सूरह 57
अल्-हदीद
मदनी · 29 आयतें · 14 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में जिस सशस्त्र संघर्ष (जिहाद) और दान (इन्फ़ाक़) के लिए प्रोत्साहित किया गया है, दूसरी सूरह में उसी के विरुद्ध प्रचार करने वाले ढोंगियों (मुनाफ़िक़ों) को उनके आचारण पर कड़ी चेतावनी दी गई है। दोनों सूरतों का संबोधन मुसलमानों से है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) के चरण में अवतरित हुई हैं।
पहली सूरह—अल्-हदीद—का विषय मुसलमानों को अग्रगामी (साबिक़ीन अव्वलीन) के स्तर तक पहुँचने के लिए जिहाद और इन्फ़ाक़ की प्रेरणा देना और उन लोगों को चेतावनी व उपदेश करना है, जो ईमान की मांगों से पूरी तरह अवगत न होने के कारण इस्लाम की इन मांगों को पूरा करने से बच रहे थे।
दूसरी सूरह—अल्-मुजादलह—का विषय ईमान व इस्लाम के आवश्यक तत्वों को स्पष्ट करना, मुनाफ़िक़ों को कड़ी चेतावनी और फटकार देना, और उनके उस दुष्प्रचार को रोकना है जो वे मुसलमानों की आस्थाओं को डगमगाने और उनके जिहाद के जोश को ठंडा करने के लिए कर रहे थे।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
धरती और समस्त आकाशों की हर चीज़ ने परमेश्वर का गुणगान किया है और वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है। धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य उसी का है। वही जीवित करता और वही मारता है और वह प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है। वही आदि भी है और अंत भी, और व्यक्त भी है और अव्यक्त भी, और वह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है।1
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- यह परमेश्वर के ज्ञान की व्यापकता का वर्णन है। मतलब यह है कि उसका ज्ञान दिक् और काल (space and time) की सीमाओं से परे है, वह आदि, अंत और अंदर-बाहर, हर चीज़ को घेरे हुए है। ↩
वही है जिसने धरती और समस्त आकाशों को छः दिन में पैदा किया और फिर (उनकी व्यवस्था चलाने के लिए) सिंहासन पर विराजमान हुआ। वह जानता है जो कुछ धरती में जाता है और जो कुछ उस से निकलता है, और जो कुछ आकाश से उतरता है और जो कुछ उसमें चढ़ता है, और जहाँ तुम होते हो, वह तुम्हारे साथ होता है, और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देखता है। धरती और समस्त आकाशों का साम्राज्य उसी का है और सभी मामले परमेश्वर ही की ओर लौटाए जाते हैं। वही रात को दिन में और दिन को रात में प्रवेश करता है और वह दिलों के भेद तक जानता है।
(इसलिए तुम भी परमेश्वर का गुणगान करो और) परमेश्वर और उसके रसूल को सच में मान लो और जो चीज़ें परमेश्वर ने तुम्हें सौंपी हैं, उनमें से दान करो। अतः तुम में से जो इस प्रकार मान चुके और उन्होंने (परमेश्वर के मार्ग में) दान किया है, उनके लिए महान प्रतिफल है। और तुम्हें क्या हो गया है कि परमेश्वर को सच में नहीं मानते हो, यद्यपि रसूल तुम्हें तुम्हारे प्रभु को मानने का निमंत्रण दे रहा है और वह तुमसे (सुनने और आज्ञा-पालन का) दृढ़ वचन भी ले चुका है, यदि तुम वास्तव में मानते हो?
वही है जो अपने भक्तों पर यह प्रकाशमान आयतें उतार रहा है ताकि तुम्हें अँधेरों से निकालकर प्रकाश में ले आए, और सत्य यह है कि परमेश्वर तुम पर अत्यंत कृपालु और अत्यंत दयालु है। तुम्हें क्या हुआ है कि तुम परमेश्वर के मार्ग में दान न करो, यद्यपि धरती और समस्त आकाशों की धरोहर, सब परमेश्वर ही को लौटने वाली है? (तुम पर स्पष्ट होना चाहिए कि) तुम में से जो लोग विजय के बाद दान करेंगे और (सत्य के मार्ग में) लड़ेंगे, वे कभी उन लोगों के बराबर नहीं होंगे जिन्होंने विजय से पहले दान किया और (सत्य के मार्ग में) लड़े। उनका स्तर निस्संदेह उन लोगों से बड़ा होगा जो इसके बाद दान करेंगे, यद्यपि परमेश्वर का वचन दोनों ही से अच्छा है। (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उस से भलीभांति अवगत है।1
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- यह मक्का शहर पर विजय का वर्णन है। ↩
अब कौन हैं जो परमेश्वर को क़र्ज़ दे, अच्छा क़र्ज़ ताकि वह उसके लिए उसे (जिस प्रकार चाहे) बढ़ाए और उसके लिए सम्मानित प्रतिफल हो, उस दिन, जबकि तुम मोमिन पुरुषों और स्त्रियों को देखोगे कि उनका प्रकाश उनके आगे और उनके दाएँ चल रहा है — आज तुम्हारे लिए शुभ समाचार है इन बाग़ों का जिनके नीचे नहरें बह रही हैं, इनमें सदा रहोगे। यही वास्तव में बड़ी सफलता है। जिस दिन कपटी पुरुष और कपटी स्त्रियाँ मानने वालों को पुकारेंगे कि देखो, हम पर भी कृपा करो कि तुम्हारे प्रकाश से हम भी कुछ लाभ उठा लें, परंतु उनसे कहा जाएगा: (नहीं), तुम पीछे की ओर लौट जाओ और (वहीं अपने लिए) प्रकाश की खोज करो। फिर उनके और मानने वालों के बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी जिसमें एक द्वार होगा। उसके अंदर दया होगी और बाहर की ओर यातना। ये उनसे प्रार्थना करेंगे: क्या (दुनिया में) हम तुम्हारे साथ नहीं थे? वे उत्तर देंगे कि निस्संदेह साथ तो थे, परंतु तुमने अपने आप को उद्दंडता में डाले रखा, हमारे लिए समय के बदलने की प्रतीक्षा में रहे, संदेहों में पड़े रहे और तुम्हारी इच्छाएँ तुम्हें धोका देती रहीं, यहाँ तक कि परमेश्वर का निर्णय व्यक्त हो गया और वह महा-कपटी अंतिम समय तक तुम्हें परमेश्वर के विषय में धोका ही देता रहा। इसलिए आज न तुमसे कोई फ़िद्या स्वीकार होगा और न उन लोगों से जिन्होंने स्पष्ट कुफ़्र किया था। तुम सबका ठिकाना नरक है, वही तुम्हारे लौटने की जगह है और वह कैसा बुरा ठिकाना है!1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात शैतान। ↩
क्या इन लोगों के लिए जो मानने का दावा करते हैं, अभी वह समय नहीं आया कि इनके दिल परमेश्वर के उपदेश के आगे और उस सत्य के आगे झुक जाएं जो (उसकी ओर से) उतरा हुआ है और उन लोगों के जैसे न हो जाएं जिनको इससे पहले धर्मग्रंथ दिया गया, फिर उनपर लंबा समय बीत गया, यहाँ तक कि उनके दिल कठोर हो गए और (आज) उनमें से कितने ही अवज्ञाकारी बने हुए हैं?
(तुम आगे बढ़ो, हो सकता है परमेश्वर तुम्हारे दिल पिघला दे)! जान लो कि परमेश्वर धरती को उसके मुर्दा हो जाने के बाद भी जीवित कर देता है। अपनी आयतें हमने तुम्हारे लिए स्पष्ट कर दी हैं ताकि तुम समझ से काम लो।
(जान लो कि) परमेश्वर के मार्ग में दान करने वाले पुरुष और स्त्रियाँ और जिन्होंने परमेश्वर को क़र्ज़ दिया है, अच्छा क़र्ज़, उनका दिया हुआ उनके लिए कई गुना बढ़ाया जाएगा और उनके लिए सम्मानदायक प्रतिफल है और जिन्होंने परमेश्वर और उसके रसूलों को पूरी सच्चाई के साथ माना है, वही अपने प्रभु के निकट सिद्दीक़ और शहीद होंगे। उनके लिए उनका अच्छा फल है और उनका प्रकाश भी। और जो नकारने वाले हैं और उन्होंने हमारी आयतों को झूठा कह दिया है, वही नरक के लोग हैं।
(तुम इस ख़र्चे से जी न चुराओ और) जान लो कि दुनिया के जीवन, अर्थात खेल-तमाशा, बनाव-सिंगार और धन व संतान के मामले में आपस में एक दूसरे पर गर्व करने और एक दूसरे से आगे बढ़ने की दौड़-धूप करने की मिसाल उस बारिश की है जिसकी उगाई हुई खेती इन नकारने वालों के दिल लुभाए, फिर ज़ोर पर आए और तुम देखो कि वह पीली हो गई है, फिर (कोई आपदा आए और) तिनका-तिनका हो जाए। (जान लो कि) परलोक में (इसके बाद) कठोर दण्ड है और परमेश्वर की ओर से क्षमा और उसकी प्रसन्नता भी। सत्य यह है कि दुनिया का यह जीवन तो धोखे की सामग्री के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
(इसलिए) दौड़ो और अपने प्रभु की क्षमा और उस स्वर्ग की ओर एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करो, जिसका फैलाव धरती और आकाश जैसा है। उन लोगों के लिए तैयार किया गया है जो परमेश्वर और उसके रसूलों पर सच्चा विश्वास रखते हैं। यह परमेश्वर का अनुग्रह है, जिसको चाहेगा प्रदान करेगा, और परमेश्वर बड़े अनुग्रह वाला है।
(ये इसलिए दान नहीं करते कि कोई विपदा आ पड़ी तो क्या बनेगा? याद रखो), ऐसी कोई विपदा नहीं जो तुम्हें धरती में और तुम्हारे अस्तित्व में लग जाती हो और हमने उसको पैदा करने से पहले एक पुस्तक में लिख न दिया हो। यह परमेश्वर के लिए अत्यंत सरल है। यह बात तुम्हें इसलिए समझा दी है कि जो हाथ से जाता है, उस पर दुखी न हो और जो परमेश्वर ने तुमको दिया है, उस पर इतराओ नहीं और (याद रखो कि) परमेश्वर उन लोगों को कुछ भी प्रिय नहीं रखता जो अपने आप को बड़ी चीज़ समझते और गर्व दिखाते हैं, स्वयं भी कंजूसी करते और दूसरों को भी कंजूसी की प्रेरणा देते हैं। और जो (इस चेतावनी के बाद भी) आज्ञा-उल्लंघन करें तो उनकी कुछ परवाह नहीं, इसलिए कि परमेश्वर निःस्पृह और उत्तम गुणों वाला है।
(ये जिहाद पर आपत्ति करते हैं। इन्हें बताओ कि) हमने अपने रसूलों को शुद्ध और स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा है और उनके साथ अपना धर्मग्रंथ, अर्थात मापदण्ड उतारा है ताकि लोग (सत्य-असत्य के विषय में) ठीक न्याय पर खड़े हो जाएं, और लोहा उतारा जिसमें बड़ी शक्ति है और लोगों के लिए दूसरे लाभ भी हैं, इसलिए कि वे उससे लाभ उठाएं और इसलिए कि (रसूलों की ओर से सत्य निर्णायक रूप से स्पष्ट होने के बाद उन नकारने वालों को इसके माध्यम से दण्ड दिया जाए और इस प्रकार) परमेश्वर उन लोगों को अलग कर ले जो उस को देखे बिना उसकी और उसके रसूलों की सहायता करते हैं। (अन्यथा) कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर बड़ा शक्तिशाली है, वह बड़ा प्रबल है।
और नूह और इब्राहीम को भी हमने (इसी उद्देश्य से) रसूल बनाकर भेजा था और इन दोनों की संतान में नुबुव्वत जारी की और उन्हें धर्मग्रंथ को प्राप्त करने वाला बनाया था। अतः उनमें से कुछ ने उचित मार्ग अपनाया और अधिकांश अवज्ञाकारी बन गए। फिर उन्हीं के पीछे-पीछे हमने अपने और रसूल भेजे और मर्यम-पुत्र ईसा को भी उन्हीं के मार्ग पर भेजा और उसे इंजील प्रदान की और उसके अनुयायियों के दिलों में करुणा और दया ड़ाल दी, किंतु वैराग्य का उनहोंने स्वयं आविष्कार कर लिया। हमने उसे उनपर अनिवार्य नहीं किया था। अपितु, यह बात आवश्यक ठहरायी थी कि वे परमेश्वर की प्रसन्नता चाहें। अतः उन्होंने उसकी मर्यादा का, जिस प्रकार कि चाहिए था, ध्यान नहीं रखा। फिर भी उनमें से जो लोग ईमान पर जमे रहे, उनका फल हमने उन्हें प्रदान कर दिया, परंतु उनमें से अधिकांश अवज्ञाकारी ही निकले।1
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- अर्थात परमेश्वर की प्रसन्नता की मर्यादा। ↩
हे मानने वालो, परमेश्वर से डरो और उसके रसूल को मानो जिस प्रकार मानना चाहिए, परमेश्वर तुम्हें अपनी दया से दोहरा हिस्सा प्रदान करेगा और तुम्हारे लिए वह प्रकाश उपलब्ध करेगा जिसको लेकर तुम (क़यामत में) चलोगे और तुम्हें क्षमा करेगा। परमेश्वर बड़ा क्षमा करने वाला और बड़ा दयावान है। (उसकी दया के लिए पहल करो) ताकि ये अहल-ए-किताब न जानें कि परमेश्वर के अनुग्रह पर उनका कोई एकाधिकार नहीं है और यह कि परमेश्वर का अनुग्रह उसके अपने ही हाथ में है, वह जिसको चाहता है, प्रदान करता है, और परमेश्वर बड़े अनुग्रह वाला है।1
टिप्पणियाँ 1
- मतलब यह है कि इनके लिए अच्छा यही है कि इसी अज्ञानता में पड़े रहें, इससे निकलने की कोई परिस्थिति इनके लिए पैदा न हो और इसके नतीजे में अपनी इस अज्ञानता के परिणाम एक दिन भुगत लें। ↩