सूरह 69

अल्-हाक़्क़ह्

मक्की · 52 आयतें · 8 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह क़ुरैश को उस दंड से सावधान करती है जो उन्हें इस लोक और परलोक में भोगना होगा, जबकि दूसरी सूरह में उसी दंड का मज़ाक उड़ाने और इसके लिए जल्दी मचाने वालों को उनके अंजाम से सावधान किया गया है। दोनों में संबोधन की दिशा क़ुरैश के नेताओं की ओर है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की तरह ये भी मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के इंज़ार (प्रारम्भिक चेतावनी) के चरण में अवतरित हुई हैं।

पहली सूरह — अल्-हाक़्क़ह — का विषय क़यामत में प्रतिफल (जज़ा व सज़ा) को प्रमाणित करना, वहाँ की घटनाओं का वर्णन और उसके संबंध में क़ुरआन की चेतावनी को झूठा कहने के परिणामों से अपने श्रोताओं को सावधान करना है।

दूसरी सूरह — अल्-मआरिज़ — का विषय इन्हीं परिणामों का मज़ाक़ उड़ाने और इनके लिए जल्दी मचाने वालों को उनके अंजाम से सावधान करना, पैग़ंबर को उनके मुक़ाबले में धीरज रखने का उपदेश करना और उन्हें यह बताना है कि स्वर्ग (जन्नत) सदाचार (हुस्न-ए-अमल) का प्रतिफल है। इससे वंचित कोई भी व्यक्ति, चाहे वह अरब या अरब से बाहर के कुलीन वंश का क्यों न हो, परमेश्वर के इस अनंत राज्य में कभी प्रवेश नहीं कर सकता।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

ٱلْحَآقَّةُ ﴿1﴾ مَا ٱلْحَآقَّةُ ﴿2﴾ وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْحَآقَّةُ ﴿3﴾

होकर रहने वाली! क्या है होकर रहने वाली! और तुम क्या जानो कि क्या है वह होकर रहने वाली!

كَذَّبَتْ ثَمُودُ وَعَادٌۢ بِٱلْقَارِعَةِ ﴿4﴾ فَأَمَّا ثَمُودُ فَأُهْلِكُوا۟ بِٱلطَّاغِيَةِ ﴿5﴾ وَأَمَّا عَادٌ فَأُهْلِكُوا۟ بِرِيحٍ صَرْصَرٍ عَاتِيَةٍ ﴿6﴾ سَخَّرَهَا عَلَيْهِمْ سَبْعَ لَيَالٍ وَثَمَـٰنِيَةَ أَيَّامٍ حُسُومًا فَتَرَى ٱلْقَوْمَ فِيهَا صَرْعَىٰ كَأَنَّهُمْ أَعْجَازُ نَخْلٍ خَاوِيَةٍ ﴿7﴾ فَهَلْ تَرَىٰ لَهُم مِّنۢ بَاقِيَةٍ ﴿8﴾

समूद और आद ने इस खड़खड़ाने वाली को नकारा तो समूद उस आपदा से नष्ट हुए जो हद से बाहर थी और आद उस भयंकर और तेज़ आँधी से बर्बाद हुए जो उद्दंड और बेक़ाबू हो गई। परमेश्वर ने यह आँधी उन्हें जड़ से उखाड़ने के लिए सात रात और आठ दिन उनपर खुली छोड़ दी। फिर तुम उन लोगों को देखते कि इस प्रकार उसमें गिरे पड़े हैं, जैसे वे खजूर के खोखले तने हों। तो अब क्या इनमें से किसी को बचा हुआ देखते हो?

وَجَآءَ فِرْعَوْنُ وَمَن قَبْلَهُۥ وَٱلْمُؤْتَفِكَـٰتُ بِٱلْخَاطِئَةِ ﴿9﴾ فَعَصَوْا۟ رَسُولَ رَبِّهِمْ فَأَخَذَهُمْ أَخْذَةً رَّابِيَةً ﴿10﴾

और यही अपराध फ़िरऔन और उससे पहले के लोगों ने किया और उन बस्तियों ने भी जो तलपट हो गईं। इस प्रकार कि उन सब ने अपने प्रभु के रसूल की अवज्ञा की। अतः उसने उन्हें ऐसी पकड़ से पकड़ा जो अपनी तीव्रता में बढ़ती चली गई।

إِنَّا لَمَّا طَغَا ٱلْمَآءُ حَمَلْنَـٰكُمْ فِى ٱلْجَارِيَةِ ﴿11﴾ لِنَجْعَلَهَا لَكُمْ تَذْكِرَةً وَتَعِيَهَآ أُذُنٌ وَٰعِيَةٌ ﴿12﴾

(इसी प्रकार नूह को नकारने के परिणामस्वरूप) जब (तूफ़ान उठा और) पानी हद से बढ़ गया तो हम ही थे कि हमने तुम्हें नाव में उठा लिया, इसलिए कि इस कथा को तुम्हारे लिए उपदेश बना दें और याद रखने वाले कान इसको सुनें और याद रखें।

فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ نَفْخَةٌ وَٰحِدَةٌ ﴿13﴾ وَحُمِلَتِ ٱلْأَرْضُ وَٱلْجِبَالُ فَدُكَّتَا دَكَّةً وَٰحِدَةً ﴿14﴾ فَيَوْمَئِذٍ وَقَعَتِ ٱلْوَاقِعَةُ ﴿15﴾ وَٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَآءُ فَهِىَ يَوْمَئِذٍ وَاهِيَةٌ ﴿16﴾ وَٱلْمَلَكُ عَلَىٰٓ أَرْجَآئِهَا ۚ وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍ ثَمَـٰنِيَةٌ ﴿17﴾ يَوْمَئِذٍ تُعْرَضُونَ لَا تَخْفَىٰ مِنكُمْ خَافِيَةٌ ﴿18﴾

सो इसी प्रकार जब नरसिंघा में एक ही बार फूंक मारी जाएगी और धरती और पर्वतों को उठाकर एक ही चोट में टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाएगा तो उस दिन होने वाली हो जाएगी और आकाश फट जाएगा, फिर (तुम देखोगे कि) उस दिन वह बहुत ही दुर्बल होगा, और फ़रिश्ते उसके किनारों पर (सिमटे हुए) होंगे और तुम्हारे प्रभु का सिंहासन उस दिन आठ फ़रिश्ते अपने ऊपर उठाए होंगे। उस दिन तुम प्रस्तुत किए जाओगे, इस प्रकार कि तुम्हारी कोई छिपी हुई बात भी छिपी नहीं रहेगी।

فَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ فَيَقُولُ هَآؤُمُ ٱقْرَءُوا۟ كِتَـٰبِيَهْ ﴿19﴾ إِنِّى ظَنَنتُ أَنِّى مُلَـٰقٍ حِسَابِيَهْ ﴿20﴾ فَهُوَ فِى عِيشَةٍ رَّاضِيَةٍ ﴿21﴾ فِى جَنَّةٍ عَالِيَةٍ ﴿22﴾ قُطُوفُهَا دَانِيَةٌ ﴿23﴾ كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ هَنِيٓـًٔۢا بِمَآ أَسْلَفْتُمْ فِى ٱلْأَيَّامِ ٱلْخَالِيَةِ ﴿24﴾

फिर जिसके कर्मों का खाता उसके दाएँ हाथ में दिया जाएगा, वह कहेगा: लो पढ़ो, मेरे कर्मों का खाता, मुझे यह ध्यान रहा कि (एक दिन) मुझे अपने इस हिसाब का सामना करना है। अतः वह एक मनचाहे सुख में होगा, उत्तम श्रेणी के स्वर्ग में, जिसके फल झुक रहे होंगे — अब खाओ और पियो मज़े से अपने उन कर्मों के फलस्वरूप जो तुम ने बीते हुए दिनों में किए हैं।

كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ هَنِيٓـًٔۢا بِمَآ أَسْلَفْتُمْ فِى ٱلْأَيَّامِ ٱلْخَالِيَةِ ﴿24﴾ وَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِشِمَالِهِۦ فَيَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى لَمْ أُوتَ كِتَـٰبِيَهْ ﴿25﴾ وَلَمْ أَدْرِ مَا حِسَابِيَهْ ﴿26﴾ يَـٰلَيْتَهَا كَانَتِ ٱلْقَاضِيَةَ ﴿27﴾ مَآ أَغْنَىٰ عَنِّى مَالِيَهْ ۜ ﴿28﴾ هَلَكَ عَنِّى سُلْطَـٰنِيَهْ ﴿29﴾ خُذُوهُ فَغُلُّوهُ ﴿30﴾ ثُمَّ ٱلْجَحِيمَ صَلُّوهُ ﴿31﴾ ثُمَّ فِى سِلْسِلَةٍ ذَرْعُهَا سَبْعُونَ ذِرَاعًا فَٱسْلُكُوهُ ﴿32﴾ إِنَّهُۥ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ ٱلْعَظِيمِ ﴿33﴾ وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ ﴿34﴾ فَلَيْسَ لَهُ ٱلْيَوْمَ هَـٰهُنَا حَمِيمٌ ﴿35﴾ وَلَا طَعَامٌ إِلَّا مِنْ غِسْلِينٍ ﴿36﴾ لَّا يَأْكُلُهُۥٓ إِلَّا ٱلْخَـٰطِـُٔونَ ﴿37﴾

और जिसके कर्मों का खाता उसके बाएँ हाथ में दिया जाएगा, वह कहेगा: काश, मेरा यह कर्मों का खाता मुझे न मिलता और मेरा हिसाब क्या है, मैं उससे अपरिचित ही रहता! काश, वही मृत्यु निर्णायक हो जाती! मेरा धन मेरे क्या काम आया? मेरी सारा साम्राज्य मुझसे लुट गया — इसको पकड़ो और इसकी गर्दन में पट्टा डाल दो। फिर इसको नरक में झोंक दो। फिर एक ज़ंजीर में डाल दो जिसका माप गज़ों में सत्तर गज़ है — यह न महान परमेश्वर को मानता था और न निर्धन व्यक्तियों को खाना खिलाने की वकालत करता था। इसलिए आज यहाँ इसके प्रति कोई सहानुभूति व्यक्त करने वाला नहीं है और धोवन को छोड़ इसके लिए कोई खाना नहीं है। इसको ये पापी ही खाएंगे।

فَلَآ أُقْسِمُ بِمَا تُبْصِرُونَ ﴿38﴾ وَمَا لَا تُبْصِرُونَ ﴿39﴾ إِنَّهُۥ لَقَوْلُ رَسُولٍ كَرِيمٍ ﴿40﴾ وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍ ۚ قَلِيلًا مَّا تُؤْمِنُونَ ﴿41﴾ وَلَا بِقَوْلِ كَاهِنٍ ۚ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ ﴿42﴾ تَنزِيلٌ مِّن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿43﴾ وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ ٱلْأَقَاوِيلِ ﴿44﴾ لَأَخَذْنَا مِنْهُ بِٱلْيَمِينِ ﴿45﴾ ثُمَّ لَقَطَعْنَا مِنْهُ ٱلْوَتِينَ ﴿46﴾ فَمَا مِنكُم مِّنْ أَحَدٍ عَنْهُ حَـٰجِزِينَ ﴿47﴾ وَإِنَّهُۥ لَتَذْكِرَةٌ لِّلْمُتَّقِينَ ﴿48﴾ وَإِنَّا لَنَعْلَمُ أَنَّ مِنكُم مُّكَذِّبِينَ ﴿49﴾ وَإِنَّهُۥ لَحَسْرَةٌ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ ﴿50﴾ وَإِنَّهُۥ لَحَقُّ ٱلْيَقِينِ ﴿51﴾ فَسَبِّحْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلْعَظِيمِ ﴿52﴾

सो नहीं, (यह किसी शैतान की प्रेरणा नहीं है)। मैं उसकी गवाही पेश करता हूं जिसे तुम देखते हो और उसकी भी जिसे तुम नहीं देखते कि निस्संदेह, यह एक आदरणीय दूत की वाणी है और यह किसी कवि की वाणी नहीं है, तुम लोग कम ही मानते हो। और न किसी ज्योतिषी की वाणी है, तुम लोग कम ही समझते हो। यह समस्त लोकों के प्रभु की ओर से उतरी हुई है। हमारा यह पैग़ंबर यदि अपनी ओर से कोई बात हमारे नाम से बना लाता तो हम इसको शक्तिशाली हाथ से पकड़ लेते, फिर इसकी गर्दन की नस काट देते, फिर तुम में से कोई हमें इस कार्य से रोक न सकता। यह तो वास्तव में डरने वालों के लिए एक उपदेश है। हम भलीभांति जानते हैं कि तुम में (इसको) नकारने वाले भी हैं। (ये इसी प्रकार नकारते रहेंगे) और (क़यामत में) इन नकारने वालों के लिए अवश्य यह एक पछतावा बन जाएगा। इसमें संदेह नहीं कि यह एक नियत सत्य है। इसलिए, (हे पैग़ंबर, इन्हें छोड़ो और) अपने महान प्रभु के नाम का गुणगान करते रहो।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात प्रत्यक्ष लोक या दिखाई देने वाला लोक (आलम-ए-मश्हूद) और परोक्ष लोक या दिखाई न देने वाला लोक (आलम-ए-ना मश्हूद)। ↩