सूरह 14
इब्राहीम्
मक्की · 52 आयतें · 19 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह में जिस चीज़़ के लिए क़ुरैश को सचेत और भयभीत किया गया है, दूसरी सूरह में उसी के संदर्भ में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) को तसल्ली दी गई है कि वे निश्चिंत रहें, यह क़ुरआन स्वयं एक स्पष्ट निर्णायक प्रमाण है। यदि ये लोग इसे नहीं मानते, तो इन्हें इनके हाल पर छोड़ो। वह समय अब निकट है जब वे यह कामना करेंगे कि काश, हमने यह आचरण न अपनाया होता।
दोनों का मूलभाव वही सचेत करना और शुभ सूचना देना (इंज़ार व बशारत) है, जो पिछली सूरतों से चला आ रहा है। अपितु, इतना अंतर आ गया है कि परिणामों का वर्णन अब और अधिक स्पष्ट हो गया है, और समझाने-बुझाने और सचेत करने के स्थान पर भर्त्सना और कठोर फटकार आ गई है। दोनों सूरतों में संबोधन मूल रूप से क़ुरैश क़बीले से है, और इनकी विषय-वस्तु यह स्पष्ट होता है कि मक्का में ये सूरतें पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के प्रचार के 'इत्माम-ए-हुज्जत' के चरण में अवतरित हुई हैं।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
यह सूरह 'अलिफ़ लाम रा' है। यह ग्रंथ है जो हमने तुम्हारी ओर उतारा है, इसलिए कि तुम लोगों को अंधेरों से निकालकर प्रकाश में ले आओ, उनके प्रभु की अनुमति से, उस परमेश्वर के मार्ग की ओर जो प्रबल है, जो अपने आप में प्रशंसनीय है। वही परमेश्वर कि समस्त आकाशों और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। (तुम इसको नकारोगे? याद रखो), उनके लिए जो इस ग्रंथ के नकारने वाले हैं, एक भीषण यातना की बर्बादी है। उनके लिए जो दुनिया के जीवन को परलोक की अपेकषा प्राथमिकता देते हैं और परमेश्वर के मार्ग से रोकते हैं और उसमें टेढ़ापन पैदा करना चाहते हैं। ये लोग बहुत दूर की पथभ्रष्टता में हैं। (इनके लिए यह ग्रंथ इनकी भाषा में उतारा गया है) और (हमारी रीति यही है कि) हमने जो रसूल भी भेजा है, उसकी क़ौम की भाषा में भेजा है, इसलिए कि वे उन्हें अच्छे से स्पष्टता के साथ समझा दे। फिर परमेश्वर जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार) भटका देता है और जिसका चाहता है, मार्गदर्शन करता है। वह प्रबल है, बड़ा प्रज्ञावान है।
हमने इसी प्रकार मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था कि अपनी क़ौम को अंधेरों से निकाल कर प्रकाश में लाओ और उन्हें परमेश्वर के दिनों की याद दिलाओ, जिनमें उसका दिव्य निर्णय प्रकट हुआ है)। इसमें संदेह नहीं कि इनमें हर उस व्यक्ति के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (परमेश्वर की परीक्षाओं में) धैर्य और (उसकी कृपाओं पर) आभार व्यक्त करने वाला हो।
याद करो, जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अपने ऊपर परमेश्वर के उस वरदान को याद रखो, जब उसने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छुड़ाया जो तुम्हें अत्यंत भीषण यतनाएँ देते थे, वह तुम्हारे बेटों को ढूंढ-ढूंढ कर मार देते थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रखते थे। तुम्हारे प्रभु की ओर से इसमें (तुम्हारे लिए) बड़ा अनुग्रह था। और याद करो, जब तुम्हारे प्रभु ने सावधान कर दिया था कि यदि तुम कृतज्ञ रहोगे तो अवश्य मैं तुमको और अधिक दूंगा और यदि अकृतज्ञता करोगे तो मेरा दण्ड भी बड़ा कठोर है। और मूसा ने (इसके साथ) सचेत भी कर दिया कि यदि तुम अकृतज्ञता करो और धरती के सारे लोग भी इसी प्रकार अकृतज्ञ हो जाएँ तो परमेश्वर का कुछ नहीं बिगाड़ोगे, इसलिए कि परमेश्वर निस्पृह और अपने आप में प्रशंसनीय है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात इस विपत्ति से मुक्ति दिलाने में। ↩
तुम्हें उन लोगों की सूचना नहीं पहुंची जो तुमसे पहले बीत चुके हैं? नूह की क़ौम, आद व समूद और जो उनके बाद हुए हैं, जिन्हें परमेश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जानता। उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए तो उन्होंने अपने हाथ उनके मुँह में दे दिए (कि चुप हो जाओ) और कह दिया कि जो तुम्हें दे कर भेजा गया है, हम उसको नहीं मानते और जिस चीज़ की ओर तुम हमको बुला रहे हो, उसके बारे में हम ऐसी शंका में पड़ गए हैं जो अत्यंत उलझन में डाल देने वाली है। उनके रसूलों ने कहा: क्या परमेश्वर के बारे में शंका है जो समस्त आकाशों और पृथ्वी को अस्तित्व में लाने वाला है? वह तुम्हें बुला रहा है कि तुम्हारे पापकर्मों में से क्षमा करे (जो इससे पहले तुमसे हुए हैं) और तुमको एक निर्धारित समय तक ढील दे। उन्होंने उत्तर दिया: तुम हम जैसे एक मनुष्य ही हो। तुम चाहते हो कि हमें उन चीज़ों की भक्ति से रोक दो जिन्हें हमारे पुरखे पूजते आए हैं। (यही बात है) तो हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण लाओ। उनके रसूलों ने उनसे कहा: निस्संदेह, हम तुम्हारे जैसे ही मनुष्य हैं, परंतु परमेश्वर अपने दास-जनों में से जिस पर चाहता है, कृपा करता है। यह हमारे अधिकार में नहीं है कि परमेश्वर की अनुमति के बिना हम तुम्हें कोई प्रमाण ला कर दिखाएं। (तो तुम्हारी यह मांग परमेश्वर के हवाले है) और मानने वालों को चाहिए कि (इस प्रकार के मामलों में) परमेश्वर ही पर भरोसा रखें। और हम क्यों न परमेश्वर पर भरोसा रखें, जबकि हमारे ये मार्ग उसी ने हमें दिखा दिए हैं ? तुम जो कष्ट भी हमें दे रहे हो, हम उस पर हर परिस्थिति में धैर्य करेंगे और (परमेश्वर पर भरोसा करेंगे, इसलिए कि) भरोसा करने वालों को परमेश्वर ही पर भरोसा करना चाहिए। इस पर नकारने वालों ने अपने रसूलों से कह दिया कि तुमको अपने इस देश से अवश्य निकाल देंगे या तुम्हें अंततः हमारे संप्रदाय में वापस आना होगा। तब उनके प्रभु ने उनकी ओर वह्य भेजी कि हम इन अत्याचारियों का सर्वनाश कर देंग। और इनके बाद तुम्हें इस देश में बसाएंगे। यह शुभ सूचना है उनके लिए जो मेरे सामने (जवाबदेही के लिए) खड़े होने से डरे और जो मेरी चेतावनी से डरे।
उन्होंने निर्णय चाहा था, तो निर्णय हो गया और हर निरंकुश हठधर्मी असफल हुआ। अब उसके आगे नरक है। वहां उसको पीप का पानी पिलाया जाएगा। वह उसको घूंट-घूंट पिएगा और गले से उतार न सकेगा। मृत्यु हर ओर से उस पर आघात कर रही होगी, परंतु मरने न पाएगा और आगे एक और कठोर दण्ड उसकी प्रतीक्षा में होगा।
जिन लोगों ने अपने प्रभु से कुफ़्र किया है, उनके कर्मों का उदाहरण उस राख के समान है जिस पर आँधी के दिन तीव्र हवा चल जाए। उन्होंने जो कुछ किया होगा, उसमें से कुछ भी न पा सकेंगे। यही दूर का भटकाव है। क्या तुमने देखा नहीं कि परमेश्वर ने समस्त आकाशों और धरती को सोद्देश्य पैदा किया है? (यह उसकी दी हुई छूट है कि वह तुम्हारे इस कुफ़्र और शिर्क को सहन कर रहा है)। वह चाहे तो तुम्हें ले जाए और एक नई रचना (तुम्हारे स्थान पर) ले आए। यह परमेश्वर के लिए कुछ भी कठिन नहीं है।
(यह छूट अति शीघ्र समाप्त हो जाएगी) और सब परमेश्वर के सामने खड़े होंगे। फिर जो कमज़ोर थे वे उनसे जो बड़े बने हुए थे, कहेंगे: हम तुम्हारे पीछे चलने वाले थे तो क्या परमेश्वर के दण्ड से हमें कुछ बचा लोगे? वे उत्तर देंगे कि यदि परमेश्वर ने हमारा मार्गदर्शन किया होता तो हम भी तुम्हारा मार्गदर्शन करते। अब हमारे तुम्हारे लिए समान है कि चीखें चिल्लाएँ या बर्दाश्त करें, हमारे बचने का कोई उपाय नहीं है।
और जब निर्णय पारित कर दिया जाएगा तो शैतान कहेगा: सत्य यह है कि परमेश्वर ने तुमसे सच्चा वादा किया था, (तो उसने वह पूरा कर दिया) और मैंने भी तुमसे वादा किया था, परंतु मैंने तुम्हारे साथ वचनभंग किया और मेरा तुम पर कोई ज़ोर तो था नहीं, मैंने इसके अतिरिक्त कुछ नहीं किया कि तुम्हें निमंत्रण दिया और तुमने मेरे निमंत्रण को स्वीकार किया। इसलिए मेरी निंदा न करो, अपने आप ही की निंदा करो। अब न मैं तुम्हारी गुहार को पहुंच सकता हूं, न तुम मेरी गुहार को पहुंच सकते हो। तुमने जो मुझे साझी बनाया था, मैंने उसको पहले ही नकार दिया है। सत्य यह है कि इसी प्रकार के अत्याचारी हैं जिनके लिए कठोर दण्ड है।
इसके विपरीत जिन लोगों ने मान लिया और उन्होंने अच्छे कर्म किए हैं, वे ऐसे बाग़ों में पहुंचाए जाएँगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। वे अपने प्रभु की अनुमति से वहां सदा रहेंगे। उनका अभिवादन शब्द उन बाग़ों में एक दूसरे के लिए सलाम होगा।
(यह इसलिए कि उनके ज्ञान और कर्म का आधार एक पवित्र वाक्य है)। क्या तुमने देखा नहीं कि परमेश्वर ने एक अच्छे वाक्य का उदाहरण किस प्रकार बताया है? वह एक अच्छे वृक्ष के समान है जिसकी जड़ें धरती में उतरी हुई और जिसकी शाखाएं हवा में फैली हुई हैं। वह अपने प्रभु की अनुमति से अपना फल हर फसल में देता रहता है। (यह एक अच्छे वाक्य का उदाहरण है) और परमेश्वर लोगों के लिए उदाहरण देता है ताकि वे स्मरण प्राप्त करें।
और इसके विरुद्ध एक बुरे वाक्य का उदाहरण एक बुरे वृक्ष का है जो धरती के ऊपर ही से उखाड़ लिया जाए, उसको कोई स्थायित्व न हो।
मानने वालों को परमेश्वर इसी टिकाऊ बात से इस लोक और परलोक, (दोनों) के जीवन में स्थायित्व प्रदान करेगा और जो (अपने आप पर) अत्याचार करने वाले हैं, उनको परमेश्वर (लक्ष्य से) भटका देगा। परमेश्वर (अपने ज्ञान और अपनी प्रज्ञा के अनुसार), जो चाहे, करता है।
तुमने देखा नहीं उन लोगों को जिन्होंने परमेश्वर के वरदान के बदले में अकृतज्ञता की और अपनी क़ौम को विनाश के घर — नरक — में ला कर उतारा है? वे उसमें प्रवेश करेंगे और वह कैसा बुरा ठिकाना है! उन्होंने परमेश्वर के सहभागी बनाए ताकि (लोगों को) उसके मार्ग से भटका दें। उनसे कहो, मौज कर लो, तुम्हारा ठिकाना अंततः नरक ही की ओर है।
(हे पैग़ंबर), मेरे जिन बंदों ने मान लिया है, उनसे कह दो कि नमाज़ का प्रबंध रखें और जो कुछ हमने उनको दिया है, उसमें से सार्वजनिक रूप से और गुप्त रूप से (परमेश्वर के मार्ग में) दान करें, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें न लेन-देन होगा और न कोई मित्रता काम आएगी।
(ये मुश्रिक देखते नहीं कि) परमेश्वर ही है जिसने समस्त आकाशों और धरती की रचना की और आकाश से पानी उतारा, फिर उससे तुम्हारी जीविका के लिए अनेक प्रकार के फल निकाले और नाव को तुम्हारे काम में लगा दिया कि उसके आदेश से समुद्र में चले और उसने नदियों को तुम्हारे काम में लगाया। और सूरज और चाँद को तुम्हारे काम में लगाया, दोनों निरंतर चले जा रहे हैं। इसी प्रकार दिन और रात को भी उसने तुम्हारे काम में लगाया। और तुम्हें हर चीज़ में से, जो तुम ने मांगी, प्रदान किया। यदि तुम परमेश्वर के उपहारों को गिनना चाहो तो नहीं गिन सकते। (इस पर भी परमेश्वर के सहभागी बनाते हो)? सत्य यह है कि मनुष्य बड़ा ही अन्यायी और बड़ा अकृतज्ञ है।1
टिप्पणियाँ 1
- अर्थात वह प्रत्येक वस्तु प्रदान की जिसकी तुम्हारी प्रकृति व संरचना (फ़ित्रत) को आवश्यकता थी और जिसकी चाहत तुम्हारे भीतर रख दी गई; इसी आवश्यकता को यहाँ 'माँगने' से व्यक्त किया गया है। ↩
(ये इब्राहीम की संतान हैं)। इन्हें वह घटना सुनाओ, जब इब्राहीम ने प्रार्थना की थी कि मेरे प्रभु, इस नगर को शांति का नगर बना और मुझे और मेरी संतान को इससे दूर रख कि हम मूर्तियों की पूजा करने लगें। प्रभु, इन मूर्तियों ने बहुत लोगों को पथभ्रष्टता में डाल दिया है। (यह मेरी संतान को भी भटका सकते हैं), इसलिए (जो इनमें से) मेरा अनुसरण करे, वह तो मेरा है और जिसने मेरी बात नहीं मानी, उसका मामला तेरे हवाले हैं, फिर तू क्षमा करने वाला है, तेरी कृपा शाश्वत है। हे हमारे प्रभु, मैंने अपनी कुछ संतान को तेरे प्रतिष्ठित घर के पास एक बिन खेती की घाटी में लाकर बसाया है। प्रभु, इसलिए कि वे इस घर में नमाज़ का प्रबंध करें। तो तू लोगों के दिल उनकी ओर आकर्षित कर दे और उन्हें फलों की जीविका प्रदान कर, ताकि वे (तेरा) आभार व्यक्त करें। प्रभु, तू जानता है जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ व्यक्त करते हैं। सत्य यह है कि परमेश्वर से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, न धरती में, न आकाश में। परमेश्वर का आभार है जिसने मुझे इस बुढ़ापे में इस्माईल और इस्हाक़ दिए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरा प्रभु प्रार्थना सुनने वाला है। प्रभु, मुझे नमाज़ का प्रबंध करने वाला बना और मेरी संतान को भी, (जिन्हें मैं यहाँ बसा रहा हूं)। प्रभु, और मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कर। प्रभु, तू मुझे क्षमा कर दे और मेरे माता पिता को और सभी मानने वालों को क्षमा कर दे, उस दिन जब हिसाब-किताब स्थापित होगा।
ये अत्याचारी जो कुछ कर रहे हैं, तुम परमेश्वर को उससे कभी बेपरवाह न समझो, (हे पैग़ंबर)। वह इन्हें केवल उस दिन के लिए टाल रहा है जिसमें आँखें हक्की-बक्की रह जाएंगी । ये सर उठाए हुए भाग रहे होंगे, इनकी दृष्टि (उठेगी तो) इनकी ओर पलट कर नहीं आएगी और इनके दिल कांप रहे होंगे।
तुम इन लोगों को उस दिन से सचेत कर दो, जिस दिन इन्हें दण्ड आ पकड़ेगा। उस समय ये अपने आप पर अत्याचार करने वाले कहेंगे कि हे हमारे प्रभु, हमें थोड़ा सा समय और दे दे, हम तेरा आह्वान स्वीकार कर लेंगे और तेरे रसूलों का अनुसरण करेंगे — क्या तुम इससे पहले क़समें नहीं खाते रहे थे कि तुम (अपने स्थान से) हटने वाले नहीं हो? तुम उन्हीं लोगों की बस्तियों में बसे थे जिन्होंने अपने प्राणों पर अत्याचार किए थे और तुम पर स्पष्ट हो चुका था कि हमने उनके साथ क्या मामला किया और हमने तुम्हारे लिए उनके उदाहरण दे दिए थे। उन्होंने अपनी सब चालें चल देखी। उनकी ये चालें अब परमेश्वर के पास धरी हैं, यद्यपि उनकी चालें ऐसी थी कि उनसे पर्वत भी हिल जाएं।
अतः कभी यह न सोचो कि परमेश्वर अपने रसूलों से किए हुए वादों के विरुद्ध करेगा। निस्संदेह परमेश्वर प्रबल है, वह प्रतिशोध लेने वाला है। उस दिन को याद रखो, जब यह धरती एक अन्य धरती से बदल दी जाएगी और आकाश भी और सब (अकेले, असहाय) अद्वितीय और पराक्रमी परमेश्वर के सामने निकाल खड़े होंगे। उस दिन तुम अपराधियों को देखोगे कि बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। उनके वस्त्र तारकोल के हैं और उनके चेहरों पर आग छाई हुई है। यह इसलिए कि परमेश्वर हर व्यक्ति को उसकी कमाई का बदला दे। निस्संदेह, परमेश्वर शीघ्र हिसाब चुका देने वाला है। यह लोगों के लिए एक घोषणा है, इसलिए कि उन तक सत्य निर्णायक रूप से संचारित हो जाए और इसलिए कि वे इसके माध्यम से सचेत कर दिए जाएं और इसलिए कि वे जान लें कि वही एकमात्र उपास्य है और इसलिए कि बुद्धिजीवी (इससे) स्मरण प्राप्त कर लें।