सूरह 73

अल्-मुज़्ज़म्मिल्

मक्की · 20 आयतें · 3 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को उस बड़ी ज़िम्मेदारी का भार उठाने के लिए तैयारियां करने का निर्देश देती है, जबकि दूसरी में उनके लिए इस ज़िम्मेदारी की व्याख्या की गई है कि प्रारंभिक चेतावनी (इंज़ार) के बाद अब वे अपनी क़ौम को सार्वजनिक रूप से सचेत करने (इंज़ार-ए-आम) के लिए उठ खड़े हों।

दोनों सूरतों में संबोधन पैग़ंबर मुहम्मद (स.) से भी है और उनके संबोधित क़ुरैश क़बीले के नेताओं से भी।

इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट है कि मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के इंज़ार-ए-आम वाले चरण का आरंभ इन्हीं दो सूरतों से हुआ है।

पहली सूरह — अल्-मुज़्ज़म्मिल — का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को क़ौम की प्रतिकूल प्रतिक्रिया के कारण उत्पन्न उदासी की हालत से निकल कर एक बड़ी ज़िम्मेदारी का भार उठाने के लिए तैयारियों का निर्देश देना है और क़ुरैश के नेताओं को यह चेतावनी देना है कि उनकी मोहलत बहुत कम रह गई है, यदि वे अपने आचरण में सुधार नहीं करते तो इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।

दूसरी सूरह — अल्-मुद्दस्सिर — का विषय पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के लिए इस ज़िम्मेदारी की व्याख्या करना, उसके अनिवार्य कर्तव्यों और सीमाओं से अवगत करना और उनके द्वारा संबोधित लोगों को यह चेतावनी देना है कि जिस क़यामत से खुल्लम खुल्ला सचेत करने का आदेश हमने पैग़ंबर को दिया है, उसे कोई साधारण चीज़ न समझो। वह एक ऐसा दिन है जो नकारने वालों के लिए सरल नहीं होगा और एक ऐसी सच्चाई है जिसे न नकारा जा सकता है और न उससे बचने के लिए कोई अनुशंसा किसी के काम आ सकती है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمُزَّمِّلُ ﴿1﴾ قُمِ ٱلَّيْلَ إِلَّا قَلِيلًا ﴿2﴾ نِّصْفَهُۥٓ أَوِ ٱنقُصْ مِنْهُ قَلِيلًا ﴿3﴾ أَوْ زِدْ عَلَيْهِ وَرَتِّلِ ٱلْقُرْءَانَ تَرْتِيلًا ﴿4﴾ إِنَّا سَنُلْقِى عَلَيْكَ قَوْلًا ثَقِيلًا ﴿5﴾ إِنَّ نَاشِئَةَ ٱلَّيْلِ هِىَ أَشَدُّ وَطْـًٔا وَأَقْوَمُ قِيلًا ﴿6﴾ إِنَّ لَكَ فِى ٱلنَّهَارِ سَبْحًا طَوِيلًا ﴿7﴾ وَٱذْكُرِ ٱسْمَ رَبِّكَ وَتَبَتَّلْ إِلَيْهِ تَبْتِيلًا ﴿8﴾ رَّبُّ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ فَٱتَّخِذْهُ وَكِيلًا ﴿9﴾ وَٱصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَٱهْجُرْهُمْ هَجْرًا جَمِيلًا ﴿10﴾ وَذَرْنِى وَٱلْمُكَذِّبِينَ أُو۟لِى ٱلنَّعْمَةِ وَمَهِّلْهُمْ قَلِيلًا ﴿11﴾ إِنَّ لَدَيْنَآ أَنكَالًا وَجَحِيمًا ﴿12﴾ وَطَعَامًا ذَا غُصَّةٍ وَعَذَابًا أَلِيمًا ﴿13﴾ يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلْأَرْضُ وَٱلْجِبَالُ وَكَانَتِ ٱلْجِبَالُ كَثِيبًا مَّهِيلًا ﴿14﴾

हे ओढ़ लपेट कर बैठने वाले, रात को खड़े रहो, किंतु पूरी रात नहीं। आधी रात या उससे कुछ कम कर लो या उसपर कुछ बढ़ा दो और अपनी इस नमाज़ में क़ुरआन को ठहर-ठहर कर पढ़ो। इसलिए कि शीघ्र ही एक भारी बात का बोझ हम तुम पर डाल देंगे। रात का यह उठना, वास्तव में मन को अनुशासित करने और वाणी के सुधार के लिए अत्यंत उपयुक्त है। इसलिए कि दिन में तो (इस कार्य के कारण) तुम बहुत व्यस्त रहोगे। (इसलिए इस समय पढ़ो) और अपने प्रभु के नाम का स्मरण करो और (रात के इस एकांत में) सबसे टूट कर उसी के हो कर रहो। वह पूरब और पश्चिम का अधिपति है, उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, इसलिए उसी को अपना संरक्षक बनाओ। ये जो कुछ कहते हैं, उस पर धैर्य रखो, इन्हें अत्यंत भले तरीक़े से अनदेखा करो और इन नकारने वालों, इन संपन्न लोगों का मामला मुझपर छोड़ दो और इनको बस थोड़ी सी ढील दो। (इनके लिए) निस्संदेह हमारे पास भारी बेड़ियाँ हैं और आग का ढेर है और गले में फँसता हुआ खाना है और अत्यंत कष्टदायक यातना भी। उस दिन जब धरती और पर्वत कांपेंगे और पर्वतों की दशा ऐसी हो जाएगी, मानो रेत के टीले हैं जो बिखरे जा रहे हैं।

إِنَّآ أَرْسَلْنَآ إِلَيْكُمْ رَسُولًا شَـٰهِدًا عَلَيْكُمْ كَمَآ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ رَسُولًا ﴿15﴾ فَعَصَىٰ فِرْعَوْنُ ٱلرَّسُولَ فَأَخَذْنَـٰهُ أَخْذًا وَبِيلًا ﴿16﴾ فَكَيْفَ تَتَّقُونَ إِن كَفَرْتُمْ يَوْمًا يَجْعَلُ ٱلْوِلْدَٰنَ شِيبًا ﴿17﴾ ٱلسَّمَآءُ مُنفَطِرٌۢ بِهِۦ ۚ كَانَ وَعْدُهُۥ مَفْعُولًا ﴿18﴾ إِنَّ هَـٰذِهِۦ تَذْكِرَةٌ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ سَبِيلًا ﴿19﴾

तुम्हारी ओर (हे मक्का के क़ुरैश), हमने उसी प्रकार एक रसूल तुम पर साक्षी बना कर भेजा है, जिस प्रकार हमने फ़िरऔन की ओर एक रसूल भेजा था। फिर फ़िरऔन ने उस रसूल की अवज्ञा की तो हमने उसको बड़े संकट में पकड़ लिया। इसलिए यदि तुम भी नहीं मानोगे तो उस दिन से कैसे बचोगे जो बच्चों को बूढ़ा कर देगा? आकाश उसके बोझ से फटा पड़ रहा है और परमेश्वर का वचन अटल है। इसमें संदेह नहीं कि (उससे पहले) यह एक स्मरण है। तो जिसका जी चाहे, अपने प्रभु की ओर जाने का मार्ग अपना ले।

إِنَّ رَبَّكَ يَعْلَمُ أَنَّكَ تَقُومُ أَدْنَىٰ مِن ثُلُثَىِ ٱلَّيْلِ وَنِصْفَهُۥ وَثُلُثَهُۥ وَطَآئِفَةٌ مِّنَ ٱلَّذِينَ مَعَكَ ۚ وَٱللَّهُ يُقَدِّرُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ ۚ عَلِمَ أَن لَّن تُحْصُوهُ فَتَابَ عَلَيْكُمْ ۖ فَٱقْرَءُوا۟ مَا تَيَسَّرَ مِنَ ٱلْقُرْءَانِ ۚ عَلِمَ أَن سَيَكُونُ مِنكُم مَّرْضَىٰ ۙ وَءَاخَرُونَ يَضْرِبُونَ فِى ٱلْأَرْضِ يَبْتَغُونَ مِن فَضْلِ ٱللَّهِ ۙ وَءَاخَرُونَ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ فَٱقْرَءُوا۟ مَا تَيَسَّرَ مِنْهُ ۚ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَقْرِضُوا۟ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍ تَجِدُوهُ عِندَ ٱللَّهِ هُوَ خَيْرًا وَأَعْظَمَ أَجْرًا ۚ وَٱسْتَغْفِرُوا۟ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌۢ ﴿20﴾

(हमने, हे पैग़ंबर, तुमको आदेश दिया था कि रात में खड़े रहो)। तुम्हारा प्रभु भलीभांति जानता है कि तुम कभी दो तिहाई रात के आस-पास, कभी आधी रात और कभी एक तिहाई रात उसके समक्ष खड़े रहते हो और एक समूह तुम्हारे साथियों में से भी। (लोगों की आवश्यकता के अनुसार) परमेश्वर ही रात और दिन का माप निश्चित करता है। उसने जान लिया कि तुम लोग इसे निभा नहीं सकोगे तो उसने तुम पर कृपादृष्टि की। अतः अब क़ुरआन में से जितना संभव हो, इस नमाज़ में पढ़ लिया करो। वह जानता है कि आगे तुम में रोगी भी होंगे, और कुछ दूसरे वे भी जो परमेश्वर के अनुग्रह की खोज में यात्रा करेंगे, और कुछ अन्य जो परमेश्वर के मार्ग में जिहाद के लिए उठेंगे। इसलिए जितना संभव हो, इसमें से पढ़ लिया करो और (अपने दिन-रात में) नमाज़ का प्रबंध रखो और ज़कात देते रहो और (धर्म और संघ की आवश्यकताओं के लिए) परमेश्वर को ऋण दो, अच्छा ऋण। और (याद रखो कि) जो कुछ भलाई तुम अपने लिए आगे भेजोगे, उसे परमेश्वर के पास उससे अच्छा और फल में ऊँचा पाओगे। परमेश्वर से क्षमा मांगते रहो। निस्संदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला और कृपा करने वाला है।