सूरह 54

अल्-क़मर्

मक्की · 55 आयतें · 12 अनुच्छेद

अक्षर
परिचय

ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों में एक आयात कई बार आई है (अर्थात तरजीअ है), इसलिए इनका बाहरी संबंध भी स्पष्ट है। दोनों सूरतों का विषय क़यामत को प्रमाणित करना और इसके संदर्भ से सचेत करना (इंज़ार) और शुभ समाचार देना (बशारत) है। पहली सूरह में परमेश्वर के न्याय (दैनूनत) के प्रकट होने से तर्क किया गया है और दूसरी सूरह में मानव व्यक्तित्व (अंफ़ुस) और ब्रह्माण्ड (आफ़ाक़) में उसकी दया, शक्ति, प्रज्ञा और पालन-पोषण की निशानियों से तर्क प्रस्तुत किया गया है।

दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश क़बीले से है, जो उस ईश्वरीय प्रकोप के लिए किसी निशानी की मांग कर रहे थे जिससे उन्हें डराया जा रहा था। एक-एक घटना और एक-एक निशानी की ओर उनका ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्हें सचेत किया गया है कि वे इन निशानियों को क्यों नहीं देखते और इन घटनाओं से क्यों कुछ सीख नहीं लेते? तरजीअ की आयतें दोनों सूरतों में इन्हीं हठधर्मी और ज़िद्दी लोगों को झंझोड़ना के लिए आई हैं।

इन सूरतों के विषयों से यह स्पष्ट होता है कि ये मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के उस चरण में अवतरित हुई हैं जब वे सार्वजनिक रूप से जनसमान्य को सचेत (इंज़ार-ए-आम) कर रहे थे ।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।

ٱقْتَرَبَتِ ٱلسَّاعَةُ وَٱنشَقَّ ٱلْقَمَرُ ﴿1﴾ وَإِن يَرَوْا۟ ءَايَةً يُعْرِضُوا۟ وَيَقُولُوا۟ سِحْرٌ مُّسْتَمِرٌّ ﴿2﴾ وَكَذَّبُوا۟ وَٱتَّبَعُوٓا۟ أَهْوَآءَهُمْ ۚ وَكُلُّ أَمْرٍ مُّسْتَقِرٌّ ﴿3﴾ وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّنَ ٱلْأَنۢبَآءِ مَا فِيهِ مُزْدَجَرٌ ﴿4﴾ حِكْمَةٌۢ بَـٰلِغَةٌ ۖ فَمَا تُغْنِ ٱلنُّذُرُ ﴿5﴾ فَتَوَلَّ عَنْهُمْ ۘ يَوْمَ يَدْعُ ٱلدَّاعِ إِلَىٰ شَىْءٍ نُّكُرٍ ﴿6﴾ خُشَّعًا أَبْصَـٰرُهُمْ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ كَأَنَّهُمْ جَرَادٌ مُّنتَشِرٌ ﴿7﴾ مُّهْطِعِينَ إِلَى ٱلدَّاعِ ۖ يَقُولُ ٱلْكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا يَوْمٌ عَسِرٌ ﴿8﴾

वह घड़ी पास आ गई जिससे इन्हें सचेत किया जा रहा है और चाँद दो खण्ड हो गया। (किंतु ये नहीं मानेंगे) और चाहे कोई निशानी देख लें, उससे मुँह ही मोड़ेंगे और कहेंगे: यह तो जादू है जो पहले से चला आ रहा है। (इसलिए यही हुआ है) और इन्होंने अब भी नकार दिया और अपनी इच्छाओं का अनुसरण किया है। और (हमने उसी समय इन्हें नहीं पकड़ा, इसलिए कि हमारे यहाँ) हर कार्य के लिए एक समय निर्धारित है। इनके सामने अतीत की वे कथाएँ आ चुकी हैं जिनमें इनके लिए बहुत कुछ सीखने की सामग्री है, अत्याधिक दिल में उतारने वाली प्रज्ञा। किंतु चेतावनियाँ (इन अवज्ञाकारी लोगों के विषय में) क्या काम देंगी! इसलिए इनसे मुँह फेर लो और उस दिन की प्रतीक्षा करो, जिस दिन पुकारने वाला उस चीज़ के लिए पुकारेगा जो अत्यंत अप्रिय होगी। इनकी आँखें उस दिन झुकी होंगी। ये पुकारने वाले की ओर दौड़ते हुए इस प्रकार क़ब्रों से निकलेंगे मानो बिखरी हुई टिड्डियाँ हैं। उस समय ये नकारने वाले कहेंगे: यह दिन तो बहुत कठिन आया है।

كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ فَكَذَّبُوا۟ عَبْدَنَا وَقَالُوا۟ مَجْنُونٌ وَٱزْدُجِرَ ﴿9﴾ فَدَعَا رَبَّهُۥٓ أَنِّى مَغْلُوبٌ فَٱنتَصِرْ ﴿10﴾ فَفَتَحْنَآ أَبْوَٰبَ ٱلسَّمَآءِ بِمَآءٍ مُّنْهَمِرٍ ﴿11﴾ وَفَجَّرْنَا ٱلْأَرْضَ عُيُونًا فَٱلْتَقَى ٱلْمَآءُ عَلَىٰٓ أَمْرٍ قَدْ قُدِرَ ﴿12﴾ وَحَمَلْنَـٰهُ عَلَىٰ ذَاتِ أَلْوَٰحٍ وَدُسُرٍ ﴿13﴾ تَجْرِى بِأَعْيُنِنَا جَزَآءً لِّمَن كَانَ كُفِرَ ﴿14﴾ وَلَقَد تَّرَكْنَـٰهَآ ءَايَةً فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ ﴿15﴾ فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ ﴿16﴾ وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ ﴿17﴾

इनसे पहले नूह की क़ौम ने भी इसी प्रकार नकार दिया। तो हमारे भक्त को उन्होंने झूठा कह दिया और कहा कि यह पागल है और वह बुरी तरह झिड़का गया। अंततः उसने अपने प्रभु से प्रार्थना की कि मैं दबाया जा चुका, अब तू इनसे बदला ले। तब हमने भयंकर बारिश से आकाश के द्वार खोल दिए और धरती को (इस प्रकार) फाड़ा कि वह झरने ही झरने हो गई। फिर धरती और आकाश का पानी उस निशान पर आपस में मिल गया जो उसके लिए निर्धारित किया गया था और नूह को हमने एक तख्तियों और कीलों वाली पर उठा लिया जो हमारी देख-रेख में चलती रही। यह हमने इसलिए किया कि हम उसके लिए बदला लें जिसका अनादर किया गया। और इस कथा को हमने (शिक्षा की) एक निशानी बना कर छोड़ दिया। फिर है कोई उपदेश प्राप्त करने वाला? तो देख लो, कैसा था मेरा दण्ड और कैसी थी मेरी चेतावनी! हमने इस क़ुरआन को उपदेश के लिए अत्यंत उपयुक्त बना दिया है। फिर क्या है कोई उपदेश प्राप्त करने वाला?

كَذَّبَتْ عَادٌ فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ ﴿18﴾ إِنَّآ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًا صَرْصَرًا فِى يَوْمِ نَحْسٍ مُّسْتَمِرٍّ ﴿19﴾ تَنزِعُ ٱلنَّاسَ كَأَنَّهُمْ أَعْجَازُ نَخْلٍ مُّنقَعِرٍ ﴿20﴾ فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ ﴿21﴾ وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ ﴿22﴾

इसी प्रकार आद ने नकार दिया तो देख लो कि कैसा था मेरा दण्ड और कैसी थी मेरी चेतावनी! हमने एक निरंतर अशुभ दिन उनपर तीव्र आँधी थोप दी जो लोगों को इस प्रकार उखाड़ फेंकती थी, जैसे वे उखड़े हुए खजूरों के तने हों। तो देख लो कि कैसा था मेरा दण्ड और कैसी थी मेरी चेतावनी! हमने इस क़ुरआन को उपदेश के लिए अत्यंत उपयुक्त बना दिया है। फिर क्या है कोई उपदेश प्राप्त करने वाला?

كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِٱلنُّذُرِ ﴿23﴾ فَقَالُوٓا۟ أَبَشَرًا مِّنَّا وَٰحِدًا نَّتَّبِعُهُۥٓ إِنَّآ إِذًا لَّفِى ضَلَـٰلٍ وَسُعُرٍ ﴿24﴾ أَءُلْقِىَ ٱلذِّكْرُ عَلَيْهِ مِنۢ بَيْنِنَا بَلْ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرٌ ﴿25﴾ سَيَعْلَمُونَ غَدًا مَّنِ ٱلْكَذَّابُ ٱلْأَشِرُ ﴿26﴾ إِنَّا مُرْسِلُوا۟ ٱلنَّاقَةِ فِتْنَةً لَّهُمْ فَٱرْتَقِبْهُمْ وَٱصْطَبِرْ ﴿27﴾ وَنَبِّئْهُمْ أَنَّ ٱلْمَآءَ قِسْمَةٌۢ بَيْنَهُمْ ۖ كُلُّ شِرْبٍ مُّحْتَضَرٌ ﴿28﴾ فَنَادَوْا۟ صَاحِبَهُمْ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ ﴿29﴾ فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ ﴿30﴾ إِنَّآ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ صَيْحَةً وَٰحِدَةً فَكَانُوا۟ كَهَشِيمِ ٱلْمُحْتَظِرِ ﴿31﴾ وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ ﴿32﴾

समूद ने भी इस चेतावनी को झूठा कह दिया और कहने लगे: क्या हम अपने ही अंदर के एक अकेले व्यक्ति का अनुसरण करेंगे? इसका अर्थ तो यह है कि हम वास्तव में पथभ्रष्टता में पड़े और नरक में गए। क्या हम में से इसी पर उपदेश का अवतरण हुआ है? नहीं, अपितु यह बेहद झूठा और धृष्ट है। अच्छा, ये कल ही जान लेंगे कि कौन बेहद झूठा और धृष्ट है। हम ऊँटनी को इनके लिए परीक्षा बनाकर भेजने वाले हैं, तो इनको देखते रहो और धैर्य रखो और इन्हें बता दो कि पानी इनमें और ऊँटनी में बाँट दिया गया है। अब हर एक अपनी बारी के दिन आएगा। इस पर उन्होंने अपने सरदार से शिकायत की। अतः वह बढ़ा और उसने ऊँटनी के स्नायु काट दिए। फिर देख लो कि कैसा था मेरा दण्ड और कैसी थी मेरी चेतावनी! हमने एक ही डांट उनपर भेजी और वे बाड़े वाले की रौंदी हुई बाड़ के समान चूर-चूर होकर रह गए। हमने इस क़ुरआन को उपदेश के लिए अत्यंत उपयुक्त बना दिया है। फिर क्या है कोई उपदेश प्राप्त करने वाला?

كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍۭ بِٱلنُّذُرِ ﴿33﴾ إِنَّآ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّآ ءَالَ لُوطٍ ۖ نَّجَّيْنَـٰهُم بِسَحَرٍ ﴿34﴾ نِّعْمَةً مِّنْ عِندِنَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى مَن شَكَرَ ﴿35﴾ وَلَقَدْ أَنذَرَهُم بَطْشَتَنَا فَتَمَارَوْا۟ بِٱلنُّذُرِ ﴿36﴾ وَلَقَدْ رَٰوَدُوهُ عَن ضَيْفِهِۦ فَطَمَسْنَآ أَعْيُنَهُمْ فَذُوقُوا۟ عَذَابِى وَنُذُرِ ﴿37﴾ وَلَقَدْ صَبَّحَهُم بُكْرَةً عَذَابٌ مُّسْتَقِرٌّ ﴿38﴾ فَذُوقُوا۟ عَذَابِى وَنُذُرِ ﴿39﴾ وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ ﴿40﴾

लूत की क़ौम ने भी चेतावनी को नकार दिया। हमने उनपर पत्थर बरसाने वाली हवा थोप दी। केवल लूत के घरवाले उससे सुरक्षित रहे। हमने अपनी विशेष कृपा से उनको पिछली रात निकाल दिया। हम उन लोगों को इसी प्रकार फल देते हैं जो कृतज्ञ रहें। लूत ने निस्संदेह उनको हमारी पकड़ से सचेत किया था, परंतु वे उसकी चेतावनी में आपत्तियाँ उठाते रहे और उसके पीछे लग गए कि अपने अतिथियों से हाथ उठा ले तो हमने उनकी आँखें अंधी कर दीं कि चखो अब मेरे दण्ड और मेरी चेतावनी का स्वाद। (फिर हुआ यह कि) सुबह सवेरे एक ऐसे दण्ड ने उनको पकड़ लिया, जिसने आकर डेरे डाल दिए — लो चखो, अब मेरे दण्ड और मेरी चेतावनी का स्वाद। हमने इस क़ुरआन को उपदेश के लिए अत्यंत उपयुक्त बना दिया है। फिर क्या है कोई उपदेश प्राप्त करने वाला?

وَلَقَدْ جَآءَ ءَالَ فِرْعَوْنَ ٱلنُّذُرُ ﴿41﴾ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا كُلِّهَا فَأَخَذْنَـٰهُمْ أَخْذَ عَزِيزٍ مُّقْتَدِرٍ ﴿42﴾

यही चेतावनी फ़िरऔन के लोगों के पास आई। उन्होंने भी हमारी सभी निशानियों को झूठा कह दिया तो हमने उन्हें पकड़ा, जिस प्रकार कोई प्रभावशाली और बड़ा शक्तिशाली पकड़ता है।

أَكُفَّارُكُمْ خَيْرٌ مِّنْ أُو۟لَـٰٓئِكُمْ أَمْ لَكُم بَرَآءَةٌ فِى ٱلزُّبُرِ ﴿43﴾ أَمْ يَقُولُونَ نَحْنُ جَمِيعٌ مُّنتَصِرٌ ﴿44﴾ سَيُهْزَمُ ٱلْجَمْعُ وَيُوَلُّونَ ٱلدُّبُرَ ﴿45﴾

(क़ुरैश के लोगो, फिर) तुम्हारे ये नकारने वाले क्या उनसे कुछ अच्छे हैं या दिव्य ग्रंथों में तुम्हारे लिए कोई क्षमा लिखी हुई है? क्या इनका भ्रम है कि हम ऐसा जत्था हैं जिसके पास लड़ने की क्षमता है? (सुन लो), इनका यह जत्था शीघ्र ही पराजित हो जाएगा और ये पीठ फेर कर भाग रहे होंगे।

بَلِ ٱلسَّاعَةُ مَوْعِدُهُمْ وَٱلسَّاعَةُ أَدْهَىٰ وَأَمَرُّ ﴿46﴾

नहीं, अपितु इनके साथ जो वचन है, उसके पूरा होने का वास्तविक समय तो क़यामत का दिन है और क़यामत का दिन (इन नकारने वालों के लिए) बड़ा कठिन और बड़ा ही कड़वा होगा।

إِنَّ ٱلْمُجْرِمِينَ فِى ضَلَـٰلٍ وَسُعُرٍ ﴿47﴾ يَوْمَ يُسْحَبُونَ فِى ٱلنَّارِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ ذُوقُوا۟ مَسَّ سَقَرَ ﴿48﴾

ये अपराधी वास्तव में बड़ी पथभ्रष्टता में हैं और निस्संदेह नरक में पड़ेंगे। ये उस दिन को याद रखें, जिस दिन ये मुँहों के बल उसकी आग में घसीटे जाएँगे — अब चखो नरक की लपट का स्वाद।

إِنَّا كُلَّ شَىْءٍ خَلَقْنَـٰهُ بِقَدَرٍ ﴿49﴾ وَمَآ أَمْرُنَآ إِلَّا وَٰحِدَةٌ كَلَمْحٍۭ بِٱلْبَصَرِ ﴿50﴾ وَلَقَدْ أَهْلَكْنَآ أَشْيَاعَكُمْ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ ﴿51﴾

(ये जल्दी न मचाएँ)। हमने हर चीज़ एक माप के साथ पैदा की है और हमारा आदेश बस एक ही आदेश होगा जो पलक झपकने में पूरा हो जाएगा। तुम्हारे जैसे लोगों को हम (इससे पहले इसी प्रकार) नष्ट कर चुके हैं। फिर क्या है कोई उपदेश प्राप्त करने वाला?

وَكُلُّ شَىْءٍ فَعَلُوهُ فِى ٱلزُّبُرِ ﴿52﴾ وَكُلُّ صَغِيرٍ وَكَبِيرٍ مُّسْتَطَرٌ ﴿53﴾

इन्होंने जो कुछ किया है, वह सब खातों में लिखा है और हर छोटी-बड़ी बात लिखी जा चुकी है।

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍ وَنَهَرٍ ﴿54﴾ فِى مَقْعَدِ صِدْقٍ عِندَ مَلِيكٍ مُّقْتَدِرٍۭ ﴿55﴾

इसके विपरीत जो परमेश्वर से डरने वाले हैं, वे बाग़ों और झरनों (के ऐश) में होंगे, यथार्थ सम्मान की जगह, बड़े प्रभुत्वशाली सम्राट की उपस्थिति में।