सूरह 12

यूसुफ़्

मक्की · 111 आयतें · 33 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का मूलभाव उन परिणामों के संदर्भ में सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है, जो पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के द्वारा सत्य के निर्णायक संचार (इत्माम-ए-हुज्जत) के बाद, उनके मानने वालों और न मानने वालों के लिए इसी दुनिया में सामने आने वाले थे। हालांकि, तर्क का स्वरूप अलग-अलग है। पहली सूरह में जिन तथ्यों को पैग़ंबर यूसुफ़ (अ.) के वृत्तांत के संदर्भ में स्पष्ट किया गया है, दूसरी में वही तथ्य बुद्धि व मानव स्वभाव के प्रमाणों से सिद्ध किए गए हैं। दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश क़बीले से है, और इनकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये सूरतें पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जिसे 'इत्माम-ए-हुज्जत' का चरण कहा जाता है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

الٓر ۚ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ ﴿1﴾ إِنَّآ أَنزَلْنَـٰهُ قُرْءَٰنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ ﴿2﴾

यह सूरह 'अलिफ़ लाम रा' है। यह उस ग्रंथ की आयतें हैं जो अपना अभिप्राय पूरे विस्तार के साथ बताता है। हमने इसको अरबी भाषा में क़ुरआन बनाकर उतारा है ताकि (हे मक्का के क़ुरैश), तुम इसको अच्छे से समझ सको।

نَحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ أَحْسَنَ ٱلْقَصَصِ بِمَآ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ وَإِن كُنتَ مِن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلْغَـٰفِلِينَ ﴿3﴾ إِذْ قَالَ يُوسُفُ لِأَبِيهِ يَـٰٓأَبَتِ إِنِّى رَأَيْتُ أَحَدَ عَشَرَ كَوْكَبًا وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ رَأَيْتُهُمْ لِى سَـٰجِدِينَ ﴿4﴾ قَالَ يَـٰبُنَىَّ لَا تَقْصُصْ رُءْيَاكَ عَلَىٰٓ إِخْوَتِكَ فَيَكِيدُوا۟ لَكَ كَيْدًا ۖ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ لِلْإِنسَـٰنِ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴿5﴾ وَكَذَٰلِكَ يَجْتَبِيكَ رَبُّكَ وَيُعَلِّمُكَ مِن تَأْوِيلِ ٱلْأَحَادِيثِ وَيُتِمُّ نِعْمَتَهُۥ عَلَيْكَ وَعَلَىٰٓ ءَالِ يَعْقُوبَ كَمَآ أَتَمَّهَا عَلَىٰٓ أَبَوَيْكَ مِن قَبْلُ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْحَـٰقَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ﴿6﴾

(हे पैग़ंबर), इस क़ुरआन के माध्यम से जो हमने तुम्हारी ओर वह्य किया है, हम तुम्हें एक बहुत अच्छी कथा सुनाते हैं। सत्य यह है कि (इस प्रकार की चीज़ों से) तुम इससे पहले पूर्णतः अनजान थे। यह तब की घटना है, जब यूसुफ़ ने अपने पिता से कहा: पिता श्री, मैंने सपना देखा है कि ग्यारह तारे हैं और सूरज और चाँद हैं। मैंने उनको देखा कि वे मुझे सज्दा कर रहे हैं। उसके पिता ने उत्तर में कहा: बेटा, अपना यह सपना अपने भाइयों को न सुनाना, ऐसा न हो कि वे तुम्हारे विरुद्ध कोई षड्यंत्र करने लगें। इसमें संदेह नहीं कि शैतान मनुष्य का स्पष्ट शत्रु है। (तुम्हारा यह सपना बता रहा है कि) तुम्हारा प्रभु तुम्हें इसी प्रकार चुन लेगा और तुम्हें बातों की वास्तविकता तक पहुंचना सिखाएगा और तुम पर और याक़ूब के वंश पर अपना वरदान पूरा करेगा, जिस प्रकार वह इससे पहले तुम्हारे पूर्वजों इब्राहीम और इस्हाक़ पर कर चुका है। निस्संदेह तुम्हारा प्रभु ज्ञानी और प्रज्ञावान है।

لَّقَدْ كَانَ فِى يُوسُفَ وَإِخْوَتِهِۦٓ ءَايَـٰتٌ لِّلسَّآئِلِينَ ﴿7﴾ إِذْ قَالُوا۟ لَيُوسُفُ وَأَخُوهُ أَحَبُّ إِلَىٰٓ أَبِينَا مِنَّا وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّ أَبَانَا لَفِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿8﴾ ٱقْتُلُوا۟ يُوسُفَ أَوِ ٱطْرَحُوهُ أَرْضًا يَخْلُ لَكُمْ وَجْهُ أَبِيكُمْ وَتَكُونُوا۟ مِنۢ بَعْدِهِۦ قَوْمًا صَـٰلِحِينَ ﴿9﴾ قَالَ قَآئِلٌ مِّنْهُمْ لَا تَقْتُلُوا۟ يُوسُفَ وَأَلْقُوهُ فِى غَيَـٰبَتِ ٱلْجُبِّ يَلْتَقِطْهُ بَعْضُ ٱلسَّيَّارَةِ إِن كُنتُمْ فَـٰعِلِينَ ﴿10﴾

सत्य यह है कि यूसुफ़ और उसके भाइयों (के इस वृत्तांत) में पूछने वालों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं। जब उसके भाइयों ने आपस में कहा कि यूसुफ़ और उसका भाई, हमारे पिता को हम से अधिक प्रिय हैं, यद्यपि हम एक पूरा जत्था हैं। निस्संदेह हमारा पिता एक स्पष्ट भूल में पड़ा है। (इसका समाधान यही है कि) यूसुफ़ की हत्या कर दो या उसको कहीं फेंक दो, तुम्हारे पिता का ध्यान इससे केवल तुम्हारी ओर हो जाएगा और इसके बाद तुम लोग बिल्कुल ठीक हो जाओगे। इस पर उनमें से एक कहने वाले ने कहा: यूसुफ़ की हत्या न करो, यदि कुछ करना ही है तो उसको किसी अंधे कुएं के तल में फेंक दो, कोई रास्ता चलता कारवां उसे निकाल ले जाएगा।

قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا مَا لَكَ لَا تَأْمَ۫نَّا عَلَىٰ يُوسُفَ وَإِنَّا لَهُۥ لَنَـٰصِحُونَ ﴿11﴾ أَرْسِلْهُ مَعَنَا غَدًا يَرْتَعْ وَيَلْعَبْ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَـٰفِظُونَ ﴿12﴾ قَالَ إِنِّى لَيَحْزُنُنِىٓ أَن تَذْهَبُوا۟ بِهِۦ وَأَخَافُ أَن يَأْكُلَهُ ٱلذِّئْبُ وَأَنتُمْ عَنْهُ غَـٰفِلُونَ ﴿13﴾ قَالُوا۟ لَئِنْ أَكَلَهُ ٱلذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّآ إِذًا لَّخَـٰسِرُونَ ﴿14﴾

(इसके बाद वे गए और) उन्होंने अपने पिता से कहा: पिता श्री, क्या बात है कि यूसुफ़ के बारे में आप हम पर भरोसा नहीं करते, यद्यपि हम उसके सच्चे शुभचिंतक हैं। उसे कल हमारे साथ जाने दीजिए, थोड़ा कुछ चर चुग ले और खेले कूदे, हम उसकी सुरक्षा के ज़िम्मेदार होंगे। पिता ने कहा: मुझे यह बात दुखी कर देती है कि तुम उसे ले जाओ और डरता हूं कि तुम उससे असावधान हो और उसे भेड़िया खा जाए। उन्होंने उत्तर दिया: यदि उसे भेड़िए ने खा लिया, जबकि हम एक जत्था है, तब तो हम बड़े ही असफल हुए।

فَلَمَّا ذَهَبُوا۟ بِهِۦ وَأَجْمَعُوٓا۟ أَن يَجْعَلُوهُ فِى غَيَـٰبَتِ ٱلْجُبِّ ۚ وَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِ لَتُنَبِّئَنَّهُم بِأَمْرِهِمْ هَـٰذَا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿15﴾ وَجَآءُوٓ أَبَاهُمْ عِشَآءً يَبْكُونَ ﴿16﴾ قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَآ إِنَّا ذَهَبْنَا نَسْتَبِقُ وَتَرَكْنَا يُوسُفَ عِندَ مَتَـٰعِنَا فَأَكَلَهُ ٱلذِّئْبُ ۖ وَمَآ أَنتَ بِمُؤْمِنٍ لَّنَا وَلَوْ كُنَّا صَـٰدِقِينَ ﴿17﴾ وَجَآءُو عَلَىٰ قَمِيصِهِۦ بِدَمٍ كَذِبٍ ۚ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنفُسُكُمْ أَمْرًا ۖ فَصَبْرٌ جَمِيلٌ ۖ وَٱللَّهُ ٱلْمُسْتَعَانُ عَلَىٰ مَا تَصِفُونَ ﴿18﴾

इस प्रकार (आग्रह करके) जब वे यूसुफ़ को ले गए और अंततः तय कर लिया कि उसको कुएं की गहराई में फेंक दें और उधर हमने उसको वह्य कर दी कि तुम (एक दिन) इनके इस कार्य से इन्हें अवश्य सूचित करोगे, जब इन्हें कुछ ध्यान भी न होगा। और (उसको कुएं में गिरा कर) वे रोते पीटते कुछ रात गए अपने पिता के पास पहुंच गए। उन्होंने (आकर) कहा: पिता श्री, हम दौड़ की स्पर्धा करने में लग गए थे और यूसुफ़ को हमने अपने सामान के पास छोड़ दिया था कि इतने में भेड़िया (आया और) उसको खा गया। परंतु आप तो हमारी बात का विश्वास नहीं करेंगे, यद्यपि हम पूरे सच्चे हों। वे (इस बात को साबित करने के लिए) यूसुफ़ की क़मीज़ पर झूठ मूठ का ख़ून भी लगा कर ले आए थे। पिता ने कहा: नहीं, अपितु यह तो तुम्हारे दिल ने तुम्हारे लिए एक बात बना ली है। अतः अब शोभनीय धैर्य की शक्ति मिले और जो कुछ तुम कह रहे हो, उस पर परमेश्वर ही सहारा है।

وَجَآءَتْ سَيَّارَةٌ فَأَرْسَلُوا۟ وَارِدَهُمْ فَأَدْلَىٰ دَلْوَهُۥ ۖ قَالَ يَـٰبُشْرَىٰ هَـٰذَا غُلَـٰمٌ ۚ وَأَسَرُّوهُ بِضَـٰعَةً ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِمَا يَعْمَلُونَ ﴿19﴾ وَشَرَوْهُ بِثَمَنٍۭ بَخْسٍ دَرَٰهِمَ مَعْدُودَةٍ وَكَانُوا۟ فِيهِ مِنَ ٱلزَّٰهِدِينَ ﴿20﴾

उधर एक कारवां आया और उन्होंने अपना पानी भरने वाला भेजा और उसने अपना डोल (कुएं में) डाला, (फिर यूसुफ़ को देखा तो) पुकार उठा: शुभ समाचार हो, यह तो एक लड़का है। अतः उन्होंने (उसको निकाला और) उसको पूंजी समझकर छिपा लिया और जो कुछ वे कर रहे थे, परमेश्वर उससे भलीभांति परिचित था। (फिर लेकर मिस्र पहुंच गए) और उसको थोड़ी सी धनराशि, कुछ दिरहमों के बदले बेच दिया और वे उसके बारे में कोई लगाव नहीं रखते थे।

وَقَالَ ٱلَّذِى ٱشْتَرَىٰهُ مِن مِّصْرَ لِٱمْرَأَتِهِۦٓ أَكْرِمِى مَثْوَىٰهُ عَسَىٰٓ أَن يَنفَعَنَآ أَوْ نَتَّخِذَهُۥ وَلَدًا ۚ وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلِنُعَلِّمَهُۥ مِن تَأْوِيلِ ٱلْأَحَادِيثِ ۚ وَٱللَّهُ غَالِبٌ عَلَىٰٓ أَمْرِهِۦ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ﴿21﴾ وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُۥٓ ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿22﴾

मिस्र के लोगों में से जिसने उसे ख़रीदा, उसने अपनी पत्नी से कहा: इसको अच्छे से रखना, आशा है कि हमें लाभ पहुंचाए या हम इसे बेटा ही बना लें। इस प्रकार यूसुफ़ को हमने उस देश में स्थान दिया, इसलिए कि उसका चयन करें और इसलिए कि उसे बातों की तह तक पहुँचना सिखाएं। सत्य यह है कि परमेश्वर अपनी इच्छा को लागू करके रहता है, परंतु अधिकांश लोग जानते नहीं हैं। (अतः ऐसा ही हुआ) और जब वह जवानी को पहुँच गया तो हमने उसे अधिकार और ज्ञान प्रदान किया। जो उत्तम आचरण वाले हों, उनको हम इसी प्रकार बदला दिया करते हैं।

وَرَٰوَدَتْهُ ٱلَّتِى هُوَ فِى بَيْتِهَا عَن نَّفْسِهِۦ وَغَلَّقَتِ ٱلْأَبْوَٰبَ وَقَالَتْ هَيْتَ لَكَ ۚ قَالَ مَعَاذَ ٱللَّهِ ۖ إِنَّهُۥ رَبِّىٓ أَحْسَنَ مَثْوَاىَ ۖ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ ﴿23﴾ وَلَقَدْ هَمَّتْ بِهِۦ ۖ وَهَمَّ بِهَا لَوْلَآ أَن رَّءَا بُرْهَـٰنَ رَبِّهِۦ ۚ كَذَٰلِكَ لِنَصْرِفَ عَنْهُ ٱلسُّوٓءَ وَٱلْفَحْشَآءَ ۚ إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُخْلَصِينَ ﴿24﴾

और यूसुफ़ जिस स्त्री के घर में था, वह उस पर डोरे डालने लगी। उसने (एक दिन) दरवाज़े बंद कर लिए और बोली: आ जाओ, यूसुफ़ ने कहा: परमेश्वर न करे, वह मेरा स्वामी है, उसने मुझे सम्मान से रखा है, मैं यह विश्वासघात नहीं कर सकता, इसलिए कि ऐसे दुष्ट कभी सफलता नहीं पा सकते। सत्य यह है कि उस स्त्री ने तो यूसुफ़ का संकल्प कर ही लिया था, वह भी यदि अपने प्रभु की निशानी न देख लेता तो उसका संकल्प कर लेता। इसी प्रकार हुआ ताकि हम उससे पाप और निर्लज्जता को दूर रखें, इसमें संदेह नहीं कि वह हमारे चुने हुए भक्तों में से था।

وَٱسْتَبَقَا ٱلْبَابَ وَقَدَّتْ قَمِيصَهُۥ مِن دُبُرٍ وَأَلْفَيَا سَيِّدَهَا لَدَا ٱلْبَابِ ۚ قَالَتْ مَا جَزَآءُ مَنْ أَرَادَ بِأَهْلِكَ سُوٓءًا إِلَّآ أَن يُسْجَنَ أَوْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿25﴾ قَالَ هِىَ رَٰوَدَتْنِى عَن نَّفْسِى ۚ وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِّنْ أَهْلِهَآ إِن كَانَ قَمِيصُهُۥ قُدَّ مِن قُبُلٍ فَصَدَقَتْ وَهُوَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ ﴿26﴾ وَإِن كَانَ قَمِيصُهُۥ قُدَّ مِن دُبُرٍ فَكَذَبَتْ وَهُوَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿27﴾ فَلَمَّا رَءَا قَمِيصَهُۥ قُدَّ مِن دُبُرٍ قَالَ إِنَّهُۥ مِن كَيْدِكُنَّ ۖ إِنَّ كَيْدَكُنَّ عَظِيمٌ ﴿28﴾ يُوسُفُ أَعْرِضْ عَنْ هَـٰذَا ۚ وَٱسْتَغْفِرِى لِذَنۢبِكِ ۖ إِنَّكِ كُنتِ مِنَ ٱلْخَاطِـِٔينَ ﴿29﴾

वे दोनों आगे पीछे दरवाज़े की ओर भागे और (यूसुफ़ को रोकने के प्रयास में) स्त्री ने उसका कुर्ता पीछे से (खींच कर) फाड़ दिया। दरवाज़े पर दोनों ने उसके पति को उपस्थित पाया। (उसे देखते ही) स्त्री ने कहा: जो तुम्हारी पत्नी के साथ बुरा करना चाहे, उसका दण्ड इसके अतिरिक्त क्या हो सकता है कि क़ैद किया जाए या उसे कोई और कष्टदायक दण्ड दिया जाए? यूसुफ़ ने कहा: इसी ने मुझे फाँसने का प्रयास किया था। (मामला आगे बढ़ा तो) स्त्री के अपने परिवार के लोगों में से एक व्यक्ति ने (परिस्थितिजन्य साक्ष्य का) प्रमाण प्रस्तुत किया कि यदि यूसुफ़ का कुर्ता आगे से फटा हो तो स्त्री सच्ची है और वह झूठा है, और यदि उसका कुर्ता पीछे से फटा हो तो स्त्री झूठी है और वह सच्चा है। फिर जब पति ने देखा कि यूसुफ़ का कुर्ता पीछे से फटा है तो (ग़ुस्से में) बोल उठा कि यह तुम स्त्रियों की चालाकियाँ हैं, इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारी चालाकियाँ बड़ी भयानक होती हैं। यूसुफ़ इस बात को जाने दो और हे स्त्री, तू अपने पापकर्म की क्षमा मांग, इसलिए कि वास्तव में तू ही दोषी है।

وَقَالَ نِسْوَةٌ فِى ٱلْمَدِينَةِ ٱمْرَأَتُ ٱلْعَزِيزِ تُرَٰوِدُ فَتَىٰهَا عَن نَّفْسِهِۦ ۖ قَدْ شَغَفَهَا حُبًّا ۖ إِنَّا لَنَرَىٰهَا فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ ﴿30﴾ فَلَمَّا سَمِعَتْ بِمَكْرِهِنَّ أَرْسَلَتْ إِلَيْهِنَّ وَأَعْتَدَتْ لَهُنَّ مُتَّكَـًٔا وَءَاتَتْ كُلَّ وَٰحِدَةٍ مِّنْهُنَّ سِكِّينًا وَقَالَتِ ٱخْرُجْ عَلَيْهِنَّ ۖ فَلَمَّا رَأَيْنَهُۥٓ أَكْبَرْنَهُۥ وَقَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَـٰشَ لِلَّهِ مَا هَـٰذَا بَشَرًا إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا مَلَكٌ كَرِيمٌ ﴿31﴾ قَالَتْ فَذَٰلِكُنَّ ٱلَّذِى لُمْتُنَّنِى فِيهِ ۖ وَلَقَدْ رَٰوَدتُّهُۥ عَن نَّفْسِهِۦ فَٱسْتَعْصَمَ ۖ وَلَئِن لَّمْ يَفْعَلْ مَآ ءَامُرُهُۥ لَيُسْجَنَنَّ وَلَيَكُونًا مِّنَ ٱلصَّـٰغِرِينَ ﴿32﴾ قَالَ رَبِّ ٱلسِّجْنُ أَحَبُّ إِلَىَّ مِمَّا يَدْعُونَنِىٓ إِلَيْهِ ۖ وَإِلَّا تَصْرِفْ عَنِّى كَيْدَهُنَّ أَصْبُ إِلَيْهِنَّ وَأَكُن مِّنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ ﴿33﴾ فَٱسْتَجَابَ لَهُۥ رَبُّهُۥ فَصَرَفَ عَنْهُ كَيْدَهُنَّ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿34﴾

नगर में कुछ स्त्रियाँ (आपस में) चर्चा करने लगीं कि अज़ीज़ की पत्नी अपने ग़ुलाम पर डोरे डाल रही है। वह उसके प्रेम में मोहित हो गई है। हमारे अनुसार तो वह स्पष्ट मूर्खता में पड़ी है, (शायद नहीं जानती कि ऐसे लोग किस प्रकार वश में किए जाते हैं)। तो उनकी धूर्तता का हाल जब उस स्त्री ने सुनी तो उसने उन्हें निमंत्रण भेजा (कि वे भी अपनी कला का प्रयोग कर लें) और उनके लिए एक बैठक का आयोजन किया और उनमें से प्रत्येक को एक-एक छुरी दी और यूसुफ़ से कहा कि इनके सामने आ जाओ। फिर जब स्त्रियों ने उसको देखा तो उनके वैभव से चकित हो गईं और (अपनी बात उससे मनवाने के लिए) अपने हाथ कई जगह से काट लिए, परंतु (असफल रहीं और अंततः) पुकार उठीं कि परमेश्वर की जय हो, यह मनुष्य नहीं है, यह तो कोई अतिश्रेष्ठ फ़रिश्ता है। उसने कहा: देख लिया, यही है जिसके बारे में तुम मुझे कोस रही थीं। निस्संदेह, मैंने इसे रिझाने का प्रयास किया था, परंतु यह बच निकला। फिर भी मैं जो करने के लिए इसे कह रही हूं, यदि उसने नहीं किया तो अवश्य क़ैद किया जाएगा और अवश्य अपमानित होगा। इस पर यूसुफ़ ने प्रार्थना की कि प्रभु, कारागार मुझे उस चीज़ से अधिक प्रिय है जिसका निमंत्रण ये मुझे दे रहे हैं। अब यदि इनकी चाल को तूने मुझसे दूर न किया तो मैं इनकी ओर आकर्षित हो जाऊंगा और उन लोगों में से हो कर रहूंगा जो भावनाओं से परास्त हो जाते हैं। तो उसके प्रभु ने उसकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और उनकी चाल उससे दूर कर दी। निस्संदेह, वह सुनने वाला, जानने वाला है।

ثُمَّ بَدَا لَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا رَأَوُا۟ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَيَسْجُنُنَّهُۥ حَتَّىٰ حِينٍ ﴿35﴾ وَدَخَلَ مَعَهُ ٱلسِّجْنَ فَتَيَانِ ۖ قَالَ أَحَدُهُمَآ إِنِّىٓ أَرَىٰنِىٓ أَعْصِرُ خَمْرًا ۖ وَقَالَ ٱلْـَٔاخَرُ إِنِّىٓ أَرَىٰنِىٓ أَحْمِلُ فَوْقَ رَأْسِى خُبْزًا تَأْكُلُ ٱلطَّيْرُ مِنْهُ ۖ نَبِّئْنَا بِتَأْوِيلِهِۦٓ ۖ إِنَّا نَرَىٰكَ مِنَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿36﴾ قَالَ لَا يَأْتِيكُمَا طَعَامٌ تُرْزَقَانِهِۦٓ إِلَّا نَبَّأْتُكُمَا بِتَأْوِيلِهِۦ قَبْلَ أَن يَأْتِيَكُمَا ۚ ذَٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَنِى رَبِّىٓ ۚ إِنِّى تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ كَـٰفِرُونَ ﴿37﴾ وَٱتَّبَعْتُ مِلَّةَ ءَابَآءِىٓ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ ۚ مَا كَانَ لَنَآ أَن نُّشْرِكَ بِٱللَّهِ مِن شَىْءٍ ۚ ذَٰلِكَ مِن فَضْلِ ٱللَّهِ عَلَيْنَا وَعَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ ﴿38﴾ يَـٰصَـٰحِبَىِ ٱلسِّجْنِ ءَأَرْبَابٌ مُّتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ أَمِ ٱللَّهُ ٱلْوَٰحِدُ ٱلْقَهَّارُ ﴿39﴾ مَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِهِۦٓ إِلَّآ أَسْمَآءً سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَـٰنٍ ۚ إِنِ ٱلْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۚ أَمَرَ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّآ إِيَّاهُ ۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلْقَيِّمُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ﴿40﴾

फिर (उसके निर्दोष होने की) यह निशानियाँ देख लेने के बाद भी उन लोगों ने उचित यही समझा कि यूसुफ़ को कुछ समय के लिए अवश्य क़ैद कर दें। उसके साथ दो और युवा भी कारागार में आए। उनमें से एक ने (एक दिन) उससे कहा: मैं सपने में देखता हूं कि शराब निचोड़ रहा हूं। दूसरे ने कहा: मैं देखता हूं कि अपने सर पर रोटी उठाए हुए हूं जिसमें से चिड़ियाँ खा रही हैं। हमें इसका अर्थ बताइए, हम जानते हैं कि आप उन लोगों में से हैं जो भला आचरण अपनाते हैं। यूसुफ़ ने कहा: यहाँ जो खाना तुम्हें मिलता है, वे आएगा नहीं कि उसके आने से पहले मैं तुम्हें इसका अर्थ बता दूंगा। यह उस ज्ञान में से है जो मेरे प्रभु ने मुझे सिखाया है। बात यह है कि मैंने उन लोगों के धर्म को त्याग दिया है जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं रखते और वही परलोक के नकारने वाले हैं। और मैंने अपने पूर्वजों, इब्राहीम, इस्हाक और याक़ूब का धर्म अपना लिया है। हमें अधिकार नहीं कि हम किसी चीज़ को परमेश्वर का सहभागी बनाएं। यह हम पर और सभी मनुष्यों पर परमेश्वर का अनुग्रह है (कि उसने यह सत्य अपने पैग़ंबरों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है), परंतु अधिकांश लोग कृतज्ञ नहीं होते। कारागार के मेरे साथियो, क्या अलग-अलग बहुत से पूज्य-देवता अच्छे हैं या वह एक परमेश्वर जो सब पर प्रभावी है। तुम उसको छोड़ कुछ नामों की ही पूजा-उपासना कर रहे हो जो तुमने और तुम्हारे पुरखों ने रख लिए हैं। परमेश्वर ने उनके पक्ष में कोई प्रमाण नहीं उतारा है। प्रभुसत्ता केवल परमेश्वर की है। उसने आदेश दिया है कि स्वयं उसके अतिरिक्त किसी की भक्ति न करो। यही सीधा धर्म है, परंतु अधिकांश लोग (इस सत्य को) नहीं जानते।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात सीधा और पूर्णतः सत्य धर्म है। ↩
يَـٰصَـٰحِبَىِ ٱلسِّجْنِ أَمَّآ أَحَدُكُمَا فَيَسْقِى رَبَّهُۥ خَمْرًا ۖ وَأَمَّا ٱلْـَٔاخَرُ فَيُصْلَبُ فَتَأْكُلُ ٱلطَّيْرُ مِن رَّأْسِهِۦ ۚ قُضِىَ ٱلْأَمْرُ ٱلَّذِى فِيهِ تَسْتَفْتِيَانِ ﴿41﴾

कारागार के मेरे साथियो, (तुम्हारे सपने का अर्थ यह है कि) तुम में से एक तो (अपने पद पर फिर से नियुक्त हो जाएगा और) अपने स्वामी को शराब पिलाएगा। रहा दूसरा तो उसे सूली दी जाएगी, फिर पक्षी उसका सर नोच-नोच कर खाएंगे। उस बात का निर्णय हुआ जिसके बारे में तुम दोनों पूछ रहे थे।

وَقَالَ لِلَّذِى ظَنَّ أَنَّهُۥ نَاجٍ مِّنْهُمَا ٱذْكُرْنِى عِندَ رَبِّكَ فَأَنسَىٰهُ ٱلشَّيْطَـٰنُ ذِكْرَ رَبِّهِۦ فَلَبِثَ فِى ٱلسِّجْنِ بِضْعَ سِنِينَ ﴿42﴾

उनमें से जिसके बारे में यूसुफ़ ने समझा कि वह मुक्त हो जाएगा, उसने उससे कहा कि अपने मालिक से मेरी बात करना। परंतु शैतान ने उसे अपने मालिक से यह बात करना भुला दिया और यूसुफ़ कई वर्षों तक (उसी प्रकार) कारागार में पड़ा रहा।

وَقَالَ ٱلْمَلِكُ إِنِّىٓ أَرَىٰ سَبْعَ بَقَرَٰتٍ سِمَانٍ يَأْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌ وَسَبْعَ سُنۢبُلَـٰتٍ خُضْرٍ وَأُخَرَ يَابِسَـٰتٍ ۖ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَأُ أَفْتُونِى فِى رُءْيَـٰىَ إِن كُنتُمْ لِلرُّءْيَا تَعْبُرُونَ ﴿43﴾ قَالُوٓا۟ أَضْغَـٰثُ أَحْلَـٰمٍ ۖ وَمَا نَحْنُ بِتَأْوِيلِ ٱلْأَحْلَـٰمِ بِعَـٰلِمِينَ ﴿44﴾ وَقَالَ ٱلَّذِى نَجَا مِنْهُمَا وَٱدَّكَرَ بَعْدَ أُمَّةٍ أَنَا۠ أُنَبِّئُكُم بِتَأْوِيلِهِۦ فَأَرْسِلُونِ ﴿45﴾

(फिर एक दिन) राजा ने (अपनी सभा के लोगों से) कहा: मैं सपने में देखता हूँ कि सात मोटी गायें जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं, और सात हरी बालें और दूसरी सात सूखी हैं (और वे भी हरी बालियों को खा रही हैं)। सभा के लोगो, मुझे मेरे सपने का अर्थ बताओ, यदि तुम सपने का अर्थ देते हो। लोगों ने कहा: यह उलझे हुए सपने हैं और हम इस प्रकार के सपनों का अर्थ नहीं जानते। उन दो क़ैदियों में से जो छूट गया था और उसे एक समय के बाद याद पड़ा, उसने कहा: मैं आप लोगों को इस सपने का अर्थ बताऊंगा, (जानना चाहते हों) तो मुझे (कारागार में यूसुफ़ के पास) भेज दीजिए।

يُوسُفُ أَيُّهَا ٱلصِّدِّيقُ أَفْتِنَا فِى سَبْعِ بَقَرَٰتٍ سِمَانٍ يَأْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌ وَسَبْعِ سُنۢبُلَـٰتٍ خُضْرٍ وَأُخَرَ يَابِسَـٰتٍ لَّعَلِّىٓ أَرْجِعُ إِلَى ٱلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿46﴾ قَالَ تَزْرَعُونَ سَبْعَ سِنِينَ دَأَبًا فَمَا حَصَدتُّمْ فَذَرُوهُ فِى سُنۢبُلِهِۦٓ إِلَّا قَلِيلًا مِّمَّا تَأْكُلُونَ ﴿47﴾ ثُمَّ يَأْتِى مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ سَبْعٌ شِدَادٌ يَأْكُلْنَ مَا قَدَّمْتُمْ لَهُنَّ إِلَّا قَلِيلًا مِّمَّا تُحْصِنُونَ ﴿48﴾ ثُمَّ يَأْتِى مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ عَامٌ فِيهِ يُغَاثُ ٱلنَّاسُ وَفِيهِ يَعْصِرُونَ ﴿49﴾

(उसने जा कर कहा): यूसुफ़, हे सत्यवान, हमें सात मोटी गायों के बारे में बताओ जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं और सात हरी और अन्य सात सूखी बालियों के बारे में, इसलिए कि मैं लौट कर उन लोगों के पास जाऊं ताकि (काल्पनिक तीर चलाने के बजाए) वे भी जान लें (कि इस सपने का अर्थ क्या है)। यूसुफ़ ने कहा: सात वर्षों तक तुम निरंतर खेती करोगे, इसलिए जो फसल तुम काटो, उसमें से थोड़ा सा निकाल कर जो तुम खाओगे, बाक़ी सब उसकी बालियों में रहने दो (ताकि बर्बाद न हो)। इसके बाद फिर सात वर्ष बहुत कठिन आएंगे जो थोड़ी मात्रा के सिवा जिसे तुम सुरक्षित कर लोगे, वह अनाज खा जाएँगे जो उन वर्षों के लिए तुमने इकट्ठा किया होगा। इसके बाद फिर एक वर्ष ऐसा आएगा कि जिसमें (आशीषमय वर्षा से) लोगों की गुहार सुनी जाएगी और वे उसमें अंगूर निचोड़ेंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यूसुफ़ (अ.) ने न केवल सपने की व्याख्या बताई, बल्कि उसके साथ उस उपाय की ओर भी मार्गदर्शन कर दिया जो अकाल के उन सात वर्षों की आपदा का सामना करने के लिए अपनाना चाहिए। ↩
وَقَالَ ٱلْمَلِكُ ٱئْتُونِى بِهِۦ ۖ فَلَمَّا جَآءَهُ ٱلرَّسُولُ قَالَ ٱرْجِعْ إِلَىٰ رَبِّكَ فَسْـَٔلْهُ مَا بَالُ ٱلنِّسْوَةِ ٱلَّـٰتِى قَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ ۚ إِنَّ رَبِّى بِكَيْدِهِنَّ عَلِيمٌ ﴿50﴾ قَالَ مَا خَطْبُكُنَّ إِذْ رَٰوَدتُّنَّ يُوسُفَ عَن نَّفْسِهِۦ ۚ قُلْنَ حَـٰشَ لِلَّهِ مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ مِن سُوٓءٍ ۚ قَالَتِ ٱمْرَأَتُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْـَٔـٰنَ حَصْحَصَ ٱلْحَقُّ أَنَا۠ رَٰوَدتُّهُۥ عَن نَّفْسِهِۦ وَإِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ ﴿51﴾

(यह अर्थ सभा में सुनाया गया तो) राजा ने कहा: उसे मेरे पास लाओ। परंतु जब संदेशवाहक यूसुफ़ के पास (उसे लेने के लिए) पहुंचा तो उसने कहा: अपने स्वामी के पास वापस जाओ और उससे पूछो कि उन स्त्रियों का क्या मामला है जिन्होंने अपने हाथ काट लिए थे? मेरा प्रभु तो उनकी चाल से भलीभांति परिचित है। राजा ने उन्हें (बुलाकर) पूछा: तुम्हें क्या हो गया, जब तुमने यूसुफ़ को फुसलाने का प्रयास किया था? सबने गवाही दी कि परमेश्वर की जय हो, हमने उसमें किंचनमात्र बुराई नहीं देखी। अज़ीज़ की पत्नी भी बोल उठी: अब सत्य खुल चुका है। यह मैं ही थी जिसने उसे फुसलाने का प्रयास किया था, इसमें संदेह नहीं कि वह पूर्णतः सच्चा है।

ذَٰلِكَ لِيَعْلَمَ أَنِّى لَمْ أَخُنْهُ بِٱلْغَيْبِ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى كَيْدَ ٱلْخَآئِنِينَ ﴿52﴾ وَمَآ أُبَرِّئُ نَفْسِىٓ ۚ إِنَّ ٱلنَّفْسَ لَأَمَّارَةٌۢ بِٱلسُّوٓءِ إِلَّا مَا رَحِمَ رَبِّىٓ ۚ إِنَّ رَبِّى غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿53﴾

(यूसुफ़ ने कहा): इससे मेरा उद्देश्य यह था कि अज़ीज़ यह जान ले कि मैंने पीठ पीछे उसका विश्वास नहीं तोड़ा था और यह कि जो विश्वासघात करते हैं, उनकी चाल को परमेश्वर चलने नहीं देता। मैं कुछ अपने जी को दोषमुक्त नहीं कर रहा हूँ, जी तो बुराई पर उत्तेजित करता ही है, सिवाय इसके जब मेरा प्रभु कृपा करे। सत्य यह है कि मेरा प्रभु बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

وَقَالَ ٱلْمَلِكُ ٱئْتُونِى بِهِۦٓ أَسْتَخْلِصْهُ لِنَفْسِى ۖ فَلَمَّا كَلَّمَهُۥ قَالَ إِنَّكَ ٱلْيَوْمَ لَدَيْنَا مَكِينٌ أَمِينٌ ﴿54﴾ قَالَ ٱجْعَلْنِى عَلَىٰ خَزَآئِنِ ٱلْأَرْضِ ۖ إِنِّى حَفِيظٌ عَلِيمٌ ﴿55﴾

राजा ने कहा: उसको मेरे पास लाओ, मैं उसे अपने लिए अलग रखूँगा। फिर जब उसने बातचीत की तो (यहाँ तक प्रभावित हुआ कि) उसने कहा: अब तुम हमारे यहाँ प्रधान अधिकारी हो और तुम पर भरोसा किया जाएगा। यूसुफ़ ने कहा: इस देश के कोष मेरे हवाले कर दीजिए, इसलिए कि मैं सुरक्षा करने वाला भी हूं और ज्ञान भी रखता हूं।

وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِى ٱلْأَرْضِ يَتَبَوَّأُ مِنْهَا حَيْثُ يَشَآءُ ۚ نُصِيبُ بِرَحْمَتِنَا مَن نَّشَآءُ ۖ وَلَا نُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿56﴾ وَلَأَجْرُ ٱلْـَٔاخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ يَتَّقُونَ ﴿57﴾

यूसुफ़ को इस प्रकार हमने उस देश में सत्ता प्रदान की, वह उसमें जहाँ चाहे, अपना स्थान बनाए। हम अपनी कृपा से जिसको चाहते हैं, बहतू देते हैं और भलाई अपनाने वालों का अच्छा फल हम कभी बर्बाद नहीं करते। यद्यपि, परलोक का अच्छा फल उन लोगों के लिए इससे कहीं बढ़कर है जो मान गए और (परमेश्वर से) बराबर डरते रहे।

وَجَآءَ إِخْوَةُ يُوسُفَ فَدَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَعَرَفَهُمْ وَهُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ ﴿58﴾ وَلَمَّا جَهَّزَهُم بِجَهَازِهِمْ قَالَ ٱئْتُونِى بِأَخٍ لَّكُم مِّنْ أَبِيكُمْ ۚ أَلَا تَرَوْنَ أَنِّىٓ أُوفِى ٱلْكَيْلَ وَأَنَا۠ خَيْرُ ٱلْمُنزِلِينَ ﴿59﴾ فَإِن لَّمْ تَأْتُونِى بِهِۦ فَلَا كَيْلَ لَكُمْ عِندِى وَلَا تَقْرَبُونِ ﴿60﴾ قَالُوا۟ سَنُرَٰوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَـٰعِلُونَ ﴿61﴾

(इसके कई वर्ष बाद) यूसुफ़ के भाई मिस्र आए और उसके यहाँ भी उपस्थित हुए तो उसने उन्हें पहचान लिया, परंतु उन्होंने यूसुफ़ को नहीं पहचाना। (फिर उनकी वापसी के समय), जब उसने उनका सामान तैयार कराया तो उनसे कहा: (अब आओगे तो) अपने सौतेले भाई को भी मेरे पास लाना, देखते नहीं हो कि मैं अनाज भी पूरे माप से देता हूं और अतिथि का बहुत अच्छा सत्कार करने वाला भी हूं। परंतु यदि तुम उसको मेरे पास नहीं लाओगे तो न मेरे पास तुम्हारे लिए अनाज है और न तुम मेरे पास फटकना। उन्होंने कहा: हम उसके बारे में उसके पिता को मनाने का प्रयास करेंगे और हम यह अवश्य कर लेंगे।

وَقَالَ لِفِتْيَـٰنِهِ ٱجْعَلُوا۟ بِضَـٰعَتَهُمْ فِى رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَآ إِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ﴿62﴾ فَلَمَّا رَجَعُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَبِيهِمْ قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا مُنِعَ مِنَّا ٱلْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَآ أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَـٰفِظُونَ ﴿63﴾ قَالَ هَلْ ءَامَنُكُمْ عَلَيْهِ إِلَّا كَمَآ أَمِنتُكُمْ عَلَىٰٓ أَخِيهِ مِن قَبْلُ ۖ فَٱللَّهُ خَيْرٌ حَـٰفِظًا ۖ وَهُوَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ ﴿64﴾

यूसुफ़ ने अपने सेवकों से कहा कि इन लोगों ने अनाज के बदले जो धन दिया है, वह (चुपके से) इनकी काठी की गठरियों ही में रख दो। इसका उद्देश्य यह है कि जब वे अपने परिवार में पहुँचें तो उसे पहचान लें (कि उन्हीं का धन है जो उन्हें वापस कर दिया गया है) ताकि वे फिर आएँ। तो जब वे अपने पिता के पास लौटे तो कहा: पिता श्री, (अगली बार) हम से अनाज रोक दिया गया है, इसलिए हमारे भाई, (बिन यामीन) को भी हमारे साथ जाने दीजिए कि हम (अपनी सच्चाई साबित कर सकें और) अनाज लाएँ, हम उसकी सुरक्षा का वचन देते हैं। पिता ने उत्तर दिया: क्या मैं उसके मामले में भी तुम पर वैसा ही भरोसा करूं, जैसा इससे पहले उसके भाई के मामले में तुम पर भरोसा कर चुका हूं? तो परमेश्वर सबसे अच्छा रक्षक है और वह सबसे बढ़कर दया करने वाला है।

وَلَمَّا فَتَحُوا۟ مَتَـٰعَهُمْ وَجَدُوا۟ بِضَـٰعَتَهُمْ رُدَّتْ إِلَيْهِمْ ۖ قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا مَا نَبْغِى ۖ هَـٰذِهِۦ بِضَـٰعَتُنَا رُدَّتْ إِلَيْنَا ۖ وَنَمِيرُ أَهْلَنَا وَنَحْفَظُ أَخَانَا وَنَزْدَادُ كَيْلَ بَعِيرٍ ۖ ذَٰلِكَ كَيْلٌ يَسِيرٌ ﴿65﴾ قَالَ لَنْ أُرْسِلَهُۥ مَعَكُمْ حَتَّىٰ تُؤْتُونِ مَوْثِقًا مِّنَ ٱللَّهِ لَتَأْتُنَّنِى بِهِۦٓ إِلَّآ أَن يُحَاطَ بِكُمْ ۖ فَلَمَّآ ءَاتَوْهُ مَوْثِقَهُمْ قَالَ ٱللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌ ﴿66﴾

(इसके बाद) जब उन्होंने अपना सामान खोला तो देखा कि उनकी पूंजी भी उन्हें लौटा दी गई है। (यह देख कर) वे पुकार उठे: पिता श्री, हमें और क्या चाहिए! (देखिए), यह हमारी पूंजी हमें लौटा दी गई है। अब हम जाएँगे, अपने परिवार के लिए अनाज लाएंगे, अपने भाई की रक्षा करेंगे, एक ऊंट के बराबर अधिक अनाज प्राप्त करेंगे, यह अनाज (जो इस समय हम लाए हैं, यह) थोड़ा है। पिता ने उत्तर दिया: मैं उसको कदापि तुम्हारे साथ नहीं भेजूंगा, जब तक तुम परमेश्वर के नाम पर मुझसे वादा न करो कि तुम उसको अवश्य मेरे पास वापस लाओगे, सिवाय इसके कि तुम कहीं घिर जाओ। अतः (उसके आग्रह पर) जब उन्होंने उसको अपना पक्का वचन दे दिया तो उसने कहा: यह वादा जो हम कर रहे हैं, परमेश्वर इस पर निरीक्षक है।

وَقَالَ يَـٰبَنِىَّ لَا تَدْخُلُوا۟ مِنۢ بَابٍ وَٰحِدٍ وَٱدْخُلُوا۟ مِنْ أَبْوَٰبٍ مُّتَفَرِّقَةٍ ۖ وَمَآ أُغْنِى عَنكُم مِّنَ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍ ۖ إِنِ ٱلْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَعَلَيْهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُتَوَكِّلُونَ ﴿67﴾ وَلَمَّا دَخَلُوا۟ مِنْ حَيْثُ أَمَرَهُمْ أَبُوهُم مَّا كَانَ يُغْنِى عَنْهُم مِّنَ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍ إِلَّا حَاجَةً فِى نَفْسِ يَعْقُوبَ قَضَىٰهَا ۚ وَإِنَّهُۥ لَذُو عِلْمٍ لِّمَا عَلَّمْنَـٰهُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ﴿68﴾

(फिर प्रस्थान करने लगे तो) उसने उनको उपदेश किया कि मेरे बेटो, तुम सब एक ही द्वार से (मिस्र की राजधानी में) प्रवेश न करना, अपितु अलग-अलग द्वारों से जाना। (मैं जानता हूं कि यह केवल एक उपाय है) और परमेश्वर के विरुद्ध मैं तुम्हारे कुछ भी काम आने वाला नहीं हूं। पूर्ण अधिकार तो परमेश्वर ही का है। मैंने उसी पर भरोसा किया है और भरोसा करने वालों को उसी पर भरोसा करना चाहिए। अतः जिस समय उन्होंने नगर में प्रवेश किया, जहाँ से उनके पिता ने उनको निर्देश दिया था तो ऐसा ही था कि (यदि परमेश्वर की ओर से उनके लिए कुछ लिखा होता तो) परमेश्वर के विरुद्ध व उनके कुछ भी काम आने वाला नहीं था। हाँ, बस याक़ूब के दिल में एक इच्छा थी जो उसने पूरी कर ली। इसमें संदेह नहीं कि उसके पास वह ज्ञान था जो हमने उसे सिखाया था, परंतु अधिकांश लोग जानते नहीं हैं।

وَلَمَّا دَخَلُوا۟ عَلَىٰ يُوسُفَ ءَاوَىٰٓ إِلَيْهِ أَخَاهُ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَنَا۠ أَخُوكَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿69﴾ فَلَمَّا جَهَّزَهُم بِجَهَازِهِمْ جَعَلَ ٱلسِّقَايَةَ فِى رَحْلِ أَخِيهِ ثُمَّ أَذَّنَ مُؤَذِّنٌ أَيَّتُهَا ٱلْعِيرُ إِنَّكُمْ لَسَـٰرِقُونَ ﴿70﴾ قَالُوا۟ وَأَقْبَلُوا۟ عَلَيْهِم مَّاذَا تَفْقِدُونَ ﴿71﴾ قَالُوا۟ نَفْقِدُ صُوَاعَ ٱلْمَلِكِ وَلِمَن جَآءَ بِهِۦ حِمْلُ بَعِيرٍ وَأَنَا۠ بِهِۦ زَعِيمٌ ﴿72﴾ قَالُوا۟ تَٱللَّهِ لَقَدْ عَلِمْتُم مَّا جِئْنَا لِنُفْسِدَ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كُنَّا سَـٰرِقِينَ ﴿73﴾ قَالُوا۟ فَمَا جَزَٰٓؤُهُۥٓ إِن كُنتُمْ كَـٰذِبِينَ ﴿74﴾ قَالُوا۟ جَزَٰٓؤُهُۥ مَن وُجِدَ فِى رَحْلِهِۦ فَهُوَ جَزَٰٓؤُهُۥ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿75﴾ فَبَدَأَ بِأَوْعِيَتِهِمْ قَبْلَ وِعَآءِ أَخِيهِ ثُمَّ ٱسْتَخْرَجَهَا مِن وِعَآءِ أَخِيهِ ۚ كَذَٰلِكَ كِدْنَا لِيُوسُفَ ۖ مَا كَانَ لِيَأْخُذَ أَخَاهُ فِى دِينِ ٱلْمَلِكِ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَـٰتٍ مَّن نَّشَآءُ ۗ وَفَوْقَ كُلِّ ذِى عِلْمٍ عَلِيمٌ ﴿76﴾

ये लोग जब यूसुफ़ के पास पहुंचे तो उसने अपने भाई को ख़ास अपने पास बिठाया। (फिर एकांत के किसी समय में) उसने उसे बताया कि मैं तुम्हारा भाई, (यूसुफ़) हूं। तो जो कुछ ये करते रहे हैं, अब उस पर दुखी न हो। फिर (उनकी वापसी के समय), जब उनका सामान तैयार कराया तो अपना प्याला (प्रेम भाव से) अपने भाई के सामान में रख दिया। इसके बाद (परमेश्वर का करना ऐसा हुआ कि ठीक उसी समय) एक पुकारने वाले ने पुकारा के काफिले वालो, तुम अवश्य चोर हो। उन्होंने उनकी ओर पलट कर पूछा: तुम्हारी क्या चीज़ खो गई है? उन्होंने उत्तर दिया: हम राजा का पानपात्र नहीं पा रहे हैं। (उनके अधिकारी ने कहा): और जो उसको लाएगा, उसके लिए एक ऊंट के बराबर अनाज है, मैं इसका ज़िम्मा लेता हूं। यूसुफ़ के भाइयों ने कहा: परमेश्वर की सौगंध, तुम जानते हो कि हम इसलिए नहीं आए कि इस देश में ऊधम मचाएँ और हम चोरी करने वाले लोग नहीं हैं। उन्होंने कहा: यदि तुम झूठे साबित हुए तो चोर का क्या दण्ड है? उन्होंने कहा: उसका दंड? जिस के सामान से खोई हुई चीज़ निकले, वह स्वयं ही अपने दण्ड में रख लिया जाए। इस प्रकार के अत्याचारियों को हम यही दण्ड दिया करते हैं। इस पर उस व्यक्ति ने यूसुफ़ के भाई की काठी की गठरी से पहले उनकी गठरियों में ढूंढना शुरू किया, फिर (राजा का पानपात्र तो नहीं मिला, परंतु) उसके भाई की गठरी से उसने वह प्याला निकाल दिया (जो यूसुफ़ ने रखा था)। हमने इस प्रकार यूसुफ़ के लिए (उसके भाई के रोकने का) उपाय किया, (इसलिए कि) राजा के विधान के अनुसार उसे अपने भाई को रोकने का अधिकार नहीं था, सिवाय इसके कि परमेश्वर ही चाहे। हम जिसकी प्रतिष्ठा चाहते हैं, ऊंची कर देते हैं और सत्य यह है की प्रत्येक ज्ञानी व्यक्ति से ऊपर एक ज्ञानी है।

قَالُوٓا۟ إِن يَسْرِقْ فَقَدْ سَرَقَ أَخٌ لَّهُۥ مِن قَبْلُ ۚ فَأَسَرَّهَا يُوسُفُ فِى نَفْسِهِۦ وَلَمْ يُبْدِهَا لَهُمْ ۚ قَالَ أَنتُمْ شَرٌّ مَّكَانًا ۖ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا تَصِفُونَ ﴿77﴾ قَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْعَزِيزُ إِنَّ لَهُۥٓ أَبًا شَيْخًا كَبِيرًا فَخُذْ أَحَدَنَا مَكَانَهُۥٓ ۖ إِنَّا نَرَىٰكَ مِنَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿78﴾ قَالَ مَعَاذَ ٱللَّهِ أَن نَّأْخُذَ إِلَّا مَن وَجَدْنَا مَتَـٰعَنَا عِندَهُۥٓ إِنَّآ إِذًا لَّظَـٰلِمُونَ ﴿79﴾ فَلَمَّا ٱسْتَيْـَٔسُوا۟ مِنْهُ خَلَصُوا۟ نَجِيًّا ۖ قَالَ كَبِيرُهُمْ أَلَمْ تَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ أَبَاكُمْ قَدْ أَخَذَ عَلَيْكُم مَّوْثِقًا مِّنَ ٱللَّهِ وَمِن قَبْلُ مَا فَرَّطتُمْ فِى يُوسُفَ ۖ فَلَنْ أَبْرَحَ ٱلْأَرْضَ حَتَّىٰ يَأْذَنَ لِىٓ أَبِىٓ أَوْ يَحْكُمَ ٱللَّهُ لِى ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلْحَـٰكِمِينَ ﴿80﴾ ٱرْجِعُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَبِيكُمْ فَقُولُوا۟ يَـٰٓأَبَانَآ إِنَّ ٱبْنَكَ سَرَقَ وَمَا شَهِدْنَآ إِلَّا بِمَا عَلِمْنَا وَمَا كُنَّا لِلْغَيْبِ حَـٰفِظِينَ ﴿81﴾ وَسْـَٔلِ ٱلْقَرْيَةَ ٱلَّتِى كُنَّا فِيهَا وَٱلْعِيرَ ٱلَّتِىٓ أَقْبَلْنَا فِيهَا ۖ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ ﴿82﴾ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنفُسُكُمْ أَمْرًا ۖ فَصَبْرٌ جَمِيلٌ ۖ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَأْتِيَنِى بِهِمْ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ ﴿83﴾

भाइयों ने (यह देखा तो) कहा: यदि यह चोरी करे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है, इससे पहले इसका एक भाई भी चोरी कर चुका है। (यह स्पष्ट रूप से झूठा आरोप था), परंतु यूसुफ़ ने इसको अपने दिल ही में रखा, उनके सामने इसे व्यक्त नहीं किया, बस (अपने मन में) इतनी बात कह कर रह गया कि तुम लोग बड़े ही बुरे हो और जो कुछ तुम कह रहे हो, परमेश्वर उसे भलीभांति जानता है। उन्होंने कहा: हे अज़ीज़, इसका एक बहुत बूढ़ा पिता है, तो इसकी जगह आप हम में से किसी को रख लीजिए, हम देख रहे हैं कि आप बड़े भले व्यक्ति हैं। यूसुफ़ ने कहा: परमेश्वर न करे कि जिसके पास हमने अपनी चीज़ पाई है, हम उसके सिवा किसी और को पकड़ें। इस स्थिति में तो हम बड़े ही अत्याचारी बनेंगे। उसका यह उत्तर सुनकर जब वे उससे निराश हो गए तो आपस में परामर्श के उद्देश्य से अलग बैठ गए। उनके बड़े ने कहा: क्या तुम जानते नहीं हो कि तुम्हारे पिता ने परमेश्वर के नाम पर तुमसे पक्का वचन लिया है और इससे पहले यूसुफ़ के विषय में जो अपराध तुमसे हो चुका है, उसे भी जानते हो? इसलिए मैं तो इस देश से जाने वाला नहीं, जब तक मेरा पिता मुझे अनुमति न दे या परमेश्वर मेरे लिए कोई निर्णय कर दे और वह सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है। तुम अपने पिता के पास जाओ और उनसे कहो कि पिता श्री, आपके बेटे ने चोरी की है और हमने वही बात कही है जो हमारी जानकारी में आई है, हम परोक्ष के रखवाले नहीं हैं। आप उस बस्ती के लोगों से पूछ लीजिए, जहाँ हम रहे हैं और उस काफिले से पूछ लीजिए जिसके साथ हम आए हैं, हम पूर्णतः सच्चे हैं। उनके पिता ने (यह वृत्तांत सुना तो) कहा: नहीं, अपितु तुम्हारे दिल ने तुम्हारे लिए एक बात बना ली है, इसलिए शोभनीय धैर्य ही अच्छा है। आशा है कि परमेश्वर इन सब को मेरे पास ले आएगा। निस्संदेह वही ज्ञानी और प्रज्ञावान है।

وَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَـٰٓأَسَفَىٰ عَلَىٰ يُوسُفَ وَٱبْيَضَّتْ عَيْنَاهُ مِنَ ٱلْحُزْنِ فَهُوَ كَظِيمٌ ﴿84﴾ قَالُوا۟ تَٱللَّهِ تَفْتَؤُا۟ تَذْكُرُ يُوسُفَ حَتَّىٰ تَكُونَ حَرَضًا أَوْ تَكُونَ مِنَ ٱلْهَـٰلِكِينَ ﴿85﴾ قَالَ إِنَّمَآ أَشْكُوا۟ بَثِّى وَحُزْنِىٓ إِلَى ٱللَّهِ وَأَعْلَمُ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿86﴾ يَـٰبَنِىَّ ٱذْهَبُوا۟ فَتَحَسَّسُوا۟ مِن يُوسُفَ وَأَخِيهِ وَلَا تَا۟يْـَٔسُوا۟ مِن رَّوْحِ ٱللَّهِ ۖ إِنَّهُۥ لَا يَا۟يْـَٔسُ مِن رَّوْحِ ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلْكَـٰفِرُونَ ﴿87﴾

उसने (यह कह कर) उनसे मुँह फेर लिया और कहा: हाय यूसुफ़ — और दुख से उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गई थीं और वह घुटा जा रहा था — बेटों ने कहा: परमेश्वर की सौगंध, आप यूसुफ़ ही को याद किए जाएँगे, यहाँ तक कि अपने आप को मिटा देंगे या मर जाएँगे। उसने कहा: मैं अपनी परेशानी और अपने दुख की शिकायत परमेश्वर ही से करता हूं और परमेश्वर की ओर से वे बातें जानता हूं जो तुम नहीं जानते। मेरे बेटो, जाओ यूसुफ़ और उसके भाई की खोज लगाओ और परमेश्वर की कृपा से हताश न हो। परमेश्वर की कृपा से तो केवल नकारने वाले लोग ही हताश होते हैं।

فَلَمَّا دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ قَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْعَزِيزُ مَسَّنَا وَأَهْلَنَا ٱلضُّرُّ وَجِئْنَا بِبِضَـٰعَةٍ مُّزْجَىٰةٍ فَأَوْفِ لَنَا ٱلْكَيْلَ وَتَصَدَّقْ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ يَجْزِى ٱلْمُتَصَدِّقِينَ ﴿88﴾ قَالَ هَلْ عَلِمْتُم مَّا فَعَلْتُم بِيُوسُفَ وَأَخِيهِ إِذْ أَنتُمْ جَـٰهِلُونَ ﴿89﴾ قَالُوٓا۟ أَءِنَّكَ لَأَنتَ يُوسُفُ ۖ قَالَ أَنَا۠ يُوسُفُ وَهَـٰذَآ أَخِى ۖ قَدْ مَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّهُۥ مَن يَتَّقِ وَيَصْبِرْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿90﴾ قَالُوا۟ تَٱللَّهِ لَقَدْ ءَاثَرَكَ ٱللَّهُ عَلَيْنَا وَإِن كُنَّا لَخَـٰطِـِٔينَ ﴿91﴾ قَالَ لَا تَثْرِيبَ عَلَيْكُمُ ٱلْيَوْمَ ۖ يَغْفِرُ ٱللَّهُ لَكُمْ ۖ وَهُوَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ ﴿92﴾ ٱذْهَبُوا۟ بِقَمِيصِى هَـٰذَا فَأَلْقُوهُ عَلَىٰ وَجْهِ أَبِى يَأْتِ بَصِيرًا وَأْتُونِى بِأَهْلِكُمْ أَجْمَعِينَ ﴿93﴾

फिर जब वे (अगली बार) यूसुफ़ के सामने पेश हुए तो उन्होंने (गिड़गिड़ा कर) निवेदन किया: हे अज़ीज़, हम और हमारे परिवार वाले बड़े संकट में पड़े हैं और हम कुछ क्षुद्र धन लेकर उपस्थित हो गए हैं, तो (कृपा कीजिए और) हमें पूरा अनाज दीजिए और हमें दान-भिक्षा भी दीजिए, इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर दान करने वालों को अच्छा फल देता है। (उनकी यह विनती सुन कर यूसुफ़ से रहा न गया), उसने कहा: तुम्हें कुछ पता है कि जब तुम पागलपन में पड़े थे तो यूसुफ़ और उसके भाई के साथ तुमने क्या किया? वे (चौंक कर) बोले: क्या सच में तुम्ही यूसुफ़ हो? उसने कहा: हाँ, मैं यूसुफ़ हूं और यह मेरा भाई है। परमेश्वर ने हम पर कृपा की है। सत्य यह है किजो परमेश्वर से डरते और दृढ़संकल्प रहते हैं, उनका फल उन्हें अवश्य मिलता है, इसलिए कि परमेश्वर उन लोगों का फल बर्बाद नहीं करता जो अच्छे ढंग से कर्म करने वाले हैं। उन्होंने कहा: परमेश्वर की सौगंध, कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर ने तुम को हमारे ऊपर प्रधानता दी है और कोई संदेह नहीं कि हम ही अपराधी थे। यूसुफ़ ने कहा: अब तुम पर कोई आरोप नहीं, परमेश्वर तुम्हें क्षमा करे और वह सब दया करने वालों से बढ़कर दया करने वाला है। (जाओ), मेरा यह कुर्ता ले जाओ और इसको मेरे पिता के चेहरे पर डाल दो, उसकी दृष्टि लौट आएगी और अपने सब परिवार वालों को ले कर मेरे पास आ जाओ।

وَلَمَّا فَصَلَتِ ٱلْعِيرُ قَالَ أَبُوهُمْ إِنِّى لَأَجِدُ رِيحَ يُوسُفَ ۖ لَوْلَآ أَن تُفَنِّدُونِ ﴿94﴾ قَالُوا۟ تَٱللَّهِ إِنَّكَ لَفِى ضَلَـٰلِكَ ٱلْقَدِيمِ ﴿95﴾ فَلَمَّآ أَن جَآءَ ٱلْبَشِيرُ أَلْقَىٰهُ عَلَىٰ وَجْهِهِۦ فَٱرْتَدَّ بَصِيرًا ۖ قَالَ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿96﴾ قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا ٱسْتَغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَآ إِنَّا كُنَّا خَـٰطِـِٔينَ ﴿97﴾ قَالَ سَوْفَ أَسْتَغْفِرُ لَكُمْ رَبِّىٓ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ ﴿98﴾

जब यह काफिला (मिस्र से) चला तो उनके पिता ने (कन्आन में अपने घर के लोगों से) कहा: यदि तुम यह न कहो कि बुढ़ापे में सठिया गया हूं तो मैं यूसुफ़ की सुगंध महसूस कर रहा हूं। लोगों ने कहा: परमेश्वर की सौगंध, आप अभी तक अपनी उसी पुरानी सनक में पड़े हैं। फिर जब यह हुआ कि शुभ सूचना देने वाला पहुंच गया, उसने कुर्ता याक़ूब के चेहरे पर डाल दिया तो अचानक उसकी दृष्टि लौट आई। तब उसने कहा: मैं ने तुम्हें बताया न था कि मैं परमेश्वर की ओर से वह कुछ जानता हूं जो तुम नहीं जानते। यूसुफ़ के भाई बोल उठे: पिता श्री, आप हमारे पापकर्मों की क्षमा के लिए प्रार्थना करें, वास्तव में हम दोषी थे। उसने कहा: मैं अपने प्रभु से शीघ्र ही तुम्हारे लिए क्षमा की प्रार्थना करूंगा, निस्संदेह वही क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

فَلَمَّا دَخَلُوا۟ عَلَىٰ يُوسُفَ ءَاوَىٰٓ إِلَيْهِ أَبَوَيْهِ وَقَالَ ٱدْخُلُوا۟ مِصْرَ إِن شَآءَ ٱللَّهُ ءَامِنِينَ ﴿99﴾ وَرَفَعَ أَبَوَيْهِ عَلَى ٱلْعَرْشِ وَخَرُّوا۟ لَهُۥ سُجَّدًا ۖ وَقَالَ يَـٰٓأَبَتِ هَـٰذَا تَأْوِيلُ رُءْيَـٰىَ مِن قَبْلُ قَدْ جَعَلَهَا رَبِّى حَقًّا ۖ وَقَدْ أَحْسَنَ بِىٓ إِذْ أَخْرَجَنِى مِنَ ٱلسِّجْنِ وَجَآءَ بِكُم مِّنَ ٱلْبَدْوِ مِنۢ بَعْدِ أَن نَّزَغَ ٱلشَّيْطَـٰنُ بَيْنِى وَبَيْنَ إِخْوَتِىٓ ۚ إِنَّ رَبِّى لَطِيفٌ لِّمَا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ ﴿100﴾ رَبِّ قَدْ ءَاتَيْتَنِى مِنَ ٱلْمُلْكِ وَعَلَّمْتَنِى مِن تَأْوِيلِ ٱلْأَحَادِيثِ ۚ فَاطِرَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ أَنتَ وَلِىِّۦ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ تَوَفَّنِى مُسْلِمًا وَأَلْحِقْنِى بِٱلصَّـٰلِحِينَ ﴿101﴾

फिर जब ये लोग यूसुफ़ के पास पहुंचे, उसने अपने माता पिता को अलग से अपने पास स्थान दिया और कहा: मिस्र में, परमेश्वर चाहे तो शांति से रहिए। (अपने घर पहुंच कर) उसने अपने माता-पिता को सिंहासन पर बिठाया और सब अनायास उसके लिए सजदे में झुक गए। यूसुफ़ ने कहा: पिता श्री, यह मेरे उस सपने का अर्थ है जो मैंने पहले देखा था। मेरे प्रभु ने उसको सच कर दिया। उसने मुझपर बड़ा उपकार किया, जब मुझे कारागार से निकाला और आप सब लोगों को गांव से यहाँ ले आया, इसके बावजूद कि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच झगड़ा डलवा दिया था। सत्य यह है कि मेरा प्रभु जो कुछ चाहता है, उसके लिए अत्यंत सूक्ष्म मार्ग निकाल लेने वाला है। सत्य यह है कि वही ज्ञानी और प्रज्ञावान है। प्रभु, तूने मुझे सत्ता में भागीदार बनाया और बातों का अर्थ कर लेने की विद्या में से भी सिखा दिया। धरती और समस्त आकाशों के विधाता, इस लोक और परलोक में तू ही मेरी बिगड़ी बनाने वाला है। मुझे इस्लाम पर मृत्यु दे और अपने सदाचारी भक्तों की श्रेणी में शामिल कर।1

टिप्पणियाँ 1
  1. यहाँ सजदे से तात्पर्य वह दंडवत नहीं है जो हम परमेश्वर के समक्ष करते हैं, अपितु रुकूअ के रूप में सम्मानपूर्वक झुकने की एक शैली है। बड़ों के सम्मान के लिए इस ढंग से झुकना प्राचीन काल की एक प्रचलित रीति थी। ↩
ذَٰلِكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْغَيْبِ نُوحِيهِ إِلَيْكَ ۖ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ أَجْمَعُوٓا۟ أَمْرَهُمْ وَهُمْ يَمْكُرُونَ ﴿102﴾

यह कथा परोक्ष की सूचनाओं में से है, इसे हम तुम्हारी ओर वह्य कर रहे हैं, (हे पैग़ंबर)। तुम उस समय उनके पास उपस्थित नहीं थे, जब यूसुफ़ के भाइयों ने अपना संकल्प पक्का कर लिया था और वे (उसके विरुद्ध) षड्यंत्र कर रहे थे।

وَمَآ أَكْثَرُ ٱلنَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِنِينَ ﴿103﴾ وَمَا تَسْـَٔلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَـٰلَمِينَ ﴿104﴾ وَكَأَيِّن مِّنْ ءَايَةٍ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ ﴿105﴾ وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِٱللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ ﴿106﴾ أَفَأَمِنُوٓا۟ أَن تَأْتِيَهُمْ غَـٰشِيَةٌ مِّنْ عَذَابِ ٱللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ ٱلسَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿107﴾

इसके बावजूद इन में से अधिकांश लोगों की दशा यह है कि तुम, चाहे कितनी ही इच्छा करो, वे मानने वाले नहीं हैं। तुम इस सेवा पर उनसे कोई बदला नहीं मांग रहे हो (कि वे भागने के रास्तों की खोज करें)। यह तो केवल एक उपदेश है दुनिया वालों के लिए। (वे तुमसे निशानी मांगते हैं, यद्यपि) धरती और समस्त आकाशों में कितनी ही निशानियाँ हैं जिनके पास से वे निकलते हैं और उनकी कोई परवाह नहीं करते। उनमें से अधिकांश लोग परमेश्वर को इसी प्रकार मानते हैं कि साथ ही उसके साझीदार बनाए हुए हैं। फिर क्या वे (अपने इन सहभागियों पर भरोसा करके) संतुष्ट हो गए हैं कि उनपर परमेश्वर के दण्ड का कोई संकट आ पड़े या उनपर अचानक महाप्रलय आ जाए और वे उससे पूर्णतः अनजान हों?

قُلْ هَـٰذِهِۦ سَبِيلِىٓ أَدْعُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا۠ وَمَنِ ٱتَّبَعَنِى ۖ وَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ ﴿108﴾

इनसे स्पष्ट रूप से कह दो, यह मेरा मार्ग है, मैं परमेश्वर की ओर बुलाता हूं, पूरे ज्ञान के साथ, मैं भी और वे भी जो मेरा अनुसरण किए हुए हैं। और (सुन लो कि) परमेश्वर (शिर्क के सारे दोषों से) मुक्त है और मैं मुश्रिकों में से नहीं हूं।

وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِىٓ إِلَيْهِم مِّنْ أَهْلِ ٱلْقُرَىٰٓ ۗ أَفَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۗ وَلَدَارُ ٱلْـَٔاخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ﴿109﴾ حَتَّىٰٓ إِذَا ٱسْتَيْـَٔسَ ٱلرُّسُلُ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا۟ جَآءَهُمْ نَصْرُنَا فَنُجِّىَ مَن نَّشَآءُ ۖ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُنَا عَنِ ٱلْقَوْمِ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿110﴾ لَقَدْ كَانَ فِى قَصَصِهِمْ عِبْرَةٌ لِّأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ ۗ مَا كَانَ حَدِيثًا يُفْتَرَىٰ وَلَـٰكِن تَصْدِيقَ ٱلَّذِى بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ كُلِّ شَىْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ ﴿111﴾

(इन्हें आश्चर्य है कि एक मनुष्य रसूल बनकर आ गया है)। तुमसे पहले भी, (हे पैग़ंबर), हमने जितने रसूल भेजे, सब इन्हीं बस्तियों के रहने वाले पुरुष ही थे, हम उनकी ओर वह्य करते थे। फिर क्या ये लोग धरती में चले फिरे नहीं हैं कि (अपनी आंखों से) देख लेते कि उन लोगों का अंत कैसा हुआ जो इनसे पहले थे? सत्य यह है कि परलोक का घर उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जिन्होंने आत्मसंयम अपना लिया है। फिर क्या समझते नहीं हो? (ये दण्ड के लिए जिस प्रकार जल्दी मचा रहे हैं, इनसे पहले के लोग भी इसी तरह मचाते रहे), यहाँ तक कि जब उनके रसूल उनसे हताश हो गए और वे लोग भी सोचने लगे कि उनसे झूठ कहा गया था (कि उनपर कोई प्रकोप आने वाला है) तो हमारी सहायता पैग़ंबरों को पहुंच गई। फिर उनको बचा लिया गया जिन्हें हम चाहते थे (कि बचा लें) और अपराधी लोगों से हमारा प्रकोप टाला नहीं जा सकता। उनकी कथाओं में बुद्धिजीवियों के लिए, निस्संदेह सीखने की बहुत कुछ सामग्री है। यह क़ुरआन कोई गढ़ी हुई बात नहीं है, अपितु जो इससे पहले उपलब्ध है, उसकी पुष्टि है और हर चीज़ का विस्तार (जो मार्गदर्शन के लिए आवश्यक है) और उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और साक्षात कृपा जो मानने वाले हैं।