सूरह 58

अल्-मुजादलह्

मदनी · 22 आयतें · 14 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

قَدْ سَمِعَ ٱللَّهُ قَوْلَ ٱلَّتِى تُجَـٰدِلُكَ فِى زَوْجِهَا وَتَشْتَكِىٓ إِلَى ٱللَّهِ وَٱللَّهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَآ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌۢ بَصِيرٌ ﴿1﴾

परमेश्वर ने उस महिला की बात सुन ली है जो तुमसे अपने पति के विषय में झगड़ रही थी और परमेश्वर से प्रार्थना किए जाती थी। परमेश्वर तुम दोनों की बातें सुन रहा था। निस्संदेह, परमेश्वर सुनने वाला और देखने वाला है।

ٱلَّذِينَ يُظَـٰهِرُونَ مِنكُم مِّن نِّسَآئِهِم مَّا هُنَّ أُمَّهَـٰتِهِمْ ۖ إِنْ أُمَّهَـٰتُهُمْ إِلَّا ٱلَّـٰٓـِٔى وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنكَرًا مِّنَ ٱلْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ ﴿2﴾ وَٱلَّذِينَ يُظَـٰهِرُونَ مِن نِّسَآئِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا۟ فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مِّن قَبْلِ أَن يَتَمَآسَّا ۚ ذَٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِهِۦ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴿3﴾ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِن قَبْلِ أَن يَتَمَآسَّا ۖ فَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ فَإِطْعَامُ سِتِّينَ مِسْكِينًا ۚ ذَٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ ۗ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿4﴾

तुम में से जो लोग अपनी पत्नियों से ज़िहार कर बैठें, वे उनकी माताएँ नहीं बन जाती हैं। उनकी माताएँ तो वही हैं जिन्हों ने जिन्होंने उनको जन्म दिया है। अपितु, इस प्रकार के लोग बड़ी अनुचित और झूठी बात कहते हैं और सत्य यह है कि परमेश्वर (इस पर भी) बड़ा क्षमा करने वाला और पापकर्मों का नाश करने वाला है। (इन्हें बताओ कि) जो लोग अपनी पत्नियों से ज़िहार कर बैठें, फिर उसी बात की ओर पलटें जो उन्होंने कही थी तो एक दूसरे को हाथ लगाने से पहले एक ग़ुलाम आज़ाद किया जाएगा। यह बात है जिसका तुम्हें उपदेश किया जाता है और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे पूर्णतः परिचित है। फिर जिसके पास ग़ुलाम न हो, उसे निरंतर दो महीनों का उपवास रखना होगा, इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएं। और जिसमें यह हिम्मत न हो, वह (इससे पहले) साठ ग़रीबों को खाना खिलाएगा। यह इसलिए है कि तुम परमेश्वर और उसके रसूल को मानो, जिस प्रकार कि मानना चाहिए, और (जान लो कि) ये परमेश्वर की निर्धारित की हुई मर्यादाएँ हैं। (इनका उल्लंघन नकारने वाले ही तो करते हैं), और नकारने वालों के लिए बड़ा कष्टदायक दण्ड है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحَآدُّونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ كُبِتُوا۟ كَمَا كُبِتَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَقَدْ أَنزَلْنَآ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍ ۚ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ ﴿5﴾ يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ ٱللَّهُ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوٓا۟ ۚ أَحْصَىٰهُ ٱللَّهُ وَنَسُوهُ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ شَهِيدٌ ﴿6﴾

(यह परमेश्वर की इस दासी का आचरण था। इसके विपरीत) जो लोग परमेश्वर और उसके रसूल के विरुद्ध युद्ध कर रहे हैं, वे अपमानित होंगे, जिस प्रकार उनके पहले साथी अपमानित हुए। (इसके) अत्यंत स्पष्ट प्रमाण हमने (इस क़ुरआन में) उतार दिए हैं, और इन नकारने वालों के लिए बड़ी अपमानित करने वाली मार है। ये उस दिन को याद रखें, जब परमेश्वर इन सबको उठाएगा, फिर इनका प्रत्येक कर्म इनको बताएगा। परमेश्वर ने उसे गिन रखा है और ये उसे भुला बैठे हैं, और परमेश्वर हर चीज़ पर निरीक्षक है।

أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۖ مَا يَكُونُ مِن نَّجْوَىٰ ثَلَـٰثَةٍ إِلَّا هُوَ رَابِعُهُمْ وَلَا خَمْسَةٍ إِلَّا هُوَ سَادِسُهُمْ وَلَآ أَدْنَىٰ مِن ذَٰلِكَ وَلَآ أَكْثَرَ إِلَّا هُوَ مَعَهُمْ أَيْنَ مَا كَانُوا۟ ۖ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا۟ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ ﴿7﴾

तुमने विचार नहीं किया कि परमेश्वर धरती और समस्त आकाशों की हर चीज़ से परिचित है? कभी ऐसा नहीं होता कि तीन चोरी-छिपे बातचीत करें और उनमें चौथा परमेश्वर न हो। और पांच चोरी-छिपे बातचीत करें और उनमें छठा परमेश्वर न हो। वे इससे कम हों या अधिक, जहाँ भी हों, परमेश्वर उनके साथ होता है। फिर क़यामत के दिन वह इनका सब किया धरा इन्हें बता देगा। निस्संदेह, परमेश्वर हर चीज़ से परिचित है।

أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ نُهُوا۟ عَنِ ٱلنَّجْوَىٰ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُوا۟ عَنْهُ وَيَتَنَـٰجَوْنَ بِٱلْإِثْمِ وَٱلْعُدْوَٰنِ وَمَعْصِيَتِ ٱلرَّسُولِ وَإِذَا جَآءُوكَ حَيَّوْكَ بِمَا لَمْ يُحَيِّكَ بِهِ ٱللَّهُ وَيَقُولُونَ فِىٓ أَنفُسِهِمْ لَوْلَا يُعَذِّبُنَا ٱللَّهُ بِمَا نَقُولُ ۚ حَسْبُهُمْ جَهَنَّمُ يَصْلَوْنَهَا ۖ فَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ ﴿8﴾

तुमने देखा नहीं उन्हें जो चोरी-छिपे बातचीत से रोके गए, फिर वही करते हैं जिससे रोके गए? और (चोरी-छिपे बातचीत भी करते हैं तो हर बार) अधिकार हनन और अत्याचार और पैग़ंबर की अवज्ञा की बातचीत करते हैं। और (हे पैग़ंबर), जब तुम्हारे पास आते हैं तो तुम्हें ऐसे सलाम करते हैं, जैसे परमेश्वर ने तुम्हें सलाम नहीं किया है और अपने दिल में कहते हैं कि (यह पैग़ंबर हैं तो) परमेश्वर हमारी इन बातों पर हमें दंडित क्यों नहीं करता? इनके लिए नरक ही पर्याप्त है। ये उसमें पड़ेंगे और वह बड़ा ही बुरा ठिकाना है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا تَنَـٰجَيْتُمْ فَلَا تَتَنَـٰجَوْا۟ بِٱلْإِثْمِ وَٱلْعُدْوَٰنِ وَمَعْصِيَتِ ٱلرَّسُولِ وَتَنَـٰجَوْا۟ بِٱلْبِرِّ وَٱلتَّقْوَىٰ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ٱلَّذِىٓ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ ﴿9﴾

हे मानने वालो, जब आपस में गुप्त बातें करो तो अधिकार हनन, अत्याचार और पैग़ंबर की अवज्ञा की बातें न करो, अपितु भलाई और संयम की बातें करो और परमेश्वर से डरते रहो जिसके यहाँ तुम सब इकट्ठा किए जाओगे।

إِنَّمَا ٱلنَّجْوَىٰ مِنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ لِيَحْزُنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَلَيْسَ بِضَآرِّهِمْ شَيْـًٔا إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ ﴿10﴾

इस प्रकार की गुप्त बातें तो शैतान की ओर से हैं ताकि वह मानने वालों को दुखी कर दे, यद्यपि परमेश्वर की अनुमति के बिना वह उन्हें थोड़ी सी भी हानि नहीं पहुंचा सकता और मानने वालों को तो हर परिस्थिति में परमेश्वर ही पर भरोसा करना चाहिए।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا قِيلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوا۟ فِى ٱلْمَجَـٰلِسِ فَٱفْسَحُوا۟ يَفْسَحِ ٱللَّهُ لَكُمْ ۖ وَإِذَا قِيلَ ٱنشُزُوا۟ فَٱنشُزُوا۟ يَرْفَعِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنكُمْ وَٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ دَرَجَـٰتٍ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ ﴿11﴾

है मानने वालो, (यह इन्हीं गुप्त बातों के लिए जत्थे बना कर बैठते हैं, इसलिए) जब तुमसे कहा जाए कि पैग़ंबर की सभाओं में खुलकर बैठो तो खुलकर बैठो, परमेश्वर तुम्हारे लिए अच्छी परिस्थिति पैदा करेगा। और जब कहा जाए कि उठ जाओ तो उठ जाया करो, परमेश्वर उन लोगों के स्तर ऊँचे करेगा जो तुम में से मान चुके और जिन्हें ज्ञान दिया गया है, और (संतुष्ट रहो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अवगत है।

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا نَـٰجَيْتُمُ ٱلرَّسُولَ فَقَدِّمُوا۟ بَيْنَ يَدَىْ نَجْوَىٰكُمْ صَدَقَةً ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لَّكُمْ وَأَطْهَرُ ۚ فَإِن لَّمْ تَجِدُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ﴿12﴾

हे मानने वालो, (अब यह पाबंदी है कि) जब पैग़ंबर से अकेले में बात करो तो अपनी इस अकेले की बात से पहले कुछ दान करो। यह तुम्हारे लिए अच्छा भी है और अधिक पवित्र भी। अपितु, सामर्थ्य न हो तो परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

ءَأَشْفَقْتُمْ أَن تُقَدِّمُوا۟ بَيْنَ يَدَىْ نَجْوَىٰكُمْ صَدَقَـٰتٍ ۚ فَإِذْ لَمْ تَفْعَلُوا۟ وَتَابَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمْ فَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ ۚ وَٱللَّهُ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ ﴿13﴾

क्या तुम डर गए कि अपनी अकेले की बातचीत से पहले तुम्हें दान करना होगा? सो जब तुमने ऐसा नहीं किया और परमेश्वर ने तुम पर दया की कि यह निर्देश उठा लिया तो अब नमाज़ का प्रबंध रखो और ज़कात देते रहो और परमेश्वर और उसके रसूल के आज्ञा-पालन पर जमे रहो, और (याद रखो कि) परमेश्वर तुम्हारे प्रत्येक कार्य से परिचित है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात इस बात से डर गए कि अवश्य कोई ग़लती हुई है, जिसके कारण परमेश्वर ने यह पाबंदी लगाई है। ↩
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ تَوَلَّوْا۟ قَوْمًا غَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِم مَّا هُم مِّنكُمْ وَلَا مِنْهُمْ وَيَحْلِفُونَ عَلَى ٱلْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ﴿14﴾ أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ إِنَّهُمْ سَآءَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿15﴾ ٱتَّخَذُوٓا۟ أَيْمَـٰنَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ ﴿16﴾

तुमने देखा नहीं उन्हें जो उन लोगों से दोस्ती रखते हैं जिन पर परमेश्वर का प्रकोप हुआ है? वे न तुम में से हैं, न उनमें से, और जानबूझकर अपने इस झूठ पर (कि तुम्हारे साथ हैं) शपथ पर शपथ खाते हैं। परमेश्वर ने उनके लिए एक कठोर दण्ड तैयार कर रखा है। निस्संदेह, बहुत बुरा है जो कुछ वे कर रहे हैं। अपनी क़समों को उन्होंने ढाल बना लिया है। अतः परमेश्वर के मार्ग से रुक गए हैं। सो उनके लिए बड़ा अपमानित करने वाला दण्ड है।

لَّن تُغْنِىَ عَنْهُمْ أَمْوَٰلُهُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُهُم مِّنَ ٱللَّهِ شَيْـًٔا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ ﴿17﴾ يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ ٱللَّهُ جَمِيعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُۥ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ ۖ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ عَلَىٰ شَىْءٍ ۚ أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلْكَـٰذِبُونَ ﴿18﴾ ٱسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ فَأَنسَىٰهُمْ ذِكْرَ ٱللَّهِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ حِزْبُ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ أَلَآ إِنَّ حِزْبَ ٱلشَّيْطَـٰنِ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ ﴿19﴾

परमेश्वर के इस दण्ड से उन्हें बचाने के लिए न उनका धन कोई काम आएगा, न उनकी सन्तान। वे नरक के लोग हैं, सदा उसमें रहेंगे। उस दिन, जब परमेश्वर इन सब को उठाएगा तो उसके सामने भी इसी प्रकार शपथ पर शपथ खाएंगे, जिस प्रकार तुम्हारे सामने खाते हैं, और सोचेंगे कि उनका भी कोई आधार है। सुनो, वास्तव में वही झूठे हैं। उनपर शैतान प्रभावी हो गया है और परमेश्वर की याद उन्हें भुला दी है। वे शैतान का जत्था हैं। सुनो, शैतान का यह जत्था ही असफल होने वाला है।

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحَآدُّونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ٱلْأَذَلِّينَ ﴿20﴾ كَتَبَ ٱللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا۠ وَرُسُلِىٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ قَوِىٌّ عَزِيزٌ ﴿21﴾

(तुम्हें जानना चाहिए कि) जो परमेश्वर और उसके रसूल से शत्रुता करेंगे, वही सब से बढ़कर अपमानित हो कर रहेंगे। इसलिए कि परमेश्वर ने लिख दिया है कि मैं और मेरे रसूल विजयी हो कर रहेंगे। सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ा शक्तिशाली और बड़ा प्रबल है।

لَّا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ يُوَآدُّونَ مَنْ حَآدَّ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَلَوْ كَانُوٓا۟ ءَابَآءَهُمْ أَوْ أَبْنَآءَهُمْ أَوْ إِخْوَٰنَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ كَتَبَ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلْإِيمَـٰنَ وَأَيَّدَهُم بِرُوحٍ مِّنْهُ ۖ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّـٰتٍ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ رَضِىَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا۟ عَنْهُ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ حِزْبُ ٱللَّهِ ۚ أَلَآ إِنَّ حِزْبَ ٱللَّهِ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ ﴿22﴾

तुम कभी नहीं देखोगे कि जो लोग परमेश्वर को और क़यामत के दिन को वास्तव में मानते हैं, वे उन लोगों से मित्रता रखें जो परमेश्वर और उसके रसूल के शत्रु हो गए हों, यद्यपि वे उनके पिता हों या बेटे या उनके भाई या परिवार के अन्य सदस्य । यही लोग हैं जिनके दिलों में परमेश्वर ने ईमान अंकित कर दिया है और अपने एक विशेष उपकार से उनकी सहायता की है। और (क़यामत के दिन) वह उन्हें ऐसे बाग़ों में परवेश देगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। वे उनमें सदा रहेंगे। परमेश्वर उनसे प्रसन्न हुआ और वे परमेश्वर से प्रसन्न हुए। वह परमेश्वर का संघ हैं। सुनो, परमेश्वर का संघ ही सफलता पाने वाला है।