सूरह 97
अल्-क़द्र
मक्की · 5 आयतें · 2 अनुच्छेद
परिचय
ये दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। पहली सूरह जिस ईश्वरीय ग्रंथ (क़ुरआन) की महानता को स्पष्ट करती है, दूसरी में उसी को अस्वीकार करने वालों को उनके अंजाम के बारे में सचेत किया गया है। दोनों में मूल रूप से संबोधन की दिशा क़ुरैश क़बीले की ओर है, लेकिन दूसरी सूरह में ‘यहूदी व ईसाई’ (अहल-ए-किताब) भी उन आपत्तियों के कारण चर्चा में आ गए हैं, जिन्हें वे इस अंतिम चरण में क़ुरैश को सिखा रहे थे। इनकी विषय-वस्तु से यह स्पष्ट होता है कि पिछली सूरतों की भाँति ये भी, मक्का से मदीना प्रवास (हिज्रत) से कुछ समय पूर्व, मक्का में पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के धर्मप्रचार के इत्माम-ए-हुज्जत के चरण में अवतरित हुई हैं।1
टिप्पणियाँ 1
- इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य का इस प्रकार निर्णायक रूप से स्पष्ट हो जाना कि नकारने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। ↩
पहली सूरह — अल्-क़द्र — का विषय क़ुरैश के लिए यह सत्य स्पष्ट करना है कि जिस क़ुरआन को उनके सामने पढ़ा जा रहा है, वह न तो किसी शैतान की प्रेरणा (इल्हाम) है और न ही किसी पैग़ंबर की व्यक्तिगत आकांक्षा का परिणाम, बल्कि यह दिव्य वाणी है, जिसे सभी लोकों के स्वामी ने पूर्ण व्यवस्था के साथ उस रात्रि में उतारना प्रारंभ किया जो उसकी योजना में महत्वपूर्ण निर्णयों के निष्पादन के लिए निर्धारित है। इसलिए वे इस क़ुरआन को कोई साधारण चीज़ न समझें। इस ग्रंथ के प्रति उनका रुख उनके लिए सदा के घाटे का कारण बन सकता है।
दूसरी सूरह — अल्-बय्यिनह — का विषय क़ुरैश और अहल-ए-किताब, दोनों को यह चेतावनी देना है कि उनकी यह मांग अत्यंत निरर्थक है कि क़ुरआन के स्थान पर कोई ऐसा ग्रंथ आना चाहिए जिसे परमेश्वर का कोई दूत आकाश से लेकर उनके लिए पढ़ता हुआ उतरे। यदि वे इसी प्रवृत्ति पर डटे रहे, तो वे सावधान हो जाएँ कि शीघ्र ही वे नरक की आग का ईंधन बन जाएंगे।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है।
हमने इस क़ुरआन को उस रात में उतारा है जिसमें भाग्य के निर्णय होते हैं। और तुम क्या जानो कि वह निर्णयों की रात क्या है? निर्णयों की रात हज़ार महीनों से अच्छी है। उसमें फ़रिश्ते और रूह-उल्-अमीन अपने प्रभु की अनुमति से हर मामले का आदेश ले कर उतरते हैं।
वह सर्वथा शांति है, उषा के उदय तक।