोगो, अपने प्रभु से क्षमा मांगो, फिर उसकी ओर पलटो, वह तुम पर ढेर सारी बारिश बरसाएगा और तुम्हारी शक्ति में अधिक वृद्धि करेगा। तुम अपराधी बनकर विरोध न करो। उन्होंने उत्तर दिया: हे हूद, तुम हमारे पास कोई स्पष्ट निशानी लेकर तो आए नहीं हो और इधर हमारा निर्णय यह है कि केवल तुम्हारे कहने से हम अपने देवताओं को छोड़ने वाले नहीं हैं और न तुम्हारी बात मानने वाले हैं। हम तो यही कहेंगे कि तुम्हारे ऊपर हमारे देवताओं में से किसी की मार पड़ी है। हूद ने कहा: मैं परमेश्वर को साक्षी बनाता हूं और तुम भी साक्षी रहो कि जिन्हें तुम परमेश्वर के साथ सहभागी बनाते हो, मैं उनसे पूर्णतः अलग हूँ। तो तुम सब मिलकर, (जिस प्रकार चाहो), मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचो, फिर मुझे थोड़ी सी भी ढ़ील न दो। मैंने परमेश्वर पर भरोसा कर लिया है, अपने और तुम्हारे प्रभु पर। प्रत्येक प्राणी की चोटी उसी के हाथ में है। मेरा प्रभु अवश्य सीधे मार्ग पर है। इस पर भी मुँह फेर रहे हो तो मैंने वह संदेश तुम्हें पहुंचा दिया है जो मुझे दे कर तुम्हारी ओर भेजा गया है। अब मेरा प्रभु तुम्हारे स्थान पर किसी अन्य क़ौम को सत्ताधारी बनाएगा और तुम उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकोगे। निस्संदेह, मेरा प्रभु हर चीज़ पर संरक्षक है। (फिर हुआ यह कि) जब हमारा निर्णय जारी हो गया तो हमने हूद को और उन लोगों को जो उसके साथ मान चुके थे, अपनी दया से मुक्ति दी और इस प्रकार एक अत्यंत कठोर दण्ड से उन्हें बचा लिया।1

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  1. र्थात बुद्धि और विवेक उसे प्रत्यक्ष रूप से पहचानते हैं और यदि एक व्यक्ति सच्चाई के साथ उसकी ओर ध्यान दे, तो वह पूर्णतः सीधे मार्ग पर उसके सामने उपस्थित होता है। ↩
وَتِلْكَ عَادٌ ۖ جَحَدُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ وَعَصَوْا۟ رُسُلَهُۥ وَٱتَّبَعُوٓا۟ أَمْرَ كُلِّ جَبَّارٍ عَنِيدٍ ﴿59﴾ وَأُتْبِعُوا۟ فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا لَعْنَةً وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ أَلَآ إِنَّ عَادًا كَفَرُوا۟ رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًا لِّعَادٍ قَوْمِ هُودٍ ﴿60﴾

ये थे आद, इन्होंने अपने प्रभु की आयतों को नकारा, उसके रसूलों की बात नहीं मानी और सत्य के हर प्रचंड और उद्दंड शत्रु के मार्ग का अनुसरण करते रहे। अंततः इस दुनिया में भी इनके पीछे अभिशाप लगा दिया गया और क़यामत के दिन भी। सुन लो, आद ने अपने प्रभु को नकारा, सुन लो कि आद अभिशप्त कर दिए गए, हूद की क़ौम के लोग!

وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَـٰلِحًا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥ ۖ هُوَ أَنشَأَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ وَٱسْتَعْمَرَكُمْ فِيهَا فَٱسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّى قَرِيبٌ مُّجِيبٌ ﴿61﴾ قَالُوا۟ يَـٰصَـٰلِحُ قَدْ كُنتَ فِينَا مَرْجُوًّا قَبْلَ هَـٰذَآ ۖ أَتَنْهَىٰنَآ أَن نَّعْبُدَ مَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِى شَكٍّ مِّمَّا تَدْعُونَآ إِلَيْهِ مُرِيبٍ ﴿62﴾ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَءَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّى وَءَاتَىٰنِى مِنْهُ رَحْمَةً فَمَن يَنصُرُنِى مِنَ ٱللَّهِ إِنْ عَصَيْتُهُۥ ۖ فَمَا تَزِيدُونَنِى غَيْرَ تَخْسِيرٍ ﴿63﴾

इसी प्रकार समूद की ओर हमने उनके भाई सालेह को रसूल बनाकर भेजा। उसने उन्हें आह्वान किया कि मेरी क़ौम के लोगो, परमेश्वर की भक्ति करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं है। उसी ने तुम्हें धरती से उठा खड़ा किया और उसे बसाने में लगा दिया। इसलिए उससे क्षमा चाहो, फिर उसकी ओर वापस आओ। मेरा प्रभु पास भी है और (अपने भक्तों की) प्रार्थना स्वीकार करने वाला भी। उन्होंने उत्तर दिया: हे सालेह, इससे पहले तो हमारे अंदर तुमसे बड़ी अपेक्षाएं की जाती थीं। (परंतु तुम अच्छे निकले)! क्या अब हमें उन देवताओं की पूजा से रोकना चाहते हो जिन्हें हमारे पूर्वज पूजते आए हैं? हम तो उस चीज़ के कारण जिसकी ओर तुम हमें बुला रहे हो, बड़ी कठिन दुविधा में हैं जिसने उलझन में डाल दिया है। उसने कहा: मेरी क़ौम के लोगो, भला सोचो, यदि मैं अपने प्रभु की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हूं और उसने मुझे अपनी ओर से (अपनी विशेष) दया भी प्रदान कर दी है तो मुझे परमेश्वर की पकड़ से कौन बचाएगा, यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ। अतः (जो कुछ तुम चाहते हो, उससे तो) तुम मेरी बरबादी ही में बढ़ोत्तरी करोगे।

وَيَـٰقَوْمِ هَـٰذِهِۦ نَاقَةُ ٱللَّهِ لَكُمْ ءَايَةً فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِىٓ أَرْضِ ٱللَّهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ قَرِيبٌ ﴿64﴾ فَعَقَرُوهَا فَقَالَ تَمَتَّعُوا۟ فِى دَارِكُمْ ثَلَـٰثَةَ أَيَّامٍ ۖ ذَٰلِكَ وَعْدٌ غَيْرُ مَكْذُوبٍ ﴿65﴾ فَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا صَـٰلِحًا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍ مِّنَّا وَمِنْ خِزْىِ يَوْمِئِذٍ ۗ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ ٱلْقَوِىُّ ٱلْعَزِيزُ ﴿66﴾ وَأَخَذَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ٱلصَّيْحَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دِيَـٰرِهِمْ جَـٰثِمِينَ ﴿67﴾ كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا۟ فِيهَآ ۗ أَلَآ إِنَّ ثَمُودَا۟ كَفَرُوا۟ رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًا لِّثَمُودَ ﴿68﴾

मेरी क़ौम के लोगो, यह परमेश्वर की ऊँटनी है, तुम्हारे लिए निशानी के रूप में, इसलिए इसके छोड़ दो कि परमेश्वर की धरती में चारा खाती फिरे और किसी दुर्भाव से इसको हाथ न लगाना, अन्यथा कुछ अधिक समय नहीं बीतेगा कि तुम पर प्रकोप आ जाएगा। फिर हुआ यह कि उन्होंने उसके बग़लों के नस काट दिए। इस पर सालेह ने सावधान कर दिया कि अब तीन दिन अपनी इस बस्ती में और रह लो। यह धमकी झूठी होने वाली नहीं है। अतः जब हमारा आदेश जारी हो गया तो हमने विशेष अपनी दया से सालेह को और उन लोगों को जो उसके साथ मान चुके थे, (उस दण्ड से) मुक्ति दी और उस दिन के अपमान से बचा लिया। इसमें संदेह नहीं कि तेरा प्रभु ही बलवान और प्रभावीहै। और जिन लोगों ने अत्याचार किया था, उनको बड़े ज़ोर की कड़क ने आ पकड़ा और वे अपने घरों में इस प्रकार औंधे पड़े रह गए कि जैसे वहाँ कभी बसे ही नहीं थे। सुन लो, समूद ने अपने प्रभु को नकारा! सुन लो कि समूद अभिशप्त किए गए!

وَلَقَدْ جَآءَتْ رُسُلُنَآ إِبْرَٰهِيمَ بِٱلْبُشْرَىٰ قَالُوا۟ سَلَـٰمًا ۖ قَالَ سَلَـٰمٌ ۖ فَمَا لَبِثَ أَن جَآءَ بِعِجْلٍ حَنِيذٍ ﴿69﴾ فَلَمَّا رَءَآ أَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ إِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۚ قَالُوا۟ لَا تَخَفْ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمِ لُوطٍ ﴿70﴾ وَٱمْرَأَتُهُۥ قَآئِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَـٰهَا بِإِسْحَـٰقَ وَمِن وَرَآءِ إِسْحَـٰقَ يَعْقُوبَ ﴿71﴾ قَالَتْ يَـٰوَيْلَتَىٰٓ ءَأَلِدُ وَأَنَا۠ عَجُوزٌ وَهَـٰذَا بَعْلِى شَيْخًا ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَشَىْءٌ عَجِيبٌ ﴿72﴾ قَالُوٓا۟ أَتَعْجَبِينَ مِنْ أَمْرِ ٱللَّهِ ۖ رَحْمَتُ ٱللَّهِ وَبَرَكَـٰتُهُۥ عَلَيْكُمْ أَهْلَ ٱلْبَيْتِ ۚ إِنَّهُۥ حَمِيدٌ مَّجِيدٌ ﴿73﴾

और (लूत के मामले में यह हुआ कि पहले) हमारे फ़रिश्ते इब्राहीम के पास शुभ सूचना लेकर पहुंचे थे। उन्होंने कहा: शांति हो। इब्राहीम ने उत्तर दिया: तुम पर भी शांति हो। फिर कुछ ही समय बीता था कि इब्राहीम भुना हुआ बछड़ा (उनके खाने के लिए) ले आया। परंतु जब देखा कि उनके हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ रहे हैं तो उनसे अजनबीपन महसूस किया और दिल में उनसे कुछ डरने लगा। उन्होंने कहा: डरो नहीं, हम लूत के लोगों की और भेजे गए हैं। इब्राहीम की पत्नी पास ही खड़ी थी, तो (प्रसन्नता से) हंस पड़ी। फिर हमने उसको इस्हाक़ और इस्हाक़ के बाद याक़ूब की शुभ सूचना दी। वह बोली: हाय! क्या मैं बच्चे को जन्म दूंगी, जबकि मैं स्वयं भी बुढ़िया हूं और यह मेरे पति भी बूढ़े हो चुके हैं? यह तो बड़ी आश्चर्यजनक बात है। फ़रिश्तों ने कहा: परमेश्वर की बात पर आश्चर्य करती हो? इब्राहीम के घरवालों, तुम पर तो परमेश्वर की दया और उसके आशीष हैं। निस्संदेह, परमेश्वर उत्तम गुणों वाला है, वह बड़ी भव्यता वाला है।

فَلَمَّا ذَهَبَ عَنْ إِبْرَٰهِيمَ ٱلرَّوْعُ وَجَآءَتْهُ ٱلْبُشْرَىٰ يُجَـٰدِلُنَا فِى قَوْمِ لُوطٍ ﴿74﴾ إِنَّ إِبْرَٰهِيمَ لَحَلِيمٌ أَوَّٰهٌ مُّنِيبٌ ﴿75﴾ يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ أَعْرِضْ عَنْ هَـٰذَآ ۖ إِنَّهُۥ قَدْ جَآءَ أَمْرُ رَبِّكَ ۖ وَإِنَّهُمْ ءَاتِيهِمْ عَذَابٌ غَيْرُ مَرْدُودٍ ﴿76﴾

फिर जब इब्राहीम का भय दूर हुआ और उसे शुभ सूचना मिल गई तो वह लूत के लोगों के बारे में हमसे बहस करने लगा। सत्य यह है कि इब्राहीम बड़ा सहनशील, सहानुभूति रखने वाला और अपने प्रभु की और बड़ा ध्यान रखने वाला था — इब्राहीम, यह बहस छोड़ो, तुम्हारे प्रभु का आदेश हो चुका है और अब इन लोगों पर वह दण्ड आने वाला है जो लौटाया नहीं जाता।

وَلَمَّا جَآءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا سِىٓءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالَ هَـٰذَا يَوْمٌ عَصِيبٌ ﴿77﴾ وَجَآءَهُۥ قَوْمُهُۥ يُهْرَعُونَ إِلَيْهِ وَمِن قَبْلُ كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ هَـٰٓؤُلَآءِ بَنَاتِى هُنَّ أَطْهَرُ لَكُمْ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ فِى ضَيْفِىٓ ۖ أَلَيْسَ مِنكُمْ رَجُلٌ رَّشِيدٌ ﴿78﴾ قَالُوا۟ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا لَنَا فِى بَنَاتِكَ مِنْ حَقٍّ وَإِنَّكَ لَتَعْلَمُ مَا نُرِيدُ ﴿79﴾ قَالَ لَوْ أَنَّ لِى بِكُمْ قُوَّةً أَوْ ءَاوِىٓ إِلَىٰ رُكْنٍ شَدِيدٍ ﴿80﴾ قَالُوا۟ يَـٰلُوطُ إِنَّا رُسُلُ رَبِّكَ لَن يَصِلُوٓا۟ إِلَيْكَ ۖ فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِّنَ ٱلَّيْلِ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنكُمْ أَحَدٌ إِلَّا ٱمْرَأَتَكَ ۖ إِنَّهُۥ مُصِيبُهَا مَآ أَصَابَهُمْ ۚ إِنَّ مَوْعِدَهُمُ ٱلصُّبْحُ ۚ أَلَيْسَ ٱلصُّبْحُ بِقَرِيبٍ ﴿81﴾

इसके बाद जब हमारे फ़रिश्ते लूत के पास पहुंचे तो उनके आने से वह बहुत दुखी और उदास हुआ और कहने लगा कि यह तो बड़े संकट का दिन है। उसकी क़ौम के लोग यह देख कर कि बहुत ही सुंदर लड़के आए हैं, अचानक दौड़ते हुए उसके पास आ पहुंचे। पहले से वे ऐसे ही कुकर्मों के आदी थे। उसने कहा: मेरी क़ौम के लोगो, ये मेरी बेटियां हैं। ये तुम्हारे लिए अधिक पवित्र हैं। इसलिए परमेश्वर से डरो और मेरे अतिथियों के विषय में मुझे अपमानित न करो। क्या तुम में कोई भला आदमी नहीं है? उन्होंने उत्तर दिया: तुम जानते ही हो कि तुम्हारी बेटियों पर हमारा कोई अधिकार नहीं है और तुम अच्छे से जानते हो जो कुछ हम चाहते हैं। लूत ने कहा: काश, मेरे पास तुम से लड़ने की शक्ति होती या मैं किसी मज़बूत सहारे की शरण ले सकता। फ़रिश्तों ने कहा: हे लूत, हम तुम्हारे प्रभु के भेजे हुए हैं। (संतुष्ट रहो), ये तुम्हारे पास भी नहीं आ सकेंगे। अतः अपने परिवार को लेकर कुछ रात रहे निकल जाओ और तुम में से कोई पीछे पलटकर न देखे। तुम्हारी पत्नी नहीं, इसलिए कि उसके साथ वही कुछ होने वाला है जो इन लोगों के साथ होना है। इन (पर दंड) के लिए सवेरे का समय निश्चित है। (तुम परेशान क्यों होते हो)? क्या सवेरा पास नहीं है?1

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  1. यह कोई प्रस्ताव नहीं था, अपितु अपनी क़ौम की अंतरात्मा को जगाने और झकझोरने के लिए मानो पैग़ंबर लूत की ओर से बेताबी के साथ दी एक अंतिम पुकार थी। ↩
فَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا جَعَلْنَا عَـٰلِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةً مِّن سِجِّيلٍ مَّنضُودٍ ﴿82﴾ مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ ۖ وَمَا هِىَ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ بِبَعِيدٍ ﴿83﴾

फिर जब हमारा आदेश आ पहुंचा तो हमने उस बस्ती को उलट के रख दिया और उस पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए, परत दर परत। जो तुम्हारे प्रभु के यहाँ निशान लगाए हुए थे और वे इन अत्याचारों से कुछ अधिक दूर नहीं थे।

وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥ ۖ وَلَا تَنقُصُوا۟ ٱلْمِكْيَالَ وَٱلْمِيزَانَ ۚ إِنِّىٓ أَرَىٰكُم بِخَيْرٍ وَإِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ مُّحِيطٍ ﴿84﴾ وَيَـٰقَوْمِ أَوْفُوا۟ ٱلْمِكْيَالَ وَٱلْمِيزَانَ بِٱلْقِسْطِ ۖ وَلَا تَبْخَسُوا۟ ٱلنَّاسَ أَشْيَآءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ﴿85﴾ بَقِيَّتُ ٱللَّهِ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۚ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيْكُم بِحَفِيظٍ ﴿86﴾ قَالُوا۟ يَـٰشُعَيْبُ أَصَلَوٰتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَآ أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِىٓ أَمْوَٰلِنَا مَا نَشَـٰٓؤُا۟ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ ٱلْحَلِيمُ ٱلرَّشِيدُ ﴿87﴾ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَءَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّى وَرَزَقَنِى مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًا ۚ وَمَآ أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَىٰ مَآ أَنْهَىٰكُمْ عَنْهُ ۚ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا ٱلْإِصْلَـٰحَ مَا ٱسْتَطَعْتُ ۚ وَمَا تَوْفِيقِىٓ إِلَّا بِٱللَّهِ ۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ ﴿88﴾ وَيَـٰقَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِىٓ أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَآ أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَـٰلِحٍ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِّنكُم بِبَعِيدٍ ﴿89﴾ وَٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّى رَحِيمٌ وَدُودٌ ﴿90﴾ قَالُوا۟ يَـٰشُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ كَثِيرًا مِّمَّا تَقُولُ وَإِنَّا لَنَرَىٰكَ فِينَا ضَعِيفًا ۖ وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَـٰكَ ۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيْنَا بِعَزِيزٍ ﴿91﴾ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَهْطِىٓ أَعَزُّ عَلَيْكُم مِّنَ ٱللَّهِ وَٱتَّخَذْتُمُوهُ وَرَآءَكُمْ ظِهْرِيًّا ۖ إِنَّ رَبِّى بِمَا تَعْمَلُونَ مُحِيطٌ ﴿92﴾ وَيَـٰقَوْمِ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنِّى عَـٰمِلٌ ۖ سَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن يَأْتِيهِ عَذَابٌ يُخْزِيهِ وَمَنْ هُوَ كَـٰذِبٌ ۖ وَٱرْتَقِبُوٓا۟ إِنِّى مَعَكُمْ رَقِيبٌ ﴿93﴾ وَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا شُعَيْبًا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍ مِّنَّا وَأَخَذَتِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ٱلصَّيْحَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دِيَـٰرِهِمْ جَـٰثِمِينَ ﴿94﴾ كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا۟ فِيهَآ ۗ أَلَا بُعْدًا لِّمَدْيَنَ كَمَا بَعِدَتْ ثَمُودُ ﴿95﴾

और मद्यन की ओर उनके भाई शुऐब को रसूल बनाकर भेजा। उसने आह्वान किया कि मेरी क़ौम के लोगो, परमेश्वर की भक्ति करो, उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई उपास्य नहीं है और नापतोल में कमी न करो। मैं तुम्हें समृद्ध देख रहा हूं, परंतु मुझे तुम्हारे विषय में एक ऐसे दिन के प्रकोप की आशंका है जो घेरने वाला है। मेरी क़ौम के लोगो, नापतोल को ठीक न्याय के साथ पूरा रखो और लोगों को उनकी चीज़ें घटा कर न दो और धरती में बिगाड़ न फैलाते फिरो। परमेश्वर का दिया हुआ लाभ ही तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम सच्चे मानने वाले हो। (मुझे समझाना ही है) और मैं तुम पर निरीक्षक नियुक्त नहीं किया गया हूं। उन्होंने उत्तर दिया: हे शुऐब, क्या तुम्हारी नमाज़ तुम्हें यह सिखाती है कि हम उन चीज़ों को छोड़ दें जिन्हें हमारे पूर्वज पूजते रहे या अपने धन का अपनी इच्छा के अनुसार उपयोग न करें? (तुम्हारी समझ में सब अगले पिछले मूर्ख और भटके हुए थे और हमारे बीच) केवल तुम ही एक बुद्धिमान और सदाचारी रह गए हो! उसने कहा: मेरी क़ौम के लोगो, थोड़ा विचार तो करो, यदि मैं अपने प्रभु की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हूं, फिर उसने (वह्य के रूप में) मुझे एक उत्तम जीविका भी अपनी ओर से प्रदान कर दी तो इसके अतिरिक्त किस बात का आह्वान करूं? मैं कदापि नहीं चाहता कि तुम्हारा विरोध करके वही काम स्वयं करूं जिससे तुम्हें रोक रहा हूं। मैं तो केवल सुधार चाहता हूं, जहाँ तक कर सकूं। इसका सौभाग्य मुझे परमेश्वर ही से मिलेगा। मैंने उसी पर भरोसा किया है और उसी की ओर पलटता रहता हूँ। मेरी क़ौम के लोगो, मेरे विरुद्ध तुम्हारी हठधर्मी कहीं यह घड़ी न पहुंचा दे कि तुम पर भी वही संकट आ जाए जो नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर आ पड़ा था और लूत की क़ौम तो तुमसे कुछ अधिक दूर भी नहीं है। और देखो, (सुरक्षित रहना चाहते हो तो) अपने प्रभु से क्षमा चाहो, फिर उसकी और पलट आओ। सत्य यह है कि मेरा प्रभु अत्यंत कृपालु और बड़ा प्रेम करने वाला है। उन्होंने उत्तर दिया: हे शुऐब, तुम्हारी बहुत सी बातें हमारी समझ में नहीं आतीं और हम तो देखते हैं कि हमारे बीच तुम एक दुर्बल आदमी हो, तुम्हारा क़बीला न होता तो हम तुम्हें पथराव से मार देते, तुम हमारे ऊपर कुछ भारी नहीं हो। शुऐब ने कहा: मेरी क़ौम के लोगो, क्या मेरा क़बीला तुम पर परमेश्वर से अधिक भारी है? उसका तुम्हें भय है और परमेश्वर को तुमने भुला कर पीठ पीछे डाल रखा है। सत्य यह है कि जो कुछ तुम करते हो, मेरा प्रभु उसको घेरे हुए है। मेरी क़ौम के लोगो, जो कुछ कर रहे हो, अपनी जगह किए जाओ, मैं भी कर रहा हूं। तुम शीघ्र ही जान जाओगे कि किस पर वह दण्ड आता है जो उसको अपमानित करके रख देगा और कौन अपनी बात में झूठा है। तुम प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहा हूं। (इस पर) जब हमारा आदेश जारी हो गया तो हमने शुऐब को और उन लोगों को जो उसके साथ मान चुके थे, अपनी विशेष कृपा से मुक्ति दी और जिन्होंने (अपने आप पर) अत्याचार किया था, उनको कड़क ने आ पकड़ा और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए। जैसे उनमें कभी बसे ही नहीं थे। सुनो, मद्यन वाले भी अभिशप्त किए गए, जिस प्रकार समूद अभिशप्त किए गए!

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَا وَسُلْطَـٰنٍ مُّبِينٍ ﴿96﴾ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَٱتَّبَعُوٓا۟ أَمْرَ فِرْعَوْنَ ۖ وَمَآ أَمْرُ فِرْعَوْنَ بِرَشِيدٍ ﴿97﴾ يَقْدُمُ قَوْمَهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فَأَوْرَدَهُمُ ٱلنَّارَ ۖ وَبِئْسَ ٱلْوِرْدُ ٱلْمَوْرُودُ ﴿98﴾ وَأُتْبِعُوا۟ فِى هَـٰذِهِۦ لَعْنَةً وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ بِئْسَ ٱلرِّفْدُ ٱلْمَرْفُودُ ﴿99﴾

इसी प्रकार मूसा को हमने अपनी निशानियों के साथ और एक स्पष्ट प्रमाण के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर रसूल बना कर भेजा था तो उन्होंने फ़िरऔन की बात मानी, यद्यपि फ़िरऔन की बात उचित नहीं थी। क़यामत के दिन वह अपनी क़ौम के आगे-आगे होगा और उन्हें नरक में ले जा कर उतारेगा। कैसा बुरा घाट है जिस पर वे उतरेंगे! उनके पीछे दुनिया में भी अभिशाप लगा दिया गया और क़यामत के दिन भी। कैसा बुरा फल है जो उन्हें दिया गया!

ذَٰلِكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْقُرَىٰ نَقُصُّهُۥ عَلَيْكَ ۖ مِنْهَا قَآئِمٌ وَحَصِيدٌ ﴿100﴾ وَمَا ظَلَمْنَـٰهُمْ وَلَـٰكِن ظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ ۖ فَمَآ أَغْنَتْ عَنْهُمْ ءَالِهَتُهُمُ ٱلَّتِى يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍ لَّمَّا جَآءَ أَمْرُ رَبِّكَ ۖ وَمَا زَادُوهُمْ غَيْرَ تَتْبِيبٍ ﴿101﴾ وَكَذَٰلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَآ أَخَذَ ٱلْقُرَىٰ وَهِىَ ظَـٰلِمَةٌ ۚ إِنَّ أَخْذَهُۥٓ أَلِيمٌ شَدِيدٌ ﴿102﴾ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةً لِّمَنْ خَافَ عَذَابَ ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمٌ مَّجْمُوعٌ لَّهُ ٱلنَّاسُ وَذَٰلِكَ يَوْمٌ مَّشْهُودٌ ﴿103﴾ وَمَا نُؤَخِّرُهُۥٓ إِلَّا لِأَجَلٍ مَّعْدُودٍ ﴿104﴾ يَوْمَ يَأْتِ لَا تَكَلَّمُ نَفْسٌ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ فَمِنْهُمْ شَقِىٌّ وَسَعِيدٌ ﴿105﴾ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ شَقُوا۟ فَفِى ٱلنَّارِ لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَشَهِيقٌ ﴿106﴾ خَـٰلِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ إِلَّا مَا شَآءَ رَبُّكَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ فَعَّالٌ لِّمَا يُرِيدُ ﴿107﴾ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ سُعِدُوا۟ فَفِى ٱلْجَنَّةِ خَـٰلِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ إِلَّا مَا شَآءَ رَبُّكَ ۖ عَطَآءً غَيْرَ مَجْذُوذٍ ﴿108﴾ فَلَا تَكُ فِى مِرْيَةٍ مِّمَّا يَعْبُدُ هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ مَا يَعْبُدُونَ إِلَّا كَمَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُهُم مِّن قَبْلُ ۚ وَإِنَّا لَمُوَفُّوهُمْ نَصِيبَهُمْ غَيْرَ مَنقُوصٍ ﴿109﴾

ये इन बस्तियों की कथाएँ हैं जो हम तुम्हें सुना रहे हैं। इनमें से कुछ खड़ी हैं और कुछ की फसल कट चुकी है। हमने इन पर कोई अत्याचार नहीं किया, अपितु इन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया था। फिर तेरे प्रभु का आदेश जारी हुआ तो इनके वे देवता इनके कुछ भी काम न आए जिन्हें परमेश्वर के अतिरिक्त पुकारते थे। इनकी बर्बादी के अतिरिक्त उन्होंने इन लोगों के पक्ष में किसी चीज़ की बढ़ोत्तरी नहीं की। तेरा प्रभु जब बस्तियों को पकड़ता है और वे अत्याचार कर रही होती हैं तो उसकी पकड़ ऐसी ही होती है। सत्य यह है कि उसकी पकड़ अत्यंत कष्टदायक और कठोर है। इसमें अवश्य उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो परलोक के दण्ड से डरें। वह एक ऐसा दिन है जिसके लिए सब लोग इकट्ठे किए जाएँगे और वह उपस्थिति का दिन होगा। हम उसको केवल कुछ देर के लिए टाल रहे हैं। जब वह दिन आ जाएगा तो कोई व्यक्ति परमेश्वर की अनुमति के बिना बात नहीं कर सकेगा। फिर लोगों में से कुछ दुर्भाग्यशाली होंगे और कुछ सौभाग्यशाली। तो जो दुर्भाग्यशाली होंगे, वे नरक में जाएँगे। उन्हें वहां चीखना और चिल्लाना है। वे उसी में पड़े रहेंगे, जब तक (उस लोक के) धरती और आकाश स्थापित हैं, सिवाय इसके कि तेरा प्रभु कुछ और चाहे। इसमें संदेह नहीं कि तेरा प्रभु जो चाहे, कर डालने वाला है। रहे वे जो सौभाग्यशाली हैं तो वे स्वर्ग में होंगे। वे उसी में रहेंगे, जब तक (उस लोक के) धरती और आकाश स्थापित हैं, सिवाय इसके कि तेरा प्रभु कुछ और चाहे, उसकी ओर से अनंत उपहार के रूप में । अतः, हे पैग़ंबर, तुम उन चीज़ों के विषय में किसी दुविधा में न पढ़ो जिन्हें ये पूजते हैं। ये उसी प्रकार पूज रहे हैं, जिस प्रकार इनसे पहले इनके पूर्वज पूजते रहे। हमारा निर्णय है कि इनका हिस्सा हम भी बिना किसी कटौती के इन्हें पूरा-पूरा चुका देंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके कर्मों के परिणामस्वरूप जो बदला निर्धारित किया गया है, वह उसे पूर्ण रूप से दे देंगे। ↩
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ فَٱخْتُلِفَ فِيهِ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِى شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ ﴿110﴾ وَإِنَّ كُلًّا لَّمَّا لَيُوَفِّيَنَّهُمْ رَبُّكَ أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ بِمَا يَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴿111﴾ فَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَ وَمَن تَابَ مَعَكَ وَلَا تَطْغَوْا۟ ۚ إِنَّهُۥ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ﴿112﴾ وَلَا تَرْكَنُوٓا۟ إِلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ فَتَمَسَّكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِنْ أَوْلِيَآءَ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ ﴿113﴾ وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ طَرَفَىِ ٱلنَّهَارِ وَزُلَفًا مِّنَ ٱلَّيْلِ ۚ إِنَّ ٱلْحَسَنَـٰتِ يُذْهِبْنَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ ذَٰلِكَ ذِكْرَىٰ لِلذَّٰكِرِينَ ﴿114﴾ وَٱصْبِرْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿115﴾

हमने मूसा को धर्मग्रंथ दिया था तो उसके बारे में भी इसी प्रकार मतभेद किया गया था। तेरे प्रभु की ओर से यदि एक बात पहले ही निश्चित न कर दी गई होती तो इनके बीच (इस मतभेद का) निपटारा कर दिया जाता। सत्य यह है कि जो कुछ तुम प्रस्तुत कर रहे हो, उसकी ओर से ये लोग ऐसी शंका में पड़े हुए हैं जो उलझा देने वाली है। (तुम संतुष्ट रहो), तुम्हारा प्रभु इनमें से प्रत्येक को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला देकर रहेगा। ये जो कुछ कर रहे हैं, वह उससे अवश्य परिचित है। अतः तुम दृढ़संकल्प रहो, जैसा कि तुम को आदेश दिया गया है, और वे भी जो तुम्हारे साथ अपने प्रभु की ओर पलट आए हैं और तुम लोग विकृति न अपनाओ। इसमें संदेह नहीं कि जो कुछ तुम कर रहे हो, उसे वह देख रहा है। इनके प्रलोभन और धमकाने पर भी इन दुष्टों की ओर थोड़ा भी नहीं झुकना, नहीं तो तुम्हें भी आग पकड़ लेगी और परमेश्वर के अतिरिक्त तुम्हारा कोई पक्षधर न होगा, फिर कहीं से सहायता भी नहीं पाओगे। और देखो, (हे पैग़ंबर, इस मार्ग में दृढ़संकल्प रहने के लिए) दिन के दोनों हिस्सों में नमाज़ का प्रबंध करो और रात के पहले हिस्से में भी। सत्य यह है कि अच्छे कर्म पापकर्मों को दूर कर देते हैं। यह एक स्मरण है उनके लिए जो स्मरण प्राप्त करने वाले हों। और धैर्य रखो, इसलिए कि परमेश्वर उन लोगों का फल बर्बाद नहीं करेगा जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं।

فَلَوْلَا كَانَ مِنَ ٱلْقُرُونِ مِن قَبْلِكُمْ أُو۟لُوا۟ بَقِيَّةٍ يَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْفَسَادِ فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا قَلِيلًا مِّمَّنْ أَنجَيْنَا مِنْهُمْ ۗ وَٱتَّبَعَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مَآ أُتْرِفُوا۟ فِيهِ وَكَانُوا۟ مُجْرِمِينَ ﴿116﴾ وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ ﴿117﴾

(फिर इस पर भी विचार करो कि) ऐसा क्यों न हुआ कि तुम से पहले के समुदायों में ऐसे भले लोग होते जो (लोगों को) धरती में बिगाड़ पैदा करने से रोकते? ऐसे लोग निकले भी तो बहुत थोड़े जिन्हें हमने उनमें से मुक्ति दी और दुष्ट लोग जिस ऐश में थे, उसी के पीछे पड़े रहे, और वे थे ही अपराधी लोग। (हे पैग़ंबर), तेरा प्रभु ऐसा नहीं है कि बस्तियों को (उनके) किसी अत्याचार के बदले में नष्ट कर दे, जबकि उनके निवासी सुधार करने वाले हों।

وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ لَجَعَلَ ٱلنَّاسَ أُمَّةً وَٰحِدَةً ۖ وَلَا يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ ﴿118﴾ إِلَّا مَن رَّحِمَ رَبُّكَ ۚ وَلِذَٰلِكَ خَلَقَهُمْ ۗ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ ﴿119﴾

तेरा प्रभु चाहता तो सभी मनुष्यों को एक ही समूह बना देता, (परंतु उसने ऐसा नहीं किया, अपितु उन्हें स्वेच्छा औए स्वतंत्रता प्रदान की है तो अब यही होगा कि) वे सदा मतभेद में रहेंगे। उनके सिवा जिन पर तेरा प्रभु कृपा करे। उसने इसीलिए उनको पैदा किया है कि वे अपनी पसंद से निर्णय करें)। तो तुम्हारे प्रभु की बात पूरी हो गई (जो उसने कही थी) कि क्या जिन्न और क्या मनुष्य, मैं सबसे नरक को भर दूंगा।

وَكُلًّا نَّقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلرُّسُلِ مَا نُثَبِّتُ بِهِۦ فُؤَادَكَ ۚ وَجَآءَكَ فِى هَـٰذِهِ ٱلْحَقُّ وَمَوْعِظَةٌ وَذِكْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ ﴿120﴾ وَقُل لِّلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنَّا عَـٰمِلُونَ ﴿121﴾ وَٱنتَظِرُوٓا۟ إِنَّا مُنتَظِرُونَ ﴿122﴾ وَلِلَّهِ غَيْبُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ يُرْجَعُ ٱلْأَمْرُ كُلُّهُۥ فَٱعْبُدْهُ وَتَوَكَّلْ عَلَيْهِ ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ ﴿123﴾

और, (हे पैग़ंबर), रसूलों की कथाओं में से हर एक हम तुम्हें सुना रहे हैं, जिससे हम तुम्हारे दिल को दृढ़ करें। इनके अंदर तुम्हारे पास सत्य आया है और मानने वालों के लिए इनमें सदुपदेश और स्मरण है। इनसे कह दो, (हे पैग़ंबर), जो नहीं मान रहे, कि तुम अपने ढंग से जो चाहते हो करो, हम अपने ढंग से करेंगे। तुम भी प्रतीक्षा करो (कि परमेश्वर का निर्णय कब व्यक्त होता है), हम भी प्रतीक्षा में हैं। धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ छिपा हुआ है, सब परमेश्वर के पास है और सभी मामले उसी की ओर लौटाए जाते हैं। तो, (हे पैग़ंबर), उसी की भक्ति करो और उसी पर भरोसा रखो। तुम लोग जो कुछ कर रहे हो, तेरा प्रभु उससे अनजान नहीं है।