सूरह 51

अज़्-ज़ारियात्

मक्की · 60 आयतें · 13 अनुच्छेद

अक्षर
इस सूरह के जोड़े का परिचय

इस सूरह का साझा परिचय उसके जोड़े की पहली सूरह में पढ़ें।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

وَٱلذَّٰرِيَـٰتِ ذَرْوًا ﴿1﴾ فَٱلْحَـٰمِلَـٰتِ وِقْرًا ﴿2﴾ فَٱلْجَـٰرِيَـٰتِ يُسْرًا ﴿3﴾ فَٱلْمُقَسِّمَـٰتِ أَمْرًا ﴿4﴾ إِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٌ ﴿5﴾ وَإِنَّ ٱلدِّينَ لَوَٰقِعٌ ﴿6﴾ وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْحُبُكِ ﴿7﴾

तीव्र हवाएँ गवाही देती हैं जो धूल उड़ाती हैं, फिर (पानी से लदे हुए बादलों का) बोझ उठाती हैं, फिर नरमी के साथ चलती हैं, फिर अलग-अलग मामला करती हैं। (ये गवाही देती हैं) और धारियों वाला आकाश भी कि जिस दण्ड की चेतावनी तुम्हें सुनाई जा रही है, वह निस्संदेह सत्य है और [कर्मों का] प्रतिफल घटित हो कर रहेगा।

إِنَّكُمْ لَفِى قَوْلٍ مُّخْتَلِفٍ ﴿8﴾ يُؤْفَكُ عَنْهُ مَنْ أُفِكَ ﴿9﴾ قُتِلَ ٱلْخَرَّٰصُونَ ﴿10﴾ ٱلَّذِينَ هُمْ فِى غَمْرَةٍ سَاهُونَ ﴿11﴾ يَسْـَٔلُونَ أَيَّانَ يَوْمُ ٱلدِّينِ ﴿12﴾ يَوْمَ هُمْ عَلَى ٱلنَّارِ يُفْتَنُونَ ﴿13﴾ ذُوقُوا۟ فِتْنَتَكُمْ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تَسْتَعْجِلُونَ ﴿14﴾

यह सत्य है कि तुम लोग एक स्पष्ट विरोधाभास में पड़े हो। हमारी इस चेतावनी से वही मुँह मोड़ सकता है जिसकी बुद्धि उलट दी गई हो। इसके बारे में इन अटकल दौड़ाने वालों का नाश हो जो गहरी नींद सोए हुए हैं, पूर्णतः बेखबर हैं। पूछते हैं: [कर्मों के] प्रतिफल का दिन कब आएगा? उस दिन आएगा, जिस दिन ये आग पर तपाए जाएँगे, अब चखो, अपने उस उत्पात का स्वाद जिसमें तुम पड़े रहे। यह वही चीज़ है जिसके लिए तुम जल्दी मचाए हुए थे।

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍ وَعُيُونٍ ﴿15﴾ ءَاخِذِينَ مَآ ءَاتَىٰهُمْ رَبُّهُمْ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَبْلَ ذَٰلِكَ مُحْسِنِينَ ﴿16﴾ كَانُوا۟ قَلِيلًا مِّنَ ٱلَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ ﴿17﴾ وَبِٱلْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ ﴿18﴾ وَفِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّ لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ ﴿19﴾

अपितु, पुण्यशील लोग उस दिन बाग़ों और झरनों में होंगे। उनके प्रभु ने जो कुछ उन्हें दिया है, ग्रहण कर रहे होंगे। वे इससे पहले अच्छे ढंग से कर्म करने वाले थे। रातों में बहुत कम सोते थे और उनकी अंतिम घड़ियों में (अपने प्रभु से) क्षमा मांगते थे, और उनकी धन-संपत्ति में अधिकार था भिक्षा मांगने वालों और वंचित लोगों के लिए।

وَفِى ٱلْأَرْضِ ءَايَـٰتٌ لِّلْمُوقِنِينَ ﴿20﴾ وَفِىٓ أَنفُسِكُمْ ۚ أَفَلَا تُبْصِرُونَ ﴿21﴾ وَفِى ٱلسَّمَآءِ رِزْقُكُمْ وَمَا تُوعَدُونَ ﴿22﴾ فَوَرَبِّ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ إِنَّهُۥ لَحَقٌّ مِّثْلَ مَآ أَنَّكُمْ تَنطِقُونَ ﴿23﴾

(हवा और बादलों में ही नहीं), जो विश्वास करना चाहें, उनके लिए धरती में भी निशानियाँ हैं और तुम्हारे अस्तित्व में भी। फिर क्या तुम देखते नहीं हो? और आकाश में तो तुम्हारे लिए जीविका भी है और वह चीज़ भी जिस की चेतावनी तुम्हें सुनाई जा रही है। तो सौगंध है आकाश और पृथ्वी के प्रभु की, उसका आना निश्चित रूप से सत्य है उसी प्रकार, जैसे तुम बोल देते हो।

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ضَيْفِ إِبْرَٰهِيمَ ٱلْمُكْرَمِينَ ﴿24﴾ إِذْ دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَقَالُوا۟ سَلَـٰمًا ۖ قَالَ سَلَـٰمٌ قَوْمٌ مُّنكَرُونَ ﴿25﴾ فَرَاغَ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ فَجَآءَ بِعِجْلٍ سَمِينٍ ﴿26﴾ فَقَرَّبَهُۥٓ إِلَيْهِمْ قَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ ﴿27﴾ فَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۖ قَالُوا۟ لَا تَخَفْ ۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَـٰمٍ عَلِيمٍ ﴿28﴾ فَأَقْبَلَتِ ٱمْرَأَتُهُۥ فِى صَرَّةٍ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَقِيمٌ ﴿29﴾ قَالُوا۟ كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْعَلِيمُ ﴿30﴾ قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا ٱلْمُرْسَلُونَ ﴿31﴾ قَالُوٓا۟ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمٍ مُّجْرِمِينَ ﴿32﴾ لِنُرْسِلَ عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِّن طِينٍ ﴿33﴾ مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ لِلْمُسْرِفِينَ ﴿34﴾ فَأَخْرَجْنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿35﴾ فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍ مِّنَ ٱلْمُسْلِمِينَ ﴿36﴾ وَتَرَكْنَا فِيهَآ ءَايَةً لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ ﴿37﴾

(इसकी निशानियाँ इतिहास में भी हैं)। तुम्हारे पास इब्राहीम के माननीय अतिथियों की कथा पहुंची है? जब वे उसके पास आए तो कहा: तुम पर शांति हो। उसने उत्तर दिया तुम पर भी शांति हो — कुछ अजनबी से लोग हैं! फिर चुपके से अपने घर वालों के पास गया और (उनके लिए) मोटे-ताज़े बछड़े का भुना हुआ मांस लाया और उनको प्रस्तुत कर दिया। (किंतु उन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया)। उसने कहा: क्यों आप खाते नहीं? फिर (उनके संकोच को देख कर) उसने अपने मन में उनसे डर का अनुभव किया। वे बोले: डरिए नहीं और उसे एक ज्ञानी लड़के का शुभसंदेश दिया। उसकी पत्नी यह सुनकर आश्चर्य की स्थिति में आगे बढ़ी, अपना माथा पीटा और बोली: बुढ़िया बांझ, अब जन्म देगी? उन्होंने कहा: तेरे प्रभु ने यही कुछ कहा है। वह बड़ा प्रज्ञावान और ज्ञानी है। इब्राहीम ने पूछा: फिर हे ईश्वर दूतो, तुम किस कार्य पर हो? उन्होंने उत्तर दिया: हमें अपराधियों की एक क़ौम की ओर भेजा गया है कि उस पर मिट्टी के पत्थर बरसा दें जो तुम्हारे प्रभु के यहाँ उन लोगों के लिए अंकित हैं जो हद से बढ़े हुए हों। फिर उस बस्ती से हमने सब मानने वालों को निकाला तो वहां एक को छोड़ मुसलमानों का कोई घर नहीं पाया। (तब हमने पत्थर बरसा दिए) और उन लोगों के लिए (सीख की) एक बड़ी निशानी वहां छोड़ दी जो कष्टदायक दण्ड से डरते हों।

وَفِى مُوسَىٰٓ إِذْ أَرْسَلْنَـٰهُ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ بِسُلْطَـٰنٍ مُّبِينٍ ﴿38﴾ فَتَوَلَّىٰ بِرُكْنِهِۦ وَقَالَ سَـٰحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ ﴿39﴾ فَأَخَذْنَـٰهُ وَجُنُودَهُۥ فَنَبَذْنَـٰهُمْ فِى ٱلْيَمِّ وَهُوَ مُلِيمٌ ﴿40﴾

यही निशानी मूसा की कथा में भी है, जब हमने उसको एक स्पष्ट प्रमाण के साथ फ़िरऔन की ओर भेजा तो उसने अहंकार से मुँह मोड़ा और बोला: यह जादूगर है या कोई सनकी है। इसका परिणाम यह हुआ कि हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ा और उन्हें समुद्र में फेंक दिया और वह निंदनीय होकर रह गया।

وَفِى عَادٍ إِذْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ ٱلرِّيحَ ٱلْعَقِيمَ ﴿41﴾ مَا تَذَرُ مِن شَىْءٍ أَتَتْ عَلَيْهِ إِلَّا جَعَلَتْهُ كَٱلرَّمِيمِ ﴿42﴾

यही निशानी आद की कथा में भी है, जब हमने उनपर अनुपकारी और सूखी हवा चला दी। वह जिस चीज़ पर भी चलती थी, उसे नष्ट किए बिना नहीं छोड़ती थी।

وَفِى ثَمُودَ إِذْ قِيلَ لَهُمْ تَمَتَّعُوا۟ حَتَّىٰ حِينٍ ﴿43﴾ فَعَتَوْا۟ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ وَهُمْ يَنظُرُونَ ﴿44﴾ فَمَا ٱسْتَطَـٰعُوا۟ مِن قِيَامٍ وَمَا كَانُوا۟ مُنتَصِرِينَ ﴿45﴾

यही निशानी समूद की कथा में भी है, जब उनसे कहा गया कि थोड़े समय के लिए मौज कर लो। परंतु (इस चेतावनी पर भी) उन्होंने अपने प्रभु के आदेश से मुँह मोड़ा और अवहेलना की तो उन्हें कड़क ने आ पकड़ा और वे देखते रह गए। फिर न उनके लिए उठना संभव हुआ और न वे अपना बचाव कर सके।

وَقَوْمَ نُوحٍ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًا فَـٰسِقِينَ ﴿46﴾

इससे पहले नूह की क़ौम को भी हमने इसी प्रकार पकड़ा। निस्संदेह वे भी अवज्ञाकारी लोग थे।

وَٱلسَّمَآءَ بَنَيْنَـٰهَا بِأَيْي۟دٍ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ ﴿47﴾ وَٱلْأَرْضَ فَرَشْنَـٰهَا فَنِعْمَ ٱلْمَـٰهِدُونَ ﴿48﴾ وَمِن كُلِّ شَىْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ ﴿49﴾ فَفِرُّوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ ۖ إِنِّى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴿50﴾ وَلَا تَجْعَلُوا۟ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ ۖ إِنِّى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ مُّبِينٌ ﴿51﴾

(फिर क्या कठिन है कि हम इन्हें फिर से उठा खड़ा करें? तुम देखते नहीं हो कि) आकाश को हमने विशाल सामर्थ्य के साथ बनाया है और हम बड़ा सामर्थ्य रखने वाले हैं। और धरती को हमने बिछा दिया, तो कैसा अच्छा बिछाने वाले हैं! और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए हैं ताकि तुम स्मरण प्राप्त करो। इसलिए दौड़ो परमेश्वर की ओर, मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेत करने वाला हूँ। और परमेश्वर के साथ किसी अन्य को उपास्य न बनाओ। (क़यामत का पड़ाव आएगा तो इनमें से कोई तुम्हारे काम नहीं आएगा)। मैं (इस सत्य के विषय में भी) उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक स्पष्ट सचेत करने वाला हूं।1

टिप्पणियाँ 1
  1. अर्थात इस बात का स्मरण कि इस लोक की प्रत्येक वस्तु की रचना जोड़ों में की गई है। इसमें कारण अपने परिणामों के साथ, शक्तियाँ अपने साधनों के साथ, प्रवृत्तियाँ अपने संकल्पों के साथ और आत्माएँ अपने शरीरों के साथ जोड़ी गई हैं, और इन्हीं के माध्यम से वे अपनी सार्थकता का प्रदर्शन करती हैं। पुरुष हो या स्त्री, धरती हो या आकाश — कोई भी वस्तु अपने जोड़े के बिना अपनी पूर्णता को नहीं प्राप्त करती।ठीक इसी प्रकार इस लोक को भी अपने एक जोड़े की आवश्यकता है, जिससे वह सार्थक और सोद्देश्य बन सके। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति मानेगा कि इस लोक का वह जोड़ा परलोक (आख़िरत) है, क्योंकि दुनिया की परिपूर्णता उसी के द्वारा होती है। ↩
كَذَٰلِكَ مَآ أَتَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُوا۟ سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ ﴿52﴾ أَتَوَاصَوْا۟ بِهِۦ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ ﴿53﴾ فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَآ أَنتَ بِمَلُومٍ ﴿54﴾ وَذَكِّرْ فَإِنَّ ٱلذِّكْرَىٰ تَنفَعُ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿55﴾

(तुम संतुष्ट रहो, हे पैग़ंबर)। इसी प्रकार होता रहा है। इनसे पहले लोगों के पास भी जो रसूल आया, उन्होंने उसको यही कहा कि जादूगर है या बावला। क्या ये एक दूसरे को यही उपदेश करते रहे हैं? नहीं, अपितु ये हैं ही अवज्ञाकारी लोग! तो इनकी ओर ध्यान न दो, अब तुम पर कोई आरोप नहीं, और उपदेश करते रहो, इसलिए कि जो मानने वाले हों, उन्हें उपदेश लाभ पहुंचाता है।

وَمَا خَلَقْتُ ٱلْجِنَّ وَٱلْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ﴿56﴾ مَآ أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ ﴿57﴾ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلرَّزَّاقُ ذُو ٱلْقُوَّةِ ٱلْمَتِينُ ﴿58﴾

(इन अवज्ञाकारियों को अब इनकी दशा में छोड़ दो)। मैंने जिन्नों और मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी भक्ति करें, (और उनसे अपेक्षा भी यही है)। मैं उनसे कोई आजीविका नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि मुझे खिलाएँ। परमेशर तो स्वयं आजीविका देने वाला है, बड़ी शक्ति और बड़े सामर्थ्य वाला है।

فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ذَنُوبًا مِّثْلَ ذَنُوبِ أَصْحَـٰبِهِمْ فَلَا يَسْتَعْجِلُونِ ﴿59﴾ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن يَوْمِهِمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ ﴿60﴾

(इन्हें कुछ ढील दो), इसलिए कि इन अत्याचारियों के लिए भी वही कसौटी है, जैसा इनसे (पहले के) साथियों के लिए थी। तो मुझसे जल्दी न मचाएँ। इन नकारने वालों के लिए अंत में बड़ी दुर्दशा है इनके उस दिन के कारण जिससे इन्हें सचेत किया जा रहा है।