सूरह 70

अल्-मआरिज्

मक्की · 44 आयतें · 6 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

سَأَلَ سَآئِلٌۢ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ ﴿1﴾ لِّلْكَـٰفِرِينَ لَيْسَ لَهُۥ دَافِعٌ ﴿2﴾ مِّنَ ٱللَّهِ ذِى ٱلْمَعَارِجِ ﴿3﴾ تَعْرُجُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُۥ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ ﴿4﴾ فَٱصْبِرْ صَبْرًا جَمِيلًا ﴿5﴾ إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُۥ بَعِيدًا ﴿6﴾ وَنَرَىٰهُ قَرِيبًا ﴿7﴾

बहुत जल्दी मचाई है एक जल्दी मचाने वाले ने, उस दण्ड के लिए जो इन नकारने वालों पर आ कर रहेगा, उसे कोई हटा नहीं सकेगा। वह परमेश्वर की ओर से आएगा जो आरोहण की सीढ़ियों वाला है। (ये हर चीज़ को अपने नाप से नापते और फिर जल्दी मचा देते हैं। इन्हें बताओ कि) फ़रिश्ते और रूह-उल्-अमीन (तुम्हारी गणना से) पचास हज़ार वर्ष के बराबर एक दिन में उसके समक्ष चढ़कर पहुंचते हैं। इसलिए, (हे पैग़ंबर), तुम (इनकी बातों पर) पूरी शोभा व गरिमा के साथ धैर्य रखो । ये उसको दूर समझते हैं और हम उसे बहुत पास देख रहे हैं।

يَوْمَ تَكُونُ ٱلسَّمَآءُ كَٱلْمُهْلِ ﴿8﴾ وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ ﴿9﴾ وَلَا يَسْـَٔلُ حَمِيمٌ حَمِيمًا ﴿10﴾ يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ يَوَدُّ ٱلْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِى مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍۭ بِبَنِيهِ ﴿11﴾ وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَأَخِيهِ ﴿12﴾ وَفَصِيلَتِهِ ٱلَّتِى تُـْٔوِيهِ ﴿13﴾ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًا ثُمَّ يُنجِيهِ ﴿14﴾

(ये भी देखेंगे, यहाँ और इसके बाद परलोक में भी)।

उस दिन जब आकाश तेल की तलछट के समान हो जाएगा और पर्वत धुने हुए ऊन के समान होंगे, और कोई सच्चा मित्र भी उस समय अपने किसी मित्र को न पूछेगा, यद्यपि वे एक दूसरे को दिखाए जाएँगे। अपराधी चाहेगा कि वह उस दिन की यातना से बचने के लिए अपने बेटों को, अपनी पत्नी को, अपने भाई को, अपने परिवार को जो उसे शरण देता रहा, और पृथ्वी के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मुक्ति के बदले में दे दे, फिर अपने आप को (उससे) छुड़ा ले।

كَلَّآ ۖ إِنَّهَا لَظَىٰ ﴿15﴾ نَزَّاعَةً لِّلشَّوَىٰ ﴿16﴾ تَدْعُوا۟ مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ ﴿17﴾ وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰٓ ﴿18﴾

कदापि नहीं, वह आग की लपट है, चमड़ी उधेड़ती, हर उस व्यक्ति को पुकारती हुई जिसने पीठ फेरी और मुँह मोड़ा और धन एकत्रित किया, फिर सहेज कर रखा।

إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ خُلِقَ هَلُوعًا ﴿19﴾ إِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ جَزُوعًا ﴿20﴾ وَإِذَا مَسَّهُ ٱلْخَيْرُ مَنُوعًا ﴿21﴾ إِلَّا ٱلْمُصَلِّينَ ﴿22﴾ ٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَآئِمُونَ ﴿23﴾ وَٱلَّذِينَ فِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّ مَّعْلُومٌ ﴿24﴾ لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ ﴿25﴾ وَٱلَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ ﴿26﴾ وَٱلَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ ﴿27﴾ إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍ ﴿28﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَـٰفِظُونَ ﴿29﴾ إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ ﴿30﴾ فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ ﴿31﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ ﴿32﴾ وَٱلَّذِينَ هُم بِشَهَـٰدَٰتِهِمْ قَآئِمُونَ ﴿33﴾ وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ ﴿34﴾ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى جَنَّـٰتٍ مُّكْرَمُونَ ﴿35﴾

(ये इसी प्रकार जल्दी मचाते रहेंगे, तुम इनकी चिंता न करो)। सत्य यह है कि मनुष्य बहुत उतावला पैदा हुआ है। उसपर जब संकट आता है तो घबरा उठता है और जब राहत मिलती है तो बहुत कंजूस बन जाता है। हाँ, किंतु वे नहीं जो नमाज़ी हैं, जो अपनी नमाज़़ में सदा नियमित रहते हैं, जिनकी संपत्तियों में मांगने वाले और वंचित के लिए एक निर्धारित अधिकार है, जो प्रतिफल के दिन को सत्य मानते हैं, जो अपने प्रभु के दण्ड से डरते रहते हैं — इसलिए कि उनके प्रभु का दण्ड ऐसी चीज़ नहीं है कि उससे कोई निडर हो जाए — जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते हैं — अपनी पत्नियों और दासियों के अतिरिक्त, इसलिए कि उनके विषय में उनपर कोई दोष नहीं है। हाँ, जो इसके आगे कुछ चाहें तो वही मर्यादा भंग करने वाले हैं — जो (परमेश्वर और परमेश्वर की रचना, दोनों के विषय में) अपनी अमानतों और अपने वचनों का ध्यान रखते हैं, जो अपनी गवाही पर बने रहते हैं और जो अपनी नमाज़ की रक्षा करते हैं। यही हैं जो (स्वर्ग के) बाग़ों में होंगे, बड़े सम्मान के साथ।

فَمَالِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ ﴿36﴾ عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ عِزِينَ ﴿37﴾ أَيَطْمَعُ كُلُّ ٱمْرِئٍ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍ ﴿38﴾ كَلَّآ ۖ إِنَّا خَلَقْنَـٰهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ ﴿39﴾

फिर क्या बात है कि (हमारा यह निर्णय सुनते ही) ये नकारने वाले दाएँ और बाएँ से, झुंड के झुंड, तुम पर पिल पड़ रहे हैं? क्या इनमें से हर व्यक्ति यह आशा करता है कि उसे राहत भरे स्वर्ग में प्रवेश कराया जाएगा? (केवल इसलिए कि वह दुनिया में बड़ा है)। कदापि नहीं, (ये अपनी बड़ाई पर न इतराएं), हमने इनको उस चीज़ से पैदा किया है जिसे ये जानते हैं ।

فَلَآ أُقْسِمُ بِرَبِّ ٱلْمَشَـٰرِقِ وَٱلْمَغَـٰرِبِ إِنَّا لَقَـٰدِرُونَ ﴿40﴾ عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ ﴿41﴾ فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا۟ وَيَلْعَبُوا۟ حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ ﴿42﴾ يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ سِرَاعًا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍ يُوفِضُونَ ﴿43﴾ خَـٰشِعَةً أَبْصَـٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يُوعَدُونَ ﴿44﴾

(ये समझते हैं कि हम इनकी पुनः रचना नहीं कर सकेंगे)? सो नहीं, मैं सौगंध खाता हूं उसकी जो पूरब और पश्चिम की व्यापकता का स्वामी है, हम इसका सामर्थ्य रखते हैं कि इनको बदल कर इनसे अच्छे पैदा कर दें और हम इसमें विवश नहीं होंगे, इसलिए (ये नहीं समझते तो) इन्हें छोड़ो, ये बातें बनाएं और खेलें, यहाँ तक कि अपने उस दिन को पहुँच जाएं जिसकी धमकी इन्हें दी जा रही है। जिस दिन ये अपनी क़ब्रों से बड़ी तेज़ी के साथ भागते हुए निकलेंगे, मानो दौड़ के लिए लगाए हुए निशानों की ओर भाग रहे हैं। इनकी आँखें झुकी होंगी, इन पर अपमान छा रहा होगा। यह है वह दिन जिससे ये डराए जाते रहे।