सूरह 72
अल्-जिन्न
मक्की · 28 आयतें · 2 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
इन्हें बताओ, (हे पैग़ंबर), कि मुझे वह्य की गई है कि जिन्नों के एक समूह ने इसको सुना तो अपनी क़ौम से (जा कर) कहा: हमने एक दिल को बड़ा ही लुभाने वाला क़ुरआन सुना है जो सन्मार्ग का रास्ता दिखाता है, तो हमने उसे मान लिया है और अब हम कदापि किसी को अपने प्रभु का सहभागी नहीं बनाएंगे। और यह भी कि हमारे प्रभु की महिमा बहुत ऊंची है, उसने अपने लिए कोई पत्नी बनाई है न संतान। और यह भी कि हमारा यह मूर्ख (मुखिया) परमेश्वर के बारे में पूर्णतः सत्य से हटी हुई बातें कहता रहा है। और यह भी कि (हम इसके पीछे केवल इसलिए चलते रहे कि) हमने समझा था कि क्या जिन्न और क्या मनुष्य, परमेश्वर पर कोई झूठ नहीं मढ़ सकता। और यह भी कि (मनुष्य कुछ पहले ही अवज्ञाकारी थे, फिर) मनुष्यों में से कुछ मूर्ख हमारे जिन्नों में से कुछ दुष्टों की दुहाई देते रहे तो इन्होंने उनकी अवज्ञा बढ़ा दी। और यह भी कि तुम्हारे जैसे उन्होंने भी यही समझा कि परमेश्वर (मृत्यु के बाद फिर) किसी को (जीवित) नहीं उठाएगा । और यह भी कि (इस क़ुरआन को सुनने से पहले हम कुछ खोज में थे, इसलिए कि) हमने आकाश को टटोला तो देखा कि वह भीषण पहरेदारों से भरा पड़ा है, और उसमें उल्का पिंडों की बारिश हो रही है। और यह भी कि हम पहले उसके ठिकानों में सुनने के लिए जा कर बैठा करते थे, किंतु (हमने देखा कि) अब जो सुनने का प्रयास करता है, अपने लिए घात में एक अंगारा पाता है। और यह भी कि (उस समय) हम नहीं जानते थे की धरती वालों के पक्ष में कोई बुराई करने का उद्देश्य है या उनके प्रभु ने उनके लिए किसी भलाई की कामना की है। और यह भी कि हम में भले भी रहे हैं और अन्य भी और हमारे मार्ग (इससे पहले भी) अलग-अलग ही थे। और यह भी कि (हम कभी अवज्ञाकारी नहीं थे), हम समझते थे कि परमेश्वर की पकड़ से न हम धरती में कहीं जाकर निकल सकते हैं और न आकाश में कहीं भाग कर उसको पराजित कर सकते हैं। और यह भी कि (हमारा यही विचार था जिसके आधार पर) हमने जब सदुपदेश की यह वाणी सुनी तो उसको मान लिया। तो (अब तुम्हें भी आह्वान करते हैं कि तुम में से) जो अपने प्रभु को मानेंगे, उन्हें किसी क्षति और किसी अन्याय का भय नहीं होगा। और यह भी कि (इसके बाद अब) हमारे अंदर वे भी होंगे जो सत्य के सामने सर झुका देंगे और वे भी जो अवज्ञा पर हठ करेंगे। तो जिन्होंने सर झुका दिया, उन्होंने मार्ग पा लिया और जो अवज्ञाकारी हुए, वे फिर नरक का ईंधन होकर रहे।
और (इनसे कहो, हे पैग़ंबर कि) मुझे यह वह्य भी आई है कि तुम्हारी क़ौम के लोग यदि तौहीद के सीधे मार्ग पर जमे रहते तो हम उन्हें अच्छे से तृप्त कर देते, ताकि इसमें उन्हें परखें। और (हमारा निर्णय है कि इनमें से) जो अपने प्रभु के स्मरण से मुँह मोड़ेंगे, उन्हें वह ऐसी यातना में डाल देगा जो बराबर चढ़ती जाएगी। और यह भी कि मस्जिदें परमेश्वर ही के लिए हैं, इसलिए उनमें परमेश्वर के साथ किसी और को न पुकारो। और यह भी कि जब परमेश्वर का यह भक्त (उसके घर में केवल) उसको पुकारने खड़ा हो जाता है तो लगता है कि ये उस पर टूट पड़ेंगे। (हे पैग़ंबर), कह दो, मैं तो अपने प्रभु ही को पुकारता हूँ और किसी को उसका सहभागी नहीं बनाऊँगा। इनसे कह दो, मैं तुम्हारे लिए किसी मुनाफ़े तथा नुक़सान और किसी मार्गदर्शन तथा भटकावे का कोई अधिकार नहीं रखता। कह दो, (मैं किसी को उसका सहभागी बनाऊँ तो जानता हूं कि) मुझे परमेश्वर के प्रकोप से कोई बचा नहीं सकता और न मैं उसके अतिरिक्त कोई शरण कभी पा सकूँगा। (नहीं, लोगो, मैं तुम्हारे लिए इस प्रकार का कोई अधिकार नहीं रखता), मेरा कार्य केवल यह है कि मुझे परमेश्वर की ओर से पहुंचा है और उसके संदेश तुम्हें देने हैं। फिर भी (याद रखो कि) की जो परमेश्वर और उसके रसूल की अवज्ञा करेंगे, उनके लिए फिर नरक की आग है जिसमें वे सदा-सदा रहेंगे। यहाँ तक कि (अपनी शक्ति के भ्रम में पड़े) ये लोग जब वहां उस चीज़ को देखेंगे जिससे उन्हें सचेत किया गया था तो अवश्य जान लेंगे कि किस की सहायता कच्ची और कौन गिनती में थोड़े हैं। कह दो, मैं नहीं जानता कि जिस दण्ड से तुमको सचेत किया जाता है, वह पास ही है या मेरा प्रभु अभी इसे कुछ और टालेगा। (यह परोक्ष की बातें हैं और) इस परोक्ष को वही जानता है और अपना यह रहस्य किसी पर व्यक्त भी नहीं करता। रहे वे जिनको वह रसूल के रूप में चुन लेता है, वे अपनी ओर से कुछ नहीं कह सकते, उनके आगे और पीछे तो वह पहरा लगा देता है ताकि पता रहे कि उन्होंने अपने प्रभु के संदेश पहुंचा दिए हैं, और वह उनके आस-पास को घेरे में और उनकी हर चीज़ को गिनती में रखता है।