सूरह 53
अन्-नज्म्
मक्की · 62 आयतें · 10 अनुच्छेद
इस सूरह के जोड़े का परिचय
इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
तारे साक्षी हैं, जब वे गिरते हैं कि तुम्हारा साथी न भटका है, न बहका है। वह अपनी इच्छा से नहीं बोलता, यह (क़ुरआन) तो एक वह्य है जो उसे की जाती है। उसको तो एक प्रबल शक्तियों वाले ने शिक्षा दी है जो बड़ा उच्च चरित्र वाला, बड़ा प्रज्ञावान है। अतः वह प्रकट हुआ, इस प्रकार कि वह आकाश के ऊँचे किनारे पर था। फिर पास हुआ और झुक पड़ा, यहाँ तक कि दो कमानों के बराबर या उससे कुछ कम दूरी रह गई। फिर परमेश्वर ने वह्य की अपने भक्त की ओर जो वह्य की। जो कुछ उसने देखा, वह दिल का भ्रम न था। अब क्या तुम उस चीज़ पर उससे झगड़ते हो जो वह आंखों से देख रहा है?
और उसने एक बार फिर उसे सिद्रत्-उल्-मुंतहा के पास उतरते देखा है, जिसके पास ही जन्नत्-उल्-मावा है, जब सिद्रा पर छा रहा था जो कुछ छा रहा था। उसकी दृष्टि न बहकी, न असंतुलित हुई। उसने अपने प्रभु की बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखी हैं।
(इसके विपरीत जो कुछ तुम मानते हो, उसका आधार क्या है)? भला बताओ, तुमने इस 'लात' और 'उज़्ज़ा' और तीसरी, किंतु दूसरे स्तर की 'मनात' की वास्तविकता पर कभी विचार भी किया है? (तुम इन्हें परमेश्वर की बेटियाँ कहते हो। दोषरहित है परमेश्वर), तुम्हारे लिए बेटे हैं और उसके लिए बेटियाँ? फिर तो यह बड़ा भोंड़ा विभाजन हुआ। नहीं, ये केवल नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने रख लिए हैं, इनके पक्ष में परमेश्वर ने कोई प्रमाण नहीं उतारा। (इनकी मूर्खता पर धिक्कार), ये केवल भ्रम और कल्पनाओं और अपने मन की इच्छाओं के अनुयायी हैं, यद्यपि इनके पास इनके प्रभु की ओर से अत्यंत स्पष्ट प्रमाण आ चुके हैं।
(ये अपनी इच्छा से जो चाहें बना लें, किंतु) क्या एक व्यक्ति वह सब कुछ पा लेगा जो उसने चाहा? (कदापि नहीं), अतः (याद रखें कि) यह लोक और परलोक, सब परमेश्वर ही के आधिपत्य में है, (उसके नियम किसी की इच्छा से नहीं बदलते)। और (इनके उपास्य-देवताओं की क्या बात), समस्त आकाशों में कितने ही फ़रिश्ते हैं जिनकी अनुशंसा कुछ भी काम नहीं आ सकेगी, किंतु जब परमेश्वर अनुमति दे जिसको चाहे और जिसके लिए चाहे।
जो परलोक को नहीं मानते, वही फ़रिश्तों के नाम स्त्रियों के नाम पर रखते हैं, यद्यपि उन्हें इस विषय का कोई ज्ञान नहीं है, वे केवल कल्पना के पीछे चल रहे हैं, और कल्पना सत्य के स्थान पर कुछ भी काम नहीं दे सकती। इसलिए, (हे पैग़ंबर), उनकी ओर ध्यान न दो जिन्होंने हमारे उपदेश की ओर ध्यान नहीं दिया है और दुनिया के जीवन के अतिरिक्त जिन्हें किसी चीज़ की अपेक्षा नहीं है। उनकी विद्वत्ता इतनी ही है। (उनको अब उनकी दशा में छोड़ो), इसमें संदेह नहीं कि तेरा प्रभु भलीभांति जानता है कि उसके मार्ग से कौन भटक गया है और वह उनको भी भलीभांति जानता है जो (उसके) मार्ग पर हैं।
धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, परमेश्वर ही के अधिकार में है। इसका परिणाम यही निकलेगा कि बुराई करने वालों को वह उनके कर्म का दण्ड दे और उन लोगों को अच्छा फल दे जिन्होंने अच्छे कर्म किए, जो बड़े पापकर्मों और स्पष्ट निर्लज्जता से बचे रहे, किंतु यह कि कभी कुछ दूषित हो गए। (वह उन्हें क्षमा कर देगा), तेरे प्रभु की क्षमा का आँचल निस्संदेह बहुत व्यापक है। (आदम के बेटो, तुम अपने आप को बड़ी चीज़ समझते हो)? सत्य यह है कि वह तुम्हें उस समय से जानता है, जब उसने तुम्हें (सीधे तौर पर) धरती से उठाया और जब तुम अपनी माओं के पेट में अभी भ्रूण मात्र थे। तो अपनी पवित्रता के दावे न करो। (तुम्हारे लिए पुण्यशीलता ही सम्मानजनक है और) जिन्होंने पुण्यशीलता अपनाई है, उन्हें वह भलीभांति जानता है।
(ये बड़ी भ्रांति में लिप्त हैं), तो क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा है जिसने मुँह फेर लिया और (परमेश्वर की दी हुई जीविका में से) थोड़ा सा देकर रुक गया? (वह समझता है कि परलोक में भी उच्च दशा होगी)। क्या उसके पास परोक्ष का ज्ञान है कि वह (अपनी दशाओं को) देख रहा है? क्या उसे उन बातों की सूचना नहीं पहुंची जो मूसा के शास्त्रों में हैं और इब्राहीम के शास्त्रों में भी, जिसने निष्ठा का दायित्व पूरा कर दिया? यह कि कोई प्राणी किसी अन्य का बोझ नहीं उठाएगा और यह कि मनुष्य को परलोक में वही मिलेगा जो उसने दुनिया में कमाया है और यह कि जो कुछ उसने कमाया है, वह शीघ्र ही देखा जाएगा, फिर उसको पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा और यह कि अंत में पहुंचना तुम्हारे प्रभु ही के पास है।
और (इसके अतिरिक्त) यह कि वही हंसाता और वही रुलाता है और यह कि वही मृत्यु देता और वही जीवित करता है, और यह कि पानी की एक बूंद से जब वह टपका दी जाती है, वही पुरुष और स्त्री का जोड़ा पैदा करता है, और यह कि उसी के ऊपर है पुनः जीवित करना, और यह कि वही संपन्न करता और धनवान बनाता है, और यह कि वही लुब्धक तारे का प्रभु है।1
टिप्पणियाँ 1
- पैग़ंबर मूसा (अ) और पैग़ंबर इब्राहीम (अ) के धर्मग्रन्थों का उल्लेख पिछली आयत पर समाप्त हुआ। यहाँ से आगे अब क़ुरआन की सामान्य शैली के अनुसार बात आगे बढ़ती है। ↩
और यह कि प्रथम-आद को उसी ने नष्ट किया और समूद को भी, फिर किसी को बाक़ी नहीं छोड़ा। और इनसे पहले नूह की क़ौम को भी, इसलिए कि ये सब थे ही अत्यंत दुष्ट और विद्रोही। और (लूत की) औंधी गिरी हुई बस्ती को भी उसने उठाकर फेंक दिया, फिर उनपर छा दिया जो कुछ कि छा दिया। अब बताओ, तुम अपने प्रभु के किन-किन अद्भुत कृत्यों के बारे में झगड़ते रहोगे?
ये बीते हुए सचेत करने वालों में से एक सचेत करने वाला है। आने वाली आ पहुंची। परमेश्वर को छोड़ इसे कोई हटाने वाला नहीं है। फिर क्या हमारी इस बात पर आश्चर्य करते हो? रोते नहीं? तुम अहंकार के नशे में) बेपरवाह पड़े हो? (होश में आओ और) परमेश्वर के सामने नतमस्तक हो जाओ और उसकी भक्ति करो।