सूरह 52

अत्-तूर्

मक्की · 49 आयतें · 11 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय क़यामत को प्रमाणित करना और इसके संदर्भ से सचेत करना (इंज़ार) और शुभ समाचार देना (बशारत) है। पहली सूरह में दंड (अज़ाब) की चेतावनी और क़ुरैश क़बीले के नेताओं के व्यवहार की आलोचना का पहलू प्रमुख है और दूसरी सूरह में परमेश्वर और परलोक (आख़िरत) के बारे में उनकी अज्ञान से भरी धारणाओं के खंडन का पहलू प्रमुख है। पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के लिए सांत्वना का विषय दोनों सूरतों में है। दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश क़बीले से है, और इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जब वे सार्वजनिक रूप से जनसमान्य को सचेत (इंज़ार-ए-आम) कर रहे थे ।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلطُّورِ ﴿1﴾ وَكِتَـٰبٍ مَّسْطُورٍ ﴿2﴾ فِى رَقٍّ مَّنشُورٍ ﴿3﴾ وَٱلْبَيْتِ ٱلْمَعْمُورِ ﴿4﴾ وَٱلسَّقْفِ ٱلْمَرْفُوعِ ﴿5﴾ وَٱلْبَحْرِ ٱلْمَسْجُورِ ﴿6﴾ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ لَوَٰقِعٌ ﴿7﴾ مَّا لَهُۥ مِن دَافِعٍ ﴿8﴾

तूर पर्वत गवाही देता है और झिल्ली के खुले पृष्ठों में लिखा ग्रंथ भी। इसी प्रकार बसा हुआ घर, यह तुम्हारी भूमि गवाही देती है और आकाश की ऊंची छत और भरा हुआ समंदर भी कि तेरे प्रभु का दण्ड घटित होकर रहेगा, उसे कोई हटाने वाला नहीं है।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात तौरात (Torah), जिसमें इस्राईलियों के लिए परमेश्वर के प्रतिफल (दैनूनत) का पूरा क़ानून उसकी सभी बारीकियों के साथ लिखा है। ↩
يَوْمَ تَمُورُ ٱلسَّمَآءُ مَوْرًا ﴿9﴾ وَتَسِيرُ ٱلْجِبَالُ سَيْرًا ﴿10﴾ فَوَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴿11﴾ ٱلَّذِينَ هُمْ فِى خَوْضٍ يَلْعَبُونَ ﴿12﴾ يَوْمَ يُدَعُّونَ إِلَىٰ نَارِ جَهَنَّمَ دَعًّا ﴿13﴾ هَـٰذِهِ ٱلنَّارُ ٱلَّتِى كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ ﴿14﴾ أَفَسِحْرٌ هَـٰذَآ أَمْ أَنتُمْ لَا تُبْصِرُونَ ﴿15﴾ ٱصْلَوْهَا فَٱصْبِرُوٓا۟ أَوْ لَا تَصْبِرُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْكُمْ ۖ إِنَّمَا تُجْزَوْنَ مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿16﴾

उस दिन, जब आकाश कपकपाकर हिल जाएगा और पर्वत चलने लग जाएँगे। तो उस दिन दुर्भाग्य है नकारने वालों का जो अपनी बातों के छल में लगे हुए खेल रहे हैं। जिस दिन वे धक्के दे-दे कर नरक की आग की ओर ले जाए जाएँगे। कहा जाएगा: यह वही आग है जिसे तुम झूठा कहा करते थे। अब बताओ, यह जादू है या तुम्हें कुछ समझ नहीं आ रहा? जाओ, इस में जा पड़ो, फिर इसे सहन करो या न करो, तुम्हारे लिए समान है। तुम वही बदला पा रहे हो जो तुम करते रहे।

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍ وَنَعِيمٍ ﴿17﴾ فَـٰكِهِينَ بِمَآ ءَاتَىٰهُمْ رَبُّهُمْ وَوَقَىٰهُمْ رَبُّهُمْ عَذَابَ ٱلْجَحِيمِ ﴿18﴾ كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ هَنِيٓـًٔۢا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ﴿19﴾ مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ سُرُرٍ مَّصْفُوفَةٍ ۖ وَزَوَّجْنَـٰهُم بِحُورٍ عِينٍ ﴿20﴾

अपितु, पुण्यशील लोग बाग़ों और सुखों में होंगे। उनके प्रभु ने जो उन्हें दिया है, उससे आनंद ले रहे होंगे, और इससे भी कि उनके प्रभु ने उन्हें नरक के दण्ड से बचा लिया। अब खाओ और पियो मज़े से, अपने उन कर्मों के फलस्वरूप जो तुम करते रहे हो। वे बराबर बिछे हुए आसनों पर तकिया लगाए बैठे होंगे और मृगनयनी गोरियां हमने उनसे ब्याह दी होंगी।

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّبَعَتْهُمْ ذُرِّيَّتُهُم بِإِيمَـٰنٍ أَلْحَقْنَا بِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَمَآ أَلَتْنَـٰهُم مِّنْ عَمَلِهِم مِّن شَىْءٍ ۚ كُلُّ ٱمْرِئٍۭ بِمَا كَسَبَ رَهِينٌ ﴿21﴾ وَأَمْدَدْنَـٰهُم بِفَـٰكِهَةٍ وَلَحْمٍ مِّمَّا يَشْتَهُونَ ﴿22﴾ يَتَنَـٰزَعُونَ فِيهَا كَأْسًا لَّا لَغْوٌ فِيهَا وَلَا تَأْثِيمٌ ﴿23﴾ وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ غِلْمَانٌ لَّهُمْ كَأَنَّهُمْ لُؤْلُؤٌ مَّكْنُونٌ ﴿24﴾

जो लोग मान चुके हैं और उनकी संतान भी ईमान के किसी स्तर पर उनके मार्ग पर चली है, उनकी इस संतान को भी हम (उन्हीं की श्रेणी में) उनके साथ मिला देंगे और उनके कर्म में उनके लिए कोई कटौती नहीं करेंगे, (इसलिए कि) हर एक अपनी कमाई के बदले में बंधक है। हम उनके पसंद के फल उनको लगातार देते चले जाएँगे। वे उसमें शराब के जाम एक दूसरे से ले रहे होंगे, जिसमें न निरर्थक बातें होंगी, न दूसरों पर पापकर्मों के आरोप। और छिपा कर रखे हुए मोतियों के समान (सुंदर) लड़के, केवल उन्हीं के लिए, उनकी सेवा में दौड़ते फिर रहे होंगे।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अतः जब मनुष्य अपनी कमाई परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत करेगा, तो यह बंधक छुड़ाएगा; और जब छुड़ाएगा, तो जहाँ तक श्रेणियों का संबंध है, परमेश्वर अपने अनुग्रह और कृपा से उनमें जितनी वृद्धि चाहे, कर सकता है। ↩
وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَسَآءَلُونَ ﴿25﴾ قَالُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا قَبْلُ فِىٓ أَهْلِنَا مُشْفِقِينَ ﴿26﴾ فَمَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَا وَوَقَىٰنَا عَذَابَ ٱلسَّمُومِ ﴿27﴾ إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلُ نَدْعُوهُ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْبَرُّ ٱلرَّحِيمُ ﴿28﴾

वे (पीछे का हाल) पूछते हुए एक दूसरे की ओर ध्यान दे रहे होंगे। कहेंगे: हम इससे पहले अपने घर वालों के बारे में डरते रहते थे। अतः परमेश्वर ने हम पर कृपा की और हमें नरक के झुलसा देने वाले दण्ड से बचा लिया है। हम इससे पहले उसी (प्रभु) को पुकारते थे। इसमें संदेह नहीं कि वह बड़ा वचन निभाने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है।

فَذَكِّرْ فَمَآ أَنتَ بِنِعْمَتِ رَبِّكَ بِكَاهِنٍ وَلَا مَجْنُونٍ ﴿29﴾ أَمْ يَقُولُونَ شَاعِرٌ نَّتَرَبَّصُ بِهِۦ رَيْبَ ٱلْمَنُونِ ﴿30﴾ قُلْ تَرَبَّصُوا۟ فَإِنِّى مَعَكُم مِّنَ ٱلْمُتَرَبِّصِينَ ﴿31﴾ أَمْ تَأْمُرُهُمْ أَحْلَـٰمُهُم بِهَـٰذَآ ۚ أَمْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ ﴿32﴾ أَمْ يَقُولُونَ تَقَوَّلَهُۥ ۚ بَل لَّا يُؤْمِنُونَ ﴿33﴾ فَلْيَأْتُوا۟ بِحَدِيثٍ مِّثْلِهِۦٓ إِن كَانُوا۟ صَـٰدِقِينَ ﴿34﴾

इसलिए स्मरण दिलाते रहो, (हे पैग़ंबर और चिंता न करो), इसलिए कि प्रभु की कृपा से तुम न ज्योतिषी हो न दीवाने। क्या ये कहते हैं कि ये एक कवि है जिसके लिए हम समय बदलने की प्रतीक्षा में हैं? इनसे कह दो, अच्छा, प्रतीक्षा करो कि मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ। क्या इनके विवेक इन्हें यही कुछ सुझाव देते हैं या ये हैं ही उद्दंड लोग! क्या ये कहते हैं कि इसने यह क़ुरआन स्वयं ही बना लिया है? नहीं, यह बात नहीं है, अपितु ये मानना नहीं चाहते। अतः अपनी बात में सच्चे हैं तो ऐसी ही भव्य वाणी बना लाएँ।

أَمْ خُلِقُوا۟ مِنْ غَيْرِ شَىْءٍ أَمْ هُمُ ٱلْخَـٰلِقُونَ ﴿35﴾ أَمْ خَلَقُوا۟ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۚ بَل لَّا يُوقِنُونَ ﴿36﴾

(इनसे पूछो, ये परलोक को नहीं मानते तो) क्या बिना किसी रचयिता के पैदा हो गए हैं या स्वयं अपने रचयिता हैं? या धरती और समस्त आकाशों को इन्होंने पैदा किया है? नहीं, यह बात नहीं है, अपितु ये विश्वास नहीं रखते।

أَمْ عِندَهُمْ خَزَآئِنُ رَبِّكَ أَمْ هُمُ ٱلْمُصَۣيْطِرُونَ ﴿37﴾ أَمْ لَهُمْ سُلَّمٌ يَسْتَمِعُونَ فِيهِ ۖ فَلْيَأْتِ مُسْتَمِعُهُم بِسُلْطَـٰنٍ مُّبِينٍ ﴿38﴾ أَمْ لَهُ ٱلْبَنَـٰتُ وَلَكُمُ ٱلْبَنُونَ ﴿39﴾

(ये किस आधार पर अकड़ रहे हैं)? तेरे प्रभु के कोष क्या इन्हीं के पास हैं या उनपर इन्हीं का आधिपत्य चलता है? क्या इनके पास कोई सीढ़ी है कि उस पर चढ़ते और आकाशीय बातें सुन लेते हैं (कि इनके लिए वहाँ भी ऐश है)? यदि ऐसा है तो इनमें से जिसने सुना है, वह कोई स्पष्ट प्रमाण लाए। (ये भला अपनी मान्यताएँ तो देखें), क्या (वह जो धरती और आकाश का रचयिता है), उसके लिए बेटियाँ हैं और तुम्हारे लिए बेटे?

أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ أَجْرًا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍ مُّثْقَلُونَ ﴿40﴾ أَمْ عِندَهُمُ ٱلْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ ﴿41﴾ أَمْ يُرِيدُونَ كَيْدًا ۖ فَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ هُمُ ٱلْمَكِيدُونَ ﴿42﴾ أَمْ لَهُمْ إِلَـٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ ﴿43﴾

(ये क्यों नहीं सुनते)? क्या तुम इनसे कोई दक्षिणा मांगते हो कि वे इस जुर्माने के बोझ तले दबे जा रहे हैं? क्या इनके पास परोक्ष की जानकारी है, तो ये स्वयं ही लिख लेते हैं (और अपने मार्गदर्शन के लिए किसी पैग़ंबर की आवश्यकता को नहीं समझते)? क्या ये कोई चाल चलना चाहते हैं? तो जिन्होंने कुफ़्र किया है, ये चाल उन्हीं पर उल्टी पड़ेगी। क्या परमेश्वर को छोड़ इनके पास कोई अन्य उपास्य है (जो इन्हें बचा लेगा? कदापि नहीं), परमेश्वर पवित्र है उनसे जिन्हें ये [उसका] भागीदार बनाते हैं।

وَإِن يَرَوْا۟ كِسْفًا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ سَاقِطًا يَقُولُوا۟ سَحَابٌ مَّرْكُومٌ ﴿44﴾ فَذَرْهُمْ حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى فِيهِ يُصْعَقُونَ ﴿45﴾ يَوْمَ لَا يُغْنِى عَنْهُمْ كَيْدُهُمْ شَيْـًٔا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ﴿46﴾

(ये नहीं मानेंगे) और यदि आकाश से कोई टुकड़ा भी गिरता हुआ देखेंगे तो कहेंगे: ये तो अनेक परतों में बादल हैं (जो उमड़े चले आ रहे हैं)। इसलिए इन्हें छोड़ो, यहाँ तक कि ये अपने उस दिन को पहुँच जाएँ जिस दिन इनके होश उड़ जाएँगे, जिस दिन न इनकी कोई चाल इनके कुछ काम आएगी, न कोई सहायता इन्हें पहुंचेगी।

وَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ عَذَابًا دُونَ ذَٰلِكَ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ﴿47﴾ وَٱصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ فَإِنَّكَ بِأَعْيُنِنَا ۖ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ حِينَ تَقُومُ ﴿48﴾ وَمِنَ ٱلَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَإِدْبَـٰرَ ٱلنُّجُومِ ﴿49﴾

इन अत्याचारियों के लिए इसके अतिरिक्त भी दण्ड है, किंतु इनमें से अधिकांश नहीं जानते। (इसलिए इन्हें छोड़ो) और दृढ़संकल्प के साथ अपने प्रभु के निर्णय की प्रतीक्षा करो। ये तुम्हें कोई क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे, इसलिए कि तुम हमारी दृष्टि में हो। और (दृढ़संकल्प के लिए) अपने प्रभु की स्तुति के साथ उसकी पवित्रता का जाप करो जिस समय तुम (नमाज़ के लिए) उठते हो और रात में भी उसकी पवित्रता का जाप करो और उस समय भी जब तारे पलटते हैं।