सूरह 59
अल्-हश्र
मदनी · 24 आयतें · 15 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में ढोंगियों (मुनाफ़िक़ों) को उन यहूदियों के अंत से सीख लेने का उपदेश किया है जिन्हें वे उकसा रहे थ, और दूसरी सूरह में कमज़ोर मुसलमानों को उन मुश्रिकों के साथ संबंध रखने के परिणामों से सावधान किया है जो परमेश्वर और रसूल के शत्रु बनकर उठ खड़े हुए थे। दोनों सूरतों में संबोधन इस्लाम को मानने का दावा करने वालों से है और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मदीना में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के शुद्धिकरण (तज़्कियह) और परिष्करण (तत्हीर) के चरण में अवतरित हुई हैं।12
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- मुश्रिक: परमेशर के साझीदार मानने वाले। ↩
- तज़्कियह और तत्हीर के शब्द ग़ामिदी साहब द्वारा समान अर्थों में ज्ञान और क्रिया से संबन्धित चीज़ों के शुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त किए गए हैं; तत्हीर शब्द का एक अतिरिक्त अर्थ होता है वर्गीकरण या मानने वालों को नकारने वालों और ढोंगियों से अलग करना। जहां भी यह अतिरिक्त अर्थ अभिप्राय होता है, वहां ग़ामिदी साहब ने इसे सूरह की व्याख्या में स्पष्ट किया है। [अनुवादक] ↩
पहली सूरह—अल्-हश्र—का विषय मुनाफ़िक़ों को चेतावनी देना है कि यदि वे आँखें रखते हों तो उन लोगों के अंत से कुछ सीख लें जिन्हें वे अजेय समझ रहे थे, क़ुरआन के आह्वान का साथ दें और परमेश्वर के दंड से डरें।
दूसरी सूरह—अल्-मुम्तहिनह—का विषय उन मुसलमानों को ईमान व इस्लाम की मांगों को समझाना है जो मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) कर के तो आ गए थे, परंतु हिज्रत की सच्चाई अभी उनपर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई थी। इसलिए, परीक्षा की घड़ियों में उनसे ऐसी त्रुटियाँ सामने आ जाती थीं जो उन्हें मुनाफ़िक़ों के समीप ले जाती थीं।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
धरती और समस्त आकाशों की हर चीज़ ने परमेश्वर का गुणगान किया है और वही प्रभावी और प्रज्ञावान है। वही है जिसने अहल-ए-किताब के नकारने वालों को पहली दुर्गति के लिए उनके घरों से निकाल बाहर किया है। तुमने कभी सोचा न था कि वे कभी (इस प्रकार) निकलेंगे और वे भी यही समझते थे कि उनके क़िले उन्हें परमेश्वर के दण्ड से बचा लेंगे। परंतु परमेश्वर उनपर वहां से आ पहुंचा, जहाँ से उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था और उनके दिलों में धाक डाल दी। वे अपने घर अपने हाथों से उजाड़ रहे थे और मुसलमानों के हाथों से भी। तो सीख प्राप्त करो, हे आँखें रखने वालो!1
टिप्पणियाँ 1
- यह ‘बनू-नज़ीर’ के यहूदियों के विस्थापन का वर्णन है, जिनकी बस्ती मदीना के पास थी। ↩
और यदि परमेश्वर ने उनके लिए (इसी प्रकार) जगह-जगह से उजड़ने का दण्ड न लिख दिया होता तो वह उन्हें दुनिया ही में यातना दे डालता और क़यामत में तो उनके लिए नरक की यातना है ही। यह सब इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर और उसके रसूल का विरोध करने का प्रयास किया है और जो परमेश्वर का विरोध करें, वे इसी अंत को पहुंचते हैं, इसलिए कि परमेश्वर कठोर दण्ड देने वाला है।
(इन्हें आपत्ति है तो चिंता न करो, इसलिए कि) खजूरों के जो पेड़ (इन पर आक्रमण के समय) तुमने काट दिए या जिनको उनकी जड़ों पर खड़ा रहने दिया तो यह परमेश्वर की अनुमति से हुआ, और इसलिए हुआ कि वह इन अवज्ञाकारियों को अपमानित कर दे।
और (ढोंगी लोग पूछते हैं तो उन्हें बताओ कि) जो संपत्तियां परमेश्वर ने इन यहूदियों की ओर से अपने रसूल की ओर पलटा दीं तो उनपर तुमने घोड़े और ऊंट नहीं दौड़ाए (कि उनपर तुम्हारा कोई अधिकार सिद्ध हो), अपितु परमेश्वर है जो अपने रसूलों को जिन पर चाहता है, विजय प्रदान करता है, और परमेश्वर प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है। (इसलिए) इन बस्तियों के लोगों से परमेश्वर जो कुछ अपने रसूल की ओर पलटाए, वह परमेश्वर और रसूल और परिवार वालों और अनाथों और यात्रियों के लिए अलग रहेगा ताकि वह तुम्हारे समृद्धि लोगों ही में चक्कर न काटता रहे। और रसूल (का स्थान यही है कि) जो तुम्हें दे, वह ले लो और जिस चीज़ से रोके, उससे रुक जाओ और परमेश्वर से डरते रहो, निस्संदेह, परमेश्वर बड़ा कठोर दण्ड देने वाला है। फिर यह विशेष रूप से उन ग़रीब प्रवासियों के लिए है जो अपने घरों और संपत्तियों से निकाल बाहर किए गए हैं। यह परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी प्रसन्नता चाहते हुए और परमेश्वर और उसके रसूल का समर्थन करते हुए आए हैं। यही सत्यवादी हैं।
(इन ढोंगियों के विपरीत) जो लोग इस इलाके को इनसे पहले ठिकाना बनाए हुए और अपना ईमान पक्का किए हुए हैं, वे उन लोगों से प्रेम करते हैं जो (उनके बाद अब) प्रवास करके उनकी ओर आ रहे हैं और जो कुछ इन प्रवासियों को दिया जा रहा है, उससे अपने दिलों में कोई खटक महसूस नहीं करते और उन्हें अपने ऊपर प्राथमिकता देते हैं, चाहे अपनी जगह स्वयं ग़रीब हों । सत्य यह है कि जो स्वार्थी होने से से बचा लिए जाएं, वही सफलता पाने वाले हैं।
और ये जो उनके बाद आए हैं, वे भी यही प्रार्थना करते हैं कि प्रभु, हमें और हमारे उन भाइयों को क्षमा कर दे जो मानने में हमसे आगे निकल गए और इन मानने वालों के लिए हमारे दिलों में कोई बैर पैदा न होने दे। प्रभु, तू बड़ा दयालु है, तेरी कृपा शाश्वत है।
क्या तुमने देखे नहीं वे लोग जो छल-कपट में पड़े हैं? वे अपने उन अहल-ए-किताब भाइयों से कहते हैं जो (पैग़ंबर के) नकारने वाले हैं (और बचे रह गए हैं): तुम्हें निकाला गया तो हम भी अवश्य तुम्हारे साथ निकलेंगे और तुम्हारे विषय में हम किसी की बात कभी नहीं मानेंगे और तुमसे युद्ध किया गया तो अवश्य तुम्हारी सहायता करेंगे। परंतु परमेश्वर गवाही देता है कि ये पूर्णतः झूठे हैं। वे निकाले गए तो ये कदापि उनके साथ नहीं निकलेंगे और उनसे युद्ध किया गया तो ये कदापि उनकी सहायता नहीं करेंगे और मान लो करेंगे तो अवश्य पीठ दिखाएंगे, फिर कहीं से कोई सहायता नहीं पाएंगे।1
टिप्पणियाँ 1
- इससे तात्पर्य यहूदी कबीला ‘बनू-क़ुरैज़ह’ है। ↩
इनके दिलों में परमेश्वर से बढ़कर तुम्हारी धाक है, इसलिए कि ये ऐसे लोग हैं जो समझ नहीं रखते। ये कभी इकट्ठे होकर (मैदान में) तुम्हारा सामना नहीं करेंगे, अपितु क़िले में शरण लेने वाली बस्तियों में बैठ कर या दीवारों के पीछे छिपकर लड़ेंगे। इनकी आपस में बड़ी शत्रुता है। तुम इन्हें इकट्ठा समझते हो, यद्यपि इनके दिल बटे हुए हैं। इनकी यह दशा इसलिए है कि ये बुद्धि से काम नहीं लेते।
(ये जिनको भड़का रहे हैं), उनके साथ भी वही होगा जो इनसे पूर्व के लोगों के साथ हुआ है, जो अभी थोड़ा पहले अपने किए का स्वाद चख चुके हैं और आगे उनके लिए एक कष्टदायक यातना है। ये पूर्णतः शैतान के जैसे हैं कि वह मनुष्य से कहता है कि नकारने वाला हो जा और जब वह नकारने वाला हो जाता है तो कहता है कि मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं है, मैं तो समस्त लोकों के परमेश्वर से डरता हूँ। सो, दोनों का अंत यह है कि दोनों नरक में जाएँगे कि सदा उसी में रहें, और दुष्टों का यही फल है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात ‘बनू-नज़ीर’ के साथ, जिनका वर्णन ऊपर हो चुका है। ↩
मानने का दावा रखने वालो, परमेश्वर से डरो और (तुम में से) प्रत्येक व्यक्ति देखे कि उसने कल के लिए क्या तैयारी की है। (इसे देखो) और परमेश्वर से डरते रहो। निस्संदेह परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम करते हो। तुम उन लोगों के जैसे न हो जाओ जो परमेश्वर को भूल गए और परमेश्वर ने स्वयं उनको उन्हें भुला दिया। सत्य यह है कि यही अवज्ञाकारी हैं।
(इस बात को समझो कि) नरक में जाने वाले और स्वर्ग में जाने वाले कभी एक समान नहीं होंगे। यह केवल स्वर्ग में जाने वाले हैं जो सफल होंगे।
(इनके दिल पत्थरों से भी अधिक कठोर हैं, अन्यथा सत्य यह है कि) यदि इस क़ुरआन को हम किसी पर्वत पर उतार देते तो तुम देखते कि वह परमेश्वर के भय से दब जाता, फट जाता। यह उदाहरण हम लोगों को इसलिए सुनाते हैं ताकि वे विचार करें।
(वे हमेशा याद रखें कि) वही परमेश्वर है जिसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, परोक्ष और प्रत्यक्ष का जानने वाला, वह सर्वथा दया है, उसकी कृपा शाश्वत है।
वही परमेश्वर है जिसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं, सम्राट, वह दोषरहित सत्ता, सर्वथा शांति, अमन देने वाला, रखवाला, प्रभावी, बड़ा शक्तिशाली, बड़ाई का स्वामी। ऊँचा है परमेश्वर उनसे जो ये सहभागी बताते हैं।
वही परमेश्वर है नक्शा बनाने वाला, अस्तित्व में लाने वाला, आकार देने वाला। सब अच्छे नाम उसी के हैं। धरती और समस्त आकाशों की सब चीज़ें उसका गुणगान करती हैं और वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।