सूरह 71
नूह्
मक्की · 28 आयतें · 6 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह, पैग़ंबर नूह की क़ौम के वृत्तांत के आईने में क़ुरआन की चेतावनी (इंज़ार) और उसके परिणामों की जो तस्वीर प्रस्तुत करती है, दूसरी सूरह उसी की पुष्टि में जिन्नों की गवाही प्रस्तुत करती है और क़ुरैश को इसके संबंध में अपने आचरण पर पुनर्विचार करने का निमंत्रण देती है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो सूरह हाक़्क़ह में जिस विषय का वर्णन इससे पहले प्रत्यक्ष (मा तुब्सिरून) और परोक्ष (मा ला तुब्सिरून) के शब्दों में संक्षेप में किया गया है, ये दोनों सूरतें उसी के कुछ अन्य पहलुओं की क्रमबद्ध व्याख्या हैं।
दोनों में संबोधन की दिशा क़ुरैश के नेताओं की ओर है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की तरह ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के इंज़ार (प्रारम्भिक चेतावनी) के चरण में अवतरित हुई हैं।
पहली सूरह — नूह — का विषय क़ुरैश के लिए रसूलों के धर्मप्रचार और उसके विभिन्न चरणों की व्याख्या करना तथा उसके उन परिणामों से उन्हें सचेत करना है जो परमेश्वर की अपरिवर्तनीय कार्यप्रणाली (सुन्नत-ए-इलाही) के अनुसार उसे न मानने वालों के लिए अनिवार्यतः सामने आते हैं।
दूसरी सूरह — अल्-जिन्न — का विषय जिन्नों की गवाही के माध्यम से क़ुरआन और उसकी सच्चाई को क़ुरैश के सामने प्रमाणित करना और उन्हें यह समझाना है कि जिस दंड की वे माँग कर रहे हैं, उसका ज्ञान केवल परमेश्वर के पास है। परमेश्वर के रसूल दंड का समय बताने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर का संदेश पहुँचाने के लिए आते हैं। वे परमेश्वर से दंड नहीं, बल्कि उसकी दया की याचना करें। इसके लिए रसूल के मुक़ाबले में विद्रोह और अहंकार का आचरण त्याग कर उसके आह्वान को स्वीकार करें और परमेश्वर के घर में केवल उसी की उपासना करें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर रसूल बनाकर भेजा कि अपनी क़ौम को सचेत करो, इससे पहले कि एक कष्टदायक दण्ड उनपर आ जाए। उसने कहा: मेरी क़ौम के लोगो, मैं तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेत कर देने वाला हूं। (मैं तुम्हें निमंत्रण देता हूं) कि परमेश्वर की भक्ति करो और उसकी मर्यादाओं का पालन करो और मेरी बात मानो। इसके परिणामस्वरूप परमेश्वर तुम्हारे पापकर्मों में से क्षमा करेगा, (जो इससे पहले तुमसे हुए हैं), और तुम्हें एक निश्चित समय तक ढील देगा। सत्य यह है कि परमेश्वर का निश्चित किया हुआ समय जब आ जाता है तो फिर टाला नहीं जाता। काश, तुम (इसको) समझते।
(वह यही निमंत्रण देता रहा, परंतु वे लोग नहीं माने। यहाँ तक कि) उसने कहा: मेरे मालिक, मैंने अपनी इस क़ौम को दिन-रात पुकारा, परंतु मेरी पुकार से ये और अधिक भागते ही रहे। मैंने जब भी इन्हें बुलाया, इसलिए कि (इनके पलटने पर) तू इन्हें क्षमा करे तो इन्होंने अपनी उँगलियाँ अपने कानों में ठूँस लीं और अपनी चादरें लपेट लीं और अपनी हठ पर अड़ गए और बड़ा अहंकार दिखाया। फिर मैंने इनको खुलमखुल्ला निमंत्रण दिया। फिर सार्वजनिक रूप से आह्वान किया और चुपके-चुपके भी बहुत समझाया। इस प्रकार कि मैंने कहा: अपने प्रभु से क्षमा मांग लो। निस्संदेह, वह बड़ा क्षमा कर देने वाला है। इसके बदले में वह तुम पर अत्यधिक बारिश बरसाएगा और धन से, और बेटों से तुमको आशीष देगा और तुम्हारे लिए बाग़ उगाएगा और तुम्हारे लिए नदियां बहा देगा।
तुम्हें क्या हो गया है, तुम परमेश्वर के लिए किसी गरिमा की आशा नहीं रखते? यद्यपि उसने (सृष्टि के) कई चरणों से निकाल कर तुम्हें बनाया है — क्या देखते नहीं हो कि परमेश्वर ने किस प्रकार सात आकाश अनेक परतों में बनाए और उनमें चाँद को प्रकाश और सूरज को दीपक बनाया? और देखते नहीं हो कि परमेश्वर ही ने विशेष प्रबंध के साथ तुम्हें धरती से उगाया? फिर वह इसी में तुम्हें लौटाता है और इसी से एकाएक अत्यंत सरलता के साथ तुमको निकाल खड़ा करेगा। और देखते नहीं हो कि परमेश्वर ही ने धरती को तुम्हारे लिए एक बिछौने के जैसा बिछा दिया है कि तुम पर्वतों के बीच इसके खुले मार्गों में चलते रहो?1
टिप्पणियाँ 1
- यहाँ से आगे के वाक्य पैग़ंबर नूह (अ.) के भाषण का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उनके भाषण पर परमेश्वर की ओर से जोड़ी गई बातें (तज़्मीन) हैं। ↩
नूह ने कहा: हे प्रभु, इन्होंने मेरी बात नहीं मानी और (अपने) उन्हीं (नेताओं) के पीछे चले जिनकी धन-संपत्ति और संतान ने उनकी असफलता में बढ़ोतरी ही की है और जिन्होंने बड़े-बड़े षड्यंत्र रचे और कहा कि अपने इन पूज्य-देवताओं को कभी न छोड़ो, और न वद्द और सुवाअ को छोड़ो और न यग़ूस और यऊक़ और नस्र को छोड़ो। और इस प्रकार अनेक लोगों को भटका दिया। और अब तू भी (हे प्रभु), इन अत्याचारियों के भटकावे में बढ़ोतरी कर।
अपने इन पापकर्मों के परिणामस्वरूप वे डुबो दिए गए, फिर आग में डाल दिए गए। फिर परमेश्वर के विरुद्ध उन्होंने अपने लिए कोई सहायक नहीं पाए।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात उनके आग में डाले जाने का निर्णय कर दिया गया। यह आयत एक बार फिर परमेश्वर की ओर से जोड़े गए वाक्य (तज़्मीन) हैं जो पैग़ंबर नूह (अ.) की प्रार्थना के बीच में आ गए हैं। ↩
और नूह ने कहा: हे प्रभु, इन नकारने वालों में से तू अब किसी को धरती पर न छोड़, इसलिए कि तूने इन्हें छोड़ दिया तो ये तेरे भक्तों को भटका देंगे और (जन्म देंगे तो तेरे) अवज्ञाकारियों और नकारने वालों ही को जन्म देंगे। मेरे प्रभु, तू मुझे क्षमा कर दे, मेरे माता-पिता को क्षमा कर दे, उन सब को क्षमा कर दे जो मेरे घर में मोमिन हो कर प्रवेश करें, सब मुसलमान पुरुषों और स्त्रियों को क्षमा कर दे, और इन दुष्टों के लिए अब इनकी बरबादी के अतिरिक्त किसी चीज़ में बढ़ोतरी न कर।